Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 41–50

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 41–50

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तृतीयखण्ड ५-- " अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्ट ं देवेभिरुत मानुषेभिः ॥ यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ” ॥ १०।१२५।५ । ) । प्रकृत मन्त्र में वाग्देवी के सौभ्यभाव का ही निरूपण हुआ है । वही वाग्देवी वागिन्द्रियरूप में परिणत होकर स्वयं बोल रही है । वाक्शक्ति ( भाषणशक्ति ) की मूलाधिष्ठात्री यही वाग्देवी है । इस का बोलना देवताओं को भी प्रिय है, एवं मनुष्यों को भी प्रिय है । वागिन्द्रिय के ' आग्नेय - सौम्य ' भेद से दो विवर्त्त हैं । रूक्षा - कर्क-शा वाक् आग्नेयी है, स्निग्धा - मधुरा वाक् सौम्या है | जब इस वागिन्द्रिय में अग्नितत्त्व की प्रधानता हो जाती है, यह आग्नेयी बनती हुई रूक्ष बन जाती है । ऐसी वाक् से कोई भी प्रसन्न नहीं होता | परन्तु वागिन्द्रिय में जत्र आम्भृणी - पारमेष्ठिनी - सौम्या बागभाग प्रधान रहता है, तो यह सौम्या बनती हुई स्निग्ध बन जाती है । ऐसी मधुरा वाक सबके लिए प्रिय है । देवता, मनुष्य, पशु, गन्धर्व, सत्र ऐसी वाक् से आकर्षिजाते हैं । आम्भृणीवाक़् ( सौम्यावाक् ) के सम्बन्ध से सूर्य्य उग्र बन रहा है, सृष्टि का स्रष्ठा ( ब्रह्मा ) बन रहा है | इसी वाक के सहयोग से प्रारणात्मक ऋषि स्वस्वरूप से सुरक्षित है । ऐसी इस वाग्देवी की उपासना से हम भी उग्र बन सकते हैं, प्रजापति बन सकते हैं, तत्त्वद्रष्टा बन सकते हैं, स्थिरप्रज्ञ बन सकते हैं | || ५ || ६ – “ अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ ॥ अहं जनाय समदं कृणोमि श्रहं द्यावापृथिवी आविवेश " ( १०।१२५।६ । ) । प्रकृत मन्त्र में वाग्देवी के आग्नेयभाव का ही निरूपण हुआ है । सौम्या - आग्नेयी, भेद से वागिद्रिय के दो विवर्त्त ' बतलाते हुए पूर्वव्याख्या में यह स्पष्ट किया गया है कि, सौम्यावाक् शान्त है, प्राणिमात्र से जुष्ट है, दिव्यभावसमर्पिका है । ठीक इसके विपरीत आग्नेयी वाक् ' जिसे ' अग्निर्वै रुद्र: ' परिभाषानुसार हम रौद्री वाक कहेंगे, क्रोधाग्निलक्षण रुद्र के लिए तत्काल धनुष तान देती है । परस्पर शस्त्रों का तनाव इसी वाक का परिणाम है । यही वाक मनुष्यों में परस्पर समद ( झगड़ा - कलह ) कराती है । इसप्रकार द्यावापृथिवी में व्याप्त यह वाग्देवी रुद्ररूप से संहारशक्ति की अधिष्ठात्री बन रही है ॥ ६ ॥

७—– “ अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ॥ ततो वि तिष्ठ े भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोपस्पृशामि ॥ ” ॥ ( १०।१०५।७ ) । ‘ पितर ' नाम से प्रसिद्ध द्यु लोक का जन्म इसी वाकू से हुआ है । द्युलोक त्रैलोक्य - त्रिलोकी के सम्बन्ध से तीन संस्थाओं में विभक्त माना गया है, जैसाकि - " तिस्रो मातृ स्त्रीन् पितृन् विभ्रन्- नेमवग्लापयन्ति ” इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । इनमें सबसे ऊर्ध्वस्थानीय त्रैलोक्य ' संयती ' नाम से प्रसिद्ध है । पृथिवी— चन्द्रमा - सूर्य्यं को अपने महिमामण्डलगर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले आपोमय परमेष्ठी इस त्रैलोक्य के पृथिवी हैं, सत्यलोकात्मक स्वयम्भू द्यौ हैं, दोनों के मध्य का अन्तरिक्षात्मकं तपोलोक अन्तरिक्ष है । यह स्वयम्भूलक्षण द्यौ सृष्टिविज्ञानानुसार विश्वरूप विराट्पुरुष का मस्तक है । इस शिरः स्थानीया स्वायम्भुवी द्यौ का रूप आकाशात्मक है | यह आकाश ' जू ' रूप है, जो कि गतिमान् यत् के सम्बन्ध से ' यज्जु ' नाम से व्यवहृत २३

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भाष्यभूमिका होता हुआ ' यजु: ' नाम से प्रसिद्ध है । यही आकाश वाकू है, जिसे अपौरुषेया, अनादिनिधना सत्यावाक भी कहा जाता है, जिसकी कि विवर्त्तमानत्रयी को ' अपौरुषेयब्रह्मनिः श्वमितवेद ' कहा जाता है । इसी वाक्तत्व को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है कि, मैं उस पित्तर ( यू ) की जननी हूँ, जिसके मस्तक में सब कुछ प्रतिष्ठित है । अर्थात् वही वाक् आकाशरूप से विश्वरूपजननी कम रही है । कमानुसार स्वयम्भू का पहिले प्रादुर्भाव हुआ है, परमेष्ठी का अनन्तर । इधर प्रकृत में उस ' आम्भृणी ' वाकू का यशोगान हो रहा है, जिसका परमेष्ठी से सम्बन्ध है । श्रापोमय परमेष्ठी ही आम्भृणी वाकी योनि है, जैसा कि मन्त्र के - ' मम योनिरस्वन्तः ' इत्यादि वर्णन से स्पष्ट है । तथापि लोकसृष्टि की अपेक्षा से इस पारनेष्ठिनीवाकू को स्वायम्भुवी श्राकाशा मिका द्यौ की जननी मान लिया है । " आप वे सर्वाणि भूतानि ” के अनुसार पाच भूतों की प्रतिष्ठा प्राप्तत्त्व ही माना गया है । और इसी दृष्टि से यहाँ वागू द्वारा द्यौ का प्रसव मान लिया गया है । अपने अप्समुद्रान्तर्वर्त्तीरूप से यह आपोमयी आम्भृणीवाक सातों भुवनों में प्रतिष्ठित है, जैसा कि— ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' इत्यादि तैत्तिरीयश्रुति से भी प्रमाणित है । उस स्वायम्भुवी यु का इस वागदेवी ने अपने शरीर से स्पर्श कर रक्खा है । तात्पर्य्यं श्रुति का यही है कि, पृथिवी - सूर्य्य - चन्द्रमा आदि अर्वाक् जितने भी भुवन हैं, उन सबको तो इस पारमेष्टिनीवाकू ने अपने गर्भ में ले रकवा है, एवं स्वयम्भू का इस्लने स्पर्श कर रक्खा है । परमेष्ठी के ऊपर स्वयम्भू है । परमेष्ठी की सीमा स्वयम्भू संस्पृष्ट है || ७ || - " अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा ॥ परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सम्बभूव " ॥ ( १०।१२५८ ) प्रकृत मन्त्र में वाग्देवी की महिमालक्षणा साहस्री का स्पष्टीकरण हुआ है । लोकसृष्टि की रचना करते समय यही बाग्देवी गतिशील ' बात ' वायु की भाँति श्रागे बढ़ जाती है । द्यावापृथिवी को अपने गर्भ में रखने वाली यह वाग्देवी ऐसी महामहिमा से युक्त होकर प्रकट हुई है । प्रत्येक मौतिक पिण्ड के ' पदं पुनः पदं ' भेद से दो विभाग माने गए है । चित्याग्निमय स्पृश्य पिएड ' पदं ' हैं, चितेनिधेयाग्निमय दृश्यमण्डल ' पुनः पदम् ' है । इस ' पुनः दं ' में ' अग्निः - आपः वाकू ' इन तीन श्रमृत शुक्रों का भोग हो रहा है । २१ पर्य्यन्त श्रग्नि है, ३३ पर्य्यन्त श्रापः है, ४८ पर्य्यन्त वाक् है । पिएडकेन्द्र से आरम्भ कर ४८ पर्य्यन्त वाकतत्त्व वितत है, बही महिमालक्षणा वाकसाहस्री है, यही उस हृद्य प्रजापति की स्वमहिमा है, जिसके गर्भ में ' स्वे महिग्नि ० ' के अनुसार स्वयं प्रजापति प्रतिष्ठित है । इस वाङ्मय महिमामण्डल के २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त पृथिवी है, ३३ पर्य्यन्त अन्तरिक्ष है, ४८ पर्य्यन्त द्यौ है । तीनों अवारपारीण वाङ्मण्डन के गर्भ में हैं, जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रवर्णन से भो प्रतिपादित हैं-सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् । सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद्ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् ॥ २४ - ऋक्सं ० १०/११४८ ।

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तृतीयखण्ड आवें मन्त्र ने इसी महीमा का स्पष्टी करण किया है । प्रसङ्गवश आम्भृणी वाक् के सम्बन्ध में अम्भृणीसूक्त उद्धत हुआ । अत्र पुनः प्रकृत की ओर पाटकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है है । ' चत्वारि वाक् ० ' मन्त्र का प्रथम पक्ष प्रक्रान्त है । इस सम्बन्ध में विषयारम्भ करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि, वाकू के चार पदों में से तीन पद गुहा निहित हैं, एबं तुरीय पद व्यवहार्य्य है । पार्थित्रवाकूपद ही तुरीय पद है । इस वाक् का स्वरूप है — ' अनुष्नुप् ' । इस मर्त्यावाकू से ही क -च - ट - त- पादिलक्षणा व्यग्जनवा का प्रादुर्भाव हुआ है । यही वाक व्यवहा मानी गई है । ( २ ) - द्वितीय: पक्ष: -इति - प्रथमः पक्षः .१ ६- चत्वारि वाक् परिमिता पदानि ' के ११ रहस्यार्थ— उक्त पक्ष में ‘ परमेष्ठी - चन्द्रमा - सूर्य्य - पृथिवी ' इन चार लोकों के सम्बन्ध से ' आम्भृणी, सुब्रह्मण्या, बृहती, अनुष्टुप् ' भेद से वाकू के चार पद बतलाए गए हैं । अब इस द्वितीय पक्ष में ' स्वयम्भू-परमेष्टी - सूर्य्य - पृथिवी ' इनके सम्बन्ध से वाकू के चार पदों का विश्लेषण किया है । ' वाचस्पतिं विश्वकर्म्माणमूतये ' के अनुसार विश्वकर्मा स्वयम्भू ही ' वाचस्पति ' नाम से प्रसिद्ध है । यही ‘ वाचस्पत्य ’ नामक वाक का प्रथम पद है । परमेष्ठी का सोम ' ब्रह्मणस्पति ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के सम्बन्ध से पारमेष्ठिनी सौम्यावाक् का पद ' ब्राह्मणस्पत्य ' नामक द्वितीय पद है । सूर्य्यगत प्राण ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है । यही सौरी वाक का ' ऐन्द्र ' नामक तृतीय पद है । पार्थिव वाक पद चौथा ' भौम ' पद है । रोदसी - त्रैलोक्याकाश ' पुराणाकाश ' कहलाया है, क्रन्दसी - त्रैलोक्याकाश अनन्त शेषशायी विष्णु के सम्बन्ध से ' अनन्ताकाश ' कहलाया है, एवं संयती - त्रैलोक्याकाश ' परमाकाश ' कहलाया है, जिसके लिए-' योऽस्याध्यक्षः परमे व्योमन् ' इत्यादि सूक्ति प्रसिद्ध है । स्वयम्भू संयती त्रिलोकी का द्यलोक है, यही परमाकाशस्वरूप है । परमाकाशात्मिका स्वायम्भुवी वाकू ही ' वेकुरावाक ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसे हम ‘ वाचस्पत्यपद ' कहेंगे । श्रापोमय पारमेष्ठय सरस्वान् समुद्र में व्याप्त सौम्या वाकू ही ' सुब्रह्मण्या ' वाक है । यही वाकू का ‘ ब्राह्मणस्पत्य ' पद है । सौरमण्डलात्मक महाब्रह्माण्ड में व्याप्त रहने रहने वाली वाकू ही “ गौरवीता ” किंवा ‘ गौरीविता ' नाम से प्रसिद्ध है । यह वाक् का ' ऐन्द्र ' पद है । एवं पार्थिवमण्डलान्तर्भुक्त चान्द्रमण्डलोपेत सोमण्डल में व्याप्त वाक् ' आम्भृणीवाक् ' है, यही वाकू का ' भौम ' पद हैं । ये चारों वाक् अपने - अपने लोकों की प्रभव- प्रतिष्ठा - परायण बन रहीं हैं । चारों में से पूर्व की तीन वाक गुहानिहित हैं । चौथी श्राम्भृणी पार्थिवीवाक् पार्थिव - प्रजा ( श्रस्मदादि ) की स्वरूपनिर्मापि बन रही है । वाङ्मय भौतिक शरीरों के निर्माण में भी इसी वाकू का उपयोग हुआ है, एवं यही वाक् व्यवहार्य्या भी बनी है । वाक् के रक्त चार पदों में से पूर्व के तीन पद गुहानिहित हैं, यही बात निम्न लिखित मन्त्र से सिद्ध हो रही है— १२५

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भाष्यभूमिका बृहस्पते प्रथमं चाचो अग्र ं यत् और नामधेयं दधानाः । यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः ॥ ( १० / ७१।१ । ) जिस वाक् का हम आज उच्चारण कर रहे हैं, उस वाकू का मूलरूप पहिले से ही हमारी अध्यात्म-संस्था में प्रतिष्ठित रहता है । वही प्रथमप्रतिष्ठता वाग्देवी ( वेकुरावाक् ) ऋक्सामयजुरात्मिका बनती हुई वेदवाकू नाम से प्रसिद्ध है । वह यद्यपि मूलोपादानरूप से प्रकटतम है, परन्तु व्यवहारदृष्टि से सर्वथा गुहानिहित है | श्रुतएव उसका हमें सम्यक् परिज्ञान नही होता, वही मन्त्रतात्पर्य्य है । १- वेकुराबाकू —— वाचस्पत्यपदम् ( स्वायम्भुवे परमाकाशे प्रतिष्ठिता ) । २ - सुब्रह्मण्याबाकू -- ब्रह्मणस्पत्यपदम् ( पारमेष्ठ्य महासमुद्रे प्रतिष्ठिता ) । ३ - गौरवीतावाकू — ऐन्द्रपदम् ( सौरे महाब्रह्माण्डे प्रतिष्ठिता ) । ४ - आम्भृणीवाक् — भौमपदम् ( पार्थिवमण्डलानुगत - सौम्यमण्डले प्रतिष्ठिता ) । इति - द्वितीयः पक्षः ( ३ ) – तृतीयः पक्षः -केवल पृथिवीलोक के सम्बन्ध से भी इस पार्थिवी श्रम्भृणीवाक के चारों पदों का समन्वय किया जा जा सकता है । पार्थिवसंस्था में पिण्ड, महिमा, रूप से दो विवर्त हैं । जिस पर श्रस्मदादि प्रजावर्ग प्रतिष्ठित है, वह चित्यपिण्ड भूपिण्ड है । पूषाप्राणात्मक यह भूपिण्ड मर्त्याग्नि से सम्बन्ध रखता हुआ ‘ पशु ’ है । मर्त्यभाग ही वैदिक परिभाषा में पशु कहलाया है । इस पशुलक्षण भूपिण्ड के आधार पर भूमहिमा प्रतिष्ठित है | इस भूमहिमा को ही चितेनिधेय पार्थिव मण्डल कहा जाता है । इस पार्थिवाग्निमण्डल के त्रिवृत् ( ६ ) - पञ्चदश ( १५ ) - एकविंश ( २१ ) स्तोम भेद से तीन विभाग हैं । ये ही महिमामयी पृथिवी के क्रमश: पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, नामक तीन स्तौम्य लोक हैं, जिनमें क्रमशः अग्नि- वायु- श्राहित्य, नामक तीन प्रतिष्ठावा देवता प्रतिष्ठित हैं । यही स्तौम्य पार्थिव त्रिलोकी है । इसप्रकार पार्थिवसंस्था में पिएड - महिमा रूप से चार पद हो जाते हैं । अथवा रोदसी त्रैलोक्य दृष्टि से भी उक्त चार संस्थाओं का समन्वय किया जा सकता है । रोदसी त्रिलोकी में भूपिण्डसहिता पृथिवी पृथिवीलोक है, सूर्य्य द्यु लोक है, दोनों के मध्य का श्राकाश अन्तरिक्षलोक है । इसप्रकार भूपिण्ड, पृथिवी, अन्तरिक्ष, सूर्य्यात्मक द्यु लोक भेद से चार संस्था हो जातीं है । भूपिण्ड में मर्त्या-ग्नि प्रतिष्ठित है, पृथिवी में अग्नि का साम्राज्य है, अन्तरिक्ष में वातवायु का आधिपत्य है, एवं सूर्य्यात्मक द्युलोक में स्तनयित्नुलक्षण दिव्य मघवेन्द्र का साम्राज्य है, जैसा कि - " यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरि-न्द्रेण गर्भिणी ” इत्यादि यजुःश्रुति से प्रमाणित है । श्राग्नेयी पृथिवी का ' रथन्तरसाम ' माना गया है, वायव्य अन्तरिक्ष का ‘ वामदेव्य ' साम माना गया है, एवं ऐन्द्र द्यु लोक का ' बृहत्साम ' माना गया है । श्रुतएव पार्थिवी वाक् को ' राथन्तरी ', आन्तरीक्ष्या वाक् को ' बामदेव्या ', दिव्या वाक् को ' बृहती ', तथा पशुणक्षणा २६

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तृतीयखण्ड भूपिण्डानुगता वाकू को ' पशव्या ' कहा जायगा । राथन्तरवाकू अग्नि समबन्ध से ' ऋकू ' है, वामदेव्या वाक् वायु सम्बन्ध से ‘ यजुः ' है, एवं बृहहतीवाक् इन्द्रात्मक आदित्य सम्बन्ध से ' साम ' है । यही त्रयीवाक् है । पशव्यात्राकू लौकिकी वाक् है । चारों में त्रयीवांक गुहा निहिता है, चौथी लौकिकी पशव्या वाक् ही मनुष्यादि पशुओं के लिए व्यवहार्य्य है । निम्नलिखित मैत्रायणी श्रुति से इसी पक्ष का समर्थन हो रहा है--" वाजस्येमां सुषुवेऽग्रे सोमं राजानमोषधीस्वप्सु । स विराजं पर्येतु प्रजानन् प्रजां पुष्टिं वर्धयमानो अस्मे ॥

वाजस्येमां प्रसवः शिश्रिये दिवस ओषधीः समनक्तु घृतेन ।

ता अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वयं राष्ट्र जागृयामा पुरोहिताः ॥

वाजस्येदं प्रसव आबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वतः । आदित्सन्तं दापयतु प्रजानन् रयिं च नः सर्ववीरं नियच्छतु ॥ " ( मैत्रा ० सं ० १ | ११ | ४ | ) “ वाग्वि वाजस्य प्रसवः । सा वै वाक् सृष्टा चतुर्धा व्यभवत् लोकेषु त्रीणि, तुरी-याणि । पशुषु तुरीयं, या पृथिव्यां - साग्नौ सा रथन्तरे ( सा राथन्तरी ), यान्तरिक्षे - सा वाते - सा बामदेव्ये ( सा वामदेव्या ) या दिवि - सा बृहती - सा स्तनयित्नौ ( सा वृहती ) । अथ पशुषु । ततो या वागतिरिच्यत, तां ब्राह्मणे न्यदधुः । तस्माद् ब्राह्मण उभयीं वाचं वदति यश्च वेद, यश्च न । बृहद्रथन्तरयोः – यज्ञादेनं ( वाजं ) तया गच्छति । या पशुषु तय ऋते यज्ञम् । " ( मैत्रा ० सं ० १।११।५ । ) स्तौम्पत्रैलोक्यात्मके पार्थिवसंस्थाने - ' चचारि वाक्परिमिता पदानि -१ - एकविंशस्तोमः - द्यौः ( आदित्यः ) २- पञ्चदशस्तोमः — अन्तरिक्षम् ( वायुः ) ३ - त्रिवृतस्तोमः - - पृथिवी ( अग्निः ) बृहत् - - बृहती- -सामवाक् वामदेव्यं – बामदेव्या— यजुर्वाक - यज्ञमान्त्रिक-रथन्तरं —राथन्तरी - ऋग्वाकू ४- अस्तोमः -- भूपिण्ड: ( चित्याग्निः ) पशवः - - पशव्या - लौकिकी वाक् ( पार्थिवः ) २७

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भाष्यभूमिका रोदसी त्रैलोक्यात्मके रोदसीज्ञाण्डे – ' चत्वारि वाक्परिमिता पदानि -१ - सूर्य्यात्मिकाद्यौः ( इन्द्र ) – बृहत्- - बृहती- --सामवाक् --२ - अन्तरिक्षम् ( वायुः ) – वामदेव्य - वामदेव्या - यजुर्वाक् ३- महिमापृथिवी ( अमृताग्निः ) - रथन्तरं — रथन्तरी —-ऋगूषाक् ४ - भूपिण्ड: ( मर्त्याग्निः ) - पशवः --- पराव्या लौकिको वाक् इति तृतीयः पक्षः - गायत्रीमात्रिकवेदः ( सौरः ) ( ४ ) —चतुर्थः पक्षः— -३. अमृतावाक, दिव्यावाकू, वायव्याबाकू, ऐन्द्रीवाक्, भेद से भी वाग्देवी के चार पर्दोका समन्वय किया जा सकता है । इनमें से सर्वप्रथम श्रमृतावाक के ही स्वरूप पर दृष्टि डालिए । आत्मा स तत्त्व है, विश्व मर्त्य है, दोनों के समन्वय से प्राजापत्यसंस्था का उदय हुआ है, जैसा कि ' अर्द्ध ह वै प्रजापते-रात्मनो मर्त्यमासीदर्द्ध ममृतम् ' इस निगम से स्पष्ट है । मर्त्यविश्व का मूल श्रमृतात्मा वागूरूप में ( क्षर-रूप में ) परिक्षित हो कर ही मर्त्य - विकारहररूप विश्व का उपादान बनता है । जो वाक्तत्त्व विश्व का उपा-दान बनता है, उसमें काम - बप - श्रम नामक तीनों व्यापारों का समन्वय है । आत्मा की मनः - प्राण - वाक-कलाओं से क्रमशः काम - तप - श्रम का उदय होता है । फलतः वाकू का ' मनः प्राणगर्भितावाक ' यह तात्पर्य्यं निकलता है । मन की आधारभूमि विज्ञान है, सर्वाधारभूमि आनन्द है । श्रानन्दविज्ञानघन वही आत्मा मुक्तिप्रवर्तक है, आनन्दविज्ञानघन मनोमयप्रायगर्भिता वाकू की दृष्टि से वही आत्मा सृष्टिप्रवर्तक बन रहा है । उक्त मनःप्राणवागूगर्भिता आत्मवाकू का पहिला विवर्त भाव ऋग्यजुः साममय ब्रह्मनिःश्वसित पौरुषेय तत्त्वात्मक वेद है । वाग्देवी इस वेदभाव में परिणत होकर ही विश्वका उपादान बनती है । बाक को प्राण से युक्त बतलाया है, साथ ही मन से भी । यह वाक् स्थितितस्व है, प्राण गतितत्त्व है । स्थिति-लक्षणा वाक् ‘ जू ’ नामक श्राकाश है, गतिलक्षण प्राण ' यत् ' नामक प्राणवायु है । दोनों की समष्टि ‘ यज्जूः ’ लक्षण यजुर्वेद है । यही ' वयः ' नामक वस्तुतस्व है । मनोमय श्रालम्बन ' वयोनाध ' लक्षण ऋक्साम हैं । ' ऋक्सामे यजुरपीतः ' के अनुसार वयोनाध ( सीमाभाव ) लक्षण ऋक्साम में यजु डूबा हुआ है । इस-प्रकार त्रयीरूपा यह श्रमृताषाक ही अपने स्थिति - गतिभाव से सम्पूर्ण विश्व की जननी बन रही है । इसी से सब कुछ उत्पन्न हुआ है, इसी पर सब कुछ प्रतिष्ठित हैं, अन्त में इसी में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च विलीन हो जायगा । आकाशात्मिका प्राणामयी यह वाक बह्माग्निरूपा है । ब्रह्मग्नि ही इस की उपनिषत् है । यही परमाकाशलक्षला स्वायम्भुबी सत्यावाकू है । इसी अमृतावाक् के विविध कम्मों का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है-III

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तृतीयखण्ड

गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षती एकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।

अष्टापदी नवपढ़ी भृषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥

( ऋकमं ० १।१६४।४१ ) । वाङ्मय प्राण ही अर्कदृष्टि से ' गौः ' कहलाया है । स्वयम्भ– परमेष्ठी - सूर्य्य भेद से यह वाङ्मय प्राणा-त्मक गीतत्त्व शुक्ल - कृष्ण - पृश्नि, तीन स्वरूपों में परिणित हो रहा है । संयती त्रैलोक्य का स्वयम्भू ब्रह्मा से, क्रन्दसी त्रैलोक्य का पारमेष्ठ्य विष्णु से, तथा रोदसी त्रैलोक्य का सौर महेश्वर से सम्बन्ध माना गया है । स्वायम्भ वी शुक्ला गौ ब्रह्मप्रिया है, जिस के लिए ' गौरीर्मिमाय ' कहा गया है । पारमेष्टिनी कृष्णागौ विष्णुप्रिया है, जिस के लिए - ' गोसवो देवनिम्मितः ' यह प्रसिद्ध है । सौरी पृश्निगौ महेश्वरप्रिया है, जिसके लिए- ' आयं गौः पृश्निरक्रमीत् ' यह वचन बिहित है । १ - शुक्ला गौः - - ब्रह्माणी — — त्रह्मप्रिया -- ज्ञानशक्तिवर्द्धिनी ( स्वायम्भुवी ) । २- कृष्णगौः- - बैष्णवी —-वष्णुप्रिया - - क्रियाशक्तिवर्द्धिनी ( पारमेष्ठिनी ) ॥ ३- पृष्निर्गौ: - माहेश्वरी – ( सौरी ) । – रुद्रप्रिया - - अर्थशक्तिबद्धिनी उक्त तीनों गोविवर्त्तो में मूलाधार विवर्त्त प्रथम विवर्त्त ही माना गया है । बिश्वाधिष्ठात्री, विश्वमूला, परमाका-शात्मिका स्वायम्भुवी श्रमृता वेदवाक् ही प्रकृत मन्त्र में ' गौरी ' शब्द से अभिप्रेत है । गौरी का अर्थ है - ' श्वेता ' | श्वेत से यहां श्वेतवर्ण अभिप्रेत नहीं है । वर्णदृष्टि से तो यह स्वायम्भुवी वाक् प्रज्ञाता - अलक्षणा ही बन रही है । यहाँ ज्ञानज्योति के सम्बन्ध से ही इसे श्वेता ( गौरी ) कहा गया है । इस गौरीवाक का पहिला काम है पार-मे'टय श्रृप्तत्त्व का विच्छेद करना । विभागकरण ही तक्षण है । ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकान् -सो-ऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् ' के अनुसार वह वाक् पारमेष्टय समुद्र को उत्पन्न कर अपने त्रयीरूप से इस समुद्र में प्रविष्ट हो जाती है । यहाँ प्रविष्ट होकर ब्रह्माण्डसीमा का उदय करना इस का पहिला तक्षण कर्म्म है, जिसके लिए - ‘ तत आण्डं समवर्त्त ' त ' यह कहा जाता है । आगे जाकर इसका यह तक्षणकर्म्म– सम, विषम, अपरिमित, भेद से तीन भागों में विभक्त हो जाता है । १-२-४-८ संख्याओं से वाक् के सम-विभागों का, ‘ नवपदी ' शब्द से विषम विभागों का, तथा ' सहस्राक्षरा ' से अपरित विभागों का स्पष्टीकरण हुआ है । त्रिवृत् - पचदश - सप्तदश- एकविंश - त्रिणव- त्रयस्त्रिंश नामक युग्मस्तोम उसी वाङ्मय वषटकार के श्रम विभाग हैं । चतुर्विंश, चतुश्चत्वारिश, एवं अष्टाचत्वारिंश नामक युग्ममस्तोम सम विभाग है । इसी प्रकार ' एका च मे तिस्रश्च मे पच च मे सप्त च मे नव च म एकादश च मे: ' इत्यादि मन्त्र विश्रम विभाग का उदाहरण है । ‘ चतस्रश्च मेऽष्टौ च मे द्वादश च मे पोडश च मे विंशतिश्च मे चतुर्विंशतिश्च मे ' इत्यादि मन्त्र सम विभाग का उदाहरण है । एवं- ' असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ' इत्यादि मन्त्र अपरिमित विभाग का उदाहरण है । अधिदैवतसंस्था के अतिरिक्त अधिभूतसंस्था में बीज से अङ्कुर, अङ्कुर से कर्णकरी, कर्णकरी से शाखा प्रशाखा, इन से असंख्य पत्र वा विभक्तियों के उदाहरण बन रहे हैं । अध्यात्मपक्ष में ब्रह्मरन्ध्र, कण्ठ,

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भाष्यभूमिका हृदय, नाभि, गुद, मुख आदि ' एकपदी ' के उदाहरण हैं । हस्त - पाद - चक्षु क्षोत्र - नासा छिद्र - श्रोणी क्लोम-फुप्फुस - पार्श्व - श्राण्ड - मूत्ररेतली - इत्यादि ' द्विपदी ' के निदर्शन हैं । शिरोगुहा, उरोगुख, उदरगुहा, बस्ति गुहा ' चतुष्पदी ' के उदाहरण हैं । आठ प्रादेश ' अष्ठापदी ' का उदाहरण है । नवप्राण ' नत्रपदी ' का उदाहरण है । असंख्य अपरिमित सूक्ष्माणु ' सहस्राक्षरा ' के उदाहरण है । तात्पर्य मन्त्र का यही है कि, अवाधार पर वाक् के विभक्तिकरण लक्षण व्याकरण - व्यापार से ही सृष्टि में विभक्त पदार्थों की उत्पत्ति हुई है । परमाकाश में प्रतिष्ठित आकाशात्मिका गौरीबाकू ही अत्रा-धारेण तक्षणकर्म्म करती हुई - ' सर्वमिदं जनयनि, यदिदं किञ्च ', जैसा कि ' नासदीय सूक्तविज्ञान-भाष्य ' की उक्त मन्त्रव्याख्या में विस्तार से प्रतिपादित है । दूसरी दिव्या वाक् है । अमृता वेदत्रयीवाक् सत्यात्मक - ब्रह्माग्निभावापन्ना बनती हुई जहां ' सत्या ' थी, वहाँ यह दिव्या वाक् ऋतात्मक - सुबह्मसोमभावापन्ना बनती हुई ' ऋता ' है । सत्यावाक् का प्रथमावतार यही ऋतावाक् है । बागाधार पर प्रतिष्ठित यजुः प्राण के संघर्ष से जो वाक्भाग द्रुत हो जाता है, यही श्रापोमय परमेष्टी-मण्डल है । पारमेष्ठ्य समुद्र की जननी कही सत्या अमृता काकू है, जिसकी गौरी - रूप से पूर्वमन्त्र में स्तुति हुई है, एवं निम्न लिखित मन्त्र से जिसका समुद्रोपादानत्त्व उपवर्णित हुआ है -“ तस्याः समुद्रा अधिविचरन्ति तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्र: । ततः क्षरत्यक्षरं तद् विश्वमुपजीवति " ( ऋक्सं ० १६४।४२ ) । " सोऽपोऽसृजत बाच एव लोकान्, बागेब साऽसृज्यत " - " अप एव ससर्जादौ ” इत्यादि श्रुतिस्मृतियाँ भी यही स्पष्ट कर रहीं हैं । सत्यावाकू से उत्पन्न यह योमयी ऋता वाक् हो दिव्या व क् है, यही सुब्रह्म नामक ‘ अथर्ब वेद ' है । त्रयीवेद का स्वयम्भू से सम्बन्ध है, वह सत्यवाङ्मय है । अथर्ववेद का परमेष्टी से सम्बन्ध है, एवं वह ऋतवाङमय है । इसी ऋता वाक से सम्पूर्ण भूत, तथा देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ है, जैसा कि -'आपो वै सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि ' ( शत ० १० | ५ | ४ | १४ ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपम् ० ' इत्यादि गोपथश्रुति के अनुसार यह प्रप्तत्त्व भृग- श्रङ्गिरामय है । भृगुत्रयी स्नेहलक्षणा है, श्रतिरात्रयी तेबोल क्षणा है । अङ्गिरागर्भित भृगु नामक प्रप्तत्त्व से भूतसृष्टि हुई है, एवं भृगुग-र्मित अङ्गिर । नामक श्रृप्तत्त्व से देवसृष्टि हुई हैं । इसी दिव्यसृष्टि के सम्बन्ध से इसे ' दिव्यावाकू ' कहना अर्थ बन रहा है | त्रयीवागू लक्षणा अमृता वाकू को अपने गर्भ में रखती हुई यही अथर्ववाकू - लक्षणा दिव्या - वाक् अपने भृग्वङ्गिरूपद्वयी से भूत - देव जननी बनती हुई सर्वजननी बन रही है । भृगु इसी वाक् का शान्त रूप है, अङ्गिरा इसी वाकू का घोर रूप है । इसी वाग्देवी की स्तुति करते हुए, साथ ही इस के ऋतभाव का समर्थन कर हुए: निम्नलिखित | मन्त्र हमारे सामने आते हैं--* – आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् । अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ” ( गोपथब्रा ० १ | १ | २६ ) ३०

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द्वितीयखण्ड इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्मसंशिता ( स्वयम्भूसंशिता ) येनैव ससृजे घोरं तेनैव शान्तिरस्तु नः ॥ ( अथर्वसं ० १६ ॥ ३ ॥

वागारं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माता अमृतस्य नाभिः ।

सा नो जुपाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मे अस्तु ॥

— तै ००५ स्वायम्भु वी त्रयीवाक् ( श्रमृतावाक् ), पारमेष्टिनी अथर्ववाक् ( दिव्यावाक् ) दोनों में त्रयीवाक् अने-जदेजल्लक्षण । योनि है, अथर्ववाक रेत है । दोनों के समन्वय से ही विश्वविभूति का उदय हुआ है, जैसाकि -“ अनेजदेकं मनसो जवीयः " इत्यादि ईशविज्ञान भाष्य में विस्तार से प्रतिपादित है । इन दोनों वेद - वाग्विवर्त्तो में ‘ ध्वनि ’ नहीं है । अतएव ये श्रोत्रग्राह्य भी नहीं हैं । भगवान् पतञ्जलि की ' तस्माद् ध्वनिः शब्दः ' ( महा-भाग्य ) इस उक्ति के अनुसार ध्वनि ही शब्द है । अतएव ध्वनि के प्रभाव से इन दोनों को शब्द नहीं कहा जासकता । ऐसी स्थितिमें “ वेदशन्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे " ( मनु ० १।२१ । ) इस कथन के ‘ शब्देभ्यः ' पद को औपचारिक मानते हुए इसका ' वेदवाग्भ्यः ' यही अर्थ करना चाहिए । अथवा ‘ शब्द-तन्मात्रा ' नामक प्रथम गुणभूत की दृष्टि से इस पद का समन्वय कर लेना चाहिए । श्रोत्रग्राह्या ध्वनि दो प्रकार की मानी गई है । प्रज्ञानेन्द्र भक्तिविरहिता, अतएव अर्थ प्रकट करने में समर्थाध्वनि एक प्रकार की ध्वनि है । एवं प्रज्ञानेन्द्र से समन्विता वर्ण - पद - वाक्यादि से विभक्तावयवा, अतएव अर्थ प्रकट करने में समर्था ध्वनि एक प्रकार की ध्वनि है । इसी दूसरे प्रकार को लक्ष्य में लक्ष्य में रखकर श्राचाय्योंनें कहा है--" ध्वनिः पदं - वाक्य - मित्यास्पदचतुष्टयम् । यस्याः सूक्ष्मादिभेदेन वाग्देवीं तामुपास्महे ॥ " इन्द्र - शक्त्यभावात्मिकानर्थभावप्रधाना ध्वनि की प्रतिष्ठा ' बायु ' है, दूसरे शब्दों में वायु ही इस की उपनिषत् है । अतएव इसे हम ' वायत्र्या ' कह सकते हैं । यद्यपि इस वाक् में स्वतः गति का अभाव है, तथापि वायु सम्बन्ध से इस का इतस्ततः गमन होता रहता है । इस वाक् में होने वाले नाद - श्वासादि व्यापार इसी वायु का अनुग्रह है | नादश्वासात्मिका, किन्तु अर्थ | वबोधन में असमर्था इसी वावव्या वाक् को ' सरस्वती ' भी कहा जासकता है । यही वाक का तृतीय पद है । इसी वायव्या वाक् के साथ जब इन्द्र का सम्बन्ध हो जाता है, तो इन्द्रकृत विभक्तिभाव से इस में वर्ण - पद – वाक्यादि भावों का उदय हो जाता है । और उस अवस्था में अर्थावबोध में समर्थ होती हुई यह ध्वनिवाक् ‘ ऐन्द्री ’ वाक् नाम से व्यवहृत होने लगती है । वायव्या वाक् जहाँ अव्याकृता है, वहाँ यह ऐन्द्री वाक व्याकृता है T । पशुओं में अव्याकृतां वायव्या वाकू ही प्रतिष्ठित है । अतएव इन की वाक् में वर्ण - पदादि का अभाव है । मनुष्यों में ऐन्द्री वाक् का प्राधान्य है । प्रज्ञानज्ञानघन प्राज्ञ इन्द्र के प्रवेश से इस अखण्ड धरात-३१

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भाष्यभूमिका लात्मक वागविवर्त्त के ज्ञानप्रवेश से खण्ड - खण्ड हो जाते हैं । यही ऐन्द्रव्याकरण है । इसी विभक्तिकरणलक्षण ऐन्द्रव्याकरण से व्याकृता बनती हुई यह मानुषी ऐन्द्री वाक् वर्णादि खण्ड भावों में परिणत होती हुई अर्थजननी बन जाती है । इसप्रकार वायव्या वाकू से सम्बन्ध रखने वाला ' वायव्यग्रह ' इन्द्र के समावेश से व्याकृत बनता हुआ ‘ ऐन्द्रवायधग्रह ' बन जाता है, जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन ' शतपथविज्ञानभाष्य ' के चतुर्थकाण्ड में हुआ है । मानुषी वाक् कैसे व्याकृता बनती है?, इसी प्रश्न का उक्त समाधान करती सुई ब्राह्मणश्रुति कहती है-“ वाग्नै पराची अव्याकृताऽवदन् । तद् देवा इन्द्रमत्र वन् ' इमां नो वाचं व्याकुरुत ' इति । सोऽब्रवीत्- ' वरं वृणै, मह्यं चैौप, वायवे च सह गृह्याता ( तै ) ' इति । तस्मादैन्द्रवायवः सह गृह्यते । तामिन्द्रो मध्यतऽपक्रम्य व्याकरोत् । तस्मादियं व्याकृता वागुद्यते " इति ॥ वायव्या वाक को सरस्वती बतलाया गया है । इस का यह तालव्य है कि, यह वायु शिवभावप्रधान बनता हुआ आप्य है । अपनत्व का आयोमय परमेष्टी से सम्बन्ध है, एवं पारमेष्टिनी वाकू ही ' सरस्वान् ' समुद्र के सम्बन्ध से ‘ सरस्वती है । वहाँ का श्राप्य वायु ' हंस ' नाम से भी प्रसिद्ध है । पशुओं में इसी ' हंस ' नामक शिववायु का प्राधान्य रहता है । श्रतएव साम्बसदाशिव को ' पशुपति ' कहा गया है । श्रापोभावात्मिका इसी वायव्या वाक् से आपोमय भूमिएड का उदय हुआ है, जैसाकि - ' श्रद्द्भ्यः पृथिवी ' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति से प्रमाणित है । वर्णात्मिका अनुष्टुप् वाक् को ही पार्थिवी वाक कहा गया है । इस वर्णात्मिका वाक के साथ इन्द्र का सख्य है | इन्द्रसख्य से ही यह वर्णात्मिका बन पाई है । इसप्रकार पूर्व ब्राह्मण श्रुति ने जिस अर्थ का ' ऐन्द्रवायवग्रह ' रूप से स्पष्टीकरण किया है, उसी अर्थ का प्रकारान्तर से निम्न लिखित मन्त्र ने स्पष्टी -करण किया है-“ बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम् । अनुष्टुभमनु चचूर्य्यमाणभिन्द्र निचिक्युः कवयो मनीषा ॥ ” -ऋक ्म सं ० १० | १२४।६ । वायव्या वाक् का इन्द्र से मोग होता है । इसी आधार पर इन्द्रयुक्ता व्याकृता वाक् को ' इन्द्र पत्नी ' मान लिया गया है । ' इन्द्रपत्नी ' नाम से प्रसिद्ध यही व्याकृता वाक ( तृतीय वाकूपद ) वेद लोक व्यवहार की मूलप्रतिष्ठा बन रही है । विश्व के वाचिक कर्म्मकलाप इसी वाग्देवी पर प्रतिष्ठित हैं, जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । भी वाक “ वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः । वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी " । - तै ० प्रा ० २६४ | इसप्रकार अमृता ( सत्या त्रयीवाक् ), दिव्या ( ऋता अथर्ववाकू ), वायव्यावाक्, ऐन्द्री वाकू, भेद से के चार पद मानें जा सकते हैं । चारों में पूर्व के तीन पद अर्थविज्ञान से सम्बद्ध रहते हुए गुहा-निहित हैं । ३२