Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 351–360
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 351–360
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तृतीयखण्ड ( ८ ) - प्रावाहरिणपर्वत-की पाञ्चाल देशान्तर्गत कन्नौज में प्रवाहरिण के पुत्र, श्रतएव प्रावाहणि नाम से प्रसिद्ध राजर्षि ' चचर ' थी । ( २ ) - अश्वपतिपत् पञ्चनद प्रदेशस्थ केकयदेशाधिपति, अतएव ' केकय ' उपनाम से प्रसिद्ध राजर्षि अश्वपति ही इस पर्षत् के कुलपति थे । ( १० ) - प्रतर्द्दनपर्यंत्-काशीराज राजर्षि प्रतद्दन हो इस पर्वत् के ब्रह्मा थे । उक्त पर्षदों में ब्रह्मर्षि, राजर्षि ही कुलपति थे, एवं ये ही दीक्षित शिष्य थे । इस परम्परा में भी हमारी उस अधिकारमय्र्यादा का भलीभांति समर्थन हो रहा है, जिसका संस्कृत द्विजातिबर्गा से सम्बन्ध है । यत्र पिप्पलादसम्मता अधिकार मर्यादा की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ७- पिप्पलादसम्मता अधिकारमय्र्यादा-अधिकारी -स्वरूप का सङ्केतभाषा में भगवान् पिप्पलाद ने बड़ी ही सुन्दर विश्लेषण किया है । यद्यपि काप्य, याज्ञवल्क्यादि की भाँति भगवान् पिप्पलाद की कोई स्वतन्त्र ब्रह्मपत् न थी । तथापि विशेषतः फलाशन करते हुए कठिन तपोयोग के प्रभाव से ' पिप्पलाद ' नाम से प्रसिद्ध होने वाले ये महर्षि तत्कालीन सभी ब्रह्म-पर्षदों के ब्रह्माओं में अप्रणी समझे जाते थे 1 । इनकी ख्याति यहाँ तक बढ़ गई थी कि, सुकेशा भारद्वाज, शैव्य सत्यकाम, सौर्ष्यायणी गार्ग्य, कौशल्य श्राश्वलायन, भागर्व वैदर्भि, कबन्धी कात्यावन, प्रारुणि उद्दालक, जैसे उच्चकोटि के परम वैज्ञानिक भी समय समय पर शिष्यभाव से इनकी सेवा में उपस्थित होते रहते थे, एवं अपने संशयों का निराकरण करते रहते थे । इन्हीं महर्षि पिप्पलाद ने अपनी सुप्रसिद्ध प्राणोपनिषत् ( प्रश्नो-पनिषत् ) के आरम्भ में हीं अधिकार - मर्य्यादा का विश्लेषण किया है । उसी का संक्षिप्त स्वरूप प्रकृत परिच्छेद में स्पष्ट किया जा रहा I ' द्वे घाव ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म, परं च यत् ' के अनुसार ब्रह्मविद्या के परब्रह्म, शब्दब्रह्म, भेदं से दो विवर्त्तमानें गए हैं । तत्त्वविद्या परब्रह्मविद्या है, तत्त्ववाचक - शब्दविद्या शब्दब्रह्मविद्या है । ऐतरेय -माण्डूक्यादि कुछ एक उपनिषदों को छोड़ कर प्रायः इतर सभी उपनिषदों में प्रधानरूप से परब्रह्मविद्या का ही विश्लेषण हुआ है, जैसा कि तत्तदुपनिषद्भाष्यों से स्पष्ट है । प्रतिपाद्य परब्रह्म के ' पर अवर ' भेद से दो विवर्त्त ' हैं । स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, पाँचों विश्वपयों की समष्टिरूप ' ब्रह्मसत्य ' नाम से प्रसिद्ध विकारकूट ( संघ ) लक्षण क्षरतत्त्व ' अवरब्रह्म ' है । दूसरे शब्दों से पाञ्चभौतिक विश्वविद्या अवरब्रह्मविद्या है, विश्वप्रविष्ट - विश्व श्वरविद्या परब्रह्मविद्या है । दब्रह्मविद्या कर्ममधाना, है, परब्रह्मविद्या ज्ञान-प्रधाना है । जो व्यक्ति अवरब्रह्मं के स्वरूप ( विश्वात्मक कम् प्रपञ्च ) को भलीभांति समझ लेता है, वही ज्ञान-प्रधान इस परब्रह्ममूलक औपनिषद तत्त्वज्ञान का अधिकारी बन सकता है । पिप्पलाद के समीप जिज्ञासाभाव ३३७
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भाष्यभूमिका से आए हुए भारद्वाजादि ६ श्र विद्वानों ने इसी परब्रह्म - ज्ञान की जिज्ञासा प्रकट की थी । वे कर्म्मप्रधान वर का यथार्थस्वरूप अवगत करने के अनन्तर ही परब्रह्मलक्षण श्रोपनिषद ज्ञान की ओर श्राकपित थे । न केवल आकर्षित ही हुए थे, अपितु अपनी जिज्ञासा को काय्यंरूप में परिणत करने के लिए सन्नद्ध हो गए थे । न केवल सन्नद्ध ही हुए थे, अपितु उसे खोजने के लिए उसी जिज्ञासा को प्रधान लक्ष्य बनाते हुए अपने अपने श्राश्रमों से निकल पड़े थे । न केवल निकल ही पड़े थे, अपितु अपनी इस सच्ची लगन के प्रभाव से उन्होंनें पिप्पलाद जैसा तत्त्वज्ञ श्राचार्य्य भी प्राप्त कर लिया था, जहाँ इनकी जिज्ञासा का यथावत् समाधान हुआ । परब्रह्म की ओर झुकना, दूसरे शब्दों में तद्विषयिणी जिज्ञासा करना प्रथमाधिकार है । जिसमें जिज्ञासा नहीं, वह प्रोपनिषद ज्ञान का तो क्या, सामान्यज्ञान का भी अधिकारी नहीं माना जा सकता । जिज्ञासावृत्ति पहिली, तथा मुख्य अधिकारमर्य्यादा है, जिसका ' ब्रह्मपरा: ' शब्द से विश्लेषण हुआ है । जिज्ञासा करके ही यदि हम शान्त हो गए, तो जिज्ञासाधिकार सर्वथा व्यर्थ है । जिज्ञासा हुई, उस पर अनन्य भाव से आरूढ़ हो गए । जब तक जिज्ञासा का समाधान नहीं हो जाता, तत्र तक अध्यात्मसंस्था अशान्त है, कुछ नहीं सुहाता । यह जिज्ञासानन्यता ही दूसरी अधिकारमर्य्यादा है, जिसका ' ब्रह्मनिष्ठाः ' शब्द से विश्ले-हुआ है । जिज्ञासा हुई, तन्निष्ठ भी बनें, परन्तु प्रयास न किया, खोज न की, तत्र भी काम नहीं चल सकता । अपनी तन्निष्ठता की पूर्ति के लिए हमें विजिज्ञास्य की प्राप्ति के लिए कटिबद्ध हो जाना पड़ेगा, उसकी खोज में लग जाना पड़ेगा । एवं यही तीसरी अधिकारमर्यादा कहलाएगी, जिसका ' परं ब्रह्मान्वेषमाणाः ’ शब्द से विलेषण हुश्रा है । श्रात्मसमर्पण ही उक्त त्रिपर्वा अधिकारमय्र्यादा का मौलिक रहस्य है । श्रात्मा का सर्वतोभावेन त्याग करने वाला ही इस ज्ञान का अधिकारी माना जा सकता है । आत्मा की ' मनः प्राण - वाक् ' भेद से तीन कलाएँ सुप्रसिद्ध हैं । जिज्ञासालक्षणा प्रथमाधिकारमर्यादा का मन से सम्बन्ध है, जिज्ञासानिष्ठालक्षणा द्वितीयाधिकार-मर्य्यादा का प्राण से सम्बन्ध है, एवं अन्वेषणलक्षणा तृतीयाधिकारमर्थ्यादा का वाक् से सम्बन्ध है । इच्छा प्रथम व्यापार है, तदनुकूल अन्तः प्रयत्न करना तपोलक्षण कर्म्म द्वितीय व्यापार है, एवं शरीरव्यापारलक्षण श्रम तृतीय व्यापार है । प्राप्तव्य परब्रह्म सत्य है, तदंशभूत प्राप्तकर्त्ता जीवात्मा भी सत्य है । एवं यह सत्य उस सत्यस्य सत्यं ज्ञानं को तभी प्राप्त कर सकता है, जबकि, यह अपने श्रात्मसत्य को ' यावदनु मनः - तदनु प्राणः-तदनुगता वाक ' लक्षणा सत्यव्यापारत्रयी का अनुगमन करे । ' ब्रह्मपरा: ' मानस व्यापार है, ' ब्रह्मनिष्ठाः ' प्राण व्यापार है, ' परंब्रह्मान्वेषमाणाः ' वाग्व्यापार है! तृतीय व्यापार के अनन्तर ' जिन ढूँढा तिन पाइया गरे पानी पैठ के अनुसार अवश्य ही तत्त्वदर्शी उपदेष्टा का आश्रय प्राप्त हो जाता है । इसी फलभाव को व्यक्त करने के लिए- ' भगवन्तं पिप्लादमुपसन्नाः ' यह कहा गया है । यही वास्तविक अधिकारमर्य्यादा है, जिसका निम्न लिखित श्रुतिद्वारा सङ्केतविधि से स्पष्टीकरण हुआ है—
* मैं बौरी ढूँढन गई रही किनारे बैठ ।
जिन ढूँढा तिन पाइया गहरे पानी पैठ ॥
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तृतीयखण्ड " सुकेशा च भारद्वाजः, शैव्यश्च सत्यकामः, सौर्य्यायणी च गार्ग्यः, कौशल्यश्वाश्व-लायनः, भार्गवो वैदर्भिः, कबन्धी कात्यायनः, ते हैते ब्रह्मपराः ( संकल्पपराः ), ब्रह्मनिष्ठाः ( अध्यूढ़ाः ), परंब्रह्मान्वेषमाणाः ( कृतप्रयत्नाः ) - ' एष वै तत् सर्वं वच्यति ' इति ( निश्चित्य ) ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः " ( प्रश्नोपनिपत् १।१ । ) । यदि तज्ज्ञानजिज्ञासा है, तज्ज्ञाननिष्ठा है, साथ ही तज्ज्ञानोपदेशान्वेषणकर्मप्रवृत्ति है, तो ऐसा व्यक्ति अवश्यमेव औपनिषद ज्ञान का अधिकारी माना जायगा, एवं ऐसी सच्ची लगन वाले को अवश्यमेव गुरु मिल जायगा । गुरु के सम्बन्ध में श्रुति ने परोक्षभाषा में थोड़ा संकेत किया है । पहिले यह निश्चय कर लेना भी आवश्यक है कि, कौन गुरु हमारी जिज्ञासा का यथावत् समाधान कर सकता है? । हठात् चाहे जिसे गुरु बना लेना आगे जाकर परिताप का कारण होता है । अयोग्य गुरु भी गुरु है, अतएव उसके प्रति प्रयत्न-पूर्वक श्रद्धा रखना आवश्यक कर्म्म है, जो कि कर्म्म कष्टसाध्य है । इस विप्रतिपत्ति से बचने के लिए, अश्रद्धा-जति प्रत्यवाय से बचने के लिए पहिले से ही अपने अन्तरात्मा में अन्वेषण के द्वारा यह निश्चय कर लेना चाहिए कि, अमुक गुरु ही हमारी जिज्ञासा शान्त कर सकता है । इसप्रकार शिष्य यदि ब्रह्म - पर, ब्रह्म-निष्ठ, ब्रह्मान्त्रेप्रमाण होना चाहिए, तो गुरु- ' एष वै तत् सर्वं वक्ष्यति ' लक्षण होना चाहिए । उक्त लक्षण शिष्य जहाँ अध्ययन का अधिकारी है, वहाँ उक्त लक्षण गुरु अध्यापन का अधिकारी माना गया है । इसप्रकार श्रुति ने दोनों की अधिकारमर्य्यादाओं का विश्लेषण कर दिया है । प्राणविद्या ही वेदविद्या है, वेदविद्या ही ब्रह्मविद्या है, यह कहा जा चुका है । वेदतत्त्वात्मक यह प्राणर्षि आध्यात्मिक संस्था में प्रादेशमित प्रदेश में अपनी व्याप्ति रखता है । ' स भूमिं सर्वतस्प्रत्वात्य तिष्ठद-शाङ्गलम् ' के अनुसार १० || ङ्गलात्मक परिमाण है । ' प्रादेश ' है । प्रत्येक शारीरप्राण - ' प्रादेशमितो वै प्राणः ' ( कौ ० ब्रा ०२।२ । ) के अनुसार प्रादेशपरिमाण से समतुलित है । प्रदेशमित यह प्राणाग्नि - ‘ प्राण।ग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाप्रति ' ( प्रश्नो ०४ | ३ | ) के अनुसार इस प्राध्यात्मिक पुर ( पाञ्चभौतिकशरीर ) में सदा जागता रहता है । प्राणाग्नि- अग्नि है, अग्नि गायत्री छन्द से छन्दित है, गायत्रीछन्द अष्टाक्षर है । इस अष्टाक्षर गायत्री छन्द के सम्बन्ध से गायत्राग्निप्रारण की आाट संस्था हो जाती है । दूसरे शब्दों में ब्रह्मरन्ध्र से आरम्भ कर पाद पर्य्यन्त व्याप्त प्राणाग्नि के आठ स्वतन्त्र संस्थान हैं । ब्रह्मरन्ध्र से कण्ट पर्य्यन्त प्रथम प्रादेश है, कण्ट से हृदयपर्य्यन्त द्वितीय प्रादेश है, हृदय से नाभिपर्य्यन्त तृतीय प्रादेश है, नाभि से ब्रह्मग्रन्थिपर्यन्त चतुर्थ प्रादश है, ब्रह्मग्रन्थि से पाद पर्य्यन्त ४ प्रादेश हैं । सम्भूय आठ प्रादेश हो जाते हैं । प्रत्येक प्रादेश में प्रादेश -मित, अक्षरात्मक एक एक गायत्राग्निप्राण प्रतिष्ठित है । प्रत्येक की व्याप्ति १० || अङ्गुलमित है | इसप्रकार गायत्री के सम्बन्ध से अष्टप्रादेशात्मक पाञ्चभौतिक शरीर का मान ८४ अङ्ग लात्मक हो जाता है । प्रत्येक प्राणी अपने हाथों की अन ली के नाम से चतुरशीति ( ८४ ) अङ्ग लिमित है । इन आठों प्राणों में नाभि से हृदयपर्यन्त व्याप्त रहने वाला, व्यान सहयोगी गायत्रप्राण सत्र प्रधान है । व्यानप्राणात्मकता ही इसकी प्रधानता का मूलकारण है । हृदयावच्छिन्न व्यानप्राणात्मक गायत्रप्राण, किंवा गायत्रप्राणावच्छिन्न हृदयस्थ व्यानप्राण ही जीवनसूत्र की मूलप्रतिष्ठा है, जैसा कि -'मध्ये वामनमासीनम्'- ' इतरेण तु जीवन्ति ' इत्यादि उपनिषद्वचनों से प्रमाणित है । ३३६
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भाण्यभूमिका इसी हृद्य प्राण के आधार पर सर्वेन्द्रिय- श्रनिन्द्रिय -लक्षण प्रज्ञानघन मन प्रतिष्ठित है । मन के आधार पर विज्ञानघना बुद्धि प्रतिष्ठित है । सूर्योपादानमूलभूता श्रतएव अग्निसमतुलिता इसी बुद्धि में, किंवा विज्ञानज्ञानाग्नि में विद्यात्मक सोम की आहुति होती है । दूसरे शब्दों में हृय प्राणावच्छिन्न- प्रादेश मित - विज्ञान-सम्परिष्वक्त - प्रशान मन पर ही विद्यात्मक संस्कार प्रतिष्ठित होता है । इस विद्याहुति से आध्यात्मिक प्राण प्रज्वलित हो पड़ता है । साधारण - यथाजात - लौकिक मनुष्यों का शारीराग्नि नहीं केवल लौकिक - भूतात्मकः-अन्नाहुति से सबल बना रहता है, वहाँ विद्वानों का प्राणाग्नि दिव्यान्नलक्षण वेदतत्त्व, तथा यज्ञातिशय मे प्रज्वलित रहता है । भूताग्नि का प्रज्वलन भूतान्नाहुति से सम्बद्ध है, प्राणाग्नि का प्रज्वलन दिव्यान्नाहुति से सम्बद्ध है । भूताग्निका प्रज्वलन कर्म इन्धन ' है, प्राणाग्निका प्रज्वलन कर्म्म समिन्धन है । भूताग्नि में सामान्य काष्ट डाल कर इसे प्रज्वलित करना इन्धन कर्म है । एवं इसी भूताग्नि में आधाररूप से प्रतिष्ठित प्राणाग्नि में तदनु-रूप मन्त्रद्वारा प्राणपरिमित ( प्रादेश मित ) समिधाहुति डालना समिन्धन कर्म है । इन्धन भूत का होता है, समिन्धन प्राण का होता है । इन्धन सामान्य परिमाणशून्य काष्ट से होता है, समिन्धन मन्त्रपूत - दिव्यप्राणु-युक्त प्रादेशमित काष्ठ से होता है । सामान्य काष्ट ' इध्म ' नाम से व्यवहृत हुआ है, अलौकिक प्राणभावापन्न काष्ट ' सामिधेनी ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इसी सामिधेनी - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है-“ इन्धे हवा एतदध्वर्यु ': - इध्मेनाग्नि, तम्मादिध्यो नाम । समिन्धे सामिधेनीभि-होता, तम्मात् सामिधेन्यो नाम " ( शत ०२ | ४ | २ | १ | ) | “ यो ह वा अग्निः सामिधेनीभिः समिद्धः, अतितरां - ह स इतरस्मादग्नेस्त-पति, अनवधृष्यो हि भवति, अनवमृश्यः " ( शत ० १ | ४ | ३ | । १ ) । * । प्रादेशमित सामिधेनी ( एतन्नामक काष्ठ ) उस प्रादेशमित हृद्य प्राण की प्रतिकृति है, प्रतिमान है । शिष्य अपने प्रादेशमित इस प्राणाग्नि को गुरु के प्रादेशमित हृद्य श्रात्मा से निकली हुई विद्यासंस्काराहुति -लक्षणा सामिधेनी से प्रज्वलित करने के लिए ही गुरु की सेवा में उपस्थित होता है । दूसरे शब्दों में विद्या के द्वारा यह अपने प्रादेशमित प्राणाग्नि को ही विद्यास ंस्कार से समिद्ध करना चाहता है । " मैं विद्यात्मिका सोमा-हुति से अपने प्रदेशमित प्राणाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए उपनीत हुआ हूँ " अपनी इसी जिज्ञासा को परोक्षविधि से प्रकट करने के लिए शिष्य प्रादेशमित समिधा हाथ में ले कर है । गुरु के समीप पहुँचता है । प्राचीन परिपाटी के अनुसार जिस किसी को गुरु का शिष्यत्त्व स्वीकार करना होता था, अथवा सामान्यतः अपनी सन्देहनिवृत्ति अभीष्ट होती थी, वह अपने मुख से आरम्भ में अपना शिष्यत्त्व प्रकट नहीं करता था । अपितु अपनी इस शिष्यवृत्ति के प्रकाशन के लिए वह समित्पाणिः बन कर हो उपस्थित होता था । भावी गुरु का अभ्युत्थानादिलक्षण सत्कार भावी शिष्य का अमङ्गल कर सकता है, इसलिए, साथ ही प्राणसमि-न्नाभिव्यक्ति के लिए समित्पाणि जन कर उपनीत होना ही विज्ञानसम्मत मार्ग है । * इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन शतपथविज्ञान माध्यान्तर्गत उक्त ब्राह्मणभाष्य में देखना चाहिए । ३४०
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तृतीयखण्ड अपिच समित्पाणि बन कर उपनीत होना उस अधिकारमर्थ्यादा का भी पोषक बन रहा है, जिसका संस्कार - संस्कृत द्विजातिवर्ग के साथ अनन्य सम्बन्ध बतलाया गया है । पलाश ब्रह्मवीर्य्यप्रधान है, खदिर काष्ट क्षत्रवीर्यप्रधान है, एवं उदुम्बर ( गूलर ) काष्ट विड्वीर्य्यप्रधान है । जिस प्रकार सावित्री दीक्षाकाल ( यज्ञोपवीत स ंस्कारकाल ) में ब्राह्मण सजातीय पलाशदण्ड का, क्षत्रिय खदिरदण्ड का, एवं वैश्य उदुम्बरदण्ड का ग्रहण करता है, एवमेव उपनीत दशा में भी तीनों वर्ण क्रमशः पलाश - खदिर - उदुम्बर की प्रादेशमित समिधा को लेकर ही गुरु के समीप उपस्थित होते हैं । गुरु इस समित् - स्वरूप से ही यह जान लेते हैं कि, शिष्य अमुक वर्ण का अधिकारी है । समित् - स्वरूप के अतिरिक्त योग्य गुरु भावी शिष्य के बाह्य स्वरूप के आधार पर भी इस बात का निश्चय कर लेते हैं कि, यह अधिकारी है, यह अधिकारी नहीं है । वर्णानुगत, वर्णस्वरूपपरिचायक समित् - काठ के रहते भी मनोविज्ञानसम्मत पुरुषपरीक्षा में ऋषि को वर्णविपर्यय का यदि थोड़ा भी सन्देह हो जाता है, तो तत्काल ' किं गोत्रोऽसि '? प्रश्न हो पड़ता है । चतुष्पाद ब्रह्म के तात्त्विक रहस्यवेता जत्रालापुत्र सत्यकाम की उत्पत्ति से सम्बन्ध रखने वाली किसी दोषवृत्ति से इनका स्वाभाविक ब्रह्मवीर्य्य दोषाक्रान्त था । जब ये समित्पाणि न कर महर्षि गौतम के समीप पहुँचे, तो गौतम को पुरुषपरीक्षा के आधार पर इनके अाधिकारिक वर्ण पर सन्देह हो गया । तत्काल प्रश्न कर बैठे - ' किं गोत्रोऽसि । अन्त में परिस्थितिवश उत्पन्न वीर्य्य-दोषनिवृत्ति के लिए गुरु का जो आदेश मिला, वह भी वर्तमानयुग के अधिकारलिप्सु महानुभावों के लिए मननीय है । आदेश ही क्या, वहाँ का पूरा कथानक ही भारतीय महर्षि, तथा भारतीय साहित्य की ज्ञानसम्मत उदारता का परिचय दे रहा है । घटना यों घटित हुई— १ –'सत्यकाम ने अपनी जबाला माता को सम्बोधन करते हुए यह प्रश्न किया कि, मैं विद्याध्ययन करने के लिए गुरु - दीक्षा लेना चाहता हूँ । ( दीक्षाधिकार के लिए द्विजाति-मर्यादा आवश्यक है ), इसलिए मैं यह जानना चाहता हूँ कि, मेरा गोत्र ( कुल ) क्या है? २ – भारत की उस पवित्रहृदया जबाला ने उत्तर दिया - पुत्र! तेरा क्या गोत्र है, यह मैं नहीं जानती । युवावस्था में इतस्ततः अनुधावन करते हुए मैंने तुझे प्राप्त किया है । मैं नहीं जानती ( तू किसका पुत्र है, एवं ) तेरा क्या गोत्र है । इस सम्बन्ध में मैं यही कह सकती हूँ कि, मेरा नाम जबाला है, तेरा नाम सत्यकाम है ( अर्थात् तेरा पितृवंश --- " सोऽयं प्रजानामुपद्रष्टा प्रविष्टः, ताविमौ प्राणोदानौ । तस्मादाहुः - मनो देवा मनुष्यस्याजानन्ति - इति । मनसा संकल्पयति, तत् प्राणमपिपद्यते, प्राणो बानं, वातो देवेभ्य आष्टे यथा पुरुषस्य मनः । तस्मादेतदृषिणाभ्यनूक्त – मनसा संकल्पयति तंद्वातमपिगच्छति । वातो देवेभ्य चष्टे यथा पुरुष ते मनः ॥ ( शत ० ३।४।२।६,७, ) । ३४१
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भाष्यभूमिका विदित है ) | तू जिस गुरु के सभ प जाय, यहाँ यही कह देना कि, भगवन्! मेरा नाम सत्यकाम है, मेरो माता का नाम जबाला है । ३ - ४ - सत्यकाम समित्पाणि बन कर ( पलाशसमिन लेकर ) महर्षि गौतम के आश्रम में आने हैं । वहाँ आकर अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं । गौतम देखते हैं कि, इसके हाथ में पालाशी समिन् है | प्रतीत होता है, ' यह ब्रह्मवीर से ही समुद्भुत है ' । परन्तु वाह्यस्वरूप सूचित करता है कि, अवश्य ही इसके ब्रह्मवीर्य में कुछ न कुछ दोष है । फलतः समिन-प्रहण करना ( शिष्य बनाना ) अनुचित है । यह निश्चय कर गौतम प्रश्न करते हैं - हे प्रिय! तुम्हारा क्या गोत्र है? । सत्यकाम उत्तर देता है भगवन! मैं नहीं जानता । माता से पूँह्रा था, परन्तु उसने कहा, मैंने युवावस्था में तुझे किसी से प्राप्त किया है । विदित नहीं, नृ किस गोत्र का है । इसलिए भगवन! मैं नहीं जानता कि, मैं किस गोत्र का हूँ । मैं इम सम्बन्ध में अपना माता के आदेशानुसार यही कह सकता हूँ कि, मेरा अपना नाम तो सत्यकाम है, एवं जबाला का मैं पुत्र हूँ " । ५ - सत्यकाम की सत्यनिष्ठा से, निष्कपट इस विशुद्ध उति से ऋषि गद्गद हो जाते हैं । और कहने लगते हैं - सत्यकाम! अपने गोत्र के सम्बन्ध में तूने जो स्पष्टीकरण किया है, वह एकमात्र ब्रह्मवीर्ध्य का ही फल है । अवश्य ही तू जन्मत: ब्राह्मण है । क्योंकि अब्राह्मण व्यक्ति अपनी उत्पत्ति के सम्बन्ध में ऐसा स्पष्टीकरण नहीं कर सकता । मैं समिन लेकर तुझे शिष्य बनाता हूँ । ६ - गौतम ने शिष्य तो बना लिया । परन्तु अभी इसका ब्रह्मवीर्य्य असंस्कृत था, एवं संस्कृत द्विजाति ही ब्रह्मविद्या में अधिकृत है । अतएव उपदेश से पहले गौतम ने वीर्य्यशुद्धि आवश्यक समझी । फलस्वरूप आदेश हुआ कि सत्यकाम! इन दुबली पतली ४०० गायों को अपने साथ लेकर चले जाओ । जब तक इनकी संख्या एक सहस्र ( १००० ) न हो जाय, तब तक वापस न लौटना ": ( छा ० उ ० ४ । ४ । ) । गोपशु का सूर्य से सम्बन्ध है । उधर ब्रह्मात्मिका वेदविद्या का भी पूर्व में सूर्य से सम्बन्ध बतलाया गया है । जिस सोरतत्त्व से आत्मविकास होता है, वही सौरतत्त्व गोपशु में प्रतिष्ठित है । गौ का पादरन, गोमय, गोमूत्र, दर्शन, स्पर्श, सेवा हमारा क्या अभ्युदय नहीं कर सकती । कम से कम वेदस्वाध्यायप्रेमियों के लिए तो गोसेवा एक आवश्यक कर्म माना जायगा । जिन्हें वेदतव हृदयङ्गम करने में कठिनता प्रतीत हो, वे गोसेवा भी इस सम्बन्ध में एक प्रकार का चिकित्साकर्म मानने का अनुग्रह करें । * - क्या ऐसा स्पष्ट कथन अन्य साहित्य में उपलब्ध हो सकता है?, पाटक मुकुलितनयन बन कर विचार करें, और रोमहर्ष का अनुगमन करें । : गोसेवा से वीर्य्यगत दोष हट जाते हैं, आरंमा पवित्र, तथा मेध्य बन जाता है, जैसाकि अन्यत्र निरूपित है । ३४२
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तृतीयखल्ल वर्णानुगता अधिकारमर्य्यादा को लक्ष्य में रख कर ही ' ते इ समित्पाणय: ' -'किं गोत्रोऽसि ’ इत्यादि वचन उद्धृत हुए हैं, यही वक़व्यांश है । प्रश्न होता है कि, क्या अधिकारमर्यादा का यहीं विश्राम है?, नहीं । अभी ब्रह्मपरादि लक्षण द्विजाति अधिकारी के लिए कुछ एक अधिकारमर्य्यादाएँ और पेक्षित हैं । ब्रह्मपराः - ब्रह्मनिष्ठाः - परंब्रह्मान्वेषमाणाः- ये तीनों अधिकारमर्य्यादाएँ कार्य्यस्थानीया हैं । एवं बसलाई जाने वालीं तीन अधिकारमर्यादाएँ कारणस्थानीया हैं । जब सुकेशादि विद्वान् समित्पाणि बन कर पिप्पलाद की सेवा में पहुँचते हैं, तो पिप्पलाद उन्हें उत्तर देते हैं— " तान् ह स ऋषिरुवाच— भूय एव तपसा, ब्रह्मचर्येण, श्रद्धया - सम्वत्सरं सम्वत्स्यथ । यथाकामं प्रश्नान् पृच्छथ । यदि विज्ञास्यामः, सर्व वो वच्यामः ” ( प्रश्नो ० १।२ । ) । ब्रह्मविद्यात्मक संस्कार की प्रतिष्ठा के लिए नहीं ब्रह्मपर - ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मान्वेषणवृत्यनुगमन - अपेक्षित है, बहाँ इन तीनों धम्मों की प्रवृत्ति, तथा रक्षा के लिए तप, ब्रह्मचर्य्यं, श्रद्धा, इन तीन ग्रात्मधम्मों का अनुगमन करना भी आवश्यक हो जाता है । बिना इस त्रयी के वह नवी कथमपि स्वस्वरूप से सुरक्षित नहीं रह सकती । श्रतएव इसे हमनें कारणस्थानीया कहा है, एषं उसे कार्यस्थानीया माना है । श्रात्मा मनः-प्राण - वाङ्मय है, यह बतलाया गया है । ' नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ' के अनुसार निर्बल आत्मा में न तो ब्रह्मजिज्ञासा सम्भव है, न तदनुकूल अन्तर्व्यापार सम्भव है, एवं न तदनुकूल बहिर्व्यापार सम्भव | आत्मा को, किंवा आत्मकलाओं को बलवान् बनाने वाले ब्रह्मचर्य्यादि तीन साधन मुख्य मानें गए हैं । ब्रह्मचर्थ्य वागभाग में बाधान करता है, तप प्राणभाग में बलाधान करता है, एवं श्रद्धा मानसक्षेत्र को घलवान् बनाती है । ठीक इसके विपरीत घ्यभिचारप्रवृत्ति घागूभाग को, श्रान्तस्य - श्रकर्म्मण्यता प्राणभाग को, तथा अश्रद्धामूलक श्रसत्यभाग मनोभाग को निर्बल बनाता है । ऐसा निर्बल आत्मा दोषयुक्त है, अतिशय से रहित है, होना है, अतएव प्रसंस्कृत रहता हुआ विद्यासंस्कारग्रहरण के लिए प्रयोग्य है । ब्रह्मचर्य्य दोषमार्जनलक्षण शोधक संस्कार है, तपःकर्म्म अतिशयाधानलक्षण विशेषक संस्कार है, एवं श्रद्धा ( सत्यत्वधारण ) हीनाङ्गपूर्तिलक्षण पूरक संस्कार है । श्रद्धासंस्कार से संस्कृत मन ब्रह्मजिज्ञासा का प्रवर्त्तक बनता हुआ जिज्ञासु को ' ब्रह्मपर ' बनाता है, तपः कर्म संस्कार से संस्कृत प्राण ब्रह्मनिष्ठा का प्रवर्त्तक बनता हुआ जिज्ञासु को ‘ ब्रह्माध्यारूढ़ ' बनाता है, एवं ब्रह्मचर्य्यसंस्कार से संस्कृता वाक् तदन्वेषणप्रवृत्ति का कारण ती हुई जिज्ञासु को ब्रह्मान्वेषमाण बनाती है । ३४३
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भाष्यभूमिका मनस्तन्त्र ज्ञानशक्ति का आधार है, प्राणतन्त्र क्रियाशक्ति का उक्थ है, बाक्तन्त्र अर्थशक्ति का प्रभव है । ज्ञानशक्त्याधार मन कारण शरीरलक्षण ' आत्मा ' है, क्रियाशक्त्युक्थप्राण सूक्ष्मशरीरलक्षण ' सत्त्व ' है, अर्थशक्तिप्रभवभूता वाक् स्थूलशरीरलक्षण ' शरीर ' है । दार्शनिक परिभाषानुसार मन ' प्रज्ञामात्रा ' है, प्राण ' प्राणमात्रा ' है, वाक् ' भूतमात्रा ' है । वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार मन ' बीजचिति ' है, प्राण ' देवचिति ' है, वाक् ' भूतचिति ' है । तन्त्र परिभाषा के अनुसार मन ' पशुपति ' है, प्राण ' पाश ' है, बाकू ' पशु ' है । नैतिक परिभाषानुसार मन ' शासक ' है, प्राण ' शासनदण्ड ' ( शासन सूत्र ) है, वाकू अनुशासिता ' प्रजा ' है । निगूढविज्ञानसिद्धान्त के अनुसार मन ' उक्थ ' है, प्राण ' अर्क ' ( रश्मि ) है, बाकू ' अशीति ' है । आयुर्वेद सिद्धान्त के अनुसार मन ' सत्त्व ' है, प्राण ' आज ' है, वाक् ' सप्तधातुसमष्टि ' है । ब्राह्मणविज्ञानानुसार मन ' आत्मा ' है, प्राण ' प्राण ' है, वाक् ' पशवः ' है f । लौकिक परिभाषानुसार मन ' भोक्ता ' है, प्राण ' भोगसाधन ' है, वाक् ' भोग्य ' है । कोशविज्ञानानुसार मन ' मनोमयकोश ' है, प्राण ' प्राणमयकोश ' है, वाकू ' अन्नमयकोश ' है । स्वरूपविज्ञानानुसार मन असङ्ग है, प्राण ' ससङ्गासङ्ग ' है, वाक्, ' ससङ्गा ' है । प्रणवविज्ञान के अनुसार मन ' अकार ' है, प्राण ‘ उकार ' है, वःक् ‘ मकार ' है । कामविज्ञान के अनुसार मन ' आनन्द ' है, प्राण ' रति ' है, बाक् ' प्रजाति ' है । एषणाविज्ञान के अनुसार मन ' लोकैषणात्मक ' है, प्राण ' पुत्रैषणात्मक ' है, वाक् ' वित्तैषणात्मिका ' है । अश्वत्थविज्ञानानुसार मन ' आनन्द - विज्ञान - मनोमय - अमृततन्त्र ' है, प्राण ' मनः - प्राण - वाङ्मय ब्रह्मतन्त्र ' है, वाकू ' वाक् आपः - अग्निमय शुक्रतन्त्र ' है । सत्यविज्ञानानुसार मन ' अमृतसत्यात्मा ' है, प्राण ' ब्रह्मसत्यात्मा ' है, वाक् ' देवसत्यगर्भित भूतात्मा ' है । ज्योतिर्विज्ञानानुसार मन ‘ स्वज्योति ' है, प्राण ‘ परज्योति ' है, वाक् ' रूपज्योति ' है । शंब्रह्मविज्ञानानुसार मन ' खंब्रह्म ' है, प्राण ' रंब्रह्म ' है, वाकू ' कंब्रह्म ' है । अन्नादब्रह्मविज्ञानानुसार मन ' आवपन ' है, प्राण ' अन्नाद ' है, वाकू ‘ अन्न ' है । त्रिदेवविज्ञानानुसार मन ' ब्रह्मा ' है, प्राण ' विष्णु ' है, वाक् ' शिव ' ( भूतपति ) है । व्याहृतिविज्ञानानुसार मन ‘ स्वर्लोक ' है, प्राण ' भुवर्लोक ' है, वाकू ' भूलोक ' है । श्राधारविज्ञान के अनुसार मन ' हितोपहित प्रतिष्ठा ' है, प्राण ' हित ' है, वाकू ' उपहिता ' है । मनः - प्राण – बाङ्मय आत्मा के इन कुछ एक व्याप्ति - उदाहरणों के आधार पर सम्भव है पाठक आत्मस्वरूपप्रतिपत्ति की ओर श्राकर्षित हो सकेंगे । ३४४
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१- मनोविवर्त्तभावाः ( १ ) — १ - ज्ञानशक्तिः २- क्रियाशक्तिः ( २ ) -१ - कारण शरीरम २- सूक्ष्मशरीरम् ( ३ ) -१ - आत्मा ( ४ ) — १ - प्रज्ञामात्रा २- प्राणमात्रा ( ५ ) -१- बीजचितिः २- देवचितिः ( ) -१- पशुपतिः २- पाशः तृतीयखण्ड २- प्राणविवर्त्तभावाः २ - सत्त्वम् ३- वाग्विवर्त्त भाषा: ३- अर्थशक्तिः ३- स्थूलशरीरम् ३- शरीरम् ३ - भूतमात्रा ३- भूतचितिः ३- पशुः ( ७ ) -१- शासकः ( ८ ) --१ - उक्थम् २ - शासनदण्डः २ - अर्काः ३- शासित प्रजा ३- शीतयः ( १ ) — १ - सत्त्वम् २- श्रजः ( १० ) - १ - श्रात्मा २- प्राणाः ( ११ ) - १ - भोक्ता ( १२ ) - १ - मनोमयकोशः २- प्राणमयकोशः ( १३ ) -१- असङ्गभावः ( १४ ) — १ - अकारः ( १५ ) -१ - आनन्दः २- उकारः २- रतिः ( १६ ) - १ - लोकपरणा २- पुत्रैषणा ( १७ ) -१ - आनन्द विज्ञानमनोमयम् २- मनःप्राणवाङ्मयः ( १८ ) १ - अमृत सत्यात्मा ( १६ ) -१ - स्वज्योतिः २- परज्योतिः ( २० ) -१ - खंत्रह्म २- रं ब्रह्म : -भोगसाधनम् २ - ससङ्गासङ्गभावः २- ब्रह्म सत्यात्मा १३- सप्तधातवः ३- पशवः ३- भोग्यपदार्थाः ३ - अन्नमयकोशः ३- ससङ्गभावः ३- मकारः ३- प्रजातिः ३- धित्तैपणा ३- वागापोऽग्निमयी ३- देवसत्यगर्भितभूतात्मा ३- रूपज्योतिः ३- कंब्रह्म ( २१ ) - १ - वपनम् २- अन्नादः ३ - अन्नम् ( २१ ) १- ब्रह्मा २ - विष्णुः ३- शिवः ( २३ ) - १ - स्वर्लोकः २ - भुवर्लोकः ३- भूलोकः ( २४ ) १ - हितोपहितप्रतिष्ठा २- हितः ३- उपहिता स वा एष आत्मा - वाङ्मयः, प्राणमयः, मनोमयः । त्रयं सदेकमयमात्मा । आत्मा उ एकः सन्नेतत् त्रयम्
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भाष्यभूमिका मनः - प्राण - वाङ्मय आत्मतत्त्व का श्रमव्यापारप्रवर्त्तक वाग्भाग अन्नमयकोश बतलाया गया है । वाक आकाश है । मनःप्राणात्मक आत्मतत्त्व से सर्वप्रथम इसी वागूरूप आकाशतत्त्व का प्रादुर्भाव हुआ है, जो कि वागाकारा बलग्रन्थितारतम्य से क्रमशः वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन चार भूतों का प्रभव बन रहा है, जैसा कि - ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, श्राकाशाद्वायुः ' ( तै ० उ ०२ | १ | ) इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति से प्रमाणित है । श्राकाशात्मिका वाक् ही सर्वभूतजननी है, इसी वागाकाश में सत्र भूत अर्पित है, सम्पूर्ण भूत वाङ्मय हैं, इत्यादि सिद्धान्तों को - ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' ( ऐ ०० ३ | १ | ६ | ) - वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' ( तै ० या ०२८४ ) इत्यादि श्रुतियों का समर्थन प्राप्त है । हमारा स्थूलशरीर पाञ्च-भौतिक है, इसी आधार पर तालिका में वाक् को स्थूलशरीर का संग्राहक माना गया है । शरीरगत वैश्वानराग्नि में सायं प्रातः हम जिस पार्थिव अन्नद्रव्य की आहुति देते हैं, उस भोग्य अन्न में पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ, तीनों लोकों का रसभाग समन्वित है । अन्नगत नभाग पार्थिव दधिरस है, अन्न-गत मिठास दिव्य मधुरस है, अन्नगत स्नेहनद्रव्य ग्रान्तरीक्ष्य घृतरस है, जैसा कि - ' दधि हैवास्य लोकस्य रूपं, घृतमन्तरिक्षस्य, मध्वमुध्य ' ( शत ०७ | ५ | १ | २ | ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है । पार्थिव द्रव्य स्थूलभाग है, तदन्तर्गत श्राज्यलक्षण प्राणभाग सूक्ष्म है, एवं सर्वान्तरतम मधुभागयुक्त दिव्य चान्द्ररस सुसूक्ष्म है | भुक्तान्न के स्थूलभ तभाग से - ' रस- असृक्- मांस - मेद - अस्थि - मज्जा - शुक्र ' इन सात स्थूल धातुओं की पुष्टि होती है । भुक्तान्न के सूक्ष्म श्राज्यभाग से प्राणमय ओज की स्वरूपरक्षा होती है । एवं भुक्तान्न के सुसूक्ष्म मधुभागावच्छिन्न दिव्य चान्द्ररस से मन की तुष्टि होती है । इसप्रकार त्रिधर्मावच्छिन्न अन्न आत्मा के तीनों पर्वों का स्त्ररूपरक्षक बन रहा है । इसी आधार पर इस आत्मपुरुष को आयु: शास्त्र ने – ' अन्नरसमय पुरुष ' कहा है, जैसा कि पूर्वप्रकरण में स्पष्ट किया जा चुका है । सप्तधातुवर्ग वाङमय है, वाकूप्रधान है । ' शुक ' धातु पृथिवी का अन्तिम रस है । इसका निर्गमन ' ऊर्ध्व - अधः - तिर्य्यक् ' भेद से तीन प्रकार से सम्भव है । जो ज्ञानोपासक अपने इस शुक्र - सोम की ब्रह्मरन्ध्रो– पलक्षित शिरोगुहा में प्रतिष्ठित ज्ञानाग्नि में आहुति देते रहते हैं, वे - ' ऊर्ध्वरेता ' कहलाए हैं । ऐसे ज्ञानोपासक कुछ एक अपवादस्थलों को छोड़ कर शरीर से कृश रहते हैं । क्योंकि इनका शुक्र ज्ञानपोषण में उपयुक्त होता रहता है । श्रुतएव ज्ञानोपासक ब्राह्मण के लिए श्राचाय्य नें शरीरायास निषिद्ध माना है । योषि-दग्नि में वृषासोम की आहुति देते हुए पुरन्ध्रिता धर्म के अनुयायी गृहमेधी- ' अधोरेता ' कहलाए हैं । ऊर्ध्व-अधः- दोनों मार्गों का निरोध कर ( शरीर - पुष्ट्यर्थं ) केवल शरीराग्नि में शुक्राहुति देने वाले मनुष्य ' तिम्-रेता ' कहलाए हैं । ' तजज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ' के अनुसार ज्ञान ही ' ब्रह्म ' है । इस ब्रह्म की चर्य्या ( आचरण, अनुमगन ) ही ‘ ब्रह्मचर्य्य ' है । यह चर्य्या शुक्ररक्षा पर ही अवलम्बित है । अतएव लदण्या ब्रह्मचर्य को शुकरक्षा परक भी मान लिया गया है । शुक्ररक्षा से प्रोज ( प्राण ) का विकास होता है । जिसका शुक्र अतिशय मात्रा में क्षीण हो जाता है, उसका लोन निर्बल हो जाता है, स्फूर्ति विलीन हो जाती है । प्रोजक्षय से तत्प्रतिष्टित मन निर्बल बन जाता है । क्योंकि शुक्रगत सोम ही तो ओजावस्था में श्राता हुआ अपने विशुद्ध सोमभाग से मनः स्वरूप-सम्पादक बनता है । मन की निर्बलता से तत् प्रतिष्ठिता बुद्धि का व्यवसायधर्म्म उच्छिन्न हो जाता है । ३४६