Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 411–420
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 411–420
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भाष्यभूमिका श्रारण्यक, उपनिपत, मेद से ब्राह्मण विभाग के तीन पर्व है । श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, सामयाचारिकसूत्र, भेद से कल्प तीन विभागों में विभक्त है । शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प, ये ६ अङ्ग-विभागों के अवान्तर पर्व है । इनमें से संहिता, ब्राह्मण, इन दोनों का सविभाग विशद वैज्ञानिक निरूपण भूमिका द्वितीय खण्ड से गतार्थ है । वितानयज्ञेतिकर्त्तव्यताप्रतिपादक श्रौतसूत्र, पाकयज्ञेतिकर्त्तव्यताप्रतिपादक गृह्यसूत्र, एवं सामयिकाचारसूत्र, त्रिधा विभक्त इस कल्प के सम्बन्ध में भी विशेष वक्तव्य नही है । वक्तव्य है - पडङ्ग के सम्बन्ध में 1 ४- षडङ्गस्त्ररूपपरिचय — शिक्षादि षडङ्ग ' वेदाङ्ग ' नाम से क्यों प्रसिद्ध हुए!, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । नित्यसिद्ध विज्ञान ही वेद पदार्थ है, यह बहुधा प्रपञ्चित है । किसी भी नित्यसिद्ध विज्ञान की सर्वाङ्गीणता के सम्बन्ध में छन्द, निरुक्त, व्याकरण, गणित, शिक्षा, कल्प, ये ६ विष आवश्यक रूप से अपेक्षित हैं । इन्हीं का क्रमशः दिग दर्शन कराया जा रहा है-( १ ) छन्द: --श्रमुक श्रङ्गी वस्तु में कितनें पदार्थ किस रूप से अन्तर्भुत हैं? इस प्रश्नोत्तर से सम्बन्ध रखने वाला, अङ्गभूत पदार्थों का रीतिबन्धरूप से प्रतिपादन करने वाला वाकूपरिमाणात्मक भावविशेष ही ' छन्द ' है । जिन अङ्गशक्तियों के संघठन से श्रङ्गी का स्वरूप निर्माण होता है, ने श्रङ्गशक्तियाँ भृत्यस्थानीया हैं, एवं स्वयं श्री स्वामी - स्थानीय है । स्वामिशक्ति क्योंकि भृत्यशक्तियों के संघटन से सम्बन्ध रखती है, दूसरे शब्दों में अङ्गशक्तियाँ अङ्गीशक्ति के प्रति आत्मसमर्पण किए रहतीं हैं, श्रतएव अङ्ग से सम्बन्ध रखने वाले वाक्-परिमाणात्मक, रोसित्रन्धनात्मक छन्द ' परच्छन्द ' कहलाते हैं, एवं श्रङ्गी छन्द ' स्वच्छन्द ' कहलाता है । इस प्रकार गौण - मुख्य - न्याय से छन्दस्तत्त्व के दो विवर्त्त हो जाते हैं । यदि अङ्गीशक्ति की अविवक्षा कर श्रृङ्ग-शक्ति का स्वातन्त्र्येण ग्रहण किया जाता है, तो उस समय ये श्रङ्गच्छन्द भी स्वच्छन्दस्क बन जाते है । छन्दस्तत्त्व की इस परिभाषा के आधार पर कहा जा सकता है कि, " स्वरूपसन्निवेश छन्द है, अवयवसन्निवेश छन्द है, अन्तरङ्गपदार्थ छन्द है, रीतिबन्ध छन्द है " । वस्तुतत्त्व विज्ञानभाषा में ' वय ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रत्येक वय ( वस्तु ) का कोई न कोई नियत आयतन होता है, जिसमें कि वय प्रतिष्ठित रहता है । यह श्रायतन आधार - आवपन भेद से दो भागों में विभक्त माना गया है । एकतः श्रयतन को आधार कहा जाता है, सर्वतः श्रायतन को वपन कहा जाता है । उदाहरण के लिए, भूपृष्ठ, और श्राकाश को लक्ष्य बनाइए । भूपृष्ठ, श्राकाश, दोनों हमारे आयतन हैं । परन्तु भूपृष्ठ हमारा एकत: आयतन है, आकाश सर्वायतन है । आकाश ने हमें सर्वतः व्याप्त कर रक्खा है । भूपृष्ठ केवल एकतोऽनुरूपा प्रतिष्ठा है । वय को चारों ओर से सीमित बनाने वाला, सीमित बना कर उसे अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाला वागाकाशरूप परिणाह ' वयोनाघ ' नाम से प्रसिद्ध है । आकाशायतन से समतुलित, अतएव सर्वाधारलक्षण यह वयोनाध आवपन है, यही छन्दः पदार्थ है । छन्दोभेद ही वस्तुभेद का मूल कारण है, जैसाकि शतपथभाष्यादि में विस्तार से प्रतिपादित है । नित्यसिद्ध विज्ञान एक प्रकार का वय है । विज्ञानात्मक प्रत्येक वय छन्दोरूप वयोनाथ से बद्ध है । बिना वयोनाध - परिज्ञान के वयज्ञान असम्भव है । अतएव वैज्ञानिकों ने वयात्मक वेदमन्त्रविज्ञान के लिए ४००
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तृतीयखण्ड छन्दोविज्ञान श्रावश्यक माना है । छन्दोभेद ही विज्ञानभेद की मूलप्रतिष्ठा है । विज्ञानघन प्राणतत्त्व, जिसे कि याज्ञिक परिभाषा में ' देवता ' कहा गया है, छन्द पर ही प्रतिष्ठित है । छन्द से छन्दित प्राणदेवता के संग्रह के लिए उसकी छन्दोभक्ति का समाश्रय श्रावश्यक रूप से अपेक्षित है । एवं यही छन्दोरूप अङ्ग का दिग्दर्शन है । ( २ ) -निरुक्तम् — विज्ञानात्मक वेदतत्व यद्यपि नित्य है । तथापि श्राविर्भाव तिरोभाव की दृष्टि से इसे हम उत्पत्ति - स्थिति-संहृति - धर्मों से युक्त मान सकते हैं । उत्पति ( प्रभव ), स्थिति ( प्रतिष्ठा ), संहृति ( परायण ) लक्षणा भावत्रयी विज्ञानात्मक वेद की दूसरी भक्ति है । निश्वयेन प्रत्येक पदार्थ सम्पत्ति, प्रतिपति, विपत्ति - भावों से नित्य चाकान्त है 1 | अर्धप्रतिपत्ति ही अर्थस्थिति है । उपचय, अपचय, साम्य, भेद से प्रत्येक अर्थ यति को तीन भागों में विभक्त माना जा सकता । वस्तु का प्रातिस्थिक स्वरूप ज्यों का त्यों है, इसका स्वरूपध किसी श्रागन्तुक श्रतिशय के कारण उत्कृष्ट हो गया है, यह स्वरूपवृद्धि ही इस अर्थ का उपचय है, यही उपचय-लक्षणा अर्थप्रतिपत्ति, किंवा अर्थस्थिति है । यही वस्तु की समृद्धि है, सौभाग्य है, लक्ष्मीभाव है । वस्तुस्वरूप का अपनापन तो सुरक्षित है, परन्तु किसी श्रागन्तुक परधर्म के समावेश से स्वरूपधर्म्म विकास से दब गया है । स्वरूपहानि नहीं हुई है, स्वरूप विकृत हो गया है, यही इस वस्तु का अपचय है, यही अपचयलक्षणा प्रर्थप्रतिपत्ति ( स्थिति ) है । यही वस्तु की व्यृद्धि है, दुर्भाग्य है, निर्ऋतिभाव है । न उपचय है, न अपचय है । अपितु वस्तुस्वरूप यथानुरूप प्रतिष्ठित है । यही वस्तु का ' योगक्षेमलक्षण ' साम्प है । तात्पर्य्यं इन स्थिति-विशेषों से यही है कि, प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक तत्त्व उत्पत्ति, वृद्धि, स्थिति, क्षय, महार, विपरिणाम, इन ६ परिस्थितियों में से अवश्य ही किसी न किसी परिस्थिति से आक्रान्त रहता है । इन ६ श्रों भावविकारों का निरूपण करने वाला शास्त्र ही ' निरुक्तशा ' है, जिसके परिज्ञान के बिना भी बस्तुतत्वपरिज्ञान अपूर्ण हो बन रहता है । ( ३ ) आकरणम् -निरुक्तशास्त्र सिद्धा निर्वाचनप्रक्रिया के आधार पर परिज्ञात षड्भावविकारों के अनन्तर तत्तत् तत्त्व-विशेषों में सामान्य, विशेष बुद्धि का उदय हो जाता है । इन सामान्य विशेष भावों के आधार पर एक ही तत्त्व का अनेकधा प्रतिपादन होने लगता है । सामान्यलक्षण एकत्त्व के आधार पर विशेषलक्षण अनेकत्व विकसित हो जाता है । एक ही वस्तुतत्त्व के आधार से निर्वचनानुग्रह से एक तस्व अनेक भावों में परिणत हो जाता है । एक का यह अनेकत्त्व ही ' एकस्य विविधाकारत्वं ' निर्वचन से व्याकरण तत्त्व है । यही वेदशास्त्र की तीसरी भक्ति है । इस व्याकरणभक्ति का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र ही ' व्याकरणशास्त्र ' है । घट अनेक प्रकार के हैं, पट अनेक प्रकार के हैं, प्राणी अनेक प्रकार के हैं, इसप्रकार प्रत्येक जाति में अनेकत्त्व सर्वानुभूत है । परन्तु साथ ही यच्चयावत् घों, पटों, प्राणियों का मूलाधार मृत् - तन्तु - प्राण समान है, यह भी स्वतः सिद्ध है । नानाविध भावों के रहने पर भी तत्त्वाभेद सुस्थिर है । अवश्य ही इन सत्र विभिन्न आकार - प्रकारों में एक कोई अभिन्न तत्त्व मूलाधार है, जिसकी यह व्याकृति है । नाम - रूप ही इस व्याकृति के मुख्य प्रवर्त्तक हैं । प्राख्यात, उपसर्ग, निपात, प्रकृति, प्रत्यय, प्रयत्न, स्वर, वर्णादि, सम्पूर्ण व्याकृतियों का नाम - रूप - व्याकृति में हीं अन्तर्भाव है । ४०१
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भाष्यभूमिका प्रत्येक पदार्थ ' में आत्मवर्म, अनात्मधर्म, भेद से द्विविध धर्मों का समावेश रहता है । आत्म-धर्महानि से वस्तुस्वरूप का उच्छेद हो जाता है, अतएव इसे स्वधर्म्म ' ' कहा जाता है, एवं इसका छन्दोध में अन्तर्भाव है । दूसरे अनात्मधर्म के समावेश से एक ही वस्तुतत्त्व अनेक नाम - रूपों में परिणत होता रहता है । इस नानाविध्य - रहस्य का, व्याकृतितत्त्व का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र ही ' व्याकरणशास्त्र ' है । उदाहरण के लिए निरुक्तसिद्ध ' घट् ' धातु को ही लीजिए । ' घटू ' के घटाघटनं घट - घटते, इत्यादि विविध भाव व्याकरण पर अवलम्बित हैं । एवमेव निरुक्तसिद्ध ' घट ' शब्द के - ' घटः - घट - घटाः ' ये अनेक व्याकृ-तियाँ व्याकरणसिद्धा हैं । इस शब्दव्याकरणवत् अर्थव्याकरण का समन्वय अपेक्षित है । जो नियमोनियम शब्दव्याकरण के हैं, वे ही तद्वाच्य अर्थव्याकरण के हैं । निष्कर्षतः समस्त का व्यास ही व्याकरण है, संक्षिप्त का बिवरण ही व्याकरण है, एक का विविधाकारसमर्थन ही व्याकरण है । एवं इस व्याकरणतत्त्व का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र ही व्याकरणशास्त्र है । ( ४ ) –गणितम् — व्याकरणशास्त्र के द्वारा अनेकधा गृहीत अर्थ का विज्ञान - सौकर्य के लिए संकलन करना ही गणन है । तत्प्रतिपादक शास्त्र ही गणितशास्त्र है, यही वेदशास्त्र की चौथी वेदभक्ति है । व्याकरणशास्त्र से ठोक उलटा मणितशास्त्र है । व्यवकलन व्याकरण है, तो संकलन गणित है । विकास व्याकरण का प्रयत्न है, तो संकोच गणन का प्रयत्न है । विवृत्ति व्याकरण पर अवलम्बित है, तो संवृत्ति गणन से सम्बन्ध रखती है । एकाकार का विविधाकारत्त्व समर्थन यदि व्याकरण से होता है, तो विविधाकार को एकाकारत्व प्रदान करन । गणित पर निर्भर है | व्याकरण यदि विस्तार का अनुगामी है, तो गणन प्रस्तार का पक्षपाती है । समस्त का व्यास यदि व्याकरण पर अवलम्बित है, तो व्यस्त का समास गणन पर अवलम्बित है । गणितशास्त्र की गुणनप्रकिया के आधार पर पूर्वपक्ष किया जा सकता है कि, जिस प्रकार एक को अनेकरूप प्रदान करना व्याकरण का काम है, एवमेव गणितशास्त्र की गुणनप्रक्रिया से भी एक को अनेक भाव में ही परिणत किया जाता है । ऐसी स्थिति में इसे संकोच - शास्त्र कैसे माना जा सकता है? । पूर्वपक्ष के समाधान के सम्बन्ध में प्रकृत में यही कह देना पर्याप्त होगा कि, षडङ्गों के पारस्परिक सम्बन्ध के कारण गणितशास्त्र में गौणरूप से संगृहीत गुणनकर्म्मात्मक व्याकरणधर्म के सन्निविष्ट रहने पर भी गणित के संकोचप्रधान मुख्य प्रतिपाद्य का प्लाप नहीं किया जा सकता, जैसा कि - ' वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्त्वम् ' नामक संस्कृत निबन्ध के ‘ षडङ्गनिरुक्ति ' प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित है । प्रकृत में इस सम्बन्ध में यही कहना है कि, तत्त्वस ंकोचप्रकिया के विविध प्रकारों का प्रतिपादन करने वाला शास्त्रविशेष ही ' गणितशास्त्र ' है, जिसके बिना जाने वेदशास्त्र में प्रतिपादित वेदव्यूह का स्वरूप कथमपि गतार्थ नहीं बन सकता । ( ५ ) - शिक्षा -म्वरूपधर्म्मप्रतिपादक छन्दः शास्त्र, सत्ताधर्म्मप्रतिपादक निरुक्तशास्त्र, विशेषधर्मप्रतिपादक व्याक-रणशास्त्र, एवं सामान्यधर्म्मप्रतिपादक गणितशास्त्र, इन चारों शास्त्रों से क्रमशः स्वरूपमुखेन, सनामुखेन, विशेषमुखेन, सामान्यमुखेन परिगृहीत वस्तुतत्त्व के सम्बन्ध में आपेक्षिक बहिरङ्ग - गुणधर्म्म उपस्थित होते हैं । इन्हीं आपेक्षिक बहिरङ्ग धर्मों को ' उपकरण ' कहा गया है । इन उपकरणों का रहस्योद्घाटन करने वाला ४०२
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शास्त्र ही ' शिक्षाशास्त्र ' है । यही वेदशास्त्र की पाँचवीं भक्ति है । यह निश्चित सिद्धान्त है कि, प्रत्येक वस्तु-त्वत्त्व स्वरूप – सत्ता - विशेष - सामान्य भेदभिन्न अन्तरङ्ग धर्मों के विकास के लिए अनुकूल कुछ एक बहिरङ्ग धम्र्मो का आश्रय लेकर स्व - स्वरूपाविर्भाव में समर्थ बनता है । इस श्राश्रयभाव का विशेषतः नाम - प्रपञ्च के साथ ही सम्बन्ध माना गया है । नित्यसिद्ध विज्ञानप्रतिपादक शरीरपुरुषस्थानीय शब्द की अनुरूपता, उच्चारण-विशेषता ही विज्ञानग्रहण का अन्यतम द्वार है । श्रौतकर्मोपयुक्त - शब्दोच्चारणवैशिष्ट्यलक्षण उपकरणरूप बहिरङ्ग धर्म्म की विशेषताओं का प्रतिपादन करने वाला शास्त्रविशेष ही शिक्षाशास्त्र है, जिसका ' स्थूलारुन्धती-न्याय ' से सर्वप्राथम्य माना गया है । बिना शिक्षा के शब्दप्रपञ्च सर्वथ । अविज्ञात ही बना रहता है । ( ६ ) - कल्पः -स्वरूप, कारण ( सत्ता ), विशेष, सामान्य, बहिरङ्ग, पूर्वोक्त पाँच शास्त्रों के द्वारा सिद्ध इन पाँच धर्मो से सर्वात्मना संसिद्ध वस्तुतत्त्व का उपयोग कहाँ, कैसे, कब करना?, उस उपयोग से क्या क्या फलसिद्धि सम्भव है?, इन प्रश्नों का समाधान करने वाला शास्त्र ही ' कल्पशास्त्र ' है । यही ६ की वेदभक्ति है । इसी वेदभक्ति को सफल बनाने के लिए पूर्वाङ्गशास्त्रों के द्वारा वेद का अनुगमन किया जाता है । उन पाँचों वेदभक्तियों के सम्यक परिज्ञान के बिना उपयोगिताज्ञानंप्रवर्तक कल्पशास्त्रानुगमन सर्वथा निर्बल रह जाता है । यह मानी हुई बात है कि, प्रत्येक वस्तुतत्त्व को उपयोग में लाने से पहिले यदि उसके स्वरूप - कारणादि पञ्च धम्मों का सम्यक ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है, तो बह विशेष प्रतिपत्तिकर बन जाता है, जैसाकि - ' यदेव विद्यया करोति, श्रद्धयोपनिपढ़ा - तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ' इत्यादि उपनिषच्छ्र ुति से भी प्रमाणित है । ग्रमुक अर्थ से क्या अतिशय उत्पन्न किया जा सकता है?, किस कर्म्मकौशल से अमुक अर्थ प्राप्त किया जा सकता है?, अमुक अर्थानुष्ठान से क्या फलसिद्धि सम्भव है?, इन सब विषयों की उपपत्ति जान लेने से विज्ञाता पुरुष ऋजुभाव से कर्मेतिकर्त्तव्यता में प्रवृत्त होता हुआ इष्टसाधक पुरुषार्थसाधन में प्रवृत्त हो जाता है, सफल बन जाता है | इसी उपयोगिताज्ञानसाधक तत्कर्त्तव्यतासमर्थक शास्त्रविशेष का नाम ' कल्पशास्त्र ' है । उपर्युक्त षडङ्गों से स ंसिद्ध अर्थों से श्रङ्गीभृत वेदशास्त्र सर्वात्मना उपकृत हो जाता है | इसी सम्बन्ध से इसे ‘ वेदाङ्ग ’ कहना ग्रन्वर्थ बनता है । श्रङ्गीभूत वेदशास्त्र जिस कर्त्तव्यकम् की हमें शिक्षा देता है, वह श्रौत - यज्ञकर्म है । श्रौत यज्ञकर्म के द्वारा हम अपनी अध्यात्मसंस्था में दिव्यप्राणातिशय उत्पन्न करते हैं । इस दिव्यसंस्कारग्रहण की योग्यता के लिए ही प्रथम षडङ्ग - अध्ययन आवश्यक माना गया है । संस्कार्य्य ग्रात्मा मनः प्राण – वाङ्मय है । षडङ्ग द्वारा प्रथम इसी त्रिकल श्रात्मा को तीनों कलाओं का दोषमार्जन होता है | शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, ये चारों ग्रङ्गशास्त्र वाग्भाग का संस्कार करते हैं । कल्प प्राणभाग को सुस ंस्कृत बनाता है । एवं ज्यौतिष मानस विवर्त ' का परिशोधन करता है । कहना न होगा कि, आज हमनें अपनी शिक्षापद्धति को दूषित कर किस प्रकार वेदतत्त्व से अपने आपको पराङ्मुख बना लिया है । अङ्गशास्त्रसे वञ्चित निगमशास्त्र आज सर्वात्मना निर्गत है, यह जान कर किस निगमप्रे मी का ग्रन्तर्जगत् शान्त रहेगा? ५ - श्रागमविवर्शपरिचय– चतुर्विध जिस पुरुषस ंस्था का पूर्व में दिगदर्शन कराया गया है, उस पुरुषसंस्था के आदि पर्न को ' महापुरुष ' नाम से व्यवहृत हुए उसे सम्वत्सरात्मक बतलाया गया है । इस सम्वत्सरात्मक महापुरुष के करते ४०३
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मायभूमिका यज्ञ, काल, भेद से दो निवर्त हैं, जिनका विष्णुपुराण में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । अग्न्यात्मक सभ्य-हसर सोमाहुति के सम्बन्ध से ' यशपुरुष ' बन रहा है, चक्रात्मक सम्वत्सर यावपनरूप से ' कालपुरुष ' बन रहा है । यज्ञपुरुष द्युलोक का अधिष्ठाता है, यही निगमशास्त्र का प्रवर्तक है । कालपुरुष भूलोक का अधिष्ठाता है, यही आगमशास्त्र का प्रवर्तक है । पुराणभाषा में इसी स्थिति वा यो स्पष्टीकरण किया जा सकता है कि, वैष्णवशास्त्र निगमशास्त्र है, शैवशास्त्र आगमशास्त्र है । शिवशक्तिप्रधान, कालनियामक, इस श्रागमशास्त्र के कल्प, सिद्धान्त, संहिता, डामर, यामल, तन्त्र, भेट से ६ विवर्त्त हैं । कल्प ६ हैं, सिद्धान्त १४ हैं, संहिता १८ है, डामर ८ हैं, यामल १० हैं, तन्त्र ६४ हैं । सम्भूय आगमशास्त्रविवर्त्त १२० ग्रन्थों में विभक्त हैं । चतुद्दशविध सिद्धान्त विवत्त में ही ' डाम्नाय ' का श्रन्तर्भाव है । भूपृष्ठ पर प्रतिष्ठित मानव सिद्धिकामना से पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधः, इन ६ दिकप्राणों में से किसी भी एक का अनुगमन कर सकता है । तदनुसार ही ये ग्राम्नाय क्रमशः पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय उत्तराम्नाय दक्षिणाम्नाय, ऊर्ध्वाम्नाय, अधराम्नाय नामों से प्रसिद्ध हैं । वैदिक मन्त्रानुगत मिद्धिमार्ग पूर्वाम्नाय है । समस्त भाषाक्षरमन्त्रानुगत सिद्धिमार्ग पश्चिमाम्नाय है । पञ्चमकारानुगत सिद्धिमार्ग सर्वोत्कृष्ट, किन्तु सर्वथा जटिल, अतएव ' वाम ' नाम से प्रसिद्ध ' उत्तराम्नाय ' है । पञ्चदकारानुगत सिद्धिमार्ग पञ्चदेवतोपासनात्मक, सर्वथा ऋजुभावापन्न मार्ग दक्षिणाम्नाय है । सुषुम्ना नाड़ी से सम्बद्ध ब्रह्मरन्ध्रानुगत योगसिद्धिमार्ग ऊर्ध्वाम्नाय है । मूलग्रन्ध्यनुगत गणपतिसंयुक्त अघोरमार्ग ( अघोराम्नाय ) अधराम्नाय है । ६ श्रों में यही शीघ्र फलप्रद मार्ग है । भारतवर्ष का यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि, जहाँ उसने निगममार्ग की उपेक्षा कर रक्खी है, वहाँ आगमशास्त्र भी एकान्ततः उसके हाथ से निकल चुका है । श्रागमशास्त्रोक्त सिद्धियों का हमारा पण्डितममाज बड़े गर्व से अभिमान तो अवश्य करता है, परन्तु खेद है कि, उसका यह अभिमान केवल शब्दों पर ही विश्रान्त है । सम्पूर्ण विश्वविभूतियों पर अपना नियन्त्रण रखने वाले श्रागमशास्त्र के भक्त पण्डित स्वयं अपनी बुभुक्षा भी शान्त नहीं कर सकते, इससे बढ़ कर हमारा नैतिक पतन और क्या होगा । आज हम शास्त्र, तत् सिद्ध धर्म की रक्षा के लिए उस सत्ता की कृपा भिक्षा माँग रहे हैं, जिसे इनका अणुमात्र भी बोध नहीं है । आज हमनें हमारे इष्टदेव का आश्रय छोड़ दिया है, और यही हमारी पराश्रयता का बीज है, जिसे उमामाहेश्वरी के बल से समूल उत्पाड देनें में हीं विश्व का शाश्वत श्रभ्युदय है ६- श्रतिशब्द के आधुनिक व्याख्याता -' श्रुति ' शब्द मीमांसा के सम्बन्ध में भारतीय शास्त्रविवत्तों का दिग्दर्शन कराना प्रासङ्गिक समझा गया । अत्र प्रकृत विषय की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । नितान्त गुप्त, एकमात्र गुरु-परम्परा में ही परम्परया सुरक्षित, परम्परोच्छेद से वर्तमान में विलुप्तप्राय वैदिक परिभाषाओं को न जानने के कारण वर्त्तमानयुग के पश्चिमी व्याख्याताओं नें, तथा तदनुगामी उच्छिष्ट मोगी कतिपय भारतीय वेदाभि-मानियों नें निगमशास्त्र के लिए निरूढ़ ' श्रुति ' शब्द का यह ताप्तर्य समझ रक्खा है कि, वेदकाल में ' लेखन ' कला का सर्वथा अभाव था । परम्परया सुन - सुना कर ही निगमशास्त्र की रक्षा होती थी । अतएव तत्कालीन यात्रामयी यह साहित्याशि ' अति ' नाम से व्यवहृत हुई है । यदि वेदकाल में लेखन कला होती, तो अबश्य ४०४
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तृतीयखण्ड ही उपलब्ध वाङ्मय में लेखिनी, मसीपात्र, आदि तत साधनों का नामोल्लेख भी उपलब्ध होता । इसी प्रकार कुछ एक ओर भी तर्काभासों के द्वारा हमारे ये मान्य ' रिसर्च स्कॉलर ' इस तथ्य पर पहुँचे हैं कि, " लेखनकला के अभाव को सूचित करने के लिए ही निगमशास्त्र के लिए ' अति ' शब्द व्यवहार में आया है " । उक्त कल्पना का हमनें तो यही अर्थ लगाया है कि, यदि किसी वर्त्तमान युग के शिष्टपुरुष की रचना में ‘ शयन - भोजन - गमन - उद्यानादि शब्द न होंगे, तो कुछ एक शताब्दियों के अनन्तर प्रकट होने वाले तत्-सम रिसर्च स्कॉलर वर्तमान रिसर्च - पद्धति का श्रनुगमन करते हुए इस तथ्य पर पहुँचेंगे कि, आज से कुछ शताब्दियों पहिले मनुष्य न सोते थे, न भोजन करते थे, न चलते फिरते थे । न उस युग में बाग बगीचे ही थे । उस युग की सन्तान जब इनसे प्रमाण माँगेगी, तो बिना किसी संकोच के उत्तर दे दिया जायगा कि, अमुक युग की अमुक साहित्यिक रचना में शयन - भोजन - गमनादि शब्द नहीं आए । कैसी विडम्बना है? साहित्यक्षेत्र का कैसा नग्न प्रदर्शन है? । वर्ण - पद - वाक्य - श्लोक - प्रन्यादि का संकलन त्रिना लेखनकला के केवल मुन सुना कर सम्पन्न हो गया, ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' सूत्रसिद्धा वेदरचना यों हीं निकल पड़ी, इसे कौन बुद्धिमान् स्वीकार करेगा । ‘ उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचम् ' ( ऋकसं ० १०/७११४ ) का क्या तत्पर्य है?, लेखिनी के लिए प्रयुक्त वेदभाषा का ‘ तुरभ्राज ' ( लौहमयी लेखिनी ) शब्द किस अर्थ का द्योतक है?, यह उन्हीं श्रुति - रहस्य-वेत्ताओं से पूँछना चाहिए । कल्पनारसिक विद्वान् कहते हैं -- विश्वविजयी, मगधेश्वर देवानांप्रियदर्शी सम्राट अशोक से पहिले लिपि न थी । अशोक साम्राज्यकाल लगभग २२४० वर्षो पर ठहरता है । भगवान् राम-चन्द्र का अवतारकाल आधुनिकों की दृष्टि से भी अशोक से कई सहस्र पूर्व विश्राम करता है । रामभद्र के अनन्योपासक श्रीमारुति अशोकवाटिका में बैटी हुई जगन्माता के क्रोड़ में जिस मुद्रिका के द्वारा: सन्देश पहुँचाते है, वह मुद्रिका ' रामनामाङ्किता ' है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से प्रमाणित है— वानरोऽहं महाभागे! दृतो रामस्य धीमतः । रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यङ्ग लीयकम् ॥ ( वा ० सु ० कां- ३६।२ । ) । G लिपि के अभाव में मुद्रिका का रामनाम से संयुक्त होना कैसे सम्भव था?, यह उन्हीं लिपिविशारदों से प्रष्टव्य है । स्वयं ऋग्वेद में कई स्थलों में पत्रादि - प्रेषण कम्मों के समर्थनद्वारा लिपि को सत्ता प्रतिध्वनित हुई है | विज्ञानभवनापरपर्य्यायक सूर्य्यसदन, सोमरसदोग्ध्री गौ, सोमवल्ली, तीनों देवचलों के विनाशक असुरों का जब भारतीय सुदास आदि राजाओं से दमन न हुआ, तो यह समाचारपत्र - द्वारा स्वर्गाधिपति इन्द्र के समीप पहुँचाए गए । इन्द्र ने पत्रवाहक के द्वारा सन्देश भिजवा कर स्वयं उपस्थित हो उन्हें सान्त्वना दी, एवं श्रमुरत्रल का विध्वंस किया । अस्तु, भारतीय दृष्टिकोण के धरातल से ऐसे रिसर्च का कोई महत्त्व नही है | भारतीय शास्त्र अपनी कुछ एक परिभाषाएँ रखता है, जिनका परिज्ञानं प्राप्त किए बिना बुद्धिबलसाहस्री से भी भारतीयकोश के सङ्क ेत शब्दों का समन्वय नहीं किया जा सकता । ७- श्रुतिस्मृति - संज्ञा मीमांसा— वस्तुतत्त्व का तथाभूत स्वरूप ' सत्य ' है, तथाभूत स्वरूप ' मिथ्या ' है । याथातथ्य ही सत्य की मौलिक परिभाषा है । जो जैसा है, उसे वैसा ही समझना सत्यज्ञान है, यही सत्यज्ञान दर्शन परिभाषा में ' प्रमा ' नाम से IIII
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भाष्यभूमिका व्यवहृत हुआ है । जिस साधन से यह प्रमात्मक सत्यज्ञान उत्पन्न होता है, ' प्रमाजनकम् ' निर्वचन मे बही प्रमासावन ' प्रमाण ' नाम से व्यवहृत हुआ है । याथातथ्यात्मक सत्यस्वरूप प्रमाज्ञान प्रत्यक्ष, अनुमान. शब्द, मेद से तीन साधनों के द्वारा सम्भव है । अतएव उक्त निर्वचनानुसार तीनों प्रमासाधकों को ' प्रमाण ' कहा जा सकता है । इन तीनों प्रमाणों में अनुमान, और शब्द, दोनों प्रमाण प्रत्यक्षमूलक हैं । प्रत्यक्ष के आधार पर दोनों की प्रामाणिकता अवस्थित है । अतएव इन दोनों को प्रत्यक्ष प्रामाण्यमापेक्ष होने से ' परतः प्रमाण ' कहा जायगा । प्रत्यक्ष प्रमाण अपने प्रामाण्य के लिए किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा न रखता हुआ अपना स्वयं आप ही प्रमाण है, अतएव ' प्रमाणानां प्रमाणभूत ' इस प्रत्यक्ष प्रमाण को ' स्वतः प्रमाण ' कहा जायगा । प्रत्यक्ष का चक्षुरिन्द्रिय से सम्बन्ध है । एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों में चतुरिन्द्रिय ही एकमात्र सत्य का अनुगामी है । कारण यही है कि- ' तयन् तत् सत्यमसौ स श्रादित्यः ' ( शत ० ) इत्यादि निगमानुसार सत्यात्मक आदित्य ही चतुरिन्द्रिय का प्रभव है । सचमुच प्रजापति ने चतु में ही सत्य का निधान किया है । यही कारण है कि, " मैंने देखा है - इसलिए मेरा कथन सत्य है, मैंने सुना है - इसलिए मेरा कथन सत्य है " इसप्रकार परस्पर विविदमान दो व्यक्तियों के सम्मुख उपस्थित होने पर हम उसी के कथन पर विश्वास प्रकट कर देते हैं, जो कि ' मैंने देवा है ' यह कहता है । इसी चाक्षुत्र सत्य का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान्, याज्ञवल्क्य कहते हैं-“ नानृतं वदेत् विचक्षणवतीं वाचं वदेत् । चक्षु विचक्षणम् । यतद्वै मनुष्येषु सत्यं निहितं यच्चतुः । यत्र द्वौ विवदमानावेयातां - अहमदर्श, अहमश्रौषम् ' इति । य एवं ब्रूयात् ' अहमदर्शम् ' इति, तस्मा एा श्रद्दध्यामः ', ( शतः २ | ३ | ११२७ | ) प्रत्यक्ष का अर्थ है- ' दृष्टि ', जो कि दृष्टि अन्य किसी प्रमाण को अपेक्षा न रखती हुई स्वतः प्रमाणभूता है । इस सम्बन्ध में यह विवेक अवश्य कर लेना चाहिये कि — लौकिक - भौतिक विषयों से सम्बन्ध रखने वाली दृष्टि ऐन्द्रियक दृष्टि है, एवं लौकिक अर्थों की सत्यता के सम्बन्ध में यह ऐन्द्रियक लौकिक दृष्टिरूप प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । अलौकिक - श्राधिदैविक, आध्यात्मिक सुसूक्ष्म विषयों से सम्बन्ध रखने वाली दृष्टि - योगजदृष्टि है, श्रार्षदृष्टि है, पवित्र - शुद्ध - व्यवसायधर्मानुगता नित्यविज्ञानदृष्टि है । एवं इन्द्रियातीत अलौकिक अर्थों की सत्यता के सम्बन्ध में यह अलौकिक दृष्टिरूप प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । लौकिक सत्य में लौकिक चतु ( इन्द्रियसत्य ) प्रमाण है, अलौकिक सत्य में अलोकिक चतु ( विज्ञानसत्य ) प्रमाण है । श्रवण दर्शन की प्रतिस्पर्द्धा में दर्शन को प्रामाण्य है । एवं दर्शनदृष्टि, विज्ञानदृष्टि की प्रतिस्पर्द्धा में विज्ञानदृष्टि को प्रामाण्य है । आदित्य मे । चक्षुरिन्द्रिय का सम्बन्ध है, आदित्य से ही विज्ञानचक्षु का सम्बन्ध है । दोनों के स्वरूप में भेद यही है कि, श्रादित्यप्राणात्मक ( इन्द्रात्मक ) देवभाव चक्षुरिन्द्रिय का स्वरूपसमर्पक है । आदित्यगत चिदात्मतत्त्व विज्ञानचतु का प्रवर्तक है । ' योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम् ' बाला आत्मसत्य ही विज्ञान सत्य है, जिसका ' चाक्षुषपुरुष ' रूप से, एवं ' दक्षिणाचिपुरुष रूप से उपनिषदों में विश्लेषण हुआ है । यही श्रन्तर्यामी है । इसके लिए भूत - भविष्यत् गत्र कुछ वर्त्तमानवत् प्रत्यक्ष है । चिरकालिक तपोयोग से विशुद्ध-स्वनिष्ठ बने हुए ऋषियों के ऋतम्भरात्मकप्रज्ञाधरातल पर प्रतिबिम्बित इस अन्तर्यामी का अनुग्रह हो जाता है । ४०६
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तृतीयखण्ड फलतः ऋषिदृष्टि अन्तर्य्यामी की दृष्टि से अभिन्न बन जाती है । इनकी दृष्टि उससे योग कर तद्रूपा बन जाती है, अतएव इसे ' योगजदृष्टि ' कहा गया है । इन्द्रियातीत तत्त्वों के सम्बन्ध में यही दृष्टि सफल होती है । प्रतएव प्रामाण्यवाद के सम्बन्ध में निर्दिष्ट ' प्रत्यक्ष ' प्रमाण से यह अलौकिक - ऋषिदृष्टिही अभिप्रेत है, जो कि अनुपद में ही ' श्रुति ' रूप से पाठकों के सम्मुख उपस्थित होने वाली है । अतीतानागतज्ञ, अतएव विदितवेदितव्य, महामहर्षियों ने अलौकिक दृष्टि के प्रभाव से इन्द्रियातीत तत्त्वों का साक्षात्कार किया । इन्होंनें जिस तत्त्वसमष्टि का साक्षात्कार किया, वह साक्षात्कृता तत्त्वसमष्टि इनकी ' प्रत्यक्षदृष्टि ' कहलाई । प्रत्यक्षदृष्टिरूप इस दृष्ट अर्थ का ऋषियों नें परोक्षदृष्टिशून्य अस्मदादि लौकिक पुरुषों को शब्दद्वारा उपदेश दिया । ऋषियों के द्वारा सुना गया वही उपदेश ' श्रुति ' कहलाया । दृष्टि से दृष्ट अर्थ का श्रभिनय करने वाला शब्द दृष्टि से भिन्न है । अतएव इस शब्द को हम ऋषिदृष्टि ही कहेंगे । ऋषिदृष्टिरूप शब्द क्योंकि हमारे श्रवण का विषय बनता है, एकमात्र इसी हेतु से इसे ' श्रुति ' कहना न्यायसङ्गत मान लिया गया है । इसी दृष्टिरूपा श्रुति का रहस्यार्थ सूचित करते हुए अभियुक्तों नें कहा है— “ साक्षात्कृतधर्म्माण ऋषयो बभूवुः । तेऽसाक्षात्कृतधर्म्मभ्योऽवरेभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः– दैवीं वाचमुपासमिति " " ऋषियों के द्वारा उपदिष्ट शब्द, जिसे कि हम हमारी अपेक्षा से श्रुति कहते हैं, क्या– वस्तुतत्त्व है?, इस प्रश्न की मीमांसा करने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, ऋषियों की दृष्टि से दृष्ट अर्थ साक्षात ' दृष्टि ' ( प्रत्यक्षज्ञान ) है । उपदिष्ट शब्द इस दृष्टि का ही विषय बन रहा है । दूसरे शब्दों में ऋषि शब्दों के द्वारा दृष्टार्थरूपा दृष्टि का ही अभिनय कर रहे हैं । दृष्ट अर्थ, तद्वाचक शब्द, दोनों शब्दार्थतादात्म्यन्याय मे, किंवा शब्दार्थ के औत्पत्तिकसम्बन्ध से - जिसका कि खण्डारम्भ में विस्तार से प्रतिपादन किया जा चुका है— अभिन्न हैं । अर्थात्मा है, शब्द शरीर है । आत्मशरीरसमष्टि जैसे एक देवदत्त है, एवमेव दृष्टार्थरूपा दृष्टि, एवं तद्वाचक शब्द, दोनों मिल कर एक तत्र है । फलतः ऋषिशब्द ही ऋषिदृष्टि है, ऋषिदृष्टिही ऋषिशब्द है । अतएव च दृष्टि ही श्रुति ( शब्द ) है, श्रुति ही दृष्टि है । दूसरी दृष्टि से समन्वय कीजिए । ' हमारा सुना हुआ शब्द द्रष्टा का शब्द है ' जब हमें यह बोध हो जाता है, तो ऐसे शब्दप्रामाण्य के लिए हमें फिर अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रह जाती । यही नहीं, अपितु दृष्टि का अभिनय करने वाले इसी शब्द से तदभिन्न दृष्टिरूप अर्थ की ओर हमारा ध्यान आकर्षित हो जाता है । क्योंकि यह शब्द अपने से भिन्न दृष्टिरूप अर्थ का ही तो स्पष्टीकरण कर रहा है । क्योंकि द्रष्टा महर्षि के दृष्ट अर्थ को हम उन्हीं के शब्दों में सुनते हैं, इसलिए भी इस ऋषिशब्द को ' श्रति ' कहना श्रन्वर्श बनता है । ऋत्रिशब्द - ऋषि के लिए शब्दार्थतादात्म्यन्याय से ' दृष्टि ' है । परन्तु हम क्योंकि उसे मुनते मात्र हैं, सुन कर उस पर प्रत्यक्षवत् विश्वास करते हैं, इसलिए भी उस ऋषि शब्द को ' श्रुति ' कहा जाता है । साथ ही ऋषि दृष्ट अर्थ को हम ऋषिशब्द से ही सुनते हैं, इसलिए भी वह शब्द श्रुति कहलाने योग्य है । इस प्रकार दो त्रिभिन्न दृष्टियों से ' श्रति ' शब्द के अर्थ का समन्वय किया जा सकता 1 III
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भाष्यभूमिका द्रष्टा का शब्द उभयथा ' श्र ति ' है, यही तात्पर्य्य है । क्योंकि दृष्टा का शब्द उसकी स्वतः प्रमाणभूता प्रत्यक्षदृष्टि की भाँति स्वतः प्रमाण है । स्वप्रामाण्य के लिए यह भी दृष्टिवत् अन्य किसी रखविशेष ( शब्दविशेष ) की अपेक्षा नहीं रखता । अतएव श्राप्तपुरुषों ने श्रुति का लक्षण किया है – “ निरपेक्षो रवः श्रुतिः ” । सम्पूर्ण मीमांसा से बतलाना हमें यही है कि, द्रष्टा की दृष्टिरूप प्रत्यक्षज्ञान का अमिनय करने वाला द्रष्टा का शब्द श्रुति है । यह श्रुति उस द्रष्टा की दृष्टि है, अतएव दृष्टिरूपा श्रुति को हम अवश्य ही स्वतः प्रमाणलक्षण प्रत्यक्षप्रमाण कह सकते हैं । मेधावी श्रोता ने द्रष्टा के दृष्ट अर्थ का दृष्टिरूप श्रुतिद्वारा श्रवण किया । द्रष्टा के शब्द से इसने जो कुछ सुना, उसे संस्काररूप से मानसजगत् में प्रतिष्ठित किया । मानस जगत् में संस्काररूप से प्रतिष्ठित इस श्रत अर्थ का इस श्रोता ने अपने शब्दों में दूसरों को उपदेश दिया । इसका यही शब्दोपदेश ' स्मृति ' कहलाया । संस्कार ही स्मृति का जनक माना गया है । संस्कारज्ञान के आधार पर जो भी शब्द हमारे मुम्ब से निकलता है, वह ' स्मृति ' कहलाता है । क्योंकि श्रोता संस्कारावच्छिन्न ज्ञान के आधार पर द्रष्टा के द्वारा श्रुत अर्थ का अभिनय करता है, श्रतएव इसे अवश्य ही ' स्मृति ' कहा जा सकता है । श्रोता अपने शब्दों से अर्थ ति सुनाता है, श्रर्थदृष्टि नहीं । श्रर्थदृष्टि तो स्वयं इसका संस्कार है । इस संस्कार के आधार पर अर्थश्रुति ही यह स्वशब्दों में प्रकट कर सकता है । श्रोता की अर्थश्रुति से स्मृतिशब्द-श्रोता व्यवहित अर्थदृष्टि का अनुमान अवश्य लगा लेता है । श्रतएव इस स्मृतिशब्द को हम ' अनुमानप्रमाण ' कह सकते हैं, जो कि प्रत्यक्षरूप श्रुतिप्रमाण के आधार पर प्रतिष्ठित है । यही स्मृति का परतः प्रामाण्य है । स्वप्रामाण्य के लिए अन्य प्रमाण की अपेक्षा रखने वाला प्रमाण ही परतः प्रमाण है । तात्पर्य्यं कहने का यही हुआ कि, दृष्टि ( प्रत्यक्ष ) द्वारा प्राप्त होने वाला ज्ञान प्राथमिक ज्ञान है, अन्यज्ञानानपेक्ष स्वतन्त्र ज्ञान है 1 श्रोता इसे सुन कर जो कुछ कहता है, वह दृष्टिरूप श्रुति के आधार पर कहता है । अतएव इसका शब्द श्रुत-अर्थ को आधार बनाता हुआ परतः प्रमाण है । अतएव ' द्रष्टुर्वाक्यं श्रुतिः ' श्रुति का जहाँ यह लक्षण किया जाता है, वहाँ स्मृति का ' स्मर्त्त वाक्यं स्मृतिः ' यह लक्षण होता है । मन्वादि धर्म्माचायों ने श्रीत अर्थ को सुना मात्र है, देखा नहीं । साक्षात्कार नहीं किया । जैसा सुना, तदनुसार अपने शब्दों में व्यक्त किया । यहाँ वक्ता स्वयं आप्त ( पहुँचवान - विषयप्राप्त - विषयसाक्षात् कर्ता ) नहीं है, अपितु श्राप्तों से श्रुत अर्थ का स्मर्त्तामात्र है । श्रन्यपुरुषज्ञानाधार पर इसका ज्ञान प्रकट हुआ है । इसका ज्ञान उसके ज्ञान पर प्रतिष्ठित है । अतएष स्मृतिशास्त्र को परतः प्रमाण कहना समीचीन बनता है । जब तक स्मृतिकार वाक्यार्थ के सम्बन्ध में श्रौतप्रमाण का आश्रय नहीं ले लेते, तत्र तक उनके वाक्य में प्रामाण्य बुद्धि नहीं होती । इसी आधार पर स्मृति कहती है-या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्र ेत्य तमो निष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ ( मनुः १२।६५ ) । याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ, पाराशर, शङ्ख, लिखितादि इतर स्मृतियों की अपेक्षा मनुस्मृति वेदप्रामाण्य से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है । अतएव “ मनुर्वै यत् किञ्चावदत्, तद्भेषजं भेषजतायाः " के अनुसार स्मार्त्त ग्रन्थों ४०८
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तृतीयखण्ड में मानवधर्मशास्त्र का विशेष समादर है । अन्य स्मृतिकार भी मानवधर्मशास्त्र के इस वैशिष्ट्य का निम्न लिखित शब्दों में अभिनय कर रहे हैं-“ वेदार्थोपनिबन्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम् ॥ मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥१ ॥
तावच्छास्त्राणि शोभन्ते तर्क - व्याकरणानि च ॥ धर्मार्थमोक्षोपदेष्टा मनुर्यावन्न भाषते || १ || ” ( बृहस्पतिः ) " पुराणं मानवो धर्म्मः साङ्गो वेदाश्चिकित्सितम् ॥ आज्ञासिद्धानि चचारि न हन्तव्यानि हेतुभिः || ” ( व्यासः ) स्मा'प्रमाण को हमनें ' अनुमान ' प्रमाण बतलाया है । यह अनुमान प्रमाण आगे जाकर स्मृति, निबन्ध, भेद से दो विभागों में परिणत हो जाता है । परतः प्रमाणभूत स्मृतिशास्त्र में वक्ता के भेद से यदि सिद्धान्तों में परस्पर विरोध प्रतीत होने लगता है, सो अनुमान के द्वारा उन विरुद्ध प्रतीत स्मार्त आदेशों की यथावत् सङ्गति लगा दी जाती है । उस सङ्गतिशास्त्र का ही नाम ' निबन्धशास्त्र ' है, जिसके कि निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु, चतुर्वर्गचिन्तामणि, व्रतराज, तीर्थराज, श्राद्धकल्प, श्रादि अनेक अवान्तर विभाग सुप्रसिद्ध हैं । इसप्रकार श्रुति, स्मृति, निबन्ध, भेद से प्रामाण्यवाद तीन भागों में विभक्त है | श्रुति प्रत्यक्षप्रमाण , स्मृति शब्दप्रमाण है, निबन्ध अनुमानप्रमाण है । निबन्धों का प्रामाण्य स्मृति पर, स्मृतिप्रामाण्य श्रुतिशास्त्र पर अवलम्बित है । तीन से अतिरिक्त जो शब्दप्रपञ्च है, वह सब वाग् विग्लापनमात्र है, श्रप्रमाण है, मत्तप्रलाप है । परिच्छेदारम्भ में हमनें स्मृति को अनुमान प्रमाण कहा था । परन्तु अनुपद में ही इसे तो शब्द-प्रमाण कहा, एवं निबन्ध को अनुप्रमाण कही । इस विरोध का भी समन्वय कर लेना चाहिए । यदि श्रुति प्रत्य प्रमाण है, तो स्मृति अवश्य ही शब्दप्रमाण तथा निबन्ध अनुप्रमाण है । यदि निबन्ध का स्मृतिप्रमाण में ही अन्तर्भाव है, तो उस दशा में स्मृति अवश्य ही अनुमानप्रमाण है । प्रमाणत्रयी का इस दृष्टि से श्रुति-द्वैविध्य के आधार पर समन्वय किया जायगा । श्रुति के ' दृष्टि - श्रुति ' भेद से दो पर्व बतलाए गए हैं । ऋषिदृष्टि जहाँ प्रत्यक्षप्रमाण है, वहां दृष्टार्थ का श्रभिनय करने वाला ऋषिशब्द प्राप्तोपदेशलक्षगा शब्दप्रमाण है । निबन्धगर्भित स्मृतिप्रपञ्च इस शब्दानुमान के द्वारा अपनी प्रामाणिकता मुरक्षित रखता हुआ अनुमानप्रमाण है । विभिन्न दृष्टि से विषय का समन्वय कीजिए । प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, इन तीन प्रमाणों में से जो शब्दप्रमाण है, वही स्वयं प्रत्यक्ष अनुमान, भेद से दो भागों में विभक्त है | श्रुति भी शब्दप्रमाण है, स्मृति भी शब्दप्रमाण है । भेद दोनों में यही है कि, श्रुतिलक्षण शब्दप्रमाण दृष्टिमूलक ( प्रत्यक्षमूलक ) बनता हुआ स्वतःप्रमाण है । एवं स्मृतिलक्षण शब्द श्रुतिमूलक बनत्ता हुआ परतः प्रमाण है । श्रुतिरूप शब्दप्रमाण प्रत्यक्षदृष्टिरूप बनता हुआ प्रत्यक्षात्मक शब्दप्रमाण है, एवं स्मृतिरूप शब्दप्रमाण प्रत्यक्ष दृष्टिलक्षण श्रुि ति-शब्द को आधार बनाता हुया अनुमानात्मक शब्दप्रमाण है । इसप्रकार तीन प्रमाणों के अन्ततोगत्वा प्रत्यक्ष, ४०६