Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 361–370

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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तृतीयखण्ड ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' रूप मृत्युफल कालान्तर में अतिथि बन जाता है । इस मृत्युपाश विमुक्ति का मुख्य साधन शुक्ररक्षात्मक ब्रह्मचर्य्य ही माना जायगा, जैसा कि - ' ब्रह्मचर्येण तपसा देवामृत्युमपाघ्नत ' इत्यादि सूक्ति से प्रमाणित है । " रसो ह्येव सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति " के अनुसार श्रानन्दघन श्रात्मा सर्वालम्बन है, यही शाश्वतानन्दोपलब्धि की प्रतिष्ठा है । इस पर विज्ञान प्रतिष्ठित है, विज्ञान पर कारणशरीरलक्षण मन का वेष्टन है, मन पर प्राणात्मक सूक्ष्मशरीर का वेष्टन है, प्राण पर वाङ्मय स्थूलशरीर का वेष्टन है । सर्व-प्रथम वाकस्तर, तदन्तः प्राणस्तर, तदन्तः मनः स्तर, तदन्तः विज्ञानस्तर, सर्वान्तरतम आनन्द | यह व्यवस्थित क्रम है । ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' के अनुसार विज्ञान ही आनन्दघन आत्मसाक्षात्कार का मुख्य द्वार माना गया है । यदि वाङ्मय शुक्र स्व - स्वरूप से सुरक्षित है, तो प्रोज बलवान् है । ओज स्व - स्वरूप में प्रतिष्ठित है. तो मन बलवान् है । मन स्व - स्वरूप में प्रतिष्ठित रहता हुआ यदि स्वस्थ है, तो - ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' के अनुसार विज्ञानात्मिका बुद्धि का विकास है । इस विज्ञानबल से ही अधिकारप्राप्ति सम्भव है, जिसके मनः - प्राण - वाङ्मय श्रद्धा - तप- ब्रह्मचर्य, ये तीन कर्म्म प्रतिष्ठा बन रहे हैं । मनोमयी श्रद्धा, प्राणमय तप, वाङ्मय ब्रह्मचर्य्य, तीनों विज्ञानबलवद्ध'क हैं । प्रवृद्ध विज्ञान ही ब्रह्मपर - ब्रह्मनिष्ठ - परब्रहा।न्वेष— माण व्यक्तियों की अधिकारमर्थ्यादा यथावत् सुरक्षित रखने में समर्थ हैं । सम्वत्सरयज्ञ से उत्पन्न द्विजाति औपनिषद ज्ञान के लिए उपनीत जनता हुआ कम से कम सम्वत्सरपर्यन्त उक्त तीनों नियमों का अनुगमन करेंगा । तभी इसका समित्पाणित्त्व चरितार्थ होगा, जिसका - ' सम्वत्सरं सम्वत्स्यथ ' से स्पष्टीकरण हुआ है । पिप्पलादसम्मता इसी अधिकारमर्य्यादा का निम्न लिखित अभियुक्त वचन से भी स्पष्टीकरण हुआ है- —

" ब्रह्मचर्य्यं तपः- सत्यं - वेदानां - - चानुपालनम् ।

श्रद्धा - चोपनिषच्चैव ब्रह्मोपायनहेतवः ॥

आगे जाकर भगवान् पिप्पलाद ने ब्रह्मचर्य - तप - सत्य की ओर विशेष ध्यान दिलाते हुए अनृत-जिह्मता - माया को इस अधिकारमय्र्यादा का एकान्ततः परिपन्थी माना है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से स्पष्ट है—

तेषामेनैष ब्रह्मलोको - येषां तपो, ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ।

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको, न येषु जिह्म - मनृतं -माया च ॥

( प्रश्नोप = १।१५,१६, ) " हमें अपने श्रद्धा - श्रास्था - शून्य, अतएव सर्वथा शुष्क - रूक्ष - केवल बुद्धिवाद के बल पर, तात्कालिक उपलालन - द्वारा, तात्कालिक विनयप्रदर्शन - द्वारा, विविध प्रलोभनों के द्वारा, वाक्छल के द्वारा, किंवा अन्यान्य अनृत - जिह्म – मायादि - छलप्रपञ्चात्मक धर्म्मशून्य लोकनीतिपथों के द्वारा उपदेष्टा से येनकेनाप्युपायेन ज्ञानलाभ कर लेना चाहिए " इसप्रकार का धर्म्मविरुद्ध - आस्था श्रद्धाशून्य - अनृत - जिह्मता - माया - मय प्रकार कदापि बेदतत्वज्ञान में सफलता प्रदान नहीं करा सकता, नहीं करा सकता, यही उक्त पिप्पलादवचन का स्वारस्य है । ३४७

पृष्ठ 362

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भाष्यभूमिका ८ - याज्ञवल्क्यसम्मता अधिकारमर्यादा— अपने युग के समर्थ वैज्ञानिक, अशास्त्रीय रुढिवाद के अन्यतम शत्रु भगवान् याज्ञवल्क्य ने इस सम्बन्ध में अपना जो महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रकट किया है, दो शब्दों में उसका भी स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए । याज्ञवल्क्य के द्वारा प्रदर्शित अधिकारमर्य्यादा के अनुगामी द्विजाति ही अध्ययनाध्यापन के अधिकारी हैं । एवं जिस अधिकारबीज को गर्म में रख कर वे अधिकारी अध्ययनाध्यापन में प्रवृत्त होते हैं, वे ही उस बीज की पुष्पित-पल्लवितरूपा समृद्धि के भोक्ता बनते हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । स्वाध्याय- प्रवचन का स्वाभाविक अनुराग ', अनन्यमनस्कता है, अपराधीनता, अर्थसाधन प्रवृि 1 मुखस्थाप ", आत्मचिकित्सा नुगमन, इन्द्रियसंयम ', एकारामता, प्रवृद्ध प्रज्ञा, यशोऽनुगमन ",, लोकपक्ति ' ये ११ साधन हीं अधिकारमयदा के मूलस्तम्भ मानें गए हैं । इनका क्रमशः स्वरूप - दिग्दर्शन करा देना ही प्रकृत परिच्छेदार्थ है । ( १ ) - स्वाध्यायप्रवचन का स्वाभाविक अनुराग ( प्रिये स्वाध्यायप्रवचने भवतः ) -मानसक्षेत्र की अपेक्षा से पदार्थों को- ' श्रेय, प्रेय, श्रेयप्रय, श्रेयप्रयोऽभाव, ' भेद से चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है । ' हितकर ' पदार्थ ' श्रेय ' हैं । ' रुचिकर ' पदार्थ ' प्रेय ' हैं । ' हितकर ' - ' रुचिकर ' पदार्थ ' श्रेय - प्रेय ' हैं । एवं ' अहितकर - अरुचिकर पदार्थ ' श्रेय योऽभावलक्षण है । कायक्लेशात्मक अध्यात्मचिन्तन, तत्त्वोपासन, एवं यशादि प्राकृतिक कर्म हितकर हैं, अतएव श्रेय हैं । इनके अनुगमन में कठिनता है । ' यत्तदप विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ' ( गी ०१८ | ३० | ) के अनुसार श्रेयः कम्मों के आरम्भ में कठिनता है, किन्तु परिणाम में निःश्रेयसभाव है । रास्नादि क्वाथ, गुग्गुल, एक वातरोगी के लिए हितकर बनते हुए श्रेय अवश्य हैं, परन्तु रुचिकर न होने से ' प्रय ' नहीं हैं । आध्यात्मिक याशिक संस्था के रक्षाक में ग्राह्य प्रकृत्यनुगत अन्नपान - शयनादि ऐन्द्रिक भोगों के अतिरिक्त, दूसरे शब्दों में बुद्धिपूर्विका - ईश्वर - प्रेरणा प्रतिफलरूपा उत्थिताकांक्षा के अनुगामी स्वाभाविक भोगों के अतिरिक्त - मानसेच्छा-नुगत- उत्थाप्याकाङ्क्षामूलक - संस्कारलेपप्रवर्त्तक - बन्धनात्मक - समस्त ऐन्द्रियक भोग केबल रुचिकर बनते हुए विशुद्ध प्र यः कर्म्म मानें गए हैं । इन प्र यः पदार्थों के रजस्तमो भेद से आगे जाकर अवान्तर दो विभाग हो जाते हैं । प्रकृतिविरुद्ध, किन्तु इन्द्रियसुख लिप्सात्मक भोजन - दर्शन - श्रवणादि कुछ एक प्रयोविषय तो ऐसे हैं, जिनके श्रारम्भ में तो सुखानुभव होता है, परन्तु परिणाम में वे महाभयङ्कर सिद्ध होते हैं । ऐसे प्रेयः पदार्थ रजोगुणात्मक कहलाए हैं । रजोगुणप्रधान प्रेयः पदार्थों के सेवनकाल में बुद्धि का एकान्ततः अभिभव नहीं है । एक वातरोगी वह समझ रहा है कि, अम्ल सेवन पीड़ा बढ़ा देगा, महाकष्ट होगा । फिर भी ' बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ' ( मनुः २ २१५ ) के अनु-सार यह लोभसंवरण करने में असमर्थ हो जाता है । परन्तु एक स्थिति ऐसी भी मानी गई है, जिसमें बुद्धि के सदसद्विवेक का एकान्ततः श्रभिभव है । न दुःखानुभव है, न मुखानुभव है । प्रमत्त मनुष्य की भांति प्रवृत्तिमात्र है । ऐसा व्यक्ति विधि - निषेध - विवेक से वञ्चित रहता हुआ उन विषयों की ओर अन्धभाव से अनुगमन करता रहता है, जिनके आरम्भ, तथा अवसान में मोहलक्षण मुख का प्रमुत्त्व रहता है । उपक्रम में भी आत्मवि-स्मृति, उपसंहार में भी आत्मविस्मृति, ऐसे मोहात्मक काल्पनिक - सुखाभासलक्षण सुखों के प्रवर्तक मद्यपान-३४८

पृष्ठ 363

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तृतीयखण्ड अभक्ष्यभक्षण – अगम्यागमनादि कर्म तमोगुणात्मक मानें गए हैं । निद्राधिक्य से, आलस्य से, प्रमाद से एक प्रकार की शान्ति की झलक दिखलाई पड़ती है । परन्तु ऐसा सुख भी तमोगुणात्मक- मोहलक्षण - प्रथोभाव ही माना गया है । सुख ही श्रेय है, सुख ही प्रेय है । परन्तु सत्वगुणक सुख श्रेय है, रजोगुणक, तथा तमोगुणक सुत्र प्रेय है । उभयविध प्रेोय त्याज है, श्रेय ग्राह्य है, जिसकी प्रतिष्ठा बुद्धियोग माना गया है । निम्न लिखित श्रौत - स्मार्त्तवचन इन्हीं दोनों के स्वरूप का स्पष्टीकरण कर रहे हैं श्रेय - प्रेयस्वरूपमीमांसा-“ अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्र ेय स्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयते । उ प्रेयो वृणीते ” । श्रयोऽनुगमनादेशः -“ श्रयश्च प्रयश्च मनुष्यमतेस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभिप्र यसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्व गीते " श्रेयोऽनुगामिनः प्रशंसा – " स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान भिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ” ( कठोपनिषत् १।२।१,२,३ ) सच्चानुगतश्रयः स्वरूपमीमांसा— " यत्तदग्रे विषमिव परिणामे ऽमृतोपमम् । तत् सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसा जगम् ॥ ” रजोऽनुगतप्र यः स्वरूपमीमांसा -“ विषय न्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोऽपमम् । परिणामे विषमिव तत् सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ” तमोऽनुगतप्र यः स्वरूपमीमांसा-“ यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ' || ( गी ०१८ | ३७,३८,३६ ) कुछ एक ऐसे पदार्थ, तथा कर्म भी हैं, जिन्हें हितदृष्टि से श्रेय भी कहा जासकता है, रुचिदृष्टि से प्रय भी माना जासकता है । ऐसा उभयनिष्ठ विभाग ही ' श्रेयः प्रेयोभाव ' नामक तीसरा श्रेणि विभाग है । शारीरयज्ञरक्षा के लिए अपेक्षित सुस्वादु दैनिक भोजनकर्म, अपेक्षित निद्राकर्म्म, भ्रमण, व्यायाम, बुद्धि - सहकृत मानस विनोद, आदि हितकर भी हैं, रुचिकर भी हैं । च्यवनप्राशावलेह, सौवर्चलपाकवटी, हिंग्वष्टकचूर्ण, गन्धकराजबटी, आदि औषधियां रास्नादि क्वाथादि की भाँति केबल हितकर ( श्रेय ) ही नहीं हैं, अपितु हितकर ३४६

पृष्ठ 364

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भाष्यभूमिका होनें के साथ साथ रुचिकर भी हैं । सर्वनाशक हालाहलादि कतिपय पदार्थ न हितकर हैं, न रुचिकर हैं । यही चौथा श्रेणि - विभाग है । वस्तुतस्तु जिन तीन विभागों का दिग्दर्शन कराया गया है, वे ही प्रज्ञापराध से उभयसम्पत्ति से बश्चित होते हुए इस चतुर्थ विभाग के जनक बन रहे हैं । मात्रायुक्त महाविष भी स्वतन्त्ररूप से हितकर बन जाता है | अन्य श्रौषधियों के सम्पर्क से अपनी कटुता छोड़ता हुआ यही विष हितकर होने के साथ साथ रुचिकर भी बन जाता है । उधर हितकर पदार्थ प्रज्ञापराध से हितकर बन जाता है, रुचिकर पदार्थ भी जीर्णदशा में अरुचिप्रवर्तक बन जाता है । सर्वथा श्रेणि - विभाग चार संख्याओं में हीं विश्रान्त है । प्रकान्त विद्याविभाग का, किंवा स्वाध्यायकर्म का श्रेय, तथा श्रेयः प्रय, इन दो विभागों के साथ ही सम्बन्ध माना गया है । स्वाध्यायारम्भ काल में, दूसरे शब्दों में प्राथमिक शिक्षण काल में अध्येता के लि अध्ययन केवल श्रेयोभावयुक्त बना रहता है । बुद्धि का विकास ही प्रयोभावाभाव ( अरुचि ) का कारण है । योग्य शिक्षक के अनुग्रह से ज्यों ज्यों बुद्धि विकसित होने लगती है, त्यों त्यों हितभाव के साथ साथ रुचिभाव भी बढ़ने लगता है । यही रुचिभाव आगे जाकर विद्यापूर्णता का कारण बन जाता है । स्वयं पढ़ने की रुचि, पटित विषय को प्रकट करने की रुचि, दोनों सफलता के मौलिक रहस्य है । शिक्षक की योग्यता विषेश से ही यह स्वाध्याय- प्रवचनानुचन्धी प्रियभाव ( प्रयोभाव - रुचि ) शिष्य में उत्पन्न होता है । वही विद्याक्षेत्र का अधिकारी बनता है । यदि किसी में पूर्वजन्मसंस्कारवश बचपन से स्वतः एव स्वाध्याय - प्रवचन की रुचि का बीज प्रतिष्ठित है, तो उत्तमाधिकारी है, एवं वह स्वाध्याकाल में ही इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेता है । यदि किसी में प्रयास से भी रुचि उत्पन्न न हुई, तो वह इस क्षेत्र का अधिकारी ही माना जायगा । " स्वा-ध्याय - ( अध्ययन ) - प्रवचन ( अध्यापन ) का अनुराग हीं स्वाध्यायप्रवचन का प्रियत्त्व है, यही याज्ञ-वल्क्यमतानुसार प्रथम अधिकार मर्यादा है ” यही सन्दर्भनिष्कर्ष है । २ – रुच्यनुगत । अनन्यमनस्कता - ( युक्तमना भवति ) -हमारी विद्या की ओर रुचि है, अतएव हम अधिकारी हैं, यहां तक तो ठीक है । परन्तु इस रुचि की दो अवस्था है । रुचि का मन से सम्बन्ध है । मन ' युक्त - श्रयुक्त ' भेद से दो वृतियों में विभक्त है । किसी भी विषय, किंवा कर्म के साथ मन का चिरकालपर्य्यन्त सम्बन्ध हो जाना मन की युक्तता है, एवं क्षणिक सम्बन्ध होना श्रयुक्तता है । इन दो विरुद्ध धम्मों का कारण है बुद्धिसहयोग का तारतम्य । अपने स्वाभाविक सौम्य विद्युत् के कारण मन स्वभावतः चञ्चल है, चाञ्चल्य मन का स्वाभाविक धर्म है । इसी वृत्ति के कारण यह किसी विषय के साथ अधिक काल पर्य्यन्त सम्बन्ध बनाये रखने में असमर्थ है । नवीनतामें रुचि रहती है, काला-तर में रुचि हट जाती है । जिस विज्ञान ( बुद्धि ) के प्रबयांश से मन स्वब्यापार करने में समर्थ होता है, वह स्थिर है | विज्ञानगत इन्द्र ' लोकः सारी ' है, जैसा कि योकःसारी बा इन्द्रः । यत्र वा एप इन्द्रः पूर्व गच्छति, ऐत्र तत्रापरं गच्छति ' इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । मन ऐन्द्रियक संस्कारवल से बलवान् बनता हुआ विज्ञानस्थिरता को अपने वश में कर लेता है । अतएव विज्ञानस्थिरता इसका उपकार करने में असमर्थ हो जाती है । ऐसे ही व्यक्ति अन्यमनस्क अयुक्त-विज्ञान वञ्चित कहलाए हैं । विद्याक्षेत्र में मानस रुचि का चिरकालिकत्त्व अपेक्षित है । यह चिरकालिकत्त्र मना, ' यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्त ेन मनसा सदा ' ( कठोपनिषत् ) इस कटश्रुति के अनुसार तभी सम्भव ३५०

पृष्ठ 365

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तृतीयखण्ड है, जत्र कि मन बुद्धि का अनुगामी बना रहे । बुद्धिगत स्थिरधर्म्म, मनोगत सोमात्मक स्नेहधर्म्म ', दोनों के समन्वय से ही मन का व्यापार, मानस रुचि विद्याक्षेत्र में स्थिरधम्र्म की प्रवर्तिका चनती है । यही ' रुच्यनु-गता अनन्यमनस्कता ' है, यही मन की युक्तता है, यही दूसरी अधिकारमर्थ्यादा है, जिसका बीज बुद्धिप्रा-धान्य माना गया है । ३ – अपराधीनता - ( अपराधीनः ) -जीवात्मतन्त्र स्व, पर, भेद से दो तन्त्रों में विभक्त है । वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ की समष्टिलक्षण कर्मात्मा ही जीवात्मा है | इसके इस ओर प्रज्ञानमनोयुक्त इन्द्रियवर्ग है, उस ओर चिज्ज्योति से अनुगृहीता बुद्धि है । बुद्धयनुगत जीवात्मा स्वमूलभूत चिदात्मतन्त्र से अनुग्रहीत रहता हुआ स्व - तन्त्र ( श्रात्मतन्त्र ) में प्रतिष्ठित है । प्रज्ञानमनोऽनुगत जीवात्मा विषयसंस्कारभूत जड़तन्त्र से अनुगृहीत रहता हुआ पर तन्त्र ( विषयतन्त्र ) में प्रतिष्ठित रहता हुआ ' परतन्त्र ' है । पारतन्त्र्य श्रात्मज्ञान का महाप्रतिबन्धक है, स्वातन्त्र्य महा उपाकारक है । यही स्वातन्त्र्य बुद्धिविकास का कारण है । बुद्धिविकास ही मनः क्षेत्र की युक्तता का मूल है । युक्तमना अधिकारी ही अपने विद्यानुराग को सुरक्षित रख सकता है । इन्द्रियानुबन्धी अर्थक्षेत्र की परतन्त्रता ही पराधी-ता है । पेट भर भोजन नहीं मिलता, जो कुछ मिलता है, उसके लिए आत्मसमर्पण करना पड़ता है, इमी अर्थचिन्ता में अहोरात्र व्यतीत हो जाता है, यही परतन्त्रता का दूसरा दृष्टिकोण है । सत्र कुछ बाह्य साधन रहने पर भी आसक्ति के अनुग्रह से प्राप्त परवशता भी आत्मस्वातन्त्र्य की बाधिका बनती हुई स्वाध्यायकर्म में प्रतिबन्धक है । बाह्य साधन न होने पर अगत्या प्राप्त अर्थचिन्ता भी आत्मस्वातन्त्र्य की प्रतिबन्धिका है । दोनों ही पराधीनताएँ बुद्धिविकास के लिए घातक यन्त्र हैं । प्राप्त वैभव में श्रासक्ति न हो, साथ ही श्रावश्य-कतानुसार अर्थक्षेत्र की सुविधा भी बनी रहे, यही अपराधीनता है, यही तीसरी अधिकारमर्य्यादा है । ( ४ ) - अर्थसाधनप्रवृत्ति - ( अहरहरर्थान् साधयते ) -दो प्रकार से इस अधिकारमर्यादा का समन्वय किया जा सकता है । रुचि भी है, अनन्यता भी है, अनन्यतारक्षक साधन भी प्रस्तुत हैं ( अपराधीनता है ) । परन्तु अर्थसाधनप्रवृत्ति नहीं है । गुरु ने ग्राज जो उपदेश दिया, उसे कल पर छोड़ दिया, कल के उपदेश को परसों पर छोड़ दिया । प्रमादवश कल कल पर छोड़ते गए । न कभी इस कल का अन्त होगा, न अधीत विषयों में सफलता मिलेगी । वही विद्या क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त कर सकता है, जो ' न श्वः श्वः प्रतीक्षेत ' के अनुसार कल - कल की प्रतीक्षा न करता हुआ प्रतिदिन अधीत ( श्रुत ) विषय का मनन - निदिध्यासन किया करता है । ' स्वाध्यायान्न प्रमदितव्यम् ' यह आदेश भी इसी अधिकारमर्य्यादा का समर्थन कर रहा है । जैसे भोजन करना हम नहीं भूलते, वैसे स्वाध्यायकर्म का भी अनध्याय नहीं होना चाहिए, जिसका ' अहरहः स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' से स्पष्टीकरण हुना है । ' हमनें इतना जान लिया, अब बस है ' - इसप्रकार विद्याक्षेत्र में ' अलं ' बुद्धि रखने वाला भो अधिकारी नहीं माना जा सकता । ज्ञान अनन्त है, इसको पिपासा भी अनन्त होनी चाहिए । ' न हम कभी बुढ्ळे होंगे, न हम कभी मरेंगे ' इस भावना को आगे करते हुए यावजीवन हमें अपने इष्टसाधन में प्रवृन रहना चाहिए । सन्तोष करना अनन्त की उपासना से विरोध करना है । जो वस्तुतत्त्व प्राप्त नहीं है, उसे प्राप्त करो, जो प्राप्त कर चुके हो, उसका विकास करो । विकास करना एक दृष्टिकोण है, जिसका पूर्व में स्पष्टीकरण ३५१

पृष्ठ 366

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भाष्यभूमिका हुआ है । प्राप्त करना दूसरा दृष्टिकोण है । इसी के लिए श्रुति ने कहा है- ' अजितु जेतुमनुचिन्तयेत्, न क्वचिदप्यलं बुद्धिमादध्यात् ' । ( ५ ) - सुखस्वाप ( सुख खपिति ) -सशक्त शरीर, उत्साहपूर्ण मन, विकसिता बुद्धि, निरालसभावानुगता अर्थसाधनप्रवृत्ति, इन सबका मूलाधार सुखस्वाप माना गया है । ' एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति ' के अनुसार स्वाध्यायलक्षण तप से शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, श्रादि शक्तियों का पर्थ्याप्त मात्रा में ह्रास होता है । इस अल्पकालीन दैनिक हास · ( विसर्ग ) की क्षतिपूर्ति के लिए इन शक्तियों का दैनिक प्रदान भी अपेक्षित है । अहःकाल में जहाँ हम शक्ति-दान करते हैं, वहाँ रात्रि में विश्रामद्वारा पुनः शक्तिसञ्चय में समर्थ हो जाते हैं । विश्राम का मुख्य क्षेत्र निद्रा है । जिसे मुखपूर्वक ( भरपेट ) निद्रा आती है, वही शक्तिलाभ कर सकता है । दिन के परिश्रम से क्लान्त ज्ञानतन्तु ( स्नायुतन्तु ) मुखस्वाप से पुनः सशक्त बनते हुए दूसरे दिन के कर्म के लिए योग्य बन जाते हैं । एवं यही पांचवीं अधिकारमय्र्यादा है । ( ६ ) - आत्म चिकित्सा नुगमन - ( आत्मनः परमचिकित्सको भवति ) -सुखपूर्वक निद्रा तभी आ सकती है, जब हमारी अध्यात्मसंस्था अपने तीनों पर्वों से स्वस्थ बनी रहती है । पृथिवी - जल - तेज - बायु - श्राकाशात्मक पाञ्चभौतिक, भूतग्रामात्मक स्थूलशरीर, ५- प्रज्ञामात्रा, ५ प्राणमात्रा, ५- भूतमात्रा, १ - मन, २- बुद्धि, ३- चित्त, ४ - श्रहङ्कार - लक्षणा अन्तःकरणचतुष्टयी, इन १६ कलाओं से एकोनविंशतिमुख, देवग्रामात्मक सूक्ष्मशरीर, भावना, वासना, श्रविद्या, काम, कर्म्म, शुकसमष्टिरूप, आत्म-ग्रामात्मक कारणशरीर, पञ्चकल आत्मक्षर, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल श्रव्यय, निष्कल परात्पर की समष्टिरूप शरीत्रयी- नियन्ता शरीरी, इन चार संस्थाओं की समष्टि ही प्रकृत में ' आत्मा ' शब्द से गृहीत हूँ । वात - पित्त - कफ, ये तीन स्थूलशरीर के धातु हैं । काम - क्रोध - लोभ - मोह - मद- मात्सर्य, ये ६ सूक्ष्मशरीर के धातु हैं | भावना - वासना - शुक्र, ये तीन कारणशरीर के धातु हैं । एवं आनन्द विज्ञानादि श्रात्मा ( शरीरी, के धातु हैं । इन धातुओं की न्यूनता, अधिकता, विषमता, पाय, समता, ये पाँच अवस्थाएँ सम्भव हैं । भोग्य पदार्थों के सेवन में गड़बड़ करने से ही चार अवस्थाओं का उदय होता है । पांच में से चार श्रवस्था घातक हैं, अन्तिम अवस्था ही स्वस्थता है । हीनयोग, प्रतियोग, मिथ्यायोग, प्रयोग, योग, इन पाँच वृत्तियों से उक्त पाँच अवस्था उत्पन्न होतीं हैं । कल्पना कर लीजिए, हमें आत्मसमता लक्षण समत्त्वयोग के लिए एक सेर अन्न खाना है । परन्तु ऐसा न कर प्रज्ञापराध से हमनें कम खाया, यही होनयोग है । मात्रा से अधिक खा लिया, यही प्रतियोग है । खाया तो मात्रा से, परन्तु प्रकृत्यनुकूल न खा कर प्रकृतिविरुद्ध अन्न खा लिया, यही मिथ्या-योग है । कुछ नहीं खाया, यही ' प्रयोग ' है । एवं प्रकृत्यनुसार जिस नियत समय में जितना अपेक्षित है, उस समय में उतना ही खाया, यही समत्वप्रवर्त्तक, स्वास्थ्यमूलक योग है । हीनादि प्रयोगात्मक चारों योग स्वस्थता. निवर्त्तक, तथा रोगप्रवर्त्तक हैं । योगात्मक पाँचवाँ योग रोगनिवर्त्तक, तथा स्वस्थताप्रवर्तक है । कौन वस्तु धातुवैषम्य का कारण है?, कौन विषमता के प्रवर्तक है?, इसप्रकार आहार - विहारादि का सम्यग्ज्ञान रखते हुए समत्त्व लक्षण योग का अनुगमन करना ही श्रात्म चिकित्सा है । आत्मचिकित्सा के अभाव में प्रज्ञापराधा-३५२

पृष्ठ 367

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 367 का मूल पृष्ठ
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तृतीयखण्ड नुग्रह से अध्यात्मसंस्था स्वस्थ रहती है । निद्रा नहीं ग्राती, मन अशान्त रहता है, बुद्धि व्यवसाय से श्राक्रान्त रहती है । ऐसी अध्यात्मसंस्था विद्याक्षेत्र में अनधिकृत है । इसी आधार पर आत्मचिकित्सा भी अधिकारमर्थ्यादा मान ली गई है । ( ७ ) -इन्द्रियसंयम— प्रश्न यह है कि, स्वस्थताप्रवर्तक श्रात्मचिकित्साकर्म में सफलता प्राप्त कैसे हो?, दूसरे शब्दों में मन की स्वाभाविक चञ्चलता से सम्बन्ध रखने वाले प्रज्ञापराध का नियन्त्रण कैसे किया जाय? | इन्द्रियसंयम ही इसका मुख्य उपाय माना गया है । हमें विशुद्ध रुचिकर भावों से बचना चाहिए, अपनी चाफ् - प्राण - चक्षुः - आदि इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना चाहिए । शुभ -अशुभोदर्क को लक्ष्य में रखते हुए ही ऐन्द्रियक श्रेयो विषयों की ओर प्रवृत्त रहना चाहिए । सहनशक्ति का अनुगमन करना चाहिए । थोड़े साहस से काम लेने पर ही हम अपनी इन्द्रियों की विषयलोलुपता पर विजय प्राप्त कर सकते हैं । ऐसे संसर्ग से बचना चाहिए, जो इन्द्रियभावों का उत्तेजक हो । और हमारे अपने अनुभव से तो जनमंमर्ग से बचते रहना ही इन्द्रियसंयम का मूल रहस्य है । एकान्तप्रियता हमें अनेक दुर्गुणों से बचा लेती है । इसीलिए अध्यात्मज्ञान के सम्बन्ध में हमें ' अर तिर्जनसंसदि ' ( गी ० १३ | १० | ) यह आदेश मिला है । अपनी आवश्यकताओं को कम करना, जनसंसर्ग से बचना, शास्त्रोपदिष्ट स्वस्त्ययनकम्मों को अपनाना, तत्त्वदर्शी विद्वानों का सहयोग प्राप्त करते रहना, इत्यादि कुछ एक ऐसे उपाय हैं, जिनसे हम इन्द्रियसंयम-कर्म में सफलता प्राप्त कर सकते हैं । यही इन्द्रियसंयमलक्षणा अधिकारमर्यादा का एक विशेष दृष्टिकोण है । अब दूसरे दृष्टिकोण से इसका समन्वय कीजिए, जिसका स्वाध्यायकाल से सम्बन्ध है । गुरु ने विद्योपदेश ग्रहण करते समय हमें इन्द्रियों पर, किंवा तद्वृत्तियों पर पूर्णसंयम रखना पड़ेगा । एवं इस संयमकर्म्म के मुख्य अधिष्ठान चक्षु, श्रोत्र, मन, ये तीन इन्द्रियभाव बनेंगे । गुरु की ओर ही दृष्टि, उसी चोर श्रोत्रेन्द्रिय, उसी ओर मन, यही इन्द्रियसंयम स्वाध्याय की सफलता का मूलाधार है । इन तीनों में भी मन का संयम मुख्यरूप से अपेक्षित है । एकाग्रमन से श्रुत - दृष्ट विषय ही दृढ़संस्काररूप में परिणत होता है । एक गुरु के समीप अनेक शिष्य विद्याध्ययन कर रहे हैं । आंखों, कानों की दृष्टि से सभी समानाधिकारी हैं । परन्तु - ' केचिदर्थैर्युज्यन्ते, अपरे न ' । कारण यही है कि, मनोजव की दृष्टि से सत्र असमान हैं । चक्षु-श्रोत्र - मन, के तारतम्य से इस अधिकारमर्यादा को चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है । कितनें हीं शिष्य न देखते, न सुनते, मनन की तो कथा ही दूर है । यही सर्वथा अधिकारी वर्ग है । पुस्तक खुली पड़ी है । मन कहीं ओर है, देख दूसरी ओर रहे हैं, श्रोत्र अन्य ध्वनिश्रवण में संलग्न हैं । इन पुरुषार्थियों को छोड़ते हुए हमें उन अधिकारियों का विचार करना है, जो प्रथम - मध्यम - उत्तम कोटित्रयी में विभक्त हैं । कितनें एक विद्यार्थी सुनते भी हैं, देखते भी हैं, मनोयोग भी रखते हैं, परन्तु स्वाध्याय - समाप्त्यनन्तर पुस्तक को पूजनगृह में प्रतिष्ठित कर देते हैं । कितनें एक घर आकर मनन तो करते हैं, परन्तु अनन्यता नहीं रखते । मनोविनोद में हीं अधिक समय बिताते रहते हैं । परन्तु उत्तमाधिकारी शिष्य स्वाध्यायकाल में भी आत्मसमर्पणयोग का आश्रय लिए रहते हैं, एवं अनन्तर भी उसी कर्म में ३५३

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• भाष्यभूमिका तल्लीन रहते हैं, डूबे रहते हैं । पानी से भरा सरोवर है । अनधिकारी किनारे से लौट आते हैं । प्रथमाधिकारी जानुपर्य्यन्त प्रवेश कर पाते हैं, मध्यमाधिकारी कक्षपर्य्यन्त प्रवेश कर लेते हैं । परन्तु उत्तमाधिकारी पूर्णरूप से ग्रन्तस्तल पर पहुँच कर बाहर निकलते हैं । पूर्णन्द्रियसंयमी ऐसे उत्तमाधिकारी ही बास्तविक अधिकारी हैं । इन्हीं तीनों अधिकारियों की स्थिति का सरोवरदृष्टान्त से स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि

कहते हैं-अनधिकारी-" यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति ।

यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम् " ॥

त्रिविधाधिकारिण: -( ८ ) - एकारामता

“ अक्षएवन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।

आदघ्नास, उपकक्षास, उ त्त्वे ह्रदा इव स्नाच्चा उ त्त्वे ददृशे " ॥

( ऋक्सं ० १०।७१।६,७ मं ० ) उद्देश्यविहीन जीन जहाँ इन्द्रियारामता का प्रवर्तक है, वहाँ उद्देश्ययुक्त जीवन एकारामता का प्रवर्तक माना गया है । लक्ष्यविहीन कर्म्मण्य मनुष्य ही प्रज्ञापराध के सत्पात्र बनते हुए ऐन्द्रियक भोगपाशों से बद्ध होते हैं । अनुभव से प्रमाणित है कि, कर्म्मण्यदशा में हीं हमारा मन इतस्ततः अनुधावन करता है । यदि हम इसके सामने कोई लक्ष्य रख देते हैं, तो इसकी अन्य वृत्तियों का लक्ष्य पर केन्द्रीकरण हो जाता । इस लक्ष्य के सम्बन्ध में यह लक्ष्य रखना आवश्यक होगा कि, कहीं स्वयं लक्ष्य तो लक्ष्य नहीं बन रहा है । एक समय में अनेक लक्ष्य बनाना लक्ष्य को अलक्ष्य बनाना है । ऐसा अलक्ष्यात्मक लक्ष्य एकारामता का प्रतिद्वन्द्वी बनता हुआ अन्ततोगत्त्वा इन्द्रियारामतामूलक चाञ्चल्य का ही प्रवर्तक बन जाता है | हमारा लक्ष्य स्थिर हो, और वह एक हो, यही एकारामता है । एकारामता ही इन्द्रिय-संयम का मूल है । ( ६ ) - प्रवृद्धप्रज्ञा– एकारामता से प्रज्ञानमन अपने प्रज्ञाभाग से स्थिर बन जाता है । इन्द्रियार | मता, तथा अनेक-लक्ष्यानुगमनता जहाँ प्रज्ञा को खण्ड - खण्डरूप में परिणत करती हुई इसके स्वाभाविक विकास का द्वार अवरुद्ध कर देती है, वहाँ आत्मानुगता, किंवा बुद्धिसंस्कृता एकारामता, तथा अनन्यलक्ष्यता प्रज्ञा को एकत्र आकर्षित करती हुई प्रज्ञावृद्धि का कारण बन जाती है । यही नवीं अधिकारमर्य्यादा है । तीव्रप्रज्ञता ही इसका बीज है । ( १० ) - यशो ऽनुगमन – ' रेतः - श्रद्धा - यशः ' ये तीन चन्द्रमा के मनोता है । चन्द्रमा मन का उपादान है । फलत: अध्यात्म-संस्था में ये तीनों मानधर्म बन रहे हैं । इसी मानस यशः प्राण से अध्येता का मन यशस्वी बनता है । ३५४

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तृतीयखण्ड जिसमें यश: करण का जितना अधिक विकास होता है, वह अपने कर्म से लोक में उतना हीं अधिक यशस्वी होता है । देखा जाता है कि, बड़े बड़े काम करने वाले भी यशः सम्पत्ति से वञ्चित रह जाते हैं । कारण यही है कि, उनका आध्यात्मिक यशःप्राण मूच्छित है । अतएव इन्हें लोकसम्पति नहीं मिलती । परिणाम में कालान्तर में ये हतोत्साह बन जाते हैं । ऐसी स्थिति में मानना पड़ेगा कि, यशोविकास भी स्वाध्यायकर्म में उपोट्लक बन रहा है । इसी दृष्टि से ऋषि ने इसे भी अधिकारमर्यादा में अन्तर्भुत मान लिया है । ( ११ ) -लोकपक्ति-उक्त १० सों साधन तभी सर्वात्मना सफल हो सकते हैं, जब इसे लोकसहानुभूति, सहयोग प्राप्त होता रहे । विद्याभ्यासी को समाजद्वारा सहयोग मिलना परम आवश्यक है । अन्यथा सांसारिक चिन्ताएँ इसे इस कम्म से च्युत कर देती हैं । " हम अमुक के लिए पच - मरने के लिए तय्यार हैं, इसमें हम अपना सौभाग्य समझते हैं " इस प्रकार की भावना ही लोकपक्ति है । तदनुगत अध्येता ही स्वाध्यायकर्म में सफल हो सकता है । भारतवर्ष का दुर्भाग्य है कि, आज वह लोकपक्ति - सम्पत् को सर्वथा भुला चुका है । यही कारण है कि, अन्य साधनों के रहते भी अध्येता अध्ययनकर्म में सफलता प्राप्त नहीं कर रहे । २ शिष्य स्वाध्यायकर्म का अनुगामी है, गुरु प्रवचनकर्म का अनुगामी है । जो ११ गुण शिष्य के लिए अपेक्षित हैं, वे ही ११ गुण प्रवचनकर्त्ता गुरु के लिए अपेक्षित हैं । इन अधिकारमर्य्यादाओं का अनुगमन करने वाला शिष्पवर्ग, तथा श्राचार्य्यवर्ग, फलस्वरूप इन्हीं ग्यारह विभूतियों के सत्पात्र बन जाते है । उनका स्वाध्याय – प्रवचन स्वाभाविक कर्म्म ' बन जाता है । उनका मन स्थितप्रज्ञ बन जाता है । वे श्रात्मस्वातन्त्र्य के अनुगामी बन जाते हैं । वे अभीप्सित अर्थसाधन में समर्थ हो जाते हैं । उन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती । वे पूर्ण स्वस्थ रहते हैं । उनका जीवन संयत बन जाता है । उनकी बुद्धि व्यवसायात्मिका बन जाती है । बे मनस्वी बन जाते हैं । लोक में उनका यश व्या'त | जाता है । एवं- ' सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति ' " के अनुसार सत्र उनकी सेवा के लिए प्रस्तुत रहते हैं । इसी अधिकार, एवं तदनुगत फलस्वरूप का दिग्दर्शन कराते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— अधिकार मर्यादा-( उद्द ेश्यरूपा ) १ – प्रिये स्वाध्यायप्रवचने स्याताम् २ – युक्तमना भवेत् ३ – अपराधीनः ( भवेत् ) ४ - हरहरर्थान् साधयेत् ५ - सुखं स्वप्यात् ६ - परमचिकित्सक श्रात्मनो भवेत् ७ – इन्द्रियसंयम ( युक्तो भवेत् ) ३५५ फलमर्यादा-( विधेयरूपा ) १ - " प्रिये स्वाध्यायप्रवचने भवतः " २. " युक्तमना भवति " । ३ – “ अपराधीनः ( भवति ) ' । ४ — “ अहरहरर्थान् साधयते ” । ५ – “ सुखं स्वपिति ” । - " परमचिकित्सक श्रात्मनो भवति " । ७ - " इन्द्रियसंयम ( युक्तो भवति ) ” ।

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= - एकारामता ( प्राप्नुयात् ) ६ --- प्रज्ञावृद्धि: ( कार्य्या ) १० — यशो ( ऽनुगतः स्यात् ) ११ – लोकपक्ति ( रन्विच्छेत् ) मायभूमिका ८ - " एकारामता ( पानोति ) " । ६ - " प्रशावृद्धि ( र्भवति । " । १० - " यशोऽ ( नुगामी भवति ) ” । ११- " लोकपक्तियुक्तो भवति ) ” । " ये ह वै च श्रमा इमे द्यावापृथिवी अन्तरेण, स्वाध्यायो हैव तेषां परमता, काष्ठा - य एवं विद्वानृत्स्वाध्यायमधीते । तस्मात् - स्वाध्यायोऽध्येतव्यः " ६- परिशिष्ट- अधिकार मर्यादा, -( शतः १ ९ । कां ४ प्र ० । १ वा ० ) । ( १ ) ब्रह्मविद्या का अधिकार किये है? इस प्रश्न की मीमांसा मुण्डकोपनिषत् में भी हुई हैं । यहाँ वेदशास्त्रसम्मत कम्र्मानुगमन, ब्रह्मनिष्ठानुगमन, श्रात्मयज्ञानुगमन, श्रद्धानुगमन, शिरोव्रतोऽनुगमन, इन पाँच साधनों को अधिकारसमर्पक बतलाया गया है । जो शास्त्रसिद्ध कम्र्म के अनुगामी बने रहते हैं, जिनकी कुल-परम्परा में शास्त्रीय कम्मों का आचरणात्मक समादर है, जो स्वयं भी क्रियात्मक धर्मानुष्ठान में प्रवृत्त हैं, वे ही इस औपनिषद ज्ञानलक्षण ब्रह्मविद्योपदेश के अधिकारी हैं । जो सर्वत्र अमेददर्शन करते हुए ' एकर्षि ' नाम मे प्रसिद्ध आत्मा का यजन करते रहते हैं, आत्मथ के उपासक बने रहते हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं । जो इस विद्या के प्रति श्रद्धा रखते हैं, वे ही इसके अधिकारी है । सर्वोपरि जिन्होंनें शिरोत्रत का अनुगमन कर लिया है, वे ही इसके अधिकारी हैं । ज्ञानाग्नि, प्राणाग्नि, भूताग्नि, भेद से आध्यात्मिक संस्था में तीन अग्निसंस्थान मानें गए हैं । शिरोगुहा ज्ञानाग्नि संस्थान है, उरोगुहा प्राणाग्निसंस्थान है, एवं उदरगुहा भूताग्निसंस्थान है । शिरोगुहा - स्थित प्रज्ञान - संयुक्त विज्ञान ( बुद्धि ) ही ज्ञानाग्नि है । जो अपने शुक्रात्मक सोम की इस ज्ञानाग्नि में आहुति देते रहते हैं, वे ऊध्वरेता कहलाए हैं, जैसा कि पूर्व परिच्छेदों में स्पष्ट किया जा चुका है । इस शिरोमार्गात ज्ञानाग्नि शुकाहुति देने बालों का ही ज्ञानाग्नि प्रवृद्ध रहता है । ऐसे ज्ञाननिष्ठ ही ' शिरोत्रती ' कहलाए हैं । इसप्रकार ज्ञानयज्ञानुगत शिरोवती ही प्रधानतः ज्ञानप्रधाना इस ब्रह्मविद्या के प्रधान अधिकारी मानें जा सकते हैं । ज्ञान की ओर स्वाभाविक प्रवृति ही इस अधिकारमर्य्यादा का प्रत्यक्ष निदर्शन है । जो श्रान्त्यन्तिकरूप से विषय-परायण हैं, उनका ज्ञानाग्नि मूर्च्छित रहता है । ऐसे ही लोकवती ( लोकपरायण ) ' अचीर्णव्रती ' हैं । ऐसे व्यक्ति इस क्षेत्र में सर्वथा अनधिकृत हैं । निम्न लिखित मुण्डकश्रुति इसी अधिकार - मय्र्यादा का स्पष्टीकरण कर रही है-“ क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठा, स्वयं जुह्वत एकपिं श्रद्धयन्तः । तेषामेतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोत्रतं विधिवद्यस्तु चीर्णम् ॥ तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच - नैतदचीर्णत्रतोऽधीते ” ( मुण्डकोप ० ३।२।१०,११ ) । ( २ ) - सबसे प्रधान मर्यादा ' अनुसूया ' भाव है । जो व्यक्ति शास्त्रीय वचनों पर श्रद्धा करता है, शास्थादेशों के प्रति अनुराग रखता है, जिसे यह विश्वास है कि, इसके अनुगमन से श्रवश्य ही मेरा ३५६