Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 391–400
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 391–400
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भाष्यभूमिका साम- अथर्व तन्त्रों को, ब्राह्मण के विधि - श्रारण्यक उपनिषत् तन्त्रों को | पृथक् पृथक् तन्त्रायी मानतेहुएवेदशास्त्र का समन्वय करने के लिए आगे बढ़ते हैं । इसी एकमात्र दोष से श्राज भारतीय समाज वेदार्थ के समन्वय में अपने आपको असमर्थ सिद्ध कर रहा है । इस असमर्थता का विशेष श्रेय उन व्याख्याताओं को ही अर्पण किया जिन्होंनें इन वेदतन्त्रों को स्वतन्त्र शास्त्र मानते हुए इनका पार्थक्य कर डाला है । जायगा, दूसरा क्षेत्र वर्त्तमान वेदाभ्यासियों का है, जिनके प्राच्य - प्रतीच्य भेट से दो श्रेणिविभाग है । श्रतीत प्राच्य व्याख्याताओं ने पार्थक्य के साथ मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेद को एक वेदशास्त्र मानते हुए नहीं अांशिक रूप से वेदतत्त्व की रक्षा करने का स्तुत्य प्रयत्न किया है, वहीं वर्त्तमानयुग के प्राच्य ( भारतीय ) वेदाभिमानियों नैं तो ब्राह्मणभाग का वेदकोटि से बहिष्कार ही कर डाला है । जिन प्रतीन्य ( विदेशी ) विद्वानों ने दबे मुँह इनका वेदत्व स्वीकार किया है, उनके इस सम्बन्ध में ये उद्गार हैं कि, “ आरम्भ में भारतीय ब्राह्मण निरं कर्मठ थे, विधि भागपरायण थे । अनन्तर उन्हें उपासनाकाण्ड ( आरण्यक ) का बोध हुआ! | बहुत आगे जाकर एकेश्वरवादमूलक उपनिषदों का श्राविर्भाव हुआ " । यही प्रवृति वर्त्तमानयुग के उन भारतीय विद्वानों की है, जो ' गतानुगतिको लोको न लोक: पारमार्थिकः ' को सर्वात्मना चरितार्थ कर रहे हैं । मन्त्रभाग प्रस्तुत है । शेष विधि - श्रारण्बक - उपनिषत्, भागों के सम्बन्ध में सर्वान्त में यही कह देना पर्याप्त होगा कि, जिस प्रकार ' अन्तःकरण । वच्छिन्न चैतन्य, अन्तःकरणवृत्यवच्छिन्न चैतन्य, एवं विषया-बन्छिन्न चैतन्य ' तीनों के समन्वय से उत्पन्न ' प्रत्यय ' त्रिपुटीभाव से नित्य श्राक्रान्त है, एवमेव विधि- आरण्यक -उपनिषत्, तीनों एक दूसरे के उपकारक - उपकार्य्य बनते हुए त्रिपुटीभाव से आक्रान्त हैं । एक के बिना दूसरे का तत्त्वज्ञान असम्भव है । ' कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत् ' - ' जैमिनीयोपनिषद्ब्राह्मण ' - ' बृहदारण्यकोप-निषत् ' इत्यादि वृद्धव्यवहार भी तीनों के इसी अभिन्न सम्बन्ध का समर्थन कर रहे हैं । एवं ' ब्राह्मण— श्रारण्यक उपनिषत्, तीनों का परस्पर क्या सम्बन्ध है? " इस प्रश्न का यही संक्षिप्त समाधान है, जिसके सम्बन्ध में अभी कुछ और जानना शेष रह जाता है । X ४ - कृत्स्नात्मक वेदशास्त्र, और तन्त्रों की अकृत्स्नता— वेदशास्त्र की श्रृङ्ग - भङ्गता का मुख्य कारण जहाँ ' सर्व ' शब्द बन रहा है, वहाँ इसकी पूर्णता का मूलाधार ‘ कृत्स्न ' शब्द बना हुआ है । अनेक तन्त्रों को अपने गर्भ में रखने वाला वेदशास्त्र कृत्स्न है, न कि सर्व । ' एकस्याशेषत्त्वं कार्त्स्यम् ' के अनुसार एक वस्तु की सर्वाङ्गीणता का प्रतिपादन करने के लिए ‘ कृत्स्न ' शब्द नियत है । एवं ' अनेकेषामशेषत्त्वं सार्व्यम् ' के अनुसार अनेक वस्तुओं की समष्टि का प्रतिपादन करने के लिए ' सर्व ' शब्द नियत है । एक मनुष्यशरीर हस्त - पाद - उरः - वन्न - मस्तक - श्रादि सम्पूर्ण अवयवों से युक्त रहता हुआ ' कृत्स्न ' है । अनेक मनुष्यों की समष्टि ' सर्व ' है । कृस्न शब्द सत्तैक्य से सम्बद्ध है, सर्व शब्द सत्तानैक्य से सम्बद्ध है । एकसत्तात्मक एक पदार्थ की सर्वता नहीं है, अपितु कृत्स्नता है । भिन्न भिन्न सत्तात्मक अनेक पदार्थों की कृत्स्नता नहीं है, अपितु सर्वता है । व्याख्याताओं की जिस सर्वता - भ्रान्ति ने कृत्स्न- दर्शनशास्त्र का अङ्ग भङ्ग किया है, उसी सर्वता - भ्रान्ति ने कृत्स्न वेदशास्त्र का ३७८
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तृतीयखण्ड अङ्ग – भङ्ग किया है । जैसा कि पूर्व परिच्छेद में दिग्दर्शन कराया गया है, वैशेषिक - प्राधनिक - शारीरक, तीनों तन्त्र व्याख्याताओं की दृष्टि में स्वतन्त्र सत्ता रखने वाले पृथक - पृथक तीन दर्शनशास्त्र हैं । तीनों की समष्टि उक्त लक्षण के अनुसार सर्वशास्त्र है । यही भेदमूला सर्वता दर्शनतन्त्रों के विरोध का मूलकारण है । यदि वैज्ञानिक दृष्टि से यह समझ लिया जाता है कि, तीन शास्त्र नहीं है, अपितु एक ही दर्शनशास्त्र के तीन तन्त्र हैं, तीन अवयव हैं, फलतः तीनों की समष्टिलक्षण दर्शनशास्त्र उक्त लक्षण के अनुसार ‘ कृत्स्नशास्त्र ’ है, तो तीनों का निर्विरोध समन्वय हो जाता है । अभेदमूला यही कृत्स्नता दर्शनतन्त्रों के अविरोध की मूलप्रतिष्ठा है । टीक यही परिस्थिति वेदशास्त्र के सम्बन्ध में घटित हुई है । सर्वतापक्ष में ऋ - यजुः साम - अथर्व - भेद्भिन्ना “ मन्त्रसंहिता, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषत् " चारों पृथक् - पृथक् शास्त्र हैं । चारों की समष्टि सर्व-लक्षणानुसार ' सर्वशास्त्र ' है । ठीक इसके विपरीत तन्त्र पक्ष में चारों एक वेदशास्त्र के चार अवयव हैं । फलतः कृत्स्नलक्षणानुसार चारों की समष्टि ' कृत्स्नशास्त्र ' है । बहुत सम्भव है, हमारी इस कृत्स्न - सर्वव्याख्या को एक काल्पनिक वस्तु मानते हुए पाठक वेदकृत्स्नता की उपेक्षा करने लगें । अतः इस सम्बन्ध में हम एक ऐसी महत्त्वपूर्ण सम्मति उनके सम्मुख रख देना चाहिते हैं कि, जिससे वे इस कृत्स्नता के अनुगामी बन सकेंगे । वेदशास्त्र की कृत्स्नता जिन चार तन्त्रों में विभक्त बतलाई गई है, उन विभागों को क्रमशः ' वेदकाण्ड, विधिव्रतकारड, तपःकाण्ड, रहस्यकाण्ड ' इन नामों से भी व्यवहृत किया जा सकता है । वेदकाण्ड मन्त्रसंहिता है, विधिव्रतकाण्ड ब्राह्मण है, तपःकाण्ड आरण्यक है, एवं रहस्यकाण्ड उपनिषत् है । नारों के परिज्ञान पर ही कृस्स्नवेद की कृत्स्नता अवलम्बित है । " पृथिवीमपि चैवेमां कृत्स्नामेकोऽपि सोऽर्हति ” ( मनुः १।१०५ ) - “ नित्यमुद्यतदण्डस्य कृत्स्नमुद्विजते जगत् " ( मनुः १।१०३ ) -" कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् " ( मनुः ८ २०७ ) इत्यादि स्थलों में सर्वत्र ' एकस्याशेषत्त्वं कृत्स्नत्त्वम् ' के अनुसार कृत्स्न शब्द का प्रयोग करने वाले भगवान् मनुने विस्पष्ट शब्दों में चतुः -पूर्वात्मक वेदशास्त्र की कृत्स्नता का ही समर्थन किया है । देखिए!
" तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥
99 ( मनुः २।१६५ ) । काण्डचतुष्टयात्मक, अतएव कृत्स्न वेदशास्त्र का मुख्य तन्त्र मन्त्रभाग है, जिसके लिए मनुने ' वेद ' शब्द का प्रयोग किया है । वेदज्ञानसाधक नियमादिलक्षण तपोऽनुष्ठान, स्वगृह्यविहित व्रतानुगमन, तथा रहस्यज्ञानानुगमन से ही कृत्स्न वेदाधिगम सम्भव है । इस साधनत्रयी के साथ साथ मनु ने संकेतविधि से तपःकर्म्मोपलक्षित उपासनाकाण्डात्मक ( रण्यक का, व्रतोपलक्षित कर्मकाण्डात्मक ब्राह्मण का, रहस्योष-लक्षित ज्ञानकाण्डात्मक उपनिषत्भाग का संग्रह करते हुए कृत्स्नवेद के चारों पर्वों की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया है । इस कृत्स्नवेद की कृत्स्नता " विज्ञान, स्तुति, इतिहास, कर्म्म, उपासना, ज्ञान, ” इन ६ भागों में विभक्त है । विज्ञान - स्तुति - इतिहास, तीनों प्रधानतः मन्त्रसंहिताभाग के प्रतिपाद्य विषय है । ३७६
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शेष तीनों क्रमशः विधि - श्रारण्यक उपनिषत् भागों से सम्बन्ध रखते हैं । ६ त्र प्रतिपाद्य विषय परम्पर सम्बद्ध हैं, एवं इसी सम्बन्धदृष्टि से कृत्न वेदशास्त्र ज्ञातव्य माना गया है । वेदशास्त्र की इस कृत्स्नता से बतलाना यही है कि, एक एक तन्त्र स्वतन्त्ररूप से अपने अपने प्रधान प्रतिपाद्य की दृष्टि से अकस्न है, अपूर्ण है । चारों तन्त्र समष्टिरूप से ही कृत्स्नता के प्रवत्तंक हैं । ५ – कृत्स्नात्मक वेदशास्त्र, और तन्त्रों की सर्वता — प्रस्तुत परिच्छेद का नामकरण प्रत्यक्ष में वदतोव्याघात का जनक बनता हुआ भी तत्त्वतः व्यवस्थित है । “ अनेकेषामशेषत्त्वं सार्व्यम् ” लक्षण वेवल एक तन्त्र की सर्वता का समर्थक कैसे बन सकता है १, यही वदतोव्याघात है । परन्तु जत्र प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि मे हम विचार करते हैं, तो यह व्याघातदोष हट जाता है । ' अनेकेषामशेषत्त्वं सार्व्यम् ' ही सर्वता है । शास्त्रकता की दृष्टि से जहाँ चारों तन्त्र एक ही शास्त्र के चार पर्व बनते हुए समष्टिरूप से कृस्नता के समर्थक बन रहे हैं, वहाँ प्रतिपाद्य अनेक-विषयों की दृष्टि से प्रत्येक पर्व सर्व बन रहा है । यह ठीक है कि, प्रत्येक पर्व में प्रधानता स्व - स्व विषय-प्रतिपादन की ही है । परन्तु गौणदृष्टि से प्रत्येक में विज्ञानादि उक्त ६ त्रों विषयों का भी समावेश हुआ है । विषय अनेक ( ६ ) हैं, सत्रका अपना अपना स्वरूप पृथक् पृथक् है । इन अनेकों का अशेषत्त्व प्रत्येक तन्त्र मे मम्बद्ध है । अतएव चारों तन्त्रों की समष्टि जहाँ कृत्स्न है, वहाँ प्रत्येक तन्त्र कृत्स्नवेदशास्त्र की दृष्टि से अकृत्स्न है । एवं चारों तन्त्र कृत्स्न वेदशास्त्र की दृष्टि से जहाँ एक ओर प्रकृत्स्न बन रहे हैं, वहाँ प्रतिपाद्य अनेक विषयों के अशेषत्त्व से प्रत्येक तन्त्र ' सर्व ' अवश्य बन रहा है । शब्दाडभ्वर से सम्बन्ध रखने वाली उक्त कृत्स्न - सर्व - मीमांसा इसलिए उपादेय मानी जायगी कि, इसके आधार पर हम वेदशास्त्र के तन्त्रों के पारस्परिक सम्बन्ध का भलीभाँति समन्वय कर सकते हैं । कृत्स्नमर्य्याद । में बेदशास्त्र अवयवी है, मन्त्र - विधि - आरण्यक - उपनिषत्, चारों तन्त्र इसके अवयव है । शरीरावयवों में जैसे एक दूसरे के कर्म में सहयोग रहता है, तथैव इन चारों के प्रतिपाद्य विषयों का एक दूसरे के स्वरूप - विश्लेषण में श्रन्यतम सहयोग है । सर्वमर्य्यादा में चारों तन्त्र सर्वविषय के प्रतिपादक बनते हुए स्वतन्त्र अवयवी भी बन रहे हैं । साथ ही प्रधानविषयातिरिक्त प्रतिपाद्य गौण विषयों के अन्यत्र प्रधान बने रहने से एक दूसरे का उत्तरदायित्व भी दूसरे पर अवलम्बित है । कृत्स्नता ' वेदशास्त्र एक है ' इस एकत्त्व व्यवहार की प्रतिष्ठा है । सर्वता चारों के पृथक् - पृथक् नाम व्यवहार की प्रतिष्ठा है । विज्ञान - स्तुति - इतिहास, ये तीन मन्त्रसंहिता के प्रधान विषय हैं । कर्म, उपासना, ज्ञान, ये तीन गौण विषय हैं । इन ६ त्रों के संग्रह से मन्त्रसंहिता का सर्वत्त्व सिद्ध है । विधिभाग में कर्मेतिकर्त्तव्यता-लक्षण कर्म्म प्रधान है, शेष पाँचों गौण हैं । फलतः इसका भी सर्वत्व अक्षुण्ण है । आरण्यक भाग में तत्त्वाराधनात्मिका उपासना प्रधान है, शेष गौण हैं, अतएव इसका भी सर्वत्त्व निर्वाध है । उपनिषत्-भाग में अव्यक्तात्मक ज्ञान का प्राधान्य है, शेष पांचों गौण हैं, अतएव इसकी सर्वता भी सुरक्षित है । अब इस सम्बन्ध में हमारा केवल यह कर्त्तव्य शेष रह जाता है कि, चारों तन्त्रों में गौण - प्रधानरूप में प्रतिपादित, सर्वताप्रवर्त्तक ६ त्रों विषयों के समर्थक कुछ एक वचन उद्धृत कर भ्रान्त नवीन वेदाभ्यासियों को यह सूचित कर दिया जाय कि, काण्ड चतुष्टयात्मक वेदशास्त्र के साथ कालभेदकल्पना करना सर्वथा आपातरमणीय है ३८०
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६ - मन्त्रसंहिता की सर्वता - ( १ ) ( १ ) - विज्ञानसमर्थकवचन — तृतीयखण्ड
१ – “ उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुराविवेश ।
मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा विचक्रमे रजसस्पात्यन्तौ ” ॥
( ऋक् ० सं ० ५।४७।३ । ) ।
२ – सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति समप्रमादम् ।
सप्तापः स्वपतो लोकमीयुस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवों " ॥
( यजुः ३४।५५ । ) । ३ - " इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्यारुहन् । प्रभूर्जयो यथापथो द्यामङ्गिरसो ययुः " । ( सामसं ० २ । १० । २ । ) । ४ - " वि नाम देवता - ऋतेनास्ते परीवृता । तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितसृजः " ॥ ( अथर्व १० । ४ । ८ । ३१ । ) । ( २ ) स्तुतिसमर्थकवचन — -X-१ – “ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् " ( ऋक्रूसं ० १ | १ | १ | ) २– “ नमस्ते रुद्र मन्यव उतांत इषवे नमः । बाहुभ्यामुत ते नमः " ( यजुःसं ० १६ । १ । ) । ३ – “ नमस्ते अग्न जसे गृणन्ति देव कृष्टयः । श्रमैरमित्रमद्द'य ' ( सामसं ० १ । २ । १ । ) । ४ – “ नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते स्तनयित्नवे । नमस्ते प्राण विद्य ुते नमस्ते प्रारण वर्षते " ॥ ( ० ( १।४।१ । ) । ( ३ ) इतिहाससमर्थकवचन— X
१ – “ क्व त्यानि नौ सख्या बभृवुः सचावहे यदवकं पुराचित् ।
बृहन्तं मानं वरुणः स्वधावः सहस्रद्वारं जगमा गृहं ते " ॥
( ऋक् ० ७८८ | ५ | ३८१
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२ – “ आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनावनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् ।
संक्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः " ॥
( यजुः १७।३३ । ) ३ – “ इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीव " ( सामसं ० उ ० ३ । १ ॥ ) ।
४ – “ अनेनेन्द्रो मणिना वृत्रमहनने नासुरान् पराभत्रयन् मनीषी ।
नेनाजयद् द्यावापृथिवी उभे इमे अनेनाजयत् प्रादेशश्चतस्रः " ॥
— अथर्व ० = | ३ | ३ | ) | ( ४ ) - कम्स मकवचन -१ - " सं वां कर्म्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्ण अपस्मारे अस्य । जुषेथां यज्ञं द्रविणं च धनमरिष्दैनः पथिभिः पारयन्ता " ॥ ( ऋकसं ० ६ | ६६ | १ | ) २ – “ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यतोऽस्ति न कर्म्म लिप्यते नरे " ॥ ( यजुः ४०।२ । ) ३ – “ नकिष्टं कर्म्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम् ॥ इन्द्रन्न यज्ञैर्विश्वगूर्त्तम्भ्वसमधृष्टं धृष्णुमोजसा " || ( साम ० उ ० ४।८ | ) |
४ -- " अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे ।
वीरान् नो अत्र मा दन् तद् व एतत् पुरो दधे " ॥
( अथर्व ०४ | ७ || ) । ( ५ ) - उपासना समर्थकवचन-१ - " तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति मूरयः । दिवीव चक्षुराततम् " ॥ ( ऋक्सं ० १ । २२ । २८ । ) ।
२ – “ य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः ।
यस्य च्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम " ॥
( यजुः २५।१३ । ) । ३६२
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तृतीयखण्ड ३ – “ इन्द्राय मद्वने सुतं परिष्टोभन्तु नो गिरः । कमर्चन्तु कारवः " ( सामसं ० पू ० २ । ७ । ४ । ) ।
४ – “ देव संस्कान सहस्रा पोपस्ये शिषे ।
तस्य नो रास्त्र तस्य नो धेहि तस्य ते भक्तिवांसः स्याम " ॥
( अथर्व ०६७६३ । ) । ( ६ ) - ज्ञान समर्थकवचन-- ·
१ – “ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधिविश्वे निषेदुः ।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते " ॥
( ऋक्सं ० ९ ।१६४।३६ । ) । २ – " यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ” । ( यजुः सं ० ४०.७ । ) ।
३ – “ विधु ं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार ।
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्याममार स ह्यः समान ॥
( साम ० उ ० ६ | ७ | ) ।
४ – “ कामो धीरो अमृतः स्वयम्भू रसेन तृप्तो न कुतश्च नोनः ।
तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम् " ॥
( ० २०१८ | ४४ | ) ७ - ब्राह्मणवेद की सर्वता ( २ ) -( १ ) - चिज्ञानसमर्धकवचन — -१-१ – “ प्रजापतिर्वै स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् - दिवमित्यन्ये आहुः, उपसमित्यन्ये । तामृश्यो भूत्वा रोहितं भूतामभ्यैत् । तं देवा अपश्यन् – अकृतं वै प्रजापतिः करोति - इति । ते तमैच्छत् - य एनमा रिष्यति । एतमन्योऽन्यस्मिन्नाविन्दन् । तेषां या एव घोरतमास्तन्व आसन् - ता एकधा समभरन् । ताः सम्भृता एष देवोऽभवत् । अस्यैतद् भूतवन्नाम " ॥ ( ऐ ० ब्रा ०१३ अ ० । ६ खं ० ऋग्ब्राह्मण ) । २– “ यदेतन्मण्डलं तपति - तन्महदुक्थं, ता ऋचः, स ऋचांलोकः । अथ यदेत-६८३
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भाष्यभूमिका यदेतदचिंदींप्यते - तन्महाव्रतं, तानि सामानि, स साम्नां लोकः । अथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः- सोऽग्निः, तानि यजूंषि, स यजुषां लोकः । सैषा येव विद्या तपति " ( शता ० १० | ३ | ४ | १.२, यजुर्ब्राह्मण ) ३ – प्रजापतिरकामयत – बहु स्यां, प्रजायेयेति । सोऽशोचत् । तस्य शोचत आदित्यो मूर्ध्वोऽसृज्यत । सोऽस्य मूर्द्धानमुदहन् । स द्रोणकलशोऽभवत् । तस्मिन् देवाः शुक्रमगृह्णत । तां वै स आयुपार्त्तिमत्यजीवत् " । ( ताण्ड्य ० ब्रा ० ६ । ५ । १ । सामब्राह्मण ) । ४-- -- " ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् स्वयन्त्वेकमेव 1 । तदैक्षत - महद्वै यक्षं तदेकमेवास्थि, हन्ताहं मदेव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्ममे - इति । तदभ्यश्राम्यत्, अभ्य-तपत्, समतपत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहो यदा-द्र मजायत - तेनानन्दत् । तमब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदम विदाम है- इति । तस्मात् सुवेदोऽभवत् । तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेद इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्ष द्विपः " | ( गो ० ० पू ० १ | १ | १ | - अथर्वब्राह्मण ) ( २ ) - स्तुतिसमर्थकवचन -१ – “ इन्द्रस्य नु वीर्य्याणि प्रवोच " मिति सूक्तं शंसति । तद्वा एतत् प्रियमिन्द्रस्य सूक्त ं निष्केवल्यं हैरण्यस्तूपम् । एतेन वै सृक्तेन हिरण्यस्तूप आङ्गिरम इन्द्रस्य प्रियं धामोपागच्छत् । स परमं लोकमजयत् ” ( ऐ ० वा ० १२/१३ । ऋग्ब्राह्मण ) । २– “ ईडेन्यो नमस्य इति । तिरस्तमांसि दर्शत इति । समग्निरिध्यते वृषेति । वृपोऽग्निः समिध्यते इति । श्रखो न देव वाहन इति । तं हविष्मन्त ईड इति वृषणं त्वा त्रयं वृपन् वृषणः समिधीमहि । अग्ने दीयन्तं बृहत् " ( शतः त्रा ० १।४।३।२६,३३, – यजुर्ब्राह्मण ) । ३– “ चात्वालमवेक्ष्य बहिष्पवमानं स्तुवन्ति । अत्र वा असावादित्य आसीत् । तं देवा बहिष्पवमानेन स्वर्ग लोकमहरन् । यच्चात्वालमवेक्ष्य बहिष्पवमानं स्तुवन्ति, यजमानमेव तत् स्वर्ग लोकं हरन्ति " ३८४ ता ० वा ० ६।७।२४ / सामब्राह्मण ) ।
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४ ‘ “ तदप्येतदृचोक्तम्— तृतीयखण्ड चत्वारि शृङ्गास्त्रयो अस्य पादा द्व े शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्या विवेश " इति । ( गो ० ना ० पू ० २।१६ । अथर्वब्राह्मण ) ( ३ ) - इतिहाससमर्थकवचन— १- " तस्य ह विश्वामित्रस्यैकशतं पुत्रा आसुः, पञ्चाशदेव ज्यायांसो मधुच्छन्दसः, पञ्चाशत् कनीयांसः 1 । तद्य ज्यायांसो, न ते कुशलं मेनिरे । ताननुव्याज-हारान् - तान् वः प्रजा भक्षीष्टेति । त एतेऽन्धाः पुण्ड्राः, शराः, पुलिन्दा:, मृतिवाः, इत्युदन्त्या बहवो वैश्वामित्रा दस्यूनां भूयिष्ठाः ” । ( ऐ ० वा ० ३३ ॥ ऋग्ब्राह्मण ) २ - " तच्च्यवनो वा भार्गवश्च्यवनो वाङ्गिरसस्तदेव जीणिः कृत्यारूपो जहे । शतो ह वा इदं जीणि ं कृत्यारूपमनर्थ्यं मन्यमानः - लोटैर्विपिपपुः । स शर्मा-तेभ्यश्चुक्रोध । तेभ्योऽसंज्ञां चकार, पितैव पुत्रेण युयुधे, भ्राता भ्रात्रा । शतो हईचाञ्चक्रे यत् किमकरं तस्मादिदमापदीति । स गोपालांचा-विपलांश्च सं ह्रयित्वाऽउवाच " ( शत ० प्रा ० ४। १.५ । - यजुर्ब्राह्मण ) | ३ - " केशिने वा एतद्दाल्भ्याय सामाऽऽविरभवत् " ( तां ० प्रा ० १३।१०१८ ) - " उशना काव्य कामयत यावानितरेषां कान्यानां लोकस्तावन्तं स्पृणुयां - इति ” ( तां ० ब्रा ० १४ । १२ । ५ । ) – ‘ स्वर्भानुर्गा सुर आदित्यन्तमसाविध्यन् । तं देवा न व्यजानन् । तेऽत्रिमुपाधावन् । तस्यात्रिर्भासेन तमोपाहन्यत् " ( तां ० ब्रा ० ६ । ६ ॥ - सामब्राह्मण ) । ४- एतद्ध स्मैतद् विद्वांसमेकादशाक्षम्मौद्गल्यं ग्लावो मैत्रेयोऽभ्याजगाम । स तस्मिन् ब्रह्मचर्य्यं वसतो विज्ञायोवाच - किं स्विन्मर्य्या अयं तं मौद्गल्योऽ ध्येति, यदास्मिन् ब्रह्मचर्य्ये वसतीति । तद्धि मौद्गल्यस्यान्तेवासी शुश्राव " । ( गो ० वा ० पू ० ११३१ - अथर्वब्राह्मण ) ३८५
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( ४ ) कम्समर्थकवचन — भाष्यभूमिका १ – ‘ “ देवा वै यज्ञेन श्रमेण तपसाऽऽहुतिभिः स्वर्ग लोकमजयन् । तेषां त्रपाया-मेव हुतायां स्वर्गो लोकः प्राख्यायत । ते वपामेव हुत्वाऽनाहत्येतराणि कम्मयूर्ध्वाः स्वर्ग लोकमायन् । ततो वै मनुष्याश्च ऋषयश्च देवानां यज्ञास्त्रभ्यायन् ” ( ऐ ० ब्रा ० ७ । ४ । ऋब्राह्मण ) । २- " श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे - इति । यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म । तस्मादाह - श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे ' इति " ( शत ० भा ० १ । ६ । ५ । ४ । यजुर्ब्राह्मण ) । ३ - " आत्मा वा एष सम्वत्सरस्य यद्विषुवान् । पक्षावेतावभितो भवतः, येन चेतो s भीवर्त्तेन यन्ति, यश्च परस्तात् प्रगाथो भवति, तावुभौ विपुवति कारणों । पक्षावेव तद्यज्ञस्यात्मन् प्रतिद्धति स्वर्गस्य लोकस्य समष्टयें " । ( तां ० ना ० ४ । ७ । १ । सामब्राह्मण ) । ४– “ अथातो यज्ञक्रमाः । अग्न्याधेयम् । अग्न्याधेयात् पूर्णाहुतिः । पूर्णाहुतैरग्नि-होत्रम् | अग्निहोत्राद्दर्शपूर्णमासां । दर्शपूर्णमासाभ्यामाग्रयणम् । आग्रयण।-चातुर्मास्यानि । चातुर्मास्येभ्यः पशुबन्धः । अग्निष्टोमः, राजसूयः, वाज-पेयः, अश्वमेधः, पुरुषमेधः, सर्वमेधः " ( गो ० ना ० पूः ५ | ७ | अथर्वत्राह्मरण ) । ( ५ ) – उपासनासमर्थकवचन— १ - " अधैनमुवाच ( नाग्दो ) वरुणं राजानानमुपधाव - ' पुत्रो मे जायताम्, ' तेन त्वा यजा ' इति । तथेति, स वरुणं राजानमुपससार, तेन त्वा यजा, इति । तथेति । तस्य पुत्रो जज्ञे रोहितो नाम " । ( ऐ ० ब्रा ० ३३२ ब्राह्मण ) । २ - " तद्य मुष्मिल्लोके रुद्रास्तेभ्य एतन्नमस्करोति । तद्य ऽस्मिल्लोके रुद्रास्तेभ्य एतन्नमस्करोति । तऽएवास्मै मृडन्ति " ( शत ० ६ । १ । १ । यजुब्राह्मएा ) । ३ – “ नमो गन्धर्वाय विष्वग्वादिने वर्चोधा असि, वर्चो मयि धे हि " । ( तां ॰ ब्रा ० १।३।१० – “ नमः समुद्राय नमः समुद्रस्य चक्षुपे " । .३८६ ( तां ० ब्रा ० ६।४ / ७ - सामत्राह्मण ) ।
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४ - " यो हवा एवंगित, स ब्रह्मवित् । पुण्यां च कीर्त्तिं च लभते, सुरभींश्च गन्धान् । सोऽपहतपाप्मानन्त्य श्रियमश्नुते - य एवं वेद, यश्चैनं विद्वाने-मेतां वेदानां मातरं सावित्रीसम्पदमुपनिषदमुपास्ते ” । ( गो ० वा ० ११३८ । अथर्वब्राह्मण ) । ( ६ ) - ज्ञानसमर्थकवचन— १ - " तेषां चित्तिः स्रुगासीत्, चित्तमाज्यमासीत्, वाग्वेदिरासीत्, आधीतं बर्हिरासीत्, केतो अग्निरासीत्, विज्ञातमग्नीदासीत्, प्राणो हविरासीत्, सामाध्वर्यु रासीत्, वाचस्पतिर्होतासीत्, मन उपवक्तासीत् । ते वा एतं ग्रहमगृह्णत " । ( ऐ ० ना ० २४।६ । ऋग्ब्राह्मण ) । २– “ स एष नेति नेत्यात्मा । अगृह्यो न हि गृह्यते, अशीयों न हि शीते, अस-ङ्गोऽसितो न सज्जते न व्यथते । अभयं नैं जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञ-वल्क्यः " ( शत ० १४ | ५ || ६ | यजुर्ब्राह्मण ) | ८ - आरण्यक वेद की सर्वता ( ३ ) -( १ ) - विज्ञानसमर्थकवचन— १ – “ अथातो रेतसः सृष्टिः । प्रजापते रेतो देवाः, देवानां रेतो वर्षम्, वर्षस्य रेत ओषधयः, षधीनां रेतोऽन्नं, अन्नस्य रेतो रेतः, रेतसो रेतः प्रजाः, प्रजानां रेतो हृदयं, हृदयस्य रेतो मनः, मनसो रेतो वाक्, वाचो रेतः कर्म्म । तदिदं कर्म्म कृतमयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः ” ( ऐ ० आ ०२।१।३ । ) । ( २ ) —स्तुतिसमर्थकञ्चन— १ - " यो मंहिष्ठो मघोनां चिकित्त्वो अभि नो नय । इन्द्रो विदे तमु स्तुषे वशी हि शक्रः " ॥ ( ऐ ००४।१।१ । ) । ३८७