Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 341–350
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 341–350
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तृतीयखण्ड प्राणानुगता रात्रि सौम्यप्राणप्रधाना है, इसी से योषा सर्ग ( स्त्री - सृष्टि ) हुआ है । भूपिण्डानुगता रात्रि पुषा प्राणप्रधाना है, इसी से शूद्रसृष्टि हुई है । उभयानुगता रात्रि में तमोमय आसुर प्राण का साम्राज्य है, जो कि त्रासुरप्राण अग्निमुख पूर्वप्रतिपादित दिव्यप्राण का प्रतिस्पद्ध माना गया है । इस तमःप्रणाली में व्याप्त मलीमस सौम्य - पौष्ण प्राण से क्रमशः स्त्री, शूद्रवर्ग का श्राविर्भाव हुआ है । यह रात्रिगत प्राण श्रच्छन्दस्क है, अमर्यादित है । इसी से स्त्री - शूद्र की आत्मसंस्था का सम्बन्ध है । इसी वर्णोः पत्तिविज्ञान को लक्ष्य में रखती हुई श्रुति कहती है—
" गायत्र्या ब्राह्मणं निरवर्त्तयत्, त्रिष्टुभा राजन्यम्, जगत्या वैश्यम् ।
न केनचिच्छन्दसा शूद्रं निरवर्त्तयत् " ॥
ऋतुयों में वसन्त ब्राह्मण है । बसन्ताग्नि शान्त, तथा वर्द्धिष्णु है । ग्रीष्म क्षत्रिय है । शीर्णध विष्णु शारदाग्नि वैश्य है । पुष्टिप्रवर्तक वर्षाकाल शूद्र है । इसी आधार पर अग्न्याधान की निम्न लिखित व्यवस्था का समन्वय हुआ है -( १ ) " वसन्ते ब्राह्मणोऽनीनादधीत " । ( २ ) " ग्रीष्मे राजन्यः " । ( ३ ) “ शरदि वैश्यः ” । ( ४ ) “ वर्षासु रथकारः ( पूषप्राणदेवतायुक्तः सच्छूद्रः ) अग्नीनादधीत " । उक्त वर्णविज्ञान से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, सोपनिषद् - सारण्यक - ब्राह्मण - सशास्त्र - अथर्व -गर्भित त्रयीवेद का सौर हर्यज्ञ से सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में तत्त्वात्मिका वेदविद्या की सत्ता अहर्यज्ञ ही है । एवं इसी के तीनों सच्छन्दस्क प्राणदेवताओं से ब्रह्म - क्षेत्र - बिडू - वीर्थ्य- द्वारा द्विजातिप्रजा की सृष्टि हुई है । अतएव एकमात्र द्विजातिप्रजा को ही वेदशास्त्र - स्वाध्याय का अधिकार है । वेदतत्त्वविरहित रात्रिभाग से उत्पन्न स्त्री - शुद्ध त्रयीविद्या में सर्वथा अनधिकृत हैं । ब्राह्मणभागसिद्ध यज्ञात्मक कर्म्मयोग, आरण्यकभाग-सिद्ध तत्त्वात्मक भक्तियोग, उपनिषद्भागसिद्ध श्रव्यक्तात्मक ज्ञानयोग, तीनों योगों का अधिकार भी एकमात्र द्विजाति - पुरुषों को ही है । निम्न लिखित व्याससूक्ति इसी अधिकारमर्यादा का स्पष्टीकरण रही है— " स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा " ३ - संस्कार- और अधिकार मर्यादा-अधिकारमर्थ्यादा के सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है । ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य - कुल में अन्य लेने वाला, अतएव जन्मना ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य कहलाने वाला पुरुष वेदस्वाध्याय का अधिकार रखता है, अथवा ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य वर्णोचित कर्म करने वाला वेदस्वाध्याय का अधिकार रखता है?, यही प्रश्न का स्वरूप है । प्रश्न का तात्पर्य यही है कि, वर्णव्यवस्था से सम्बन्ध रखने वाली अधिकारमर्थ्यादा का ३२७
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भूमिका जाति ( वर्ण ) से सम्बन्ध है, अथवा कर्म से? उत्तर में यही कहा जायगा कि, जाति से भी वर्ण का सम्बन्ध नहीं है, एवं कर्म्म से भी वर्ण का कोई सम्बन्ध नहीं है । केवल ब्राह्मणादि वर्णों में उत्पन्न होने से भी वेदाधिकार नहीं मिल सकता । एवं द्विजातीतर शुद्रादि वर्ण - वर्ण में उत्पन्न होकर जिसनें व्यामोहवश यज्ञोपवीतादि संस्कारों का अभिनय कर डाला है, वह भी वेदाधिकार प्राप्त नहीं कर सकता । जो द्विजातिकुल में उत्पन्न नहीं होते, दूसरे शब्दों में जिनके श्रात्मा में वेदतत्त्वात्मक सच्छन्दस्क ग्रहयज्ञ बीजरूप से प्रतिष्ठित नहीं है, ऐसे स्त्री-शूद्रों पर किया गया संस्कार निरर्थक है । जब बीज ही नहीं, तो संस्कार किस का । एवमेव जात्या द्विजाति होने पर भी जिनका वीर्य्य वेदतत्त्वमाहक सांस्कारिक कर्म से शून्य हैं, ऐसे द्विजबन्धु भी इस वेदसंस्कार के अयोग्य ही मार्ने जायँगे | भगवान् वसिष्ठ के शब्दों में- ' प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्य सकारविशेषाच ' के अनुस | र जन्मानुगता संस्कारसम्पति ही अधिकारप्राप्ति का अनन्य साधन है । ‘ जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते ' के अनुसार संस्कार न होने पर्यन्त द्विजातिवर्ग असंस्कृत संस्कृतानई शूद्रकोटि में प्रविष्ट है, शूद्रवत् है । इस सम्बन्ध में हमें यह नहीं भुला देना चाहिए कि, संस्काराभावपर्य्यन्त कर्म्मणा शूद्रवत् रहता हुआ भी द्विजातिकुलोत्पन्न द्विजातिवर्ग द्विजाति - मातापिता के शुक्रशोणित में प्रतिष्ठित द्विजातिभावसम्पादक ब्रह्म - क्षेत्र - विड् वीयों की सत्ता से जन्मना द्विजाति ही माना जायगा, एवं वही संस्कारकर्म का अधिकारी माना जायगा । सुरापान, ब्रह्महत्या, गोहत्या, भ्रूणहत्या, आदि कुछ एक जातिभ्रंशकर महापातकों का सम्बन्ध जत्र तक इस के आत्मा के साथ नहीं हो जाता, तब तक इसका जात्यनुगत वीर्य्य सुरक्षित रहता है । इसके अतिरिक्त जब तक वीर्य्यस्वरूप रक्षक प्राणदेवता स्व - स्वरूप से सुरक्षित रहते हैं, तभी तक वीर्य्यसत्ता सुरक्षित है । प्राणरक्षा छन्दों के आधार पर अवलम्बित है । छन्दोमय वयोनाधप्राणों का अपना नियतकाल होता है । नियत अवधि समाप्त हो जाने पर छन्दों का अतिक्रमण हो जाता है । इसके अनन्तर संस्कार करना व्यर्थ है । क्योंकि छन्दोऽतिकमण से छन्दित प्राणदेवता उत्क्रान्त हो जाते वीर्य्यभाव निर्वार्य्यभाव में परिणत | जाता है । यही ' व्रात्य ' ( पतित द्विजाति ) संज्ञा का रहस्यार्थ है । १६-२२-२४ व वर्ष सावित्री - संस्कार की श्रन्तिम अवधि है । इसके अनन्तर - ' पतितसावित्रीका ने शूद्रवदव्यवहार्या भवन्ति ' । यथाजात - श्रसंस्कृत - शूद्र समुदाय हो ' व्रत ' है । व्रतश्रेणि ( शुद्धश्रेणि ) में आने वाला द्विजाति ही ' बात्य ' है । इस प्रकार जिसके आत्मा में द्विजवीर्य्य प्रतिष्ठित है, अर्थात् जो जन्मना द्विजाति है, साथ ही वात्यदशा से पहिले पहिले जिसका सावित्रीसंस्कार हो गया है, ऐसा संस्कार - संस्कृत - जन्मजात द्विजाति ही वेदस्वाध्याय का अधिकारी है । वेदस्वाध्याय का अधिकार जहां तीनों वर्णों को है, वहाँ वेदाध्यापनलक्षण उपदेश का अधिकार एकमात्र ब्राह्मणवर्ण को ही दिया गया है । अर्थशक्ति का अनुगामी वैश्य, क्रियाशक्ति का अनुगामी क्षत्रिय, दोनों ज्ञानशक्ति से सम्बन्ध रखने वाले अध्यापन कर्म में स्वभावतः अनधिकृत हैं । यह अधिकार ज्ञानशक्ति के अनुगामी ब्राह्मण की प्रातिश्विक सम्पत्ति है । इसी वैशिष्ट्य के आधार पर इसे सर्ववर्णों की योनि माना गया है । निम्नलिखित मनुवचन ब्राह्मणवर्ण के इसी वैशिष्ट्य का समर्थन कर रहे हैं— ३२८
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तृतीय ars
१ - उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।
स हि धर्म्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
२ - ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते ।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्म्मकोशस्य गुप्तये ॥
३- सर्वं स्वं ब्राह्मणस्येदं यत् किञ्चिज्जगतीगतम् ।
श्रेष्ठ नाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणोऽर्हति ॥
४ - स्त्रमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । श्रानृशंसाद् ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः ॥ ( मनु: १० ६८, ६६, १००, २०१, श्लो ० ) जैसा कि कहा जा चुका है, शुद्रदम्पती के मिथुनभाव से उत्पन्न शुद्र के लिए, तथा - अच्छन्दस्क रात्रिगत सौम्यप्राणप्रधाना स्त्री के लिए संस्कार विहित हैं । जन्मतः वीर्य्यसम्पत्ति से वञ्चित इन दोनों वर्गों का संस्कार करना व्यर्थ है । वज्र ( हीरे ) की खान में उत्पन्न होने वाले मलिन वज्र को शाण पर चढ़ा के चमकदार बनाया जा सकता है | परन्तु कोयले की खान में उत्पन्न कोयले में संस्कारसाहस्री से भी दीप्तिभाव उत्पन्न नहीं किया जासकता । इसप्रकार सूत्रकारों की व्यवस्था के अनुसार संस्कारसंस्कृत द्विजातिवर्ग ही अधिकारमय्र्यादा-कोटि में आता है । ४- संस्कारस्वरूपदिग्दर्शन-श्रव प्रसङ्गोपात्त दो शब्दों में संस्कारस्वरूप की मीमांसा कर लेना भी अनावश्यक न माना जायगा । दोषमार्ज्जन, अतिशयाधान, हीनाङ्गपूर्ति, भेद से संस्कारकर्मी त्रिपर्वा माना गया है । ' शोधक ' संस्कार दोषों का मार्जन करते हैं, ' विशेषक ' संस्कार निदुष्ट पदार्थ में अतिशय का प्राधान करते हैं, एवं ' पूरक ' संस्कार पूर्णतासम्पादन करते हैं । जड़ - चेतन, किसी का भी संस्कार कीजिए, इन्हीं तीन संस्कारों का आश्रय लेना पड़ेगा । वस्त्रनिर्माणार्थ कपास लाया जाता है, यह असंस्कृत है, इसका संस्कार करना है । सर्वप्रथम बिनौले, तृरण, यदि निकालते हुए इसे स्वच्छ रूई का स्वरूप दिया जाता है, एवं यही पहिला शोधक- दोषमार्जन संस्कार है । सूत्ररूप में परिणित कर वस्त्र बना डालना विशेषक अतिशयाधान संस्कार है । सम्पन्न वस्त्र पर इस्त्री करना, चटन आदि लगाना पूरक हीनाङ्गपूर्तिसंस्कार है । जौ का वितुपीकरण दोष है, कूट - पीस - छान कर रोटी बना लेना अतिशया • है, घृतसम्बन्ध करा देना हीनाङ्ग ० है । स्नान करना दो ० है, वस्त्रपहिनना प्रति ० है, मुगन्धिद्रव्य, पुष्पादि धारण करना हीनाङ्ग ० है । निदर्शनमात्र है । यही त्रिपर्वा सामान्य संस्कार हमारी अधिकार मर्यादा से सम्बद्ध है । आत्मा, देव, भूत, तीनों की समष्टि ' ग्रह ' पदार्थ है । इनमें आत्मा संस्कार्थ्य है, नित्य संस्कृत है । देब, भूत दो पर्व संस्कार्य्य हैं । अतएव शास्त्रीय संस्कार भी देवसंस्कार, भूतसंस्कार भेद से दो भागों में विभक्त मानें गए हैं । दैवसंस्कार श्रौतसंस्कार कहलाए हैं, भूतसंस्कार स्मार्त्तसंस्कार कहलाए हैं । श्रौत ० ३२ हैं, स्मार्च ० ९ ६ हैं, सम्भूय ४८ संस्कार हो जाते हैं । इन संस्कारों के नित्य नैमित्तिक - काम्यादि प्रवान्तर अनेक भेद और ३२६
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भाष्यभूमिका हो जाते हैं, जिनका अन्यत्र * विशद वैज्ञानिक विवेचन किया जाचुका है । पञ्चमहायज्ञादि नित्यसंस्कार, पार्व- ' खादि मासिक संस्कार, श्राग्रयणादि वार्षिक संस्कार, उद्धाहादि नैमित्तिक संस्कार, गुणाधायक श्रग्निष्टोमादि काम्यसंस्कार, आदि भेदभिन्न संस्कारों से सुसंस्कृत द्विजाति सगुणब्रह्म की साक्षात् प्रतिमा माना गया है । देखिए!
संस्कारैः संस्कृतः पूर्णेरुत्तरैरपि संस्कृतः ।
नित्यमष्टगुणैर्युक्तो ब्राह्मणो ब्रह्म लौकिम् ॥
ब्राह्म ' पदमवाप्नोति यस्मान्न च्यवते पुनः ॥ ( शङ्खस्मृतिः ) संस्काराभावदशा में सस्कृत बना हुआ आत्मा दिव्यसंस्कार को अपने ऊपर प्रतिष्ठित करने में असमर्थ है । असंस्कृत श्रात्मा मध्यस्थ दोशवरण से उसी प्रकार मलिन बना रहता है, जैसे कि कृष्ण दर्पण के सम्बन्ध से दीप की शुक्लप्रभा कृष्ण बनी रहती है । ठीक यही स्थिति असंस्कृत आत्मा की है । ऐसे मलिनसत्त्व मनुष्यों के विचार वर्णधर्म्म से सर्वथा विपरीत पथ का ही अनुसरण करते हैं । संस्काराभाव से ही आज प्रत्येक वर्ग की शास्त्रीयोपदेश के प्रति अरुचि हो रही है । प्रकृतिविरुद्ध कर्म ही आज उन्नति का मार्ग माना जा रहा है । वर्णाश्रमधर्म्मविरोध ही श्राज के पुरुषार्थियों का परमपुरुषार्थ बन रहा है । हमारी ओर से इन पुरुषार्थियों को निराश नहीं होना चाहिए | श्रवश्यमेव उनका यह सत् पुरुषार्थ? आसुरीबिभूति को समृद्ध बनाता हुआ उनकी सदाशा! पूरी करेगा । परन्तु इस सम्बन्ध में उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि, जिसे वास्तव में श्रभ्युदय कहते हैं, श्रात्मविकास कहते हैं, जिसके श्राराधन से भारतवर्ष जगद्गुरु कहलाया है, भारतवर्ष का वह अभ्युदय, वह आत्मविकास, वह जगद्गुरुत्त्व तो एकमात्र संस्कार - संस्कृत- विशुद्ध - पूत ऋषियों के शास्त्राज्ञा-देशानुगमन से ही सुरक्षित रह सकता है । यदि हमें वेदशास्त्र पर विश्वास है, यदि हम इस आनन्दकोश के अधिकारी बनना चाहते हैं, तो हमें अवश्यमेव संस्करानुबन्धिनो अधिकारमर्य्यादा का अनुगमन करना पड़ेगा । वाचक्नवी, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, अनुसूया, आदि विदुषियों को दृष्टान्त बना कर वेदाध्ययनसम्बन्धिनी उस सामान्य अधिकारमर्य्यादा की उपेक्षा नहीं की जा सकती । यदि कोई अपने कम्र्म्मातिशय से स्ववीर्य्य में परिवर्तन करने की शक्ति रखता है, तो वह अवश्यमेव अधिकारी है । सुप्रसिद्ध कवषपुत्र ऐलूप को किसने रोका । उसका देखा हुआ । ‘ श्रापोनप्त्रीय सूक्त ' श्राज ऋग्वेद की शोभा बढ़ा रहा है । यह सब कुछ होते हुए भी समाजव्यवस्था-रक्षा के नाते व्यवस्था में नियन्त्रण आवश्यक है । किन्हीं विशेष प्राकृतिक श्राधिदैविक कारणों से सम्बन्ध रखने वाले कुछ एक अपवादस्थान सामान्य प्राकृतिक नियमों के विघातक नहीं माने जा सकते । सामान्य दृष्टान्त ही सामान्य व्यवस्था में उपयुक्त मानें जा सकते हैं । अस्तु, यह विवाद एक स्वतन्त्र विषय है । प्रकृत में इस परिच्छेद से वक्तव्य यही है कि शास्त्रदृष्टया वेदाधिकार केवल उन्हीं द्विजातियों को है, जिन्होंने विविध संस्कारों से अपने महानात्मगत सच्छन्दस्क वर्णवीर्य्यात्मक बीज को स्वच्छ बना लिया है । देवप्राणघन वेदतत्त्व ( विद्यात्मक संस्कार ) उन्हीं के श्रात्मा में प्रतिष्ठित हो सकता है । यही संस्कारसापेक्षा अधिकारमीमांसा है । * पूर्वोक्त वर्णविज्ञान, तथा प्रकृत का संस्कारविज्ञान गीताभूमिका के वर्णव्यवस्थाविज्ञान, तथा संस्कारविज्ञान, नामक स्वतन्त्र प्रकरणों में देखना चाहिए । ३३०
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तृतीयखण्ड ५- ब्रह्मविद्यावित् - परमाचार्य्य-अब एक अन्य दृष्टि से अधिकार मर्यादा की मीमांसा की जाती है, जिसका संस्कार की तुलना में कम महत्त्व नहीं है । महर्षि पिप्पलादसम्मता अधिकारमर्थ्यादा के दिग्दर्शन से पहिले स्वाध्यायपरम्परा से सम्बन्ध रखने वाले ऐतिहासिक सन्दर्भ की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ब्रह्मविद्यावित् परमाचार्यों में परम्परया प्रतिष्ठित ब्रह्मविद्या का इतिवृत्त भी हमारी उक्त लक्षणा अधिकारमर्यादा का ही पोषक माना जायगा । जिस समय भारतवर्ष में वेदविद्यात्मक सूर्य्य अपने प्रखर तेज से तप रहा था, जिस युग की सामान्य अशिक्षित प्रजा भी ' तद्धैतदविद्वांस अभ्याहुः सैषा त्रयी विद्यातपति ' ( शत ० १० | ५ | २ | २ | ) इत्यादि के अनुसार सूर्य को त्रयीविद्या नाम से व्यवहृत कर रही थी, उस वेदयुग में ब्रह्मविद्या से सम्बन्ध रखने वाले गभीरातिभीर तत्त्वों का अन्वेषण प्रचार - प्रसार करने वाली कई एक विज्ञानशालाएँ इस देश में प्रतिष्ठित थीं । ब्रह्मविद्या का, किंवा वेदविद्या का मूलस्तम्भ प्राणतत्त्व माना गया है । लोकविज्ञान के अनुसार प्राणतत्त्व सत्यलोकात्मक स्वयम्भूलोक की प्रातिस्त्रिक वस्तु माना गया है । स्वायम्भुव वेद ही ' ब्रह्मनिःश्वसित ' नामक अपौरुषेयवेद है, जिसका भूमिका द्वितीय खण्ड में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । स्वायम्भुव वेदतत्त्व के - यजुः साम भेद से तीन पर्व हैं । इनमें ऋक्साम वयोनाधलक्षण छन्दोवेद है । इस छन्दोवेद से छन्दित यजुर्वेद वयोलक्षण वस्तुतत्त्व है । यही यजु पुरुष है, इसे ही ' ब्रह्माग्निलक्षण-सत्याग्नि ’ - ‘ सार्वयाजुपाग्नि ' इत्यादि नामों से व्यवहृत किया गया है । ब्रह्माग्निलक्षण यजुर्वेद के यत् - जू., नामक दो पर्व हैं । स्थितिप्रकृतिक जू भाग. आकाश है, यही वाक् है । गतिप्रकृतिक यत् भाग वायु है, यही प्राण है । यह प्राणतत्त्व ही मौलिक वेद है । यही प्राणतत्त्व - ' तद्यत पुराऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमण तपसा श्ररिषंस्तस्म, ऋषय: ' ( श ० ६ | १ | १ | १ ) के अनुसार ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध है । ' ऋषि ' नामक यही यजुःप्राण तत्त्वात्मक ‘ ' वेदमन्त्र ' है । इसी को लक्ष्य में रख कर - ' ऋपिवेदमन्त्रः ' कहा गया है | इस वेदस्वरूप ऋषिप्राण के कश्यप, अगस्त्य, भृगु, अङ्गिरा, अगस्त्य, पुलह, ऋतु, दक्ष, वसिष्ठ, मत्स्य, विश्वामित्र, भरद्वाज, बृहस्पति, जमदग्नि, आदि असंख्य अवान्तर भेद मानें गए हैं । प्राणानन्त्य हो वेदानन्तता का मूलाधार है । इसी प्राणानन्त्यविज्ञान को लक्ष्य में रख कर इन्द्रप्रदत्त वर के प्रभाव से चार सौ वर्षों की आयु प्राप्त करने वाले सुप्रसिद्ध वेदाभ्यासी महर्षि भरद्वाज के प्रति इन्द्र ने कहा था- ' अनन्ता वै वेदाः ' ( तै ० ब्रा ० ३।१०।११।३ । ) । इन ऋषिप्राणों का स्वरूपज्ञान प्राप्त कर लेना कोई सामान्य काम नहीं है । स्वयं मन्त्रसंहितानें निम्न लिखित शब्दों में ऋषिप्राण विज्ञान की दुरूहता का समर्थन किया है— " विरूपास पयस्त इद्गम्भीरवेपसः ॥ ते अङ्गिरसः सुनयस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे ॥ १ । अग्नेः परि जज्ञिरे विरूपामा दिवस्परि । नवग्बो नु दशग्वो अङ्गिरस्तमः सचा देवेषु मंहते ॥ ” ( ऋकसं ०१०।६२।५,६, ) अनेकधा विमक्त इन ऋषिप्राणों के आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, नाक्षत्रिक, आादि भेद से अनेक संस्थान मानें गए हैं । उदाहरण के लिए पहिले आध्यात्मिकसंस्था को ही लीजिए । श्राध्यात्मिक ३३१
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are भूमिका राप्रा से कर्मप्रवणता का उदय होता है । इसकी प्रतिष्ठा शारीराग्नि है । जबतक शारीर भूताग्नि में प्राण प्रतिष्ठित रहता है, तत्रतक अग्नि प्रबल बना रहता है । एवं जनतक अग्नि सबल रहता है, तभीतक कर्म में प्रवणता रहती है । प्राधिभौतिक प्रपञ्च में अङ्गिरा श्रङ्गाराग्नि की प्रतिष्ठा माना गया है । प्रज्ज्वलित अङ्गारखण्ड में जो एक रक्तवर्ण की दीप्ति दिखलाई पड़ती है, वह प्राणप्रतिष्ठा का ही माहा त्म्य है । जबतक श्रृङ्गार में अङ्गिरा प्रतिष्ठित है, तभी तक श्रङ्गार खण्ड स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित है । श्रङ्गिरा -प्राणोत्कान्ति ही श्रृङ्गारखण्ड की विनष्टि का कारण बनती है । अग्निज्वाला में भृगुप्राण प्रतिष्ठित है, श्रृङ्गार -पि es में प्राण प्रतिष्ठित है । अङ्गारखण्ड को पानी से शान्त कर दीजिए । पुनः उसे प्रज्ज्वलित कीजिए | दुबारा प्रज्ज्वलित करने पर श्रङ्गार खण्ड में जो दीप्ति उत्पन्न होगी, उसका ' बृहस्पति ' प्राण में सम्बन्ध होगा । इसी प्रकार अङ्गार को बुझाते हुए, प्रज्ज्वलित करते जाइए । नवीन प्राणों का उदय होता जायेगा । यह धाराक्रम २१ बार चल सकेगा । २२ वीं बार अङ्गारखण्ड भस्मरूप में परिणत हो जायगा । श्रङ्गिरा प्राण को मूल बना कर प्रकट होने वाले अङ्गारखण्डानुगत इन्हीं २१ प्राणों के लिए ' एकविंशिनोऽङ्गिरसः ' कहा गया है । इसी आधिभौतिक श्रङ्गिरा - भृगुप्राण की व्याप्ति का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है--" अङ्गारेष्वङ्गिराः सम्बभूव । अचिंषि भृगुः सम्बभूव । अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुददीप्यन्न, अथ बृहस्पतिरमवत् " ॥ वसिष्ठप्राण श्रोदस्विता का प्रवर्तक माना गया है । अगस्त्यप्राण परोपकारशीलता का प्रवर्तक है । ये ही दोनों प्राण प्रधिदैवत में मित्र कम्मों के अधिष्ठाता चन रहे हैं । पानी को मृदूरूप में परिणत कर देना वसिष्ठप्राया का काम है । दूसरे शब्दों में बायुसहयोग से वसिष्प्राण पानी में घनता उत्पन्न कर देता है । इस घनता के उत्तरोत्तरप्रबाह से पानी आपः - फेन - मृत् - सिकतादि स्वरूपों में परिणत होता हुआ कॉलान्तर में स्थल - रूप में परिणत हो जाता है । उत्तरदिशा में क्योंकि घनताप्रवर्तक वसिष्ठप्राण का प्राधान्य है । यहीं कारण है कि, उत्तर समुद्र क्रमशः स्थलरूप में परिणत होता जा रहा है । उत्तर में होने वाली भूभागवृद्धि ही इस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष निदर्शन है । दक्षिणदिशा में प्रतिष्ठित अगस्त्यप्राण का व्यापार वसिष्ठ से ठीक विपरीत माना गया है । पानी की धनता का उच्छेद करना इस प्राण का अन्यतम कर्म्म माना गया है । जिस पारम्परिक-ग्रन्थिबन्धन से श्रद्धात्तत्त्व सोम- पर्जन्य - रूप में परिणत होता हुआ अन्तत: वर्षा ( पानी ) रूप में परिणित होता है, अगस्त्यप्राण उसी मन्थिबन्धन का उच्छेद करता है । ग्रन्थिबन्धविमोक से पानी अपनी सुसूक्ष्म।बस्था ( वाष्पावस्था ) में परिणत होता हुआ उत्क्रान्त हो जाता है । पुलस्त्यप्राण घातकता का प्रवर्तक है, हिंसा भाव का उत्तेजक है । ऋतुप्राण अध्यबसाय का जन्मदाता है । दक्षप्राण से बुद्धि में निश्वयात्मक व्यवसायधर्म का उदय होता है । विश्वामित्रप्राण से श्रायु: स्वरूप की रक्षा होती है | बृहतीसहस्र ( ३६००० ) के सम्बन्ध से प्रत्येक मनुष्य वेदोक्त आयुर्मर्य्यादानुसार ३६००० दिन ( १०० वर्ष ) जीवित रहता है । इस बृहतीसहस्र की मूलप्रतिष्ठा यही विश्वामित्रप्राण माना गया है । मरीचिप्राण से अध्यात्म में स्वेदोत्पत्ति होती है । यही मरीचिप्राण सूर्य्यरश्मियों में प्रतिष्ठित रहता हुआ ' मरीचि ' नामक सौर-आग्नेय जल का उत्पादक बनता हुआ कृर्म्माकाराकारित कश्यपसंस्था का जन्मदाता बनता है । कश्यपप्रा पुरंखिता का प्रवर्त्तक है । ३३२
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तृतीयखण्ड इसप्रकार प्रत्येक प्राण भिन्न भिन्न संस्थानों के अनुरूप भिन्न भिन्न कम्मं का प्रवर्तक बन रहा है । विदितवेदितव्य वेदद्रष्टा महर्षि भी - " को हि तद्व ेद - यदन्तरात्मन् - प्रारणाः " ( शत ०७।२।२।२० ) इत्यादिरूप से प्राणतत्त्व की गहनता, दुर्विज्ञेयता स्वीकार करते हैं । यही प्राणतत्त्व सृष्टि का मूलाधार तथा मूलप्रवर्त्तक माना गया है । “ असत्, चित्य, चितेनिधेय, अवकाश, अक्षिति, एकर्षि, द्वधर्षि, सप्तर्षि, स्क्र्त्, शाकल, बालखिल्या, धवित्र, पवित्र, साकञ्ज, स्तौम्य, लोक्य, ऐन्द्र, वैराज, मनु, प्राजापत्य " यदि भेद से इनके अवान्तर असंख्य विवर्त्त हैं । प्राणानन्त्य ही वस्तुभेद की मूलप्रतिष्ठा है । यही प्राणतत्त्व सुप्रसिद्ध वेद-तत्त्व है । प्राणविद्या ही वेदविद्या है । ऋषिप्राणवित् विद्वान् हीं वेदवित् है, ये ही ब्रह्मविद्यावित् परमाचार्य्यं हैं । इन्हीं को परम - ऋषि कहा गया है- ' नमः परम ऋषिभ्यः, नमः परम - ऋषिभ्यः ' । इन ऋषिप्राणों के प्रथम परीक्षक तपस्वी महापुरुष ही ऋषिप्राण नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । आज मनुष्यविध ऋषियों के वसिष्ठ - अगस्त्य - कश्यप - भरद्वाज - अङ्गिरा, ग्रादि जो नाम सुने जाते हैं, वस्तुतः ये उनके यशोनाम हैं, कर्म्मनाम हैं । ऋषिलक्षण वेदमन्त्र ( वेदतत्त्व ) के द्रष्टा ( प्रथमद्रष्टा - प्रथम परीक्षक ) पुरुष भी उन उन ऋषि नामों से ही प्रसिद्ध हुए हैं । इसी आधार पर - ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः - साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः ' यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित हुआ है । उन तपः पूत महर्षियोंनें तत्प्राणपरीक्षण के लिए जो विज्ञानशालाएँ स्थापित कीं, वे ही ' ब्रह्मपर्णत् ' ( परिषत् ) कहलाई । तत्तत् ब्रह्मपर्षदों में शिष्यादि परम्परया तत्तद् विशेषप्राणों का परीक्षण ही प्रक्रान्त रहा । एवं तत्तद् पर्षत् के भावी कुलपांते तत्तत्प्राण नाम से ही प्रसिद्ध हुए । उन परिषदों में से कुछ एफ का परिचय यहाँ भी उद्धृत कर दिया जाता है ६- ब्रह्मपत्स्वरूप दिग्दर्शन--( १ ) - सुरब्रह्म पर्षत्— प्राणविद्या ही वेदविद्या है | यह प्राणविद्या देवविद्या, असुरविद्या, भेद से दो भागों में विभक्त मानी गई है | बृहस्पति देवविद्या के प्राचार्य मानें गए हैं, शुक्र असुरविद्या के प्राचार्य माने गए हैं । संहारक विविध शस्त्र - अस्त्र - यन्त्र - ग्रह - विद्य त् - आदि के आविष्कारक शुक्राचार्य की परम्परा में प्रासुरवेद प्रतिष्ठित रहा है । रक्षक देवताविज्ञानात्मक यज्ञकाण्ड बृहस्पति की प्राचार्य्यपरम्परा में सुरक्षित रहा है । यही देववेद है । देवप्राण की विकासभूमि सूर्य्य है, एवं सुरप्राण की विकासभूमि आपोमय परमेष्ठी है । पारमेष्ठयमण्डल के अभिमानी देवता वरुण हैं, सौरमण्डल के श्रभिमानी देवता ' इन्द्र ' ( मघवा नामक ) हैं । इन दोनों प्राणों में परस्पर अश्व-माहिष्य है । असुर- प्राणधिष्ठाता वरुण तत्त्वात्मक आासुरवेद के श्रालम्बन हैं, एवं देवप्राणाधिष्ठाता इन्द्र तत्त्वात्मक देववेद के आलम्बन हैं । इसप्रकार प्राणभेद से वेद के दो विवर्त्त हो जाते हैं । उक्त प्राकृतिक ( आधिभौतिक ) चरित्र के प्रतिकृतिरूप आधिभौतिक ( मनुष्यविध ) देवता, और सुर क्रमश: दोनों वेदों के सम्प्रदायप्रवर्त्तके बनें । सुरेन्द्र वरुण सुरवेट के, देवेन्द्र इन्द्र देववेद के प्रवक बनें । वर्तमान में ' बलख ' नाम से प्रसिद्ध देवयुगकालीन सुप्रसिद्ध ' बाह्लीक ' नगर ही सुरेन्द्र वरुण की राजधानी थी, जो कि वरुण पश्चिमदिशा के दिकपाल, तथा आपोलोक के लोकपाल कहलाते थे । असुरों के सतत उद्योग से भी जब देवताओं ने अमुरों को सोमपान का अधिकारी नहीं समझा, तो अन्त में असुरों के विशेत्र आग्रह से वरुण ने असुरों के लिए मुरवलप्रवर्द्धक, तथा देवबलविरोधी पाप्मा द्रव्यों के सम्मिश्रण से एक पूर्व मादक द्राय उत्पन्न किया । बरुणद्वारा आविष्कृत वही पेय ' वारुणी ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । ३३३
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भूमिका सुप्रसिद्ध महर्षि भृगु इन्हीं वरुण के श्रौरस पुत्र थे । श्रमुरकुल में उत्पन्न होने पर भी इनमें पूर्वजन्मकृत-सूर्य्यसंस्कारातिशय से दैव वीर्य्य का प्राधान्य था । अतएव पामीर नामक प्राग्मेरु स्थानस्थित हिरण्यपर्वत-निवामी, प्राग्ज्योतिष नामक नगर के, तथा ' कान्तिमती ' नामक लोकसभा के अध्यक्ष भौम ब्रह्माने भृगु को अपना दत्तक पुत्र ( मानसपुत्र ) बना लिया था । ब्रह्मा जिसमें जन्मतः ब्रह्मवीर्य्य की अतिशय प्रधानता देखते थे, उसे ही अपना दत्तक पुत्र बना कर उसे वेदधर्म में दीक्षित कर लेते थे । वे ही ब्रह्मपुत्र पुराणपरिभाषा में ' मानसपुत्र ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । अमुरों की देखा देखी देवमण्डली में भी वारुणी का प्रलोभन जागृत हुआ । अन्त में वरुणपुत्र भृगु के द्वारा इसका निरोध हुआ । * । प्रकृत में उक्त ऐतिहासिक सन्दर्भ से यही बतलाना है कि, सुखेट के मूलप्रवर्तक सुरेन्द्र वरुण ही थे । इन्हीं की सम्प्रदाय में पुलस्त्य - पुलह किलात - श्राकुली आदि प्रमुरप्राणों की परीक्षा हुई । एवं तत्तदामुरप्राण-परीक्षक असुर ऋषि तत्तन्नामों से ही प्रसिद्ध हुए । पुलस्त्यप्राण के परीक्षक पुलस्त्य कहलाए, पुलहप्राण के परीन्हक पुलह कहलाए । इन दोनों श्रमुर कुलपतियों की ब्रह्मपदें उस सुप्रसिद्ध ' पोलेण्ड ' स्थान में थीं, जो रूस - तथा जर्म्मन् के संदश में स्थित है । देवेन्द्रानुगत दिव्यवेद में इनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है । श्रुतः सुरपर्वत का विवेचन यहीं समाप्त कर दिव्यवर्षदों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । * - ( दिव्य ब्रह्मपत् ) -( २ ) - कश्यपपत्- ( स्वर्गपरिषत् ) -यों तो दिव्य परिषदें अनेक थीं । परन्तु उनमें से १० परिषदें ही मुख्य मानीं जातीं थीं । इनमें १ पर्धत् भौम स्वर्ग में थी, १ पर्यत् भौम अन्तरिक्ष में थी, शेष पदें भौमपृथिवी ( भारतवर्ष ) लोक में थीं । स्वर्गीय पर्छत् के कुलपति कश्यपमहर्षि थे, जिन्हें ' प्रजापति ' भी कहा जाता था । इस पर्यंत् में प्रधानरूप से कश्यपप्राण की ही परीक्षा होती थी । आदिब्रह्मा की श्रावासभूमि हिरण्यशृङ्ग पर्वत बतलाया गया है । इसी के समीप ' तिब्बत ' प्रदेश है । तिब्बत से उत्तर कश्यपवत् की प्रतिष्ठा थी । स्वर्गस्था होने से इसे विशेष सम्मान प्राप्त था । ( ३ ) - अत्रिवर्षद सांख्यअत्रि, भौम अत्रि, भेद से त्रिवंश दो शाखाओं में विभक्त हुआ ॥ इनमें भौम अत्रि के श्रौरस पुत्र चन्द्रमा थे | ब्रह्माके द्वारा यही अत्रिपुत्र चन्द्रमा सोमवल्ली को अमुरों के आक्रमण से बचाने के लिए मौनेय गन्धर्व सेना के साथ उत्तर दिशा के टिकूपाल बनाए गए, एवं औषधि ( सोम ) के लोकपाल बनाए गए. । अपनी गान्धर्वमर्य्यादा का दुरुपयोग करते हुए राज्यमदोन्मत्त चन्द्रमा के द्वारा ही वह अप्रिय घटना घटित हुई, जो आगे जाकर देवबलविनाश का कारण सिद्ध हुई । तारापहरण जनित पाप से चन्द्रमा रक्षाक में शिथिल हो गए । फलस्वरूप दिव्ययज्ञकर्म के सहजशत्रु श्रमुरो ने यज्ञस्वरूप संसाधिका सोमवल्ली का मूलोत्पाटन कर डाला । देववल उच्छिन्न हो गया, असुरों का साम्राज्य दृढमूल बन गया । इस मुरी मत्ता के * सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते । तस्माद् ब्राह्मण - राजन्यौ चैश्यश्च - न सुरां पिवेत् ॥ ( मनुः ) । ३३४
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तृतीयखण्ड एकमात्र निमित्त चन्द्रमा ही बने थे, अतएव देव - वेद धम्मंविरोधी सम्प्रदायविशेषों में निदान विद्यासम्बन्धी संकेत के अनुसार चान्द्र तिथिको ही प्रधानता दी जाती है । तारागर्भ से चन्द्रमा के बुध पुत्र उत्पन्न हुए । बुध के साथ मनुभगिनी इला का परिणय हुआ । यही दम्पती - युग्म सोमवंश ( चन्द्र वंश ) का मूल प्रवर्तक बना । इसी श्राधार पर सोमवंशी क्षत्रिय ' ऐलः प्रकृतिरुच्यते ' के अनुसार ऐल ( इलावंशज ) कहलाए । दूसरे सांख्य अत्रि के वंशज वेदधर्म्म से बहिष्कृत होते हुए महादुराचारी बन गए । इनके असदाचरणों से दुःखी होकर सांख्य अत्रि ने देवनिकाय पर्वत ( मुलेमान पर्वत ) को अपना आवास स्थान बना लिया । इनके पुत्रों के वंशज ही आगे जाकर ' यवनवंश ' के प्रवर्तक बनें । प्रसङ्गोपात्त यह भी जान लेना चाहिए कि, आज जिसे ( ग्रीस को ) यूनान कहा जाता है, वास्तव में वह तत्त्वत्तः यूनान नहीं है । वास्तविक यूनान ( यवन देश ) स्तान से सम्बन्ध रखता है, जहाँ यवनों के मूलपुरुष सांख्य त्रि के पुत्र निवास करते थे । अस्तान ( जो कि पुराण में ' बनायु ' नाम से प्रसिद्ध है ) ६ खण्डों में विभक्त माना गया है । इनमें एक खण्डविशेष ही यूनान कहलाया है । त्रिपुत्र साख्यायन के वंशज, आमुरधर्मानुयायी, अतएव ' असुर ' नाम से प्रसिद्ध ' हेलि ' नामक असुर यहीं निवास करते थे । इनके निवास से ही यह वनायुग्वण्ड ( अखण्ड ) यवन ( यूनान ) देश कहलाया । कालान्तर में अत्रों की आदि जाति ने यवनों को युद्ध में परास्त किया । पराजित यवनों ने खण्ड को छोड़ कर जिस पाश्चात्य प्रदेश ( ग्रीक ) को अपनी श्राश्रयभूमि बनाया, वही यूनान नाम से व्यवहृत हुआ । कालातिक्रमण से अखण्डात्मक यूनान आज विस्मृत हो गया है, कल्पित यूनान यूनान माना जाने लगा है । वास्तविक यूनान ही पाश्चात्य भाषा में आज ' पोलेस्टाइन ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं यह वर्त्तमान युनानियों ( ग्रीक निवासियों ) का तीर्थस्थान माना जाता है । कालनेमि मय, श्रादि सुप्रसिद्ध यवनामुर यहीं निवास करते थे । सुप्रसिद्ध ज्योतिर्वित् वराहमिहिर ने यहीं आकर मयासुर से आसर ज्योतिष की शिक्षा ग्रहण की थी । यवनवंश के सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, वर्तमान परिभाषा में यवन शब्द से जिस जातिविशेष का ग्रहण किया जाता है, उसका उस प्राक्तन यवनवंश से कोई सम्बन्ध नहीं है । जिसे आज ‘ ईरान ' कहा जाता है, वही हमारा मुप्रसिद्ध ' आर्य्यायण ' है । एवं जिसे आज ' हिन्दूस्तान ’ कहा जाता है, बही ‘ आर्य्यावर्त्त ' है । एवं श्रयिण, तथा आय की समष्टि ' भारतवर्ष ' है । श्राय्यवर्त्त पूर्व भारत है, आार्थ्यायण पश्चिम भारत है । भारतीय भुवनकोश से अणुमात्र भी परिचय न रखने वाले जो राजनैतिक भौगोलिक सिन्धु - नद को भारतवर्ष की पश्चिम सीमा बसलाते हुए भारतांशभूत ग्राण को पृथक् मान रहे हैं, वह नितान्त भ्रान्ति ही मानी जायगी, अथवा तो नैतिक- कौशल माना जायगा । भारतीय वर्षात्मक भुवनकोश के अनुसार भारतवर्ष ६० अंश पय्यन्त अपनी व्याप्ति रखता है । पीतसमुद्र ( चीन का यलोसी ) भारतवर्ष की पूर्व सीमा है, एवं महीसागर नाम से प्रसिद्ध पश्चिम समुद्र ( मेडिट्टे नियन्सी ) पश्चिम सीमा है । यही ६० श्रंशात्मक भारतवर्ष है, जो श्राज हमारी उदासीनता से अपना आधा अङ्ग खो चुका है * । * प्रस्तुत ग्रन्थप्रकानात्मक वर्तमान दुर्भाग्यपूर्ण युग में तो उस खण्डात्मक भारत के भी हमारी भाव-कता से अनेक कल्पित खण्ड हो चुके हैं । ३३५
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भाष्यभूमिका ऋज्राश्व ऋषि के दौहित्र, पारसीमत के प्रवर्तक, छन्दोभ्यस्ता की तुलना में ' जन्दावस्ता ' का. निर्माण करने वाले जरथुस्त्र ही इस अङ्ग भङ्ग के कारण बने । वारुण, तथा ऐन्द्र - ब्राह्मणों की प्रतिस्पर्द्धा से विधवाविवाह के प्रश्न के आधार पर घोर जातीय कलह का बीजवपन हुआ । वरुण ब्राह्मण जहाँ इस आसुर कर्म के पक्ष में थे, वहाँ ऐन्द्र ब्राह्मण विपक्ष में थे । इस विवाद को शान्त करने के लिए ब्रह्मा ने सिन्धुनद को माध्यम बनाते हुए भारतवर्ष के दो विभाग कर डाले । सिन्धु से उस पार रहने वाले पारस्थानी कहलाये, वे ही ' पारसी ' नाम से प्रसिद्ध हुए । इस दृष्टि से सिन्धुनद यद्यपि हिन्दुस्थान की सीमा मानी जा सकती है, तथापि इसे भारत सीमा कहना कथमपि न्यायसंगत नहीं माना जा सकता । उक्त भौगोलिक परिस्थिति से बतलाना यही है कि, भारतवर्ष की अन्तिम पश्चिम सीमा महीसागर है । यही उस युग में स्वर्गसन्धि का उपक्रम स्थान था । यहीं से भौम अन्तरिक्ष का आरम्भ माना जाता था । यहीं हमारे चरितनायक भौम अत्रि को वह सुप्रसिद्ध त्रिपत् थी, जहाँ पारदर्शकता प्रतिबन्धक, धामच्छद, प्रजोत्पादक, ग्रहणप्रवर्त्तक, त्रिप्राण की परीक्षा होती थी । सुप्रसिद्ध वेदवित्महर्षि ' वाय ' की ब्रह्मपर्षत् भी यहीँ प्रतिष्ठित थी । इस पर्श्वत् ने किसी प्राण का प्रथमाविष्कार नहीं किया था, अपितु इसमें श्राविष्कृतप्राणों के स्वरूप की मीमांसा ही हुआ करती थी । ( ४ ) -शिविपर्पत-गुजरात के सुप्रसिद्ध ' काठियावाड़ ' में यह पर्वत् प्रतिष्ठित थी । इसके ब्रह्मा ( कुलपति ) राजत्रिं ' शिवि ' थे । ( ५ ) - पित्-पञ्चनद ( पञ्जाब ) प्रदेशस्थ त्रिगर्त्तदेश में अङ्गिरात् प्रतिष्ठित थी । यहाँ प्रधानतः अङ्गिराप्राण की परीक्षा होती थी । अङ्गिरा, वृहस्पति, सम्वर्त, उतथ्य, आदि अङ्गिराप्राण के २१ अवान्तर विवर्तों के आविष्कार का श्रेय इसी पर्वत् को प्राप्त हुआ था । ( ६ ) - याज्ञवल्क्यपर्षत्-मिथिलानगरी में एक स्थान ' जयन्तपुर ' है । यही जयन्तपुर आज ' जनकपुर ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । इसी जनकपुर के समीप अरण्यदेश में ' धनुषा ' नामक स्थान है । यहाँ एक धनुषाकार पाषाणखण्ड प्रतिष्ठित है । यह भगवान् रामचन्द्र के द्वारा भङ्ग धनुष की प्रतिकृति मान कर पूजा जाता है । एवं इसी के सम्बन्ध से यह स्थान ' धनुषा ' कहलाया है । इसी आरण्य प्रदेश में याज्ञवल्क्यवर्षत् प्रतिष्ठित थी । ' सीरध्वज ' नामक राजर्षि जनक इसी स्थान पर समय समय पर याज्ञवल्क्य के दर्शनार्थ आया करते थे । यद्यपि याज्ञवल्क्य किसी स्वतन्त्र ऋषिप्राण के परीक्षक न थे, तथापि अपने समय के अनन्य वैज्ञानिक होने से इनकी भी पत् का महत्त्व मान लिया गया था । ( ७ ) –उद्दालकपर्षत्— महाराज मिथि के कुलपुरोहित उद्दालक भी अपने समय के उच्चकोटि के विद्वान् थे । सुप्रसिद्ध ' सदानीरा ' नाम की वह नदी जो कोसलविदेद्दों की मर्य्याद । मानी जाती है, के समीप उद्दालक पर्वत थी । ३३६