Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 381–390
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 381–390
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भाय भूमिका कर्म्म, भक्ति, ज्ञान, बुद्धि, नामक चारों हीं योग पुरुषस्वरूप के विकासक बनते हुए ' पुरुषार्थ ' मार्ने जा सकते हैं | ये योग पुरुषार्थ क्यों माने गए?, क्यों इनका अनुगमन किया जाय?, किस कौशल से इनका अनुगमन किया जाय?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान तत्र तक असम्भव है, जब तक कि, इनकी मौलिक उप-पत्तियाँ हृदयङ्गम न कर लीं जायँ । अवश्य ही सञ्चरविद्यात्मक विज्ञान तथा प्रतिसञ्चरविद्यात्मक ज्ञान, इन दोनों के आधार पर प्रतिष्ठित कर्म्म ( विज्ञान ) तथा, ज्ञान के मौलिक रहस्य ही योग चतुष्टयी - प्रवृत्ति के मुख्य आधार | ' रहस्यप्रतिपादनत्त्व ' ही उपनिषत् शब्द का प्रधान श्रवच्छेदक है । एवं ऐसा ' उपनिषत ' शब्द न केवल उपनिषच्छास्त्र से ही सम्बद्ध है, अपितु कर्म्मयोगप्रतिपादक विधिभाग, भक्तियोगप्रतिपादक आरण्यक भाग, बुद्धियोगप्रतिपादक उपनिषद् - भाग, तीनों वेदभागों के साथ उपनिषत् - शब्द का घनिष्ठ सम्बन्ध है । उपनिष-च्छास्त्र में प्रतिपादित उपनिषदें ( तात्त्विकरहस्य ) सर्वत्र व्याप्त हैं । यहाँ तक कि, स्वयं मूलसंहिताएँ भी इस मासे वञ्चित नहीं है, जैसा कि पाठक आगे जाकर देखेंगे । प्रश्न इस सम्बन्ध में यह शेष रह जाता है कि, यदि ' उपनिषत् ' शब्द का ( उक्त अवच्छेदक मर्य्यादा से ) विधि, आरण्यक भागों से भी सम्बन्ध है, तो उन्हें भी ' उपनिषत् ' शब्द से व्यवहृत क्यों नहीं किया गया?, क्या कारण है कि, उपनिषत् शब्द से केवल ईशाद्य पनिषद्भाग ही प्रसिद्ध हुआ? । प्रश्न का समाधान उप-निषच्छब्दार्थ से गतार्थ है । यहाँ स्मरणमात्र करा दिया जाता है । कर्म्मयोगप्रतिपादक विधिभाग जिन कम्मों की इतिकर्तव्यता बतलाता है, वह कर्मकलाप क्रत्वर्थ, पुरुषार्थ, भेद से दो भागों में विभक्त है । अनेक क्रत्वर्थकम्मों के समन्वय से एक पुरुषार्थकर्म्म का स्वरूप सम्पन्न होता है । क्रत्वर्थकम्मों का आरभ्याधीत विधिवचनों से सम्बन्ध है, एवं पुरुषार्थकम्मों का अनारम्याधीत विधिवचनों से सम्बन्ध है । आरभ्याधीत विधिवचनों में ' लिङ ' इष्ट है, अनारम्याधीत विधिवचनों में ' स्वर्गादिकल ' इष्ट हैं । आरभ्याधीत विधिपरक क्रत्वर्थक यज्ञार्थक हैं, इनसे यज्ञकर्म का स्वरूप सम्पन्न होता है । अनारम्याधीत विधिपरक कर्म्म यज्ञकर्म्म हैं, इनसे यज्ञकर्त्ता पुरुष का स्वार्थसाधन होता है, अतएव इन्हें ' पुरुषार्थ ' कहा गया है । क्रत्वर्थ - पुरुषार्थ भेदभिन्न यज्ञकर्म्म विशेष बनते हुए विशेष ( द्विजाति ) अधिकारियों के लिए ही विहित हैं । इनसे अतिरिक्त एक तीसरा सामान्य विधिभाग है जिसका मनुष्यमात्र को समानाधिकार है । " सदा कर्म्म करते रहो, सत्य भाषण करो, धर्म्मपथ का अनुगमन करो, किसी की हिंसा न करो " इत्यादि विधिवचन ' सामान्याधीठ - विधिवचन ' हैं । इसप्रकार विशेष - सामान्याधिकारी भेद से कर्म्मयोग ‘ क्रत्वर्थ- पुरुषार्थ - लोकार्थ ' मेद से तीन भागों में विभक्त हो रहा है । तीनों क्रमशः -‘आरभ्याधीत-अनारभ्याधीत - सामान्याधीत ' इन विधिवचनों से सम्बद्ध हैं । इस त्रिविध कर्म्मभेद से कर्मोपपत्तिलक्षण-विज्ञान सिद्धान्तरूपा ' उपनिषत ' के भी तीन भेद हो जाते हैं । क्रत्वर्थ कम्मों की उपनिषदों ( विज्ञान सिद्धान्तों ) का प्रतिपादन तो सर्वात्मना विधिभाग में ही हो गया है । साधारण विज्ञानात्मिका ये उपनिषदें कत्वर्थकम्मैतिकर्तव्यता - प्रतिपादन के साथ साथ ही प्रतिपादित हैं । क्योंकि क्रत्वर्थ प्रतिपादक - विधिभाग में कम्र्मेतिकर्तव्यता का प्राधान्य है, वही विधि का मुख्य लक्ष्य है, उप-पत्तिविज्ञानलक्षणा उपनिषदें गौण हैं, अतएव क्रत्वर्थकर्म्मप्रतिपादक श्रारभ्याधीत विधिभाग से सम्बद्ध उपनिषदों को ‘ उपनिषत् ' रूप से व्यवहार करने का अवसर नहीं याता । श्रपितु इनका ' विधि ' शब्द से ही ( ' तद्वादन्याय ' से ) ग्रहण कर लिया जाता है । ३६८
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तृतीयखण्ड अत्र शेष बचते हैं — पुरुषार्थकम्र्मानुगत अनारभ्याधीत विधिवचन, तथा लोकार्थ- कर्मानुगत सामा-न्याधीत विधिबचन | पुरुषार्थकम्मों के भी सामान्य - विशेष भेद से दो श्रेणि विभाग हैं । दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, वरुणप्रत्रासेष्टि, पुत्रेष्टि, तानूनप्त्रेष्टि, सोत्रामणी, आदि पुरुषार्थकर्म्म सामान्य हैं । ग्रहयाग, राजसूय, वाजपेय, चयन, प्रवर्ग्य, आदि पुरुषार्थकर्म्म उच्चकोटि के मानें गए हैं । महाविज्ञानानुगत इन उभयविध पुरुषार्थों की उपनिषदों का प्रायः तत्कर्मेतिकर्त्तव्यताप्रतिपादक- तत्तदनारभ्याधीत विधिवचनों के साथ ही प्रतिपादन हो गया है । हाँ कुछ एक अनारम्याधीतविधियाँ ऐसी भी हैं, जिनका प्रतिपादन विधिग्रन्थों में नहीं भी हुआ है । पुरुषार्थकर्मानुगत विधिभाग में भी विधि ( कर्म्म ) की ही प्रधानता है । अतएव क्रत्वर्थवत् इन उपनिषदों का भी उपनिषत् शब्द से व्यवहार नहीं होने पाया है, जैसा कि सोदाहरण शब्दार्थप्रकरण में प्रतिपादित है । महाविज्ञानानुबन्धी कुछ एक पुरुषार्थकम्मों का प्रतिपादन करने वाले अनारम्याधीत विधिवचन, तथा लोकार्थप्रतिपादक सामान्याधीत विधिवचन, दो विभाग शेष रह जाते हैं । कारुणिक महर्षियों नें इन दोनों की उपनिषदों का पृथकरूप से निरूपण कर दिया है । वही विभाग उपनिषत् - प्रतिपादन की प्रधानता मे उसी तद्वादन्याय से ‘ उपनिषत् ' शब्द से प्रसिद्ध हुआ है । एकधनावरोध, देवस्मर, यज्ञविरिष्टसन्धान, आदि अनारभ्याधींत विधियों की उपनिषदें उपनिषद्ग्रन्थों में हीं प्रतिपादित हैं — ( देखिए – कौ ० उ ० २।३।४ । ) -( छां ० उ ० ४।१७ । ) । स्पष्टीकरण यह है कि - समस्त क्रत्वर्थकर्म्म, एवं कुछ एक पुरुषार्थकम्मों को छोड़ कर समस्त पुरुषार्थंकर्म्म उपनिषदों के सहित विधिभाग में प्रतिपादित हैं, एवं इनमें इतिकर्त्तव्यतालक्षण कर्म्मभाग प्रधान है, उपपत्तिलक्षणा उपनिषदें गौण हैं । अतएव विधिभागान्तर्भूत उभयविध उपनिषदों को ‘ उपनिषत् ’ शब्द से ब्यवहृत नहीं किया गया । कुछ एक पुरुषार्थकर्म्म ( एकधनावरोधादि ) ऐसे हैं, जिनकी इतिकर्त्त-व्यता तो विधिभाग में विशेषरूप से प्रतिपादित हुई है, एवं उपपत्तिलक्षणा उपनिषत् स्वतन्त्र रूप से प्रतिपादित हुई है । एवमेव सामान्य विधियों की इतिकर्त्तव्यता तो प्रधानरूप से विधिभाग में, तदनुगत स्मृतिभाग में हुई है, एवं उपनिषत् स्वतन्त्ररूप से प्रतिपादित हुई है । यही स्वतन्त्रोपनिषत्समष्टि ' उपनिषत् ' प्राधान्य से ' उपनिषत् ' नाम से व्यवहृत हुई है | ‘ यदि वेद के विधिभाग में उपनिषत् - शब्दावच्छेदक विद्यमान है, तो वह उपनिषत् -शब्द से व्यवहृत क्यों नहीं हुआ? " इस प्रश्न का यही युक्तियुक्त, तथा विज्ञानसम्मत समाधान है । विधिभाग के अनन्तर भक्तियोगप्रधान ' आरण्यक भाग ' हमारे सम्मुख उपस्थित होता है । इसे उपनिषत नाम से क्यों नहीं व्यवहृत किया गया, जबकि अवच्छेदकभावयुक्त उपनिषत् का विधिभागवत् इसमें भी समावेश है? ' प्रश्न के सम्बन्ध में इसलिए समाधान करना अप्रयोजक है कि, ' बृहदारण्यकोपनिषत् ' इत्यादि वृद्ध-व्यवहार स्वयं श्रारण्यकभाग का उपनिषत् के साथ सम्बन्ध मानता हुआ आरण्यक के उपनिषत् - त्व का समर्थन कर रहा है । अपिच आरण्यक प्रतिपादित भक्तियोग ( तत्त्वोपासना ) की उपनिषदों का तद्योगप्रतिपादन के साथ ही विधिभागवत् स्पष्टीकरण हो गया है । अतएव उसे भी विधिभागवत् स्वतन्त्ररूप से ‘ उपनिषत् ’ शब्द से व्यवहृत करने का अवसर प्राप्त रह गया । प्रकृत परिच्छेद से बतलाना हमें यही है कि, उपनिषत् - शब्द रहस्यविज्ञान से सम्बन्ध रखता है | वेद का उपनिषद् भाग क्योंकि प्रधानरूप से इसी रहस्यज्ञान का विश्लेषण करता है, कर्म्म - भक्ति - ज्ञान - बुद्धि योग -३६६
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भाष्यभूमिका चतुष्टयी की उपनिषदे बतलाता है, अतएव यह ईशाग्र पनिषद्विभाग में ही निरूद्ध बन गया है । ' उपनिषत-और उपनिषच्छा ' का यही स्वाभाविक सम्बन्ध है । श्रत्र हमें कुछ एक ऐसे वचन और उद्धृत कर देने हैं, जिनके आधार पर पाठक यह निर्णय कर सकें कि, ' उपनिषत् शब्द का अवच्छेदक ज्ञानयोगत्त्व है, अथवा विज्ञानसिद्धान्तत्व? | यद्यपि उपनिषच्छब्दार्थप्रकरण में दो एक उदाहरण उद्धृत हुए हैं, तथापि वे सर्वात्मना सन्तोषकर नहीं है । अतः यहाँ और उदाहरण उद्धृत करना प्रासङ्गिक मान लिया गया है । २ - उपनिषत् - शब्द का अवच्छेदक-' शान्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ' इत्यादि वचनों के अनुसार साहित्य में प्रयुक्त शब्द ही अपने श्रवच्छेदकभावों को व्यक्त करने में समर्थ हैं । उदाहरण के लिए ' इति-हास - पुराण ', शब्दों को ही लक्ष्य बनाइये । ' इति - ह- श्रास ' ( ऐसा- निश्चयेन था - ) रूप से स्वयं ' इतिहास ' शब्द अपने अवच्छेदक का स्पष्टीकरण कर रहा है । ' पुरा - नवं भवति ' निर्वचन पुराणशब्द का अवच्छेदक व्यक्त कर रहा है । एवमेव ' उपनिषत् ' शब्द का अवच्छेदक भी हमें उपनिषत् शब्द से ही पूँछना चाहिए । ' उप - नि - त् ' ही उपनिषत् शब्द का अवच्छेदक है । ' उप ' का अर्थ है – ' समीप ' | ' नि ' का अर्थ है— ‘ निश्चयेन ' । ' घत् ' का अर्थ है ' बैठना ' । जिस तत्त्वज्ञान के परिज्ञान से हम तज्ज्ञान प्रतिष्ठ विषय के समीप निश्चयेन पहुँच जाते हैं, यह तत्त्वज्ञान ही ' उप - नि - त् ' का साधक बनता हुआ ' उपनिषत् ' है । साधकत्त्वेन तत्त्वज्ञान यदि उपनिषत् है; तो साध्यत्वेन भी यह उपनिषत् ही बन रहा है । उपपत्तिज्ञान ' उप ' है, निश्चयबोध ' नि ' है, तत्रस्थिति ' पत् ' है । उपपत्तिज्ञान ही निश्चयबोधपूर्वक तद्विषयस्थिति का कारण बनता है । अतएव इसे इस साध्यदृष्टि से भी ' उपनिषत् ' ( उप - उपपत्ति, नि-निश्चय, पत् - स्थिति ) कहना अन्वर्थ बन रहा है । जो जिसकी मूलप्रतिष्ठा है, मूलाधार है, जिस मूलाधार के आधार पर तदाधेय स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित है, वह मूलाधार ' उपपत्ति - निश्चय - स्थिति ' रूप से उपनिषत् है, एवं ऐसी मूलाधारात्मिका उपनिषत् का परिज्ञान भी उप - नि - त्- ( समीपे - अन्तस्तले- निश्चयेन - स्थापयत्या-त्नानम् ) रूप से उपनिघत् है । यही उपनिषत् शब्द का तात्त्विक अवच्छेदक है । निम्नलिखित वचन इसी वच्छेदक को लक्ष्य में रख कर प्रवृत्त हुए हैं-१ – “ तक्ष्य वा एतस्याग्नेवगित्रोपनिषत् ” ( शत ० ब्रा ० १० | ४ | ५ | ६ | ) 1 २ – “ अथादेशाः - उपनिषदाम् ” ( शत ० ब्रा ० २० | ४ | ५ | १ ) ३ – “ यदेव विद्यया करोति, श्रद्धयोपनिषदा, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति " ( छान्दो ० उप ० १ | १ | १० । ) । ४ – “ अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् " ( ऐ ० आ ० ३।२।५ । ) । ५ – “ तस्योपपनिषदहमिति " ( बृ ० आ ० उ ० ४ | ५६४ । ) । ६ – “ तस्योपनिपद हरिति " ( बृ ० आ ० उ ० ४।५।३ । ) । ७- - " तस्योपनिपन्न याचेत् - इति " ( कौ ० उ ० २ । १ । ) । ३७०
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तृतीयखण्ड ८- - " अन्नवानन्नादो भवति, य यतामेवं साम्नामुपनिषदं वेद ” ( छान्दो ० उ ० १ | ३ | ४ | ) । ६ – “ बतेत्यसुराणां ह्यषोपनिषत् " ( छान्दो ० उ ० ८ | ५ | ) १० - " तेभ्यो हैतामुपनिपदं प्रोवाच " ( छान्दो ० ॐ ० । ८ ८ । ४ । ) । ११ – “ तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति ” ( बृ ० आ ० उ ० २।१।२० । ` । १२ – “ उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः " ( बृ ० आ ० ४।२।१ । ) । १३ – “ अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः ' ( तै ० उ ० १ । ३ । १ । ) । १४ – “ सत्यमित्युपनिषत् ” ( कैवल्योप ० २। ) । उद्धृत वचनों में प्रयुक्त ‘ उपनिषत् ' शब्द ' ईशाद्य पनिषदों ' का वाचक नहीं है, यह स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त स्वयं व्याख्याताओं ने भी ' अरण्यमियान्न पुनरेयादित्युपनिषत् ' इत्यादि रूप से उपनिषत् शब्द के यौगिकार्थ का अनेक स्थलों में समर्थन किया है । निम्न लिखित वचन भी उपनिषत् का अवच्छेदक पृथक् मान रहा है । प्रथमं स्यात् महानाम्नी द्वितीयञ्च महाव्रतम् । तृतीयं स्यादुपनिषद् गोदानञ्च ततः परम् " ( आश्वालायनगृह्यकारिका ) इस प्रकार अवच्छेदक की मर्यादा से उपनिषत्तत्त्व का ' विधि - ग्रारण्यक उपनिषत् ' तीनों काण्डों के साथ सम्बन्ध हो रहा है | जिस प्रकार यवच्छेदक मर्य्यादा से उपनिषत - तत्त्व का तीनों काण्डों से सम्बन्ध है, एवमेव इसी वच्छेदकमर्य्यादा से विधि, तथा आरण्यकभाग का भी तीनों काण्डों से घनिष्ठ सम्बन्ध माना गया है । यही कारण है कि, एक काण्ड के परिज्ञान के लिए शेष दोनों काण्डों का स्वरूप - परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक हो जाता है । ३ - काण्डत्री का त्रिपुटी – सम्बन्ध-धर्म्मबुद्धियोगलक्षण कर्म्मयोग, ऐश्वर्य्यबुद्धियोगलक्षण भक्तियोग, ज्ञानबुद्धियोगलक्षण ज्ञानयोग, एवं वैराग्यबुद्धियोगलक्षण बुद्धियोग, चारों में बुद्धियोग एक स्वतन्त्र योग है, जिसका प्रधानरूप से उपनिषद्-भाग में विश्लेषण हुआ है । यही उपनिषदों का प्रधान लक्ष्य है । इस बुद्धियोगसम्पत्ति के अनुग्रह से ही शेष तीनों योग सोपनिषत्क बनते हुए बलवत्तर बन रहे हैं । इस विलक्षण बुद्धियोग को थोड़ी देर के लिए, पृथक रखते हुए हमें काण्डत्रयी से सम्बद्ध योगत्रयी का विचार करना चाहिए । बुद्धियोग क्योंकि तीनों का श्रालम्बन है, अतएव इसकी स्वतन्त्र गणना नहीं होती । योगस्वेन योगत्रयी ही शेष रह जाती है, जिसका काण्डत्रयी से क्रमिक सम्बन्ध है । बुद्धियोग ही कर्म्मयोग का कौशल है, यही भक्तियोग का कौशल है, एवं यही ज्ञानयोग का कौशल है । वैज्ञानिकों नें इन योगों के जो वैज्ञानिक लक्षण किए हैं, उनके आधार बर यह कहा जा सकता है कि, प्रत्येक योग में गौणरूप से इतर दोनों का समन्वय हो रहा है । कर्म्मयोग में कर्म्म का प्राधान्य है, ज्ञानयोग में अव्यक्तज्ञान का प्राधान्य है । मध्यस्थ भक्तियोग का ' देहलीदीपकन्याय ' ३७१
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भूमिका से दोनों के साथ सम्बन्ध है । साथ ही मध्यस्थ होने से भक्तियोग इस ओर की कर्म्मसम्पत्ति, उस ओर की ज्ञानसम्पत्ति, दोनों से युक्त है । इसप्रकार प्रत्येक योग योगत्रयात्मक बन रहा है । सामान्य दृष्टि से भी कर्मयोग में ज्ञान भी अपेक्षित है, उपासना भी अपेक्षित है । भक्तियोग में उपासना के साथ साथ ज्ञान-कर्म भी अपेक्षित हैं । एवमेव ज्ञानयोग में ज्ञान के साथ साथ कर्म्म, तथा उपास्ति भी अनिवार्य हैं । पहिले कर्मप्रधान कर्मयोग की मीमांसा कीजिए, जिसका प्रधानतः विधिभाग से सम्बन्ध है । जितनें भी कर्म हैं, सब की प्रतिष्ठा भिन्न भिन्न उपनिषत् है । जिस कम्मं की उपनिषत् मलीभांति जान ली जाती है, वही कर्म्म सुसम्पन्न बनता है । उपनिपल्लक्षण तत्त्वज्ञान के आधार पर ही कर्म प्रतिष्ठित है । कर्मप्रधान विधिग्रन्थों में प्रजापति, आत्मा, उक्थ, पृष्ठ, आदि तत्वों का यत्र तत्र सुविशद निरूपणा हुआ है । इन सब का तत्त्वज्ञान ब्रह्मविज्ञानप्रधाना उपनिषत् से ही सम्बद्ध है । कम्मत्मिक यज्ञ यौगिक तत्त्व है, ज्ञानात्मक ब्रह्मतत्त्व मौलिक तत्व है । मौलिक ब्रह्मतत्त्व ही यौगिक यज्ञकर्म की प्रतिष्ठा है । ब्रह्मस्वरूप को यथावत् अवगत किए बिना तत्प्रतिष्ठ कम्म ' का स्वरूप सर्वथा श्रविदित ही रहता है । मानना पड़ेगा कि, जब तक औपनिषद लक्षण ज्ञान को आधार नहीं बना लिया जाता, तब तक कर्म में बलाधान सम्भव नहीं है । एव इसी दृष्टि से उपनिष्ठत् सम्बन्धी ज्ञानयोग का कर्म्मयोग में अन्तर्भाव हो रहा है । इसके अतिरिक्त यह भी मानी हुई बात है कि, चिना तद्विषयक - इतिकर्त्तव्यतालक्षण ज्ञान के कर्मप्रवृत्ति मर्यादित है, स्खलित है । अज्ञान सहकृत कर्म में पदे पदे पतन का भय है । ज्ञान सहकृत कम ही कम्र्म - सौष्ठव का प्रवर्तक है । इसप्रकार इस सामान्य दृष्टि से भी ज्ञान का कम्म ' में संग्रह हो रहा है । निम्न लिखित बच्चन इसी ज्ञानसम्बन्ध की अनिवार्यता सिद्ध कर रहा है-ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत नाज्ञाच्या कर्म्म आचरेत् । श्रज्ञानेन प्रवृत्तस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे ॥ यही स्थिति उपासना के सम्बन्ध में समझिए । श्रारण्यक भागानुगता उपासना के अनेक लक्षण हुए हैं । उनमें से किसी न किसी लक्ष्य का कम्म ' में श्रवश्यमेव ग्रन्तर्भाव रहता है । इसी आधार पर ' होता अध्वर्यु मुपास्ते ' इत्यादि वचन प्रतिष्ठित है । दृष्टि है — भूताग्नि पर मन है दिव्याग्नि पर । यह भी एक प्रकार की उपासना ही है । पाठकों की सुविधा के लिए उपासना के कुछ एक तात्त्विक लक्षण उद्ध त कर दिए जाते हैं, जिनका विशद वैज्ञानिक विवेचन गोताभाव्यान्तर्गत ' भक्तियोगपरीक्षा ' प्रथमखण्ड में देखना चाहिए । १ – “ प्रत्यक्षप्रत्ययेन परोक्षार्थे प्रत्यय प्रवाहः - उपासनम् " । २ – “ बुद्धिसनिकृष्टार्थद्वारा विदूरार्थप्रत्ययधारणम् - उपासनम् ” । ३ – “ विजिज्ञासितस्य भावस्य यत्किञ्चिद्रूपं प्रतिपद्य - तत्र - सत्यचेनास्था-धारणं श्रद्धानम् । श्रद्धानपारवश्यात् तदनुकूला वैज्ञानिकी परिचय ध्यानरूपा - बुद्धियोगः - तदुपासनम् ” । ३७२
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४– “ ईश्वरोऽयमस्तीति विश्वासभाजां दृढप्रत्ययेन सूर्ये, गुरौं, अवतारपुरुपे, धातुप्रतिमायां वा ईश्वरोचितकर्म्मकरणं - उपासनम् ” । ५ – “ कस्मिंश्चित् प्रत्येतव्येऽर्थे विज्ञानसमर्थानामधिकारिणां सौकर्येण प्रत्ययो-त्पत्यर्थं - आधिभौतिके कस्मिंश्चित् संनिहितेऽर्थे - आहार्य्यारोपमूलकं, प्रतिरूपमूलकं, प्रतीकमूलकं, वा प्रत्ययालम्बनं ( ऐन्द्रियकप्रत्यक्षज्ञानालम्बनं ) तत्प्रत्यक्ष- ( परोक्षाधिदैविकप्रत्यय ) - प्रवाहोत्पादनम् - उपासनम् ” । ६ – “ उपासनं नाम समानप्रत्ययप्रवाहकरणम् " ( शां ० भा ० ४।१।७ । ) । ७– “ अन्य सिद्धयर्थमन्यत्र स्थितिः - ' उपासना ' । - " श्रद्धानसूत्रेण मनो- बुद्ध्यर्पणम् – ' उपासना ' । - " श्रद्धाद्वारा परत्रात्मनि स्व मनो - बुद्ध्यात्मांशमर्पयन्तः परमात्मभक्ता भवन्ति । भक्तिर्नाम भागों ऽशः । भक्तिकरणं कर्म्माप्युपचारात् - भक्तिः । सैषा भक्तिः - ' उपासना ' । १०— “ तद्वृत्यनुकूलवृत्तिं धारयमाणस्य तदिच्छानुसारेण चरणमुपासनम् ” । ११ - " श्रद्धानार्पितमनोवृत्यनुकूल दृष्टिसूत्रार्पितायाः श्रद्धयपरिस्थित्यनुरोधवद-पेक्षाबुद्धिसहकृताया भावना बुद्ध स्तदनुरोधापेक्षितवृत्तिस्थिरच्चम् उपासनम् " | ( इत्यादीनि लक्षणानि ) । १ - प्रत्यक्षज्ञान को मध्यस्थ बना कर इसके द्वारा परोक्षविषय को प्राप्त करना ही उपासना का प्रथम लक्षण है । स्वर्गादि फल परोक्ष हैं । श्राहवनीय - गार्हपत्य - दक्षिणाग्नि- पुरोडाश- जुहू - उपभृत् ध्रुवा - दर्भ-वेदि, मन्त्र - आदि यज्ञकर्म्मस्वरूपसम्पादक सामग्री –सम्भार प्रत्यक्षज्ञानसिद्ध विषय हैं । एकमात्र श्रद्धासूत्र के आधार पर यज्ञकर्त्ता यजमान इन प्रत्यक्ष सिद्ध पदार्थों की मध्यस्थता के आधार पर उस परोक्ष स्वर्गकला-वाप्ति की उपासना कर रहा है । २ – हमारे ( यजमान के ) बौद्धिक धरातल में ' अग्निष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' इस विधिश्रद्धान से परोक्ष स्वर्गफल प्रतिष्ठित । इस बुद्धिसंनिकृष्ट वासनात्मक फल के आधार पर हम यज्ञकर्मद्वारा उस विदूरस्थ ( दिव्यलोकस्थ ) कलात्मक नाचिकेत - स्वर्गप्रत्यय के अधिकारी बन जाते हैं । यही उपासना का प्रथम लक्षण से मिलता जुलता दूसरा लक्षण है । ३ – जिस इन्द्रियातीत परोक्षभाव को हम जानना चाहते हैं, निदानलक्षण संकेत के आधार पर उसका एक काल्पनिकरूप बना लिया जाता है । उस कल्पित रूप में ' स एवायम् ' इसप्रकार का जो सत्यत्त्व धारण है, वही श्रद्धा है | इस श्रद्धा से आकर्षित होकर उस कल्पितरूप की जो परिचर्या की जाती है, वही उपासना है । ब्रह्म स्वरूत्ररूप से निर्गुण है, निराकार है, परोक्ष है, इन्द्रियातीत है । ३७३
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भाष्यभूमिका
" अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ।
उपासकानां सिद्धयर्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥
99 इस मियुक्तोक्ति के अनुसार उसकी कल्पित प्रतिमा बना ली जाती है । साथ ही इसे साक्षात् वही समझते हुए उसको परिचर्य्या की जाती है । ठीक यही स्थिति यज्ञकर्म में समझिए । यज्ञकर्मसम्पादक श्राहवनीय - गार्हपत्य - दक्षिणाग्निकुण्ड क्रमशः स्वर्ग - अन्तरिक्ष- पृथिवीलोक से समतुलित हैं । तत्रस्थ अग्नित्रयी आदित्य - वायु - अग्नि से समतुलित हैं । तदनुरूप ही इनकी परिचय की जाती है । एवं इस दृष्टि से भी कम में उपासना का समन्वय हो रहा है । ४ - ईश्वर पर विश्वास रखने वाले श्रद्धालु ईश्वरांशभूत सूर्य, गुरु, अवतार, पाषाण प्रतिमा, आदि में वैसी ही भावना रखते हुए इनकी आराधना करते हैं । तथेत्र स्वर्गकल पर विश्वास करने वाले याज्ञिक तत्यभून कुण्डाग्नि- पुरोडाश - सोम - आज्यादि की श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं । वे गाईपत्य को साक्षात् पृथिवी समझते हैं, आहवनीय को सूर्य्य मानते हैं, सोमरस को तृतीय द्युलोक की वस्तु मानते हैं । ५- जिस तत्त्व को हम जानना चाहते हैं, किंवा प्राप्त करना चाहते हैं, मान लीजिए वह विजिशास्य-प्राप्तव्य तत्त्व श्राधिदैविक - सूक्ष्म जगत् की वस्तु होने से पगेन है । उसके परिज्ञान, तथा उपलब्धि के लिए वैज्ञानिक अधिकारियों के बोधसीक को लक्ष्य में रखते हुए आधिभौतिक पदार्थ को मध्यस्थ बना कर इसमें उस परोक्ष तत्त्व का आह्वायरोपविधि मे किंवा प्रतिरूपविधि मे, किंवा प्रतीकविधि से आरोप कर इसके द्वारा उस परोक्ष तत्त्व के साथ जो अपने ज्ञानक्षेत्र से सम्बन्ध करा देना है, वही उपासना है । तात्पर्य यही है कि, श्राधिभौतिक पदार्थ में प्रत्ययालम्बनता तीन प्रकार से सम्भव है । श्राधिदैविक तत्त्व की प्राप्ति के सम्बन्ध में मध्यस्थ श्राधिमौतिक पदार्थों में दृष्टि - स्थिर करने के ये ही तीन आलम्बन है । ' अन्य को अन्य समझना ' ही आरोपविधि है । यह आरोप प्रातिभासिक, व्यावहारिक, भेद से दो श्रेणियों में विभक्त है । रज्जु में सर्प का, स्थाणु में पुरुष का, शुक्ति में रजत का, मृगमरीचिका में जल का, शश में शृङ्गका, वन्ध्या में पुत्रप्रसूति का आरोप करना प्रातिभासिक श्रारोप है । अतएव ये श्रारोप मिथ्या-कोटि में अतभूत हैं । व्यावहारिक श्रारोप परमार्थदृष्टि से श्रमत् रहता हुआ भी व्यवहारजगत् की दृष्टि से परमोपयोगी है । प्रातिभासिक श्रारोप नहीं दार्शनिक परिभाषा में ' अध्यास ' कहलाता है, वहाँ व्यावहारिक आरोप को प्रातिभासिक आरोप से पृथक बतलाने के लिए ' आहायरोप ' नाम से व्यवहृत किया गया है । जिस सत्य-परमार्थ बोध के लिए यह श्रारोप किया जाता है, बोघानन्तर वह आरोप स्वत: निवृत्त हो जाता है । जिस भौतिक वस्तु में आहार्थ्यारोप किया जाता है, उसके कुछ एक धर्मो का, तथा जिस परोक्षतत्त्व की प्राप्ति के लिए श्राहार्थ्यारोप किया जाता है, उसके कुछ एक धम्मों का समतुलन करके ही आरोप किया जाता है । दोनों के श्रभिन्न धर्मो का ग्रहण कर लिया जाता है, भिन्न धर्मो का परित्याग कर दिया जाता है । समस्त संसारिक व्यवहार इसी आहार्य्यारोप पर प्रतिष्ठित हैं । यही इसकी उपादेयता है । एक भ्राता दूसरे भ्राता में कर्मसाहाह्य-दृष्टिसाम्य से दक्षिण भुजा का आरोप करता | पट्टिका पर लिखित वर्णमात्रिका में नित्य वाकतत्त्व का आरोप होता है । इसीप्रकार यशिय कर्मकाण्ड में श्राज्य में वज्र का, विराटबन्द में यज्ञ का, मृगचर्म्म में वेदत्रयी का आरोप है । ३७४
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हार्थ्यारोपविधि के अनन्तर प्रतिरूपविधि हमारे सामने आती है । शालग्रामशिला भूप्रजापति ( स्वयम्भू ) का, प्रतिरूप ( प्रतिकृति - प्रतिमा - नकल ) है । अश्वत्थवृक्ष षोडशीप्रजापति का प्रतिरूप है । कच्छपप्राणी कुर्म्मप्रजापति का प्रतिरूप है । यज्ञकर्म्मप्रधान वेद के विधि भाग में चिति - यज्ञ की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हुए प्रतिकृतिलक्षणा प्रत्ययालम्बनात्मिका इसी प्रतिरूपोपासना का आश्रय लिया गया है । रुक्म कूम्र्म-पञ्चपशुशीर्ष - श्रादि चित्य पदार्थों के द्वारा प्रतिरूपविधि से सूर्य्य- कश्यप - पञ्चपशु आदि ही अभिप्रेत हैं, जैसाकि चयन विज्ञानात्मक तत् - प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित हैं । तीसरी प्रतीकरूपा उपासना है, इसे ही ' अङ्गवती ' उपासना भी माना गया है । सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी - आदि पर्व उस विराट्पुरुष के प्रतीक हैं, अववय हैं । अङ्ग लिग्रहण से जैसे मनुष्य पर ध्यान चला जाता है, चरणसेवा से जैसे गुरुसेवा गतार्थ है, वस्त्रैकदेश के दग्ध हो जाने पर जैसे ' पटो दग्धः ' व्यवहार लोकसम्मत है, एवमेव पुष्करपर्ण ( कमलपत्र ) ग्रहण से पृथिवी का ग्रहण मानते हुए ब्राह्मणग्रन्थों में इस प्रतीकरूपोपासना का भी यत्र तत्र समावेश हुआ है । ६ - अपने मानसज्ञान को बुद्धिपूर्वक उपास्य देवता के प्रति अनन्यरूप से, अविच्छिन्नरूप से प्रवाहित करना ही उपासना है । यज्ञकर्म्मारम्भ से यज्ञसमाप्ति पर्य्यन्त ऋत्विजों से युक्त यजमान अपने मानस जगत् को अनन्यरूप से यज्ञकर्म्म में प्रतिष्ठित रखता हुआ इस लक्षण का भी अनुगामी बना हुआ है । ७ - परोक्ष प्राणदेवता का श्रध्यात्म संस्था में श्राधान करने के लिए तत् - प्राणदेवताप्रधान तद्भून पर मन का संयम किया जाता है । यही उपासना है । परोक्ष स्वर्गफलातिशय को अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित करने के लिए यजमान आधिभौतिक - प्रत्यक्ष यज्ञ पर अपनी निष्ठा रखता हुआ इस लक्षण का भी अनुगामी बन रहा है । ८ - मानस - श्रद्धासूत्र के द्वारा उपास्य में मनोबुद्धि - समर्पित कर देना ही उपासना है । यज्ञकर्त्ता यजमान इसी श्रद्धा के आधार पर अपने मन, तथा बुद्धि को अनुष्ठेय कर्म में संलग्न रखता हुआ । इस लक्षण का भी अनुगामी बन रहा है । ६- श्रद्धासूत्र के प्रभाव से उपासक अपने आत्मा को व्यापक परमात्मा के साथ युक्त करता हुआ उसका भाग बन जाता है । भक्ति ही भाग है, भाग ही अंश है । इस अंशस्वरूपात्मिका भक्ति - सम्पत् प्राप्ति के लिए जो कर्म्मविशेष किया जाता है, वह भी लक्षणया ' भक्ति ' कहलाने लगा है । यही भक्ति ( भक्त्युपाय ) उपासना है | श्रद्धासूत्र के द्वारा यज्ञकर्ता यजमान अपने भौतिक मानुषात्मा को त्रिणाचिकेतस्वर्ग - थिति सभ्वत्सरयज्ञात्मक दैवात्मा के सात्र युक्त करता हुआ उसका भाग बन जाता है । इसी भागात्मिका ( श्रंशा-मिका ) भक्ति कसे ( दैवात् माकर्षण से ) यजमान का मानुषात्मा श्रायुर्भोगानन्तर स्थूलशरीर छोड़ता हुआ स्वर्गफलभोक्ता बनता है । इस भक्तिलक्षणा अतिशयसम्पत् के लिए अनुष्ठेय यज्ञकर्म्म भी उपचार विधि से भक्ति ही है । १० - उपासक पुरुष उपास्य देवता के स्वरूप, वृत्ति के अनुसार चलता हुआ, उसकी इच्छा के अनुसार अनुगमन करता हुआा ही स्वोपासना में समर्थ होता है । यज्ञकर्त्ता यजमान भी प्राप्तव्य प्राणदेवता की वत्ति के अनुसार ही श्रनुगमन करता है । ' न वै देवाः सर्वेण सम्वदन्ते ' ( शत ० ३ | १ | १ | १० ) के अनुसार ३७५
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भाष्यभूमिका द्विजातिवीर्य्यप्रवर्त्तक यज्ञिय देवता शूद्रादि से सम्बन्ध नहीं रखते । श्रतएव तत् संग्राहक दीक्षित यजमान भी यज्ञसमाप्तिपर्य्यन्त शूद्र से भाषण नही करता । होता श्रध्वर्यु के प्रौष ( अनुज्ञा ) के अनुसार चलता हुआ इस लक्षण का अनुगमन करता हुआ उपासक बन रहा है, जैसा कि - ' अध्वर्यु मुपास्ते ' रूप से स्पष्ट किया जा चुका है । ११ - ग्यारहवीं लक्षण भी इन्हीं उक्त लक्षणार्थों से गतार्थ है । इस प्रकार विधिभागोक्त यज्ञकम्म ' में प्रतिपादित सभी उपासना - लक्षणों का समन्वय हो रहा है । उपनिषत् तत्त्व से जैसे विधिभाग नित्य अन्वित है, एवमेव उपासनातत्त्व से भी विधिभाग नित्य सम्बद्ध है । त्रिन । उपनिषत् - उपासना - तत्त्व परिज्ञान के विधिभागोक्त कम्र्म का रहस्य जान लेना असम्भव है । कर्म्म -प्रधान विधिभाग, उपासनाप्रधान श्रारण्यक भाग, तथा ज्ञानप्रधान- उपनिषद्भाग के बिना अकृत्स्न है, सर्व श्रतएव पूर्ण है । यही अवस्था उपासनाप्रतिपादक श्रारण्यक भाग की है । उपासनातत्त्व तो यहाँ प्रधान है ही । इसके अतिरिक्त बाह्यकर्म्म, तथा ज्ञानाधारत्व भी यहाँ अनिवार्य है । ज्ञानप्रतिष्ठ कम् ही इन्द्रियधारण लक्षणा तत्त्वोपासना का मूलप्रवर्तक माना गया है । शेष उपनिषत् भाग की भी यही परिस्थिति है । उपनिषदों में तीनों योगों का प्रत्यक्षरूप से स्पष्टीकरण हुआ है, जैसा कि - ' उपनिषत् हमें क्या सिखाती है? ' प्रकरण में सोदाहरण बतलाया जा चुका है । उक्त सन्दर्भ से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, विधि, आरण्यक उपनिषत्, तीनों में परस्पर उपकार्य्योपकारक सम्बन्ध है । तीनों में तीनों विषयों का दृष्टिभेद से विश्लेषण हुआ है । स्वाध्यायप्रेमी हमारे इस कथन का सर्वात्मना समर्थन करेंगे कि, विधिभागोक्त कम्म काण्ड से सम्बन्ध रखने वाले कुछ एक तत्त्व ऐसे हैं, जिनका श्रारण्यक उपनिषत् भाग का श्राश्रय लिए बिना कथमपि समन्वय नहीं किया जा सकता । एवमेव आरण्यक में प्रतिपादित विषय भी अपनी पूर्णता के लिए विधि - उपनिषत् - भागों की अपेक्षा रखते हैं । एवमेव उपनिषत् - भाग के कतिपय विषयों का स्पष्टीकरण विधि- आरण्यक भागानुगमन पर ही अवलम्बित है । उदाहरण के लिए विधिभाग के यज्ञविशिष्ट संधानक को ही लीजिए । जबतक छान्दोग्योपनिषदुपवर्णित इस विषय के विज्ञान को श्रात्मसात् नहीं कर लिया जाता, तबतक विधि भाग का वह विषय पूर्ण बना रहता है । एवमेव कठोपनिषत् के नचिकेता - यम संवाद का विधि- भागोक्त चयनयज्ञस्वरूप का परिचय प्राप्त किए चिना कथमपि समन्वय नहीं किया जा सकता । विधिभाग कम्र्म्म ' के साथ साथ उपासना, एवं ज्ञान पर, आरण्यक भाग उपासना के साथ साथ कर्म तथा ज्ञान पर, एवमेव उपनिषत् भाग ज्ञान ( विज्ञान युक्त ज्ञानात्मिका उपनिषत् ) के साथ साथ कर्म्म तथा उपासना पर प्रकाश डालते हुए परस्परानुग्राह्यानुग्राहक बनते हुए अपनी अभिन्न मैत्री का समर्थन कर रहे हैं । प्रधान प्रतिपाद्यों की दृष्टि से जहाँ ' विधि - आरण्यक उपनिषत् ' तीनों तीन शास्त्र है, वहाँ गौण विषयों की दृष्टि से तीनों की समष्टि एक शास्त्र है । यही क्यों, तीनों तीन शास्त्र नहीं, अपितु एक शास्त्र के तीन तन्त्र है । जिस प्रकार वैशेषिक - प्राधानिक - शारीरिक तीनों एक ही दर्शनशास्त्र के तीन तन्त्र हैं, दर्शनशास्त्र एक है । एवमेव ये तीनों काएड एक शास्त्र है । काण्ड का अर्थ है ' पर्व ' । पर्व स्वतन्त्र नहीं होता । एक गन्ने में अनेक पर्व होते हैं, सब पर्व एक गन्ने की दृष्टि से अभिन्न है । एवमेव कर्त्तव्यात्मक वेदशास्त्र के ये तीन पर्व ३७६
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तृतीयखण्ड हैं | तीनों परस्पर अभिन्न हैं । दूसरे शब्दों में तीनों का परस्पर अभेद - सम्बन्ध है | एकमात्र इसी आधार पर प्राचीन वैज्ञानिकों ने तीनों काण्डों के लिए ' ब्राह्मण ' शब्द का प्रयोग किया है । " मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद नाम-धेयम् ” में ‘ मन्त्र ' शब्द नहाँ अनेक शाखाविभक्त मन्त्रसंहिता का संग्राहक है, वहाँ ' ब्राह्मण ' शब्द ‘ विधि-श्रारण्यक - उपनिषत् ' तीनों का संग्राहक बन रहा है । इस सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है । यदि ब्राह्मण शब्द तीनों का संग्राहक है, तो केवल विधिभाग को ही ' शतपथब्राह्मण - ऐतरेय ब्राह्मण ' इत्यादि रूप ' ब्राह्मण ' नाम से क्यों व्यवहृत किया गया? | जो ‘ विधि ' शब्द विधिभाग के लिए नियत है, उस विधि शब्द से तो यह विधिभाग व्यवहृत होता नहीं, श्रपितु जो ' ब्राह्मण ' शब्द तीनों के लिए समान है, उस ब्राह्मण शब्द से ही यह विधिभाग व्यवहृत होता है, जब कि आरण्यक, तथा उपनिषत्, दोनों भी इस नाम के समानाधिकारी बनते हुए इस नाम से वञ्चित - से देखे जाते हैं । प्रश्न का समाधान मन्त्रभाग से सम्बन्ध रखता है । वेद का मन्त्रभाग ' ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत हुआ है, शेष काण्डत्रयी के लिए ' ब्राह्मण ' शब्द नियत है । ज्ञातव्य भाग ब्रह्मवेद है, कर्त्तव्य भाग ब्राह्मणवेद है | यद्यपि कर्त्तव्यात्मिका काण्डत्रयी में ब्रह्मविज्ञानसम्बन्धी ज्ञातव्य विषयों का भी पर्याप्त स्पष्टीकरण हुआ है, तथापि इनका प्रधान लक्ष्य कर्त्तव्यशिक्षा हो माना गया है । कर्म्म - भक्ति - ज्ञान - योगत्रयी मानव का अधिकार-भेदभिन्न कर्त्तव्य है | इस कर्त्तव्य का ' कर्म्म ' से सम्बन्ध है । ज्ञातव्य का ज्ञान से सम्बन्ध है । कर्म्म ही ज्ञान की व्याख्या है । ब्रह्म ( ब्रह्म ) की व्याख्या का ' ब्राह्मण ' कहलाना स्वतः प्राप्त है । ' ब्राह्मण ' शब्द कर्त्तव्यलक्षण कर्म का सूचक है | योगत्रयी के प्रतिपादक तीनों काण्ड इसी कम्म मर्यादा से ' ब्राह्मण ' उपाधि के अधिकारी बन रहे हैं | श्रुतएव ब्राह्मण शब्द से ( कर्त्तव्यकम्म दृष्टया ) तीनों का संग्रह हो जाना भी स्वत: प्राप्त है | यद्यपि तीनों हीं योग कर्त्तव्यशिक्षण के सम्बन्ध से सामान्यतः ' ब्राह्मण ' नाम के अधिकारी हैं, तथापि विधिभाग में क्योंकि कम्म शिक्षा का प्राधान्य है, उधर ब्राहाण शब्द का विशेषतः कर्म से सम्बन्ध है, अत-एव विधिभाग ही में आगे जाकर ब्राह्मण शब्द प्रधान गया है । एकमात्र इसी आधार पर हमनें प्रकृत प्रकरण के नामकरण में विधिभाग के लिए ' ब्राह्मगा ' शब्द को प्रधानती दी है । ' ब्रह्म - ब्राह्मण ' की उक्त स्वरूपमीमांसा से हमें इस निश्चय पर भी पहुँचना पड़ता है कि, कर्त्तव्यभाग -त्रयी का ज्ञातव्यभाग से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है । जिस प्रकार ब्राह्मण - अरण्यक - उपनिषत्, तीनों स्वस्वरूपबोध के लिए एक दूसरे के आश्रित हैं, एवमेष मन्त्रभागात्मक ब्रह्मभाग भी तीनों को लक्ष्य बना कर ही अपने सम्यगबोध का परिचायक बन रहा है । अतएव यह कहा जासकता है कि, वेदशास्त्र एक है, मन्त्र - ब्राह्मण, चे उसके दो तन्त्र हैं । मन्त्रभाग अनेक अवान्तर तन्त्रों ( शाखा ) में विभक्त है, ब्राह्मणतन्त्र अवान्तर तीन-तन्त्रों में विभक्त है । यही वेदशास्त्र का ' पटधर्म्म ' है । पटधर्म से तात्पर्य हमारे कहने का यह है कि, जिम प्रकार पट ( वस्त्र ) के एक तन्तु के हाथ में लेने से सम्पूर्ण पट दृष्टि के सामने उपस्थित हो जाता है, एवमेव ब्रह्म - ब्राह्मणात्मक वेद के किसी भी एक तन्त्र को लक्ष्य बनाने से शेष सम्पूर्ण तन्त्र हमारे सम्मुख उपस्थित हो नाते हैं । अतएव व्यापक दृष्टि रक्खे बिना वेदशास्त्र का सम्यगबोध असम्भव है । यही वेदस्वाध्याय की एक ऐसी जटिल समस्या है, जो अपने उपक्रमकाल में ही अध्येताओं को विचलित कर देती है । एवं उस समय तो हमारी यह समस्या और भी अधिक विषम बन जाती है, जबकि हम - ब्रह्म - ब्राह्मण को, ब्रह्म के ऋक् - यजुः ३७७