Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 291–300

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 291–300

पृष्ठ 291

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are भूमिका वाली अनासक्ति. आसक्ति ही मुक्ति, बन्ध का कारण बन रही है, जैसाकि निम्न लिखित शास्त्रीय वचन से भी प्रमाणित है--न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप! मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोऩयोः ॥ दूसरी दृष्टि से विचार कीजिए । कर्म का ही नाम ' तप ' है । यह तपोल क्षण कम्म, किंवा कम्-लक्षण तप ' अलिङ्ग, लिङ्ग ' भेद से दो प्रकार का माना गया है । जिस कम्म का आभार ज्ञान है, वह लिङ्गप है । एवं जिस ज्ञान का आधार कम है, वह कलिङ्गता है । ज्ञानाश्रित कम्म ज्ञानप्राधान्य मे अमन है, कम्मश्चित ज्ञान कम् प्राधान्य से समझ है । बुद्धिसहकृत मानस कम् लिङ्गतप है, यह ग्रबन्धन है, एवं यही ' ज्ञानमयतन ' है । मनसानुगृहीत बुद्धिकर्म्म लिङ्गता है, यह सबन्धन है, यही कम्ममय ज्ञान है । ईश्वरीय कलिङ्गप है, ज्ञानमय कर्म है । श्रतः कम्म, कम्प्रवृति, कम्म कामना, कम्फल, चारों के रहते भी वह नित्यमुक्त है । इधर पार्थिव जीवात्मा पृथिव्युपग्रहभूत चान्द्र मन के प्राधान्य से लिङ्गतप का अनुगामी बनता हुआ कामासक्ति के अनुग्रह से बन्धन का प्रवर्तक बन रहा है । यदि जीव भी अलिङ्गतप का अनुगामी है, तो बन्धनविमुक्त है । अन्य दृष्टि से समन्वय कीजिए । मानसेच्छा के ही ' कामना, इच्छा ' नामक दो पृथक् विवत्त ' हैं । श्रात्मानुगता, बुद्धिप्रधाना इच्छा ' कामना ' है । एवं विषयानुगता मनःप्रधाना इच्छा ' इच्छा ' है । कामना भूमासुखमयी है, इच्छा भूताल्पतानुगामिनी है । श्रात्मसहकृता कामना अवन्धन है, इसे ही स्वेच्छा, ईश्वरेच्छा, उत्थिताकांक्षा कहा गया हैं । भूतानुगता इच्छा बन्धनम ला है । यही परेच्छा, जीवेच्छा, उत्थाप्याकांचा, इत्यादि नामों से व्यवहृत है । ईश्वरीय चक्र में प्रतिष्ठित जीवात्मा ईश्वरीय भावनामलक विश्वाभ्युदयदृष्टि ईश्वर सांसारिकों में ' केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ' भावना से सतत प्रवृत्त रहता हुआ ईश्वरवत् नित्यमुक्त है । अपने आपको एक स्वतन्त्र संस्था मानता हुआ जीवात्मा स्वार्थवश ऐन्द्रियक सुखपूर्ति के लिए कर्म में प्रवृत्त होता हुआ नित्यबद्ध है । उक्त सन्दर्भ का निष्कर्ष यह निकला कि, बुद्धियुक्त कर्म बन्धनप्रवृत्ति का कारण है । स्मरण रखिए, बुद्धि का सहयोग दोनों क्षेत्रों में समान है । क्योंकि बिना बुद्धिसहयोग के एकाकी मन कर्म करने में नितान्त असमर्थ ' है । ऐसी दशा में बुद्धियुक्त आयुक्त के ये ही अर्थ होते हैं कि, बुद्धिप्रधान मानसकर्म मुक्ति के कारण हैं, एव मनःप्रधान कम्म बन्धन के कारण हैं । मनःप्रधान कन आसक्ति बन्धन के कारण बनते हुए ' काम्यकर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध हैं । बुद्धिप्रधान कर्म आसक्तिशून्य बनते हुए ' नित्य - नैमित्तिक ' नामों से प्रसिद्ध हैं । शास्त्रों ने यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि, ग्रात्मकामना से सम्बन्ध रखने वाले नित्य-नैमित्तिक कर्म यावज्जीवन अनुष्ठेय है । एवं मानसकामना से सम्बन्ध रखने वाले काम्यकम्म सदा त्याज्य हैं । २७६

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आसक्तिम लक काम्य कर्म्म हीं ' प्रवृत्तिकर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । अनासक्तिम लक नित्य - नैमि-त्तिक कर्म्म ' ' निवृत्तिकम् ' ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । काम्यक से उत्पन्न वासनासंस्कार का निराकरण करने से ही ये निवृत्तिकर्म्म ' कहला र हैं । ये ही निष्कामकर्म्मा हैं । यद्यपि कम्म विज्ञानानुसार इनमें भी प्रवृत्ति, कामना, फलोत्पादकता, सब कुछ सुरक्षित है । तभी तो इनके न करने में प्रत्यवाय मानना सुसङ्गत बनता है * । तथापि कामासक्ति के प्रभावमात्र से इन्हें निष्काम - निवृत्तिकम् मान लिया गया है । लोका-भ्युदयदृष्टि से, विश्वयज्ञरक्षा के नाते किया हुआ यज्ञादिलक्षण वैदिक कर्मयोग निवृत्तिप्रधान बनता हुआ मोक्ष का हेतु है | स्वार्थसाधन से कृत यही कम्म काम्य बनता हुआ प्रवृत्तिभाव से बन्धन का हेतु है । वेदरति जहाँ आवश्यक है, वहाँ वेदवादरति घातक है । काम्यदृष्टि से वैदिक कर्मयोग जहाँ त्रिगुणसम्पति से युक्त रहता हुआ अवाञ्छनीय है, वहाँ निष्कामदृष्टि से वही वैदिक कम्मयोग त्रिगुणातीतात्मा का अनुगामी बनता हुआ वश्यक है । जिन व्याख्याताओं ने कर्मयोग का विरोध किया है, साथ ही अपने विरोध को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंनें जो प्रमाण उद्धृत किए हैं, उनकी निःसारता उस समय भलीभाँति सिद्ध हो जाती है, जबकि हम कर्म्म ' की उक्त उपनिषत् ( सिद्धान्त ) का भलीभाँति स्पष्टीकरण कर लेते हैं । प्रथम परिच्छेद में व्याख्याताओं की ओर से कर्म योगनिन्दापरक, तथा ज्ञानयोगप्राशस्त्यपरक जो वचन उद्धृत हुए हैं, उनका कर्म्म त्याग से अणुमात्र भी सम्बन्ध नहीं है । अपितु सबका एकमात्र लक्ष्य फलकामासक्ति - परित्याग ही बन रहा है । ' वेदवादरताः पार्थ ' - ' कामात्मनः स्वर्गपरा ' -‘भोगैश्वर्य्यप्रसक्ता-नाम् ' इत्यादि वचन वेदोक्त यज्ञ का विरोध न कर मानसेच्छानुगता आसक्ति का ही विरोध कर रहे हैं । अना-सक्त कर्म्म के समर्थक अन्य वचनों के समन्वय की दृष्टि से भी यही मानना न्यायसङ्गत है । निष्कामभाव - सहकृत वही वैदिक कर्म्मयोग अवश्यमेव अनुष्ठेय है, यह सिद्धान्त निम्न लिखित गीताशब्दों से ही प्रमाणित हो

रहा है-१ – स्वे स्वे कर्म्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।

स्त्रकर्म्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥

२ – यतः प्रवृत्तिभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।

स्वकर्म्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

३– श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधम्मात् स्वनुष्ठितात् ।

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥

४ – सहजं कर्म्म कौन्तेय! सोपमपि न त्यजेत् ।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

* विहितस्याननुष्ठानात्, निन्दितस्य च सेवनात् । निग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति ॥ ( स्मृतिः ० ) । २७७

पृष्ठ 293

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मायभूमिका ५ – असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । सिद्धि परमां संन्यासेनाधिगच्छति । ( गी ० १ ३।४५-४६ ) । ६- न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशघेतः । यस्तु कर्मफलत्यागीस त्यागीत्यभिधीयते ॥ ( गो ०१८ । ११ । ) । ७- एतान्यपि तु कर्माणि सङ्ग त्यक्त्वा फलानि च । कर्त्तव्यानीति मे पार्थ! निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ( गी ० १ = १६१ ) । ८- - नियतस्य तु संन्यासः कर्म्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्त्तितः ॥ ( गी ०१८।७ । ) । - कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन! है--सङ्ग ं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः साचिको मतः ॥ ( गी ० १८६ । ) । बहुत सम्भव है, चीन व्याख्याताओं से पूर्व युगों में भी कम को लेकर ऐसे विवाद होते रहे हो । परन्तु रहस्यवेत्ताओं ने उस समय भी अपने उक्त निर्णय को ही सुरक्षित रखखा है । कर्मत्यागमला संन्यास-भावना को आगे कर यज्ञादि कम्मों को सदोष मानने वाले सम्भवतः गीताशास्त्र के निम्न लिखित निर्माय का विरोध न कर सकेंगे—

१ - काम्यानां कर्म्मणां न्यासं संन्यास को विदुः ।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥

२ - त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म्म प्राहुर्मनीषिणः ।

यज्ञदानतपःकम्मं न त्याज्यमिति चापरे ॥

३– निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम! यज्ञ - दान- तपः - कर्म्म न त्याज्यं कार्य्यमेव तत् । ( गी०१८।२--३-४--५- ) । ( १ ) यही अवस्था ' न ध्रुवैः प्राप्यते ध्रुवं तन ० ' इत्यादि श्रौत वचनों की है । फलकामासक्ति से सम्बद्ध काम्य कर्म्म ' वास्तव में अध्रुव हैं । क्योंकि, इनका अध्रुव स्वर्गादि फलों से सम्बन्ध है । इनमे कभी ध्रुव - श्रात्मपद प्राप्त नहीं किया जा सकता । यदि काम्यभाव हटा दिया जाता है, तो ये ही कर्म्म ' ध्रुव श्रात्मा-नुगामी बनते ' हुए ध्रुव बन जाते हैं । ( २ ) नित्यम् स्वाभाविक है । श्रतएव ये जीवप्रयत्न से बहिर्भूत रहते हुए अकृतक हैं । आत्म-कम्प भी अकृतक ( अकृत्रिम ) हैं । इन्हीं से अकृत आत्मा की प्राप्ति सम्भव है । काम्यकम् विकृतिभाव से २७२

पृष्ठ 294

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तृतीयखण्ड सम्बन्ध रखते हुए कृत ( कृत्रिम ) हैं । इनसे सचमुच अकृतभाव प्राप्त नहीं हो सकता । ' नास्त्यकृतः कृतेन से यही स्पष्ट किया गया है । ( ३ ) काम्य यज्ञकर्म्म ' वास्तव में ग्रह हैं । क्योंकि अनित्य स्वर्गफल से सम्बद्ध इन काम्य कम्र्मों में स्थिरता का अभाव है | इसप्रकार ' प्लवा ह्येते दृढा यज्ञरूपाः ' इत्यादि श्रुति ने काम्यभाव को आगे करते हुए ही यज्ञकर्म ' को ग्रदृढ माना है । यदि काम्यभाव का त्याग है, तो यही दृढ हैं । ( ४ ) प्रजा, वित्तादि, के साथ पठित कर्म्म मानस कामनानुगत भूतकर्म्म का ही संग्राहक माना जायगा । यह कर्म्म ' परेच्छानुगामी बनता हुआ, श्रासक्तिबन्धन का प्रवर्त्तक बनता हुआ वास्तव में मृतप्राप्ति का प्रतिबन्धक है । ' न कर्म्मणा न प्रजया धनेन ' इत्यादि श्रुति इसी रहस्य का स्पष्टीकरण कर रही है । ५,६,७,८,६,१०,११,१२, इन श्राट श्रौत वचनों के द्वारा, तथा आगे के १२ स्मार्त्त वचनों के द्वारा व्याख्याताओं नैं जो यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि, ज्ञानयोग ही मुक्ति का कारण है, यह भी प्रौढ़िवादमात्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । बुद्धिसहकृत निष्कामकर्मानुयायी ही ज्ञानी है, ऐसा ज्ञानवान् ही आत्मस्वरूप पहिचान सकता है । मानसेच्छानुगत कम्म का अनुयायी भोगैश्वर्य्य - प्रसक्त बनता हुआ मर्ख है, ऐसा अज्ञानी आत्मस्वरूपत्रोध में असमर्थ है | सम्पूर्ण ' वचन एकमात्र इसी स्थिति का स्पष्टीकरण कर रहे हैं । अभ्युपगमवाद से थोड़ी देर के लिए हम यह मान लेते हैं कि, आत्मा शुद्ध ज्ञानमय है । इस शुद्ध -ज्ञानमय आत्मा पर कर्म्मजनित वासना संस्कार का आवरण आया हुआ है । जबतक यह आवरण नहीं हट नाता, तत्रतक आत्मज्ञानोदय असम्भव है । अत्र प्रश्न हमारे सामने यह है कि, इस कर्मावरण को किस उपाय से हटाया जाय? | ज्ञान स्वयं निष्क्रिय है । यदि वह सक्रिय होता, तो ज्ञानमय आत्मा पर संस्कारावरण का ग्राक्रमण ही न होता । अवश्य ही उन व्याख्याताओं को भी यह मानना पड़ेगा कि, कर्म्मावरणनिवृत्ति कर्म्मा-न्तर से ही सम्भव है । प्रवर्त्तक कर्म से आवरण हुआ था, निवर्त्तक कर्म से आवरण हटाया जासकता है । ' विषस्य विषमौषधम् ' - ' कण्टकं कष्ट केनैवोद्धरेत् ' इत्यादि न्यायानुसार कम्म ' का निवर्त्तक कम ही बन सकता है । ज्योतिर्धन सूर्य्य बद्दलों की तुलना में सहस्रगुणित शक्ति रखता हुआ भी प्रयत्नसहस्रों से भी स्वाव-रणभूत बद्दलों को हटाने में असमर्थ है । अपितु सजातीय वायु ही इन्हें हटाता है । इसप्रकार ज्ञानोदय ने पहिले पहिले निवृत्तिकर्म का अनुगमन व्याख्याताओं को भी मानना पड़ता है । जत्र कर्म की आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है, तो विशुद्ध ज्ञानात्मा इस लोक की वस्तु न रह कर परज्योति में विलीन हो जाता है । उस समय न कर्मयोग का प्रश्न रहता, न ज्ञानयोग का । ' ताहगेव भवति ' स्थिति से अतिरिक्त सोवाधिक दशा में जीवात्मा कर्म्म ' प्रपञ्च से क्षणमात्र भी जब वियुक्त नहीं होसकता, तो उस दशा में कर्म त्यागलक्षण ज्ञानयोग का कुछ भी महत्त्व शेष नहीं रह जाता । जबतक देह है, तत्रतक देही है । जबतक देही है, तत्रतक कर्म्मत्याग असम्भव है * । जब कर्म्म ' करना ही है, तो लोकसंग्रह की दृष्टि से शास्त्रसिद्ध कम्र्म्म योग का ही निष्कामभाव से अनुगमन क्यों न किया जाय । स्वयं भगवान् ने यही निर्णय किया है-* न हि देहभृता शक्यं त्यक्तं कर्माण्यशेषतः । ( गीता १८।११ । ) २७६

पृष्ठ 295

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भाष्यभूमिका न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्य्यते ह्यत्रशः कर्म्म सर्गः प्रकृतिजेर्गुणैः ॥ ( गीता २ । ५ । ) कर्मयोग को हम प्रचलित, संशोधित, भेद से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं । प्रचलित कर्म्म -योग का स्वरूप है ‘ काम्यकर्म्म ' । संशोधित कर्म्मयोग का स्वरूप है ' धर्म्मबुद्धियोग ' । सूर्योपादानभृता बुद्धि में विद्या, विद्या, नामक २ धातु मानें गएँ हैं । दोनों विद्या अविद्या - चतुष्टयी भेद से चार चार भागों मे विभक्त हैं | ये ही प्राधानिकशास्त्रसम्मत ' अष्टौ बुद्धयः ' हैं । धर्म्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, चार विद्या-बुद्धि है, अभिनिवेशलक्षण धर्म्म, अविद्यालक्षण ज्ञान ( मोह ), रागद्वे पलक्षणा आसक्ति, अम्मिताल-क्षण अनैश्वर्य, ये चार विद्याबुद्धि है । चारों अविद्याबुद्धिभावों से आत्मज्योति श्रावृत रहती है, बुद्धि ( विद्याबुद्धि ) का श्रात्मा के साथ योग नहीं होने पाते । धर्मादि से बुद्धि का विद्याभाव विकसित रहता है । विद्यात्मिक ऐसी बुद्धि ही आत्मयोग में समर्थ है । निष्कामभावानुगत यज्ञाद्यनुष्ठान ही धर्म है, इसका अनुगमन ही बुद्धि में धर्मातिशय का प्रतिष्ठापक है । यही संशोधित, धर्मबुद्धियोगलक्षण ' कम्म'योग ' है, जिसका गीताभाष्यभूमिकान्तर्गत ‘ कर्म्मयोगपरीक्षा ' खण्ड में विस्तार से प्रतिपादन हुआ । है " अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते ” ( मनुः २ १३ ) के अनुसार भूतासक्ति से संस्पृष्ट लोका-भ्युदय - कामुक व्यक्तियों के द्वारा अनुष्ठेय वेदोक्त कर्मकाण्ड ही कम्मयोग है । यही उपनिषदों का एक दृष्टि-कोण है । जिन उपनिषदों को व्याख्याता कम्र्म्म त्यागलक्षण ज्ञानयोगपरक मान रहे हैं, वे उपनिषत् स्वयं उक्तलक्षण कर्मयोग का निम्न लिखित शब्दों में समर्थन कर रहे हैं-धर्म्मबुद्धियोगलक्षण कर्म्मयोग के समर्थक वचन – १ – “ कुर्वन्न वेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एव ं त्वयि नान्ययेतोऽस्ति न कर्म्म लिप्यते नरे " ॥ ( ई ०3०१ । ) " ओं क्रतो स्मर, कृतं स्मर " ( ई ० उ ० १७ । ) । २ - " उपनिषदं भो न हि इति उक्ता त उपनिपत्, ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमत्र मेति । तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् । यो वा एतामेवं वेद, अपहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति ' ( केनोप ०४ खं ०।३२, ३३,३४ ) । ३ – “ ऋतं पिवन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौं परमे परार्द्ध । छायातपो ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेता ॥ ( कठ - १ । १ । ३ ) ४ – “ अधोतरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनं, एतदमृतं, अभयं एतत् परायणम् । एतस्मान्न पुनरा-वर्त्तते, इत्येष निरोधः ” । ( प्र ०१।१० ) । २८०

पृष्ठ 296

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तृतीयखण्ड

त े ह तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ।

तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥

. तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिल्ह्यमनृतं न माया चेति " ( प्रश्नोप ०१।१५,१६, ) ५- ' ' तदेतत् सत्यं - मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यं— स्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि । तान्यचरथ नियतं सत्यकामा -एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके " ( मुण्डक १ । २ । १ । ) । " तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्म्मसु चामृतम् || ” ( मुण्डक १ | | १ ८ | ) “ क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वते एकर्षि श्रद्धयन्तः । तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोत्रतं विधिवद्यस्तु चीर्णम् ॥ ” ( मुण्डक ३ | २ | ११ | ) ६- ' ' जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा - आदिमत्त्वात् । आप्नोति ह वै सर्वान् कामान्, आदिश्च भवति य एवं वेद ” ( माण्डूक्य ६ ) । ७– “ सत्यं वद, धर्म्यं चर, प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः, देवपितृ कार्य्याभ्यां न प्रमदितव्यम्, यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः – धर्म्मकामाः स्युः, यथा ते तत्र वर्त्तेरन्, तथा तत्र वर्त्तेथाः । एष आदेशः, एष उपदेशः, एषा वेदोपनिषत्, एतदनुशासनम् ” ( तै ० । १ । ११ । ) । " ऋतं सत्यं तपः, दमः शमः, अग्नयः ( यज्ञाः, ) अग्निहोत्रं, अतिथयः, मानुषं, प्रजनः, प्रजातिः - स्वाध्याय - प्रवचने च ' ( तै ० राहा ) । ८- “ स एवं विद्वान् – अस्माच्छरीरभेदादू उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् " ( ऐ ० उ ० ४।६ । ) । - " नाना तु विद्या चाविद्या च । यदेव विद्यया करोति, श्रद्धयोपनिषदा, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति " छा ० उ ० १।१।१७ । ) । १०- “ XXXX य्रात्मैवास्य । कर्मात्मना हि कर्म्म करोति । स एप पाङ्क्तो यज्ञः, पाङ्क्तः पशुः, पाङ्क्तः पुरुषः, पाङ क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च । तदिदं सर्वमाप्नोति, य एवं वेद " ( बृ ॰ उ ० १।४।१७ ) । २८१

पृष्ठ 297

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भाष्यभूमिका “ अथो खल्चाहुः - काममय एवायं पुरुषः - इति । स यथाकामी भवति, तत्क्रतु-भवति, यत्कर्म कुरुते, तदभिसम्पद्यते " ( वृ ० उ ० ४।४।५ । ) । इत्युपनिषदां कर्म्मयोगशिक्षा ( धर्म्मबुद्धियोगशिक्षा प्रथमा ) ६ - उपनिपदों की भक्तियोग शिक्षा--3------२ - उपनिषदों का भक्तियोग - ( ऐश्वर्य्यबुद्धियोग ) – उपासना, तथा भक्ति, दोनों के तात्त्विक स्वरूप में यद्यपि अन्तर है, तथापि प्रकृत में दोनों को अभिन्न मानते हुए ही हमें विचार करना है । साथ ही इस सम्बन्ध में यह स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है कि, प्रकृत में ' भक्तियोग ' से वस्तुतः ' उपासना ' ही अभिप्रेत है, जिसमें तत्त्वोपासना का ही प्राधान्य है । उपासना का चरम लक्ष्य तो ' अक्षर ' ही है, जैसाकि पूर्व परिच्छेदों में स्पष्ट किया जा चुका है । परन्तु इस लक्ष्यवेध से पहिले भूतशुद्धि अपेक्षित है । एवं भूतशुद्धि के लिए तत्त्वोपासना अपेक्षित है । पञ्चभूतात्मक पार्थिव शरीर की शुद्धि ही भूतशुद्धि है । पृथिवो, जल, तेज, वायु, आकाश, पाँचों भूतों के अभिमानी देवता क्रमशः गणपति, दुर्गा, सूर्य्य, शिव, विष्णु, इन नामों से प्रसिद्ध हैं 1 । पार्थिवतत्त्व ही गणपति है, मूलाधार चक्र ही इनकी प्रतिष्ठाभूमि है । अतएव सर्वप्रथम इसी तत्त्व की उपासना अपेक्षित है । इसी उपासना से मलशुद्धि होती है । मलशुद्धि जब तक नहीं हो जाती, तब तक शक्तिसञ्चार असम्भव है, शक्तिसञ्चार के अभाव में बुद्धि ( तेज ) का विकास असम्भव है, बुद्धिविकासाभाव में शान्तिलक्षणा स्थिरप्रतिष्ठा असम्भव है, शान्ति - प्रतिष्ठा के अभाव में सर्वभूतहितर तिप्रवर्त्तिका सर्वव्याप्तिभावना असम्भव है । इसी आधार पर पाँचों तत्त्वों की उपासना का क्रमशः आराधन माना गया है । यही सुप्रसिद्ध पञ्चदेवोपासना है, जिसका तात्त्विक स्वरूप सम्प्रदायाभिनिवेश से आज सर्वथा विलुप्त हो गया है । तन्त्रशास्त्र ने मुख्यरूप से इसी तत्त्वोपासना का विश्लेषण किया है, जिसका मूल उपनिषदों का ही उपासनाकाण्ड है । ईश्वर - अनुग्रहप्राप्तिकामलक्षणा उपासना भक्तियोग है, एवं ऐसा भक्तियोग एक प्रकार से काम्यकर्म है । अतएव ऐसा काम्य भक्तियोग तत्त्वतः बन्धन का ही कारण है । प्रथम परिच्छेद में व्याख्याताओं ने जिस भक्तियोग को लक्ष्य बना कर ज्ञानयोग का समर्थन किया है, वह यही काम्य भक्तियोग है, जिसके मूल में गुणत्रयविशिष्ट सगुणभाव प्रतिष्ठित है । वास्तव में कामानुग्रहप्राप्तिलक्षणा ऐसी सगुणभक्ति पराशान्ति का कारण नहीं बन सकती । परन्तु जैसे फलकामा सक्तिशून्य कर्म्मयोग त्रिगुणातीत बनता हुआ पराशान्ति का कारण बन रहा है, साथ ही ऐसे कर्म्मयोग का जैसे उपनिषदों में समर्थन हुआ । है, एवमेव कामभावशून्या, तत्त्वोपासनात्मिका, अतएव त्रिगुणभावविरहिता भक्ति भी अवश्यमेव पराशान्ति का कारण बन सकती है, एवं ऐसी भक्ति का अवश्यमेव उपनिषदों में समर्थन हुआ है । इस भक्तियोग के अनुष्ठान से बुद्धिगत श्रस्मितालक्षण अनैश्वर्य्यभाव पलायित हो जाता है । अस्मिता के आवरण से विद्यमान भी श्रमशक्तियाँ मुकुलितावस्था में परिणत रहतीं हैं । यही जीवात्मा के २८२

पृष्ठ 298

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तृतीयखण्ड स्वतः सिद्ध ऐश्वर्य्य का महाप्रतिबन्धक ' अस्मिता ' नामक अविद्या दोष है । भक्तियोग के द्वारा बुद्धिस्थ ऐश्वर्य-भाव विकसित होता है, अस्मिता पलायित होती । यही ' ऐश्वर्य्यबुद्धियोग ' है, जिसे उपनिषदों की परिभाषा में उपासना कहा गया है । गीता के शब्दों में यही श्रव्यभिचारिणी भक्ति कहलाई है, जिसके ज्ञान, तथा वैराग्य नामक दो सत्पुत्र मानें गए हैं । धर्म्मबुद्धियोगलक्षण कर्म्मयोग की तुलना में ऐश्वर्य्यबुद्धियोगलक्षण भक्तियोग का आसन ऊँचा माना गया है 1 । कारण इसका यही है कि, भक्तियोग में शास्त्रसिद्ध धर्म्मलक्षण कम्म के संग्रह के साथ साथ ईश्वरध्यानजन्य प्रसादगुण का समावेश और रहता है । अपिच कर्मयोग से जहाँ क्षर के द्वारा अक्षरप्राप्ति होती है, वहाँ भक्तियोग से क्षर के द्वारा अव्ययप्राप्ति होती है । विज्ञानपरिभाषानुसार अव्यय -क्षर की समष्टि भक्तियोग है, अक्षर - क्षर की समष्टि कम्म योग है, तथा अक्षरप्रधान अव्यक्तज्ञान ज्ञानयोग की प्रतिष्ठा है । अवश्य ही कर्मादि योगों की इस परिभाषा में पाठकों को नवीनता प्रतीत होगी । परन्तु तत्त्वान्वेषण के द्वारा उन्हें अवश्य ही इस परिभाषा पर श्रद्धा करनी पड़ेगी । उपनिषदों का उक्तलक्षण भक्तियोग ' राज, मन्त्र, हठ, लय ' भेद से चार श्रेणियों में विभक्त माना गया है । इन चारों में राजयोग ही ऐश्वर्य्यबुद्धियोगलक्षण भक्तियोग है, यही उपनिषदों का प्रधान लक्ष्य है, जत्रकि गौणरूप से मन्त्रादि इतर तीनों योगों का भी उपनिषदों में यत्र तत्र संग्रह हुआ है । कर्मयोगापेक्षया श्रेष्ठ भक्तियोग एकमात्र ऐश्वर्य्यबुद्धियोगलक्षण भक्तियोग ही माना गया है । क्योंकि इसी में स्वात्मविकास के साथ साथ कर्म्म ' का संग्रह है, लोकसंग्रह - रक्षा है । शेष तीनों योग केवल प्रातिस्विक आत्मसंस्था से सम्बन्ध रखते हुए, अतएव लोकसंग्रह से वञ्चित रहते हुए श्रवर - श्रेणि में हीं प्रतिष्ठित हैं । यही कारण है कि, उपनिषदों को अपना मूलाधार बनाने वाले गीताशास्त्र ने चारों में से ऐश्वर्य्यबुद्धियोगलक्षण भक्तियोग को ही प्रधानता दी है । प्रकृत में इस सम्बन्ध में केवल यही स्पष्टीकरण पर्याप्त होगा किं, कामभावशून्य, कर्म्म ' संग्रहात्मक, लोकसंग्रहात्मक, बुद्धिस्थ ऐश्वर्य्यभावविकासक, श्रात्मध्यानलक्षण भक्तियोग ही उपनिषदों का भक्तियोग है, जिसकी सिद्धि के लिए तत्त्वोपासन प्रथम द्वार है । इसी तत्त्वोपासना को लक्ष्य बना कर भक्तियोग ( उपासना ) समर्थक निम्न लिखित औपनिषद वचनों का समन्वय करना चाहिए । ऐश्वर्य्यबुद्धियोगलक्षण भक्तियोग ( उपासना ) के समर्थक वचन १.-चानुष पुरुषोपासना-“ हिएमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्म्माय दृष्ट्ये ” || ( ई ० उ ० १५ ) " पूषन् कर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्, समूह तेजो यत्ते रूपं कल्यापतमं तत्ते पश्यामि / योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि " ( ई ० उ ०१६ | ) " वायुर निलममृतम् ” ( ई ० उ ० १७ ) २८३

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 299 का मूल पृष्ठ
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वैश्वानरपुरुषोपासना-* मायभूमिका " अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् | युयोध्यस्मज्जुडुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ” ( ई ० उ ० १८ ) २– “ स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना -शक्त्युपासना-३-* मुर्मा हैमवतीम् । ” ( केनोप ० ३।२५ ) । " अग्निर्ययैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । सर्वभूतान्तरा-मोपासना एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ” ( कटो ०५/६ ) भूतात्मोपासना-" मथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि, यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथा परीव दर तथा गन्धर्वलोके, छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ” ( कठी ० ६ | ५ | ) “ देवानामसि बह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ॥ ऋषीणां चरितं सत्यमथर्व्वाङ्गिरसामसि ॥ + + + + + + + +

प्राणोपासना-या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता य । श्रोत्रे या च चक्षुषि ।

याच मनसि सन्ततो शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥

प्राणस्येदं वशे सर्व्वं त्रिदिवे यन् प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रानुक्षस्य श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि नः " ( प्र ० २८-१३ ) २८४

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 300 का मूल पृष्ठ
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तृतीय ars " स यद्य कमात्रमभिध्यायीत " ओङ्कारोपासना — “ यदि द्विमात्र ेण मनसि सम्पद्यते ” ५. “ यः पुनरेतं त्रिमात्र णैवोमित्येनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत ” *

" धनुर्गृ हीत्वौपनिषदं महास्त्र शरं ह्युपासा निशितं सन्धीयत ।

श्रयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य! विद्धि ॥

अक्षरोपासना- प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ” ( मुण्डको ० २ २ ३, ४, ) । “ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ” ( मुण्डको ० ३।१।२ ) । हिरण्यगर्भोपासना--8 ६-प्रणवोपासना-" ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । तस्योपव्याख्यानं भूतं -भवद् - भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्-त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव " ( माण्डूक्यो ० १ ) । " तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत " " तन्मह इत्युपासीत " " तन्नम इत्युपासीत " त्रिभृतिपुरुषोपासना -* " तद् ब्रह्मत्युपासीत " " तद् ब्रह्मण: परिमर इत्युपासीत " “ स यश्चायं पुरुषे, यश्वासावादित्ये, स एकः " ( तै ००३ | १० ) २८५