Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 31–40
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40
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तृतीयखण्ड ( १६ ) – - “ शब्दप्रमाणका वयं, यदस्माकं शब्द आह, तदस्माकं प्रमाणम् ' इस सिद्धान्त को मानने वालों की दृष्टि में युक्ति - तर्क हेतु वादों का कोई महत्त्व नहीं है । अत्र तक हमनें तर्कादि के द्वारा ही शब्द का नित्यत्त्व व्यवस्थित किया है । परन्तु श्रत्र हम उस शब्दप्रमाण को उद्धृत करते हैं, जिसकी श्रामाणिकता ग्राम्तिकजगत् में सर्वमूर्द्धन्या मानी जाती है । निम्नलिखित श्रौत - स्मार्त्त - लिङ्ग ( वचन ) शब्द को ब्रह्म बतलाते हुए, वाग्देवी को अनादिनिधना मानते हुए इसकी नित्यता का ही समर्थन कर रहे हैं— १ – ‘ “ बाग् ब्रह्म ” ( श्रुतिः ) २ - " वाचा विरूपनित्यया ” ( श्रुतिः ) ३ - " अथो वागेवेदं सर्वम् " ( श्रुतिः ) ४ - " बाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता " ( श्रुतिः ) ५ - " अनादिनिधना नित्या वामुत्सृष्टा स्वयम्भुवा " ( स्मृतिः ) " ( ६ ) । * * ( ५ ) — सब्दवाचकच निरूपाम् ( स्वसिद्धान्त समर्थनम् ) * " श्रौत्पपत्तिकस्तु ० " ( १/१/५ ) आरम्भ कर “ लिङ्गदर्शनाच्च " ( १।१।२३ ) पर्यम्त ( १६ सूत्रों से ) सूत्रकार ने शब्द की नित्यता, अनित्यता का विचार करते हुए सिद्धान्त में शब्दनित्यत्त्ववाद स्थापित किया । अत्र “ उत्पत्तौ वाऽवचनाः स्युः ० " ( १।१।२४ ) इत्यादि से प्रारम्भ कर " लोके सन्नियमान् ० " ( १ | १ | २६ ) पर्य्यन्त सूत्रत्रयी के द्वारा वाचकत्त्व, अवाचकत्व के सम्बन्ध में सूत्रकार अपना अभिप्रात्र प्रकट करते हैं । प्रश्न इस सम्बन्ध में यह उपस्थित होता है कि, ' शब्द और अर्थ का यदि श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध है, तो शब्द अर्थों के वाचक किस आधार पर मान लिए गए '! । यही विषयोत्थानिका करते हुए सूत्रकार कहते हैं * — ( २० ) " शब्द, तथा अर्थ, दोनों का प्रादुर्भाव यद्यपि एक नित्य वाकूतत्त्व हुआ है । तथापि चे शब्द उन अर्थों के वाचक नहीं माने जा साकते । शब्दार्थ क्योंकि समानप्रभव हैं, अतः इनके औत्पत्तिकं सम्बन्ध स्वीकार करने में भी कोई आपत्ति नहीं जा सकती । परन्तु एतावता ही शब्दों का वाचकत्व सिद्ध नहीं होता । यदि अर्थ का शब्द निमित्त होता, दूसरे शब्दों में यदि अर्थाविर्भाव में शब्द का सहयोग होता, तो इस निमित्त - सम्बन्ध से यथाकथंचित् शब्दों को अथों का वाचक माना जा सकता था । परन्तु ऐसा नहीं * — विज्ञानदृष्टि से शब्द, तथा अर्थ, दोनों की उत्पत्ति एक ही वाकतत्त्व से हुई है, जो कि वाकूतत्त्व सर्वथा नित्य है । प्रकृत जैमिनिसूत्र इसी नित्या वाक् को लक्ष्य में रख कर प्रवृत्त हुए हैं । दूसरे शब्दों में जैनिनि ने जिस शब्द को नित्य कहा है, वह यही वाक्तत्व है, जिससे अर्थ, और वर्णात्मक अनित्यशब्द का प्रादुर्भाव हुआ है । इस विज्ञानदृष्टि का आगे के परिच्छेदों में विस्तार से स्पष्टीकरण होने वाला है । अभी प्रस्तुत सिद्धान्त का ( यथोद शपक्षानुसार ) स्वीकार करके ही हमें सूत्रत्रयी का समन्वय करना है | १३
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भाष्यभूमिका है । शब्द, अर्थ. दोनों के आविर्भाव का निमित्त तीसरा वाक्तत्त्व है, एवं इसी लिए शब्दार्थ का समान-प्रभवत्त्व भी सिद्ध होता है । दो समान प्रभवों में एक दूसरे का परस्पर लिङ्ग ( परिचायक ) नहीं बन सकता । जत्र कि शब्द अर्थ का निमित्त नहीं है, दोनों का आविर्भाव समकक्षा में आता हुआ जत्र स्वतन्त्र है, तो कभी शब्दों को अर्थों का वाचक नहीं माना जा सकता । जब शब्द अर्थ का वाचक ही नहीं, तो ऐगी शब्दलक्षणा चोदना को धर्म में क्यों कर प्रमाण माना जा सकता है " ( १ ) । ( २१ ) समानप्रभवस्व हेतु के द्वारा वाचकत्त्व का विरोध उद्धत कर, इस पक्ष का निराकरण करते हुए आगे जाकर सूत्रकार कहते हैं कि, शब्द की अनिमित्तता के आधार पर ही शब्दों की वाचकता का विरोध नहीं किया जा सकता । जिस किया से, जैसी क्रिया से अर्थों का आविर्भाव हुआ है, उसी क्रिया से, वैसी ही क्रिया से शब्दों का आविर्भाव हुआ है । अर्थात् शब्दब्रह्म, अर्थब्रह्म दोनों का आविर्भाव, श्राविर्भावा-नुबन्धिनी क्रिया समतुलित है । जैसी जो व्यवस्था शब्दब्रह्म की है, वैसी वही व्यवस्था अर्थब्रह्म की है । ( जैसा कि आगे के परिच्छेदों में " शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति " इत्यादि सिद्धान्त के सम्बन्ध में स्पष्ट किया जाने वाला है ) । तात्पर्य्य कहने का यह हुआ कि, यद्यपि स्वयं शब्द अर्थ का निमित्त नहीं है, किन्तु शब्दाविर्भावानु-बन्धिनी प्रक्रिया अवश्य ही अर्थ का निमित्त बन रही है । शब्दानुबन्धिनी प्रकिया एक ऐसा साँचा है, जिसके अनुरूप ही अर्थ का आविर्भाव होता है । इसी कियासादृश्यलक्षण निमित्त के आधार पर ( वाचकाभिप्राय से ) शब्दों का समाम्नाय ( उच्चारण ) करना अन्यर्थ बन रहा है । उत्पत्तिक्रिया के प्रकार का प्रदर्शन ( लोकव्यवहार में ) उस क्रिया से उत्पन्न अर्थ को व्यक्त करता देखा जाता है । उदाहरण के लिए एक व्यक्ति अपने हाथ को यदि अपनी ओर लाने की क्रिया करता है, तो इस क्रिया से किसी अन्य व्यक्ति को बुलाने का तात्पर्य्य सूचित होता है । यदि हाथ को अपने से विरुद्ध जाने की क्रिया करता है, तो इससे उस व्यक्ति को लौटाने का संकेत सूचित होता है । इस दृष्टान्त के आधार पर जब हम शब्दार्थ की मीमांसा करने चलते हैं, तो हमें स्वीकार करना पड़ता है कि, शब्दों, तथा थों का समानप्रक्रिया से सम्बन्ध रहने के कारण एक के प्रदर्शन से अन्य का स्वरूप गतार्थ हो जाता है । प्रत्यक्ष में देखते हैं कि वक्ता जिस भाव को लक्ष्य बनाकर जिस प्रक्रिया से शब्द का उच्चारण करता है, श्रोता पर इस क्रिया के अनुरूप ही उन्चावच भावों का प्रभाव पड़ता है । सिद्ध होता जाता है कि, शब्द अपनी उत्पत्ति - क्रिया के संकेत द्वारा वैसे ही क्रिया से उत्पन्न अर्थ का बोध कराता हुआ अवश्यमेव उस अर्थ का वाचक बन रहा है ( २ ) ” । ( २२ ) — “ उत्पत्ति क्रिया के सादृश्य से जहाँ शब्दों का वाचकत्व सिद्ध हो रहा है, वहाँ औत्पतिकता भी दृढ़रूप से प्रमाणित हो रही है । दोनों का प्रभव एक, प्रभवप्रकिया समान, इसीलिए दोनों का औत्पत्तिक सम्बन्ध, एवं शब्दार्थ का वाच्यवाचकभाव निःसंदिग्ध बना रहा है । शब्द, अर्थ, दोनों सम-सम्बन्धी हैं । अतएव एक के द्वारा दूसरे सम्बन्धी का बोध हो पड़ता है, जैसाकि - ' एकसम्बन्धिज्ञानमपर-सम्बन्धिनः स्मारकं भवति ' इस न्याय से स्पष्ट है । गौ शब्द वाचक है, गौ पदार्थ वाच्य है, दोनों १४
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तृतीय ars का मूल एक ही आया वाक् है । यही कारण है कि, शब्द सुनने से गौपदार्थ बुद्धि में आ जाता है, एवं गोपदार्थ देखने से गौशब्द हमारे अन्तर्जगत् में प्रकट हो जाता है । इसप्रकार शब्दनित्यत्त्व, शब्दार्थ का श्रौत्पत्तिकत्त्व, शब्दार्थ का वाच्यवाचकत्व सर्वात्मना सिद्ध हो रहा है । अत्र इस सम्बन्ध में एक प्रश्न शेष रह जाता है । प्रकृत सूत्र उसी का समाधान कर रहा है । “ यच्च यावत् शब्दों तथा अर्थों का मूलप्रभव एक ही वाक्तत्त्व है, यह कहा गया है । यदि ऐसा है, तो सभी शब्दों को सभी अर्थों का वाचक होना चाहिए | सबसे सबका बोध होना चाहिए । परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं देखा जाता । प्रत्येक शब्द नियत अर्थ का ही सूचक बन रहा है । इससे तो यही सिद्ध हो रहा है कि, शब्दार्थ का औत्पत्तिक सम्बन्ध नहीं है, अपितु उत्पन्नसृष्टसम्बन्ध है । पीछे से शब्दों की योग्यता के अनुसर अर्थों का सम्बन्ध करा दिया गया है । " इसी विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— “ यद्यपि यह ठीक है कि, औत्पत्तिक सम्बन्ध के आधार पर सभी शब्द सत्र अर्थों के वाचक - तथापि व्यवहार की सुविधा के लिए शब्दार्थ के सम्बन्ध का, सम्बन्धानुबन्धी वाचकत्त्व का नियमन किया गया है । यह व्यवस्था की गई है कि, ' अमुक शब्द से अमुक अर्थ का ही ग्रहण करना चाहिए, अन्य अर्थों का नही | सिद्धान्तरूप से शब्द का सर्वार्थवाचकत्त्व रहने पर भी प्रयोग करने वाला व्यक्ति स्वप्रयुक्त शब्द से सांकेतिक नियत अर्थ का ग्रहण करता हुआ ही शब्द का प्रयोग करता है । तात्पर्य्य यह हुआ कि, ' अमुक अर्थ के अभिप्राय से अमुक शब्द प्रयुक्त हुआ है, सर्वार्थाभिप्राय से नहीं, इस नियम से प्रयोग के आधार पर प्रयोग के अनुरूप ही अर्थ का संनिकर्ष होगा । उदाहरण के लिए ' धूप ' शब्द को लीजिए । राजपूताना की प्रान्तीय भाषा में धूप शब्द के प्रयोग से सूर्य्यात्तफ्लक्षण अर्थ का महरण होता है । किन्तु शास्त्रभाषा में वही शब्द धूममय गन्धयुक्त द्रव्यविशेष का संग्राहक बन रहा हैं | इस नियमव्यवस्था का एकमात्र हेतु है लोकव्यवहार । प्रयोगात्मक शब्द को सुनने चाला श्रोता अपनी बुद्धि में लोकव्यवहार संचालन के लिए नियत अर्थ का ही संनिकर्ष प्राप्त करे, एकमात्र इसी हेतु से ' सर्वे सर्वार्थवाचका: ' इस सिद्धान्त पक्ष की उक्त व्यवस्था करना आवश्यक समझा गया है । यह व्यवस्था केवल व्यावहारिकी है, सिद्धान्ततः सभी शब्द सत्र अर्थों के वाचक हैं " ( ३ ) । तीनों सूत्रों की उक्त व्याख्या का निम्नलिखित दृष्टिकोण से भी समन्वय किया जा सकता है । “ एक ही वाक्तत्त्व से शब्दार्थ का आविर्भाव हुआ है । इसलिए हम मान लेते हैं कि, दोनों का औत्पत्तिक सम्बन्ध है । तथापि शब्दार्थ का वाच्य वाचक भाव नहीं बन सकता । समान उत्पत्ति स्वीकार कर लेने पर भी शब्द अर्थों के अवचन ( श्रवाचक ) ही मानें नायँगे । क्योंकि जो जिसका निमित्त होता है, वही उसका वाचक माना जाता है । इधर शब्द अर्थाविर्भाव का क्योंकि निमित्त नहीं है, अतएव शब्द अबाचक है ” ( १ ) । " यह ठीक है कि, शब्द अर्थ का निमित नहीं है, तथापि शब्दों का यही है कि, तत्तदर्थों के सम्बन्ध में लोकव्यवहारप्रक्रिया के उद्देश्य से समाम्नाय किया गया है! निघण्टु, निर्वचनादि प्रक्रियाओं के द्वारा पूर्वकाल से पदेशपरम्परा सुरक्षित देखी जाती है । यं काकः, अयं पिकः, इत्यादि व्यवहार १५ वाचकत्व अप्रतिहत है । कारण संकेतविधि से क्लृस्न शब्दों का आरम्भ कर अद्यावधि शब्दो-अविच्छिन्न रूप से चला आ
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मायभूमिका रहा है | आचाल - बृद्ध वनिता - सब काक पिकादि शब्दों से काक - पिकादि अथों का बोध कर रहे हैं । इस परम्परासिद्ध शब्दसमाम्नाय के आधार पर कहा जा सकता है कि, अमुक शब्द अमुक अर्थ में ही निरूढ़ है । निरूद्भाव से शब्द अवश्य ही अर्थों के वचन ( वाचक ) माने जा सकते हैं । शब्द अर्थ का निमित्त न सही, परन्तु परम्परासिद्ध समाम्नाव तो अर्थ का निमित्त है । वह समाम्नाय क्योंकि शब्दों का है, अतएव शब्द अवश्य ही अर्थो के वाचक हैं । जिस अर्थ में जो शब्द प्रयुक्त हुआ है, तदर्थ में प्रयुक्त वह सब्द अवश्य ही उस अर्थ का बोधक देखा जाता है । बिना वाचकत्त्व के ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता था ” ( २ ) । " श्रमुक शब्द से श्रमुक अर्थ का ग्रहण करना चाहिए " इस रूप से अर्थविशेष में यदि शब्द-विशेष का संकेत लक्षण समाम्नाय है, तो शब्द नित्यता पर श्राघात होता है I क्योंकि अर्थविशेषों के आधार पर शब्दविशेषों की कल्पना हमने की है । संस्कृत, ब्रोक इंगलिश, उर्दू, हिन्दी, मारवाड़ी, आदि - आदि तत्तत् भाषाशब्दों की कल्पना ( अर्थानुसार ) तत् मनुष्यसमाजद्वारा हुई है । कल्पना करने वाला मनुष्यसमाज सृष्टिकाल की अपेक्षा सादि सान्त है । भला इसकी कल्पना से सम्बंध रखने वाले शब्द क्योंकर निश्य हो सकते है " इस प्रकार वाचकत्व की रक्षा के लिए जिस समाम्नाय प्रक्रिया का आश्रय लिया जाता है, वह शब्द की नित्यता पर ही प्रहार करने वाली सिद्ध हो रही है । यदि शब्द नित्य हैं, तो वाचक नहीं मानें जा सकते । यदि समाम्नायविधि से वाचक हैं, सो नित्यता का व्यापात होता है । उक्त पूर्वपक्ष के सम्बन्ध में वक्तव्य यही है कि, जिस शब्दसमाम्नाय से जिन अर्थो का लोकव्यवहार में बोध होता है, वे शब्द मनुष्यों ने नहीं बनाए हैं । शब्दरचना करना मनुष्य व्यापार से सर्वथा वहिर्भूत है । पहिले से ( श्रमादिकाल से ) ही विद्यमान नित्य शब्दों के सम्बन्ध में मनुष्यसमाज लोकव्यवहार संचालन के लिए अर्थविशेष का नियमनमात्र करता है । यदि शब्द अनित्य होते, तो मनुष्यसमाज प्रयत्नसहस्रों से भी शब्दार्थसंकेत करने में असमर्थ रहता शब्दानित्यदशा में शब्द से अर्थ का बोध ही न होता । क्योंकि तत्काल उत्पन्न शब्द में संकेत सम्बन्ध सर्वथा गृहीत रहता है । अतः मानना पड़ेगा कि, शब्दों का काल सन्निकृष्ट ( सादि ) नहीं है, अपितु शब्दप्रयोगकाल सन्निकृष्ट है । इस प्रयोगसंनिकर्ष से शब्दनित्यता में भी कोई वाधा उपस्थित नहीं होती, एवं शब्दों का वाचकत्त्व तथा नित्यत्व भी क्षण जना रहता है ” ( ३ ) - ( इतिवाचकत्वावाचत्त्वप्रसङ्गः ) ४ - वाग्देवी के चार विवर्त'-जैसाकि पूर्व परिच्छेद के आरम्भ में बतलाया गया है, शब्द नित्यत्त्वानित्यत्त्व की मीमांसा करने वाले ' औत्पत्तिकस्तु ० ' इत्यादि मीमांसासूत्रों का विज्ञानदृष्टि से सम्बन्ध है । साथ ही सूत्रकार जिस विज्ञानदृष्टि से शब्दनित्यता स्थापित कर रहे हैं, सूत्रकार का वह ' शब्द ' शब्द अनादिनिधना तत्त्वात्मिका निश्यावाक से सम्बन्ध रखता है । पूर्वपरिच्छेद में मीमांसा सूत्रों की सङ्गति लगाते हुए जिस दार्शनिक दृष्टि से शब्दार्थ का श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध सिद्ध किया गया है, एवं जिस श्रीत्पत्तिक सम्बन्ध के आधार पर शब्द की नित्यता, तथा वाचकता सिद्ध की गई है, उससे एक वैज्ञानिक तबतक कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकता, जब तक कि उसके सामने शब्दार्थ की उत्पत्ति का मौलिक रहस्य न रख दिया जाय । इसी लक्ष्यसिद्धि १६
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तृतीयखण्ड के लिए वाक्तत्त्व का, एवं वाक्तत्त्व के सम्बन्ध रखने वाले शब्दार्थ की उत्पत्ति का मौलिक रहस्य विज्ञ पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जा रहा है । जिस वाग्देवी से सम्पूर्ण विश्व का एवं विश्वप्रजा का विकास हुआ है, वैज्ञानिको ने उसके ‘ परायाक्’-' अपरावाकू ' मेद से दो विवर्त्त मानें हैं । आनन्दघन - विज्ञानमय - मनः प्राणगर्भित नित्य वाकतत्त्व ही ' परावाक ' है । श्रानन्दघन - विज्ञानमय - मनःप्राणगर्भित वाकू ही आत्मा है, जैसा कि ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' इत्यादि बृहदारण्यकश्रुति से स्पष्ट है । इसी ग्राधार पर मनःप्राणगर्भिता इस परावाक को हम ‘ आत्मवाकू ' भी कह सकते हैं । केन्द्र में रहने वाले प्रजापति इसी वागूविज्ञान के कारण स्वमहिमा में प्रतिष्ठित रहते हैं । " वावा अस्य स्त्रो महिमा " - " स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः " इत्यादि श्रुतियाँ वाकू को ही उसकी महिमा बतला रहीं हैं । स्वमहिमा ( आत्ममहिमा ) लक्षणा यह परावाकू सत्य - आत्मारूपा होने से ' सत्या ' है, अतएव इसे ‘ सत्यावाक् ' भी कहा जा सकता है । इस सत्यावाक के साथ मन, और प्राण का सम्बन्ध बतलाया है । मन एक आधारपात्र है । इस पर प्रतिष्ठित गतिलक्षण प्राण के तपःकर्म्म से, एवं वाक् के श्रम से शब्दार्थसृष्टि का विकास हुआ है । गतिलक्षण प्रारण ही ' यत् ' है, स्थितिलक्षणा वाक् ही ' जू ' है । प्राणात्मक यत् ' वायु ' ( प्राणवायु ) है, वागात्मक जू ' आकाश ' है । दोनों की समष्टि ' यज्जू: ' है । यही परोक्ष प्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में ' यजुः ' है, यही तत्त्वात्मक नित्य ' यजुर्वेद ' है, जो कि वयं नाधलक्षण ऋक्-साम नामक आयतनों से नित्य वेष्टित रहता हुआ ' त्रयीवेद ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, जिसका कि भूमिका द्वितीय खण्ड में अनेक प्रकार से स्पष्टीकरण किया जा चुका है । सत्यस्वरूपा वह वाकू इस वेदमहिमा के कारण ' वेदवाकू ' नाम से भी व्यवहृत हुई है, जैसा कि ' वागविवृताश्च वेदा: ' इत्यादि निगम वचनों से स्पष्ट है | परावाङ्मय यही त्रयीवेद ' ब्रह्मनिःश्वसित ' नामक अपौरुषेय वेद है, जो कि सम्पूर्ण प्रपञ्च का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण बनता हुआ ' वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसृतिगुणकर्मतः ' ( मनुः ) - " सर्व वेदान प्रसिद्धयति ” ( मनुः ) इत्यादि मनुसिद्धान्तों को अन्वर्थं बना रहा है । यही वह सत्यवेद है, जिसकी अभिव्यक्ति सर्वप्रथम प्राणप्रधान, ब्रह्माक्षरयुक्त स्वयम्भूमण्डल में हुई है । अतएब जिसे ' स्वायम्भूववेद ' भी कहा जा सकता है । इसप्रकार स्वायम्भुववेद, सत्यवेद, प्राजापत्यवेद, त्रयीवेद, ब्रह्मनिःश्वसितवेद, इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध पौरुषेयवेद के आविर्भाव की मूल प्रतिष्ठा बनने वाली सत्यलक्षगा, मनः प्राणगर्भिता, आत्मवाक् ही ' परावाकू ' है । ब्राह्मप्राण ( ऋषिप्राण ) प्रधान स्वयम्भूमण्डल को अपना उक्थस्थान बनाने वाली यही परावाक आगे जाकर " आम्भृणीवाकू ', बृहतीवाकूर, सुब्रह्म एयात्राकू ', ' अनुष्टुवाक ', ' " चार इसप्रकार विवर्त्तभावों में परिणित हो जाती है । ' परमेष्ठी -सूर्य - चन्द्रमा - पृथिवी ' - इन चार लोकों के भेद से ही यह वाग्देवी चार स्वरूपों में परिणत होती है । वही अपने विशुद्ध वागरूप में ' सत्यावाक ' कहलातो है । एवं यौगिकावस्था में आकर आम्भृणी आदि नाम धारण कर लेती है, जैसाकि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । वाक्तत्त्व की इसी रूपचतुष्टयी का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है—
चच्चारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या बदन्ति " ॥
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मायभूमिका वाकतत्त्व के स्वरूप - स्पष्टीकरण के लिए उक्त मन्त्र एक विशेष महत्त्व रखता है, अतः इसकी व्याख्या कुछ विस्तार से की जायगी । ' निगमानुगमपरिभागविज्ञान ' के अनुसार उक्त मन्त्र का अनुगमभाव से सम्बन्ध है, अतएव इसके अनेक अर्थ होते हैं । नियत अर्थ का प्रतिपादन करने वाली श्रुति ' निगम श्रुति ' कहलाती है । एवं पदानुगत शब्दों के सादृश्य से अनेक अर्थों का प्रतिपादन करने वाली श्रुति ‘ अनुगमश्रुति ' कहलाती है । उदाहरण के लिए - ' यज्ञो वै विष्णुः ' यह श्रुति केवल विष्णुतत्त्व से सम्बन्ध रखती हुई निगम ति है । एवं ' पाइको वै यज्ञः ' यह श्रुति यज्ञ की अनेक रूपा पाक्कता का संग्रह करती हुई, उन सब पाहूक्त - भावों को अपने गर्भ में रखती हुई अनुगमश्रुति है । ' पोडशकलं वा इदं सर्वम् ' - ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् " - चतुर्द्धा विहितो छ वा अग्रेऽग्निरास ' इत्यादि श्रुतियां अनुगमभाव से सम्बन्ध रखतीं है । ' चत्त्वारि वाक् परिमिता ददानि ० ' इत्यादि मन्त्र वाक् की यच्चयावत् भावचतुष्टयी का संग्राहक बन रहा है । अतएव इसे हम अवश्य ही अनुगममन्त्र कह सकते हैं । वही कारण है कि, स्वयं श्रुति ने इसकी अनेक व्याख्या की है । महाभाष्यकार मगवान् पतञ्जलि ने इसी की शब्दशास्त्रानुबन्धिनी व्याख्या की है । वैदिक विज्ञान का यह सिद्धान्त है कि, प्रत्येक शब्द नियत अर्थ का ही वाचक है । शब्दों का पारस्परिक पर्य्याय सम्बन्ध अशुद्ध है । अतएव अनेकार्थकता विज्ञानविरुद्ध है । यद्यपि अनुगम वचनों के अनेक अर्थ होते हैं, तथापि उक्त सिद्धान्त का कोई विरोध नही होता । कारण, अनुगम मन्त्रों के अनेक अर्थ मन्त्रघटित शब्दों की नियतार्थव्याप्ति से ही सम्बन्ध रखते हैं । अपनी कल्पना से मनमाना अर्थ नही किया जा सकता । श्रपितु जहाँ जहाँ जिन जिन ग्रंथों में उन उन अनुगमशब्दों की नियन व्याप्ति है, उन्हीं का संग्रह होता है । इसलिए विरोध को अवसर नहीं मिलता । अस्तु, देखना यह है कि, प्रकृत अनुमगमन्त्र कितनें स्थानों में अपनी व्याप्ति रखता है? ( १ ) - प्रथम: पक्ष: -५- आम्भृणी - मुक्त रहस्य – वाक् के चार परिमित पद ( स्थान ) हैं, जिन्हें मनीषी बाह्मण ही जानते हैं । वेद ही ब्रह्म है, इस वेदब्रह्म को बान ने वाला ही ' ब्राह्मण ' है । वेदवित् विद्वान् ही वाक के इन चार रूपों को बान सकता है । वेदज्ञानशून्य साधारण ब्राह्मण, तथा इतर मनुष्य वाग्देवी के इस चातुर्विध्य जानने में असमर्थ है । बाक के वे चार पट क्रमशः ' आम्भृणी ', सुब्रह्मण्या, बृहती ', अनुष्टुप् " इन नामों प्रसिद्ध हैं । इन चारों में श्राग्ग्भ के सीन वाक् - विवर्त्त गुहानिहित हैं, गुप्त हैं, व्यवहारमर्य्यादा से प्रतीत हैं । शेष चौथा अनुष्टुप् - विवत्त ' ही वाक् का तुरीय पद है, जोकि तुरीयपद ममुष्यन्यवहार में उपयुक्त हो रहा है । क - च - ट - त - पादि वर्णात्मिका वाक् ही अनुष्टुप् है । यही वर्णवाक् भाषाव्यवहार की मूलप्रतिष्ठा बन रही है । इस वर्णवाक के गर्भ में आधार रूप से जो स्वरात्मिका वाक् प्रतिष्ठित है, वही ' बृहत्ती ' है । बृहती के गर्भ में तदाधारभूता सुब्रह्मण्यावाक् प्रतिष्ठित है, एवं सर्वाधारभूता वा आम्भृणीवाक् है । श्राम्भृणीवाक् चारों लोकों में प्रतिष्ठित रहती हुई सर्वव्यापिनी बन रही है । आम्भृणी की इसी सर्वव्यापिष्ट हुए निम्नलिखित मन्त्र हमारे सम्मुख उपस्थित हो रहे है-१८
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तृतीयखण्ड १ - " अहंरूद्र भिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वेदेवैः । मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ” ( ऋक्सं ० १० १२५।१ । ) । रुद्र, वसु, आदित्य, विश्वदेव, इन चार देवताओं के साथ तो वह वाग्देवी विचरण करती है, एवं-मित्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि, नासत्य, दस, इन ६ देवताओं की प्रतिष्ठा बन रही है । पार्थिव प्राणदेवता वसु हैं, आन्तरीक्ष्य प्राण देवता रुद्र हैं, दिव्य प्राणदेवता आदित्य हैं, चतुर्थलोकस्थ श्रान्यदेवता विश्वदेव हैं । ' पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ - श्रापः ' भेद से स्तौम्य पार्थिवलोक चार भागों में विभक्त हैं । ' मही ' नामक एक ही महापृथिवी के त्रिवृत् ( E ), पञ्चदश ( १५ ), एकविंश ( २१ ), त्रिणव ( २७ ), त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) भेद से पाँच संस्था - विभाग हैं । त्रयस्त्रिंशस्तोमावच्छिन्न पार्थिवलोक स्वयं उप वाग्देवी का प्रतिष्ठा स्थान है । इसी बाकू की व्याप्ति से पार्थित्र वषट्कार ( वाङ्मण्डल ) लक्षण महिमा का वितान हुआ है । ' देवपात्रं वा एष वपट्कारः ' के अनुसार इसी वाङ् मण्डल के गर्भ में सम्पूर्ण देवता प्रतिष्ठित हैं । वाक् की इसी सर्वव्याप्ति को लक्ष्य रख कर ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' - ' यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाकू ' - ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' इत्यादि वचन उद्धृत हुए हैं । महापृथिवी के वित्तोम प्रदेश में अग्निप्राणत्मक श्राट वसुदेवताओं का साम्राज्य है | पञ्चदशस्तोम प्रदेश में वायुप्रासात्मक एकादश रुद्रदेवताओं की स्थिति है | एकविंशस्तोमप्रदेश में श्रादित्यप्राणात्मक द्वादश श्रादित्यदेवताओं की प्रतिष्ठा है । एवं सप्तविंशस्तो प्रदेश में प्राप्यप्राणात्मक त्रयस्त्रिंश विश्व देवों का प्रभुत्त्व है । चार पार्थिवलोकों में प्रतिष्ठित चारों देवताओं के साथ पाँचवें त्रयस्त्रिशलोक में उक्थरूप से प्रति-ष्ठित उस श्राम्भृणीवाक् का सहचर सम्बन्ध होरहा है | ' अग्नि ' —- वायु ' --आदित्य 3 -- विश्वे देव ४ ' चारों देवता क्रमशः संज्ञ ' ( अचेतन ), अन्तःसंज्ञ २ ( द्ध चेतन ), ससंज्ञ ( चेतन ), सौम्यदिव्य जीवों के प्रधान प्रारम्भक बने हुए हैं । चारों जोव वाक्पुत्रात्मक शब्द की मर्य्यादा से श्राक्रान्त हैं । स्वयं वाकू स्थिर है, परन्तु वाक्पुत्र शब्द चर है, गतिमान् है । शब्दावच्छिन्ना गति के द्वारा वागूदेबी ने चारों के साथ सम्बन्ध कर रक्खा है । इसी गतिरहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुतिनं ' रुदभिर्वसुभिरादित्यैरुत विश्वेदेवैः ( सह ) चरामि ' यह कहा है । पार्थिवलोकमण्डल ही खगोल इयत्ता है । भूपिण्ड भूगोल है, भूमहिमा ( मही ) खगोल है । खगोल का उत्तर - दक्षिण ध्रुव से सम्बन्ध रखने वाले याम्योत्तरवृत्त ( ‘ उर्वशी ' ' सरा नाम से प्रसिद्ध ध्रुवप्रोतवृत्त - दक्षिणोत्तरवृत्त ) द्वारा पूर्व - पश्चिम कपालों में विभाजन हो रहा है | पूर्वकपालावच्छिन्न सौरप्राण ग्रागतिधर्म्म से मित्र है, पश्चिमकपालावच्छिन्न सौर प्रारण गति से वरुण है । भूपिण्डोपलक्षित पृथिवीलोक में अग्नि का साम्राज्य है, भूमहिमोपलक्षित लोक में सौर मघवेन्द्र का शासन है, जैसा कि, ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी ' इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । पृथिवी का ' शवसोनपात् ' देवता अग्नि है, द्युलोक का शवसोनपात् देवता इन्द्र है | इन्द्र, और अग्नि, दोनों का विभाजक देवता नासत्य - दस नामक सान्ध्य प्राणों का युग्म है । वही लोकव्यापिनी वाक् खगोल का स्वरूप सम्पादन करती हुई मित्रावरुण की प्रतिष्ठा बन रही है, वही पृथिव्यवच्छेदेन अग्नि की, द्युलोकावच्छेदेन इन्द्र की, अन्तरिक्षोपलक्षित सन्धिस्थानावच्छेदेन अश्विनीकुमारों की प्रतिष्ठा बन रही है । प्रकृत मन्त्र वागूदेवी की इसी गति, तथा प्रतिष्ठा का स्पष्टीकरण कर रहा है ” || १ || १६ ७
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भाष्यभूमिका २ -- ‘ “ अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् । दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते " । ( ऋक्सं ० १० । १२५ २। ) । " तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम आसीत् " इत्यादि श्रुति के अनुसार तृतीय स्थान से उपलक्षित पारमेष्ट्य मण्डल सोमतत्त्व का अपना प्रभव स्थान है । यह सोमतत्त्व सौर सावित्राग्नि में अनवरत आहुत होता हुआ सौर सम्वत्सर यज्ञ का सञ्चालक बन रहा है । इसी यज्ञबल से ज्योतिर्म्मय सौर देवता तमोमय सुर प्राण को ( अन्धकार को ) दूर करने में समर्थ होते हैं । ' त्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ ' ( ऋक ) इस ऋग्वर्णन के अनुसार दाह्य खोम ही दाहक सावित्राग्नि में श्राहुत होकर प्रकाश का जनक बनता है । तमोमय आसुर प्राण ज्योतिर्म्मय देवप्राण का शत्रु है, एवं शत्रुनाश ( अन्धकारनिवृत्ति ) का एक मात्र श्रेय सोम को है । अतएव इस तृतीय लोबस्य सोम को हम अवश्य ही ' आहनसं ' ( शत्रूणामाहन्तारं ) नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । श्रपिच यह पारमेष्ठ्य सोम श्रहन्तव्य है, यज्ञार्थ अभिषेोतव्य है, इस लिए भी इसे ' आइनस ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । पारमेष्ट्य मण्डलस्था वाक् ही आम्भृणी है । यही इस हनस सोम की प्रतिष्ठा बन रही है । त्वष्टा, पूषा, भग, तीनों आदित्य विशेष है । वस्तुओं में आकारविशेष प्रतिष्टित करना त्वष्टा प्राण का काम है, पोषण करना पूषाप्राण का काम है, ऐश्वर्य्य स्थापित करना भगप्राण का काम है । इस प्राणत्रयी की प्रतिष्ठा भी यही वाग्देवी है । आकारविशेष ही छन्द है, एषं ' वाक्परिमाणं छन्दः ' के नुसार वाक् हो त्वष्टारूप से सीमाभावात्मक छन्द की प्रतिष्ठा बनती हुई त्वष्टा की प्रतिष्ठा बन रही है । वस्तुपिएड की महिमा ही वस्तु पिएड की पुष्टि ( वितान ) है । इस महिमा का वितान वागवितानलक्षण वषट्कारमण्डल से सम्बन्ध रखता है । अतएव पुष्टयवच्छेदेन वाग्देवी को पूषा की भी प्रतिष्ठा माना जा सकता है । ऐश्वर्य्य, धर्म्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य, इन ६ ओं भर्गो की प्रवृत्ति आम्भृणीवाकू के द्वितीयरूप सरस्वती वाक् ( शब्दवाक् ) पर ही निर्भर है । शब्दोपदेश ही इस षडविधभगप्रवृत्ति का कारण है, श्रतएव इसे इस भग की भी प्रतिष्ठा कह सकते हैं । वाकूतत्त्व के इस मौलिक पारमेष्ठ्य रूप को जान कर जो यजमान अपने सम्वत्सरयज्ञ में सोमाहुति प्रदान करता है, उस शोभनहविः प्रदाता यजमान के लिए वह वाग्देवी विपुल सम्पत्ति प्रदान करती है । अर्थात् सोमयज्ञ की मूलप्रतिष्ठारूप वाकू के मौलिक रहस्यपरिज्ञान से सोमयज्ञ यथाविधि सम्पन्न होता है, एवं ऐसा यज्ञ अवश्य ही द्रविण ( अभिलषित फल ) प्राप्ति का कारण बनता है ” ॥ २ ॥
“ अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरि स्थात्रां भृगवेिशयन्तीम् ” ( ऋक्सं ० १०।१२५।३ । ) । “ प्रकृत मन्त्र में वाग्देवी की विश्वरूपता का वर्णन हुआ है । वह वाग्देवी राष्ट्री है । राष्ट्र का सञ्चालन करने वाली है । राष्ट्र का प्रधान बल है ' वाकसम्पति ' । जो राष्ट्र वाकतत्त्व का परिज्ञाता है, वही सुसमृद्ध रह सकता है । क्योंकि राष्ट्र के सम्पूर्ण कर्म्म -कलापों के सञ्चालन की मूलप्रतिष्ठा वागवल ही है, जिसे कि विज्ञान-२०
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तृतीय ars भाषा में ' ब्रह्मबल ' कहा जाता है । स्वयं राष्ट्र क्षत्रबल है, कर्म्मबल है, वाग्देवी ब्रह्मबल है, ज्ञानबल है । राष्ट्र का तीसरा बल ' अल ' है । अर्थबल भी वाक् | सम्बन्ध रखता है । वाक ही जहां अपने सरस्वतीरूप से वाग-बल की अधिष्ठात्री बनती हुई राष्ट्री है, वहाँ यही अपने आम्भृणीरूप से पञ्चभूतात्मिका बनती हुई ' वसूनां संगमनी ' ( धनसंगमयित्री ) है । किसी भी विषय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने वाला विद्वान् ' चिकितुट् ’ कहलाता है, जैसाकि - ' चिकितुषे जनाय ' ( ऋकसं ० १।१६ ४ ६ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । बुद्धि में जो एक प्रकार की धिषणात्मिका वृत्ति ( उपज ) प्रतिष्ठित रहती है, तद्वृत्तियुक्त मनुष्य ही चिकितुट् कहलाता है, एवं इस वृत्ति की मूलप्रतिष्ठा भी यही वाग्देवी है । अतएव वाग्देवी को ' चिकिकुतुषी ' कहा जा सकता है । प्राकृतिक जितने भी यज्ञकर्म्म हैं, उनके सञ्चालक प्राणदेवता आधिदैविक यज्ञिय देवता हैं । एवं वैध यज्ञकम्मों के सञ्चालक भूसुर आधिभौतिक यज्ञिय देवता हैं । दोनों यज्ञियों के यज्ञों का उपक्रम यही वाग्देवी हैं । वेदवाक् ही ग्रह-स्तोत्र - शस्त्र कर्मों के द्वारा यनुः - साम - ऋगूरूप से यशियों के यज्ञकर्म्म की प्रथम भूमिका ( उपक्रमस्थाम ) बन रही है । इसप्रकार विविधरूप से यत्रतत्र व्याप्त, यच्चयावत् भूतसर्ग में प्रविष्ट ऐसी इस वागूदेवी को प्राकृत प्राणदेवता मुझ में अनेक रूप से प्रतिष्ठित कर रहे हैं । आध्यात्मिक जितने भी कर्म हैं, सबकी मूलप्रतिष्ठा यही आधिदैविक वाक्तत्त्व है, यही तात्पर्य्य है ” ॥ ३ ॥
४ – “ मयासो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणितिय ईं शृणोत्युक्तम् । -अमन्तवो मां त उपक्षियन्ति श्रुधि श्रुतः श्रद्धिव ं ते वदामि ” ( १०।१२५ | ४ | ) | प्रकृत मन्त्र में वाग्देवी के अन्नादभाव का स्पष्टीकरण हुआ है । आधिदैविक प्राणदेवता, आधिभौतिक भूताग्नि, श्रधियाज्ञिक यज्ञाग्नि, आध्यात्मिक शरीराग्नि इस वागदेवी के विशेषरूपों से ही अन्नादान करने में समर्थ हैं । प्राकृतिक प्राणदेवता जिस धरातल पर प्रतिष्ठित होकर अन्नग्रहण करते है, वह पात्र ' वषट्कार ' नाम से प्रसिद्ध है | वषट्कार वह वाङ्मय धरातल है, जिसका ४८ वें अहर्गण पर्य्यन्त वितान होता है | इव वाङ्मय वषट्कार मण्डल के २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त यज्ञिय ३३ प्राण देवता प्रतिष्ठित हैं । पार्थिववाक् का ६ स्तोमों में वितान ही ‘ वाकू – प्रट्कार ’ लक्षण वषट्कार है । ' देवपात्र ' वा एष वषट्कारः ' के अनुसार यही देवताओं का श्राधारपात्र है । इस पात्राधार पर प्रतिष्ठित प्राणदेवता जिस दिव्याग्नि के द्वारा अन्नग्रहण करते हैं, उसे ‘ आस्पात्र ' ( आस्य – मुख – रूप पात्र ) कहा गया है, जैसाकि – “ आस्पात्रं जुहूर्देवानामू ” – “ देवपत्र ं घा एष बदग्निः ” ( शत ० १ | ४ | ४ | १३ ) इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । यह अग्नि भी ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ' के अनुसार वागूरूप ही है । इसप्रकार आधारपात्र – मुखपात्र - रूप से उभयथा यह प्राकृतिक वाक्तत्त्व ही देवताओं के लिए अन्नग्राहक बन रहा है । प्रत्येक भौतिक पिण्ड आदान विसर्गात्मिका क्रिया पर ही अवलम्बित है । चेतनजगद्वत् ये जड़पदार्थ भी अन्नादान से वञ्चित नहीं हैं । इन का यह आदानकर्म्म पिएडगत वैश्वानर संज्ञक अग्नि से ही सञ्चालित है । यह वै ० अग्नि ही भूतवाक् नाम से व्यवहृत हुआ है । इस दृष्टि से यहाँ भी वाकू ही अन्नग्राहिका बन रही है । २१
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एवमेव आध्यात्मिक संस्था में भी मुखस्थित वागग्नि ही अन्नमाहिका बनी हुई है । इसी अन्नग्रहण से वाक्तत्त्व ' त्रि ' नाम से व्यवहत हुआ है, जैसा कि निम्न लिखित वाजिश्रुति से स्पष्ट है— “ वागेवात्रिः । वाचा ह्यन्नमद्यते । अत्तिर्ह नैं नामैतत् - यदत्रिरिति ” ( शत ० ० ४ ५ २ २ ) । अधियज्ञ में ( पुरुषप्रयत्नसाध्य वैघ यज्ञों में ) मन्त्रवाक् रूप से यही वाक् अन्नाहुतिप्रदात्री बन रही है । इसप्रकार सब दृष्टियों से वाग्देवी को यह कहने का अधिकार है कि - " सब मेरे द्वारा ही अन्न खाते हैं'-" मयासो अन्नमत्ति " । प्राकृतिक प्राणाग्नि ( देवाग्नि - सम् त्सराग्नि ) ही वाकू है । इस वागग्नि के ' अग्नि, वायु, आदित्य ' भेद से तीन विवर्त्त ' हैं । ये ही तीनों क्रमश ' वाक् प्राण- चक्षु ' इन्द्रियों के स्वरूप समर्पक माने गए हैं । अन्न-ग्रहण करने वाली वाक् आलोमभ्य - श्रनखाग्रेभ्यः व्याप्त रहने वाली वैश्वानरा निलक्षणा वाकू है, जिस के लिए ' मयासो अन्नमसि ' यह कहा गया है । इस का स्वरूप नागिन्द्रिय लक्षण वाकू से भिन्न है, जिस का अगले मन्त्र में स्पष्टीकरण होने वाला है I । वागिन्द्रिय के अतिरिक्त जो प्राण तथा चक्षुरिन्द्रियाँ हैं, वे भी वाङ्मय ही हैं । क्योंकि वायु - तथा आदित्य उसी वागग्नि की अवस्थास्तर हैं । जो कुछ हम देखते हैं, जो कुछ प्राणकर्म्म करते हैं, वह भी इसी वाक का अनुग्रह है । शब्द सुनना भी वाकसमुद्र के बिना असम्भव है । वाकसमुद्र ही बीचि -न्याय से शब्दश्रवण का कारण बनता है । इसप्रकार खाना, देखना, कर्म - करना, सुनना – सब कुछ वाक्तत्त्व पर ही अवलम्बित है । अथवा मन्त्र के पूर्व भाग का दूसरे प्रकार से भी समन्यय किया जासकता है । जीववर्ग - ' असंज्ञ - अन्तःसंज्ञ-ससंज्ञ ' भेद से तीन श्रेणियों में विभक्त है । संज्ञ जीव लोष्ट - पाषाणादि हैं, अन्तःसंज्ञ जीव श्रोषधि - वनस्प त्यादि हैं, एवं ससंज्ञ जीव श्रस्मदादि हैं । अचेतन असंज्ञ जोवों में न प्राणव्यापार है, न शब्द ग्रहणशक्ति हैं । आप पुकारिए, इनसे कोई उत्तर न मिलेगा । स्वरूप पर दृष्टि डालिए, कोई व्यापार प्रतीत न होगा । केवल ऐसा प्रतीत होगा, जैसे कोई मुग्ध मनुष्य न कुछ करता है, न कुछ सुनता है, केवल देख रहा है । ' यो विपश्यति ' से तिने इन्हीं अचेतन जीवों का संग्रह किया है । श्रद्ध चेतन वृक्षादि में प्राणव्यापार अवश्य है, श्रतएव ये ऊर्ध्वप्ररोहित होते हैं । परन्तु प्रत्युत्तर देने में ये भी असमर्थ हैं । ' यः प्राणिति ' से इन्ही श्रद्धचेतनों का संग्रह हुआ है | श्रस्मदादि देखते भी हैं, कर्म्म भी करते हैं, सुनते भी हैं, प्रत्युत्तर भी देते हैं । ' यई शृणोति ' से इन्हीं का संग्रह हुआ है । वाग्देवी तीनों प्रकार के जीवों के अन्नादान -कर्म की अनुग्राहिका बन रही है । जो व्यक्ति वाक्तत्त्व के उक्त स्वरूप को नहीं जानते, वे लोकसम्पत्ति से वञ्चित रह जाते हैं । वाक ही सर्वज्ञान, सर्वकर्म की श्रधिष्ठात्री है । ज्ञान - कर्म्म ही सम्पत्ति के संग्राहक हैं । ऐसे सम्पत्तिकामुक व्यक्तियों से त्रैलोक्य व्यापक वाग्देवी अपने भौतिक वैभव को हमारे सम्मुख रखती हुई हमसे मानो यह कह रही है कि, हे मनुष्यो! तुम मेरे स्वरूप को पहिचानो । मैं श्रद्धय - श्रद्धाद्वारा प्राप्तव्य उस ब्रह्म का बखान करती हूँ, जो सर्व-सम्पत् - प्राति का मूलाधार है । वाग्ब्रह्म ही तो ' वाचीमा विश्वाभुवनान्यर्पिता ' के अनुसार सर्वसिद्धि की प्रतिष्ठा है ॥४ ॥
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