Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 331–340
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 331–340
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भूमिका साधारण अन्न जहाँ पार्थिव शरीर का अन्न है, वहाँ जज्ञ, तथा तेज ( प्रकाश ) दोनों क्रमशः सौम्य - ग्राग्नेय देवताओं के अन्न हैं । शारीर - रसों को मस्तक से पाद पर्यन्त, पाद से मस्तक पर्य्यन्न प्रवाहित करने वाला शारीर वायुतत्व है 1 यह वायुतत्त्व आन्तरीक्ष्य है । उधर सृष्टिविज्ञान के अनुसार पशुप्राण वायव्य बनता हुआ अान्तरीक्ष्य है, जैसा कि- ' अन्तरिक्ष भाजना वै पशवः ' इत्यादि निगम से प्रमाणित है । पशुभाग वायुप्रधान है, अतएव पशुप्राण-प्रधान अश्वादि पशुओं के अपत्य उत्पत्ति से कुछ समय पीछे ही उछलने कूदने लगते हैं । ' इषे त्वोर्जे त्वा स्थ देव वः प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे ' इत्यादि मन्त्रश्रुति भी पशु की इसी वायुरूपता का समर्थन कर रही है | इस पशव्य बायु का भोग हमारे ( मनुष्य ) शरीर में भी हो रहा है । श्लेष्मादि चिक्कण भाग साक्षात् पशु है । ' घृतमन्तरिक्षस्य ' के अनुसार अन्नगत वृत रस ग्रान्तरि है, जो पयोरस का रूपान्तर है । इसप्रकार अन्नगत घृतरस भी शारीर पशु का अन्न बन रहा है । एवं साक्षात् रूप से श्वास - प्रश्वास द्वारा भी वायुतत्त्व शारीर पशुभाग का अन्न बन रहा है । आकाश भूमा है, यही सुख, किवा आनन्द है, जैसा कि - " को ह्येवान्यान् कः प्राण्यान, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् " इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । निरावरणप्रान्त, खुली हवा, निःसीमभूमा, आदि ही तो आनन्द के प्रत्यक्ष निदर्शन हैं । इसप्रकार भूमात्मक आकाश श्राकाशत्वेन भी आत्मा का अन्न बन रहा है, एवं अपने शब्दगुण से भी यह आत्मा का अन्न बन रहा है । दूसरा प्राणात्मक क्रियान्न है, तीसरा मनोमय ज्ञानान्न है | ज्ञान - किया - आकाश, तीनों क्रमश: आत्मा के मन: - प्राण- वाक भागों के अन्न बन रहे हैं । और इसप्रकार सातों अन्नों का आध्यात्मिक सातों अन्नादकलाओं के साथ उपभोग हो रहा है । 3 सहज भाषा की दृष्टि से सातों का समन्वय कीजिए । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, किया, ज्ञान, ये सात अन्न है । सातों में पांच तो प्रजापति के कोश से बिना परिश्रम के ही मिलते रहते हैं । श्वासप्रश्वासात्मक वायु, सूर्य्य - चन्द्र - ग्रग्नि - वाक् - श्रात्म - भेदभिन्न तेज ( ज्योति ), श्राकाशभूमा, एवं तदनुगत शब्द, क्रिया, शोन, ये पाँच अन्न तो स्वतः प्राप्त हैं । शेष पृथिवी, जल के लिए हमें श्रम करना पड़ता है । पानी प्रयासपूर्वक मुख में डाला जाता है । पृथिवी ( मिट्टी ) को रूपान्तर ( जो - गेहूं आदि ) में परिणत कर प्रयासपूर्वक भोग्य बनाया जाता है | यही सप्तान्न विज्ञान की संक्षिप्त परिभाषा है, जो गहनतम बनती हुई भी शिक्षण - कौशल से सरलतम बन रही है! १ – मनः – ज्ञानम् २ - प्राणः - क्रिया ३ –त्राकू · ' आकाशः ४ - पशुः - वायु: ५- आग्नेयदेवाः – तेजः ६ – सौम्यदेवाः – जलम् ( सहजज्ञान विकासः ) ( सहजक्रिया सञ्चारः ) ( भूमा, शब्दश्च ) श्वासप्रश्वासाँ ) ] - पश्वन्नम् ( पञ्चविधं ज्योति ) ( पेयं जलम् ) : - श्रात्मान्नम् - देवान्नम ३१६
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तृतीयखण्ड ७ – शरीरम् — पृथिवी ( गोधूमादीनि सा ० अन्नानि ) 7-साधारणान्नम पूर्वप्रदर्शित कुछ एक निदर्शनों से हमें यह मान लेना पड़ता है कि, उपनिषदों का शिक्षणक्रम, दूसरे शब्दों में विषयनिरूपणीया शैली प्रियसत्यभावानुगता बनती हुई ' सत्यं शिवं सुन्दरम् ' को अक्षरशः चरितार्थ कर रही है । यही उपनिषच्छास्त्र का शिक्षण कौशल है । इस सम्बन्ध में हमें यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि, यह शिक्षणकौशल अध्यापन कौशल पर अवलम्बित है, एवं अध्यापन कौशल परिभाषाज्ञान पर अबलम्बित है | निसन्देह परिभाषाज्ञान की विलप्ति से श्राज हमारा अध्यापनकौशल बिगड़ गया है । फलस्वरूप सत्यं - शिव-सुन्दरं उपनिषच्छास्त्र जिज्ञासु वर्ग के लिए एक जटिल समस्या बन गया है । विलुप्त वैदिक परिभाषाओं का पुनरुद्धार ही शिक्षणकौशल का जीर्णोद्धार कर सकता है, यह कहना पिष्टपेषण ही माना जायगा । प्रकरणोपसंहार— उपनिषत् हमें क्या सिखाती है? प्रश्न के सम्बन्ध में यद्यपि अभी बहुत कुछ वक्तव्य है । परन्तु विस्तारभय से यहीं विश्राम किया जाता है । ज्ञान - कर्म्म भक्ति - विज्ञान - श्रादि जटिल विषयों की रहस्य शिक्षा के साथ साथ व्यावहारिक जीवन से सम्बद्ध नैतिक शिक्षाओं को हमारे सम्मुख रखता हुआ उपनिषच्छास्त्र अपनी उपयोगिता का सभी दृष्टिकोणों से समर्थन कर रहा है । औपनिषद - शिक्षासूत्र के नियन्त्रण में रहता हुआ मनुष्य अधिकार — योग्यतानुसार अपने लक्ष्य पर पहुँच सकता है, जिस लक्ष्य की मूल प्रतिष्ठा- ' बुद्धियोग-शिक्षा ' है । यही उपनिषदों की प्रधान शिक्षा है । उपनिषत् हमें क्या नहीं सिखाती?, यही प्रकरणोपसंहार-वाक्य है । ' उपनिषत् - शिक्षास्वरूपदिग्दर्शन ' - नामक तृतीय स्तम्भ उपरत -३-३१७
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' उपनिषत् - शिक्षास्वरूपदिगदर्शन'- नामक तृतीयस्तम्भ - उपरत
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत-' आपनिषद - ज्ञानाधिकारिस्वरूप दिग्दर्शन ' चतुर्थ - स्तम्भ ४ नामक
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श्रीः औपनिषद - ज्ञानाधिकारिस्वरूपादिग्दर्शन चतुर्थ - स्तम्भ १ - त्रह्मविद्या, और तत्प्रतिपादक शास्त्र — श्रव्यय - अक्षर - गर्भिता आत्मक्षरविद्या ही ब्रह्मविद्या है । परिभाषानुसार उपाधिरहित ' ब्रह्म ' शब्द एकमात्र आत्मक्षर का ही वाचक माना गया है । श्रात्मतर का मूल अक्षर है, सर्वमूल अव्यय है, यही का है, यही परा गति है । अव्यय - अक्षर के बिना आत्मक्षर अनुपपन्न है । अतएव आत्मक्षर से सम्बन्ध रखने वाली ब्रह्मविद्या का - ' अव्ययाक्षरगर्भितत्त्वे सति - आत्मक्षर विद्यात्त्वं ब्रह्मविद्यात्त्वम् ' यही लक्षण न्याय-सङ्गत माना जायगा | नानाभावोपेता खण्ड - खण्डात्मिका ददरपुण्डीरविद्या, उद्गीथविद्या, सामविद्या, प्रणव-विद्या, परिमरविद्या, पर्य्यङ्कविद्या, अभिप्लवविद्या, पृष्ठविद्या, हिङ्कारविद्या, श्यैत - नौधसविद्या, ज्योतिर्विद्या, आदि यच्चयावत् इतर विद्याओं का इसी ब्रह्मविद्या में अन्तर्भाव है । ब्रह्मविद्या के परिज्ञान से सब कुछ विज्ञात बन जाता है | इसी अभिप्राय से - ' एकेन विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' यह कहा जाता है । ब्रह्मविद्या का तत्त्वतः परिज्ञान प्राप्त करने वाले ब्रह्मवित् विद्वान् के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है । इसी ब्रह्मविद्या के आधार पर भारतीय महर्षिगण ' सर्वज्ञ ' कहलाए, इसीके बल पर उन्होंनें अपने लिए ' विदितवेदितत्र्या अधिगतयाथातथ्याः ' शब्दों का प्रयोग किया, जिन शब्दों को निम्न लिखित श्रुति से समर्थन प्राप्त है--' तदाहुः - ब्रह्मविद्यया ह सर्व ं भविष्यन्तो मन्यन्ते मनुष्याः ' ( शत ० १४ । ४ । २।२० । ) ब्रह्मचर्य्य, तपः, सत्य, श्रद्धा, उपनिषत्, विद्या, यदि ब्रह्मविद्याप्राप्तिसाधनों के अनुष्ठान से ऋषियों र्ने सर्वज्ञानमूलभूता इस ब्रह्मविद्या का साक्षात्कार किया, एवं लोकाभ्युदय - निःश्रेयस के लिए अपनी दैवी वाणी में उसका संकलन किया । ऋषिसंकलिता शब्दात्मिका वही ब्रह्मविद्या आजदिन ' वेदशास्त्र ' नाम से प्रसिद्ध है । ' सर्व वेदात प्रसिद्धयति ' ( मनु: १२ ६७ | ) कहते हुए भगवान् मनु ने भी उक्त श्रुति का यथावत् अनुगमन किया है । महर्षियों के चिरकालिक तपोयोग से अवतीर्ण वेदशास्त्र एक प्राकृतिक शास्त्र है, अन्तर्य्यामी की सत्यनियति से नियन्त्रित मर्यादाशास्त्र है । इसे लौकिक शब्दशास्त्रों की भाँति सामान्य शास्त्र नहीं माना जा सकता । अतएव सर्वसाधारण इसके अधिकारी नहीं बन सकते । प्रकृत्या ( जन्मना ) जिनमें ग्रधिकार - समर्पण - लक्षण योग्यता बीजरूप से प्रतिष्ठित है, वे ही ( भारतीय द्विजातिवर्ग ही ) इस शास्त्र के नन्य अधिकारी माने गए हैं । केवल जन्मना द्विजाति होने से भी तब तक वेदशास्त्राधिकार प्राप्त नहीं होता, जब तक कि, स्वाध्याय-सम्बन्धी निर्द्दिष्ट नियमों को नहीं अपना लिया नाता । यही अधिकारसमर्पण की दूसरी नियति है । उपनिषदों की सामान्य शिक्षा, जिसे पूर्व प्रकरण के अन्तिम परिच्छेद में हमनें व्यावहारिकी शिक्षा के नाम से व्यवहृत किया है, जहाँ सर्वसाधारण के लिए विहित है, वहाँ कर्म - ज्ञान - भक्ति - योगादि लक्षणा रहस्य शिक्षा विशेष अधि-३२१
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कारियों के लिए ही नियत है । अनधिकारी पुरुष चाहे यावज्जीवन वेदशास्त्र की पुस्तक का भारबइन करता रहे, परन्तु वह इसके तत्त्व का सदा अनधिकारी ही बना रहेगा । प्रकृत प्रकरण में संक्षेप से उसी अधिकार-मय्या का स्पष्टीकरण अपेक्षित है । पूर्वप्रतिपादिता ब्रह्मविद्या सर्वविद्या है, तत्प्रतिपादक वेदशास्त्र सर्वशास्त्र है । वेदशास्त्र की इस सर्वता के परिज्ञान के लिए प्रथम ब्रह्मविद्या की सर्वता का दिग्दर्शन करा देना आवश्यक होगा । विद्यात्मक ब्रह्मतत्त्व को त्रिमूर्ति बतलाया गया है । त्रिमूर्ति इस ब्रह्म के तत्त्वभेद से ' ज्ञानाधिकरण, क्रियाधिकरण, अर्थाधि-कर ' ये तीन अधिकरण हो जाते हैं । ज्ञानाधिकरण ' अमृत संस्था ' है, कियाधिकरण ' ब्रह्मसंस्था ' है, एवं अर्थाधिकरण ‘ शुक्रसंस्था ' है । अमृतसंस्था ' मनोमयी ' है, ब्रह्मसंस्था ' प्राणमयी ' है, शुक संस्था ' वाङ्मयी ' है । तीनों की समष्टि ही ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' इस बृहदारण्यकश्रुति के अनुसार सृष्टिसाक्षी आत्मा, किंवा ब्रह्म है । मनः - प्राण - वाकू – कलाओं के स्वाभाविक त्रिवृद्भाव के कारण तीनों संस्थाओं में ( प्रत्येक में ) तीन तीन अवान्तर कलाओं का उपभोग हो रहा है । ज्ञानाधिकरणलक्षणा मनः - संस्था ' आनन्द - विज्ञान- मनो ' मयी है । क्रियाधिकरणलक्षणा प्राणसंस्था ' मनः - प्राण - वाङ् ' मयी है । एवं अर्थाधिकरणलक्षणा वाक्संस्था ' वाक्-आपः - श्रग्नि ' मयी है । इन्हीं तीन संस्थाओं के भेद से ब्रह्मविद्या ' अमृतविद्या, ब्रह्मविद्या, शुक्रविद्या ' इन तीन भागों में विभक्त हो रही है । तीनों को ' मनोविद्या, प्राणविद्या, वाविद्या ' इन नामों से भी व्यवहृत किया जा सकता है | मनोविद्या ' आत्मविद्या ' है, प्राण विद्या ' देवविद्या ' है, वाग्विद्या ' भूतविद्या ' है । तीनों एक ही के तीन विवर्त हैं, एवं वही तीनों हैं । निम्न लिखित उपनिषच्छ्र ुति इसी त्रिसंस्था तत् - विद्या
का विश्लेषण कर रही है-ऊर्ध्वमूलोऽवक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं, तद् ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते ॥
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ॥ एत द्वै तत् || ( कठोप ० ६। ' । ) । अर्थाधिकरणात्मिका शुकसंस्था के वाक् आपः अग्नि, इन तीन पर्वों में उस समस्त भौतिक विज्ञान का अन्तर्भाव है, जिसके कुछ एक अंश - प्रत्यंशों को हस्तगत करने वाला वर्त्तमानयुग का वैज्ञानिक जगत् भारतीय आर्षसाहित्य को एकमात्र अध्यात्मविद्यापरक मानता हुआ इसे विज्ञानशून्य बतलाने की भयङ्कर भूल कर रहा है । ' वागिन्द्रः ' ( शत ० ८७ २२६ ) के अनुसार सर्वव्यापक, आकाशात्मा इन्द्र ही वाक है । ' रूपं रूपं मधवा बोभवीतु ' ( ऋक्सं ० ३।५३ ८ ) के अनुसार यही वाङ्मय मघवेन्द्र प्रकाशात्मा है । ' विद्य द्वा अपां ज्योति: ' ( शत ० ७ | ५ | २ | ४६ ) के अनुसार आपः शुक्र ही विद्युत् है । श्रग्नि ही ताप का अधिष्ठाता है । इसप्रकार प्रकाश - विद्युत् - ताप, तीनों क्रमशः वाक् - श्रापः - श्रग्नि शुक्रों के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । लाइट ( Light ), इलेक्ट्री ( Electry ), हीट ( Heat ) वर्त्तमान विज्ञान के ये तीनों मूलाधार हमारे शुकतत्व में अन्तर्भूत हैं, जो कि शुक्र तत्त्व साहित्य का सर्वथा अवर धरातल माना गया है । इसी शुक्रत्रयी के आधार पर वेदयुगकालीन ( देवयुगकालीन ) वैज्ञानिकों नें, जो कि वैज्ञानिक ऋभू, विभ्वा, ३२२
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वाज, त्वष्टा, आदि नामों से प्रसिद्ध थे, ऐसे ऐसे अद्भुत वैज्ञानिक आविष्कार किए थे, जिनकी प्रतिकृति भी सम्भवतः आज अनुपलब्ध है । सोमपानसाधक चमस यन्त्र, जल - थल - नभ सञ्चारी हरि ( अश्व ), वरुण की नौका, सौभविमान, प्लवबिमान, धातुमयी गौ, उत्ता, सुपर्ण, पुरुष, वृषभ, सूर्य्यचक्र, सूर्य्यसदन, यदि जिन अभूतपूर्व भौतिक आविष्कारों का ॠग्वेद संहिता में यत्रतत्र वर्णन उपलब्ध होता है, उनके आधार पर वर्त्तमान युग के हम अकर्म्मण्य - वेदतत्त्वज्ञानवञ्चित भारतीय कम से कम यह कहने की धृष्टता तो कर ही सकते हैं कि, अवश्य ही वेदशास्त्र नें आध्यात्मिक क्षेत्र के साथ साथ भौतिक विज्ञानक्षेत्र का भी पर्य्या'त विश्लेषण किया है । भौतिकविज्ञानाधिष्ठात्री, शुक्रात्मिका यही वाग्विद्या विज्ञानशास्त्र का ' भूतविद्या ' नामक प्रथम पर्व है । भूतविद्या का आधार प्राणविद्या है, जिसे क्रियाधिकरणलक्षणा बतलाया गया है । प्राण ही परि-भाषानुसार ‘ देवता ' है, जिसके ' ऋषि, पितर, देव, असुर, गन्धर्व आदि अवान्तर अनेक भेद हैं | यही प्राण-विद्या ' देवविद्या ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । सर्वाधारभूता मनोविद्या ही ' आत्मविद्या ' है । बाकू की अपेक्षा प्रारण प्रबल है, प्राण की अपेक्षा मन अधिक प्रचल है । फलतः तीनों में प्रथम - मध्यम - उत्तम भेद से श्रेणि— विभाग मान लेना न्यायसङ्गत बन रहा है । वाङ्मयी, किंवा शुक्रमयी भूतविद्या ही यज्ञात्मक ' कर्म काण्ड ' है | प्राणमयी, किंवा - ब्रह्ममयी देवविद्या ही तत्त्वोपासनात्मक ' उपासनाकाण्ड ' है । मनोमयी, किंवा अमृतमयी आत्मविद्या ही अव्यक्तात्मक ' ज्ञानकाण्ड ' है । हमारी आध्यात्मिक संस्था के आत्मा, देवता, भूत, ये तीनों पर्व ग्राधि-दैविक उक्त तीनों पर्वों से उपकृत हैं । आधिभौतिक वाङ्मय पदार्थों के माध्यम से आधिभौतिक अभ्युदय के लिए कृत कर्म्म कर्म्मकाण्ड है । आधिभौतिक वाङ्मय पदार्थों के माध्यम से आधिदैविक तत्त्वसंग्रह के लिए होनें वाला प्राणव्यापार ही उपासनाकाण्ड है । एवं आधिदैविक साधनों के द्वारा आधिदैविक फल प्राप्यर्थ जो अव्यक्तकर्म किया जाता है, वही ज्ञानकाण्ड है । कर्म्म का भूतपूर्व से सम्बन्ध है, उपासना का देवता मे सम्बन्ध है, ज्ञान का आत्मा से सम्बन्ध है । ब्रह्मविद्या के स्थूल पर्वस्थानीय शुक्रात्मक भूतविद्याप का विश्ले -घण प्रधान रूप से ' ब्राह्मणभाग ' में हुआ है । सूक्ष्म पर्वस्थानीय ब्रह्मात्मक देवविद्यापर्व का विश्लेषण प्रधान-रूप से ‘ आरण्यकभाग ' में हुआ है । एवं सुसूक्ष्म पर्वस्थानीय अमृतात्मक श्रात्मविद्यापर्व का विश्लेषण प्रधानरूप से ‘ उपनिषद्भाग ' में हुआ है । इसप्रकार त्रिकाण्डात्मिका ब्रह्मविद्या त्रिकाण्डात्मक वेदशास्त्र के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित हुई है, जिसके अतिरिक्त कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता है । ब्रह्मविद्या - शास्त्रपरिलेखः— १ - आनन्दः २ - विज्ञानम् ३- मनः - मनःसंस्था - मन. ( अमृतम् ) - ज्ञानाधिकरणम् ३२३
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१- मनः २- प्राणः ३- बाक १ - वाक् भूमिका -- प्राणसंस्था - प्राण: ( ब्रह्म ) -- क्रियाधिरकरणम् २- आपः ३- अग्निः --वाक्संस्था - वाक् ( शुक्रम् ) --अर्थाधिकरणम् १ - अमृतात्मा - ज्ञानात्म । - श्रात्मविद्याल क्षरण: -- सर्वाधारः २- ब्रह्मात्मा —- कर्मात्मा - देवविद्यालक्षणः --तत्त्वाधारः ३- शुक्रात्मा --- भूतात्मा - -- - भूत विद्यालक्षणः — विश्वाधारः १- आत्मविद्या -- ज्ञानकाण्डप्रतिष्ठा – उपनिषच्छास्त्रम् २- देवविद्या- -उपासनाकाण्ड प्रतिष्ठा - आरण्यकशास्त्रम् ३- भूतविद्या --- कर्म्मकाण्ड प्रतिष्ठा-- -- ब्राह्मणशास्त्रम् २ – वर्णप्रजा, और अधिकारमर्यादा-' देवेभ्यस्तु जगत् सर्णम् ' ( मनु: ३ | २०११ ) इस मनुवचन का तात्पर्य्य है - ' देवासुराभ्यां जगत् सर्वम् ' । देव, असुर, दोनों प्राणों के समन्वय का ही नाम जगत् है । देव आग्नेय हैं, असुर श्राप्य है । अप् तत्त्व की विरलावस्था ही ' सोम ' है । फलत: ' अग्नीप्रोमात्मकं जगत् ' इस सिद्धान्त का उक्त मानवसिद्धान्त के साथ भलीभाँति समन्वय हो रहा है 1 । दैवीविभूति का देवप्राण से सम्बन्ध है, आमुरीत्रिभूति का असुरप्राण मे सम्बन्ध है । दोनों विभूतियों का समन्वय ही विश्व है । समष्टि - व्यष्टि - रूप से सर्वत्र इन्हीं दोनों विभूतियों का साम्राज्य है । सत्त्वगुरण का देवीविभूति से, तमोगुण का मुरीविभूति से सम्बन्ध है । रजोगुण दोनों का संयोजक है | इसप्रकार दैवासुरप्राण कृतमूर्त्ति विश्व के प्रत्येक पदार्थ में तीनों प्राकृतिक गुणों की गौण-प्रधान - तारतम्य से सत्ता सिद्ध हो जाती है, जैसाकि निम्न लिखित वचनों से प्रमाणित है— ३०४
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तृतीयखड १ - न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैमुक्त ' यदेभिः स्यात् त्रिभिर्गुणैः ॥ ( गी ० १८ । ४० ) । २- त्रिभिगुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं ततम् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ ( गी ० ७ । १३ । ) । सत्त्वानुगता देवप्राणप्रधाना गुणविभूति, तमोऽनुगता अमरप्राणप्रधांना दोषविभूति, दोनों की समष्टि ' तदिदं सर्वम् ' है, जैसाकि - भूमिका प्रथमखण्डान्तर्गत ' मङ्गलरहस्य ' नामक प्रकरण में - ' गुणदोषमयं सर्व स्रष्टा सृजति कौतुकी ' इत्यादि रूप से विस्तार से बतलाया जा चुका है । इस सामान्य अनुगम के अनुसार मानववर्ग का भी प्रकृत्या ( जन्मना ) श्रासुरभावमूलक तमोगुण से सम्बद्ध पा मात्र के संसर्ग से असंस्कृत रहना अनिवार्य है । स्वकर्मानुसार माता - पिता के योषावृषात्मक चीज में औपपातिकरूप से प्रति-ठित रहने वाला जीवात्मा मातृदोष, पितृदोष, कालदोष, ग्रहदोष, नाड़ीदोष, पूर्वजन्म सञ्चित कर्म्मसंस्कारदोष, रसासृङमासादि भूसदोष, आदि अनेक दोषों को ले कर ही गर्भाशय में प्रतिष्ठित रहता है । इन श्रागन्तुक, तथा प्राकृतिक दोषों के लेप से इसका मनःप्राणवाङ्मय ग्रात्मा मलिन रहता है, असंस्कृत रहता है । जिस प्रकार तैललिप्त मलीमस असंस्कृत वस्त्र पर रङ्गादि शुभ संस्कार सम्भव नहीं है, इसी भाँति इस असंस्कृत-मलीमस आत्मा पर विद्यासंस्कार का कोई प्रभाव नहीं होता । जिस प्रकार ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' श्रुतिप्रमाण से हमारा श्रात्मा सूर्य्यमूलक है, एवमेव ' सैषा त्रयी विद्या तपति ' ( शत ० १०/५/२/२ ) श्रुति-प्रमाण से वेदशास्त्र भी सूर्य्यमूलक ही माना गया है । यही सूर्यवेद विज्ञानशास्त्र में ' गायत्रीमात्रिक ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन भूमिका द्वितीयखण्ड में किया जा चुका है । वर्णसृष्टि, लोक-सृष्टि, आश्रमविभाग, भूत - भविष्यत् - वर्त्तमान, सबकी प्रतिष्ठा यही वेदतत्त्व है, जैसाकि निम्न लिखित स्मृति-वचन से स्पष्ट है— चातुर्वर्ण्य, त्रयो लोका, अत्वारश्वाश्रमाः पृथक् । भूतं भवत् - भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति ॥ ( मनुः १२।६७ । ) त्रयीघन सूर्य्य का ऋग् - भाग अग्नि है, इसी से भूलोक उत्पन्न हुआ है । यजुर्भाग वायु है, यही भुवर्लोक का अधिष्ठाता है | सामभाग आदित्य है, यही स्वर्लोक का प्रतिष्ठा है । भूलोकावच्छिन्न ऋङ्मूर्त्ति अग्नि अष्टाक्षर गायत्रीछन्द से छन्दित है । इसी गायत्राग्नि से ब्रह्मवीर्य्य का विकास हुआ है । सृष्टि में जिस प्रजा में इस गायत्रीवीर्य्य की प्रधानता रहती है, वही वर्षों में ' ब्राह्मण ' कहलाया है । भुवर्लोकावच्छिन्न यजुग्मूर्त्ति वायु ( किंवा वाय्वविनाकृत मरुत्त्वानिन्द्र ) एकादशाक्षर त्रिष्टुप छन्द से छन्दित है । इसी भ इन्द्र से क्षत्रवीर्य्य का विकास हुआ है । प्रजासृष्टि में एतद्वीर्यप्रधाना प्रजा ' क्षत्रिय ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । स्वर्लोकावच्छिन्न साममूर्त्ति श्रादित्य ( किवा श्रादित्याविनाकृत विश्वेदेव ) द्वादशाक्षर जगतीछन्द से छन्दित है । इन्हीं जागत विश्वदेवों से विड्वीर्य्य का विकास हुआ है । प्रजासृष्टि में एतद्वीर्य्यप्रधाना प्रजा ' वैश्य ' नाम से व्यवहृत हुई है । ३२५
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भाष्यभूमिका गायत्रानि सौरयज्ञ के प्रातः सवन के, त्रैष्टुभ इन्द्र माध्यन्दिनमवन के, एवं जागत विश्वेदेव सायं-सवन के अधिष्ठाता है । इसप्रकार वेदात्मक एक ही मौर तेज अपने त्रिषवणात्मक ( त्रिसवनात्मक ) हर्यश में त्रिवृत् - पञ्चदश- एकविंशस्तोमावच्छिन्न पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ नामक तीन स्तोम्य लोकों से युक्त अग्नि-इन्द्र - विश्वेदेव, इन तीन देवताओं के भेद से ब्रह्म - क्षत्र - विड् - वीर्य्यद्वारा ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य इन तीन वर्णों का प्रभव बन रहा है । प्रातःसवन में गायत्री है, माध्यन्दिनसवन में सावित्री है, सायंसवन में सरस्वती, किंवा वृषाकपायी है । गायत्रप्रणाली में व्याप्त प्रातःकालीन सौर प्राण ब्राह्मणवर्ण का जनक है । सावित्रप्रणाली में व्याप्त माध्यन्दिन सवनीय सौर प्राण क्षत्रियवर्ण का प्रभव है । सारस्वतप्रणाली में व्याप्त सायंकालीन सौर प्राण वैश्यवर्ण का उत्पादक है । अक्षरानुरहीत अव्ययमन का हृदयस्थानीय इस सूर्य्य में ही विकास माना गया है । अतएव सौरप्राणावच्छिन्न अव्ययमन ' मनु ' कहलाया है । मनुलक्षण यही अव्ययपुरुष सौरवेद के द्वारा उक्त रूप से वर्णसृष्टि का मूलप्रवर्तक बना हुआ है । इसी वर्णोत्पत्तिविज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् ने कहा है-चातुवर्यं मया सृष्टं गुणकर्म्मविभागशः । ' तस्य कर्त्तारमपि मां विद्धयकर्त्तारमव्ययम् ॥ ( गी ० ४ । १३ । ) । प्रकृतिमण्डल में प्रात काल : का सूर्य्य ब्राह्मण है, एवं पूर्व क्षितिज इस की प्रतिष्ठा है । मध्याह्न का सूर्य्यं क्षत्रिय है, एवं मध्याकाश इस की प्रतिष्ठा है । सायंकाल का सूर्य्य वैश्य है, एवं पश्चिम दितिज इस की प्रतिष्ठा है | अपने प्रवर्ग्यलक्षण उच्चिष्ट भाग से यही विट - सू अथॉत्पादन का निमित्त बनता है । प्रातः-सायं समानात्रस्थापन्न हैं । दोनों पर मध्याकाशस्थ सावित्रतेजोमय क्षत्रवीर्य्यप्रधान प्रचण्ड चण्डांशु का प्रभुत्व है, शासन है । त्रिविध सूर्य्यसंस्थाओं से उत्पन्न तीनों वर्णों की भी यही स्थिति है । ब्राह्मण प्रातः काल का शान्त, किन्तु वर्द्धिष्णु तेज है । वैश्य सायंकालीन शान्त, किन्तु क्षयिष्णु तेब है । दोनों में हीं शान्तिलक्षण समतुलन है । ब्राह्मण - वैश्य का समतुलन प्रसिद्ध है । दोनों पर मध्यस्थ क्षेत्र का शासन है । इन तीनों वर्णों में श्राधारश्चिला ब्राह्मणवर्ण ही माना गया है । प्रातःकाल ही मध्याह्न, एवं सायं का आधार है । पृथिवी ही अन्तरिक्ष एवं द्यौ की प्रतिष्ठा है । गायत्री ही त्रिष्टुप, एवं जगती का उक्थ है । ऋक ही यजुः साम की वितानभूमि है । श्रग्नि ही वाय्वादित्य की प्रतिष्ठाभूमि है । इसी प्रतिष्ठा तत्त्व को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति ने ब्राह्मण को इतर वर्णों की योनि माना है । जो समाज इस वर्ण की उपेक्षा कर देता है, तथा जिस समाज का यह वर्ग स्व - स्वरूप से विच्युत हो जाता है, उस समाज की विनष्टि निश्चित है । अग्नि ही अग्नि वायु - श्रादित्यरूप से श्रयीवेदरूप में परिणत हुआ है । इधर अग्निप्रधान वर्ण ब्राह्मणवर्ग है । अतएव तीनों वर्णों में से अग्नि-प्रधान ब्राह्मणवर्ण ही ' वेदगोता ' माना गया है । यह तो हुई अहर्यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाली सौरकालव्यवस्था की चर्चा । ग्रत्र रात्रिकाल की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । रात्रि का सम्बन्ध भूपिएड, तथा चन्द्रमा से माना गया है । चन्द्र-* ' मनु ' तत्त्व का विशद वैज्ञानिक विवेचन शतपथविज्ञान भाध्यान्तर्गत - ' मनोई वा ऋषभ श्रास, तस्मिन्नसुरघ्नीसपत्नघ्नी वाक् प्रविष्टास ' ( शत ० १ | १ | ४१ | १४ | कं ० से १७ कं • पर्य्यन्त ) इत्यादि ब्राह्मण माध्य में देखना चाहिए | ३२६