Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 271–280

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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भाग्यभूमिका १ - " न ह्यभ्रुणैः प्राप्यते ध्रुनं तत् ” ( कठोपनिषत् १० । २६०।१० मं ० ) । २ - " नास्त्यकृतः कृतेन ” ( मुण्डकोप ० १० । २ । खं ०।१२ मं ० ) । ३– “ प्लवा ह्वेते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म्म । एतच्छ्रे यो येऽभिनन्दति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ” । ( मुण्डको ० २०२ | ० | ७ | )

४ - " न कर्म्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ।

परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति " ॥

५ - " यदा चर्म्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । ( कैवल्योप. १० |: मं ० ) तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ” ॥ श्वे ताः ६ अ ०२० मं ० ) । ६ - " तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय " । श्वेता ० ३ | मं ० ) । ७- " एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् " ( कठोप ०२।१६ ॥ ८- " ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ” ( श्वे ०१ । ८ । ) । c---- " ईशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ” ( श्वे ०३ । ७ । ) । १०- “ तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांच्छिनत्ति ” ( श्वे ०७/१५ ) । ११– “ ज्ञात्वाऽत्मस्थममृतं विश्वधाम ” ( श्वे ०६।६ । ) । १२ – “ तमेवैकं जानथ आत्मानम् ” ( २ मु ० । २ खं ०५० ) । - * १ - " श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञ।ज्ज्ञानयज्ञः परंतप! कम्मखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमाप्यते " ॥ ( गी ०४ । ३३ । ) । २- “ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति " ॥ ( गी ०५ / २६ । ) । ३– “ भक्तया पाममभिजानाति यावान्यश्चास्मि तन्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् " ॥ ( गी ०१८।४४ । ) । ४- “ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ” ॥ ( गी ०४ । ३६ । ) । २५६

पृष्ठ 272

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तृतीयखण्ड ५ - " न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत् स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । ( गो ०४ । ३८ । ) । ६- " यौधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन! ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा " ॥ ( गी ०५।३७ ) । ७- " अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । म ज्ञान ' लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि " ॥ ( गी ०४,३६ । ) । ८ - " तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । वित्ौनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत " ॥ ( गी ०५।४२ । ) । र - " ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् " ॥ ( गी ०५।१६ । ) । १०- “ तद् बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिधू तकल्मषाः " ॥ ( गी ०५ । १७ । ) । ११ – “ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । स्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् " ॥ ( गी ० ७ । १ = । ) ।

१२ - " बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते ।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः " ॥ ( गी ०७।१६ ॥

** १– “ अध्रुव - अस्थिर कम्मों से ध्रुव - स्थिर आत्मतत्त्व कथमपि प्राप्त नहीं किया जा सकता ” । २– “ कर्म्म से असंसृष्ट, अतएव ' अकृत ' नाम से प्रसिद्ध ज्ञानैकघन आत्मा ' कृत ' नामक कर्म्म से कथमपि प्राप्त नहीं किया जा सकता " । ३– “ अवर - क्षर से सम्बन्ध रखने वाला १८ संख्या में विभक्त कर्म जिन यज्ञों में विहित हुआ है, वे यज्ञरूप नौकाएँ इस मृत्युसंसार सागर को पार करने में जीर्ण - सिद्ध हुई हैं । जो मूढ ( कम्मांभिनि-विष्ट जन ) इस सर्वथा प्रेय कामनामय यज्ञ की श्रेयोरूप से स्तुति करते हैं, वे जरा - मृत्यु का चार चार श्रनुगमन किया करते हैं । तात्पर्य्य - यज्ञकर्म से शाश्वत - आत्मानन्द नहीं मिल सकता ” | ४– “ यावज्जीवन कामनामय कर्म करने से, बहु प्रजा से, प्रभूत वित्तपरिग्रह से, इनमें से किसी से भी अमृतत्त्व - सम्पत्ति नहीं मिल सकती । विद्वानों ने कर्मादि परिग्रहों के श्रात्यन्तिक परित्याग को ही अमृतप्राप्ति का कारण माना है । सर्वकम्म त्यागलक्षण सन्यास का अनुगमन करने वाले यतिश्रेष्ठ ( ही ) इसी त्याग के बल से दुःखासम्भिन्न, गुहानिहित्त, नाकस्वर्ग में प्रवेश करते हैं, जहाँ से पुनरा— ' न नहीं होता " । २५७

पृष्ठ 273

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भाष्यभूमिका ५ -- “ जत्र मनुष्य आकाश को चमड़े की भांति अपने शरीर से लपेट लेंगे, तभी श्रात्मदेव को बिना जाने दुःख का अन्त होगा । अर्थात् जैसे आकाश को चम ' की भांति शरीर से लपेटना असम्भव है, तथैव बिना आत्मज्ञान के दुःखनिवृत्ति असम्भव है ” । ६ – “ उसे ही जान कर मृत्यु का अतिक्रमण करता है । मुक्तिपथ - प्राप्ति के लिए आत्मज्ञान के अतिरिक्त दूसरा मार्ग नहीं है " । ७— “ इस अक्षरब्रह्म को जान कर ही सर्वज्ञता, सर्वाप्ति, आदि व्यापक विभूतियां प्राप्त कर सकता है ” | ८ - " श्रात्मदेव को जान कर सम्पूर्ण बन्धनों से मनुष्य मुक्त हो जाता है " । E - " उस ज्ञानघन ईश को जान कर मनुष्य अमृतभाव में परिणत हो जाते हैं " । १० - - " उसे इस भाँति जान कर मनुष्य अपने मृत्युपाशों को काट फेंकते हैं " । ११ - - " आत्मा में प्रतिष्ठित ज्ञानामृत को जान कर जो कि ज्ञानामृत विश्व की प्रतिष्ठा है - ( मुक्त हो जाते हैं ) " । १२ -- " केवल उस ज्ञानघन आत्मतत्त्व को ही पहिचानो " । * १– “ द्रव्ययज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है । सम्पूर्ण कर्मकलाप ज्ञान में विश्रान्त है । अर्थात् ज्ञान-भूमिका में पहुँचने के अनन्तर कर्म्म विलीन हो जाते हैं " । २– “ सम्पूर्ण यज्ञों, तपों के अनन्य भोक्ता, सम्पूर्ण लोकों के अधिपति, सम्पूर्ण भूतों के सुहृद, ऐमे श्रात्म-तत्व को जान कर मनुष्य शान्तिलाभ करता है " । ३— “ मैं ( श्रात्मतत्व ) कितना, और कैसा हूँ, यह भक्तियोग से जान लेता है । ( इस सामान्य ज्ञान के ( अनन्तर ज्ञानयोग से ) आत्मा को तत्त्वतः जानकर उसमें लीन हो जाता है ” । ४ – “ जितेन्द्रिय, श्रद्धालु पुरुष ज्ञानसम्पति प्राप्त करने में समर्थ होता है । इस ज्ञानसम्पत्ति को प्राप्त कर वह शीघ्र ही पराशान्ति को प्राप्त हो जाता है । ५. - " संसार में ज्ञान से बढ़ कर दूसरी कोई वस्तु पवित्र नहीं है । वह ज्ञान सिद्धदशा में अपने आप प्रकट हो जाता है " । ६– “ जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि का भार को भस्मावशेष कर देता है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि सम्पूर्ण कम्मों को जला डालता है ' ' | ७ – “ यदि तुम पापियों की गणना में घोर पापी हो, तो भी ज्ञाननौका के सहारे इस तफान को पार कर सकोगे ” । - " इसलिए अज्ञान से उत्पन्न हृदयस्थ श्रविद्याजालरूप संशय को आत्मज्ञानरूप कृपाण से काट कर इस ज्ञानयोग का आश्रय लो " । ६– “ जिन ज्ञानियों का अज्ञान ज्ञान से नष्ट हो चुका है, उनका श्रादित्यवत् प्रकाशित ज्ञान परज्योति -- प्राप्ति का कारण बन जाता है " । २५८

पृष्ठ 274

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तृतीयखण्ड १० – “ ज्ञानबुद्धियुक्त, ज्ञानात्मसम्पत्तिपरायण, ज्ञाननिष्ठ, ज्ञानलीन पुरुष ज्ञान से सर्वात्मना शुद्ध पूत बनते हुए पुनरावृत्तिरूप अमृतगति को प्राप्त कर लेते हैं " । ११ – “ सभी अच्छे हैं— मेरे ( आत्मा के ) भक्त हैं । परन्तु ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है । ऐसा योगयुक्त युक्तात्मा सर्वश्रेष्ठ श्रात्मगति का अनुगामी बनता है " । १२ – “ अनेक जन्मों के अनन्तर ज्ञानवान् पुरुष आत्मामृत प्राप्त करने में समर्थ होता है । कृष्णतत्त्व ( अनुपाख्य कृष्ण नामक व्यापक आत्मतत्व ) सर्वव्यापक है, यह जानने वाला दुर्लभ है " । * उक्त श्रौतस्मार्त्त ' वचनों से यह भलीभाँति प्रमाणित हो रहा है कि, विशुद्ध आत्मा का साक्षात् -कार ही पराशान्ति का मुख्य हेतु है । विशुद्ध आत्मा क्योंकि विशुद्ध ज्ञानमूर्ति है, अतएव इसकी प्राप्ति का एकमात्र उपाय आत्मज्ञानोदयोपयिक सर्वकर्म्मात्यन्तविमोकलक्षण ज्ञानयोग ही है । इसप्रकार यत्र यह मान लेनें में कोई आपत्ति नहीं रह जाती कि, वेद के विधिभाग में प्रतिपादित यज्ञात्मक कर्म्मयोग पराशान्ति-लाभ में सर्वथा अनुपयुक्त है । वस्तुस्थिति यह है कि, नित्यं - विज्ञान मानन्दं - घन ब्रह्म के ' विशुद्ध, मायिक ' भेद से दो विवर्त हैं | विशुद्ध श्रात्मा अस्ति - भाति प्रिय रूप है, मायिक प्रपञ्च नाम रूपात्मक है । नाम - रूपात्मक मायिक प्रपञ्च के ' सगुण, साञ्जन ' भेद से दो विवर्त्त हैं । सगुण विवर्त्त विश्वेश्वर है, साञ्जन विवर्त्त विश्व है । इसप्रकार दो ब्रह्मविवत्त के विशुद्ध विश्वातीत व्यापक ग्रात्मा, विश्वेश्वर, विश्व, ये तीन विवर्त्त हो जाते हैं । ये तीन विवर्त्त क्रमश: श्राधिदैविक - प्राध्यात्मिक - श्राधिभौतिक विवर्त्ती की प्रतिष्ठा माने गए हैं । ये ही तीनों वित्त क्रमशः सर्वकर्म्मविमोकलक्षण ज्ञानयोग, ईश्वरानुग्रहप्राप्तिकामलक्षण भक्तियोग, ऐहिकामुष्मिक सुखप्राप्ति-साधक कर्म्म'योग, इन तीनों योगों की प्रतिष्ठा हैं । प्रथम श्रेणि के अधिकारी कम्मयोग के, मध्यम श्रं णि के अधिकारी भक्तियोग के, एवं उत्तम श्रेणि के अधिकारी ज्ञानयोग के अधिकारी मानें गए हैं । इन तीनों योगों के निम्न लिखित लक्षण मानें जा सकते हैं--१ - जिसमें साध्य, साधन, दोनों आधिदैविक हों, वही ' ज्ञानयोग ' है । २ - जिसमें साध्य चिदैविक, साधन प्राधिभौतिक हों, वही ' भक्तियोग ' है । ३- जिसमें साध्य, साधन, दोनों प्राधिभौतिक हों, वही ' कर्म्मयोग ' है । प्राचीन व्याख्याताओं का यह कहना है कि, गृहस्थाश्रम में कम्र्म्मयोग का अनुगमन होता है, वानप्रस्थाश्रम में भक्तियोग का अनुगमन होता है, एवं संन्यासाश्रम में ज्ञानयोग का अनुगमन होता है । इन तीनों का क्रमशः ' ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषत् ' इन तीन वेदभागों के द्वारा विश्लेषण हुआ है । आधिभौतिक कर्म्म'योग ब्राह्मणग्रन्थों का यवच्छेदक है, प्राध्यात्मिक भक्तियोग आरण्यक ग्रन्थों का अवच्छेदक है, एवं श्राधिदैविक ज्ञानयोग उपनिषदों का यवच्छेदक है । इन तीनों योगों का इसप्रकार वर्गीकरण करते हुए ही उपनिषदों की शिक्षा का समन्वय करना चाहिए । २५६

पृष्ठ 275

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भाष्यभूमिका १ - त्र्यापक- आत्मा - विश्वातीतः - आधिदैविक: - ज्ञानयोग प्रतिष्ठा । २ - सगुणेश्वरः - - विश्वेश्वरः - श्राध्यात्मिकः - भक्तियोग प्रतिष्ठा ३ - साञ्जनं विश्वं विश्वम् -- आधिभौतिकः कर्मयोग प्रतिष्ठा * १ - ज्ञानयोगः - श्राधिदैविक साध्यसाधन विशिष्ट: ------ -- उत्तमाधिकारिणाम. २ - भक्तियोगः -- आधिदैविकमाध्याधिभौतिकसाधनविशिष्टः - मध्यमाधिकारिणाम् ३- कम्मे योगः - श्रधिभौतिकसाध्यसाधनविशिष्ट: - --- प्रथमाधिकारिणाम १ - उपनिषदः – – विशुद्धज्ञानयोग प्रतिपादिकाः - ( अखण्डात्मप्रतिपादिकाः - इति यावत् ) २ - आरण्यकानि - उभयनिष्ठ भक्तियोग प्रतिपादकानि ३ - ब्राह्मणानि – – विशुद्धकर्मयोगप्रतिपादकान * बतलाया जा चुका है कि, बाह्मणभागोक्त, आधिभौतिक साध्य - साधन - विशिष्ट, विश्वानुगत कर्म्मयोग पराशान्ति - लक्षण आत्मानन्द की प्राप्ति में असमर्थ रहता हुआ परमपुरुषार्थकोटि से बहिष्कृत है । एवमेव श्रारण्यक भागोक्त, श्राधिदैविक साध्य, तथा श्राधिभौतिक साधनविशिष्ट, विश्वेश्वरानुगत भक्तियोग भी श्रात्मानन्दप्राप्ति में असमर्थ रहता हुआ परमपुरुषार्थकोटि से बहिर्भूत ही माना जायगा । यद्यपि भक्तियोग मे - ' सा परानुरक्तिरीश्वरे ' ( शाण्डिल्यसूत्र ) के अनुसार ध्यानलक्षगण ( समानप्रत्ययप्रवाहलक्षण ) ज्ञान का समावेश है । तथापि साधनदृष्टि से इसमें कर्म की एकान्ततः निवृत्ति नहीं है । वस्तुगत्या विशुद्ध श्रात्मदृष्टि से उपास्य - उपासक्रभाव सर्वथा अनुपपन्न है । व्यापक आत्मविवर्त के सम्बन्ध में ' अहं त्वं ' ( मैं - तू ) का भेद सर्वथा अनुपपन्न है । निम्नलिखित उपनिषन् ति के अनुसार वह ज्ञानैकघन विशुद्ध आत्मा मृत्युल क्षण - भेदभाव से एकान्तत: शून्य है-देवेह तमुत्र, यमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ( कठोपनिपन ४ वल्ली ११ ) “ एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ” – “ योऽसावादित्ये पुरुषः, सोऽहम् " - " ग्रोऽहं, सोऽसौ - योऽसी-सोऽहम् " इत्यादि वचनों के अनुसार उस अद्वय - अखण्ड - व्यापक तत्व में जब द्वैतभाव का समावेश नहीं, तो मानना पड़ेगा कि, भक्तियोग भी वहाँ सर्वथा अवरुद्ध है । किसी फकीर से जब यह पूछा गया कि, आप उसे याद करते हैं, अथवा नहीं?, तो उसने उत्तर दिया-मैं ग़ैर कोई हूँ, तो वह मुझे भूले | वह अगर ग़ैर कोई हो, तो मुझे याद रहे ॥ २६०

पृष्ठ 276

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तृतीयखण्ड तात्पर्य्य - जब मैं ( जीवात्मा ) और वह ( ईश्वरात्मा ) दो नहीं, तो फिर उपासना कैसी? | उपासना शास्त्रविहित है, परन्तु अन्तिम ध्येय नहीं है । ' उपायाः शिक्षमाणानाम् * के अनुसार प्रारम्भिक धरातल है, परमार्थदृष्ट्या सत्य पथ है । क्योंकि उपासना में मायाकृत, कल्पित, असत्यमूलक द्वैतभाव सुरक्षित बना रहता है | जीवेश्वर का भेद नहीं टूटने पाता । ' द्वितीयाद्वै भयं भवति ' इस सर्वमान्य सिद्धान्त के अनुसार उपास्य - उपासक - भेदेन द्वैतभावात्मिका उपासना में अभय का अभाव है । द्वैतभाव भय का मूल है, भय की उत्तर | वस्था ही दुःख है । फलतः मान लेना पड़ता है कि, द्वैतभावानुगत, श्रतएव भयभावप्रवर्तक भक्तियोग भी जीवात्मा का परमपुरुषार्थ नहीं बन सकता । विश्वानुगत कर्म्मयोग, विश्वेश्वरानुगत भक्तियोग, दोनों हीं योग जब अनुपपन्न हैं, तो हमारे लिए अत्र ऐसा कौनसा योग बचा रहता है, जिसके अनुगमन से हम पराशान्ति - लक्षण अमृतपद प्राप्त करने में समर्थ बन सकते हैं?, इसी प्रश्नसमाधि के लिए वेद का उपनिषद्भाग प्रवृत्त हुआ है । उपनिषत् हमें सिखाती है कि, जो पुरुष बन्धनमूलक कर्म्ममार्ग में रत रहता है, अथवा अपने आत्मा से भिन्न देवता की उपासना करता है, न स वेद, न स वेद ( अर्थात् उसने कुछ नहीं जाना, कुछ नहीं जान । ) । “ अहमेवाधस्तात्, अहमुपरिष्टात् ” ++ “ अहमेवेदं सर्वम् ” ++ " ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ” इत्यादि सिद्धान्तानुसार वह व्यापक आत्मब्रह्म सत्र ओर से सत्र में सर्वरूप से व्याप्त है । कर्म नानाभावापन्न है, देवमूला उपासना भी भेदभाव से नित्य श्राक्रान्ता है । इस द्वैतभाव के सम्बन्ध से दोनों हीं मार्ग अद्वैतामृत के प्रतियोग हैं । निश्चित है कि, यदि हम अपना वास्तव में निःश्रेयस् चाहते हैं, तो कर्म्म ' का एकान्ततः परित्याग करना पड़ेगा । सांसारिक कम्म'जाल को नमस्कार कर एकान्त - जनवविहीन - अरण्य का अनुगमन करना पड़ेगा, बहाँ त्यक्ताहारविहारादिलक्षण तपोयोग को अपनाना पड़ेगा, समानप्रत्ययप्रवाहलक्षणा, आत्मचिन्तन रूपा उपासना के अनुष्ठान से चित्तशुद्धि का अधिकारी बनना पड़ेगा । जब कालान्तर में चित्त शुद्ध हो जायगा, कम्म'वासना का आत्यन्तिक लय हो जायगा, तो विशुद्ध ज्ञानघन श्रात्मस्वरूप का उदय होजायगा । और यही हमारे जीवन का परमपुरुषार्थ होगा, जिसकी शिक्षा ही उपनिषच्छास्त्र का एकमात्र उद्देश्य है । उपनिषत हमें क्या सिखाती है?, इस प्रश्न का ( प्राचीनदृष्टि से ) निम्नलिखित तथ्य? पूर्ण उत्तर ही पर्याप्त माना जायगा -“ संसार मिथ्या है, तदनुगत कर्म्ममार्ग भी सर्वथा मिथ्या है । भेदमूलक भक्तियोग भी परमार्थतः असत्य ही है । परमपुरुषार्थ की सिद्धि के लिए कर्म - भक्ति का परित्याग करो, सर्वकर्मा-त्यन्तविमोकलक्षण ज्ञानयोग का अनुगमन करो । यही सर्वश्रेष्ठ पथ है, यही उपदेश है, यही आदेश है, यही शिक्षा है " । २ – प्रत्नदृष्टिं, और उपनिषदों की शिक्षा— व्याख्याताओं की दृष्टि इसलिए प्राचीनदृष्टि है कि, कुछ एक अतीत शताब्दियों से कल्पनाजगत् के आधार पर उस दृष्टि का नवीन जन्म हुआ है । और हमारी दृष्टि इसलिए ' प्रत्नदृष्टि ' है कि, इसका किसी साम्प्र-* — उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः । असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ ( वाक्यपदी २६१

पृष्ठ 277

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मायभूमिका | दायिक व्याख्या से सम्बन्ध न हो कर परम्परा सिद्ध - दृष्टि से सम्बन्ध है । व्याख्याताओं की जिस प्राचीनदृष्टि का पूर्वपरिच्छेद में दिग्दर्शन कराया गया है, उसके भयावह दुष्परिमाणों से हम अपने पाठकों को अधिक भय-त्रस्त नहीं करना चाहते । इस सम्बन्ध में केवल यही कह देना पर्य्याप्त होगा कि, कर्म्मप्रधान भारतवर्ष के गौरव के सर्वनाश का श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है, तो वह एकमात्र यही प्राचीनदृष्टि है । जिस दृष्टि ने हमें शास्त्रव्याज से यह सिखाया कि, " ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, कर्म कभी शान्तिका कारण नहीं है, फलतः कर्म करना व्यर्थ है " । इसी शिक्षा नुगमन से भारत श्री का सर्वस्व अपहृत हुआ है । अपने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण के आधार पर ऐसी शिक्षा ने जब से प्रधानता प्राप्त की, तभी से क्रियात्मक मानवधर्म्म का, आर्गधर्म्म का ह्रास आरम्भ हो गया । और आज तो कर्म्माभ्यास से भारतीय प्रजा इतनी विदूर हो चुकी है कि, उसे पदे पदे भाग्यवाद, तथा कल्पित भक्तिवाद का ही अनुगामी बनना पड़ रहा है । समय पर दृष्टि नहीं होती, भगवान् का कोप है । अकालमृत्यु अधिक होती है, ईश्वर का कोप | हम दुःखी हैं, परतन्त्र हैं, ईश्वर का कोप । जनसाधारण धर्म से विमुख होता जारहा है, ईश्वरकोप । इसप्रकार आज हम अपना सम्पूर्ण उत्तरदायित्त्व ईश्र के सिर पर थोप कर शान्ति का श्वास ले रहे हैं । अधिक से अधिक हुआ, तो एक स्थान पर एकट्टे होकर झञ्झा - ताल मृदङ्ग को उपास्य बना कर ' हरिनाम सङ्कीर्त्तन ' का अनुगमन कर लिया जाता है । वैकुटधाम आज कौड़ियों में मिल रहा है । ' हरे राम हरे राम ' का उच्चारणमात्र आज हमें क्षणमात्र में सीधा परमधाम पहुँचा रहा है । कैसा भीषण पतन है! प्रजा की कैसी दुरवस्था है!! और कैसा है उस कृशिक्षा का यह भयानक फल, जिसके अनुगमन से आज भारतीय प्रजा व्यामोह में पड़ी हुई है!!! सर्वज्ञ - सर्ववित्- सर्वशक्तिधन जगदीश्वर ने मनुष्य की अध्यात्मसंस्था में ज्ञान - अर्थ - क्रिया- मात्राएँ प्रतिष्ठित कीं । अपने भूतभाग से पाञ्चभौतिक शरीर प्रदान किया, वैश्वानरभाग से श्रग्निवल ( कम्र्म्मचल ) प्रदान किया, अग्नि - वायु - आदित्य - दिसोम - भास्वरसोम - के प्रवर्ग्य भागों से ' वाक् प्राण - चक्षु - श्रोत्र - मन ' नामक इन्द्रियाँ प्रदान कीं, मत्रत्रेन्द्ररूप सौर तत्त्व के प्रवर्ग्य से बुद्धि प्रदान की, पारमेष्ठ्य ब्रह्मणस्पति सोम के प्रवर्ग्य भाग से महद्ज्ञानविभूति प्रदान की । इसप्रकार अपनी सम्पूर्ण विभूतियों का प्रदान कर अपने स्वरूप से सर्वथा समतुलित बना कर, सर्वाङ्गीण बना कर - ' पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ' इस साङ्केतिक श्रादेश के साथ इसे संसारक्षेत्र में भेज कर जगदीश्वर ने इससे यह आशा की कि, मेरी दिव्य विभूतियों को ले कर भूतल पर अवतीर्ण होने वाला मानव इन शक्तियों का सदुपयोग करेगा, अपने ज्ञान - क्रिया - अर्थ- मावों के विकास से अपनी आध्यात्मिकसंस्था को विकसित करता हुआ इसके आधार यह पर अपने कुटुम्ब, जाति, ग्राम, नगर, गढ़, का अभ्युत्थान करता हुआ विश्वशान्ति का सन्देशवाहक बनेगा । परन्तु खेद का विषय है कि, जबसे यह कुशिक्षा के कुचक्र का अनुगामी बना, तब से अपने उस महान् स्वरूप को भुला बैठा । और आज?, आज तो यह अपनी रक्षा करने में भी असमर्थ है । ईश्वरप्रदत्त विभूतियोंके उपभोग से वञ्चित श्राज का मानवसमाज अपनी अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित दिव्यविभूतियों से अपरि-चित रहता हुआ आज नामसङ्कीर्त्तनद्वारा भगवान् से पुकार कर रहा है । क्या यह इसका व्यामोह नहीं है? | क्या इसकी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, शरीर, विचारशक्ति, इसकी अपनी कमाई है १, क्या ये सब सम्पत्तियाँ ईश्वरा-नुग्रह नहीं है?, क्या इनके अनुगमन से यह अपना अभ्युदय नहीं कर सकता १, क्या इनकी उपेक्षा करता हुआ मानव बाह्यजगत् में ईश्वरनाम का चीत्कार करता हुआ नातिक पद का अनुगमन नहीं कर रहा?, भारतीय २६२

पृष्ठ 278

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 278 का मूल पृष्ठ
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तृतीयखण्ड कर्म्मवाद, ऋषिपरम्परा / सिद्ध भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, आदि का क्या यही बीभत्सरूप है?, क्या इसी का नाम सना-धर्म है?, क्या यही हमारी आस्तिकता है?, अभ्युदय निःश्रेयस्पथों - से वञ्चित करने वाला यह व्याजधम्म-चरण ही क्या वास्तविक धर्म है?, शास्त्रानुगमन का क्या यही फल है?, आशा है - श्रार्षधम्मप्रेमी हमारी इस प्रश्न- परम्परा का यथानुरूप समाधान - अन्वेषण का प्रयास करेंगे । विचार हमें उस उपनिषत् - शिक्षा का करना है, जिसकी मूलप्रतिष्ठा जगन्मिथ्यात्त्ववाद है । ' मिथ्या ' शब्द का अर्थ यदि ' विनाशी ' है, ' नश्वर ' है, तब तो कोई आपत्ति नहीं है । यदि ' मिथ्या ' का अर्थ ' अभाव ' है, तो श्रापत्ति है । ' कुछ नहीं है ' वाक्य सर्वथा अशास्त्रीय है । और कहा जा सकता है कि, मायामय विश्व सल्लक्षण ईश्वर की विभूति बनता हुआ सर्वथा ' सत्य ' है । ' माया ' स्वयं एक वस्तुतत्त्व है, जिसका पूर्वप्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । सद्भावना - मिध्याभावना - नास्तिकमत है, जिसकी दृष्टि में सम्पूर्ण प्रपञ्च, सम्पूर्ण जीवन दुःखपूर्ण है, शून्य है । इधर दृष्टि से सद्भावना - सत्यभावना ही मूल सिद्धान्त है, यही आस्तिक प्रजा की आस्तिकता है, जिसकी दृष्टि में सम्पूर्ण प्रपञ्च, सम्पूर्ण जीवन श्रानन्दमय है, पूर्ण है । ' पूर्णमदः पूर्ण-मिदम् ' - ' आनन्दाद्धये व खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभि-संविशन्ति ' ( उपनिषत् ) ऐसे विस्पष्ट शब्दों में विश्व, एवं विश्वप्रजा को पूर्णेश्वर की पूर्णविभूति, श्रानन्दविभूति बतलाने वाला उपनिषच्छास्त्र विश्व को मिथ्या कहेगा, उसे निःसार बतला कर कर्ममार्ग से हमें वञ्चित करने की शिक्षा देगा, क्या यह सम्भव है? । श्रात्मतत्त्व का विश्लेषण करने वाली प्रस्थानत्रयी ( उपनिषत्, व्याससूत्र, गीता ) का अथ से इति पर्यन्त अन्वेषण कर डालिए, कहीं श्रापको ईश्वरीयविभूतिलक्षण विश्वके लिए ' मिथ्या ' शब्द का प्रयोग उपलब्ध न होगा । हाँ यत्रतत्र ' अनृत ' शब्द का साक्षात्कार अवश्य होगा, जोकि अनृत शब्द वस्तुतः ' ऋत ' भाव का बोधक माना गया है । ' सत्य, ऋत ' नामक दो तत्त्व अग्नीषोमात्मिका सृष्टि के मूलोपादन मानें गए हैं । स्वाय-म्भुव वेदाग्नि ' सत्य ' है, सत्याग्नि के यजुर्भाग से उत्पन्न पारमेष्ठय- भृग्वङ्गिरोमय अपनत्व - ' ऋतमेव परमेष्टी ' के अनुसार ऋत तत्त्व है । सत्य वृषा है, ऋत योषा है । प्रश्नोपनिषत् - परिभाषा के अनुसार सत्यात्मक वृषा प्रास है, ऋतात्मिका योषा रयि है । मनुपरिभाषानुसार रयि पत्नी है, प्राण पति है । दोनों के दाम्पत्यभाव से ही सम्वत्सरचक्रद्वारा विश्वस्वरूप का विकास हुआ है, जैसाकि प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य में विस्तार से प्रतिपादित है | नत्रतक सत्यतत्त्व ऋततत्त्व से परिगृहीत रहता है, तभीतक वह सत्य है । श्रतएव सत्यको ऋतशब्द से भी व्यवहृत किया जाता है । ' सत्यं ऋतेधायि, ऋतं सत्येधायि ' के अनुसार दोनों का परस्पर श्रोतप्रोत सम्बन्ध है । मूल सत्य ' रस ' है, मूल ऋत ' बल ' है । रस बल के समन्वितरूप का ही नाम विश्व है, जैसा कि – ‘ तत्तु समन्त्रयात् ’ - ‘ जन्माद्यस्य यतः ' इत्यादि व्याससूत्रों से भी प्रमाणित है । सत्य, अतएव सर्वथा सद्रूप रस का वेदप्राणात्मक ऋषिप्राणरूप से श्राविर्भाव होता है । ' सामान्ये सामान्याभावः ' के अनुसार सत्प्राण में सत्प्राण की सत्ता अनुपपन्न है, अतएव इस सद्रूप ऋषिप्रारण को ' असत् ' कहा जाता है । " अप्रा * -- ‘ असद्वा इदमग्र आसीत् । तदादुः - किं तदसदासीदिति?, ऋपयो वाच तदग्रेऽस-दासीत् । तदादुः केते ऋषय इति? आणावा ऋषयः " ( शत ० ६।१।१।१ ॥ २६३

पृष्ठ 279

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 279 का मूल पृष्ठ
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भाष्यभूमिका णो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः " के प्राणः - अमनः का अर्थ भी प्राणधनः- मनोधनः- ही हुआ है । जिस प्रकार सतृप्राण अन्य सत्प्राण के समावेशाभाव से असत् कहलाया है, एवमेव चलात्मक ऋत तत्त्व भी अन्य ऋत तत्त्व के समावेशाभाव से ' अमृत ' कहलाया है, जोकि अनृत तत्व ( ऋत बलतत्व ) वाङ्मय विश्व का मूल उपादान बनता है - ‘ श्रथैतन्मूलं वाचो - यदनृतम् ” । स्वयं प्रश्नोपनिषत् ने भी अनृत की यही वैज्ञानिक-मीमांसा की है । फलतः सिद्ध हो जाता है कि, वेदशास्त्र में प्रयुक्त ' अन्त ' शब्द मिथ्याभाव का वाचक नहीं है, अपितु सृष्टिमूलभूत बलात्मक ' ऋततत्त्व ' का वाचक है । अभ्युपगमवाद से थोड़ी देर के लिए ' अनृत ' शब्द को मिथ्यापरक भान लेने पर भी ' जगत् मिथ्या है, असत्य है ' ऐसा सिद्धान्त कथमपि प्रमाणित नहीं माना जासकता । अपितु ठीक इसके विपरीत - ' सत्यम प्रतिष्ठन्ते जगदाहुर नीश्वरम् ' ( गीता १६।८ । ) के अनुसार जगन्मिथ्यावादियोंकी निन्दा ही उपलब्ध होती है । गगनसदृश, भारूप, सत्यसंकल्प, विश्वाधार, सर्वाधार, अतएव स्वयं निराधार आत्मतत्त्व को विशुद्ध ज्ञानघन मान कर कर्म्ममार्ग से जीवात्मा की स्वाभाविक निष्ठा का उच्छेद करना सर्वथा अनर्थ है । जिस आत्मतत्त्व के विशुद्ध - ज्ञानघनभाव के आधार पर कर्म्ममार्ग का प्राचीनों की ओर से विरोध हुआ है, प्रत्नदृष्टि से वह आत्मतत्त्व उभयात्मक है, ज्ञान- कर्ममय है । पूर्वप्रकरणारम्भ में यह विस्तार से बतलाया जा चुका है कि, विश्वमूलभूत श्रात्मतत्त्व अमृतरसरूप ज्ञान, मर्त्यत्रलरूप - कर्म्म, दोनों की समष्टि है । ' ज्ञायते ' ' वत् ' क्रियते ' भी आत्मा का प्रातिस्विकरूप है, जिसका - ' श्रद्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासी-दर्द्ध ममृतम् ' इन स्पष्ट शब्दों में समर्थन हुआ है । फलतः कर्म्ममय विश्व को मिथ्या बतलाना जैसे असङ्गत है, एवमेव श्रात्मप्रजापति को अकृत ( कर्म्मशून्य, शुद्धज्ञानमय ) बतलाना भी सर्वथा अप्रामाणिक ही बन रहा है । ज्ञान अमृत तत्त्व है, नित्य शान्त है, अतएव अकृत है । कर्म्म मृत्यु तत्त्व है, नित्य अशान्त है, कृत है, यह निःसंदिग्ध है | परन्तु आत्मा केवल अकृत है, यह कहना सर्वथा कृत ( बनावटी ) है । प्रकृत ज्ञान, कृत कर्म्म ', दोनों की समष्टि श्रात्मा है । दूसरे शब्दों में आत्मप्रजापति में अमृतप्रधान श्रकृतज्ञान, मृत्युप्रधान कृतकर्म्म, दोनों का समावेश है । हमारे प्राचीन व्याख्याता आत्मा के लिए प्रयुक्त - ' अहं ' शब्द को सम्भवतः प्रामाणिक मानते होंगे, जैसा कि - ' श्रहमेवाधस्तादहमुपरिष्टात् ' इत्यादि उपनिषच्छ्र तियों से संसिद्ध है | श्रात्मवाचक अहं शब्द नेवल अकृत- सल्लक्षण - अमृतरूप ज्ञान का ही वाचक है?, अथवा ज्ञान के साथ साथ कृत- सल्लक्षण - मृत्युरूप कर्म का भी संग्राहक है?, इसका निर्णय - ' अमृतं चैत्र-मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन '! ( गीता ६।१६ ) इस प्रामाणिक वचन से भलीभाँति हो जाता है । ज्ञान - कर्म्म ', दो तत्त्वों की मान्यता से सर्ववेदान्त - ( उपनिषत् ) - सिद्ध- ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' इस श्रद्वै तसिद्धान्त पर श्राक्रमण होगा, यह श्राशङ्का इस लिए नहीं करनी चाहिए कि, सत्ताभेद ही द्वैतव्यवहार की प्रतिष्ठा माना गया है । ज्ञान ( रस ), कर्म ( बल ) दोनों तत्वों की सत्ता अभिन्न है, भातिभात्र दो हैं । रस सत्तासिद्ध पदार्थ है, बल भान्तिसिद्ध पदार्थ है । भातियाँ अनेक हैं, किन्तु सत्तार सैक्य से अद्वैतवाद सुरक्षित है । भाति - मेदमूलक द्वैतवाद वस्तुगत्या द्वैतवाद का उपोलक नहीं माना जा सकता । तभी तो प्राचीनों का भी अद्वैतवाद सुरक्षित रहता है । अन्यथा अस्ति ( सत्ता ) - भाति ( चेतना ) -प्रिय ( श्रानन्द ) -२६४

पृष्ठ 280

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
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तृतायखण्ड लक्षण श्रात्मा के तीनों पर्व र गतभेद के प्रवर्तक बनते हुए अद्वैतवाद को कैसे मुरक्षित रख सकेंगे? | इस सम्बन्ध में उनका जो समाधान होगा, वही समाधान रस बल की द्वैतभाति के लिए पर्याप्त होगा । ' आत्मा विशुद्ध ज्ञानमय है ' - यह कथन, किंवा कल्पित सिद्धान्त विज्ञानप्रधान भारतवर्ष में पुष्पित पल्लवित कैसे हो गया?, यह एक दैवदुर्विपाक है, जबकि समस्त - साहित्य में ऐसा कहीं भी उल्लेख नहीं है | युक्तिवाद भी इस ज्ञानैकपक्षना का आमूलचूड़ खण्डन कर रहा है । सूर्य - चन्द्र - नक्षत्र - गगन - अनिल-नल - भूमि-- चतुद्दशविध भूतसर्ग, इन सब विश्वसर्गों का कर्त्ता ईश्वर माना गया है । यदि उस ईश्वरात्मा में कर्तृत्त्व शक्ति न थी, तो विश्वसर्ग प्रवृत्त कैसे हुआ? | क्योंकि प्राचीनाभिमत शुद्धज्ञानमय आत्मा सर्वथा निष्क्रिय है । विश्वसर्ग व्यापार - ( कर्म्म - क्रिया ) - साक्षेप है । माया का विस्तारमात्र है, यह कहने भर से समाधान नहीं हो जाता । माया है क्या?, उसमें क्रियाशक्ति आई कहाँ से १, इन प्रश्नों का समन्वय किए चिना एकहेलया माया का अर्थ मिथ्या कल्पना मान बैठना वेदप्रामाण्य मे विरोध करना है, जो सम्भवतः व्याख्याताओं को भी अभीष्ट न होगा । जत्र श्रीतवचन स्पष्ट शब्दों में विश्वमुर्ग की आत्मप्रजापति से प्रवृत्ति बतला रहे हैं, तो मानना पड़ेगा कि, उसमें ज्ञानवत् क्रियाशक्ति की भी प्रतिष्ठा है । श्रुतिसिद्ध ईश्वरक ' के विश्व को मिथ्या कहना साहस की निःसीमता है । जिस श्रात्मा को प्राचीन ' अक्षर ' कहते हैं, श्रति उसी से विश्वोत्पत्ति मान रही है । देखिए! . I १ - यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति । यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि, तक्षाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् || मुण्डक १ | १ || ) | “ २ - यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुल्लिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽऽक्षराद्विविधाः सौम्य! भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ ( मुण्डक २।१।१ । ) ३ - स ईक्षत - लोकान्नु सृजा इति । ( ऐ ० उप ० १ । १ । ) । ४- - तदैक्षत- बहु स्यां, प्रजाति । ( छा ० उप ० ६।२।३ । ) । ५ - प्रजापतिर्वा सर्नमभवत्, यदिदं किञ्च । ( शतब्राह्मण ) । ६- प्रजापतिः प्रजाः ससृजानो रिरिचान - वामन्यत । ( शत ० ३।६।१।१ । ) । ७- प्रजापते! नत्त्वदेतानन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव । यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ( यजुः २२।६५ ) । ८- यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स पोडशी । ( यजुः ८ । ३६ । ) । ६ - प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किञ्च । ( शत ० ) । १० – पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । ( यजुःसं ० ३१।२ । ) । ११ - एकं वा इदं विबभूव सर्वम् । ( ऋक्सं ० ८५८ २ ) । १२ - भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः । ( गीता ० १०१५। ) । २६५