Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 321–330

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 321–330

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भाष्यभूमिका २० – सम्पत्ति का दुरुपयोग न करो! ( भूत्यै न प्रमदितव्यम् ) । २१ – हितत्रचन कहना न छोड़ो! ( प्रवचनान्न प्रमदितव्यम् ) । २२ - सर्वत्र समबुद्धि बनाए रक्खो! ( यस्मिन् सर्वाणि भूतानि ० ) । २३ - परिणाम को लक्ष्य में रक्खो! ( क्रतो स्मर, कृतं स्मर ) । २४— शक्त्यनुसार कर्म्म करो! ( अग्ने नय सुपथा राये ० ) । २५ - ज्ञान - कर्म्म - वित्त का प्रतिमान न करो! ( य: यामतं तस्य मतम् ० ) । २६ – हितकर कर्म में प्रवृत्ति रक्खो! ( श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो ० ) २७ – हितकर - रुचिकर कर्म में प्रवृत्ति रक्खो! ( श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेय मो ० ) । २८ – केवल रुचिकर कर्म्म को छोड़ दो! ( प्रेयो मन्दः ० ) । २६ – कुतर्क कभी न करो! ( नेपा तर्केण मतिरापनेया ० ) । ३० – सचाई की खोज करते रहो! ( सत्यधृतिर्बतासि ) । ३१ – अन्धश्रद्धालु न बनो! ( अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ) । ३२ - विषयलोलुप न बनो! ( न त्त्वा कामा बहवो लोलुपन्त ) । ३३ – श्रात्मा को अजर अमर समझो! ( अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः ० ) । ३४ — सोच - समझ कर काम करो! ( यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा ० ) । ३५ - धीरता ही शान्ति की प्रतिष्ठा है! ( धीरास्तेपां शान्तिः शाश्वती ) । ३६ -- ईश्वरीय दण्ड से डरते रहो! ( महद्भयं वज्रमुद्यतम् ) । ३७-- कभी मुख से ' नास्ति ' न बोलो! ( श्रसन्नेव स भवति, सद्ब्रह्मेति वेद वेन् ) । ३८-- सदा अस्तित्व की उपासना करो! ( अस्तीत्ये षोपलब्धन्यः ) ३६ – शिष्यभाव से जिज्ञासा करो! ( समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादम् ० ) । ४० – दिन में रति न करो! ( प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति, ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ) । ४१ – कुटिलता - बल का परित्याग करो! ( न येषु जिह्ममनृतं न माया ) । ४२ – पाण्डित्य का घमण्ड न करो! ( स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः ) । ४३ - उदारमना बने रहो! ( महामना स्यात्, तदुव्रतम् ) । ४४ - धूप की निन्दा न करो! ( तपन्तं न निन्देत् तद्व्रतम् ) । ४५ – वर्षा की निन्दा न करो! ( वर्धन्तं 33 ४६ – ऋतुओं की निन्दा न करो! ( ऋतून ४७ - स्थान की निन्दा न करो! ( लोकान् ४८ - पशुओं की निन्दा न करो ( पशून् ४८ - ब्राह्मणों की निन्दा न करो! ( ब्राह्मणान् ५० - अन्न की निन्दा न करो! ( अन्नं न निन्द्यात् 99 " " - )! 93 ) 1. + - ) । 22-) ।.. ५१ – किसी भी अवस्था में भय न करो! ( न बिभेति कुतश्चन ) । ३०६

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१० - उपनिषदों का शिक्षण कौशल — तृतीयखण्ड श्रेयः - प्रयोभावात्मक उपनिषदों का शिक्षण कौशल वास्तव में एक अभूतपूर्व इत्तिवृत्त है । उपनिषदों में जिन तात्त्विक विषयों का विश्लेषण हुआ है, वे सब श्रेयोभाव को मूलाधार बनाते हुए ' सत्यं ' है । जटिल से जटिल तत्त्वों का निरूपण प्रयोभाव को लक्ष्य बना कर हुआ है, अतएव श्रौपनिषद - विषय ' सुन्दरं ' है । सत्यं, सुन्दरं, ने औपनिषद विषयों को ' शिव ' बना रखा है । कटुसत्य परिणाम में ' शिवं ' बनता हुआ भी श्रवणकाल में सुन्दरं है, अतएव ' शिव ' है । और ' न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ' के अनुसार ऐसा अप्रिय सत्य श्रोता के स्वाभाविक आकर्षण पर आधात करने वाला है, तत् - तत्त्वप्रवृत्ति में रति उत्पन्न करने वाला है । वर्तमान युग की शिक्षाप्रणाली, विशेषतः संस्कृतसाहित्यशिक्षाप्रणाली शिक्षा नुयायियों के लिए कटुसत्य ही सिद्ध हो रही है | करण यही है कि, वर्त्तमान प्रणाली ने प्रेयोभाव का परित्याग करते हुए विशुद्ध श्रेयोभाव-मूलक कटुसत्य को प्रधान बना रक्खा है । यही कारण है कि आज सर्वसाधारण की दृष्टि में यह वैभव एक महाविभीषिका बन रहा है " संस्कृत महा कठिन है, इसमें रटाई बहुत होती है, कोई ग्राकर्षण नहीं है ” ऐसे ऐसे उद्गार जब सुनने में आते हैं, तो कहना पड़ता है कि, भारतीय विद्वत्समाज शिक्षण - कौशल से दूर हट चुका है । जत्र संस्कृत साहित्य में शिक्षण - कौशल का समावेश कर दिया जाता है, तो उस स्थिति में चिना किसी सन्देह के यह कहा जा सकता है कि, “ संस्कृतसाहित्य की तुलना में ' सत्यं शिवं सुन्दरम् ' कहलाने योग्य पृथिवी का अन्य कोई साहित्य नहीं है " | परन्तु विचार उपनिषदों की शिक्षा का प्रक्रान्त है । भाषा, भाव, निरूपणीया शैली, आदि सभी दृष्टियों से उपनिषदों की शिक्षा एक पूर्व कौशल रखती है । गहन से गहन तत्त्वों का व्यावहारिक लौकिक दृष्टान्तों के द्वारा बड़ी ही प्राञ्जल, तथा बोधगम्यभाषा में जैसा स्पष्टीकरण उपनिषदों में हुआ है, उसे देखते हुए कहना पड़ता है कि, ऋषियों नें उपनिषदों की शिक्षा के सम्बन्ध में ' सत्यं शिवं सुन्दरम् ' को अथ से इति पर्य्यन्त चरितार्थ किया है । उदाहरण के लिए कुछ एक उद्धरण यहाँ उद्धृत कर दिए जाते हैं । इनके आधार पर स्थालीपुलाकन्याय से पाठक भलीभाँति इस शिक्षण - कौशल का महत्व अवगत कर सकेंगे । ( १ ) - " अन्न से मन बनता है, पानी से प्रारण बनता है, तेज से वाकू का निर्माण होता है ” यह उपनिषत् का सिद्धान्तसूत्र है, मौलिक शिक्षा है । इस शिक्षा का किस कौशल से उपनिषत् ने स्पष्टीकरण किया है, यह द्रष्टव्य है | श्व ेतकेतु शिष्य हैं, स्वयं श्वेतकेतु के पिता महर्षि अरुण उपदेष्टा हैं । श्वेतकेतु के सामने जब उक्त सिद्धान्तसूत्र ग्राता है, तो सहसा उनकी बुद्धि स्तब्ध सी हो जाती है । वे विचारने लगते हैं कि, अन्न, श्रापः, तेज से मन - प्राण - वाक् का निर्माण कैसे हुआ? | अरुण महर्षि पुत्र की इस मनोदशा को लक्ष्य में रखते हुए अपनी श्रोर से एक दृष्टान्त उपस्थित करते हुए कहने लगते हैं — हे प्रिय! दही त्रिलोना देखा होगा | और देखा होगा कि, मन्थनप्रक्रिया से दही के ऊपर सुसूक्ष्म घृतचिन्दुएँ निकल आतीं हैं । ठीक यही स्थिति मनः - प्राण - बाक की समझो । जब तुम शारीराग्नि में अन्न, पानी, तेज की आहुति देते हो, तो शरीर में मन्थनप्रक्रिया आरम्भ हो जाती है । इस मन्थन से तीनों के सुसूक्ष्म भाग ऊपर आ जाते हैं । ये ही सुसूक्ष्म भाग क्रमशः मनः - प्राणः - वाक् हैं । और सम्भव है, इस ' दधि - सर्पि ' दृष्टान्त से तुम समझ गए होंगे कि -३०७

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भाष्यभूमिका " अन्नमयं हि सोम्य! मन श्रापोमयः प्राणस्तेजोमयी बाक् " । धि का मारभाग सर्पि है, एवमेव अन्न, अप, तेज, का सारभाग क्रमशः मनः प्राणः - वाकू है, दृष्टान्त का यही तात्पर्य्य है । कैसा सुलभ, साथ ही तात्विक दृष्टान्त है । दृष्टान्त की अनुरूपता भी कम महत्त्व नहीं रखती । एक ही दधि - सर्पिदृष्टान्त में तीनों की अनुरूपता विद्यमान है । दधि दुग्ध का रूपान्तर है । दुग्ध में सोममात्रा अधिक रहती है । उधर नान्द्र सोमरस ही अनरूप में परिणत होता हुआ रमास मांसादि क्रममे अपने विशुद्धरूप मे मन का स्वरूप निर्मापक बनता है । दुग्ध मन का निर्मापक नहीं बनता, श्रपितु ' दधि ' मन का निर्मापक बनता है । जमे हुए दुग्ध का ही नाम दधि है । तरलरम दुग्ध घनरस दधि है । ' दधि हैवास्य लोकस्य रूपम ' ( शत ०७ / ५ | १ | ३ | ) के अनुसार पार्थिव अन्नरस दधिरूप है । खेत से आया हुआ अन्न दधि ( घन ) भावापन्न है । इस दधिस्थानीय अन्न की आहुति होती है । मन्थनप्रक्रिया आरम्भ होती है । घनता टूट जाती है । दविमें रहने वाला आन्तिरिक्ष्य धृतरस निकल पड़ता है । वही मन का स्वरूपनिर्म्मारक बनता है । दधिमन्थनप्रक्रिया में पानी का भी समावेश रहता है । अपसम्बन्ध से ही इस में फेन ( भाग ) निकलते हैं । एवं इस दृष्टि से यही मन्थनप्रक्रिया ' आपोमयः प्राणः ' का दृष्टान्त बन रही है । मन्थनप्रक्रिया एक प्रकार का घर्षण है । इस घर्षण से ताप उत्पन्न हो जाता है, जिसका मन्थनं प्रक्रिया में साक्षात्कार किया जासकता है । और इसी दृष्टि से यही मन्थनप्रक्रिया ' तेजोमयी वाकू ' का भी दृष्टान्त बन रही है । दधि - सर्पि – दृष्टान्त से योग्य शिष्य तत्त्व पर पहुँचता हुआ भी अभी अनुभूति से वञ्चित है, यह लक्ष्य में रखते हुए अरुण एक प्रायोगिक दृष्टान्त उपस्थित करते हैं । आदेश देते हैं कि, पन्द्रह दिवस पय्यंन्त अन स्वाना छोड़ दो, केवल पानी पीश्रो । शिष्य ने आदेश का पालन किया । १५ वें दिन गुरु ने प्रश्न किया कि, हे सोम्य! क्या तुम ऋ यजुः साम का विश्लेषण कर सकते हो? । शिष्य उत्तर देता है, भगवन्! इस समय मुझे कुछ सुझाई नहीं देता । बस गुरु का शिक्षण कौशल समाप्त हुआ । शिष्य को विदित हो गया कि, अन्न खाने से जब मेरा प्रज्ञानजगत् शिथिल हो गया है, तो अवश्यमेव ' श्रन्नमयमेव मनः ' । ( छां ० उप ०६।५,६,७, -खण्ड ) । ( २ ) - सुरेन्द्र विरोचन, तथा देवेन्द्र इन्द्र के सम्मुख श्रात्मा के सम्बन्ध में यह उपनिषत् ( सिद्धान्त -सूत्र ) उपस्थित हुई कि - " श्रात्मा श्रजर है, श्रमर है, भूख - प्यास से दूर है, पाप से विरहित है, सत्यकाम है, सत्यसंकल्प है । ऐसे इस आत्मा के परिज्ञान से सम्पूर्ण विभूतियाँ प्राप्त हो जाती हैं " । इस आत्मोपनिषत् ने दोनों का ध्यान आत्मस्वरूपविज्ञान की ओर आकर्षित किया । फलतः आत्मस्वरूप विषयिणी जिज्ञासा ले कर ममित् - पाणि बन कर दोनों प्रजापति की सेवामें पहुँचे, और अपनी जिज्ञासा प्रकट की । प्रजापति ने आदेश दिया कि, श्रात्मस्वरूपपरिज्ञान मे पहिले योग्यता प्राप्त्यर्थ तुझें ३२ वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्यव्रत का अनुगमन करना चाहिए | अनन्तर तुझें अात्मस्वरूप बतलाया जायगा । दोनों नें आदेशानुसार ब्रह्मचर्य का पालन किया, अनन्तर दोनों समित् - पाणी बन कर प्रजापति के सम्मुख पुनः उपस्थित हुए । प्रजापति ने सामने रक्खे हुए जलपात्र की ओर सङ्केत करते हुए दोनों को आदेश दिया कि, तुझें इस जलपात्र पर दृष्टि डालनी चाहिए । यदि इस प्रतिविम्वभाव से तुझे श्रात्मस्वरूप अवगत न हो, तो पुनः जिज्ञासा प्रकट करना । दोनों ने श्रादे-३०८

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तृतीयखण्ड शानुसार जलपात्र पर दृष्टि डाली । ' जलपात्र ' में क्या देखा?, पूँछने पर दोनों नें उत्तर दिया कि, इस जलपात्र में हम अपना सर्वाङ्गशरीर देख रहे हैं । प्रजापति ने पुनः श्रादेश दिया कि, अब तुम सुन्दर आभूषण, सुन्दर वस्त्र धारण कर जलपात्र पर दृष्टि डालो | दोनों नें ऐसा ही किया । ' क्या देखा ' १ प्रजापति के प्रश्न करने पर उत्तर दिया कि, अच हम ग्रलङ्कार - आभूषणों के सहित सर्वाङ्गशारीर को प्रतिविम्बित देख रहे हैं । प्रजा-पति ने आदेश दिया कि, जिसे तुम जलपात्र में प्रतिबिम्बित देख रहे हो, वही अमृत - अभय - लक्षण आत्मब्रह्म है । प्रजापति के इस समाधान से दोनों की श्रात्मविषयिणी जिज्ञासा थोड़ी देर के लिए शान्त हो जाती है । दोनों वापस लौट आते हैं । इस सम्बन्ध में यह और स्मरण रखिए कि प्रजापति ने सर्वप्रथम ' अक्षिपुरुष ' को लक्ष्य में रखते हुए यह कहा था कि, आँख में जो प्रतिविम्बित पुरुष दिखलाई पड़ता है, वही आत्मब्रह्म है । इस पर दोनों नें यह प्रश्न किया था कि, पानी, तथा दर्पण में जो प्रतिबिम्ब दिखलाई पड़ता है, वह क्या है? | प्रजापति ने उत्तर दिया था कि, यह भी वही आत्मा है । इसप्रकार प्रजापति की ओर से आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में चक्षुपटलप्रतिविम्बित पुरुष, दर्पण प्रतिबिम्बित पुरुष, जलपात्रप्रतिविम्बित पुरुष, तीन उदाहरण सामनें आए । तीनों के द्वारा प्रतिबिम्बविधा से प्रजापति ने आत्मस्वरूप का विश्लेषण किया । उक्त तीनों उदाहरणों में दर्पण, चक्षुपटल, उदशराव ( जलपात्र ), यह क्रम समझना चाहिए | दर्पण में शरीर का प्रतिविम्ब खचित होता है, परन्तु सङ्गरूप से । जिस प्रकार दर्पण में असङ्गरूप से शरीर प्रति-विम्बित होता है, एवमेव दर्पणस्थानीय महत्तत्त्व पर चित् का प्रतिविम्ब प्रतिष्ठित होता है । यही चित् प्रति-बिम्व चिदाभास है, यही चिदाभास जीवात्मा है । दर्पणस्थानीय महद्भुत ही इस चिदाभास के निर्वचन का साधन है । एवं इस दृष्टि से दर्पणदृष्टान्त सर्वथा अन्वर्थ बन रहा है । दूसरा चक्षुदृष्टान्त है । पुरोऽवस्थित पुरुष का प्रतिविम्ब हमारे नेत्रपटल पर खचित हो जाता है । जबतक चिदाभासलक्षण श्रात्मा पञ्चभौतिक शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक चक्षुपटल में अन्य पुरुष का प्रतिबिम्ब खचित होता है । शवशरीर के चतुपटल में अन्य पुरुष का प्रतिबिम्ब खचित नहीं होता । इस उदाहरण से प्रजापति को यह बतलाना था कि, जिस चित् तत्त्व में अन्य पुरुष के प्रतिविम्ब - ग्रहण की शक्ति है, वही जीवात्मा है । जब तक शरीर में वह प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक चक्षुपटल पर पुरुषप्रतिबिम्ब खचित होता है । एवं इस दृष्टि से चतुः पुरुषदृष्टान्त भी सर्वथा अन्वर्थ बन रहा है । तीसरा उदशरावपुरुष दृष्टान्त है । पानी पारमेष्ठ्य तत्त्व है । पारमेष्ठ्य तत्त्व ' भृगु ' है, एवं श्रापः - वायुः – सोम भेद से इसकी तीन अवस्था मानी गई हैं । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ' से तीनों ' आप ' हैं । चिदाभासलक्षण जीवात्मा के तीन ही गर्भक्षेत्र हैं । अतएव जीवसर्ग आप्य, वायव्य, सौम्य, भेद से तीन ही भागों में विभक्त हैं । भागत्रय में विभक्त यही भार्गव अपतत्त्व ' महान् ' है । एवं ' मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यमहम् ' के अनुसार यही महत्तत्त्व चिदाभास की योनि है । उदशराव-दृष्टान्त से प्रजापति बतलाना यही चाहते थे कि, जिस प्रकार पानी में शरीर प्रतिबिम्बित है, वैसे ही अपतत्त्व-लक्षण महत् के श्राधार पर चिदाभासलक्षण जीवात्मा प्रतिष्ठित है । णत्मा शरीरसापेक्ष है । आत्मा, पाञ्च-भौतिक शरीर, दोनों की समष्टि का आधार शुक्रावच्छिन्न महद्ब्रह्म माना गया है । इन दोनों को लक्ष्य में रख कर प्रजापति ने पहिले तो लोमभ्यः - श्रानखाग्रेभ्यः शरीर का प्रतिबिम्ब लक्ष्य बनवाया, अनन्तर वस्त्राभूषण-सुसजित शरीर को लक्ष्य बनवाया । शरीर विशुद्ध चिदात्मा का दान्तिक बना, वस्त्रादि ' वासांसि जीर्णानि ' न्याय से शरीर का दान्तिक बना । एवं इस दृष्टि से यह उदशरावदृष्टान्त भी सर्वथा अन्वर्थं बना । ३०६

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भूमिका दृष्टान्तविधि से आत्मस्वरूप का विश्लेषण कर प्रजापति ने दोनों जिज्ञासुओं को लक्ष्य में रखते हुए यह उद्गार प्रकट किए कि, सम्भवतः दोनों अभी श्रात्मस्वरूप की वस्तुस्थिति पर नहीं पहुँचे हैं । दोनों में जो श्रात्मस्वरूपोपनिषत् के तथ्य पर पहुँच जायेंगे, विजित होंगे, अन्य पराजित होंगे । इधर प्रजापति यह विचार-विमर्श कर रहे थे, उधर उन दोनों की क्या स्थिति हुई?, यह देखिए । मुरेन्द्र विरोचन दृष्टान्त को ही - सिद्धान्त पत्र मान बैठे । उन्होंनें अपनी असुर मण्डली में यह उद्घोष प्रकट कर दिया कि, ' प्रजापति ने शरीर को ही आत्मा बतलाया है । शरीर को स्वस्थ - बलिष्ठ - रखना ही सुखप्राप्ति का अन्यतम द्वार है । शरीर को नलाना नहीं चाहिए, क्योंकि यह तो श्रात्मा है । इसे साध्वलंकृत रखना चाहिए । अहोरात्र शरीर चिन्ता में ही निमग्न रहना चाहिए । शरीर से अतिरिक्त आत्मा नहीं है, यह आज प्रजापति ने उदशराव - दृष्टान्त से स्पष्ट प्रमाणित कर दिया है " । तभी से असुर - सम्प्रदाय के लिए निम्न लिखित सिद्धान्त प्रचलित हो पड़ा-" असुराणां ह्येषोपनिषत् । प्रतस्य शरीरं भिक्षया, वसनेन, अलङ्कारेणेति-संस्कुर्वन्ति । एतेन ह्यमु ं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते - इति * । मन्दबुद्धि विरोचन शीघ्र हो सन्तुष्ट हो गए । परन्तु इन्द्र सन्तुष्ट न हुए । उन्होंने अपनी देवमण्डली में आकर ये मनोभाव प्रकट किए कि, प्रजापति ने जिस प्रतिबिम्ब को अमृताभयलक्षण श्रात्मा बतलाया, वह आत्मा ( शरीरप्रतिबिम्ब तो सर्वथा भयाक्रान्त है । जैसा शरीर, वैसा प्रतिबिम्ब । हस्त पाद - चक्षु श्रादि -दीन शरीर का प्रतिबिम्ब भी अङ्गहीन ही रहता है । तात्पर्य्य, नाशवान् शरीर का प्रतिबिम्ब भी सर्वथा नाशवान् है । फिर इसे अविनाशी, अनुच्छित्तिधर्म्मा आत्मा कैसे मान लिया जाय? | व्याकुलमना इन्द्र समित्पाणि बन कर पुनः प्रजापति की सेवा में उपस्थित हुए, एवं अपना क्षोभ प्रकट किया । प्रजापति ने कहा- मघवन्! ऐसा ही है, तुम्हारा क्षोभ यथार्थ है । ३२ वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य का अनुगमन और करो । अनन्तर वस्तुतत्त्व की ब्याख्या की जायगी । ३२ वर्षान्तर प्रजापति कहने लगे, इन्द्र! जाग्रदवस्था के अनन्तर अपना प्रभाव प्रतिष्ठित रखने वाली स्वप्नावस्था से सम्भवतः तुम परिचित हो । इस अवस्था में जो तत्त्वविशेष विविध प्रकार के स्वप्न देखा करता है, वह स्वप्नद्रष्टा ही अमृत - अभयलक्षण आत्मब्रह्म है । इस स्वप्न पुरुष - दृष्टान्त से प्रजापति का अभि-प्राय यही था कि, स्वप्नावस्था में पाञ्चभौतिक शरीरपिएड की बाह्य क्रियाएँ शान्त हो जातीं हैं । दूसरे शब्दों में शरीर निश्रेष्ट हो जाता है । इस दशा में स्वप्नदर्शन हुआ करता है । न रथ है, न मार्ग है, न अश्व है । परन्तु वह द्रष्टा अपनी महिमा से स्वयं ही रथ, रथमार्ग, अश्वादि बन कर क्रीडा किया करता है । अवश्य ही यह स्वप्नद्रष्टा शरीर में रहता हुआ शरीर से भिन्न अमृत तत्त्व है । केवल द्रष्टृत्वेन विदंश ही स्वप्नद्रष्टा है । एवं इस दृष्टि से यह दृष्टान्त भी सर्वथा अन्वर्थ बन रहा है । ८ इन्द्र शान्तहृदय होकर देवमण्डली में लौट आते हैं । और कहने लगते हैं कि, प्रजापति ने स्वप्न-द्रष्टा को अमृताभयलक्षण आत्मा बतलाया है । यह ठीक है कि, शरीरविकृति का स्वप्नद्रष्टा पर कोई प्रभाव * शवशरीर को वस्त्रालङ्कारों से सुसजित करना श्रसुरधर्म है । विदित नहीं, देवधर्मानुयायिनी आस्तिक प्रजा में यह आसुरधर्म कैसे, कब से, और क्यों प्रचलित हो पड़ा? । ३१०

पृष्ठ 326

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तृतीयखण्ड नहींपड़ता, जैसा कि प्रतिविम्बित उदशराव पुरुष पर पड़ता था । परन्तु यह भी तो स्पष्ट है कि, स्वप्नद्रष्टा स्वावस्था में कभी रोने लगता है, कभी व्याकुल हो पड़ता है, कभी हँसने लगता है । श्रात्मानुगता एकसत्ता यहाँ कहाँ है । फिर कैसे स्वप्नद्रष्टा को अभय अमृत मान लिया जाय । श्रवश्य ही एतत्लक्षण आत्मा स्वप्नद्रष्टा से कोई पृथक् तत्त्व होगा, जिसका उपदेश अनधिकारी समझ कर प्रजापति ने नहीं दिया है । इन्द्र वापस लौटे, ' इन्द्र! शान्तहृदय बन कर लौट गए थे, फिर वापस क्यों आए ' प्रजापति के यह पूँछने पर इन्द्र ने बस्तु– स्थिति प्रकट की । पुनः ३२ वर्ष के ब्रह्मचर्यानुगमन का श्रादेश मिला । श्रनन्तर निरुपाधिक आत्मतत्त्व का तटस्थलक्षण से विश्लेषण करते हुए प्रजापति कहने लगे कि, इन्द्र! स्वप्नावस्था से अगली अवस्था ' सुषुप्ति ' है । इस अवस्था में अन्तर्जगत् का व्यापार भी उपरत हो जाता है । विशुद्ध आत्मा अपने आपमें डूबा रहता है । यही ' स्वमपीतो भवति ' लक्षणा ' स्वपिति ' कही जाती है । स्वप्नावस्था से भी अतीत, अतएव सर्वातीत, श्रुतएव वाङ्मनसपथातीत, अतएव ' नेति नेति ' शब्द से निर्धीत तत्त्वविशेष ही अमृत - अभय - लक्षण आत्म-ब्रह्म है । तात्पर्य्य ' प्रजापति का यही है कि, स्वप्नद्रष्टा प्रज्ञानमन चिदंश के अनुग्रह से स्वप्नदर्शन में समर्थ होता है । जब प्रज्ञानमन विज्ञान के साथ सम्पृक्त होकर हृदयावच्छिन्न पुरीतति नाड़ी में चला जाता है, तो हृदयाकाशस्थ दहराकाश में तद्रूप से प्रतिष्ठित विशुद्ध चिद्घन में प्रज्ञान का चिदंश डूब जाता है, द्वैत नष्ट हो जाता है, अद्वैतप्रसाद प्रकट हो जाता है । फलतः स्वप्नदर्शन बन्द हो जाता है । इस दशा में विशुद्ध चिदात्मा निरुपाधिक है । अतएव किसी भी शब्द से, किंवा दृष्टान्त से इसका समतुलन नहीं किया जा सकता । एवं यही वस्तुतः श्रात्मतत्त्व है, जिसके सम्बन्ध में निम्न लिखित तटस्थ उत्तर के अतिरिक्त और कोई उत्तर नहीं हो सकता — “ तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानाति, एष आत्मा " इन्द्र शान्त होकर वापस लौट आए । और देवमण्डली के समक्ष अपने ये उद्गार प्रकट किए कि, प्रजापति ने सुषुप्त्यवस्थापन्न जिस ग्रात्मतत्त्व का तटस्थ लक्षण से उपदेश दिया, उससे भी मुझे अभी सन्तोष नहीं हुआ है । स्वप्नद्रष्टा - पर्यन्त बतलाए गए आत्मस्वरूप में नाशवान् भूतभाग का प्राधान्य था । परन्तु सुषुप्ति – अवस्थायुक्त श्रात्मस्वरूप में तो नाशवान् भूतभाग के साथ साथ अविनाशी ' अहं ' भाव का भी विलोप है । सुषुसि में ' श्रहमस्मि ' का भी अभाव है । ' अहं ' ही तो आत्मोपनिषत् है । जिस अबस्था में ' अहमस्मि ' ही न रहे, वह अबस्था, उस अवस्था से युक्त तत्त्वविशेष, दोनों हीं बुद्धि से परे हैं । इसलिए मुझे कहना पड़ेगा कि, अभी आत्मस्वरूप अपने लिए विदित ही है । इन्द्र पुनः उपस्थित होते हैं । एवं समित्पारिण बन कर अपना उक्त क्षोभ प्रकट करते हैं । प्रजापति श्रादेश देते हैं कि, ५ वर्ष और धैर्य रखो | इसप्रकार ३२ - ३२-३२-५ -के संकलन से आत्मजिज्ञासानुवर्त्ती इन्द्र की आयु के १०१ वर्ष व्यतीत हो जाते हैं । निरन्तर १०१ वर्ष पर्यन्त इन्द्र ब्रह्मचर्य का अनुगमन करते रहे । तत्र जाकर कहीं प्रजापति नैं उन्हें अधिकारी माना । और सर्वान्त में आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में अपना यह सिद्धान्त प्रकट किया कि -“ इन्द्र! पाञ्चभौतिक शरीर मर्त्य है । अमृतात्मा का यह मर्त्य ' शरीर अधिष्ठान बन रहा है । अमृत मृत्युपुर में प्रतिष्ठित है । यही कारण है कि, जब तक शरीर पर ( उपाधि पर ) दृष्टि है, तब तक प्रिय अप्रिस ३११

पृष्ठ 327

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भाष्यभूमिका द्वन्द्वों से अतीत अमृतात्मप्राप्ति ( बोध ) असम्भव है । निरस्तसमस्तोपाधि- प्रपञ्चोपशम- श्रद्वय - अमृत - श्रभया-त्मतत्त्व अनुभूति से परे की वस्तु है । अनुभूति भोग है, भोग का प्रज्ञान सहकृत विज्ञान ( बुद्धि ) से सम्बन्ध है | बुद्धि स्वयं भौतिक - मर्त्य पदार्थ है । वह उसका अनुभव कर भी कैसे सकती है, जब कि'यो बुद्धः परतस्तु सः । ' ब्रहमस्मि ' यह अनुभव भी तो मर्त्यभावाक्रान्त ही है । अनुभव द्वैतसापेक्ष है । द्वैत नामरूपात्मक है । आकाशोदर ही नामरूपात्मक भव का प्रवर्तक है । जब वह नामरूपातीत है, तो उसका शब्द द्वारा उपदेश कैसे सम्भव है । परज्योतिः स्वरूप सम्प्रसाद ही उसकी एकमात्र तटस्थ परिभाषा है । यही श्रात्म स्वरूप का-जैसा समझो, विश्लेषण है " । ( कु ० प ०८० ७, ८, ६, १०, ११, १२, १३, १४ खण्ड ) पाठक देखेंगे कि, किस कौशल से स्थूल से सूक्ष्म की ओर लाते हुए आत्मस्वरूप का तटस्थ लक्षण द्वारा विश्लेषण हुआ है । आयु के १०० वर्षों तक बड़े संयम के साथ जीवनयात्रा का निर्वाह करने वाला, आत्मजिज्ञासा सुरक्षित रखने वाला धीर ही इस आत्मबोध का अन्यतम अधिकारी है । इसप्रकार एक ओर सर्वानुभूत- बोधगम्य दृष्टान्तों के द्वारा जहाँ उपनिषत् सोपाधिक आत्मस्वरूप का विश्लेषण कर रही है, वहाँ अधिकारी की मर्य्यादा का भी पूरा पूरा स्पष्टीकरण हुआ है । क्या ऐसे शिक्षणकौशल का अन्यत्र मिल सकना सम्भव है? २. ३ ) – “ नामरूपात्मक पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर भूतसत्य है । वैश्वानराग्नि, तैजस वायु, प्राज्ञ इन्द्र, की समष्टि शरीराभिमानी ' देवसत्य ' है । प्रारण, प्रज्ञान, विज्ञान, महान, अव्यक्त, इन पाँचों की समष्टि ' ब्रह्मसत्य ' है । एवं आत्मक्षर - अक्षरानुगत - चिद्घन अमय पुरुष ' श्रात्मसत्य ' है, यही ' सत्यस्य सत्यम् है " इस उपनिषत् का शिक्षण कौशल उस समय भलीभाँति स्पष्ट हो जाता ह, बब कि केनोपनिषत् में उपवर्णित कथानक की ओर हमारा ध्यान आकर्षित होता है । कथानक यों है कि, ३३ सों देवताओं में प्रधान जातवेदा नामक अग्नि, मातरिश्वा नामक वायु तथा मघवा नामक इन्द्र, तीनों को यह अभिमान हो गया कि, सम्पूर्ण त्रैलोक्य में हमारा ही प्रभुत्व है । हम से बढ़ कर अन्य शक्ति का अभाव है । इनके इस अभिमान को दूर करने के लिए एक यक्ष प्रकट हुआ । देवता इसे देख कर घबरा गए । सर्वप्रथम अग्नि गए, अग्नि के सामने यक्ष ने एक तृग्गा रख दिया, अग्नि इसे न जला सके, अग्नि वापस लौट आए । वायु गए, परन्तु ये भी इसे न उड़ा सके । सर्वान्त में इन्द्र पहुँचे । इन्द्र के पहुँचते ही तृण विलीन हो गया । देवता स्तब्ध, तथा चकित हो गए । उसी समय श्राकाश में ' हैमवती उमा ' प्रकट हुई । और उसने आकाशवाणी की कि, हे देवताओ! जिस यक्ष को देख कर तुम आश्चर्य में पड़ रहे हो, वह ब्रह्म ( चिद्घन आत्मा ) है । इसी के विजय में तुम्हारा विजय है । तप, दम, कर्म्म हो उसकी प्राप्ति के साधन हैं । साङ्गवेद, सत्य ही उस आत्मब्रह्म का श्रायतन है । जो श्रात्मब्रह्म की इस उपनिषत् को जान लेता है, वह पूर्णप्रतिष्ठित हो जाता है " । ( केनोपनिषत् ) आख्यान के द्वारा उन सुप्रसिद्ध ज्ञान - क्रिया- श्रर्थ नामक तीन शक्तियों की ओर उपनिषत् ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिनके अभिमान में पड़ कर जीवात्मा परमात्मा को भूल जाता है । पाञ्चभौतिक शरीरभुवन में श्रर्थाधिष्ठाता वैश्वानर अग्नि है, यही जातवेदा है । कियाधिष्ठाता तबस वायु है, यही मातरिश्वा ३१२

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तृतीयखण्ड है | ज्ञानाधिष्ठाता प्राज्ञ इन्द्र है, यही मघवा है । वै ० तै ० प्राज्ञ की समष्टि ही अर्थ - क्रिया - ज्ञानमूर्ति देवसत्य नामक जीवात्मा है । इसे यह अभिमान हो जाता है कि, जो कुछ प्राप्तव्य ( अर्थ ), कर्त्तव्य ( क्रिया ) तथा ज्ञातव्य ( ज्ञान ) है, यह सब कुछ मुझ में स्वतः सिद्ध है । फिर मुझ से अतिरिक्त ईश्वर है, इस झंझट में क्यों फँसा जाय । श्रुति कहती है- भूलते हो । एक ' ज्ञानीयतृणा ' तुम्हारे सामने रक्खा जाता है । तुम्हारा अग्निभाग प्रयत्न - सहस्रों से भी इसे नहीं जला सकता । तुम्हारा वायुभाग इसे उड़ा नहीं सकता । तुम्हारा इन्द्रभाग उसी प्रकार इसमें डूब जाता है, जैसे समुद्र में लौटे का पानी । स्मरण रक्खो, तुम्हारा यह वैभव वस्तुतः न तो तुम्हारा है, न तुम्हारे आलम्बनभूत प्रज्ञानादि की समष्टिलक्षण ब्रह्मसत्य का है । “ यदस्य च त्त्वं - ब्रह्मसत्यं - यदस्य च देवेषु, अथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् " के अनुसार भूतसत्यात्मक शरीरभुवन में प्रतिष्ठित देवसत्य, तथा ब्रह्मसत्य दोनों मीमांस्य हैं । वस्तुतत्त्व दोनों में व्याप्त रहने वाला सर्वव्यापक स्वतन्त्र तत्र है । एवं उसके दर्शन का एकमात्र उपाय शक्त्युपासना है । ' मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ' के अनुसार शक्त्युपासना | उस चिह्ननानुग्रह का अन्यतम द्वार है । उस परमात्मशक्ति के कणदान से ही तुम्हारा स्वरूप प्रतिष्ठित है । परमात्मशक्तियाँ हीं जीवात्मशक्तियों की प्रतिष्ठा है । ' तमुपास्वेत्युपनिषत् ' । ( ४ ) – ' पानी से पुरुषशरीर उत्पन्न होता है ' यह उपनिषत् है, जिसका छान्दोग्य की ‘ पञ्चाग्नि-विद्या ' में स्पष्टीकरण हुआ है । जलीयसृष्टि का यह शिक्षण कौशल भी द्रष्टव्य है । घटना यों घटित हुई । अरुणपुत्र, अतएव ' ग्रारुणि ' नाम से प्रसिद्ध श्वेतकेतु एकबार कुरुपञ्चालों की समिति में पधारे । वहाँ सुप्रसिद्ध सृष्टिविज्ञानवेत्ता प्रवाहण जैबिली भी विद्यमान थे । मापने श्वेतकेतु से प्रश्न किया कि, कुमार! तुमने किस से शिक्षा प्राप्त की? । पिता गौतम ने मेरा अनुशासन किया है, श्वेतकेतु ने उत्तर दिया । राजर्षि प्रवाहा ने कुमार श्वेतकेतु से एक साथ पाँच प्रश्न किए, एवं पाँचों के सम्बन्ध में श्वेतकेतु ने ' नाहं भगवो ' वेद ' यही उत्तर दिया । यदि तुम इन प्रश्नों का उत्तर नहीं जानते, तो तुमने क्या शिक्षा प्राप्त की?, राजर्षि की इस भर्त्सना से क्लान्तमना होने वाले श्वेतकेतु पिता के पास लौटे, और कहा कि, उस राजन्यत्रन्धु ने मुझ से जो प्रश्न किए, उनका उत्तर ग्रापने क्यों नहीं बतलाया? । गौतम ने उत्तर दिया, मैं स्वयं इनका उत्तर नहीं जानता । यदि जानता, तो अवश्य बतलाता । पुत्र को आश्वासन प्रदान कर गौतम प्रवाहण के समीप पहुँचते हैं, और जिज्ञासा प्रकट करते हैं कि, आपने कुमार से जो प्रश्न किए हैं, उनका उत्तर बतलाइए? गौतम ने सर्वप्रथम ' वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' इस पाँचवें प्रश्न का विश्लेषण करना आरम्भ किया । ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम आसीत् ' के अनुसार रोदसीत्रैलोक्य के आदित्याग्निप्रधान द्यू II लोक से ऊपर प्रतिष्ठित परमेष्ठी नामक तीसरे द्युलोक में श्रद्धात्मक सोम प्रतिष्ठित रहता है । द्युलोका -वच्छिन्न दिव्य सावित्राग्नि योनि है, तृतीय द्युलोकावच्छिन्न श्राद्धात्मक पारमेष्ठ्य सोम रेत है, जो कि ' ग्रम्भः ' नामक तत्त्व है । इस दाम्पत्यभाव से, दूसरे शब्दों में श्रद्धारेत, एवं दिव्याग्निलक्षण योनि के समन्वय से भास्वरसोम नामक दाह्य तत्त्व उत्पन्न होता है । यही इस प्रथमाहुति का फल है । एवं यह तत्त्व की द्वितीयावस्था है । ३१३

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भाष्यभूमिका रोदसीत्रैलोक्य में व्याप्त पर्जन्य नामक प्राप्य अग्नि में प्राणदेवताओं के द्वारा श्रद्धाद्भुति से उत्पन्न सोम की आहुति होती है । पर्जन्याग्नि में हुत सोम वर्षा ( पानी ) रूप में परिणत होता है । वर्षा ही इस द्वितीयाहुति का फल है । एवं यही अपतत्त्व की तृतीयावस्था है । पार्थिव गायत्राग्नि योनि बनता है, इसमें वर्षा नामक रेत की आहुति होती है । इस आहुति से अन्नसम्पत्ति उत्पन्न होती है । यह अन्नसम्पत् उस श्रद्धा नामक अप्तत्त्व का चतुर्थ रूप है । यही तृतीयाहुति का फल है । लोमकेश - नखाग्र भागों को छोड़ कर सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त वैश्वानर अग्नि योनि है, अन्न रेत है । आध्यात्मिक प्राणदेवताओं के द्वारा इस रेतोभूत अन्न की योनिभूत पुरुषाग्नि ( वैश्वानराग्नि ) में आहुति होती है । भुक्तान्न में पार्थिव - श्रान्तरिक्ष्य - दिव्य - तीनों तत्त्व हैं । रस - मल के क्रमिक विकलन से मुक्तान्न क्रमशः रस, असृक्, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा - रूप में परियात होता हुआ ' शुक्र ' रूप में परिणत हो जाता है I अन्नाहुति से उत्पन्न शुक्र अपूतत्त्व की पाँचवीं अवस्था है । यही चतुर्थी आहुति का फल है । गर्भाशयगत शोणिताग्नि योनि है, पुरुषाण्डगत रेत रेत है । नाभानेदिष्ठ, एवयाममत्, वृषाकृपि, बालखिल्या, आदि प्राणदेवताओं के सहयोग से यही रेतः- आहुति गर्भपुरुषरूप में परिणत होती है । यही पाँचवीं आहुति का फल है । इसप्रकार दिव्य सावित्राग्नि, आन्तरिक्ष्य पर्जन्याग्नि, पार्थिव गायत्राग्नि, शारीर वैश्वानराग्नि, शोणिताग्नि, इन पाँच अग्नियों में क्रमश: श्रद्धालक्षण आप:, सोमलक्षण आपः, वृष्टिलक्षण आप:, अन्नलक्षण आपः, शुकलक्षण प्रापः, इन आहुतिद्रव्यों की आहुति होती है । इस परम्परा से पाँचवीं शुक्राति में यही श्रद्धा नामक अपतत्त्व पुरुषस्वरूप में परिणत हो रहा है । बड़े ही व्यवस्थित ढंग से, साथ ही प्राञ्जलभाषा में गर्भविज्ञानोपनिषत् की शिक्षा देती हुई उपनिषत् इस महत्त्वपूर्ण शिक्षा की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है कि, जिस विषय का हमें ज्ञान नहीं है, पाण्डित्य का गर्न छोड़ कर उस विषय के जानकार की सेवा में प्रणतभाव से पहुँच जाना चाहिए | ‘ वयं विद्वांसः ' की कुत्सित भावना ज्ञानविकास का महाप्रतिबन्धक देखा सुना गया है । ( ५ ) - " प्रजापति ने स्वप्रजा के भरण - पोपण के लिए सात प्रकार के अन्न उत्पन्न किए ” यह उपनिषत् है । ( बृ ० आ ० उ ० १ ५ | १ | ) | उपनिषत् का शिक्षणकौशल देखिए, किस ऋजुपद्धति से उसने इस सप्तान्न - विज्ञान का स्पष्टीकरण किया है । सात अन्नों का साधारण, देवता, आत्मा, पशु, इन अन्नादभावों के क्रम से १-२-३ - १ - इसप्रकार विभाजन हुआ है, जैसाकि निम्नलिखित श्रुति से स्पष्ट है— यत्सप्तान्नानि मेधसा तपसाऽजनयतत्पिता ॥ एकमस्य साधारणं, द्वे देवानभाजयत् ॥ १ ॥

त्रीयात्मनेऽकुरुत, पशुभ्य एकं प्रायच्छत् ॥ तस्मिन्त्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न ॥ २ ॥

कस्मात्तानि न चीयन्ते ऽद्यमानानि सर्व्वदा ॥ ३१४

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तृतीयखण्ड यो ताम क्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन ॥ स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति ॥ ३ ॥ ( वृ ० श्र ० १! ५ । ) ।

जौ, गेहूँ, उर्दू, मूँग, चना, चावल, आदि सुप्रसिद्ध अन्न प्रथमान्न विभाग है । इसी के लिए ' एक-मध्य साधारणम् ' कहा गया है । एतिलक्षण हुत अन्न, प्रेतिलक्षण प्रहुत अन्न, दोनों का द्वितीयान्न विभाग है । इसी के लिए ' द्वे देवान भाजयत् ' कहा गया है । पय तृतीयान्न विभाग है, इसी के लिए ' पशुभ्य एकं प्रायच्छत ' कहा गया है । एवं ' मनः प्राणः - वाक् ' की समष्टि चतुर्थान्न विभाग है, इसी के लिए ' त्रीण्या-त्मनोऽकुरुत ' कहा गया है । इसप्रकार सात अन्न चार भागों में विभक्त हैं । १ - प्रसिद्धमन्नम् ] - साधारणमन्नम २- हुतम् - देवान्ने ३ - प्रहुतम J ४ - पयः ] – पश्वन्नम् - " सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पिता " ५- मनः ६- प्राणः - श्रात्मान्नानि ७ – त्राक अब लौकिक भाषा में इन सातों अन्नों की मीमांसा कीजिए । आत्मा मनः प्राण - वाङ्मय माना गया है । क्रियाघन ज्ञानघन मन, प्राण, अर्थघना वाकू, तीनों की समष्टि ही ' तदिदं सर्वम् ' है । सुसूक्ष्म मन की कामना से, तथा सूक्ष्म प्राण के व्यापार से स्थूल वाक्तत्त्व का विकास हुआ है, जो कि वाक्तत्त्व तै ० के शब्दों में ' आकाश ' भूत नाम से प्रसिद्ध है । बलग्रन्थितारतम्य से यही वागाकाश आगे जाकर क्रमशः वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन चार भूतों में परिणत हो जाता है । इसप्रकार मनःप्राणप्रधान आत्मा श्राकाशादि पाँच भूतों का जनक बनता हुआ सप्तकल बन रहा है । सप्तकलोपेत आत्मब्रह्म का अंशभूत जीवात्मा भी इन्हीं सातों कलाओं से युक्त है, जो सप्तकला समष्टि चार भागों में विभक्त मानी जा सकती है । पृथिवी प्रधान स्थूलशरीर की एक स्वतन्त्र कला है । जल, तेज, दोनों की समष्टि एक कला है । वायु एक स्वतन्त्र कला है । ग्राकाशात्मिका वाकू, प्राण, मन, इन तीनों की एक स्वतन्त्र कला है । चार भागों में विभक्त इन्हीं सात कलाओं के अन्न का विचार प्रस्तुत है । भौतिक शरीर नामक प्रथम विभाग भूतसृष्टिमात्र में सामान्य है, आहार - निद्रा - भय - मैथुन, चारों धर्म्म ' भी इस दृष्टि से सामान्य हैं । अतएव इस सामान्य श्रात्माङ्ग के अन्न को श्रुति ने ' सा'वारण ' नाम से व्यवहृत किया है । स्थूलशरीरगत जलीय तत्त्व सौम्य प्राण देवताओं से युक्त है, तेजस्तत्त्व श्राग्नेय प्राणदेवताओं से युक्त है । सौम्य देवता, आग्नेय देवताओं की समष्टि ' देवविभाग ' नामक एक स्वतन्त्र विभाग है । पार्थिव ३१५