Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 281–290
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 281–290
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भाष्यभूमिका १३ - प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ( गीता १।१८ । ) । १४ - सर्वं खल्विदं ब्रह्म " उक्त श्रौतस्मार्च प्रमाण यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि, ईश्वरप्रयत्न- साध्यरूप विश्व सर्वथा सत्य है । ईश्वर सृष्टिकर्ता है, यह नि: संदिग्ध है । सृष्टि कर्म्मप्रधाना है । यदि उसमें कर्म्मबल का समावेश न होता, तो उस कम से कम् मय विश्व का विकास असम्भव था । प्राणव्यापार ही किया है, यही तपोलक्षण आभ्यन्तर कर्म है । वाग्व्यापार ही श्रम है, यही बाह्य कर्म है । श्रम की प्रतिष्ठा तप है, तप की प्रवृत्ति काम से हुई है । कामना मन का, तप प्राण का, श्रम वाकू का व्यापार है । मनः प्राणवाक़ की समष्टि ही आत्मा है । जो श्रात्मा उपनिषत् - व्याख्याताओं की कल्पना में विशुद्ध ज्ञानमय - निष्काम कर्म्मशून्य बन रहा है, वही सत्तालक्षण आत्मा स्वयं उपनिषत् के शब्दों में ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमय: ' ( बृ ० उ ० १ | ५ | ३ ३ ) के अनुसार मनः प्राणवाङ्मय बनता हुआ सर्वकाम - सर्वकम्ममय बन रहा है । " सोऽकामयत, स तपोऽतप्यत, सोऽश्राम्यत् " श्रुति इसी सृष्टिव्यापारत्रयी का समर्थन कर रही है । जो सर्वज्ञ आत्मा प्राचीनों की दृष्टि से नितान्त तटस्थ बन रहा है, स्वयं उपनिषत् की दृष्टि से वह अन्नलक्षण यज्ञ, ब्रह्मलक्षण प्रतिष्टा, नामरूपलक्षण ज्योति का उपादान बन रहा है— यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म, नामरूप, मन्नं च जायते ॥ ( मुण्डक १ । १ । ६ । ) । इस प्रामाणिक, तथा युक्ति - तर्क - विचार - सङ्गत परिस्थिति के आधार पर हमें मान लेना पड़ता है कि, वह श्रात्मतत्त्व अवश्यमेव ज्ञान --कर्म - भेद से ' उभयात्मक ' है । ज्ञान ' ब्रह्म ' है, कर्म्म ' ' कर्म्म ' है । विश्वातीत दिव्य ब्रह्म -- कर्म्मरूप प्रजापति ही स्वज्ञानधरातल पर ( कर्म्म के द्वारा ) विश्वप्रपञ्च ( उत्पन्न कर ) प्रतिष्ठित रखता है । वह ब्रह्म - ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' - सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' के अनुसार ज्ञान-विज्ञान ( कर्म्म ) मय है, सत्य है । एवं ' सर्व खल्विदं ब्रह्म ' - ' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' - ' सर्वमु ह्ये वेद - प्रजापतिः’-' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वम् ' इत्यादि वचनों के अनुसार ' इदं ' शब्द से अभिनीत विश्व ब्रह्मात्मक है, ब्रह्मरूप है । सत्यब्रह्मांशभूत कर्मप्रधान विश्व की सत्यता के लिए इससे अधिक और क्या प्रमाण चाहिए? । श्रोत्र. नासिका, चक्षु, मुख, आदि अवयव परस्पर सर्वथा भिन्न हैं । परन्तु अवयवो ' अहं ' पदार्थ सत्र के लिए सत्र में अभिन्न है । इसी आधार पर ' अहं शृणोमि ' ' अहं जिघ्रामि ' ' अहं पश्यामि ' ' अहं वदामि ' व्यवहार प्रतिष्ठित हैं | सभी ' अहं ' हैं, यह यथार्थ है । परन्तु - ' गुणानां च परार्थत्वात्, असम्बन्धः समत्त्वात् ' न्याय से श्रोत्र – नासिका आदि का परस्पर भेद ही माना जायगा । श्रोत्र ही नासिका है, नासिका ही चतु है, चक्षु ही मुख है, यह समझ लेना भ्रान्ति है । अग्नि, इन्द्र, वरुण, यम, मातरिश्वा, आदि अवयव वही ब्रह्म है, परन्तु अग्नि ही वरुण है, वरुण ही इन्द्र है, इत्यादि ज्ञान भ्रान्त ज्ञान है । ' एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' के अनुसार वह एक ही बलग्रन्थिसम्बन्धतारतम्य से नानारूपों से परिणत हो रहा है । उत्पन्न कार्यों की अपेक्षा वह जहाँ नाना है, कारणापेक्षया वहाँ वह एकाकी है । इसी आधार पर ' एकेन विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' २६६
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तृतीयखण्ड सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । एतावता ही नानाभाव को मिथ्या मान बैठना सर्वथा प्रौढिवादमात्र रह जाता है । समझ में नहीं ता, इन सब प्रत्यक्ष परिस्थितियों को देखते हुए भी व्याख्याताओं ने नामरूपात्मक विश्व को मिथ्या मानने की कल्पना किस आधार पर कर डाली? | व्याख्याता कहते हैं, नामरूपात्मक विश्व मिथ्या है, स्मृति कहती है, -1- नामरूपात्मक विश्व को मिथ्या मानना ' असत्यमप्रतिष्ठन्ते जगढ़ाहुरनीश्वरम् ' के अनुसार अनीश्वरवादी बनना है । व्याख्याताओं को सम्भवतः यह जान कर आश्चर्य होगा कि, जिस नामरूप को वे मिथ्या कहते हैं, जिस मिध्यात्त्व के आधार पर उपनिषत् को वे शुद्ध ज्ञान की प्रतिपादिका मानते हैं, स्वयं उस उपनिषत् में आवेश के साथ वह नामरूपविवर्त्त ' सत्य ' शब्द से व्यवहृत हुआ है । देखिए! “ प्राणा वा अमृतम् | ' नामरूपे सत्यम् । ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ' ( बृ ० आ ० ३० ४।६।३ । ) । उक्त विवेचन से विचारशील पाठकों को यह भलीभाँति विदित हो गया होगा कि, जगन्मिथ्यात्ववाद, तथा आत्मज्ञानैकतावाद, दोनों विशुद्ध कल्पना प्रसून हैं । फलतः उपनिषत् हमें क्या सिखाती है? इस प्रश्न के पूर्वोक्त उत्तर में कोई सार नहीं रह जाता । प्रत्नदृष्टि ( विज्ञानदृष्टि ) के अनुयायियों के सम्मुख जब उक्त प्रश्न उपस्थित होता है, तो वे इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उत्तर देते हैं- हैं-“ कर्म्मज्ञानयुक्त बुद्धियोग ही उपनिषदों की प्रधान शिक्षा है । एवं अक्षरात्मा को लक्ष्य बनाने वाला ज्ञान- कर्ममय खण्डात्मप्रपञ्च ही इस शिक्षा का मूलाधार है " । उक्त शिक्षासिद्धान्त का समन्वय करने के लिए कुछ एक अवान्तर विषयों का विश्लेषण आवश्यक हो जाता है । उपनिषच्छास्त्र एक रहस्यशास्त्र है । इतर वेदभाग की अपेक्षा उपनिषदों की भाषा सुसूक्ष्म, ग्रतएव दुरधिगम्या है | हमें यह विश्वास है कि, शिक्षा प्रसङ्ग में उद्धत अगले परिच्छेद में उपनिषदों के सम्बन्ध में एक सर्वथा नवीन, किन्तु सिद्धान्ततः प्रत्नदृष्टिकोण उपस्थित करेंगे । ३ - उपनिषदों की सञ्चरविद्यात्मिका शिक्षा-" श्रात्मा ज्ञानकर्ममय है ", इस सिद्धान्त के समर्थन के लिए पूर्व परिच्छेद में कुछ एक श्रौतस्मार्च वचन उद्धत हुए हैं | इस सम्बन्ध में जिज्ञासा - उत्थान स्वाभाविक है कि क्या उपनिषदों में भी संहिता ब्राह्मण-भागादि की भाँति सृष्टिविद्या का निरूपण हुआ है? । इसी प्रश्नसमाधि के लिए प्रकृत परिच्छेद उपस्थित हुआ है । सन्तमतानुगृहीत प्राचीनमताभिनिवेशानुग्रह से कुछ एक शताब्दियों से सर्वसाधारण का ऐसा विश्वास हो गया है कि, उपनिषत् - साहित्य उस अवस्था के लिए उपयोगी है, जब मनुष्य के लिए कुछ कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता । विशुद्ध - ज्ञान चर्चा से सम्बद्ध उपनिषत् केवल परलोकप्राप्ति का साधक है । लोकसृष्टि-विज्ञान का उपनिषत् से कोई सम्बन्ध नहीं है । कहना न होगा कि, यह भ्रान्ति उसी व्याख्याभ्रान्ति का अनुग्रह् है | हमने तो इस सम्बन्ध में अपने ये विचार स्थिर किए हैं कि, सञ्चरविद्या से सम्बन्ध रखने वाले ' सृष्टि-विज्ञान ' ( ब्रह्मविज्ञान ) का जैसा मामिक, श्रृङ्खलाबद्ध विश्लेषण उपनिषत् में हुआ है, वैसा स्वयं संहिता, ब्राह्मणादि भागों में भी अनुपलब्ध है । एक आत्मतत्व से नानाभावापन्न विश्व का निर्माण कैसे हुआ?, इस प्रश्न का समाधान करने वाली विद्या ही ' सञ्चरविद्या ' कहलाई है । एवं उपनिषदों में स्थान स्थान पर इस सञ्चरविद्या का अनेक दृष्टियों २६७
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भूमिका से निरूपण हुआ है | उदाहरण के लिए सबसे प्रथम स्थान रखने वाली ईशोपनिषत् को ही लीजिए । इसमें अथ से इति पर्य्यन्त धारावाहिकरूप से सृष्टिपवों की उत्पत्ति का प्रतिपादन हुआ है । षोडशीप्रजापति मे सर्वप्रथम अव्यक्त स्वयम्भू का प्रादुर्भाव होता है । ' अनेजदेकं ' मन्त्र ने उसी का प्रतिपादन किया है । स्वयम्भू से शुक्रात्मक महल्लक्षण परमेष्ठी का उदय हुआ है । ' स पर्य्यगान ' ने इसी का विश्लेषण किया है । परमेष्ठी के गर्भ में विज्ञानात्मघन सूर्य्यं का, अनन्तर चन्द्रमा का, अनन्तर महिमापृथिवी के आधार पर साक्षी सुपर्णका, एवं भूपिण्ड का विकास हुआ है । अगले मन्त्रों में क्रमशः इन्हीं का निरूपण हुआ है । इसप्रकार ईशोपनिषत् प्रधानरूप से सञ्चरविद्या ( सृष्टिविज्ञान ) की निरूपिका बन रही है । इसके अतिरिक्त निम्न लिखित वचन उपनिषदों की इसी सञ्चरविद्या का स्पष्टीकरण करते हुए यह प्रमाणित कर रहे हैं कि, उपनिषत् केवल परलोक काही प्रमाणपत्र नहीं देती, अपितु वह उस सृष्टिविज्ञान का भी विश्लेषण कर रही है, जिसे बिना जाने प्रतिसञ्चरलक्षण ज्ञानमार्ग का अधिकार मिलना असम्भव है । सञ्चरविद्यासमर्थक वचन— १ – “ तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ” ( ई ०3०४ मं ० ) । २ - " तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ” ॥ ( केनोप ०४ । ३३ । ) । ३ - ' ग्निर्यौको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । वायुर्यको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च " ॥ ( कठोप ०५ | ६ | १० | ) | ४ – “ प्रजाकामो वै प्रजापतिः । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा मिथुनमुत्पादयते-रयिश्च, प्राणं च । इत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ” ( प्रश्नोप ० १५० | ४ मं ० । ) । ५ - " तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ।
५-यथोर्णनाभिः सृजते गृहते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् ॥
यः सर्व्वज्ञः सर्व्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म - नामरूपमन्नं च जायते " ॥ ( मुण्डकोप ० १।१।६,७,१, ) । ६- " ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । सोऽयमात्मा चतुष्पात् । वैश्वानरः प्रथमः पादः, तैंजसो द्वितीयः पादः, प्राज्ञस्तृतीयः पादः । एष सर्वेश्वरः, एष सर्वज्ञः, एपो-अन्तर्यामी, एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ” ॥ ( माण्डूक्य ० ) । २६८
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तृतीयखण्ड ७- " सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म XXX तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आका-शाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः ओष-धीभ्योऽन्नम्, अन्नाद्र ेतः, रेतसः पुरुषः, स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ” ॥ ( तैःउ ०२०१ अ ० ) । ८-: - " आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्, नान्यत् किञ्चन मिषत् । स ईक्षत - लोकान्नु सृजा इति । स इमाँल्लोकानसृजत - ग्रम्भो, मरीचि, र्मर, मापः " ॥ ( ऐ ००१ । २ । ) । है- ६ - " प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् । तेषां तथ्यमानानां रसान् प्राबृहत् - यग्निं पृथिव्याः, वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः " ॥ ( ह्रां ० ० ४ । १७ । १ । ) । १० - " आप एवेदमग्र आसुः । ता आपः सत्यमसृजन्त, सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं, प्रजापतिर्देवान् 1 । ते देवाः सत्यमेवोपासते " ॥ ( बृ ०३०५ श्र ०।५ ब्रा’१कं ० ) । “ स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेत्, यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, वास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति ।
तस्योपनिषत् - सत्यस्य - सत्यम् - इति । प्राणा वै सत्यम् । तेषामेष सत्यम् ” ॥
( वृ ० आ ० उ ०५।१।२० | ) । ११ - " येनावृतं नित्यमिदं हि सर्व ज्ञः कालकालो गुणी सर्व विद्यः । तेने शितं कर्म्म विवर्त्तते ह पृथिव्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् " । ( श्वे ० उ ० ६० | २ मं ० ) । १२- " आपो वा इदमसत् सलिलमेव । स प्रजापतिरेकः पुष्करपर्णे समभवत् । तस्यान्त-र्मनसि काम: समवर्त्तत - इदं सृजेयमिति ॥ ( बृ ० जा ०३०१।१ । ) । १३ - " विचत्तणातो रेत भृतं पञ्चदशात् प्रसूतात् पित्र्यावतस्तन्मा पुंसि कर्त्तयें -रध्वं पुंसा कर्त्रा मातरि मासिषिक्तः स जायमान उपजायमानो द्वादश त्रयोदश उपमासो द्वादश त्रयोदशेन पित्रा सतद्विदेहं प्रतितद्विदेहं तन्म ऋतवो मर्त्यव आरभध्वं तेन सत्येन तपसा - ऋतुरहिम आर्त्तवोऽस्मि ॥ ( कौ ० ना ० उ ०१ । २ । ) । सञ्चरविद्या - समर्थक उद्धृत उदाहरणों से प्रकृत में हमें यह बतलाना है कि, उपनिषत् केवल ज्ञानानु-गत प्रतिसञ्चरभाव से ही सम्बन्ध नहीं रखती, जैसा कि व्याख्याताओं नें उपनिषदों को केवल सर्वकम्म'-त्यागलक्षण - ज्ञानयोगशिक्षापरक मानते हुए कहा है । उपनिषदों में प्रतिपादित सृष्टिविज्ञान ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि, उपनिषदों का श्रवण - मनन - निदिध्यासन जरा - जर्जरित, शिथिलेन्द्रिय, २६६
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भाष्यभूमिका सर्वकर्मोपरत, संन्यासी के आत्मकल्याण का प्रवर्तक नहीं है, अपितु सर्वकम् ( शास्त्रीयकम् ) परायण, सबलेन्द्रिय, युवा ब्रह्मचारी के अध्ययन की सामग्री है, गृहस्थी के अभ्युदय का अन्यतम ग्रालम्बन है । एवं सञ्चरविद्यात्मक विज्ञानकाण्ड से सम्बन्ध रखने वाले सृष्टि के गप्ततम रहस्य - विज्ञानों की शिक्षा भी उपनिषदों का एक अन्यतम दृष्टिकोण है । ४ - उपनिषदों की प्रतिसञ्चरविद्यात्मिका शिक्षा-अनेकत्त्व से एकत्व की ओर आना ही ज्ञान है । यही ज्ञान ' प्रतिसञ्चरविद्या ' है, एवं ज्ञानपक्ष ही उपनिषदों का दूसरा शिक्षात्मक दृष्टिकोण है । अनित्य, भूतानुगत, ज्ञानवञ्चित, क्षणिक विज्ञान जहाँ दुःख का प्रवर्त्तक है, वहाँ नित्य, प्राणानुगत, ज्ञानसहकृत, विज्ञान अभ्युदय - निःश्रेयस ( तेहलौकिक - पारलौकिक सुब ) का प्रवर्तक माना गया है । विशुद्ध नानाभाव भी ' विविधं ज्ञानं ' निर्वचन से विज्ञान है, एवं एकत्त्व पर प्रतिष्ठित नानाभाव भी ' विविधं ज्ञानं ' निर्वचन से विज्ञान है । विशुद्ध ( एकल सम्पत्ति से वञ्चित ) विज्ञान अपने स्वाभाविक मृत्युभाव के कारण - ' मृत्योः स मृत्युमाप्नाति य इह नानेव पश्यति ' के अनुसार जहाँ मृत्युपाश का प्रवर्तक है, वहाँ ज्ञानयुक्त विज्ञान अमृतरसात्मक ज्ञानालम्बन से अमृतभावात्मक बनता हुआ मृत्युपाश निवर्त्तक बन रहा है । भारतीय नित्यविज्ञान, तथा लौकायतिकों के क्षणिक - विज्ञान में यही एक बहुत बड़ा दृष्टि - भेद है । सर्वत्र एकत्त्वमूलक समदर्शन को प्रधानता देते हुए अनेकदमूलक विषमवर्त्तन का अनुगमन करना भारतीय दृष्टिकोण है । एवं सर्वत्र अनेकत्त्व का दर्शन करते हुए कल्पित एकस्वभावनानुगत, अतएव कल्पित समवर्त्तन का व्याज से आचरण करना लोकायतिक दृष्टिकोण है । उपनिषदों का एकत्वप्रतियोगिक, अनेकत्त्वानुयोगिक ( सञ्चरविद्यात्मक ) विज्ञानकाण्ड हमें नि की शिक्षा देता हुआ जहाँ हमारे लोकवृत्त को पुष्पित - पल्लवित कर रहा है, वहाँ बही उपनिवत् - शास्त्र अनेकत्त्वप्रतियोगिक, एकत्वानुयोगिक ( प्रतिसञ्चर विद्यात्मक ) अपने ऐसे ज्ञानकाण्ड से समदर्शन की शिक्षा देता हुआ हमारे आत्मवृत्त की भी रक्षा कर रहा है । विज्ञान वही उपयोगी है, जिसका आधार ज्ञान है | ज्ञान वही उपयोगी है, जिसके गर्भ में विज्ञान प्रतिष्ठित है । उस एक आत्मब्रह्म को उद्देश्य मान कर अनेकत्वमूलक विश्वप्रपञ्च का विधान करना विज्ञानपक्ष है । दूसरे शब्दों में ब्रह्म से विश्व कैसे बना?, इस प्रश्न का समाधान करने वाली विद्या सञ्चरविद्या है, यही विज्ञानकाण्ड है । निष्कर्षतः एक को मूल मान कर अनेक की ओर आना सञ्चरविद्यात्मक विज्ञान है । इस नानाभावात्मक विश्वप्रपञ्च को उद्देश्य मान कर एकत्त्वमूलक ब्रह्म का विधान करना ज्ञानपक्ष है । दूसरे शब्दों में विश्व ब्रह्मरूप में कैसे परिणत हो जाता है? इस प्रश्न का समाधान करने वाली विद्या प्रतिसञ्चरविद्या है, यही ज्ञानकाण्ड है । निष्कर्षतः अनेक को मूल मान कर एक की ओर आना प्रतिसञ्चरविद्यात्मक ज्ञान है । ' ब्रह्म ' वेदं सर्वम् ' - प्रजापतिस्त्वेवेनं सर्वं यदिदं कि ' - ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म, प्रजापति, आत्मा, को उद्देश्य मान कर सर्वत्त्व का विधान कर रहीं हैं । अतएव इन्हें हम सञ्चरविद्यात्मिका मान सकते हैं । ब्रह्म ही विश्व बना है, प्रजापति ही सब कुछ है, आत्मा ही सब कुछ है, इन वाक्यों का यही तात्पर्य्य है कि, आरम्भ में एकरूप आत्मतत्त्व ही स्वात्मस्थ चलभाग के पारस्परिक सम्बन्ध - तारतम्य से नानाभावात्मक विश्वरूप में परिणत हो रहा है । ' सर्व ' खल्विदं ब्रह्म ' - ' सर्वमु ह्ये वेदं प्रजापतिः ' इत्यादि २७०
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तृतीयखण्ड श्रतियाँ ' सर्व'- ' इदं ' शब्दादि से अभिनीत नानाभावात्मक विश्व को उद्देश्य मान कर ब्रह्मत्त्व का विधान कर ग्हीँ हैं । अतएव इन्हें प्रतिसञ्चरविद्यात्मिका कहा जा सकता है । सम्पूर्ण प्रपञ्च अन्ततोगत्त्वा उसी ब्रह्मभाव में परिगान है । मुष्टिदशा में नानाभावात्मक बना हुआ विश्व बलग्रन्थि - विमोक से अन्ततः तद्रूप में हीं परिणत हो जाता है । यही भारतीय ज्ञान - विज्ञानभावों की संक्षिप्त परिभाषा है । सृष्टिदशा में ज्ञानगर्भित विज्ञानात्मा ( कर्मात्मा ) उपास्य है, मुक्तिदशा में विज्ञानगर्भित ज्ञानात्मा उपास्य है । दोनों अवस्थाओं में ज्ञान - विज्ञान ( कर्म्म ) दोनों इष्ट है । सृष्टिदशा में बलग्रन्थिप्रवर्त्तक प्रवृत्तिकर्म उपास्य है, तो मुक्तिदशा में बलग्रन्थिनिवर्त्तक निवृत्तिकर्म्म उपास्य है । " प्रवृत्त ं च निवृत्त च द्विविधं कर्म वैदिकम " ( मनुः १२/६८ | ) के अनुसार दोनों वैदिक कर्म्म अवस्थाभेद से, परिस्थितिभेद से व्यवस्थित हैं । यही व्यवस्थिति प्रामाणिक है, जिसे कि निम्न लिखित स्मार्त्ती - उपनिषत् का समर्थन
प्राप्त है --ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वच्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥
( गीता ० ७ | २ ) । प्रवृत्ति - निवृत्ति, दोनों समानकाल में भुक्त हैं । सृष्टि का सम्भूतिलक्षण स्थिति से मुक्ति का विनाश-( ग्रथिबन्धविमोक ) -लक्षणा गति से सम्बन्ध है । विज्ञानानुगता सृष्टिस्थिति, ज्ञानानुगता सृष्टिमुक्ति, दोनों सहचारिणीं हैं, जैसाकि - ‘ सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्ब दोभयं सह ' से प्रमाति है । यावज्जीवन कर्म्ममार्ग में रूड़ रहना विज्ञानशिक्षा का फल है, यावज्जीवन कामासक्ति का त्याग रखना ज्ञानशिक्षा का फल है । यही उपनिषत् - शिक्षा का निष्कर्ष है, जैसाकि सर्वान्त में स्पष्ट किया जाने वाला है । अत्र कुछ एक उन श्रौपनिषद वचनों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जो प्रतिसञ्चरविद्या के समर्थक हैं | स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना ही प्रतिसञ्चर है । एवं उद्धृत वचनों का समन्वय इसी दृष्टिकोण से हो रहा है । प्रतिसञ्चरविद्यासमर्थक वचन— १ – ‘ " यस्मिन् सर्वाणि भूतानि श्रात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ” ( ई ० उ ० ७। ) । २ – “ श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ " ( केनोप ० १ । १ । ) । ३ - " इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था, अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धि:, बुद्ध ेरात्मा महान् परः । महतः परमव्यक्तं ', अव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ” ( कठोप ० ३ । १ । १०, ११, । ) । २७१
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भाष्यभूमिका यच्छेवाङ्मनसी प्राज्ञः, तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महत नियच्छेत्, तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ ” ( कठोप ० ३।२।१३ | ) | ४ - " एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुपं प्राप्यास्तं गच्छन्ति, भिद्यते तासां नामरूपे, पुरुष इत्येवं प्रोच्यते । स एषोऽकलोऽमृतो भवति ” ( प्रश्नोप ० ६ | ५ | ) |
५-- " यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्व्वेः ।
तमेवैकं जानथ श्रात्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः ॥
( मुण्डकोप ० २२२५ ) । ६- " सर्वं ह्येतद्ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म । नान्तः प्रज्ञं, न बहिः प्रज्ञं, नोभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं, न प्रज्ञं, नाप्रज्ञं, अदृष्टं, अन्यवहार्य्यं, अग्राह्य, अलक्षणं, अचिन्त्यं, अव्यपदेश्यं, ऐकात्म्यप्रत्ययसारं, प्रपञ्चोपशमं शान्तं, शिवं, अद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते, स आत्मा, स विज्ञेयः " ( माण्डूक्यो ० ७ । ) । ७- " XXXX ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः, स एको ब्रह्मण आनन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । स यश्चायं पुरुषे, यश्वासावादित्ये, स एकः । स य एवंवित्-अस्माल्लोकात् प्रत्य- एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतं प्राणमयमात्मानमुप ०, एतं मनोमयमात्मानमुप ०, एतं विज्ञानमयमात्मानमुप ०, एतमानन्दमयमात्मान-मुपसंक्रामति । यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कुतश्वन ॥ " ( तै ० उ ० २।८,६ अनु ० ) । ८– “ एष ब्रह्म, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, इमे सर्वे देवाः, इमानि च पञ्च महाभूतानि-पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्रारणीव बीजानी-तराणि, चेतराणि चाण्डजानि च, जारुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वाः, गावः, पुरुषाः, हस्तिनः । यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमंच, पतत्रि च, यच्च स्थावरं, सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रं, प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं, प्रज्ञानेत्रो लोकः, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, प्रज्ञानं ब्रह्म ' ( ऐ ० उ ० २।३ । ) । ६ - " सर्वं खल्विदं ब्रह्म, तज्जलानीति शान्त उपासीत । मनोमयः प्राणशरीरो भा-रूपः सत्यसङ्कल्प आकाशात्मा सर्वकम्म सर्गकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्व-२७२
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तृतीयखड मिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः । एष म आत्माऽन्तहृदयेऽणीयान् ब्रीहेर्वा यवाद्वा सर्पपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वा । एष म आत्माऽन्तहृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् -दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः । एतद् ब्रह्म । एतमितः प्रत्याभिसम्भवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह - शाण्डिल्यः, शाण्डिल्यः " ( छा ० उप ० ३ प्र ० १४ खं ० ) । १०- " तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति, सर्नमात्मानं पश्यति ' ( वृ ० आ ० उ ० ४।३।२३ ) । ११ - " सलिल एको द्रष्टा तो भवति । एष ब्रह्मलोकः सम्राट् इति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्यः । एपास्य परमा गतिः, एपास्य परमा सम्पत्, एषोऽस्य परमो लोकः, एषोऽस्य परम आनन्दः । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुप-जीविन्त " ( वृ ० आ ० उ ० ४।३।३२ ) । १२ - " सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवामृतम् । श्रात्मविद्यातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् " ॥ ( श्वे ० उ ० ११५६॥ ) । " यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित् यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तं नेदं पूर्ण पुरुषेण सर्चम् ॥ " ( श्वे ० उ ० ३ शहा ) । १३ - " यत्र न वायुर्वाति, न चन्द्रमा भाति, यत्र न नक्षत्राणि भान्ति, यत्र नाग्निर्दहति, यत्र न मृत्युः प्रविशति, यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति, सदानन्दं, परमानन्दं, शान्तं, शाश्वतं सदाशिनं, ब्रह्मादिवन्दितं, योगिध्येयं, परं पदं, यत्र गत्वा न निवर्त्तन्ते " । ( बु ० जा ० उ ० ८६ ) | १४- " स होवाच- यो वै बालाक एतेषां कर्त्ता, यस्य चैतत् कर्म्म, स वेदितव्यः " ( कौ ० प्रा ० उ ० ४ । १८ । ) । ज्ञान - विज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाला, इनका मौलिक रहस्य बतलाते हुए ज्ञानविज्ञान की शिक्षा देने वाला, दूसरे शब्दों में विज्ञानगर्भित ज्ञान की शिक्षा देने वाला शास्त्र ही उपनिषच्छाभ्त्र है, यही उपनिषत् - शब्द का प्रवच्छेदक है, जैसा कि भूमिका - प्रथमखण्ड में उपनिषच्छच्दार्थनिरूपण -प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । विज्ञानशिक्षागर्भिता ज्ञानशिक्षा ही प्रतिसञ्चरविद्या है, यही उपनिषत्-२७३
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भाष्यभूमिका शिक्षा का दूसरा दृष्टिकोण है । विज्ञान - ज्ञान शिक्षा का, किंवा विज्ञानगर्भिता ज्ञानशिक्षा का अनेक दृष्टियों से समन्वय किया जा सकता है । पहिले हमें लोकसंग्रहदृष्टि से उस शिक्षात्रयी का समन्वय करना है, जो कि भारतीय आात्तिक समाज में ' योगत्रयी ' ( कर्म्म - भक्ति - ज्ञान - योगत्रयी ) नाम से प्रसिद्ध है । ५ - उपनिपड़ों की कर्मयोगशिक्षा-( उपनिषदों की योगत्रयी ) १ - उपनिषदों का कर्म्मयोग - ( धर्म्मबुद्धियोग ) -प्राचीनपरिभाषा के अनुसार आधिभौतिक - साधनसाध्यविशिष्ट सत्कर्म्मषट्क का ही नाम ' कर्मयोग ' है, जैसा कि प्रथम परिच्छेद में स्पष्ट कर दिया गया है । व्याख्याताओं ने उक्त लक्षण कर्म्मयोग को इसलिए पुरुषार्थ का प्रतिबन्धक माना है कि, “ कर्म क्षणिक क्रियामय होने से दोभात्मक है । क्षोभ ही अशान्ति है, अशान्ति ही स्थितिविच्युतिरूप भय है, भय ही दुःखका मूल बनता हुआ शाश्वत आनन्दलक्षण अभयपद का प्रतिद्वन्द्वी है । अभयपदप्राप्ति ही जीव का परम पुरुषार्थ है । जब तक भयात्मक कर्म्मका अनुगमन है, तबतक तत्प्राप्ति सम्भव है । अपि च कर्म्म मल है, किट्ट है । मल सभी दृष्टियों से आत्मज्योति का आवरक है । अतएव कर्मविमोक ही आत्मज्योतिर्विकास का अन्यतम हेतु है " । इस सम्बन्ध में थोड़ा संशोधन अपेक्षित है । हम देखते हैं कि, सतत कर्म्म ' में प्रवृत्त रहता हुआ भी प्रजापति ( ईश्वर ) कर्म्म बन्धन से विमुक्त है । अपने कर्म से सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न कर, ' तत्सृष्ट्वा ' न्याय से विश्वगर्भ में प्रविष्ट होकर भी वह स्रष्टा विश्वबन्धनासक्ति से संस्पृष्ट है । यदि कर्म्म बन्धन का कारण होता, तो कम्म ' मय - विश्व के अणु अणु में व्याप्त रहने वाला कर्म्माध्यक्ष, कम्म प्रवर्त्तक प्रजापति बन्धन में पड़ जाता, और फिर उसके लिए ' नित्यशुद्ध - मुक्त ' इत्यादि शब्द प्रयुक्त न होते । मानना पड़ेगा कि, कम्म बन्धन का कारण नहीं है । जो कर्म्म आत्मा का स्वरूप है, वह बन्धन का कारण बन भी कैसे सकता है । आत्मानुबन्धी कर्म्म ' बन्धन का कारण नहीं, श्रतएव तद्रूप कम्मों का अनुगमन करता हुआ जीवात्मा कभी कम्म बन्धन में नहीं पड़ सकता । जिस प्रकार कम्म बन्धन का कारण नहीं, एवमेव कम्म प्रवृत्ति भी बन्धन का कारण नहीं है । प्रवृत्ति ही तो कर्म्म का प्रातिस्विक स्वरूप है, जैसाकि ' विसर्गः कर्म्मसंज्ञितः ' ( गीता ८ | ३ ) इत्यादि से प्रमाणित है | बन्धन का एकमात्र कारण है- ' कामना ' किंवा कामनामयी प्रवृत्ति । वस्तुतस्तु कामना भी बन्धन का कारण नहीं है । क्योंकि न्यायसम्मतलक्षण * के अनुसार बिना कामना के कम्म प्रवृत्ति ही असम्भव है, जैसा कि भगवान् मनु ने भी कहा है--* - ज्ञानजन्या भवेदिच्छा, इच्छाजन्या कृतिर्भवेत् । कृतिजन्यं भवेत् — कर्म्म, तदेतत् कृतमुच्यते ॥ २७४
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तृतीयखण्ड संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः ॥ तानि - यम - धर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः ॥१ ॥
कामस्य क्रिया काचिदृश्यते नेह कर्हिचित् ॥ ८ यद्यद्धि कुरुते किञ्चित्तत्तत् कामस्य चेष्टितम् ॥ २ ॥ ( मनुः १।३,४, )
कर्म, कम्प्रवृत्ति, कम कामना, तीनों हीं बन्धन के कारण इसलिए नहीं मानें जा सकते कि, आधिदैविकी ईश्वरसंस्था में स्वयं ईश्वरप्रजापति ज्ञानकम्म मूर्ति है, वह स्वयं सृष्टिकर्म में प्रवृत्त है, साथ ही ‘ एकोऽहं बहु स्याम् ' लक्षणा कामना भी वहाँ विद्यमान है । इन तीनों के रहते हुए भी वह नित्यमुक्त है | ऐसी स्थिति में तीनों का अबन्धनत्त्व स्वतः सिद्ध है । इन सत्र परिस्थितियों के रहते हुए कर्म्मबन्धं प्रहास्यसि ' को सुरक्षित रखते हुए हमें वैदिक कर्मयोग का समर्थन करना है । अवश्य ही कम् तिकर्त्तव्यता के सम्बन्ध में कोई ऐसा प्रतिबन्धक मानना पड़ेगा, जो अबन्धनक ', अबन्धनप्रवृत्ति, तथा अबन्धनकामना, तीनों को बन्धनप्रवृत्ति का कारण बना देता है । वही बन्धनहेतु शास्त्रों में ‘ संस्कार ' नाम से प्रसिद्ध है । यह संस्कार ज्ञानीय संस्कार, कम्म संस्कार, भेद से दो भागों में विभक्त है । ज्ञानजनित संस्कार भावना है, कम्मजनित संस्कार वासना है । यदि भावना - वासना संस्कार है, तो अव-श्यमेव बन्धन है | यह विश्वास करने की बात है कि, शास्त्र ने जहाँ भी केंहीं, जब भी कभी कम्म ', कम्म-प्रवृत्ति, कर्म्म'कामना, को बन्धन का कारण बतलाया है, वहाँ सर्वत्र शास्त्र का एकमात्र लक्ष्य भावना - वासना– संस्कार ही है । यदि और भी सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाता है, तो भावना - वासना - संस्कार भी बन्धन के कारण नहीं हैं | कारण, व्यापार की सत्ता में कार्य्यं उत्पन्न न हो, यह असम्भव है । जब ज्ञान - कर्म्म सुरक्षित हैं, तो तज्जनित भावना - वासनासंस्कार भी दुर्निवार हैं । प्रत्यक्ष दृष्ट सूर्य - चन्द्र- पृथिव्यादि ईश्वरीय कम्म के ही तो वासनासंस्कारात्मक स्थूल विवर्त्त हैं । संस्कार हो तो कम्म फल है । कम फल ही तो कर्म्म प्रवृत्ति का मुख्य कारण है । फलकामना ही कम प्रवृत्ति का मूलाधार है । ' बहु स्याम् ' यही तो उस फलकामना का स्वरूप एवं संस्कारात्मक विश्व ही तो तत्मूलभूता फलकामना का स्वरूप है । परन्तु श्राश्चर्य है कि, विश्वकर्म्म, विश्वकर्म्म'प्रवृति, विश्वकर्मा ' कामना, विश्वकम्म संस्काररूप फल, चारों के रहते भी वह कम्र्माध्यक्ष नित्यमुक्त है । मानना पड़ेगा कि, अवश्य ही बन्धन का कारण इन चारों से पृथक् है, और गीतोपनिषत् - परिभाषा के अनुसार वह कारण है एकमात्र - ' फलकामा सक्ति ' । फलकामना जहाँ स्वाभाविक है, वहाँ फलकामासक्ति अस्वाभाविक है, अप्राकृतिक है । और निश्चयेन यही बन्धन का कारण है । फलकामना बुद्धि का व्यापार है, कामासक्ति मन का व्यापार है । असङ्ग सूर्य्य-तत्त्वामिका बुद्धि से सम्बद्ध फलकाम जहाँ असन है, वहाँ ससङ्ग चन्द्रतत्त्वात्मक मन से सम्बद्ध कामासक्ति बन्धन का कारण है | चान्द्र - स्नेह - लक्षण सोममय मन की प्रधानता ही आसक्तिप्रवृत्ति का कारण | यदि कम्म प्रवृत्ति में बुद्धि का प्राधान्य है, तो बन्धन है । यदि मनःप्राधान्य है, तो बन्धन है । इसप्रकार बुद्धयनु-गत वही मन बुद्धि के असङ्गभाव से नियन्त्रित रहता हुआ जहाँ बन्धन है, वहाँ वही मन बुद्धि के प्रसङ्ग-भाव को नियन्त्रित रखता हुआ बन्धन का हेतु बन रहा है । इसप्रकार केवल मानसवृत्ति से सम्बन्ध रखने २७५