Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 221–230

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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६- आपनत्रह्मरहस्याधिकरणम् तृतीयखण्ड नवमोऽनुवाकः ( ३२६। ) । १० - अध्यात्मत्रह्मरहस्याधिकरणम् दशमोऽनुवाकः ( ३।१० । ) । इति - दशाधिकरणात्मकं - विश्व विवर्त्तनिरूपणाधिकरणम् । समाप्ता चेयं तृतीया भृगुवल्ली समाप्ता चेयं तैत्तिरीयोपनिषत् ३ = -ऐतरेयोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय— ८ - ऐतरेयोपनिषत् - ( प्राजापत्यप्राणबर्णनपरेयमुपनिषत् ) - प्रज्ञात्मकः प्राणः प्राजापत्यः इस उपनिषत् के सम्बन्ध में हमें कुछ विशेष वक्तव्य है । ' ऐतरेय उपनिषत् ' का जो स्वरूप वर्त्तमान में ‘ उपनिषत ' रूप से उपलब्ध हो रहा है, केवल उसी पर ' उपनिषत् ' मर्य्यादा का अवसान नहीं माना जा सकता । ‘ उपनिषत् ' शब्द का जो अवच्छेदक माना गया है, जिसका कि भूमिका- प्रथम खण्ड में विस्तार से विश्लेषण किया जा चुका है, उसके अनुसार ऐतरेयोपनिषत् का वही रूप उपनिषत् शब्द से ग्राह्य माना जिसके सम्बन्ध में अवच्छेदक मर्य्यादा घटित होगी । ' ब्राह्मणलक्षण विधि, आरण्यक उपनिषत् ' जायगा, कर्त्तव्यात्मक वेदभाग के ये तीनों पर्व समष्टिरूप से ' ब्राह्मण ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । इसी व्यवहार के प्रमाणस्वरूप ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इत्यादि वचन प्रसिद्ध हैं । यहाँ ब्राह्मण शब्द से विधि, आरण्यक, उपनिषत्, तीनों गृहीत हैं । ‘ बहुवृचब्राह्मणोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ' इत्यादि व्यवहार भी एतन्मू-लक ही हैं । ‘ जैमिनीयब्राहमणोपनिषत् ' अभिधा भी ब्राह्मण शब्द की इसी सर्वव्याप्ति का समर्थन कर रही है । ' बृहदारण्यकोपनिषत् ' नाम से जो एक स्वतन्त्र उपनिषत् मानी जाती है, वह वस्तुतः सुप्रसिद्ध शतपथ-ब्राह्मण का ही अन्तिम भाग है । ब्राह्मणग्रन्थ के १४ वें काण्ड का ही नाम बृहदारण्यक है । इस सम्बन्ध में भी यह विशेषरूप से ध्यान रखना पड़ेगा कि, विधि भागात्मक ब्राह्मणभाग की अपेक्षा आरण्यक का उपनिषत् से विशेष सम्बन्ध माना गया है । श्रारण्यक, और उपनिषदों के प्रवच्छेदक समतुलित हैं | हमारी प्रस्तुत ऐतरेयोपनिषत् कोई स्वतन्त्र उपनिषत् नहीं है । अपितु ऐतरेय आरण्यक के भागविशेष का ही नाम ऐतरेयोपनिषत् है । ऐतरेय ब्राह्मण का अवसान ' अथाथो ब्रह्मणः परिमरः ' ( ऐ ० ना ० ) इस परिमरविद्या पर हुआ है । इसके अनन्तर हमारे सामने आरण्यक उपनिषदात्मक ( उभयात्मक ) ऐतरे-यारण्यक आता है । ' अथ महाव्रतम् ' ( ऐ ०१० | १० | १० ) यहाँ से आरण्यक का आरम्भ है, एवं “ ब्रह्म भवति, ब्रह्म भवति ” ( ऐ ०५० | १० | ३० ) यहाँ पर आरण्यक की समाप्ति है । इस आरण्यक में ५ आरण्यक हैं, एवं प्रत्येक में क्रमशः ५,७,२,१, ३, इतनें अध्याय हैं । इस अरण्यकग्रन्थ का एक प्रकरण-विशेष ही आज दिन विद्वत् - समाज में ' ऐतरेयोपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं दार्शनिक - मतवाद से सम्बन्ध रखने वाले इस उपनिषत् का निम्न लिखित स्वरूपपरिचय है-२०५

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प्रचलित - ऐतरेयोपनिषत् -भाष्यभूमिका खण्डोपक्रमवास्य " आत्मा वा इदमेक एवाम आसीन् ” खण्डोपसंहारवाक्य " रेतस आपः " ( इति १ खण्डः ) । खण्डोपक्र " ता एता देवताः सृष्टाः ” खण्डोपसं ॰ " अशनायापिपासे भवतः " ( इति २ खण्ड: ) । खण्डोपक्र • " स ईक्षतेमे नु लोकाश्च ” खण्डोपसं ० " परोक्षप्रिया व हि देवाः " ( इति ३ खण्ड: । इत्यैतरेये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः उपनिपत्सु प्रथमोऽध्यायः ·· खण्डोपक्र • " पुरुषे हवा अयम् " खण्डोपसं • “ समभवत् समभवत् ” ( इति चतुर्थ खण्डः ) । इत्यैतरेयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः उपनिषत्सु द्वितीयोऽध्यायः " कोऽयमात्मेति ० " खण्डोपक्र ० खण्डोपसं • “ समभवत् समभवत् " ( इति पञ्चमखण्डः ) । इत्यैतरेयारण्य पष्ठोऽध्यायः उपनिषत्सु तृतीयोऽध्यायः इत्यैतरेयोपनिषत् - सम्पूर्णा -. तात्पर्य्य कहने का यह निकला कि, ऐतरेय आरण्यक के द्वितीय आरण्यक का त्रिखण्डात्मक चतुर्थ-अध्याय १ खण्डात्मक पञ्चम अध्याय १ खण्डात्मक षष्ठ अध्याय, इतने प्रकरण का नाम प्राचीनों ने ' ऐतरेयोपनिषत् ' रक्खा है । प्राचीनों से हमारा लक्ष्य केवल अद्वैतसम्प्रदायवादी ( श्रीशङ्कराचार्य्याः ) है! २०६

पृष्ठ 223

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तृतीयखण्ड आपनें, एवं आपके अनुयायी श्रीश्रानन्दगिरि, आदि व्याख्याताओं नें ऐतरेयोपनिषत् का उक्त स्वरूप ही माना है? परन्तु वेदभाष्यकार सर्वश्री सायणाचार्य्य ने इस उपनिषत् का बृहत् स्वरूप हमारे सामने रक्खा I और इस स्वरूप के सम्बन्ध में कहना पड़ेगा कि, उपनिषत् शब्द का अवच्छेदक सायणाभिमत पाठ के साथ ही समन्वित हो रहा है | अतः हम भी इसी स्वरूप को लक्ष्य बना कर प्रतिपाद्य विषयतालिका उद्धृत करेंगे । द्वितीय आरण्यक से आरम्भ कर तृतीय आरण्यक समाप्तिपर्य्यन्त सायणाभिमत ' ऐतरोयोपनिषत् ’ है | द्वितीय आरण्यक का आरम्भ - " एष पन्थाः, एतत्कर्म्म, एतद् ब्रह्म, एतत् सत्यम् ' ( ऐ ० आ ० २ आ ० । १ आ ० i १ खं ० । ) यहाँ से हुआ है, यही ऐतरेयोपनिषत् का उपक्रम है । एवं तृतीयारण्यक की समाप्ति-“ इत्याचार्य्याः, इत्याचार्याः ” ( ऐ ० ० ३ ० २ ० ६ खं ० । ) यहाँ हुई है, और यही ऐतरेयोप-निषत् का उपसंहार है । इसी को लक्ष्य में रखते हुए प्रतिपाद्य विषयों का दिग्दर्शन विज्ञानसम्मत माना जायगा । द्वितीयारण्यक का उपक्रम करते हुए सायणाचार्य ने - ' उपनिच्छन्दो ब्रह्मविद्यामाचष्टे ' यह कहा है । स्पष्ट है कि, वे यहीं से उपनिषत् का आरम्भ मानते हैं । एवं तृतीयारण्यक के अन्त का ' अथातः संहिताया उपनिषत् ' वचन स्पष्ट कर रहा है कि, सायणाचार्य्य तृतीयारण्यक - समाप्ति पर्य्यन्त उपनिषत् का स्वरूप स्वीकार कर रहे हैं । ऐतरेयोपनिषत् ने प्रज्ञा - प्राणमय इन्द्राक्षर को अपना लक्ष्य बनाते हुए ' प्रज्ञानात्मा ' नामक प्रज्ञान ब्रह्म का ही विश्लेषण किया है । सम्भूति - विनाशात्मक प्रज्ञानब्रह्म ही उपनिषत् का प्रधान विषय है । प्रजा ( भूत ), आदि सृष्टियों का मूल यही प्रज्ञानब्रह्म है, जिसे पार्थिव इरा - रसमय होने से ‘ इरामय ' कहा गया है । एवं जो कि इरामय प्रज्ञानब्रह्म परोक्षभाषा में ' हिरण्मय ' कहलाया है । सौर विज्ञानात्मा जहाँ सौर - हिरण्य तेज के सम्बन्ध से हिरण्यमय है, वहाँ चान्द्रतत्त्वगर्भित पार्थिव प्रज्ञानात्मा पार्थिव इरामय के सम्बन्ध मे हिरण्मय है । यह हिरण्मय ( प्रज्ञान ) तभी तक अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित रहता हुआ जीवनसत्ता का कारण बना रहता है, जब तक कि इसका हिस्रमय ( विज्ञानात्मा ) के साथ ग्रन्थिबन्धनसम्बन्ध सुरक्षित बना रहता है, अतः उस हिरण्मय को ही आयुः स्वरूपरक्षक माना गया है । वही हिरण्मय प्राण ( विज्ञानप्राण-सौरप्रास ) ' बृहतीप्राण'- ' विश्वामित्रप्राण ' इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । नवाक्षर बृहतीछन्द ही सौर बृहतीप्राण की प्रतिष्ठा है । बृहती छन्द के चार पादों के ३६ अक्षर हैं । प्रत्येक अक्षर साहस्री के सम्बन्ध से सहस्र - सहस्र महिमा रूप में परिणत रहता है, जैसाकि - ' सहस्रधा महिमानः सहस्रम् ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । इसप्रकार ३६ बृहतीप्राण के ३६००० विवर्त्त हो जाते हैं । इन्हीं के लिए उपनिषत् में “ बृहती ' ( ३६ ) –सहस्र ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । प्रत्येक प्राण वाकू मन से अनुग्रहीत है । मनःप्राणवाङ्मय यही बृहतीप्राण ( सौरविज्ञानप्राण ) हमारा ( प्रज्ञान का ) आत्मा ( प्रतिष्टा ) है । प्रतिदिन सूर्थ्य से हमें ज्ञानमय मन, क्रियामय प्राण, वाङ्मय अर्थरूप एक एक बृहतीप्राण प्राप्त होता रहता | ३६ हजार प्राणों का यह आदानक्रम ३६ हजार दिन में समाप्त हो जाता है । यही पुरुष का शतायुर्भोगकाल है । बृहतीसहस्रानुगत इसी आयुर्भोगकाल के आधार पर ' शतायुर्वै पुरुषः ' - ' शतं जीवेम शरदः ' इत्यादि निगम प्रतिष्ठित हैं । ) प्रज्ञानसम्परिष्वक्त विज्ञानप्राणलक्षण बृहतीप्रारण के निरूपण के अतिरिक्त इस उपनिषत् में चतुर्विध-लोकसृष्टि, देवसृष्टि, भूतसृष्टि, शब्दसृष्टि, पुरुषसृष्टि, स्तोमविज्ञान, रेतःसृष्टि, ब्रहागिरि, कर्म्मगिरि, अन्नान्नाद-

पृष्ठ 224

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भाष्यभूमिका विवर्त्त, प्रजापति - संहिता, आदि अनेक तात्त्विक विषयों का वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है, जैसा कि विषयतालिका से अनुमान लगाया जा सकता है— द्वितीयारण्यकेप्रथमोऽध्यायः ( उपनिषत्सु प्रथमोऽध्यायः ) ( १ ) १ - प्रजासृष्टिविज्ञानाधिकरणम् -- द्वितीयारण्य के १ अध्याये १ खण्डः । ( २ ) २ - उक्थविज्ञानाधिकरणम्-" २ खण्ड: । 19 ( ३ ) ३ - रेतः सृष्टिविज्ञानाधिकरणम्-" ३ खण्डः । ( ४ ) ४ - प्रपदब्रह्मविज्ञानाधिकर णम्-४ खण्ड: । 29 39 ( ५ ) ५ - प्रहितांसंयोगविज्ञानाधिकरणम्-,, ५ खण्ड: । 29 ( ६ ) ६ – छन्दः स्वरूपविज्ञानाधिकरणम्-६ खण्ड: । " " 99 ( ७ ) ७ - पुरुषविभूति विज्ञानाधिकरणम् ७ खण्ड: । " 99 ( ८ ) = -ब्रह्म - कर्म्मगिरिविज्ञानाधिकरणम्,, ८ खण्ड: । " इति - द्वितीयारण्यके - अष्टखण्डात्मकः प्रथमोऽध्यायः द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः-( ६ ) १ - प्राणबिभ ूतिविज्ञानाधिकरणम् – द्वितीयारण्यके २ अध्याये १ खण्डः ( १० ) २ - प्राणाक्षरविज्ञानाधिकरणम ( ११ ) ३ - प्राणव्याप्ति विज्ञानाधिकरणम् ( १२ ) ४ - बृहती प्राणविज्ञानाधिकरणम् २ खण्ड: 99 29 ३ खण्ड: 29 13 ४ खण्डः इति- द्वितीयारण्यके ४ खण्डात्मको द्वितीयोऽध्यायः द्वितीयारण्यके तृतीयोऽध्यायः-( १३ ) १ - अन्नान्नादविज्ञान. धिकरणम् ( १४ ) २ - प्राणभृत - विज्ञानाधिकरणम ( १५ ) ३ - पञ्चत्रिधपुरुषविज्ञानाधिकरणम् ( १६ ) ४ - यज्ञरहस्यविज्ञानाधिकरणम् ( १७ ) ५ - अनुष्टुपू द्वितीयारण्यके ३ अध्याये १ खरडः 39 " " २ खगड: 13 19 ३ खण्डः ४ खण्ड: 39 " ५ खण्ड: 23 " २०५

पृष्ठ 225

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तृतीयखण्ड ( १८ ) ६ - महदुक्थविज्ञानाधिकरणम् ( १६ ) ७ - आत्मसम्प्रदानविज्ञानाधिकरणम् ( २० ) = - पश्चाक्षर विज्ञानाधिकरणम् द्वितीयारण्यके ३ अध्याये ६ खण्डः " " " " ७ खण्डः " ८ खण्डः I इति - द्वितीयारण्यके ८ खण्डात्मकस्तृतीयोऽध्यायः द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः— ( २१ ) १ - लोकप्रजाविर्त्त विज्ञानाधिकरणम् ( २२ ) २ - इन्द्रियोरप त्तिविज्ञानाधिकरणम् ( २३ ) ३ - इन्द्रपुरुष ( विज्ञानात्म ) विज्ञानाधिकरणम द्वितीयारण्यके ४ अध्याये १ खण्डः " " २ खण्डः " " ,, ३ ख ७: इति - द्वितीयारण्यके ३ खण्डात्मकश्चतुर्थोऽध्यायः इत्यैतरेयोपनिषत्सु प्रथमोऽध्यायः -१-द्वितीयारण्यके - पञ्चमोऽध्यायः - ( उपनिषत्सु द्वितीयोऽध्यायः ) ( १ ) १ - गर्भविवर्त्त विज्ञानाधिकरणम् द्वितीयारण्यके ५ अध्याये १ खण्डः • इति द्वितीयारण्यके १ खण्डात्मकः पञ्चमोऽध्यायः द्वितीयारण्यके - षष्ठोऽध्यायः-( २ ) १ - प्रज्ञानब्रह्म विज्ञानाधिकरणम् द्वितीयारण्यके ६ अध्याये १ खण्डः इति -- द्वितीयारण्यके १ खण्डात्मकः षष्ठोऽध्यायः इत्यैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयोऽध्यायः -२--द्वितीयारण्यकं समाप्तम् X तृतीयारण्यके - प्रथमोऽयायः ( उपनिषत्सु तृतीयोऽयायः ) ( १ ) १ - माण्डूकेय संहितोपनिषद्विज्ञानाधिकरणम् ( २ ) २ - शाकल्यसंहितोपनिपद्विज्ञानाधिकरणम् ३ आरण्यके १ अध्याये १ खण्ड: " २ खण्ड: " २०६

पृष्ठ 226

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( ३ ) ३ - निर्भुजप्रवादविज्ञानाधिकरणम् भाष्यभूमिका ३ आरण्यके १ अध्याये ३ खण्डः ४ खण्ड: " " I " ५ खण्ड: ६ खण्ड: " " " ( ४ ) ४ - प्राण वंशविज्ञानाधिकरणम् ( ५ ) ५ - निर्भुजवक्यविज्ञानाधिकरणम् ( ६ ) ६ - विविधसंहितोपनिषद्विज्ञानाधिकरणम् इति तृतीयारण्यके ६ खण्डात्मकः प्रथमोऽध्यायः = तृतीया के द्वितीयोऽध्यायः-( ७ ) १ - अन्नमयपुरुषविज्ञानाधिकरणम् - ३ ० ( ८ ) २ - सम्वत्सर पुरुष विज्ञानाधिकरणम्- " २० १ खण्डः 99 २ खण्ड: ३ खण्ड: 29 ४ खण्ड: " ५ खण्ड: " ६ खण्ड: ( ६ ) ३ - पुरुषचतुष्टय विज्ञानाधिकरणम्— ( १० ) ४ - मृत्युपरिज्ञानविज्ञानाधिकरणम्-- " ( ११ ) ५ - देवीवीणाविज्ञानाधिकरणम्- 19 ( १२ ) ६ - वाग्ब्रह्मविज्ञानाधिकरणम्-- " इति - तृतीयारण्यके - ६ खण्डात्मको द्वीतीयोऽध्यायः इत्यैतरेयोपनिषत्सु तृतीयोऽध्यायः ३ तृतीयारण्यकं समाप्तम् समाप्ता चेय मैतरेयोपनिषत् ३६ - छान्दोग्योपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय— ६- छान्दोग्योपनिषत् - ( विज्ञानात्मवर्णनपरेषमुपनिषत् - सूर्य्यविद्यात्मिका ) ε उपनिषत् - साहित्य के स्वाध्याय से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि, छान्दोग्य उपनिषत् परिभाषादृष्टि से कठिनतम है । जिस रहस्यपूर्ण संक्षिप्त भाषा में जिन रहस्यपूर्ण तत्त्वों का इस उपनिषत् में विश्लेषण हुआ । है, उनका लौकिक ( हिन्दी ) भाषा में स्पष्टीकरण कर देना सर्वथा असम्भव है । हम नहीं समझते कि, ' छान्दो -ग्योपनिषत् - हिन्दी- विज्ञान - भाष्य ' लिख कर हम कहाँ तक अपने प्रयत्न में सफल हुए हैं । वस्तुतः स्थिति २१०

पृष्ठ 227

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तृतीयखण्ड तो यह है कि, तत्त्व वेदत्रयी के सामतत्त्व से सम्बन्ध रखने वाला शब्दात्मक मन्त्र - ब्राह्मणलक्षण सामवेद ऋक - यजुः - अथर्व की अपेक्षा कहीं विशेष रहस्यपूर्ण है । इसका एकमात्र कारण है तात्त्विक सामवेद के एक सहस्रविवर्त्त ' । यही कारण है कि, समस्त ब्राह्मणग्रन्थों में ' ताड महाब्राह्मण ' सामपवों का विश्लेषण करता हुआ भाषादृष्टि से, तथा गभीरार्थदृष्टि से, उभयथा एक जटिल समस्या बन रहा है । ‘ मन्त्रब्राह्मण | योर्वेदनामधेयम् ' सिद्धान्त के अनुसार सामवेद भी इतर वेदों की भाँति ' मन्त्र - ब्राह्मण ’ भेद से दो भागों में विभक्त है । इन दोनों में सामवेदीय ' ब्राह्मण ' भाग निम्नलिभित भेदों से आठ भागों में बिभक्त माना गया है-१ - प्रौढब्राहाण ( महात्राह्मण ) २ - षडविंशत्राह्मण ३ – सामविधानब्राह्मण ४ - आर्षेयब्राह्मण ५ - दैवत ब्राह्मण ( देवताध्याय ) ६ - उपनिषद् ब्राह्मण ( मन्त्रब्राह्मम् ) ७ - संहितोपनिपत् ६ - वंशब्राह्मण कितनें हीं विद्वानों के मतानुसार सामविधान ब्राह्मण ( ३ ), " श्रायब्राह्मण ( ४ ), दैवतब्राह्मण ( ५ ), * संहितोपनिषत् ( ६ ), " धंशब्राह्मण ( ८ ), इन पाँच ब्राह्मणग्रन्थों को समष्टि एक ' अनुब्राह्मण ' है, एवं यह् गौण है । वस्तुतः सामवेद का मुख्य ब्राह्मण एक ' मानना उचित है । इस मुख्य ब्राह्मण में ४० अध्याय हैं, जिनका २४, १, ५, १, ८, २, इस प्रकार विभाग हुआ है । २४ अध्यायों की समष्टि स्वतन्त्ररूप से ' ताण्डघमहात्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध है । १ अध्यायात्मक २५ वाँ अध्याय ' पञ्चविंशत्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध है । २६ से ३० वें अध्याय पर्य्यन्त ५ अध्याय समष्टि ' षडविंशब्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध है । ३१ से ३८ वें श्रध्यायपर्थ्यन्त ८ श्रध्यायसमष्टि ही ' छान्दोग्योपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं अगले २ अध्यायों की समष्टि ' उपनिषद्ब्राह्मण ' ( मन्त्रब्राह्मण नाम से प्रसिद्ध है । १ — ताण्ड्यमहाब्राह्मण- १ अध्याय से २४ अध्यायपर्यन्त ( २४ ) २ – पञ्चविंशब्राह्मण -- २५ वाँ अध्याय ( १ ) ३ – पडूविंशश्राह्मण —- २६ ० से ३० अ ० पर्यन्त ( ५ ) ४ – छान्दोग्योपनिपन् - ३१ ५— उपनिषद्ब्राह्मण – ३६ ० से ३८ ० पर्यन्त ( ८ ) ० से ४० अ ० पर्यन्त ( २ ) २११ - सामब्राह्मण

पृष्ठ 228

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भाष्यभूमिका ८- श्रध्यायात्मिका छान्दोग्योपनिषत् के प्रतिपाद्य विषयों का दिग्दर्शन अपेक्षित है । यह उपनिषत् सामोपनिषत् है । जिस प्रकार मूर्ति ( पिण्ड ) का ऋक् से, गति का यजुः से सम्बन्ध है, एवमेव तेजोमण्डल-लक्षण महिमामण्डल का साम से सम्बन्ध माना गया है, जैसा कि ' सर्व तेजः सामरूपं हि शश्वत् ' वचन से प्रमाणित है । पाञ्चभौतिक, योगमायावच्छिन्न विश्व में मध्यस्थ सूर्य्य तेजोमय है । इसी तेजोभाव के आधार पर हम कह सकते हैं कि, सूर्य्य में सामतत्त्व प्रधानरूप से विकसित है । सहस्ररश्मियुक्त सूर्य्यं सहस्र सामण्डलों से अभिन्न रहता हुआ ' सहस्रवत्मा सामवेदः ' को चरितार्थ कर रहा है । सामसम्बन्ध में सर्वत्र सूर्य्य ही लक्ष्य बन रहा है, जैसा कि निन्न लिखित कुछ एक निदर्शनों से स्पष्ट है— १ - " सामवेद आदित्यान " ( ऐत ० ब्रा ० २ । ७ । ) । २ – “ सूर्य्यात् सामवेदः ' ' ( शत ० ११५ । ८ । ) । ३ – “ आदित्यात् सामानि ” ( कौ ० ६ । १८ । ) । ४ – “ सामान्यादित्यात् ” ( छा ० उ ० ४।१७।२ । ) । ५ - " सामवेद आदित्यात् ' ' ( जै ० उ ० ब्रा ० ३ | १५ | ७ | ) | ६ – “ सामवेदोऽमुष्मात् " ( षड्विंशब्रा ० ४ । १ । ) । ७– “ आदित्यात् सामवेदम् " ( गो ० पू ० १ । ६ । ) । ८ - " स्वर्गो लोकः सामवेद: " ( प ० ब्रा ० १ । ५ । ) । ६ - " अर्चिः सामानि ” ( शत ० १० | ५ | १ | ५ | ) | सामात्मक यही सौर - हिरण्य - तेज प्रवांश से आध्यात्मिक संस्था में प्रतिष्ठित होकर ' विज्ञानात्मा ' ( बुद्धि ) नामसे व्यवहृत हुआ है । “ साधारण दृष्टि से अव्ययानुगृहीत व्यापक अक्षरात्मा को लक्ष्य बनानें वाली उपनिषदे द्वारात्मिका विशेषदृष्टि की अपेक्षा से किसी एक खण्डात्मा को ही अपना प्रधान लक्ष्य बनाती हैं ", इस पारिभाषिक सिद्धान्त के अनुसार यहाँ भी प्रश्न उपस्थित होता है कि, " छान्दोग्य में प्रधान रूप से द्वारदृष्ट्या किस खण्डात्मा का निरूपण हुआ है? " । उत्तर स्पष्ट है । साम का सम्बन्ध तेजोमण्डल से है । तेजोमण्डल की वासभूमि सूर्य्य है । सूर्य्य ही प्रवर्ग्यात्मना विज्ञानात्मा है । फलत: सिद्ध हो जाता है कि, इतर अवान्तर विद्याओं के निरूपण के साथ साथ इस उपनिषत् में प्रधानरूप से ' विज्ञानात्मा ' का ही विश्लेषण हुआ है । विज्ञान के द्वारा ही यह अमृतात्मा को लक्ष्य बना रही है । श्राधिदैविक परिभाषा की दृष्टि से जहाँ इसे ' सूर्य्यविद्या - प्रति-पादिका " मामा जायगा, वहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से इसे विज्ञानात्मप्र तिपादिका कहा जायगा । इस प्रधान लक्ष्य-सिद्धि के साथ साथ जिन अवान्तर विषयों का प्रकृत उपनिषत में प्रतिपादन हुआ है, उनका अध्यायकम से दिग्दर्शन करा दिया जाता है । प्रस्तुत उपनिषत ू में आठ अध्याय हैं । प्रत्येक अध्याय में क्रमशः १, ४, १,, २४, १४, ,, खण्ड हैं । जिन विद्याओं, विद्यान्तर्गत उपनिषदों का इस उपनिषत " में स्पष्टीकरण हुआ है, उन सबका आनुपूर्वी से उद्धरण करना अप्रासङ्गिक है । स्वयं तद्विज्ञानभाष्य में प्रस्तावना - प्रकरण में इन सत्र बहिरङ्गपरीक्षाओं का विश्लेषण किया जा चुका है । यहाँ तो उदाहरण के रूपमें केवल विद्याओं का दिग्दर्शन ही पर्याप्त माना जायगा । अष्टखण्डात्मिका इस उपनिषत् में सूर्य्यविद्यानुगता निम्न लिखित १३ विद्याओं का विश्लेषण हुआ है-२१२

पृष्ठ 229

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छान्दोग्यप्रतिपादिता मुख्य - विद्याएँ-१ - सामविद्या २- मधुविद्या ३- गायत्रविद्या ४ - शाण्डिल्यविद्या ५- ब्रह्मविद्या ६- अग्निविद्या ७- प्राणविद्या तृतीयखण्ड - पञ्चाग्निविद्या ( मृतस्य ) ६- वैश्वानरविद्या ( जीवितस्य ) १०- सद्विद्या ११- भुमोपपत्तिविद्या ( महिमाल दक्षणा ) १० - दहरविद्या ( अणिमालक्षणा ) १३- आत्मविद्या * - विद्योपसंहार प्रत्येक विद्या में अवान्तर अनेक खण्डविद्याओं का समाबेश हुआ है, जैसा कि निम्न लिखित उदाहरण से स्पष्ट है— १ - सामविद्या मुख्या - प्रथमा, तत्र = अवान्तरविद्याः— १ - उद्गीथविद्या २- सामोपासनविद्या ३ - सामपर्वविद्या ( सामभेदाः ) ५- सामभैषज्यविद्या ६ - धर्म स्कन्दविद्या ७- सम्प्रस्रवविद्या ४- त्रिनर्द्दिसामविद्या ( दोषपरिहार विद्या ) 5- भैषज्यसामाभिज्ञानविद्या ८-यह कहा जा चुका है कि, सम्पूर्ण उपनिषत् में १३ विद्याओं का स्पष्टीकरण हुआ | तेरहों में सामप्रधाना - उपनिषत् में प्रथमा सामविद्या का प्राधान्य है । सामविद्या की मूलस्थिति उद्गीथविद्या पर अव-लम्बित है । दूसरे शब्दों में उद्गीथ ही साम की प्रतिष्ठा है । अतएव १३ खडात्मक प्रथमाध्याय में साम-विद्या की अवान्तरविद्या- उद्गीथविद्या का ही निरूपण हुआ है । एवं २४ खण्डात्मक द्वितीय अध्याय में शेष सात अवान्तर सामविद्याओं का निरूपण हुआ है । १ - उद्गीर्थावद्या २- सामोपासनविद्या ३- सामपर्वविद्या ४ - विनर्दिसाम विद्या ५- सामभैषज्य विद्या ६ - धर्म्मस्कन्दविद्या त्रयोदश खण्डात्मकः प्रथमोऽध्यायः । २ अध्यायारम्भ से १ खण्ड पर्यन्त २ खण्ड से २० खण्ड पर्यन्त २१ खण्ड २२ खण्ड २३ खण्ड २१३

पृष्ठ 230

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भाष्यभूमिका ७- सम्प्रस्रवधिद्या = - भैषज्य सामाभिज्ञान विद्या २४ सामविद्या की अवान्तर आठ विद्याओं में प्रत्येक में अनेक अवान्तर विषयों का निरूपण हुआ है । उदाहरण के लिए ' उद्गीथविद्या ' नाम की प्रथमा अवान्तरविद्या के विषयों का निदर्शन ही पर्य्याप्त होगा । सामविद्यायां प्रथमा उद्गीथ विद्या - अत्रान्तरा । तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः— १ खण्ड: २ खण्डः ३ खण्ड: ४ खण्डः ५ खण्ड: १ १ - उद्गीथस्योङ्कारत्वम् २ २ - उद्गीथस्य रसेष्वष्टमरसत्त्वम् ३ ३ - ऋक्सामयोर्वाकप्राणयोर्मिथुनस्य हृदययोगावसायित्वमुद्गोथत्वम् ४ ४ - प्रणवस्यानुज्ञाक्षरतया हृदयाभ्युपपादकत्वादुत्गीत्वेनाभिन्नत्वम् ५५ - उद्गीथस्य त्रयीविद्यारम्भणीयत्वात् प्रणवेनाभिन्नत्वम् १ ६ - अध्यात्ममुख्यप्राणस्योद्गीथत्वम् २ ७ – मुख्यप्राणस्योद्गीथस्याङ्गिरस्त्वं बृहस्पतित्वमयास्यत्वं च १८ - उत्तमाधिकारिणां कृते - अधिदैवतमादित्यस्योद्गीथत्वम् २६ - मध्यमाधिकारिणां कृते - मुख्प्राणस्य व्यानस्योद्गीथत्वम् ३ १०- प्रथमाधिकारिणां कृते - मात्राभावस्योद्गीथत्वम् ४ ११ - सामान्याधिकारिणां कृते - श्राशीः, समृद्धिः, उपसरणानामुद्गीथत्वम् १ १२ - ओमित्यस्याक्षरस्यामृतस्वमभयत्वं, स्वररूपत्वं च १ १३ - आदित्योद्गीथस्य - उद्गीथत्वं, प्रणवत्वं च २ १४ - प्राणादित्ययोरुद्गीथत्वं, प्रणवत्वं च २१४