Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 261–270

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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तृतीयखण्ड ( ४ ) - ईश्वर साक्षी सुपर्ण है, जीव भोक्ता सुपर्ण है । दोनों ब्रह्माश्वत्थ पर प्रतिष्ठित हैं । चतुर्थ अध्याय में सुपर्णप्रतिष्ठालक्षणा ' अश्वत्थविद्या ' का ही प्रतिपादन हुआ है । ( ५ ) - पाँचवें अध्याय में विद्या - विद्यात्मक अक्षरतत्त्व का निरूपण हुआ है । ( ६ ) - अन्त में सिंहालोकनन्याय से पूर्वप्रतिपादित विषयों का संग्रह करते हुए, एकमात्र श्रात्मतत्त्व-परिज्ञान को ही अमृतप्राप्ति का कारण बतलाते हुए विषयोपसंहार हुआ है । एवं यही प्रकृत उपनिषत् के विषयों का संक्षिप्त परिचय है । १ - षोडशीपुरुषविज्ञानाध्यायः २ - विश्वविभूतिविज्ञानाध्यायः ३ - जीवात्मस्वरूप विज्ञानाध्यायः ४- ब्रह्माश्वत्थस्वरूपविज्ञानाध्यायः ५ - जीवप्रतिष्ठात्मकाक्षरविज्ञानाध्यायः ६ – उहसंहाराध्यायः समाप्ता चेयं श्वेताश्वतरोपनिषत् ११ --- * -४२- कौपित कियाह्मणोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय— १२ – कौपितकी ब्राह्मणोपनिषत् - ( इन्द्र विद्यावन परेयमुपनिषत् ) ब्रह्मविद्याप्रतिपादिका इस उपनिषत् में पय्र्यङ्कविद्याध्याय, प्राणविद्याध्याय, इन्द्रियविद्याध्याय, ब्रह्मविद्याध्याय, भेद से चार मुख्य प्रकरण हैं । प्रधान विषय के प्रतिपादन के अतिरिक्त स्थूलशरीर छोड़ने के अनन्तर आत्मा कहाँ गमन करता है?, प्रेतात्मा के परलोक गमनमार्ग का क्या स्वरूप है?, स्वयं प्रेतात्मा का क्या स्वरूप है?, प्राज्ञइन्द्रमय कर्मभोक्ता भोक्तात्मा का क्या स्वरूप है?, इत्यादि विषयों का जैसा स्पष्टीकरण इस उपनिषत् में हुआ है, वैसा अन्यत्र अनुपलब्ध है । विद्याओं में प्रतिपादित विषयों का निम्न लिखित तालिका से स्पष्टीकरण हो रहा है--१- पर्यङ्कविद्याध्यायः- तत्रैते विषया निरूपिता द्रयाः-१ - दहरपुण्डरीकनाम्ना प्रसिद्धस्य ब्रह्मलोकस्य स्वरूपप्रतिपादनम् २- ब्रह्मलोके गमनोपायभूतस्य ' शुक्लगति ' नाम्ना प्रसिद्धस्य ' अर्चिर्मार्गस्य ' स्वरूपनिरूपणम् ३ - कर्म्मात्मनः - प्राण, वाक् - मनः-- प्राण - चक्षुः - श्रोत्र -- जिह्वा -- हस्त- शरीर - उपस्थ- पाद - प्रज्ञा - भेदभिन्नानां नानावस्थानां निरूपणम् इति - प्रथमोऽध्यायः १ २४५

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भाष्यभूमिका २- प्राण विद्याध्यायः तत्रैते विषया निरूपिता अष्टव्याः-१- ' एकधनावरोधन ' नाम्ना प्रसिद्धायाः, श्रयाचितग्रामोपलाभ - धनपलाभोपायोपाखानाया निरूपणम् २- वशीकरणोपायोपासन विज्ञानम् ३ - नित्याग्निहोत्रोपासन विज्ञानम् ४- उत् कर्षला भोपायोपासन विज्ञानम् ५- दैनिक सन्ध्योपासन विज्ञानम् ६ - मासिक सन्ध्योपासन विज्ञानम् ७ - स्त्री- पुत्राशीर्वादोपासन विज्ञानम् ८ - दैवपरिमरविद्या ( शत्रुनिग्रहोपासनविज्ञानम् ) ६-- प्राणनिः श्रेयसादानविज्ञानम् १०-- पिता - पुत्रीय सम्प्रदान विज्ञानम् इति — द्वितीयोऽध्यायः २ ३ – इन्द्रियविद्याध्यायः तत्रेते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः— १ - इन्द्रपदार्थविज्ञानावश्यकता, तत्स्वरूपप्रतिपादनञ्च २ -- प्रज्ञात्मकप्राणानामेकभूयस्त्वं, प्राणप्राधान्यत्वं च ३- प्रज्ञा - प्राणयोरैक्यसमर्थनं, प्राणे सर्वाप्तिश्च ४ -- प्रज्ञामात्रा- भूतमात्रयोरन्योऽन्याविनाभावनिरुक्तिः ५ -- भूतमात्राणां प्रज्ञामात्रासु, तासां च प्राणेऽनुस्यूतत्त्वम् इति - तृतीयोऽध्यायः ३ 8. ४ - ब्रह्मविद्याध्यायः तत्र ते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः-१ - अजातशत्रोः काशिराजस्य बालाकिमुनिना ब्रह्मतत्त्वे संवादः २- अजातशत्रुरणा याथार्थ्येन ब्रह्मस्वरूपनिरूपणम् इति चतुर्थोऽध्यायः ४ समाप्ता चेयं कौषित किब्राह्मणोपनिषत् १२ --२४६

पृष्ठ 263

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४३- मैत्रायण्युपनिषत् के प्रतिपाद्यविपय— तृतीयखण्ड १३- मैत्रायण्युपनिषत् ( भृतात्मवर्णनपरेयमुपनिषत् ) इस उपनिषत् में प्रधानरूप से देवसत्यप्राणमूर्ति, त्रिपर्वा हुआ है । इस उपनिषत् में ५ प्रपाठक हैं । पाँचों में क्रमशः, भूतात्मा का ही प्रधानरूप से विश्लेपण भूतात्मा, ग्रात्ममहिमा, आत्मकला, आत्मस्वरूप प्रतिष्ठा, इन श्रात्मस्वरूपजिज्ञासा, वैश्वानर- तैजस - प्राणात्मक विषयों का प्रधान रूप से प्रतिपादन हुत्रा है । १ -- ग्रात्मस्वरूपजिज्ञासाधिकरणम् ( १ प्रपाटकः ) । २- भूतात्मस्वरूपनिरूपणाधिकरणम् ( २ प्रपाठकः ) । ३ -- भूतात्ममहिमानिरूपणाधिकरणम् ( ३ प्रपाठकः ) । ४-- भूतात्मकला विभागनिरूपणाधिकरणम् ( ४ प्रपाठकः) । ५- भूतात्मप्रतिष्ठातत्त्वनिरूपणाधिकरणम् ( ५ प्रपाठकः ) । * प्रकरणोपसंहार-समाप्ता चेयं मैत्रायण्युपनिषत् १३ --' उपनिषदों में क्या? ' इस प्रश्न के समाधान की तक सफलता हुई है?, प्रश्नभार विज्ञ पाठकों पर छोड़ते चेष्टा की गई । अपने इस प्रयत्न में हमें कहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि, अक्षरदृष्टया सम्पूर्ण हुए सर्वान्त में प्रक्रान्त प्रश्नसमाधि के सम्बन्ध में दृष्ट्या प्रत्येक उपनिषत् अपना अपना भिन्न भिन्न दृष्टिकोण उपनिषत् जहाँ ग्रभिन्नार्थ प्रतिपादिका हैं, वहाँ द्वार-प्रकरणारम्भ में ब्रह्मविज्ञानानुगता कुछ एक परिभाषाओं रखता है । इस दृष्टिकोण के स्पष्टीकरण के लिए ही यदि उक्त ‘ परिभाषासंग्रह ' को लक्ष्य में रखते हुए उपनिषदर्थं का दिग्दर्शन कराना आवश्यक समझा गया है । समन्वय में सुविधा होगी । परिभाषा - ज्ञानाभाव में का समन्वय किया जायगा, तो निश्रयेन अर्थ-प्रयत्न - सहस्रों से भी उपनिषदर्थं सकता, प्रातिविक मन्तव्य है । ऐसा अपना का समन्वय नहीं किया जा ' उपनिषत्प्रतिपाद्य विषय दिग्दर्शन ' नामक द्वितीय स्तम्भ उपरत २४७

पृष्ठ 264

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श्रोः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' उपनिषत्प्रतिपाद्यविपय दिगदर्शन ' नामक द्वितीयस्तम्भ - उपरत २ -X-

पृष्ठ 265

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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत-' उपनिषच्छिक्ष स्वरूप दिग्दर्शन ' तृतीय - स्तम्भ नामक

पृष्ठ 266

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श्रीः उपनिषच्छिक्षास्वरूपदिग्दर्शन तृतीय स्तम्भ १ – प्राचीनदृष्टि, और उपनिषदों की शिक्षा-उपनिपच्छास्त्र से हमें क्या शिक्षा मिलती है?, दूसरे शब्दों में उपनिषच्छास्त्र हमें कर्त्तव्यत्वेन क्या आदेश देता है?, इस प्रश्न के सम्बन्ध में उपनिषच्छास्त्र के व्याख्याताओं ने क्या विचार प्रकट किए हैं?, प्रथम संक्षेपतः यह जान लेना आवश्यक होगा । ' इदं ' रूपेण प्रतीयमान प्रपञ्च को प्राचीन व्याख्याताओं नें ' अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप ' भेद से पाँच भागों में विभक्त मानते हुए यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि, अस्ति - भाति - प्रिय - की समष्टि ' सच्चिदानन्दघन ' ब्रह्म है, एवं यह नित्य, सर्वव्यापक, सुसूक्ष्म, अद्वयलक्षण है । नाम - रूप की समष्टि विश्व है | नामरूप के अतिरिक्त तीसरा कर्म्म तत्व और है, जिसका नामरूप में हीं अन्तर्भाव है | नामरूपकर्म्ममय विश्व सर्वथा क्षणिक, प्रातिभासिक, अतएव सर्वथा सत्य है, मायिक है, मिथ्या है | मिथ्या - लक्षण विश्व का प्रधान स्वरूप कर्म है । श्रतएव विश्व को कर्म्मप्रधान कहा जा सकता I उक्त कर्म्मरूप विश्वावरण ने अपने मायारूप से अस्ति भाति - प्रिय - रूप ग्रात्म - ज्योति को उसी प्रकार आवृत कर रक्खा है, जैसे मेघावरण से सूर्य्यज्योति श्रावृत हो जाती है । विशुद्ध ज्ञानज्योतिर्धन सच्चिदानन्दघन आत्मा के वास्तविक स्वरूप को आवृत कर जीवात्मा को मोहमार्ग का पथिक बना देने वाला एकमात्र कर्म-जाल ही माना जायगा | जबतक जीवात्मा की कर्म्ममार्ग में प्रवृत्ति है, तबतक आत्मबोध असम्भव है । एवं जत्रतक श्रात्मत्रोध नहीं हो जाता, तत्रतक मुक्तिलक्षण नित्यानन्द ( शान्तानन्द ) की प्राप्ति सम्भव है । जीवात्मा का परमपुरुषार्थ यही माना जायगा कि, वह यच्चयावत् कम्मों का प्रात्यन्तिकरूप से परित्याग कर विशुद्ध ज्ञानभाव में परिणत हो जाय । उपनिषच्छास्त्र का प्रधान लक्ष्य यही है कि, जीवात्मा कर्म के मायिक स्वरूप को समझता हुआ, इसे ज्ञानकघन आत्मा की प्राप्ति में प्रतिबन्धक मानता हुआ कर्म का परित्याग कर सर्व-कर्म्मात्यन्तविमोकलक्षण संन्यासपथ का अनुगामी बने । सहज भाषा में यों भी कहा जा सकता है कि, प्रवृत्तिलक्षण कर्म्मयोग की शिक्षा जहाँ हमें वेद के विधि भाग से मिलती है, परानुरक्तिलक्षण भक्तियोग की शिक्षा जहाँ वेद के श्रारण्यक भाग से मिलती है, वहाँ उपनिषच्छास्त्र सर्वकर्म्मनिवृत्तिलक्षण ज्ञानयोग की ही शिक्षा दे रहा । और यही जीवात्मा का परमपुरुषार्थ है । ज्ञानैकघन विशुद्ध आत्मा को स्वस्वरूप से आवृत करने वाले मायिक कर्म्म को कर्म्म, विकर्म्म, अकर्म्म, भेद से तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है । यज्ञ, तप, दान, नाम से प्रसिद्ध विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिसत्-कर्म्मत्रयी, –एवं इष्ट, आपूर्त्त, दत्त, नाम से प्रसिद्ध विद्या निरपेक्ष प्रवृत्तिसत्कर्म्मत्रयी, इन ६ कर्मों की समष्टि — ' कर्म्म ' ( सत्कर्म्म ) नामक कर्म है । इस कर्म्मषट्क के अनुगामन से आत्मा का अभ्युदय माना गया है । २५१

पृष्ठ 267

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भूमिका सूर्य्यसंस्था यज्ञप्रधान है, एवं यह यज्ञ त्रयीविद्या के आधार पर ही वितत होता है, जैसा कि ' मैपा-त्रयीविद्या यद्यज्ञः ' ( शतपथना ० ) इत्यादि विधि - वचन से प्रमाणित है । इसी प्रयीविद्या के आधार पर वैध अग्नि में सोमाहुति देकर हम अपने आत्मा में यज्ञातिशयसंस्कार प्रतिष्ठित करने में समर्थ होते हैं । इसी सौर-दिव्य - यज्ञातिशयसंस्काराकर्षण के अनुग्रह से नियतायुर्भोगानन्तर शरीर छोड़ने के पश्चात् हमारा मानुषात्मा पार्थिवाकर्षण से विमुक्त होता हुआ ' सप्तदश ' नाम से प्रसिद्ध नाचिकेतस्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है । इतर कर्मों की अपेक्षा त्रयीविद्या - मूलक, यज्ञात्मक वह सत्कर्म्म देवस्वर्गप्राप्ति का साधक बनता हुआ, साथ ही अभिलषित ऐहिक कामनाओं का भी अन्यतम पूरक बनता हुआ श्रेष्ठतम है, जैसा कि - ' श्रेष्ठतमाय कर्मणे ' ( यजुः २ | २ | ) - ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म " ( शतपथब्रा ० ) इत्यादि वचनों से प्रमाणित है । पञ्च ज्योतिर्मय हमारा भूतात्मा सूर्य्यज्योति के आधार पर ही प्रतिष्ठित माना गया है । इन्द्रात्मिका सूर्य्यज्योति हो चिज्ज्योति ( आत्मज्योति ) की प्रतिष्ठा है । अतश्व - ' सूर्य आत्मा जगतस्थस्थुषश्च ' इत्यादि श्रुत्ति सूर्य्यं को ही श्रात्मप्रतिष्ठा मान रही है । जबकि हमारी आत्मा सूर्य्यमूलक है, तो सिद्ध है कि, सूर्य की ओर आत्मा का अनुगमन करना ग्रात्मभूमालक्षण आत्मसुख का कारण है । ज्यों ज्यों श्रात्मा सूर्य की ओर बढ़ेगा, त्यों त्यों सौर - तत्व के अधिकाधिक समावेश से वह भूमा - भाव को प्राप्त होगा, स्व - स्वरूप से विकसित होगा । विकासलक्षण यह भूमाभाव ही - ' यो वै भूमा, तनसुखम ' के अनुसार आत्मानन्द है । यही आत्म-स्वरूप का विकासलक्षण ' उदय ' है । एवं यही आत्मोदय ' आत्माभ्युदय ' है । ' अभि - उत् य ' की समष्टि ही अभ्युदय है । ' अभि ' का अर्थ है - ' सामने ', उत् का अर्थ है - ' ऊपर की ओर - सूर्य की ओर ', ' य ' का अर्थ है – ' गमन ' । सूर्य की ओर आत्मा का जाना ही आत्मा का अभ्युदय है । एवं इस अभ्युदय का अन्यतमप्रवर्त्तक त्रयीविद्यामूलक श्रेष्ठतम यज्ञकर्म्म पहिला कर्म है । दूसरा साधन ' तप ' नामक कर्म्मविशेष है । योग का ही नाम तप है, जिसका कि – ' योगविधिं च कृत्स्नम् ' इत्यादि रूप से कठोपनिषत् में विस्तार से निरूपण हुंग्रा है । तपोलक्षण इस योगकर्म के ' राज-हट - मन्त्र - लय ' भेद से चार श्रेणि- विभाग हैं । राजयोग सुप्रसिद्ध ' भक्तियोग ' है, जिसका शाण्डिल्यदर्शन में ' सा परानुरक्तिरीश्वरे ' रूप से विश्लेषण हुआ है । हटयोग, मन्त्रयोग, अमनस्कयोगापरपर्यायक लययोग, इन तीनों का पातञ्जलयोगशास्त्र में स्पष्टीकरण हुआ है । इस योगचतुष्टयी से आत्मा में परज्योति का प्राधान होता है । श्रात्मा दिव्यज्योति के प्रधान से ऊर्ध्वगति का अनुगामी बनता है, ऐहिक - पारलौकिक सिद्धियों का फलभोक्ता चनता है । स्वर्गसुख जहाँ आत्मा का पहिला सुत्र था, वहाँ अपरामुक्ति श्रात्मा का दूसरा सुख है । जहाँ स्वर्गसुख यज्ञकर्म से सम्बन्ध रखता है, वहाँ अपरामुक्ति योगलक्षण तप से सम्बद्धा है । तीसरा सत्कर्म ' दान ' है । यज्ञकर्म्मसञ्चालक, यज्ञकर्मस्वरूपसम्पादक ऋत्विजों के आत्मा को यज्ञफल से पृथक करते हुए यज्ञफल के अनन्यभोक्ता बनने के लिए यज्ञकर्ता यजमान की ओर से दी जाने वाली ऋत्विग् - दक्षिणा ही ' दान ' नामक तीसरा सत्कर्म है । इसके अतिरिक्त प्राकृतिक तत्त्वों को अपने श्रात्म-जगत् में आधान करने के लिए तत्तत् प्राकृतिक प्राणों मे युक्त तत्तत् -गौ- सुव - भूमि लौह - रजत ताम्र- घृत - आदि द्रव्यों का योग्य - कर्म्मनिष्ठ - विद्वान् ब्राह्मणों को स्वसत्त्वनिवृत्ति - परसत्त्वस्थापनपूर्वक दान देना भी दानक है । यज्ञिय दान ' दक्षिणा ' कहलाया है, दूसरा दान ' दान ' कहलाया है । दान - दक्षिणात्मक यह उभयविध दान २५२

पृष्ठ 268

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तृतायखण्ड पात्रता पर निर्भर है । एवं यह पात्रता शास्त्र के द्वारा निर्णीत है । दरिद्र हीनाङ्ग - अतिरिक्ताङ्ग श्रादि इस दान-दक्षिणा के पात्र नहीं है । अपितु योग्य विद्वान् ही इस वैज्ञानिक दान के पात्र हैं । यदि किसी योग्य विद्वान् के पास सम्पत्ति है, तो वहाँ यह विचार नहीं किया जायगा कि, इसे दान क्यों दिया जाय । सम्पत्ति रहे, अथवा न रहे, यदि वह दानपात्र है, तो वही इस दान का अधिकारी माना जायगा । इस दान का अर्थ है - भेंट, निवेदन । दाता का आसन नीचे है, प्रतिग्रहीता का आसन उच्च है । यही शास्त्रीय दान है, जिसके प्रतिफल में दाता के आत्मा में अभ्युदयप्रवर्त्तक दिव्य संस्कारों का प्रधान होता है । कहना न होगा कि, शाम्त्र रहस्य-मर्म्मानभिज्ञ आज का भारतवर्ष दान के इस वैज्ञानिक प्रकार को सर्वथा भुला चुका है । यही कारण है कि, आज शास्त्रीय दान का स्थान लौकिक ' दत्त ' ने ग्रहण कर लिया है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । बतलाना इस सम्बन्ध में यही है कि, यज्ञ, तप, दान, तीनों सत्कर्म्म अभ्युदय के साधक बनते हुए ' देवस्वर्ग ' प्राप्ति के कारण बन रहे हैं । इन तीनों के अनुष्ठान के लिए शास्त्रीय ज्ञान ( विद्या ) अपेक्षित है, जो कि शास्त्रीय ज्ञान अधिकारतन्त्र से तन्त्रायित है । भारतीय द्विजातिवर्ग ही वेदशास्त्र का अधिकारी है, एवं वही तन्मूलक यज्ञ - तप - दान का अनुगामी है । भारतीय द्विजातिवर्ग के अतिरिक्त मनुष्य-मात्र इसमें अनधिकृत हैं । तत्रापि यज्ञ का प्रधान अधिकारी ब्राह्मण है, तप का प्रधान अधिकारी क्षत्रिय है, एवं दान का प्रधान अधिकारी वैश्य है । गौणविधि से तीनों परस्पर समतुलित हैं । शास्त्रीय ज्ञानसापेक्ष, द्विजातिमात्र मर्यादित यही पहिला कर्म्मत्रयी - विभाग है । दूसरा विभाग विद्यानिरपेक्ष - सत्कर्म है । इष्ट, आपूर्त, दत्त, भेद से इसके भी तीन ही विभाग मानें गए हैं | स्वार्थ- परार्थ- परमार्थ भेद से तीनों विभक्त हैं । अपने उपभोग में आने वाली वस्तुओं की प्राप्ति के लिए दूसरों को कोई हानि न पहुँचाते हुए जो कर्म किया जायगा, वह ' इष्ट ' कहलाएगा । संसार के उन समस्त कम्मों का जिनसे योग - क्षेम का निर्बाह होता है, जीवनयात्रा का सञ्चालन होता है - इसी इष्टकर्म में अन्तर्भाव है । देश - काल - पात्र - द्रव्य - भेद से इस इष्टकर्म का स्वरूप भिन्न भिन्न है । यदि इष्टकर्म से स्वार्थसिद्धि के साथ अन्यों का अनिष्ट है, तो वैसा इष्टकर्म अनिष्ट ही माना जायगा । वापी - कूप - तड़ाग- पाठशाला उद्यान-आदि सार्वजनिक कर्म्म परार्थस्थानीय बनते हुए ' आपूर्त ' हैं । असमर्थ, हीनाङ्ग, अतिरिक्ताङ्ग, अनाथों का भरण - पोषण करना परमार्थस्थानीय ' दत्त ' कर्म्म है । पूर्वप्रतिपादित ' दान ' से यह ' दत्त ' ठीक उलटा । यहाँ दाता का ग्रासन ऊँचा है, ग्रहीता का ग्रासन नीचा है । ' दरिद्रान् भर कौन्तेय? ' के अनुसार दरिद्र ही इसके अधिकारी हैं | किसी वर्ण का हो, किसी जाति का हो, यदि वह असमर्थ है, तो उसे शक्तिभर देना प्रत्येक मनुष्य का श्रानृशंसधर्म है । भारतीय ऋषियों नें इस सम्बन्ध में अपना यह निर्णय प्रकट किया है कि, विद्याध्ययन करने वाले असमर्थ विद्यार्थी, अपने सदुपदेश से लोकाभ्युदय - निःश्रेयस् में प्रवृत सर्वपरिग्रहशून्य व्रती ( संन्यासी ), इन्द्रियों के द्वारा अर्जनकर्म में असमर्थ लूले लँगड़े अन्धे कोढ़ी असमर्थं मनुष्य, ये तीन वर्ग ही इस ' दत्त ' के अधिकारी है । अपनी कुत्सित वासनाओं से समाज में पापाचार फैलाने वाले, देश की अतुल सम्पत्ति को अपनी विलास - लीला में स्वाहा करने वाले, अकर्मण्य साधु - फकीर सन्त- महन्त - श्राचार्य्य- नामधारी, सर्वोपरि निरक्षरभट्टाचार्य्यं देश के ऐसे घोर घोरतम शत्रुओं को ' दत्त ' का अधिकारी मानना भयङ्कर भूल है । २५३

पृष्ठ 269

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भाष्यभूमिका तावानधीयाना यत्र भैक्षचरा द्विजाः । तं देशं दण्डयेद्राजा चौरभक्तप्रदो हि सः ॥ ( स्मृतिः ) उक्त स्मृति - वचन के अनुसार जिस नरपति के राज्य में व्रती ( सन्यासी ), विद्यार्थी, चकारात् श्रसमर्थ दरिंद्री, इन तीनों को छोड़ कर अन्य - अकर्म्मयों का भरणपोषण होता है, एवं जहाँ का शासक दान देने वाले ऐसे हीन प्रज्ञों को, तथा लेने वाले धूर्त - वञ्चकों को दण्ड नहीं देता, वह अपने राज्य में लुटेरों की संख्या बढ़ाता है । वह चौर - पालक राज्य है । इष्ट - श्रापूर्त्त ' - दत्त, उक्त इन तीनों कम्मों का सबको समानाधिकार है । इस सत्कर्म्मत्री से पितृस्वर्ग प्राप्त होता है, जिसका श्राद्धविज्ञानान्तर्गत - ' आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । श्रात्माभ्युदय प्रवर्त्तिका इस कर्मत्रयी को भी हम अभ्युदय - साधक ही कहेंगे । यज्ञ - तर - दान- तीनों विद्या-सापेक्ष ‘ पुण्यकर्म्म ' हैं, इष्ट- आपूर्त - दत्त- तीनों विद्यासापेक्ष ' शुभकर्म ' हैं । दोनों त्रयीकम्मों की समष्टि ' सत्कर्म ' नामक पहिला कम्र्म्मविभाग है । 1 स्तेय ( चोरी ), सुरापान, परः सत्त्वापहरण, अगम्यागमन, भ्रूणहत्या, बालहत्या, श्रनृतभाषण, अभक्ष्यभक्षण, आदि लोक- शास्त्रनिन्दित यच्चयावत् कर्म अपने मलिन - संस्कारावरण से आत्मज्योति को मलिन करते हुए इसे सूर्य्य - ज्योति की ओर जाने में असमर्थ बना डालते हैं । फलतः मलिनात्मा स्वप्रभव-सूर्य से ठीक विरुद्ध दिक का अनुगामी बन जाता है । यही विरुद्ध श्रात्मगति ' प्रत्यवाय ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । ' प्रति ' का अर्थ है सूर्य्यदिकू से विपरीत, ' अव ' का अर्थ है - नीचे की ओर, ' थय ' का अर्थ है ' गमन ' । जिन शास्त्रनिषिद्ध कम्र्मों से ग्रात्मा तमोभाव का अनुगामी बनता हुआ अधोगति का अनुगमन करता है, वे पापकर्म्म ' प्रत्यवायकर्म्म ' हैं । यही ' विकम् ' ( विरुद्धकर्म ) नामक दूसरा कर्म्म है । जलताड़न, वृथाहास्य, तृणच्छेद, पादभ्रमण, अङ्गुलिध्वनि करतान, श्रादि कर्म निरर्थक कर्म्म हैं । इन कम्मों का न निषेध है, न श्राज्ञा है । अतएव इन्हें ' अविहिताप्रतिषिद्ध ' नाम से व्यवहृत किया गया है । इन निरर्थक कम्मों से आत्मा में आलस्य का उदय होता है । आलस्य कालान्तर में अविद्या का जनक बन जाता है । स्वस्त्ययनकम्मों के अन्यतम विघातक ये निरर्थक कर्म्म कालान्तर में विकम्र्म का ही स्थान ग्रहण कर लेते हैं । निरर्थक कम्र्मात्मक यही तीसरा ' कर्म ' विभाग है । इसप्रकार कर्म्म, विकर्म, अकर्म्म, भेद से कर्म्मप्रपत्र का तीन प्रकार से वर्गीकरण किया जासकता है । इतर सम्पूर्ण कर्मकलापों का इन्हीं तीनों में अन्तर्भाव है । इस कर्म्मत्रयी का एकमात्र कर्म्ममय विश्व के साथ ही सम्बन्ध है । अतएव इन कम्मों से उत्पन्न फल का भी एकमात्र विश्वसोमा में ही विश्राम है । अकर्म्मा-चरण से पशु - पक्षी - कृमि - कीटादि हीनयोनियाँ प्राप्त होतीं हैं । विकम्माचरण से रौरवादि नरक- गतियों का अनु-गमन करता हुआ प्राणी हीनयोनियों का सत्पात्र? बनता है । विद्यानिरपेक्ष- इष्टादि कर्मत्रयी से पितृस्वर्गा-वाप्ति होती है । एवं विद्यासापेक्ष यज्ञादि कर्म्मत्रयी देवस्वर्गप्राप्ति का कारण बनती है । उक्त कम्मों, तथा कर्म्मोदकों के विश्लेषण से थोड़ी देर के लिए हमें इस निश्चय पर पहुँच जाना पड़ता है कि, विश्व के यच्चयावत् कम्मों में यज्ञकर्म्म सत्र से श्रेष्ठ कर्म्म है । यज्ञकर्म की यह श्रेष्ठता ही घोड़ी २५४

पृष्ठ 270

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तृतीयखण्ड देर के लिए अपने देवस्वर्गफल के मोह से हमें मुग्ध बना लेती है । और हम मान बैठते हैं कि, जिस यज्ञ-कर्मानुष्ठान से हमें इस लोक में अभीष्ट फल मिलते हैं, परलोक में सुख मिलता है, वह यज्ञकर्म्म ही हमारा परमपुरुषार्थ है । फलतः हमें यावजीवन इसी कर्म्म का अनुगमन करते रहना चाहिए । वेद के विधि - भागात्मक ब्राह्मणभाग में प्रतिपादित, महर्षि जैमिनिद्वारा मीमांसित यज्ञलक्षण कर्म्म -काण्ड की पुरुषार्थ - रूपता का खण्डन करते हुए प्राचीन व्याख्याता कहते हैं कि, जिस यज्ञकर्म्म को कम्मभि-भिनिविष्ट- कामकामी - जन सर्वाभीष्टफलप्रद बतलाते हुए उसे परमपुरुषार्थ कहते हैं, वह कर्ममार्ग वस्तुत: ज्ञानोदयावधिपर्य्यन्त आंशिकरूप से केवल क्रत्वर्थ बन रहा है । कर्मात्मक स्वयं यज्ञ भी अस्थिर है, यज्ञफल-रूप देवस्वर्ग भी अस्थिर है । जनतक यज्ञकर्त्ता यजमान के मानुषात्मा में यज्ञकर्म्मजनित यज्ञातिशय प्रतिष्ठित रहता है, तत्रतक इस की स्वर्ग में प्रतिष्ठा है । जिस क्षण यज्ञातिशय क्षीण हो जाता है, उसी क्षण - क्षीणे पुण्यं मर्त्यलोके वसन्ति ' के अनुसार वह पुनः इसी मर्त्यलोक का अनुगामी बन जाता है । इसप्रकार कर्म्मप्रपञ्च-प्रधान विश्वगर्भ में प्रतिष्ठित पुरुष भले ही उत्तम से उत्तम कर्म्म ( यज्ञ ) का अनुष्ठान क्यों न करले, परन्तु कर्म से उसे पराशान्तिलक्षण अक्षयसुख नहीं मिल सकता । वस्तुतस्तु जिसे वह स्वर्गमुख कहता है, वह भी दुःखयुक्त ही है । पतन का भय वहाँ भी बना ही रहता है । भय ही दुःखकी पूर्वावस्था है । इसके अतिरिक्त काम-नाओं की परम्परा से इस कामकामी का चेतोधरातल नित्य शान्त बना रहता है । ऐसा कामकामी कट स्थिरप्रज्ञानुगता चिच्छान्ति से सम्बन्ध रखने वाली पराशान्ति का अधिकारी नहीं बन सकता, जैसाकि निम्न लिखित स्मार्त्ती उपनिषत् से स्पष्ट है—

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।

वेदवादरताः पार्थ! नान्यदस्तीति वादिनः ॥ १ ॥

कामात्मनः स्वर्गपरा जन्मकर्म्म फलप्रदाम् ।

क्रियाविशेषबहुला भोगैश्वर्यमतिं प्रति ॥२ ॥

भोगैश्वर्य्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते || ३ || ( गी ० २ ४२,४३,४४, ) वस्तुस्थिति यह है कि, पराशान्तिलक्षण सच्चिदानन्दघन ब्रह्म विशुद्ध ज्ञानघन है, कृतभाय ( कर्म्ममा ) से संस्पृष्ट है, अतएव नित्य है, व्यापक है । इधर कर्म क्रियालक्षण है, कृत है, क्षणिक है, परिच्छिन्न है, अनित्य है, ध्रुव है । ऐसी दशा में अनित्य- अध्रुव कर्म से उस नित्य ध्रुव आत्मतत्त्व का कथमपि लाभ सम्भव नहीं है । साथ ही जबतक वह प्राप्त नहीं हो जाता, तबतक अमृतलक्षण शाश्वत सुख की प्राप्ति भी असम्भव है । निम्न लिखित कुछ एक श्रौत - स्मार्त्तवचन यही सिद्ध कर रहे हैं कि, आत्मा कृत ( कर्म्मशून्य ) है । वह कृत ( कर्म्म ) से कथमपि प्राप्त नहीं किया जा सकता । दूसरे शब्दों में कर्ममार्ग आत्मप्राप्ति का साधक नही, अपितु बाधक है । कर्म्मत्यागल क्षण विशुद्ध ज्ञानमार्ग ही जीवात्मा का परम पुरुषार्थ है | २५५