Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 401–410

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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( ३ ) - इतिहाससमर्थकवचन — भाष्यभूमिका १ - " विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषसाद । स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसत्रौं शरांस । तेनेन्द्रस्य प्रियं भामोपेयाय । तमिन्द्र उत्राच – ऋषे! प्रियं नै धामोपागाः । वरं ते ददामि इति " ( ऐ ० आ ०२।२।३ । ) । ( ४ ) कर्म्मसमर्धकवचन ---१ – “ पञ्चकृत्वः प्रस्तौति, पञ्चकृत्व उद्गायति, पञ्चकृत्वः प्रतिहरति, पञ्चकृत्व उपद्रवति, पञ्चकृत्वो निधनमुपयन्ति । तत् स्तोभसहस्र ं भवति ” ( ५ ) - उपासना समर्थकवचन— ( ऐ ० आ ०२।३।४ ) । १. “ कोयमात्मेति वयमुपास्महे, कतरः स आत्मा? इति । येन वा पश्यति, शृणोति, गन्धानाजिघ्रति, वाचं व्याकरोति, स्वादु - चास्वादु च विजानाति ० Xx । सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति " ( ऐ ००२ ६ । १ । ) । ( ६ ) – ज्ञानसमर्थकाचन — १ - " एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुऋषयः काणयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे, किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुडुमः, प्राणे वा वात्रम् । यो न प्रभवः, स एवाप्ययः " ( ऐ ० आ ०३।२।६ । ) । ६ - उपनिषत् वेद की सर्वता ( ४ ) -( १ ) - विज्ञानसमर्थकवचन — १ - " अन्नमशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत् पुरीषं भवति, यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः । आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते । तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति, यो मध्यमस्तल् लोहितं योऽणिघ्नुः स प्राणः । ३८८

पृष्ठ 402

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तृतीयखण्ड तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति, यो मध्यमः स मज्जा, योऽणिष्ठः सा वाक् । अन्नमयं हि सोम्य! मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी बाक् ” ( छां ० उप ०६।५ । ) । ( २ ) - स्तुतिसमर्थकाचन— ,

- * -१ - " विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।

सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रैर्द्यानाभूमी जनयन् देव एकः " ॥

( श्वेताश्व ०३।३ । ) । ( ३ ) - इतिहाससमकवचन— १ – मटचीहतेषु कुरुष्याटक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास । स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं विभिक्षे । तं होवाच - नेतोऽन्ये विद्यन्ते, यच्च ये म इम उपनिहिता - इति । मे देहीति होवाच । तानस्मै प्रददौ ( ब्रां ० उप ०३।१० । ) । ( ४ ) कर्म्मसमर्धकवचन ( ५ ) - उपासना समर्थकाचन ( ६ ) --ज्ञान समर्थकञ्चन * प्रकरणोपसंहार -- - * संहिताभाग को अपनी मूलप्रतिष्ठा बनाने वाली विधि- आरण्यक उपनिषत् भेदभिन्ना काण्डत्रयी का घरम्पर क्या सम्बन्ध है?, इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर तो काण्डत्रयी के सम्यक् स्वाध्याय पर ही निर्भर है । इस सम्बन्ध में हमारा अपना तो यही स्पष्टीकरण है कि, जिस प्रकार शिर: - हृदय - पाद, ये तीनों शरीरपर्व एक ही शरीर के स्वरूपनिर्माता हैं, तीनों का जैसे परस्पर उपकार्य्य - उपकारक सम्बन्ध है, एवमेव शिरः स्थानीय उपनिषत्, हृदयस्थानीय श्रारण्यक, तथा पादस्थानीय ब्राह्मण ( विधि ), तीनों शरीरस्थानीय कर्त्तव्यात्मक एक ही वेदशास्त्र के स्वरूपनिर्माता हैं, एवं तीनों का परस्पर उपकार्य - उपकारक सम्बन्ध है । प्रत्येक पर्व के सम्यक अवध के लिए इतर दोनों पवों का सम्यक ज्ञान नितान्त अपेक्षित है । * पूर्व के द्वितीय परिच्छेद में तीनों के उदाहरण उद्धृत किए जा चुके हैं । ३८६

पृष्ठ 403

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भाष्यभूमिका उक्त पारस्परिक सम्बन्ध के द्वारा प्रकृत में बतलाना यही है कि, पटस्थानीय वेदशास्त्र के तन्तुस्थानीय संहिता - आदि चारों का स्वाध्याय सर्वता - तथा कृत्स्नता - भावनिबन्धन निखिल वेदशास्त्र -स्वाध्याय पर ही अवलम्बित है । केवल एक भाग को लक्ष्य बनाते हुए उस भाग के प्रतिपाद्य विषय की उसी भाग पर विश्रान्ति मानतेहुए सन्तोष कर लेना प्रौढिवादमात्र ही माना जायगा । अङ्गभङ्गात्मक आज का स्वाध्यायक इसी हेतु से वेदशास्त्रबोध का परिपन्थी बना हुआ है । वेदस्वाध्याय - प्रेमियों से इस सम्बन्ध में सानुनय निवेदन किया जायगा कि, यदि वे वेदतात्पर्य्य - निज्ञासु हैं, तो उन्हें मन्त्रब्राह्मणात्मक कृत्स्न वेदशास्त्र को लक्ष्य बना कर ही स्वाध्यायकर्म में प्रवृत्त होना चाहिए । उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' ब्राह्मणाश्रायकोपनिषत् - सम्बन्धस्वरूप दिग्दर्शन ' नामक पञ्चमस्तम्भ - उपरत ५ ३६०

पृष्ठ 404

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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' ब्राह्मणारण्यकोपनिषत् सम्बन्धस्वरूप दिग्दर्शन ' नामक पञ्चम- स्तम्भ उपरत

पृष्ठ 405

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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत-' श्रुतिशब्द मीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि ' नामक षष्ठ - स्तम्भ ६

पृष्ठ 406

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श्रीः श्रतिशब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि षष्ठ स्तम्भ १- भारतीय शास्त्र— अनुशासन करने वाला वाङ्मय संग्रह ही ' शास्त्र ' है । विशुद्ध लोकतन्त्र को लक्ष्य में रख कर जिन लौकिक मनुष्यों नें लौकिक मनुष्यों के लोकतन्त्र को सुरक्षित रखने के लिए लौकिक भाषा में जो देशोपदेश दिए हैं, उनका संग्रह ' लौकिकशास्त्र ' है, जिसके गर्भ में भारतीयातिरिक्त विश्व के यश्चयावत् शास्त्रों का समावेश है | लोकतन्त्र के साथ साथ अध्यात्ममूलक श्राधिदैविक तन्त्र को लक्ष्य में रख कर जिन अलौकिक महर्षियों ने लौकिक मनुष्यों के उभय तन्त्र को सुरक्षित रखने के लिए अलौकिक भाषा में जो देशोपदेश दिए हैं, उनका संग्रह ‘ भारतीय शास्त्र ' है । दूसरे शब्दों में केवल भूतोन्नति - जिसका चरम फल ' उन - नति ' निर्वचन के अनु-सार पतन है— को लक्ष्य में रखने वाला अनुशासनग्रन्थ इतरशास्त्र है । एवं पतनभावविरहित भूताभ्युदय, तथा प्राण - निःश्रेयस, दोनों से सम्बन्ध रखने वाला अनुशासनग्रन्थ भारतीय शास्त्र है, और यही भारतीय शास्त्र का इतर लौकिक - उन्नतिसाधक - शास्त्रों की अपेक्षा वैशिष्टय है, जिस वैशिष्ट्य को ग्राज के लौकिक शिक्षा आवरण ने प्रावृत कर लिया है । दूसरी दृष्टि से समन्वय कीजिए । पुरुष ( मनुष्य ) को लक्ष्य में रख कर ही सम्पूर्ण शब्दोपदेश प्रवृत हुए हैं, यह तो निर्विवाद है । क्योंकि - चतुद्दशविध भूतसर्ग में से एकमात्र मनुष्यसर्ग हो - ' मनुष्या एवैके -अतिक्रामन्ति ' ( शत ० २ | ४ | २ | ६ | ) के अनुसार प्रज्ञापराध से प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता हुआ उत्पथ का अनुगमन करता है । आवश्यक है कि, प्राकृतिक नियमोल्लंघन से होने वाली हानियाँ, तथा प्रकृत्यनुगमन से प्राप्त होने वाले लाभ इसके सम्मुख रखे जाँय एवं दोनों का समतुलन करते हुए इसे लाभप्रद प्राकृतिक नियमों की ओर आकर्षित किया जाय । जो शब्दशास्त्रोपदेश पुरुष का एवंविध अनुशासन कर सकेगा, वही अपने ‘ शास्त्र ' शब्द को अन्वर्थ बनाता हुआ ' शास्त्र ' शब्द का अधिकारी माना जायगा । ' पुरुष की प्रकृति को यथावस्थित बनाए रखने वाला अनुशासन ग्रन्थ शास्त्र है, शास्त्र की इस परिभाषा के गर्भ में वह प्रकृति - विज्ञान अन्तर्निहित है, जिसका लौकिक मनुष्य अपनी लौकिक दृष्टि से समन्वय नहीं कर सकते । लौकिक मनुष्य ऐन्द्रियक ज्ञान के अनुगामी होते हैं । इन्द्रियों का प्रवाह बाह्य भौतिक जगत् की ओर है, जिसे कि हम ' वैकारिक जगत् ' कहा करते हैं । जिनका एकमात्र लक्ष्य वैकारिक जगत् है, अतएव इन्द्रियातीत, अतएव सर्वथा परोक्ष प्रकृतितन्त्र का जिन्हें आभास तक नहीं है, उन लौकिक मनुष्यों के इन्द्रियाराममूलक आदेशोपदेश पुरुष के वास्तविक पुरुषार्थ - साधन में नितान्त असमर्थ हैं । वे ही आदेशोपदेश पुरुषार्थ माने बायँगे, जो वैकारिक जगत् के साथ साथ प्राकृतिक अन्तर्जगत् के विकास को भी अपना लक्ष्य बनाए रहेंगे । अपने इस लक्ष्य में क्योंकि एकमात्र भारतीय शास्त्र ही सफल हुआ है, अतएव ' शास्त्र ' परिभाषा में एकमात्र इसी को प्रतिष्ठित माना जा सकता है । ' पश्यन्त्यार्षेण चक्षुषा ' लक्षण भारतीय शास्त्र अन्तर्जगत् को लक्ष्य में ३६५

पृष्ठ 407

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भाष्यभूमिका रम्ख कर ही प्रवृत्त हुआ है । यदि कोई कर्तव्य लौकिक - सामयिक - ऐन्द्रियक दृष्टि से लाभप्रद प्रतीत हो रहा है, तत्र भी उसका उस दशा में सर्वथा परित्याग कर दिया जायगा, जबकि, वह लाभ शास्त्रद्वारा अलाभ घोषित कर दिया जायगा । क्योंकि लौकिक दृष्टि जहाँ भ्रान्त है, वैकारिक है, वहीं शास्त्रीय दृष्टि निर्भ्रान्त है, प्राकृतिक है, जिसका साक्षात्कार अस्मदादि लौकिक जन्तु नहीं कर सकते । तात्पर्य यह निकला कि " वैकारिक जगत् से सम्बद्ध श्रादेशोपदेश संग्रह शास्त्रामासलक्षण शास्त्र है, एवं अन्तदृष्टि से सम्बन्ध रखने वाला आदेशोपदेश संग्रह वस्तु-गस्या ' शास्त्र ' है, और वही हमारा भारतीय शास्त्र है, जिसके सम्बन्ध में अवतारपुरुषों के द्वारा हमें यह आदेश मिला है कि- " तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते कार्याकार्य्य व्यवस्थितौ " ( गीता ) । केवल पुरोऽवस्थित पदार्थों के आधार पर ऐन्द्रियक ज्ञान के अनुसार विधि - निषेध की व्यवस्था करने वालेपुरुष लौकिक पुरुष हैं, एवं इन्हें हीं शास्त्रीय परिभाषा में ' यथाजात ' कहा गया है । पुरोऽवस्थित वस्तु को माध्यम बना कर उसके श्रवारपारीण- भूत - भविष्यत् परिणामों के आधार पर विधिनिषेध करने वाले पुरुष अलौकिक पुरुष हैं । एवं इन्हें हीं ' ऋषि ' कहा गया है । ऋषिदृष्टि योगजदृष्टि है, ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्बन्ध रखने वाली दृष्टि है, दिव्यदृष्टि है । इस दृष्टि से दृष्ट अर्थ सर्वथा निर्भ्रान्त है, एवं प्रत्येकदशा में श्रभ्युदयकर है । अतएव इस ऋषिदृष्टि से दृष्ट अर्थ का स्पष्टीकरण करने वाला शब्दशास्त्र किसी भी अन्य प्रमाण की अपेक्षा न रखता हुआ स्वतः प्रमाण है । ऋषियों का दृष्टिरूप अर्थ शब्दावच्छेदेन हमारे लिए ' श्रुति ' है । यही ' श्रुति ' हमारे लिए प्रत्यक्षदृष्टिस्थानीया बनती हुई स्वतः प्रमाणभूता है, जैसा कि अगले परिच्छेदों में स्पष्ट होने वाला है । अभी इस सम्बन्ध में यही वक्तव्यांश है कि, अतीतानागतश, पारोवर्य्यविद, महामहर्षियों के सहज ( प्राकृतिक ) ज्ञान - जोकि ईश्वरीयज्ञान है - से सम्बद्ध शब्दराशि ही भारतीय शास्त्र है । यहौ भारतीय शास्त्र पुरुष का परमपुरुषार्थ है । पुरुष के परम पुरुषार्थ से सम्बन्ध रखने वाला भारतीय शास्त्र भारतीय ऋषियों की ‘ कृति ' कहलाता हुआ भी इसलिए प्रकृति है कि, इस शास्त्र का वितान उस पुरुष चतुष्टयी के आधार पर हुआ है, जिसे श्रुतिशास्त्र ने नित्यशब्द से व्यवहृत किया है । पुरुष - ऋषि भारतीय शास्त्र के द्रष्ट । है, कर्त्ता नहीं । कर्त्ता है - वह पुरुष, जिसने अपने आपको चार संस्थाओं में विभक्त कर रक्खा है । एवं जिसके चार विवतों का दिग्दर्शन कराना प्रसङ्गतः श्रावश्यक हो रहा है । २ चतु: संस्थ अपौरुषेय शास्त्र— ' क्लेशकर्म विपाकाशयर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर: ' ( पातञ्जलयोगसूत्र ) के अनुसार प्रकृति से नित्य संयुक्त, महामायी, विश्वेश्वर ही ' पुरुष ' है । ' मयाऽऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् ' इस स्मार्च सिद्धान्तानुसार वह पुरुष इस प्रकृति के द्वारा ही विश्व, तथा विश्वधम्मों का प्रस्तोता ( वितानकर्ता ) बना हुआ है । उस पुरुष का प्राकृतिकरूप ही विश्व का मूल है, जिसका ' अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्ति ' भी समर्थन हुआ है । प्रकृत्यवच्छिन्न वही पुरुष महामाया, एवं तद्गर्मीभूत योगमायाओं के तारतम्य मे चार विवर्त्तभावों में परिणत हो रहा है । पुरुष के वे ही चारों विवर्त - क्रमश: इन नामों से प्रसिद्ध हैं-“ १ – मढ़ापुरुषः, २– वेदपुरुषः, ३ – छन्दः पुरुषः, ४ – शरीरपुरुषः ” । पुरुषविज्ञानवेत्ता महर्षि ' बाघ ' ने सम्वत्सरविज्ञान के आधार पर उक्त पुरुषचतुष्टयी का समन्वय करते हुए बतलाया है कि, ज्योतिष्चकावच्छिन्न, सवनत्रयात्मक सम्वत्सर ही ( पार्थिवदृष्टि की अपेक्षा से ) महापुरुष है । ३६६

पृष्ठ 408

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तृतीयखण्ड इस सम्वत्सरपुरुष की सवनत्रयाध्यक्षभूता देवतात्रयी से सम्बद्ध यज्ञप्रवर्त्तक त्रयीवेद ( मौलिक यज्ञमात्रिक वेद, जिसका भूमिका द्वितीयखण्ड में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है ) वेदपुरुष है । वेदवागलक्षणा नित्या-वा का विवर्त्तृभूत नित्य अक्षरसमाम्नाय छन्द: पुरुष है । एवं महा, वेट, छन्दः पुरुषत्रयी के आदित्य, ब्रझा, एवं ' अ ' काररस से समुत्पन्न वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञलक्षण देही शरीरपुरुष है । प्रज्ञानात्मा ही इसका रस है । इस प्राज्ञरसावच्छिन्न शरीरपुरुष ( देही ) का ही नाम मुण्डकपरिभाषानुसार भोक्तासुपर्ण है । एवं देही के दभ्रा-काश में अन्तर्यामीरूप से प्रतिष्ठित छन्दः, वेद, महापुरुषात्मक तत्त्व साक्षीसुपर्ण है । फलतः शरीरपुरुष का चतुः पुरुषत्व सिद्ध हो रहा है । शरीरपुरुष जीवन का हेतु है, छन्दःपुरुष आयतन का संरक्षक वेदपुरुष आध्यात्मिक हरहर्य‍ का सञ्चालक है, एवं श्रादित्यरसात्मक महापुरुष मन प्राण - वाङ्मय श्रायुःसूत्र का प्रदाता है । यही आध्यात्मिक - पुरुषचतुष्टयी का संक्षिप्त इतिवृत्त है - ( देखिए - ऐत ० ० २।३।६ । ) । १ – शरीरपुरुषः - योगमायावच्छिन्नो वैश्वानरतैजसप्राज्ञमूर्त्तिर्जीवनहेतुर्देही - तस्य प्रज्ञानात्मा रसः अध्यात्मम् २– छन्दः पुरुषः- योगमायावच्छिन्नः - आकाररूपप्रदाता साममयः स्वरः - तस्य कारो रसः ३ – वेदपुरुषः– योगमायावच्छिन्नः - यज्ञप्रवर्त्तकः प्रजापतिः - तस्य ब्रह्मा रसः ४ – महापुरुषः - महामायावच्छिन्नः - श्रायुः प्रवर्त्तकः- सम्वत्सरः - तस्य श्रादित्यो रस: इस प्रकार ' यदेवेह, तदमुत्र ' न्याय से अधिभूत तथा अधिदैवत संस्था में भी उक्त पुरुषचतुष्टयी का भोग हो रहा है । उदाहरणरूप से बेदशास्त्र को ही अपना लक्ष्य बनाइए । वेदपुस्तक, जिसके आधार पर हम वेदतत्त्व का मनन करते हैं, श्रधिभौतिक पदार्थ हैं । पत्र ( कागज ) - मसी ( श्याही ) - लिपि - आदि सभी आधिभौतिक पदार्थ हैं । श्रतएव तद्रूप वेदपुस्तक को अवश्य ही ' याधिभौतिकसंस्था ' कहा जा सकता है । यही वेदपुस्तक ' शरीरपुरुष ' है, जिसके आधार पर वेदग्रन्थ प्रतिष्ठित है । स्मरण रखिए — ऋग्वेदग्रन्थ एक है, परन्तु पुस्तकें हजारों है । ऋग्वेद की पुस्तक हमारी है । किन्तु ऋग्वेदग्रन्थ हमारा नहीं है । अक्षरसमाम्नायात्मक शब्दप्रपञ्च ग्रन्थ है, जिसका आधार पुस्तक है । पुस्तकरूप शरीरपुरुष पर प्रतिष्ठित ग्रन्थ भिन्न वस्तुतत्त्व है 1 । ऋग्वेदपुस्तक का अधिकार सत्र को है, किन्तु - ऋग्वेदग्रन्थ का अधिकार केवल द्विजाति को ही है । जिसे अक्षरबोध है, वह सामान्य यथाजात भी पुस्तक बाँच सकता है । परन्तु ब्रह्म - तत्र - त्रिड्-वीर्य्यातिरिक्त सामान्य लौकिक मनुष्य ग्रन्थ नहीं समझ सकता | ग्रन्थ - श्रर पुस्तक का यही अहोरात्रवद् महान् विभेद है । वाङ्मय प्रपञ्चरूप इसी ग्रन्थ को हम ' छन्दः पुरुष ' कहेंगे । वाङ्मय प्रपञ्चलक्षण छन्दः-पुरुष के गर्भ में प्राणात्मक नित्यविज्ञान प्रतिष्ठित है । वह नित्यविज्ञान अनेक धाराओं में विभक्त है । उन अनन्त विज्ञानों की समष्टि ही ' वेदपुरुष ' है । अनन्त विज्ञानात्मक सर्वसमष्टिलक्षण महामायी वेदैकवेद्य तत्त्व ही ' महापुरुष ' है । इसप्रकार हमारे इस प्राधिभौतिक उदाहरण में भी चारों पुरुषविवर्तों का भोग हो रहा है । • महापुरुष स्वयं अकृतक है, नित्यकूटस्थ है, अतएव अपौरुषेय है । उक्थ स्थानीय पौरुषेय महापुरुष के अर्क ( निःश्वास ) स्थानीय विज्ञानात्मक अनन्त वेद भी तत्सम ( अपौरुषेय ) हीं हैं । वेदाभिन्न वाङ्मय प्रपञ्च भी अपौरुषेयमर्य्यादा से बहिर्भूत नहीं हैं । वाकतत्त्व के ये तीनों पद गुहा निहित हैं । महापुरुषाधार पर प्रतिष्ठित वेदपुरुषावच्छिन्न छन्दः पुरुषपर्य्यन्त अपनी व्याप्ति रखने वाला शास्त्र एकान्ततः अपौरुषेय है । एवं चौथा वैखरीवाङ्मय विवर्त्त यद्यपि पुरुषप्रयत्नसाध्य होने से पौरुषेय है, तथापि अपौरुषेय - वेदतत्त्व से ३६७

पृष्ठ 409

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भाष्यभूमिका समतुलित इस वेद शब्द को भी लौकिक- पौरुषेय भाषा के समान धरातल पर नहीं रक्खा जा सकता । यही कारण है कि, पौरुषेय भी यह शरीरपुरुषात्मक वेदशास्त्र आस्तिक सम्प्रदाय में अपौरुषेय नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, जो प्रसिद्धि इस तत्त्वदृष्टि से सर्वथा समीचीन है । तात्पर्य्य- परिच्छेदान्तर का यही हुआ कि, भारतीय शास्त्रों में स्वतः प्रमाणभूत शास्त्र वेदशास्त्र है । एवं यह उक्त दृष्टि से चतुः संस्थ है । चतुः संस्थ अपौरुषेय यह वेदशास्त्र प्राकृतिक शास्त्र है, विज्ञानशास्त्र है, दृष्टि से दृष्ट श्रुतिशास्त्र है, अतएव निर्भ्रान्त सनातनशास्त्र है । इस सनातनशास्त्र के प्रति अनामा बुद्धि रखना, इसे लौकिक- पौरुषेय -सामयिक - शास्त्राभासों की भाँति बुद्धिवाद की शून्य - निकषा पर कसना भ्रान्ति है । अप्रामाण्यगन्धलेशतोऽपि शून्य स्वतः प्रमाणसिद्ध चतुःसंस्थ अपौरुषेय वेदशास्त्र क्योंकि पुरुष के अन्तर्जगत् का विकासक बनता हुआ अपने बाह्यस्वरूपोपलक्षित यज्ञविधान से इसके बहिर्जगत् की भी स्वरूप रक्षा कर रहा है, अतएव इसे ' सर्वशास्त्र ' कहना श्रन्वर्थ बनता है * । ३ - आगम निगम रहस्यः— अनन्त वेदशास्त्र की अनन्तता को अपने सान्त - सादि जीवन के सम्बन्ध में एक जटिल समस्या समझते हुए हमें उस शास्त्री की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है, जिसका हम अपने स्वल्पजीवन में अधिक से अधिक उपयोग कर सकते हैं । हमारी उत्पत्ति, हम सुनते आ रहे है, माता - पिता के दाम्पत्यभाव से होती आ रही है । शोणिताधिष्ठात्री माता के प्रवर्ग्यभूत शोणित भाग से, तथा शुक्राधिष्ठाता पिता के प्र ० शुक्रमाग से दोनों के है । तच्वद्रष्टा अन्तर्य्यामसम्बन्धात्मक चिति - सम्बन्ध से देही- शरीर का श्राविभव हुआ महर्षि कहते हैं कि, वस्तुतः हमारे माता - पिता द्यावापृथिबी हैं । स्त्रीसृष्टि में माता पृथिवी के प्रारण की प्रधानता है, पुरुषसृष्टि में पिता द्य के प्राण का प्राधान्य है । इसी परम्परा से शुक्रादुतिप्रदाता पिता, एवं शोणिताग्नि में शुक्राहुति को गर्भरूप से प्रतिष्ठित करने वाली माता नाम से व्यवहृत हुई है । द्युलोकोपल चित सूर्य्य हमारे पिता हैं, एवं पृथिव्युपलक्षिता उखा हमारी माता है, जैसाकि - ' द्यौष्पितः पृथिवि मातरधुगग्ने-भ्रातर्वसवो मृडता नः ' ( ऋ ०६।५१।५ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । द्यावापृथिवी की समष्टिरूप सम्वत्सरपुरुष - जिसका अहः कालोपलक्षित - अद्ध ' - दृश्य - खगोल अग्नितत्त्वप्रधान बनता हुआ द्युतत्त्वप्रधान है - प्राकृतिक ' पति ' है । एवं रात्रिकालोपलक्षित - श्रद्ध - अदृश्य - खगोल सोमतत्वप्रधान बनता हुआ पृथिवी-तत्त्व प्रधान है, यही ' जाय । ' भाव है । इसप्रकार द्यावापृथिव्यात्मक सम्वत्सरपुरुष ही पार्थिवप्रजा का प्रधान उपादान है । ' प्रकृति के गर्भ में प्रकृति के अंश से हमारी उत्पत्ति हुई है, इस सिद्धान्त का तात्पर्य यही है कि, द्यावापृथिव्यात्मक आधिदैविक सम्वत्सर चक्र से हमारी उत्पत्ति हुई है, जिसके धर्म्म सर्वथा नियत हैं । इन नियत धम्मों के कारण ही इसे ' नियति ' कहा गया है, जो कि नियति -पृथिवी भेद से दो भागों में विभक्त * -- खण्ड चतुष्टयात्मक - ' भारतीय हिन्दू मानव, और उसकी भावुकता ' नामक निबन्ध के द्वितीय खण्ड में - ' किमिदं शास्त्रम्?, केयं वा शास्त्रनिष्ठा? ' नामक परिच्छेद में विस्तार से भारतीयशास्त्र- स्वरूप का उपबृंहगा हुआ है । ३३८

पृष्ठ 410

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तृतीयखण्ड है । हमारा अभ्युदय तभी सम्भव है, जबकि हम अपनी प्रभवभूता इस नियतिद्वयी के नियत धम्मों का यथानुरूप श्रनुगमन करते रहें । दूसरे शब्दों में प्रकृत्यनुसार जीवनयात्रा का निर्वाह करने से ही हमारा अभ्युदय हो सकता है, एवं तभी निःश्रेयसुभाव की प्राप्ति सम्भव है । अब प्रश्न हमारे सामने यह है कि, द्युलोकोपलक्षिता नियति का सूर्य्यपर्वतो किन धर्मों का अनुयायी है?, एवं पृथिवीपर्व किन धम्मों का अनुगमन कर रहा है? । इन्हीं दोनों प्रश्नों के समाधान के लिए परोक्षार्थद्रष्टा महर्षियों की ओर से निगमागमशास्त्रद्वयी का आविर्भाव हुआ है । सूर्य्यविद्या प्रकृतिविद्या का प्रथम, तथा मुख्य पर्व है । पारमेष्ठ्य समुद्रगर्भ में यह विद्यापर्व स्वयं विनिर्गत है । स्त्रयं निर्गतः ' निर्वचन से ही सूर्य्यविद्या ' निगम ' नाम से व्यवहृत हुई है । अथर्वगर्भिता ऋग् - यजुः- सामात्मिका त्रयीविद्या ही सूर्य्यविद्या है, जिसका ' सैपा त्रयीविद्या तपति ' ( शत ० १० | ५ | २ | २ | ) रूप से स्पष्टीकरण हुआ है । एवं जिसका कि ' भूमिका द्वितीयखण्ड ' में तात्विक वेदनिरुक्तिप्रकरण में ' गायत्री -मात्रिक वेदनिरुक्ति ' रूप से विश्लेषण हुआ है । इस प्राकृतिक वेदविद्या - जिसे कि स्वयं निर्गत होने से निगम विद्या कहा जायगा -का स्पष्टीकरण शब्दात्मक - ग्रन्थात्मक - जिस वेदपुस्तक से हुआ है, वह भी ताच्छन्द्यन्याय से ‘ निगमविद्या ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । द्यु शास्त्र, वेदशास्त्र, पितृशास्त्र, निगमशास्त्र, त्रयीशास्त्र, इत्यादि शब्द अंशत: समानार्थक हैं । पृथिवीविद्या प्रकृतिविद्या का दूसरा पर्व है । ग्रहोपग्रहविज्ञानानुसार पृथिवी सूर्य्य का उपग्रह माना गया है । पृथिवीचिव का मूलाधार सूर्य्यविवर्त्त है । श्रतएव यह कहा जा सकता है कि, स्वयंनिर्गत सूर्य्यं मे पृथिवी विवर्त्त श्रागत है । त्रयीविद्यावन सूर्य्य निगम है । इस निगम से श्रागत होने के कारण ही पृथिवीविद्या ' निगमादागतः ' निर्वचन से ' आगम ' है । इस प्राकृतिक श्रागमविद्या का स्पष्टीकरण शब्दात्मक जिस ग्रन्थ से हुआ है, वह भी उक्त न्याय से ' श्रागमविद्या ' नाम से ही प्रसिद्ध हो गया है । पृथिवीशास्त्र, मातृशास्त्र, श्रागमशास्त्र, इत्यादि शब्द अंशतः समानार्थक हैं । निगमशास्त्र अपौरुषेय श्रुतिशास्त्र है, ग्रागमशास्त्र पौरुषेय स्मृतिशास्त्र हे । श्रुति स्मृतिलक्षणा शास्त्रद्वयी ही ' भारतीय शास्त्र ' है, जिसे हम प्राकृतिक शास्त्र कह सकते हैं । इन श्रागम - निगम निर्वचनों से सम्भवतः यह मान लेने में कोई आपत्ति न होगी कि, भारतीय श्रुतिस्मृतिशास्त्र मानवीय कल्पना नहीं है । अपितु सर्व-जगदाधार स्वयं ईश्वरप्रजापति का आदेश है । ऋषि इसके निमित्तमात्र हैं । वे स्वयं इनके अनुगामी रहे हैं, इस अनुगमन से उन्होंनें अम्युदय - निःश्रेयस् प्राप्त किया है । श्रतएव उन्होंनें लोकाभ्युदय निश्रेयस् के लिए अपने शब्दों में अपनी सन्तति के सम्मुख उन श्रादेशोपदेशों को रक्खा है, जिनके अनुगमन से प्रजा का उभयविध संरक्षण संशयरहित है । हमारा मुख्य लक्ष्य ' अति ' शब्द है । परन्तु बिना निगमागमपरिभाषाओं के लक्ष्य-पूर्ति पूर्ण रह जाती है । श्रतएव उस परिभाषा का दिग्दर्शन कराना आवश्यक समझा गया । अब इस सम्बन्ध में प्रसङ्गोपात्त निगमागमग्रन्थों के सम्बन्ध में भी दो शब्द कह देना अनुचित न होगा । क्रमप्राप्त पहिले निगमविस्तार पर ही दृष्टि डालिए । ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस निगम प्रमाण से निगमशस्त्र भी चार भागों में विभक्त माना जा सकता । १ - संहिता, २ - ब्राह्मरण, ३ – कल्प, ४ - अङ्ग, ये ही निगमशास्त्र के चार विवर्त्त ' हैं । ऋकू - यजुः - साम - अथर्व, भेद से संहिता के चार मुख्य पर्व हैं I । विधि, ३६६