Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 371–380
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 371–380
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तृतीयखण्ड अभ्युदय - निःश्रेयस् है, ऐसा श्रद्धालु, विश्वासी व्यक्ति ही इस शास्त्र का अधिकारी बन सकता है । स्वयं वेद-भगवान् का इस सम्बन्ध में यह आवेशपूर्ण आदेश है कि, तुम उसी के प्रति विद्योपदेश करो, जो शास्त्र के प्रति श्रद्धा रखता है, ऋजुभाव से अनुकूल तर्क से अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है । ठीक इसके विपरीत यदि तुमनें अनधिकारी - अश्रद्धालु को उपदेश का क्षेत्र बना लिया, तो विश्वास करो - तुम्हारा अपना विद्यासंस्कार निर्बल हो जायगा । ग्रनधिकारी का अश्रद्धा दोष तुम्हारे आत्मा पर भी आक्रमण कर बैठेगा । इसी अधिकारमय्या का समर्थन करते हुए ऋषि कहते हैं -" विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकायानृजवेऽयताय न मात्र या, वीर्य्यवती तथा स्याम् ” ॥ " ( किसी समय ) विद्या ( विद्याभिमानिनी वाग्देवी ) वेदवित् ब्राह्मण के समीप आई, और कहने लगी, हे ब्राह्मण! तुम मेरे स्वरूप की रक्षा करो । सुरक्षित होती हुई मैं तुम्हारे अभीष्ट सिद्ध कर सकूँगी । परनिन्दक, कुटिल, असंयतेन्द्रिय, अश्रद्धालु, मायावी, लोकैषणासक्त, ऐसे अधिकारियों के लिए मेरा कदापि प्रवचन न करो । इस नियम के परिपालन से मैं तुम्हारे लिए वीर्य्यवती बनी रहूँगी " । अधिकारीवर्ग को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि, जिस गुरु से वे विद्योपदेशग्रहण करते हैं, उसके प्रति, उसके वचनों के प्रति पूर्ण श्रद्धा बनाए रक्खे | तभी इसमें विद्याविकास सम्भव होगा । जो गुरु अपने उपदेशामृत से शिष्य की अविद्या दूर करता हुआ इसे अमृतसम्पत्ति प्रदान करता है, हमें ' द्विज ' सम्पत् प्रदान करने वाला ऐसा गुरु मातृ - पितृ - स्थानीय है । उस से द्रोह करना अपने आप से द्रोह करना है । गुरु के प्रति अनन्यश्रद्धा ही अधिकार - मर्यादा का मूलाधार है । उपदेष्टा गुरु के प्रति जो भूल से भी द्रोह करने लगते हैं, न उन पर गुरुकृपा रहती, एवं न गुरूपदेश ही उनके लिए सफल बनता । उनका सम्पूर्ण श्रुत उपदेश सर्वथा व्यर्थ चला जाता है । इसलिए— " य तृणत्यवितथेन कर्णावदुःखं कुर्वन्नमृतं सम्प्रयच्छन् ॥ तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्य ेत् कतमच्च नाह ॥१ ॥
अध्यापिता गुरु नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा ॥ यथैव ते न गुरोर्भोजनीयास्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुतं तन् ॥ ” साथ ही उपदेशक गुरु को भी विद्योपदेश से पहिले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि, अमुक व्यक्ति इस योग्य हैं, अथवा नहीं? | धर्म्मशास्त्रोक्त यम - नियमानुगमन के द्वारा जिसका अन्त: करण निर्मल है, आशु-ग्रहणलक्षण मेधागुण से जो युक्त है, जो जिज्ञासाभाव से यथाविधि शिष्य बन रहा है, साथ ही जिसके प्रति यह विश्वास है कि, यह कभी द्रोह नहीं करेगा, उसी के प्रति विद्योपदेश करना चाहिए-३५७
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मायभूमिका
" यमेव विद्याः शुचिमप्रचं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् ।
यस्तेन द्रुह्य ेत् कतमच्च नाह तस्मै मात्र यानिधिपाय ब्रह्मन् ” ॥ * ॥
( ३ ) - वेदव्याख्याता यास्काचार्य ने भी इस अधिकारमर्यादा का संक्षेप से स्पष्टीकरण किया है । निरुक्त का प्रधान लक्ष्य निर्वचन है, निर्वचन ही शब्दों के तत्त्वार्थ का बोधक माना गया है । अतएव निक्ति मे पहिले शब्द - शान आवश्यक है । उपदेश का आधार शब्दशास्त्र है । श्रतएव शब्दज्ञानसाधक व्याकरण का विशेष बोध नहीं, तो सामान्यबोध श्रवश्यमेव अपेक्षित है । वेदशास्त्राधिकार प्राप्ति के लिए व्याकरणज्ञान नितान्त अपेक्षित है | व्याकरणशून्य के लिए वेदशास्त्र एक समय प्रश्न है | चाहे व्याकरणशास्त्र का परपारगामी विद्वान ही क्यों न हों, यदि उसमें प्रपन्नता नहीं है, शिष्यानुगता जिज्ञासा नहीं है, तो ऐमे श्रनुप-सन व्याकरण को भी वेदशास्त्र का अधिकारी ही माना जायगा । प्रत्येक दशा में शिष्य बनना अनिवार्य है । यदि कोई शुष्क वैय्याकरण है, जिसे कि, ' वैय्याकरणखसूचि ' कहा गया है, तो वह भी ' श्रनिदंवित् ' चनता हुआ अनधिकारी ही माना जायगा । वेदशास्त्र सर्वज्ञाननिधि है । इसमें प्रवेशाधिकार पाने के लिए केवल व्याकरणज्ञान ही पर्याप्त नहीं है । दर्शनादि अन्य शास्त्रज्ञान के बिना विशुद्ध वैय्याकरण अनियंवित् जनता हुआ अनधिकारी है । अवश्य ही इस अधिकारप्राप्ति के लिए अन्य शास्त्रों का सामान्य बोध भी परम आवश्यक है । इसके अतिरिक्त स्वाभाविक प्रतिभा भी अपेक्षित है । प्रजानुगामिनी प्रतिभा ही वेदशास्त्र के तात्त्विक बोध में समर्थ है । बिना प्रतिभा के वेद के निगूढ विषय समझ में नहीं आते । और उस दशा में प्रतिभाशून्य अधिकारी अपने अज्ञान का दोष उपदेश के प्रति समर्पित करने लगता है । परिणाम में विद्याप्रतिबन्धक असूया -दोष उत्पन्न हो जाता है । इसप्रकार निरुक्तमतानुसार व्याकरण ज्ञान युक्त, श्रन्यशास्त्रबोधयुक्त, प्रतिभा-सम्पन्न, शिष्यवुडिङ्कक्क व्यक्ति ही वेदशास्त्राध्ययन का अधिकार प्राप्त कर सकता है । निम्न लिखिता सूत्र-चतुष्टयी इसी अधिकार मर्यादा का स्पष्टीकरण कर रही है-“ १ – नावैय्याकरणाय, २ – नानुपसन्नाय, ३ - अनिदविदे बा,
४ - नित्यं विज्ञातुर्विज्ञाने ऽसूया " ( या ० नि ०२।३।५,६,७,८, ) ।
* विद्या ब्राह्मणमेत्याह शेत्रविष्टेस्पि रक्ष माम् ॥
असूयकाय मां मादास्तथा स्यां वीर्य्यवनमा ॥ १ ॥
यमेव तु शुचिं विद्यान्नियतब्रह्मचारिणम् ॥
तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाप्रमादिने ॥२ ॥
ब्रह्म यस्त्वननुज्ञातमधीयानादवाप्नुयात् ॥
स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥
— मनुः २।११४, १५, १६, । ३५८
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तृतीयखण्ड “ उपसन्नाय तु निब्रूयात्- यो बाऽलं विज्ञातुं स्यात्, मेधाविने तपस्विने वा ' ( या ० नि ०२।३।६ ) । अधिकार प्रश्न को लेकर आज अनेक प्रकार के ऊहापोह उपस्थित किए जारहे हैं । परिस्थिति वस्तुतः यह है कि, किसी को तत्त्वपरिज्ञान की जिज्ञासा नहीं है । जिज्ञासा के अतिरिक्त आज कई एक श्रागन्तुक दोषों से हमारा सत्त्वभाग सर्वथा मलिन हो चुका है । फलतः स्वाभाविक अधिकारमर्थ्यादा एकान्ततः श्रभिभूत है । अधिकार माँगने से नहीं मिलता, अपितु वह अपनी योग्यता पर अवलम्बित है । जबतक विद्याग्रहणयोग्यतानु-रूपा अधिकार - मर्य्यादा उबुद्ध नहीं हो जाती, तब तक ' हम अधिकारी हैं, हम अधिकारी हैं ' इस निरर्थक उद्घोष से कोई लाभ नहीं हो सकता । ज्ञानलवदुर्विदग्ध वर्तमानयुग के मादृश अधिकारी कभी सफल नहीं हो सकते । हम स्वयं विद्वान् बन कर, पहिले अपना मन्तव्य स्थिर बना कर आगे बढ़ते हैं । ऐसी दशा में तत्त्वज्ञान न हो तो, कोई आश्चर्य नहीं है । ' पाण्डित्यं निर्भिद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ' इस औपनिषद आदेश के अनुसार हमें बच्चे बन कर ज्ञानक्षेत्र में प्रवृत होना चाहिए । शास्त्रप्रदिष्ट उन उपायों का अनुगमन करना चाहिए, जो श्रात्मगत दोषों को हटा कर उसे विद्यासंस्कारग्रहण के योग्य बनाते हैं । ' तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभि-गच्छेत् ' को लक्ष्य बनाकर तदर्शी गुरु के प्रति श्रात्मसमर्पण किए बिना केवल अनुवाद - भाग्यादि के बल पर, किंवा धर्म्म, तन्मूला आस्था श्रद्धा, तद्युक्त शास्त्रीय विधि - विधान से सर्वथा संस्पृष्ट रूक्ष विशुद्ध बुद्धिवाद के बल पर तत्त्वज्ञानप्राप्ति नितान्त श्रसन्भव है, जैसा कि - निम्नलिखित छान्दोग्यवचन से प्रमाणित है— " तमाचार्य्योऽभ्युवाद - सत्यकाम! इति, भगव! इति प्रतिशुश्राव । ब्रह्मत्रिदेव नै सोम्य! भासि, को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्ये-भ्य इति प्रतिजज्ञे । भगत्राँस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् । श्रुतं ह्येव भगवदृशेभ्यः - ‘ आचार्य्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति, इति तस्मै तदेवोवाच । अत्र ह न किश्चन वीयाय - इति ” ( छां ० उ ०४।६।१,२,३, ) । हमारी अधिकारमर्य्यादा, तथा शास्त्रीय अधिकारमय्र्यादा, दोनों के समतुलन से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, हम वेदशास्त्र के लिए सर्वथा अनधिकारी हैं । विद्या विकास के लिए जो चिरकालिक पेक्षित है, वह सर्वथा विलीन है । आज हम चाहते यह हैं कि, अहोरात्र अन्यान्य सांसारिक - अर्थ-प्रधानक्षेत्रों की उपासना करते रहें, अपनी काल्पनिक लोकैषणाओं के द्वारा कल्पित व्यक्तित्त्व के विमोहन में आसक्त होकर श्रात्म - ब्रह्म - विद्या - वेद - धर्म - विरोधी भी लोकमानवों का समालिङ्गन करते हुए कल्पित मानवता का अभिनय करते रहें, और साथ ही हमारी विद्याक्षेत्र में भी पूर्ण प्रगति होती रहे । सर्वथा असम्भव । ऐसे अनधिकारियों के अनुग्रह से ही तो सच्छास्त्र ाज श्रन्तम्मुख बने हुए हैं । प्रश्न के अव्यवहितोत्तरकाल में ही इच्छा यह प्रकट की जाती है कि, अभी इसका तत्त्वज्ञान करा दिया जाय । यदि प्रश्नकर्त्ता से यह कह दिया जाता है कि, अभी आप इसका उत्तर हृदयङ्गम नहीं कर सकेंगे, तो प्रश्नकर्त्ता तत्काल यह निर्णय कर डालता है ३५६
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भाष्यभूमिका कि, इन्हें कुछ नहीं आता । उधर ओपनिषद ज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली अधिकारमर्यादाओं के इतिवृत्त की ओर जत्र हमारा ध्यान जाता है, तो वर्त्तमानयुग की प्रवृत्ति पर स्तब्ध हो जाना पड़ता है । सुकेशा भारद्वाजादि विद्वान् पिप्पलाद के सम्मुख जिज्ञासा ले कर उपस्थित होते हैं, उत्तर मिलता है-एकवर्ष पर्यन्त योग्यता सम्पादक नियमों का अनुगमन कीजिए । अनन्तर प्रश्न का समाधान किया जायगा । सत्यकाम को आदेश मिलता है ४०० गाएँ ले जाओ, जब ये १००० बन जायें, तत्र वापस लौटना, अनन्तर उपदेश के अधिकारी बनोगे । इन्द्र - विरोचन प्रजापति की सेवा में श्रात्मस्वरूप की जिज्ञासा ले कर उपस्थित होते हैं । उत्तर मिलता है - " एवमेवैध मघवन्निति होवाच । एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि । वसाऽपराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि । स हा पराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास । तस्मै होबाच " ( छा ० उ ०८ ६३ ॥ ये ही कुछ एक ऐसी जटिल समस्याएँ हैं, जिन्हे लक्ष्य में रखते हुए वर्त्तमान युग के ज्येष्ठ - श्रेष्ठ - सर्वज्ञ - बुद्धि-वादी श्रधिकारियों के सम्मुख अधिकारमर्य्यादा का स्वरूप रखते हुए हम हृत्कम्प का अनुभव कर रहे हैं । ६- स्वाध्यायवतमीमांसा-" आदर्शवाद जिस युग में यथार्थवाद था, उस युग के लिए प्रतिपादित उक्त अधिकारमर्थ्यादाओं के अनुगमन के बिना किसी भी युग में वेदशास्त्र का पूर्णरूप से तत्त्वबोध सम्भव नहीं है, " इस सिद्धान्त को सुरक्षित रखते हुए भी हम उस युग से सम्बन्ध रखने वाले यथार्थवाद, किंवा परिस्थितिवाद की ओर से भी सर्वथा श्रखमिचौली नही खेल सकते, जिस युग में कई एक कारणविशेषों से यथार्थवाद का आदर्शवाद से अनेक अंशों में पार्थक्य हो गया है । वर्त्तमान युग की विषम परिस्थितियों में प्रतिपादित अधिकारमर्य्यादा प्राप्त कर ली जाय, फलस्वरूप वेदशास्त्र का तत्त्वज्ञान उपलब्ध हो जाय, यह केवल काल्पनिक जगत् के काल्पनिक विचार हैं । यत्र कुत्रचित परिगणित अपवाद स्थलों को छोड़ कर आज परिस्थितियों के आक्रमण से वह अधिकारमर्य्यादा हमारे लिए प्रणम्य बन रही है । ऐसी दशा में क्या यह किया जाय कि, वेदशास्त्र को बस्ते में बन्द कर पूजागृह में प्रतिष्ठित कर दिया जाय १, नेति होवाच!
न हि कल्याणकृत् कश्चिद्द गतिं तात! गच्छति ।
स्वल्पमप्यस्य धर्म्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
सिद्धान्त के आधार पर हम प्रतिपादित अधिकारमर्य्यादाओं में से वर्तमान की कुछ एक मर्य्यादाओं का वर्तमान परिस्थिति में भी अनुगमन कर सकते हैं, एवं इन्हीं श्रंशात्मिका अधिकारमर्थ्यादाओं के आधार पर हम अंशतः अपने स्वाध्यायकर्म में सफलता भी प्राप्त कर सकते हैं । अधिकारमय्र्यादा के सम्बन्ध में जो नियमोपनियम बतलाए गए हैं, उन सबका एकमात्र लक्ष्य यही है कि, हमारा मन दोषों से वियुक्त होता हुआ विद्यासंस्कार - ग्रहण - योग्य बन जाय, हमारा ज्ञानाग्नि विक. खेत हो जाय । परमकारुणिक महर्षियों नें कुछ एक ऐसे उपाय भी बतला दिए हैं, जिनके अनुगमन से कालान्तर में लक्ष्यसिद्धि हो जाती है, एवं हम अधिकारी की कोटि में आ जाते हैं । हमें हमारी चर्य्याओं में कुछ एक ऐसे अतिशयों का समावेश कर डालना चाहिए, जिनसे अध्यात्मसंस्था का उत्तरोत्तर विकास निश्चित है । उन श्रतिशयाचायक नियम विशेषों को ही ' स्वाध्यायत्रत ' कहा गया है । यद्यपि निर्दिष्ट स्वाध्यायवत स्वाध्याय - कर्म में प्रवृत्त होने के अनन्तर स्वाध्यायकर्म्म की रक्षा के लिए उपयुक्त माने गए हैं । तथापि इन्हें अधिकारसमर्पक भी माना जा सकता है । अवश्य ही इनके ३६०
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तृतीयखण्ड पूर्णानुगमन से, एवं सततानुगमन से स्वाध्याय की ओर हमारी प्रवृत्ति भी होने लगती है, एवं वह प्रवृत्ति सुरक्षित भी रह सकती है । जो इस अनन्त तपः कर्म्मलक्षण स्वाध्याय में प्रवृत्त होना चाहते हैं, जिन्हें ब्रह्मविद्या - सेतु पर पहुँचने की आकांक्षा है, उन्हें निम्न लिखित ( कतिपय ) स्वाध्यायत्रतों का अनुगमन करना चाहिए— स्वाध्यायव्रतनिदर्शनानि — १ - सूर्योदय से पहिले उत्थापन २ - ईशसंस्मरणपूर्वक नित्यकर्मानुगमन ३– देव - द्विज - गुरु - ज्येष्ठ - वृद्धों का उपसेवन ४ – अहरहः स्वाध्यायकम्र्मानुगमन ५ - यथाशक्य सत्यभाषणानुगमन ६ – सत्त्वगुणोपेत आहार विहारोपसेवन ७ – कुसङ्ग का एकान्ततः विसर्जन ८ -- जनकलकलसंसर्ग का विसर्जन ६ – गोवंशपूजन १० – उद्दण्डतापरिवर्जन ११ – हित - मित- प्रियभाषणानुगमन १२ - असप्रियाख्यानवर्जन १३ – वृथाचेष्टा विसर्जन १४ – कुतूहल प्रवृत्तिवर्जन १५ – स्वस्त्ययनकर्मानुगमन " तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् " ( मनुः ४।१४ । ) एक अनुभूत प्रयोग है - ' स्वाध्यायकर्म्म का नैरन्तर्य्य ' । हमें यह नियम बना लेना चाहिए कि, हन प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य पढ़ेंगे । भोजनकर्म्मवत् इस कर्म को ही थोड़े दिनों मानसजगत् अपने ऊपर अनुचित भार का अनुभव बुद्धिपूर्वक बलप्रयोग से यदि हमनें इस अभ्यास को सुरक्षित रक्खा, अनिवार्य्यं बना लेना चाहिए | अवश्य करेगा । परन्तु थोड़ी सावधानी से, तो अवश्यमेव स्वाध्यायानुष्ठान में -सफलता मिलेगी । शास्त्राभ्यास ज्यों ज्यों वृद्धिंगत होगा, त्यों त्यों बुद्धिगत विज्ञान विकसित होगा । स्वयं भगवान् मनु ने इस शास्त्राभ्यासनैरन्तर्य्यं को सफलता का मूलसूत्र माना है.
१ – बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च ।
नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ॥
यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति । तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते । ( मनुः ४ १६, २० ) । इसी सम्बन्ध में एक बात और । स्वाध्यायकर्म के सम्बन्ध में कल्पसूत्र, स्मृत्यादि में अष्टमी, प्रतिपत् श्रादि जो अनध्यायकाल बतलाए गए हैं, उनके प्रति अपनी श्रद्धा को अणुमात्र भी कम न करते हु इस सम्बन्ध में यह स्पष्टीकरण करने का साहस किया जायगा कि, जिस युग में वेदस्वाध्याय एकान्ततः विलुप्त हो चुका हो, वैदिक साहित्य स्मृतिगर्भ में विलीन हो रहा हो, आज के उस श्रापद्युग में हमें - ' अनध्याय-* जिन कम्मों के अनुगमन से आत्मा के स्वस्तिभाव की निवृत्ति, तथा स्वस्तिभाव की प्रवृत्ति होती है, उन शान्ति – समृद्धि - तुष्टि - पुष्टि- प्रवर्तक कम्मों को ही ' स्वस्त्यन कम् ' कहा गया है । इनका वैज्ञानिक विवेचन गीताविज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत कम्मयोगपरीक्षा - द्वितीयखण्डात्मक ' ग ' विभाग के ' हमारे स्वस्त्यनकर नामक अवान्तर प्रकरण में देखना चाहिए । ३६१
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भाष्यभूमिका प्रियाहि छात्राः, विशेषतो गुरव: ' इस मुन्दर सूक्ति की एकान्ततः उपेक्षा कर देनी चाहिए । यह हमारा सौभाग्य है कि, स्वयं श्रुति ने अनध्यायमर्य्यादा को दत्तकपुत्र - मर्यादावत् अपवादकोटि में ही सुरक्षित रक्खा है । सृष्टिकालोपलक्षित वेदस्रष्टा भगवान् ब्रह्मा के पुण्याह में कोई तिथि, कोई समय वर्ज्य नहीं है । सोते, खाते, पीते, उठते, बैटते, मन्त्र अवस्थाओं में सर्वत्र सदा हमारे आध्यात्मिक नगत् में स्वाध्यायकम्म का धारावाहिक स्रोत प्रवाहित रहना ही चाहिए । शाश्वतब्रह्म के शाश्वतयज्ञ ( ब्रह्मयज्ञ ) लक्षण स्वाध्यायकम्र्म्म ' का कभी अनध्याय नहीं है । क्या कभी पानी अपना बहाव बंद करते हैं?, क्या आदित्य अपनी दैनंदिनगति से कभी विश्राम लेते हैं?, क्या चन्द्रमा को कभी किसी ने श्रनध्याय करते देखा है?, क्या नक्षत्र कभी छुट्टी लेकर स्वक्षेत्र से पलायित होते हैं? | यदि दुर्भाग्य से ये प्राकृतिक देवता अनध्याय करने लगें, तो सृष्टिमर्यादा की कैसी दुर्दशा हो, कल्पना कीजिए । ब्राह्मण भी भूदेव हैं, प्राकृतिक देवताओं के अनुसार इन्हें भी सदा स्वाध्याय-यज्ञलक्षण सत्र में प्रतिष्ठित रहना चाहिए । मृत्यु, जरा, रोग, ये तीन प्रतिबन्धक ही इन्हें इस सत्र से विमुख बना सकते हैं । आत्मा ' स्व ' लक्षण है । तदनुगत अध्ययन ही ' स्वाध्याय ' है । शाश्वत व स्व ( आत्मा ) का अध्ययनलक्षण स्वाध्यायकर्म भी इसी शाश्वतधर्म्मा से युक्त है । यही स्वाध्यायकर्म की अनवच्छिन्नता का मूलरहस्य है, जिसका - " श्रभिव्याहरेन - व्रतस्याव्यवच्छेदाय " ( शत ० ११ | ४ | १ | १० ) से समर्थन हो रहा है | देखिए स्वयं वेदभगवान् अपनी ओर से क्या आदेश दे रहे हैं— १ – “ अथ ब्रह्मयज्ञः । स्वाध्यायो नै ब्रह्मयज्ञः । तस्य वा एतस्य ब्रह्मयज्ञस्य वागेव जुहूः, मन उपभृत्, चक्षुभ्रु ' वा, मेधा स्रुवः, सत्यमत्रभृथः, स्वर्गो लोक उदयनम् । यात्रन्तं ह वाऽइमां पृथिवीं विनेन पूर्ण दइँल्लोकं जयति, त्रिस्तावन्तं जयति, भूयांसं चाक्षय्यं, य एवं विद्वानहरहः स्वाध्यायमधीते । तस्मात् स्वाध्यायो-S ध्येतव्यः " ( शव ११।५।६।३ । ) । २ – ‘ “ तस्य वा एतस्य ब्रह्मयज्ञस्य चत्वारो वषट्काराः - यद्वातो वाति, यद्विद्योतते विद्युत्, यत्स्तनयति, यदवस्फूर्जति । तस्मादेवंवित् वा वाति, विद्योतमाने स्तनयति, अवस्फूर्जति – ‘ अधीयीतेव ' XXX । स चेदपि प्रलमित्र न शक्नुयात्, अप्येकं देवपदं - अधीयीतत्र । तथा भूतेभ्यो न हीयते " ( शत ० ११५ | ६ | ६ | ) । ३– “ यदि ह वा अप्यभ्यक्तः, अलङ्कृतः, सुहितः, सुखे शयने शयानः, स्वाध्यायमधीते - हैव स नखाग्रेभ्यस्तप्यते, य एवं विद्वान्त्स्वाध्यायमधीते ।
तस्मात् स्त्राध्यायोऽध्येतव्यः । " ( शत ० ११ । ५ । ७ । ४ । ) I ।
* - वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः ॥
वेदाभ्यासोहि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १ ॥
[ शेष पृष्ठ २६३ पर ] ३६२
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तृतीयखण्ड ४ - " यन्ति वाऽपः, एति आदित्यः, एति चन्द्रमाः, यन्ति नक्षत्राणि । यथाह वा Se ता देवता नेयुः, न कुर्युः, एवं हैव तदहर्ब्राह्मणो भवति, यदहः स्वाध्यावं नाधीते । तस्मात् स्वाध्यायो ऽध्येतव्यः " । ( शत ० ११।५।७।१० । ) । ** प्रकरणोपसंहार— ' औपनिषद ज्ञान का अधिकारी कौन है? इस प्रश्न के सम्बन्ध में अब तक जिन अलौकिक, लौकिक अधिकारों का दिग्दर्शन कराया गया है, उन सबका वस्तुतः श्रात्मनिष्ठा से ही सम्बन्ध माना जायगा । जैसाकि कहा जा चुका है, अधिकार न तो प्राप्त करने की ही वस्तु है, न माँगने से ही अधिकार मिलता है । हृदयाकाशस्थ दभ्राकाश ( दहराकाश ) में उक्थरूप से प्रतिष्ठित चिज्ज्योतिर्धन ब्रह्म ही औपनिषद पुरुष है । यही वस्तुतः औपनिषद ज्ञान है, जिसके सम्पर्कमात्र से शेष भेट प्रत्यस्त हैं, जो विशुद्ध सत्ताघन है, अतएव वाङ्मनस पथातीत बनता हुआ अगोचर है - । औपाधिक भेदनिवृत्ति हो जाने पर यह स्वतः प्रकट है । ' तत् स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' के अनुसार शास्त्रमिद्ध सोपाधिक कम्र्मानुगमन से बुद्धियोगसम्पत्ति प्राप्त हो जाती है, तो बिना किसी प्रयास के नाप्राप्त ( नित्यप्राप्त ) इस औपनिषद ज्ञान का अधिकार प्रकट हो जाता है । प्रतिपादित तप, मेधा, प्रवचन, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, श्रवण, मनन, आदि अधिकार बुद्धियोग से सम्बन्ध रखते हैं, न कि औपनिषदज्ञान से । निम्नलिखित उपनिषच्छ्र ुति को सम्मुख रखते हुए प्रकरण विश्राम ग्रहण कर रहा है— “ नायमात्मा प्रवचेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन । यमेष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ " ( कठोपनिषत् १।२।२२ ) । ' औपनिषद - ज्ञानाधिकारिस्वरूप दिग्दर्शन ' नामक चतुर्थ स्थम्भ उपरत ४ --[ पृष्ठ ३६२ की टिप्पणी का शेषांश ] हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः ॥ यः सव्यपि द्विजो s वी स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ॥ २ ॥
— ( मनुः २ अ०।१६६-६७ श्लो ० ) ।
-- प्रत्यस्ताशेषभेदं यत्, सत्तामात्र मगोचरम् ।
वचसामात्मसंवेद्य ं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' ओपनिषद - ज्ञानाधिकारि स्वरूप दिग्दर्शन ' चतुर्थ - स्तम्भ - उपरत ४ नामक -X-
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t: उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत-' ब्राह्मण - आरण्यक - उपनिषत् -सम्बन्धस्वरूपदिग्दर्शन ' नामक पञ्चम- स्तम्भ ५
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श्रीः ब्राह्मण - आरण्यक उपनिषत् - सम्बन्धस्वरूपदिग्दर्शन पञ्चम स्तम्भ १ - उपनिषत्, और उपनिपच्छास्त्र — * प्रकृत प्रकरण के यथावत् समन्वय के लिए हम पाटकों से अनुरोध करेंगे कि इस प्रकरण के अव-लोकन मे पहिले वे एकवार भूमिका - प्रथमम्नण्डान्तर्गत- ' उपनिपत शब्द का क्या अर्थ है? ' नामक प्रक. -रण पर एक दृष्टि डाल लें । प्रकृत प्रकरण में जो कुछ वक्तव्य है, उसका रूपान्तर से वहाँ दिग्दर्शन कराया जा चुका है । प्रकरणसङ्गति के लिए सिंहावलोकन न्याय से दो शब्दों में उस मन्तव्य की पुनरावृत्ति कर लेना प्रासङ्गिक न माना जायगा । विधि, आरण्यक उपनिषत् वेद के ब्राह्मणभाग के इन तीन शास्त्रखण्डों मे सर्वसाधारण भलीभाँति परिचित हैं । प्राचीन व्याख्याताओं की दृष्टि से ' स्वर्गादिफलावाप्तिसाधक - काम्य– कर्म्मयोगत्त्व ' ' विधि ' शब्द का अवच्छेदक है । ' ईश्वरानुग्रहप्राप्तिकामलक्षण - भक्तियोगत्त्व ' ‘ आरण्यकः ’ शब्द का अवच्छेदक है, एवं ' सर्वकर्म्मविमोकलक्षण विशुद्ध ज्ञानयोगत्त्व ' ' उपनिषत् ' – शब्दका अवच्छेदक है । विधिभाग विशुद्ध कर्म्मयोग का, आरण्यकभाग विशुद्ध भक्तियोग का, तथा उपनिषत् - भाग विशुद्ध ज्ञानयोग का प्रतिपादन कर रहा है । व्याख्याताओं की इस विभक्त - दृष्टि से निष्कर्ष यह निकलता है कि, ' उपनिषत् ' शब्द एकमात्र ' ईश - केन - कट ' आदि नामों से प्रसिद्ध, एतन्नामक उपनिषद्मन्थों में हीं निरूद्ध है । अतएव ' सर्वे वेदान्ताः ' सूक्ति वृद्धव्यवहार में उपनिषद्ग्रन्थों की ही संग्राहिका बन रही है । वस्तुस्थिति यह सिद्ध कर रही है कि, ज्ञानयोगत्त्व उपनिषत् - शब्द का अवच्छेदक नहीं है । अपितु -' व्यवस्थितविज्ञानसिद्धान्तत्त्व ' ही उपनिषत् - शब्द का अवच्छेदक है, जैसाकि भूमिका - प्रथमखण्ड में विस्तार से बतलाया जा चुका है । वह मौलिक सिद्धान्त, तत्त्वविज्ञान अपने गर्भ में ' उपपत्ति - निश्चय स्थिति ’ लक्षण ‘ उप - नि - पत् ' भावों को अपने गर्भ में रखता हुआ ही ' उपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । व्याख्या-ताओं नें योगत्रयी के जो, लक्षण मानें हैं, जिनका कि - ' उपनिषत हमें क्या सिखाती है? ' इस प्रकरण में दिग्दर्शन कराया जा चुका है, वे सर्वथा अवैज्ञानिक, अतएव प्रणम्य हैं । वही योगत्रयी वस्तुतः ग्राह्य, तथा उपादेय है, जो क्रमशः कामनिवृत्ति, अनुग्रहकामनिवृत्ति, कर्म्मप्रवृत्ति, से सम्बन्ध रखती हुई संशोधिता योगत्रयी है, जिसका उक्त प्रकरण में ही स्पष्टीकरण किया जा चुका है । धर्म्मबुद्धियोगात्मक कामनिवृत्तिपरक कर्म्मप्रवृत्तिपरक कर्म्म ही ' कर्म्मयोग ' है । ऐश्वर्य्यबुद्धियोगात्मक - अनुग्रहकामनिवृत्तिपरक उपासनातत्त्व व्यक्त ' भक्तियोग ' है, कामनिवृत्तिपरक - अव्यक्तकर्म्मप्रवृत्तिपरक ज्ञान ही ' ज्ञानयोग ' है । एवं – रागासक्तिविरहित- ही ज्ञानकर्म्मोभयात्मक – वैराग्यबुद्धियोग ही चौथा सिद्धान्त - स्थानीय ' बुद्धियोग ' है । इस दृष्टिकोण को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें प्रकृत प्रकरण का विश्लेषण करना है । ३६७