Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 311–320
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 311–320
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भाष्यभूमिका
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् " ॥ ५ ॥
( कठोप ० १ २ १,२,६,८,६ ) ४- " एष हि द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घाता, रसयिता, मन्ता, योद्धा, कर्त्ता, विज्ञानात्मा पुरुषः । स परेऽक्षरे - आत्मनि सम्प्रतिष्ठते । परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते - स यो ह नै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य! स सर्गज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः -विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेश " । ( प्रश्नोप ० ४।१०, ११, )
५ - " मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।
ज्ञान परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥
( मुण्डक ० २ | २ | ७३ ) यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् * पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ " ( मुण्डक ० ३।१।३ । ) ६ – ‘ “ एष सर्वेश्वरः, एष सर्गज्ञः, एषोऽन्तर्यामी, एष योनिः— सर्वस्य, प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ” ( माण्डूक्यो ० ६। ) ७- " स एषोऽन्तहृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके य एष स्तन इवावलम्बते - सेन्द्रयोनि ः-यत्रासौ केशान्तो विवर्त्तते - व्यपोद्य शीर्षकपाले । xxx । विज्ञान-पतिः । एतत्ततो भवति । श्राकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्मप्राणारामं मन आनन्दम् । शान्ति - समृद्ध - ममृतम् " ( तै ० उ ० १।६।१,२, ) ८ - " स एतमेव सीमानं विदार्य्यं एतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्यतिर्नाम -द्वा:, तदेतन्नान्दनं तस्य त्रय - आवसथाः, त्रयः स्वप्नाः । स * ' बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृत - दुष्कृते " ( गीता ० ) । २६६
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जातो भूतान्यभिव्यैख्यत्- किमिहान्यं वावदिपदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततमपश्यत् - इदमदर्शमिति । तस्मादिदन्द्रो नाम । इदन्द्रो ह वै ' नाम तमिदन्द्र ं सन्तं - ' इन्द्र ' ( विज्ञानात्मा - बुद्धिः ) इत्या-चक्षते परोक्षेण । परोक्ष प्रिया इव हि देवा: " ( ऐ ० उ ० ३।१२।१३, १४, ) । ६- " अथ य आत्मा - स सेतुः । विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय । नैतं सेतुमहोरात्रे तरतः, न जरा, न मृत्युः, न शोकः, न सुकृतं, न दुष्कृतम् । सर्वे पाप्मानोऽतो विवर्तन्ते, अपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः " ( छा ० उ ० ८।४।१ ' ) । १०- " स वा एष महान आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषो ऽन्तहृदय आकाशस्तस्मिञ्छेने सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्व-स्याधिपतिः । स न साधुना कर्म्मणा भूयान्, नो एवासाधुना कनीयान् । एष सर्वेश्वरः, एष भूताधिपतिः, एष भूतपालः, एष सेतुः, विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय । तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विवदिषन्ति यज्ञेन, दानेन " तपसाऽनाशकनेन । एतमेव विदित्वा मुनिर्भगति " ( वृ ० आ ० उ ० ४।४।२२ । ) -इत्युपनिषदां बुद्धियोगशिक्षा ( वैराग्यबुद्धियोगशिक्षा - चतुर्थी ) ६ - उपनिषदों की व्यावहारिक शिक्षा--४-“ उपनिषत् एकमात्र अखण्ड - ब्रह्म को लक्ष्य बनाते हुए, जगन्मिथ्यावाद का समर्थन करते हुए सर्वकम्मत्यन्तविमोकलक्षण ज्ञानयोग की शिक्षा दे रहे हैं ” – व्याख्याताओं की कल्पना मे सम्बन्ध रचने वाली उपनिषदों की यह शिक्षा जहाँ व्यावहारिक जगत् से सर्वथा वहिष्कृत्त है, वहाँ प्रत्नदृष्टि से सम्बन्ध स्वने बाली शिक्षाएँ परमार्थसाधन के साथ साथ व्यावहारिकता का भी समर्थन कर रही हैं । प्रकृत परिच्छेद नें दो शब्दों में हमें उसी व्यवहारिक ज्ञानशिक्षा का दिग्दर्शन कराना है । " अर्धसाहित्य ( वैदिक साहित्य ) का हमारे दैनिक व्यावहारिक जीवन में क्या उपयोग "? इस प्रश्न का महत्त्व उस समय और भी अधिक बढ़ जाता है, जबकि - क्षणिक विज्ञान को अपने मूल में रखने वाली वर्त्तमान शिक्षा के संसर्ग में श्राए हुए भारतीय व्याख्याताओं के व्यामोहन - अनुग्रह से अपने साहित्य ग्रे २६७
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भाष्यभूमिका एकमात्र परलोक का साधन मानते हुए इसे सर्वथा उपेक्षणीय मान बैठते हैं । उनकी इस भ्रान्ति के निराकरण के लिए यह आवश्यक है कि, उपनिषदों के आधार पर उनके सम्मुख कुछ एक ऐसे सिद्धान्त रक्खे जायें, जिनके आधार पर उन्हें यह मान लेने के लिए विवश हो जाना पड़े कि, साहित्य का महत्त्वपूर्ण यह श्रृङ्ग ( उपनिषच्छास्त्र ) केवल जरा - जीर्ण - शीर्ण वृद्धावस्था में पारायण की ही वस्तु नहीं है, अपितु अपने कर्म्म-प्रधान गार्हस्थ्य जीवन में भी इस शास्त्र से पर्याप्त लाभ उठाया जा सकता है । ' किं कर्म्म, किमकर्मेति कवयोऽध्यत्र मोहिता: ' इस गीता सिद्धान्त के अनुमार बड़े बड़े विचार-शीलों के सम्मुख भी कर्म्ममार्ग के सम्बन्ध में कभी कभी ऐसी अड़चनें उपस्थित हो जातीं हैं, जिनसे थोड़ी देर के लिए वे व्यामोह में पड़ जाते हैं, कर्त्तव्याकर्त्तव्यविवेक जाता रहता है, किं कर्त्तव्यं, किं न कर्त्तव्यं की जटिल समस्या उनकी गति का अवरोध कर डालती है । विशेषतः कर्म्ममार्ग की यह कठिनाई उनके लिए तो और भी जटिल समस्या धारण कर लेती है, जो परमार्थ की उपेक्षा कर केवल वैय्यक्तिक स्वार्थ के ही अनुगामी बने हुए हैं । विशुद्ध स्वार्थपथ का अनुगमन करने वाले व्यक्ति उपस्थित होने वालों कठिनाइयों से सदा क्लान्त बने रहते हैं । बाह्यदृष्टि से यद्यपि उनका जीवन मुखपूर्ण प्रतीत होता है, परन्तु स्वयं उनके अन्तरात्मा से यदि शपथ - पुरस्सर पूछा जाता है, तो उन्हें यही उत्तर देना पड़ता है कि, हमारा अन्तर्जगत् सर्वथा अशान्त है । स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ एक प्राकृतिक आक्रमण भी ऐसे है, जिनको सहने में असमर्थ निर्बल मानवहृदय कम्पित हो जाता है । अपने पारिवारिक जीवन में गार्हस्थ्य जीवन में, सामाजिक जीवन में जिन्हें हम व्यावहारिक जीवन के अन्तर्गत मान सकते हैं- आध्यात्मिक - श्राधिभौतिक - श्राधिदैविक श्राकमणों का होना दुर्निवार है । इन तीनों आक्रमणों में से पहिले आध्यात्मिक आक्रमण की ही मीमांसा कीजिए । हमारी अध्यात्मसंस्था कारण - सूक्ष्म स्थूल भेद से त्रिसंस्थ है । प्रज्ञामात्राप्रधान कारण संस्था ' आत्मा ' है, प्राणमात्राप्रधान सूक्ष्मसंस्था ' मन ' है, एवं भूतमात्राप्रधान स्थूलसंस्था ' शरीर ' है । ' आत्मा सत्वं- शरीरच त्रयमेतत् त्रिदण्डवत् ' न्याय से वात - पित्त - कफ - वत् तीनों त्रिदण्डवत् श्रन्योऽन्याश्रित हैं । हमारी स्थूल दृष्टि स्वीकार करे, अथवा न करे, परन्तु यह सिद्ध विषय है कि, तीनों में से किसी एक के कुपित हो जाने पर शेष दोनों संस्थाएँ श्रवश्यमेव क्लान्त हो जातीं हैं । हमारा शरीर पूर्ण स्वस्थ है, मन को शान्त करने वाला भी कोई कारण नहीं हैं । मनोयुक्त इन्द्रियों के, तथा शरीर के सभी सुख - साधन प्रस्तुत हैं । परन्तु फिर भी शान्ति नहीं । क्यों?, आत्मस्थिरता का अभाव । आत्मा पर आक्रमण करने वाले अविद्यादोष के संसर्ग से आत्मानन्द अभिभूत हो रहा है । परिणाम में आत्मा से नित्य सम्बद्ध मन, शरीर दोनों अशान्त बन रहे हैं । इसी प्रकार मन की अशान्ति में श्रात्मसंस्था भी अशान्त है, शरीर भी कुपित है । एवमेव रोगादि के विशेष आक्रमण पर शरीर के साथ साथ मन, तथा श्रात्मा, दोनों कुपित है । तात्पर्य्य तीनों की स्वस्थता में ही ' अध्यात्मसंस्था ' की स्वस्थता है । वात - पित्त - कफ नामक प्राणात्मक ( प्रताव इन्द्रियातीत ) तीनों धातुओं की विषमता से सम्बन्ध रखने वाले प्रज्ञापराधजनित रोग ( व्याधियाँ ) भूतमात्राप्रधान स्थूलशरीर पर आक्रमण करते हैं, जिनके २६८
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तृतीयखण्ड मूलमें प्रज्ञासहयोगी राग - द्वेष प्रतिष्ठित हैं । काम - क्रोध - मद- मात्सर्य्यादि ६ धातु अति - हीन- मिथ्या-अयोगात्मक योगदशाओं में कुपित बनते हुए प्राण मात्राप्रधान सूक्ष्मशरीर ( मन ) पर आक्रमण करते हैं, जिनकी मूलप्रतिष्ठा भी राग - द्वेष ही मानें गए हैं । अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश, नाम की चार अविद्याएँ बुद्धिद्वारा प्रज्ञामात्राप्रधान कारणशरीर ( आत्मा ) पर आकमण करती हैं । विद्याचतुष्टयी से अात्मसंस्था, कामादि षडरिपुवर्ग से मनःसंस्था, वातादि धातुवैषम्य से शरीरसंस्था कुपित बनी रहती है । तीनों के मूल में राग - द्वेष प्रतिष्ठित हैं । राग - द्वेष मानसवृत्तिस्थानीय बनते हुए आध्यात्मिक दोष हैं । अतएव इस त्रिविध आक्रमण को ‘ आध्यात्मिक आक्रमण ' ही कहा जायगा । निश्चयेन इस आक्रमण की मूल-प्रतिष्ठा राग - द्वेषयुक्त प्रज्ञापराध ही माना जायगा । अज्ञान ही प्रज्ञापराध का प्रवर्तक है । अज्ञानता ही इस आक्रमण की मूलोपनिषत् है । ये आक्रमण जीवात्मा की स्वार्जित सम्पत्ति है । दूसरा विभाग आधिभौतिक आक्रमण का है । हमारी अध्यात्मसंस्था सर्वथा निरापद है | परन्तु राग-द्वे श्रमय जगत् के गर्भ में रहते हुए हम अन्य व्यक्तियों के संसर्ग से भी अपने आपको नहीं बचा सकते । कोई ईर्ष्यावश हमारी सम्पत्ति पर आक्रमण करता है, कोई वाक्प्रहार करता है, कोई शस्त्रादि से श्राघात करता है । निष्कारण ही ईर्ष्याल मनुष्य हमें परोक्ष - प्रत्यक्ष में उत्पीड़ित किया करते हैं । मनुष्यों के अतिरिक्त हिंस्रक जन्तुओं के आक्रमण का भी भय बना रहता है । नगर में स्वच्छता न रहने से दंश - मशकादि की वृद्धि होती है, रोग फैल जाता है । ये सब आधिभौतिक आक्रमण हैं । तीसरा विभाग आधिदैविक आक्रमण का है । समय पर वृष्टि नहीं हुई, अतिवृष्टि हुई, अनावृष्टि रही, भूकम्प हुआ, ज्वालामुखी फट पड़ा, विद्युत्पात हो गया, तूफान से धन - जन की अपार हानि हो गई, ये सत्र आधिदैविक आक्रमण हैं । प्रकृति में वैषम्य आजाने से ही इन आक्रमणों का जन्म होता है, अतएव इन्हें हम प्राकृतिक श्राक्रमण कहा करते हैं । आधिभौतिक तथा आधिदैविक आक्रमणों में हमारा प्रज्ञापराध निमित्त नहीं है । अपितु आधिभौतिक आक्रमण का निमित्त लोकसत्तातन्त्र है, एवं आधिद विक आक्रमण का निमित्त प्रकृति का क्षोभ है, जिस प्राकृतिक क्षोभ का निमित्त परम्परया प्रकृतिविरुद्ध आचरण करने वाले मनुष्यों का धम्र्मानुगमन ही माना गया है । त्रिविध आध्यात्मिक आक्रमणों से, तथा प्राकृतिक आधिदैविक आक्रमणों से बचाने वाला देश का ब्राह्मणवर्ग है । एवं आधिभौतिक आक्रमण की रक्षा शासक क्षत्रवीर्य्य पर अवलम्बित है, जैसा कि गीता-विज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत - कर्मयोगपरीक्षा के ' वर्णव्यवस्थाविज्ञानः नामक प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । समर्थ क्षत्रियराजा का राजदण्ड ही प्राततायियों के आधिभौतिक आक्रमण से समाज की रक्षा करेगा । एवं वेद - रहस्यवित् - कम् - भक्ति - ज्ञान - बुद्धियोगपरायण ब्राह्मण ही त्रिविध आध्यात्मिक आक्रमण से, तथा प्राकृतिक आधिदैविक आक्रमण से राष्ट्र की रक्षा करेगा ।
* रागादिरोगान् सततानुषक्तान शेषकायप्रसृतानशेषान् ।
औत्सुक्यगोहारतिदान् जघान यो पूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ॥
२६६ - अष्टाङ्गहृदय |
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मा भूमिका अाध्यात्मिक स्थूलशरीर ( शरीर ) की चिकित्सा चरकसुश्रुतादि भेदभिन्न आयुर्वेदशास्त्र करेगा, सूक्ष्मशरीर ( * सत्र - मन ) की चिकित्सा मनुस्मृति - याज्ञवल्क्यस्मृति - गृह्यसूत्रादि भेदभिन्न धर्मशास्त्र करेगा, एवं कारणशरीर ( आत्मा ) की चिकित्सा वेदान्त - सांख्य - वैशेषिकादि भेदभिन्न दर्शनशास्त्र करेगा । श्राधि-दैविक आक्रमण का निराकरणा यज्ञकम्म प्रतिपादक ब्राहारणभाग से होगा । प्राकृतिक नित्य यज्ञों की विषमता ही आधिदैविक कोप का मुख्य कारणा है । इसके लिए नित्य यज्ञों के आधार पर वितत पुरुषप्रयत्नसाध्य वैधयज्ञों का ही आश्रय लेना पड़ेगा, जिनका निरूपक वेदभाग ' विधि ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसे कि सामान्य दृष्टि से ब्राह्मण भी कहा जाता है । जो तत्त्व अधिदेवत में हैं, वे ही तत्त्व अध्यात्म में हैं । हमारे प्रज्ञापराध से आध्यात्मिक तत्त्व, जिन्हें वैदिक परिभाषा में ' प्राण ' - ' देवता ' आदि नामों से व्यवहृत किया गया है, निर्बल बन जाते हैं । तत्त्वों की निर्बलता से हमारी आध्यात्मिक संस्था उक्त त्रिविध आक्रमणों को सहने में असमर्थ बनती हुई क्लान्त हो जाती है । इस क्लान्ति - निवृत्ति का एक यह भी उपाय है कि, हम अपने आध्यात्मिक तत्त्वों का श्राधिदैविक तत्त्वों के साथ अन्तर्य्यामि सम्बन्ध कराते हुए उनकी घन - शक्ति के स्रोत को अपनी अल्पशक्तियों में प्रवाहित कर इन्हें सबल बनादें । यही तत्त्वोपासना वैज्ञानिक भक्तियोग है, जिसका प्रधानरूप से वेद के आरण्यक भाग में विश्लेषण हुआ है । श्रायुर्वेदसिद्ध शरीर चिकित्सा, धर्मशास्त्रसिद्ध मानसचिकित्सा, दर्शनशास्त्रसिद्ध आत्मचिकित्सा, ब्राह्मणभागसिद्ध यज्ञात्मकर्मयोग, आरण्यक भागसिद्ध तत्त्वात्मक भक्तियोग, इन सब शान्ति उपायों का जब तक हमें मौलिक रहस्य ज्ञात नहीं हो जाता, तत्र तक इन उपायों पर पूर्ण श्रद्धान नहीं होता । एवं कार्य्यकारण-रहस्यज्ञानाभाव में सुरक्षित श्रश्रद्धान पूर्ण सफलता का कारण नहीं बनता । इसी मौलिक रहस्य का उपनिषद् भाग में विश्लेषण हुआ है, जैसाकि इसके नाम निर्वचन से ही स्पष्ट है - ( देखिए उ ० भू ० १ खं ० उप-निषच्छब्दार्थनिर्वचनप्रकरण ) । आत्मचिकित्सालक्षण ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, तीनों के समर्थक वचन पूर्वपरिच्छेदों में उद्धत किए जा चुके हैं । अत्र केवल शरीरचिकित्सा, मानसचिकित्सा, ये दो क्षेत्र बच जाते हैं । इनकी उपनिषदें ( मोलिक रहस्य ) भी उपनिषदों में यत्र तत्र स्पष्टरूप से उपलब्ध हो रहीं हैं । पहिले कुछ एक निदर्शन - शरीरोपनिषत् के ही लीजिए-१ - " ब्रह्मविदाप्नोति परमं पदम् । तदेषाभ्युक्ता — सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ' इति ।
* रजस्तमोभ्यां तु मनः परीतं सच्चसंज्ञकम् ।
शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणां च कारणम् ॥
३०० चरकसं ॰ सू ० २४ | ११ | )
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तृतीयखण्ड तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ओषधीभ्योऽन्नं, अन्नाद्र ेतः, । स वा एष पुरुषोऽन्न रसमयः " ( चिकित्सापुरुषः-रेतसः पुरुषः चिकित्स्यः * ) — ( तै ० उ ० २।१ । ) । २- “ × इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्त ' भोक्ते त्याहुर्म्मनीषिणः ॥ ” ( कठोप ० १ । ३ ॥ ) । ३ – “ ÷ पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति यद्रतः । तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं विभर्त्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति, तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति, यथा स्वमङ्ग तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यै तमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति, तं स्त्री गर्भ विभत्ति, सोऽएव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधि-भात्रयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति - एषां लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकाः । तदस्य * – “ यतोऽभिहितं पञ्चमहाभृतशरीरिसमवायः पुरुष इति स एष - कर्म्म पुरुष-चिकित्साधिकृतः " ( सु ० शा ० अ ० १ ) । " पृथिव्यापस्तेजोवायु र काशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च पधातवः समुदिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते " ( चरक ० शा ० ५ अ ० ३। ) । X- ‘ “ आत्मेन्द्रियमनोऽर्थानां योऽयं ' पुरुष ' संज्ञकः । राशिरस्यामयानां च प्रागुत्पत्ति विनिश्चये ॥ " ( चरक ० सू ० २५।४ । ) । --- ‘ “ पुरुषस्यानुपहतरेतसः स्त्रियाश्चाप्रदुष्टयोनिशोणितगर्भाशयाया यदा भवति संसर्गः - ऋतुकाले, यदा चानयोस्तथैव युक्तं च संसर्गे शुक्रशोणितसंसर्ग मन्तर्गर्भाशयगतं जीवोऽतिक्रामति सत्वसंप्रयोगात्, तदा गर्भाऽभिनिर्गते स सात्म्य रसोपयोगाद रोगोऽभिसंबद्ध ते सम्यगुपचारैश्चोपचर्य्यमाणः । ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णसर्वशरीरो बलवर्णसचसंहनन-सम्पदुपेतः सुखेन जायते समुदायादेषां भावानाम् " ( चरक ० शा ० ३ ३। ) । ३०१
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भाष्यभूमिका द्वितीयं जन्म । × × × । स इतः प्रयन्नेत्र पुनर्जायते, तदस्य तृतीयं जन्म " ( ऐ ० उ ० ४।१,२,३,४, ) । ४ – “ अथातो रेतसः सृष्टिः । प्रजापते रेतो वर्षं, वर्षस्य रेत श्रोषधयः, पर्धानां रेतो अन्नं, अन्नस्य रेतो रेतः, रेतसो रेतः प्रजाः प्रजानां रेतो हृदयं, हृदयस्य रेतो मनः, मनसो रेतः कर्म्म । तदिदं कर्म कृतमयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः । स इरामयः । यद्धि - इरामयः, तस्माद्धिरण्मयः " ( to 32 ( 131 ) 1
५ – “ पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्त्तमानं पडाश्रयं षड्गुणयोगयुक्तम् ।
तं सप्तधातु त्रिमलं द्वियोनिं चतुर्विधाहारमयं शरीरम् ॥
भवति पञ्चात्मकमिति कस्मात्? - पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशमिति । तत्र यत् कठिनं ( मूर्ति ) - सा पृथिवी, यद्द्रवं - ता आपः, यदुष्णं - तत्तेजः, यत् सञ्चरति ( प्राणः ) – स वायुः, यत् सुषिरं - तदाकाशमित्युच्यते । तत्र पृथिवी धारणे, आपः पिएङकरणे, तेजः प्रकाशने, वायुयु हने, आकाशमवकाशप्रदाने । XXXXXXXx | ' ' ६ – “ परस्परं सौम्यगुणत्वात् षड्विधो रसः । रसाच्छोणितं, शोणितान्मांमं, मांसात् मेदः, मेदसः स्नायवः, स्नायुभ्योऽस्थीनि, अस्थिभ्यो मज्जा, मज्जातः शुक्रम् । शुक्रशोणितसंयोगादावचने गर्भो हृदि व्यवस्थां नयति । हृदयेऽन्तराग्निः, अग्निस्थाने पित्तं, पिनस्थाने वायुः, वायुतो हृदयं प्राजा-पत्यात् क्रमात् ” । ७– “ ऋतुकाले सम्प्रयोमादेकसत्रोषितं कललं भवति, सप्तरात्रोषितं बुद्बुदं भवति, अर्द्धमासाभ्यन्तरं पिण्डो भवति, मासाभ्यन्तरे कठिनो भवति, मासद्वयेन शिरः सम्पद्यते, मामत्रयेण पादप्रदेशो भवति । अथ चतुर्थे मासे गुल्फ-जठर- कटिप्रदेशा भवन्ति । पञ्चमे मासे पृष्ठवंशो भवति । षष्ठे मासे मुख– नासिका - क्षि - श्रोत्राणि भवन्ति । सप्तमे मासे जीवेन संयुक्तो भवति । ऋष्टमे मासे सर्नलक्षणसम्पूर्णो भवति ” । * “ तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्त्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापः, वायुः प्राणः, त्रियच्छुषिराणि " ( चरक ० शा ० ५ । ४ । ) । २०३
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तृतीयखण्ड ८- - " पितू X रेतोऽतिरेकात् पुरुषः, मातृरेतोऽतिरेकात् स्त्री, उभयोर्बीजतुल्य-त्वान्नपुंसको भवति । व्याकुलितमनसोऽन्धाः, खञ्जाः, कुब्जा, वामना भवन्ति । अन्योऽन्य वायुपरिपीडित – शुक्र द्वै विध्यात्तनु स्यात्ततो युग्माः प्रजायन्ते । " ६– “ पञ्चात्मकः समर्थः पञ्चात्मिका चेतसा बुद्धिर्गन्धरसादिज्ञानाक्षराक्षर-मोङ्कारं चिन्तयतीति तदेतदेकाक्षरं ज्ञात्वा - अष्टौ प्रकृतयः षोडशविकाराः शरीरे तस्यैव देहिनः " । १०— “ अथ मात्राशितपीतनाड़ीसूत्रगतेन प्राण श्राप्यायते । अथ नवमे मासि सर्व-लक्षणज्ञानकरणसम्पूर्णो भवति, पूर्वजातिं स्मरति, शुभाशुभं च कर्म विन्दति " । ११ – “ शरीरमिति कस्मात्? - नयो ह्यत्र श्रियन्ते- ज्ञानाग्निः, दर्शनाग्निः, कोष्ठाग्नि: -इति । तत्र कोष्ठानिर्नाम - अशितपीतलेाचोष्यं पचति । दर्शनानी रूपाणां दर्शनं करोति । ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति । त्रीणि स्थानानि भवन्ति -- मुखे - आवहवनीयः, उदरे गार्हपत्यः, हृदि दक्षिणाग्निः । आत्मा यजमानः, मनो ब्रह्मा, लोभादयः पशवः, धृतिदीक्षा, सन्तोषश्च बुद्धीन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि, हवींषि कर्मेन्द्रियाणि, शिरः कपालं, केशा दर्भाः, मुखमन्त-र्वेदिः । चतुष्कपालं शिरः, षोडश पाश्व दन्तपटलानि, सप्तोत्तरं मर्म्मशतं, साशीतिकं सन्धिशतं, सनवकं स्नायुशतं, सप्त शिराशतानि पञ्च मज्जा -शतानि, अस्थीनि च ह नै त्रीणि शतानि षष्टीः " सार्द्धं चतस्र ' रोमाणि कोट्यः, हृदयं पलान्यष्टौ, द्वादशपला जिह्वा, पित्त - प्रस्थं, ककस्याढकं, शुक्र-कुडव ं, मेदः प्रस्थौ द्वावनियतं - मूत्रपुरीषमाहारपरिमाणात् " । - गर्भोपनिषत् । निदर्शनमात्र है । उपनिषदों ने सृष्टिविज्ञान का निरूपण करते हुए आध्यात्मिक विज्ञान को अपना मुख्य लक्ष्य बना कर स्थूलशरीर के मौलिक रहस्य का भलीभांति स्पष्टीकरण किया है । एवमेव सूक्ष्मशरीर से सम्बन्ध रखने वाली धर्मशास्त्रानुगता - मानस - चिकित्सा का भी विस्तार से रहस्यविश्लेषण हुआ है । किन X “ रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण तेन द्विविधीकृतेन ॥ बीजेन कन्यां च सुतं च सूते यथास्ववीजान्यतराधिकेन " ( चरक ० शा ० २।१२ । ) । “ आधिक्ये रेतसः पुंसः कन्यास्यादार्त्तवाधिके । नपुंसकं तयोः साम्ये यथेच्छा पारमेश्वरी " || ( भावप्रकाश ) ३०३
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भाष्यभूमिका किन नियमोपनियमों के अनुगमन से हमारा अन्तःकरण पवित्र बना रहता है?, इस धार्मिक प्रश्न की भी पर्य्याप्त मीमांसा हुई है | आनृशंसधर्म्म ( सभ्यता - लोक व्यवहार - मनुष्यता ), नीतिधर्म्म, सत्य - अहिंसादि सामान्य धर्मं, इन सत्र अवान्तर धर्म्माङ्गों की भी शिक्षा हमें उपनिषदों से मिल रही है, जिस नैतिक शिक्षा को हम अपने व्यावहारिक जीवन से पृथक नही कर सकते । पहिले नीतिधर्म के उदाहरण पर ही दृष्टि डालिए । ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्चित् जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ ( ई ० उ ० १ ) । उक्त मन्त्र का विज्ञान, धर्म्म, नीति, तीनों काण्डों से सम्बन्ध है । मनः प्राण - वाक् का त्रिवृद्भाव ही इम त्रिकाण्डता का मूल है । इसी त्रिष्टद्भाव के आधार पर मन्त्र का तीनों काण्डों के साथ समन्वय हो रहा है, जैसा कि ' ईशविज्ञानभाष्य ' में विस्तार से निरूपित है । प्रकृत में हमें नीतिमूलक अर्थ को लक्ष्य बना कर ही मन्त्र का समन्वय करना है । यह केवल आदर्शवाद ही नहीं, अपितु यथार्थवाद है कि, केवल इस एक नैतिक शिक्षा के अनुगमन से मानवसमाज त्रिविध तापों से प्रतिमुक्त होता हुआ पूर्ण सुम्बी बन सकता है । प्रत्येक मनुष्य का यह कर्त्तव्य होना चाहिये कि, वह उस भोग्यतम्पत्ति पर अपनी नियत न डिगावे, जिस भोग्यसम्पत्ति पर किसी अन्य व्यक्ति का अधिकार है । दूसरों के न्यायसिद्ध भोग्य पदार्थों की लिसा ही व्यक्तियों में, समाज में, ग्राम में, राष्ट्र में, विश्व में संघर्ष का कारण बनती है । अपने नियताधिकार से बर्हिभूत, साथ ही परः सत्वा-नुगत भोग्यवस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य सत्य - अहिंसा - अस्तेय - आदि मानवगुणों को ( नैतिकधर्म को थोड़ी देर के लिए भूल जाता है, एवं बदले में असत्य - हिंसा - स्तेयादि दुर्गुणों का अनुगामी बन जाता है । इन दुर्गुण से इसको अध्यात्मसंस्था भी मलिन हो जाती है, आधिभौतिक आक्रमण से भी यह इस दशा में अपने आपको नहीं ' बचा सकता, साथ ही परम्परया ऐसा लुब्धक आधिदैविक आक्रमण का भी निमित्त बन जाता है । इसप्रकार केवल ' तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा ' नीति की उपेक्षा कर देने से मानवजीवन घोर अशान्ति का अतिथि बन जाता है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अधिकार मर्य्यादा को सुरक्षित रखता हुआ परस्पर अधिकारसिद्ध आदान - प्रदान करने लगता है, तो निश्चयेन उस देश का मानत्रसमाज पूर्ण समृद्ध है । " अन्याय से बलात्कार से हम किसी की भोग्य सम्पत्ति पर दृष्टि न डालें, अपितु अपने पुरुषार्थ से न्यायपथानुगमन के द्वारा प्रवर्ग्य सम्पत्ति का ही उपभोग करें ” यही इस नैतिक शिक्षा का निष्कर्ष है, जिसका मन्त्र से स्पष्टीकरण हो रहा है । हम ही क्या, स्वल्प - ज्ञानमात्रा प्राणिमात्र सुखी रहना चाहते हैं । परन्तु खेद है कि, हम से कहीं रखने वाले प्राणी अपने क्षेत्र के अनुसार जहाँ सुखी हैं, वहाँ हम ज्ञानमात्रा की पर्य्याप्तता सुरक्षित रखते हुए भी दुःखी हैं । क्यों?, अकर्म्मण्यता, श्रालस्य, पौरुषहीनता । विश्वास करना चाहिए कि, कर्म्मशून्य - श्रकर्म्मण्य-आलसी व्यक्ति न स्वयं सुखी हो सकता, न अपने आश्रित परिवार को सुखी रख सकता । यही नहीं, अपितु कर्म्मशून्य ऐसे मन्दभागी पदे पदे आपत्तियों के जाल में फँसे रहते हैं । जो कर्मठ हैं, पुरुषार्थी हैं, सम्पत्ति उनके सामने करबद्ध खड़ी है । पुरुषार्थशून्य पुरुषाधम ही दूसरों की सम्पत्ति के इच्छुक बने रहते हैं । जो ३०४
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तृतीयखण्ड स्वयं पुरुषार्थी हैं, वे कभी ' मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ' नीति से पराङमुख नहीं होते । हमें यावज्जीवन क करना चाहिए, पुरुषार्थ का अनुगमन करना चाहिये । कम्र्म्मोपासना ही सुखी जीवन का गुप्त रहस्य है । क मनुष्य न कभी दुःखी रहता, न दुःखों से कम्पित होता, न आपत्तिजाल से कभी घबराता । " हमें यावज्जीवन अधिकार सिद्ध - योग्यता सिद्ध - कर्म का अनुगमन करते रहना चाहिए । इस कर्मानुगमन से कभी हमारी स्थिति नहीं बिगड़ सकती । साथ ही न कभी हम परमुखापेक्षी बन सकते " । यही उपनिषदों की दूसरी नैतिक शिक्षा है, जिसका निम्नलिखित मन्त्र से स्पष्टीकरण हुआ है । कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेोऽस्ति न कर्म्म लिप्यते नरे ॥ ” कुछ एक ऐसे शिक्षावचन उद्धृत कर दिए जाते हैं, जिनके आधार पर विज्ञ पाठक भलीभाँति यह निश्चय कर सकेंगे कि, उपनिषच्छास्त्र केवल ग्रात्ममूलक - परलोकशास्त्र ही नहीं है, अपितु इसके द्वारा हम अपने ऐहलौकिक जीवन में, अपने वैय्यक्तिक - कौटुम्बिक - सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन में भी अन्यतम उत्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं— १ - माता के भक्त बनो! ( मातृदेवो भव ) । २ - पिता के भक्त बनो! ( पितृदेवो भव ) । ३ - गुरु के भक्त बनो! ( श्राचार्यदेवो भव ) । ४ – सद्गुणों का ग्रहण करो! ( यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि ) । ५ - श्रत्रगुणों की उपेक्षा करो! ( नो इतराणि ) । ६ – महान् पुरुषों का आदर करो! ( श्रासनेन प्रश्वसितव्यम् ) । ७— अतिथियों का सत्कार करो! ( अतिथिदेवो भव ) । ८ - वृद्धों के अनुशासन में चला! ( तथा तेषु वर्त्तेथाः ) । १ – सदा सत्यभाषण करो! ( सत्यं वद ) । १० – धर्म का आचरण करो! ( धर्म्म चर ) । ११ – किसी को कष्ट न दो! ( मा हिंस्यान सर्वा भूतानि । १२ – अधिदैवत कर्म्म को कभी विस्मृत न करो! ( देवकार्यान्न प्रमदितव्यम् ) । १३ – किसी की सम्पत्ति पर नियत न डिगाओ! ( मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ) १४ - कर्म करते हुए ही जीवित रहने की इच्छा करो! ( कुर्वन्नेह कर्माणि ) । १५ – अपने आपको सब शक्तियों से युक्त समझो! ( पूर्णस्य पूर्णमादाय ) । १६ - हानि - लाभ को समतुलित समझो! ( सम्भूतिं च विनाशं च ) । १७ - पढ़ने का व्यसन रक्खो! ( स्वाध्यायात् मा प्रमदः ) । १८ – वंशवृद्धि की ओर ध्यान रक्खो! ( प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः ) । १३ – सावधानी से काम करो! ( कुशलान्न प्रमदितव्यम् ) । ३०५