Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 51–60
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60
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तृतीयखण्ड मनुष्य जिस वाक् का प्रयोग करते हैं, जिस प्रयुक्त वाक् में कार - ककारादि वर्ण प्रविभक्त - प्रज्ञात प्रतीत होते हैं, वही चौथी व्याकृता वाकू है, जिसे हमने ' ऐन्द्री ' कहा है । जैसा कि पूर्व में कहा गया है, प्रज्ञात्मक प्राण ही इन्द्र है । इसी प्रज्ञान ज्ञानमय प्राणेन्द्र के समावेश से ग्रखण्ड - वायव्य वाग्धरातल खण्ड - खण्डात्मक बन जाता है । अनाहतनाद में, वायु - अग्नि - जल - पृथिवी मे, पशुओंों में, सरीसृपों में, सद्योजात बालक के रुदन में जो वर्णविभक्त्यभावात्मिका वाकू प्रतिष्ठित है, वह प्रज्ञानेन्द्र से अव्याकृत रहती हुई विशुद्धा वायव्या वाक् है । शेष चौथा ऐन्द्र पद ही मनुष्य में श्रद्धा बन रहा है । १- अमृता वाक् – स्वायम्भुवी सत्यावाक् – त्रयोवाकू २ - दिव्या वाक् -- पारमेष्ठिनी ऋतात्राकू - अथर्ववाक् ३- वायव्या वाक् - श्रव्याकृता ध्वनिर्वाक् ४- ऐन्दी वाक् –-व्याकृता ध्वनिर्वाक् इति चतुर्थः पक्षः -४ ---( ५ ) - पञ्चमः पक्षः -पूर्वोक्त वागविवर्त्त में जो चौथी व्याकृता ऐन्द्री वाक् है, उसका अध्यात्मदृष्टि से विचार करने पर हमारी अध्यात्म संस्था में भी ' चत्वारि ० ' मन्त्र का समन्वय सिद्ध हो रहा है । आध्यात्मिक वाक्तत्त्व ' परा - पश्यन्ती- मध्यमा- वैखरी ' भेद से चार भागों में विभक्त है । चारों का मूल कर्म्मात्मा है । वैश्वानर-तेजस - प्राज्ञ की समष्टि ही कम्मात्मा है । प्राज्ञ से प्रज्ञानेन्द्र अविनाभूत है । अतएव कर्मात्मा को इन्द्रयुक्त कहा जा सकता है । इसीलिए इन्द्र को आत्मा माना गया है, जैसाकि - ' सहोवाच - प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा, तं मामायुरमृतमित्युपास्व ” ( कौ ० उ ० ३।२ | ) इत्यादि से स्पष्ट है । इसी आधार पर उक्त चारों वाक्ग्दों को व्याकृता ऐन्द्रीवाक् के विवर्त्त मानें जा सकते हैं । संसार में कोई भी ज्ञान ऐसा नहीं है, जिसका शब्द से सम्बन्ध न हो । शब्द ही प्रत्यय अनन्य प्रतिष्ठा है, जैसाकि निम्न लिखित हरिकारिका से प्रमाणित है – न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते । ( वाक्यपदी ) ' विज्ञानात्मा ' नाम से प्रसिद्ध बुद्धि में प्रतिष्ठित वाक् हो ' परावाक ' है । मनोयोगपूर्वक चुपचाप पुस्तक हुए जो ग्रन्तश्वर्वणात्मिका शब्दानुगता वाक् है, वही ' पश्यन्तीवाक ' है । नादव्वनि किए बिना श्वासमात्र के आधार पर बोली जाने वाली वाक् ( कानाफूसी वाली वाक ) ' मध्यमात्राकू ' है । एवं नादष्वनि-चुक्ता, दूरतोऽपि श्रोताग्राह्या वाक् ' वैखरीवाक ' है । इन चारों में पूर्व के तीनों विवत्तों का बोध नहीं होता | वैखरी नाम की चौथी वाक् ही ' वदन्ति ' का समर्थन कर रही है । इन्ही चारों आध्यात्मिक विवत्त का स्पष्टी -करण करते हुए अभियुक्तों नें कहा है-३३
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भाष्यभूमिका " नैखरी - शब्दनिष्पत्ति, मध्यमा श्रतिगोचरा । द्योतितार्थानुपश्यन्ती, सूक्ष्मावागनपापिनी " । १ - परावाक्- बुद्धिस्था - अन्तर्लीना - सूक्ष्मा । २- पश्यन्तीवाक्- प्रन्थाक्षरानुगता - उपांशुवाक् । ३- मध्यमावाक — नादध्वनि शुभ्या श्वासमात्राभुगता । ४ - वैखरीबाकू —- नादव नियुक्का श्रोत्रग्राह्या । इति पञ्चमः पक्षः ( ६ ) – पष्ठः पक्षः-उक्त चारों वाग्विवतों में से जो चौथी वैखरीवाक् है, उसके अध्यात्म में चार विवर्त्त ' मानें जा सकते हैं, एवं इस दृष्टि से भी ' चारि ० ' इत्यादि मन्त्र का समन्वय किया जा सकता है । वैखरीवाक् वह है, जिसका उच्चारण होता है । पूर्व में यह कहा गया है कि पश्वादि में जो ध्वनिवाक् हैं, उसमें इन्द्र का समावेश नही है, अतएव उनकी वाक् श्रव्याकृता है । इस कथन का यह तात्पर्य्य समझना चाहिए कि- इन्द्र की मात्रा के सन्निवेश में तारतम्य है । पश्वादि में इन्द्र का श्रात्यन्तिक अभाव हो, यह बात नहीं है । ' नेन्द्रादते पवते धाम किचन ' ( ऋक् सं ०६ / ६६ | ६ | ) के अनुसार संसार का कोई भी पदार्थ इन्द्रसम्पत्ति से वञ्चित नहीं है । फिर चेतनप्राणियों की श्रात्म - सस्था का स्वरूप तो इसी श्रायुःस्वरूपसमर्पक इन्द्रप्राण के सम्बन्ध पर निर्भर है । हाँ कहीं वह अनिरुक्तरूप से प्रतिष्ठित है, कहीं निरुक्त रूप से । निरुक्ता निरुक्त-रूप से प्रतिष्ठित इन्द्रसम्बन्ध से पश्वादि की वाक् भी व्याकृता मामी बायगी । साथ ही इसे भी वैखरी हो कहा जायगा । इस वैखरीवाक् का उच्चारण करने वाली प्रजा को ' मनुप्य, पशु, पक्षी, क्षुद्रसरीसृप ' भेद से चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है । चारों में इन्द्रमात्रा का चतुर्थांशन्चतुथांश रूप से क्रमशः हास माना गया है । इसप्रकार ' निरुक्तमनुष्यवाकू, अनिरुक्त पशुवाक्, श्रनिरुक्तपतिवाकू, श्रनिरुक्तक्षुद्र-सरीसृप्वाकू ' मेद से इस वैखरी वाक् के भी चार पद हो जाते हैं । चारों में उत्तर के तीन विवर्त्त स्पष्ट बनते हुए गुहानिहित हैं । चौथा निरुक्त वाग्विवत्त ' ' वदन्ति ' मर्य्यादा से युक्त है । इसी पदचतुष्टयी का स्पष्टी-करण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-" इन्द्रो ह वा ईक्षाञ्चक्रे - वायु नोऽस्य यज्ञस्य भूयिष्ठभाक् । ‘ हन्त – अस्मिन्नपित्व-मिच्छा ' इति । स होवाच - ' वायवा मास्मिन् ग्रहे भज ' इति । किं ततः स्यात् - इति, निरुक्तमेव वाग्वदेत्, इति । निरुक्त ं चेद् वाग्वदेत् - या स्वाभजामीति । तत एष एचैन्द्र-वायो ग्रहोऽभवत् । तदेतत् तुरीयं वाचो, यन्मनुष्या वदन्ति । अथैतत् तुरीयं वाचोऽनि-३४
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द्वितीयखण्ड रुक्त ं , यत् पशवो वदन्ति । अथैतत् तुरीयं वाचोऽनिरुक्त, यद् वयांसि वदन्ति । अर्थौ-तत् तुरीयं याचो यदिदं क्षुद्रसरीसृयं वदति ” (....... ) I १ - अनिरुक्ता क्षुद्रसरीसृच्वाक् इन्द्रयुक्ता अपूर्णा २- अनिरुक्का पक्षिवाकई ३ - अनिरुक्ता पशुवाकू –: -४- निरुक्ता मनुष्यवाकू — ( ७ ) - सप्तमः पक्षः -इन्द्रयुक्ता अपूर्णा इन्द्रयुक्ता अपूर्णा पूर्णेन्द्र युक्तापूर्णा इति षष्ठंः पक्षः उक्त चारों वैखरी- विवत्तों में से मनुष्य जिस निरुक्ता - वैरवरी - वाक् का प्रयोग करता है, उसके भी चार पद मानें जा सकते हैं, एवं इस सम्बन्ध से भी ' चत्वारि ० ' का समन्वय किया जा सकता है । मानुषी निरुक्ता वैखरी वाक् के उन चारों पदों को क्रमशः - ' प्राण, स्वर, वर्ण, ध्वनि ' भेद से चार भागों में विभक्त किया जा सकता है । वर्णोत्पत्तिविज्ञान का स्पष्टीकरण करने वाले शिक्षाशास्त्र ने यह सिद्धान्त बतलाया है कि — मनुष्य जव कुछ बोलना चाहता है, तो सर्वप्रथम इस कामना में ' आत्मा - बुद्धि - मन ' तीनों का सहयोग होता है | संकल्पित वाच्य अर्थ को स्पष्ट करने की कामना रखने वाले ग्रात्मबुद्धिसहकत मन की इस कामना का कायाग्नि ( शरीराग्नि ) पर आघात होता है । ग्राहत कायाग्नि से शारीर वायु को प्रेरणाचल मिलता है । कायाग्नि से धक्का खाकर प्राणवायु उर: स्थान में टकरा कर मन्द्रस्वर का जनक बनता है । वह स्वर शिरः प्रदेश में टकरा कर मुखविवर में श्राता हुआ वर्णरूप में परिणत होता है । कायाग्निके ग्राधात से नाभिप्रदेश से ऊपर की ओर उठा हुआ वायु उरःस्थान से टकराने से पहिले पहिले अपनी विशुद्ध प्राणवस्था में परिणत रहता है । यही ' प्राण ' नाम की पहिली अवस्था है । मुखस्थान में आने से पहिले - पहिले यह प्राणवायु क्रमशः उर: - कण्ठ - शिरः प्रदेश में विचरण करता हुआ स्वरावस्था में परिगत रहता है । यही ' स्वर ' नाम की दूसरी अवस्था है । वही स्वर मुखस्थान में आता हुआ । स्वरतः, कालतः, स्थानात्, प्रयत्नानुप्रदानात् भेद से पाँच भागों में, ५० विभागों में, किंवा ६४ रूपों में परिणत होता हुआ ' वर्ण ' नाम से प्रसिद्ध होता है । यही ' वर्ण ' नाम की तीसरी अवस्था है । यही वर्ण आगे जाकर * " आत्मा बुद्धया समेत्यर्थान् मनो युङ्क्त विवक्षया ॥ मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥१ ॥
मारुतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥ सोदीर्णो मूर्त्यभिहतो वक्त्रमाप मारुतः ॥२ ॥
वर्णान् - जनयते, तेषां विभागः पञ्चधा स्मृतः || ३ || ( पाणिनीयशिक्षा ) ३५
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भाष्यभूमिका षड्ज, ऋषम, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद ( सा - रे - ग - म - प - ध - नी ) इन नामों से प्रसिद्ध सात श्रुतिमूलक स्वरों से युक्त होता हुआ श्रुति से गृहीत न कर ' ध्वनि ' रूप में परिणत हो जाता है । यही ' ध्वनि ' नाम की चौथी अवस्था है । इसप्रकार कायाग्नि से आहत वायु ध्वनिरूप में आता हुआ प्राणादि चार अवस्थाओं में परिणत रहता है । चारों में प्रारणावस्था एक वाक्स्तर है, अन्य स्तरयोग ये स्वरावस्था द्विस्तरा है, अन्य स्तरयोग से वर्णावस्था त्रिःस्तरा है, एवं अन्य स्तरयोग से ध्वन्यवस्था चतुःस्तरा है । पूर्व पूर्व के वाक् स्तर को आधार बना कर ही उत्तर - उत्तर के वाक्तर का स्वरूप सम्पन्न हुआ है । इसप्रकार हम जिस ध्वन्यात्मिक । वैखरी वाक् का उच्चारण करते हैं, उसके चार स्तर हो जाते हैं, यही ' चत्वारि वाक् परिमिता पदानि ' है । चतुर्थ, किंवा चतुःस्तरात्मिका जो ध्वनि है, उसके सम्बन्ध में कुछ विशेषताएँ प्रसङ्गोपात और जान न चाहिएँ । ' कः पुनरिदं ध्वनिर्नाम ' इत्यादि रूप से ध्वनि के सम्बन्ध में प्रश्न उठाते हुए अभियुक्तों ने यह समाधान किया है कि--वर्णसमूहलक्षण किसी वाक्य का हमनें उच्चारण किया दूरस्थित श्रोता ने उसे सुना । परन्तु विदूरभाव के कारण उसे वर्णविवेक तो हुआ नहीं, केवल उसके कर्णपथ में आघात हुआ । यह श्राघात ही ' ध्वनि ' मानी गई है । यदि कोई हमारे समीप बैठा है, तो वह विस्पष्टरूप से वर्णों का बोध कर लेता है । यह विस्पष्टतालक्षणा पटुता वर्णों में जिसके द्वारा उत्पन्न होती है, वह ध्वनि ही मानी गई है । उच्चारित वर्ण ध्वनि के सहयोग से सम्बन्ध भी रखते हैं, एवं असम्बन्ध भी । अर्थात् कभी ध्वनि के बिना उच्चारित वर्ण बोध के जनक बन जाते हैं, कभी ध्वनि के साथ । एकान्त में बैठे हुए दो आदमी कानाफूसी कर रहे हैं । यही उपांशुवाक् है । दोनों में बातचीत चल रही है, परन्तु तीसरा नहीं सुन रहा । ऐसीउपांशुबाकू में ध्वनि नहीं है, परन्तु वर्णोच्चारण सुव्यवस्थित है । जब यह बातचीत उच्चरवर से चलने लगती है, तो ये ही उच्चारित वर्ण ध्वनिमाव से युक्त हो जाते हैं । इससे यह भी निष्कर्ष निकला कि, ध्वनि का स्वर से प्रधान सम्बन्ध है, न कि वर्णों से । उक्त स्वरानुगामिनी ध्वनि को स्वरध्वनि, स्फोटध्वनि भेद से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है । ' अकारो वै सर्वा वाकू,, सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बही नानारूपा भवति ' ( ऐ ०० ) इत्यादि ऐतरेय श्रुति के अनुसार स्पर्श, तथा ऊष्मा ( संकोच - तथा विकास ) प्रतियोगिनी जो वाक् है, वही स्वर है, एवं तदात्मिका ध्वनि ही स्वरध्वनि है । ' लघु - गुरु ' भेद से दो भागों में विभक्त यही वाक् स्वर ' अक्षर ' कहलाया है । इसके अतिरिक्त वर्ण - पद - वाक्य- श्लोकादि श्रवण से जो हमें एक समूहालम्बनात्मिका अर्थप्रतिपत्ति होती है, इस अर्थपरिचायक भाव को ही व्याकरण ने ' स्फुटत्यर्थो येन ' से स्फोट कहा है । इस स्फोट का नभ्यप्राण से प्रधान सम्बन्ध है । अखण्ड धरातलात्मक नभ्यप्राण के आधार पर प्रतिष्ठित रहने से हो वर्णं परस्पर संश्लिष्ट नहीं होने पाते । इस स्फोटप्राण से अनुग्रहीत ध्वनि ही ' स्फोटध्वनि ' कहलाई है, जो वर्णाधार के साथ - साथ समूहालम्वनात्मक अर्थबोध की जननी बन रही है । स्वर - प्राण — स्फोटादि के श्रुतिरिक्त देवताभेद से भी वागदेवी के विभक्त स्वरूपों का समन्वय कर लेना चाहिए | ध्वन्यात्मिका वाक् अग्नीषोमदेवता से सम्बन्ध रखती हुई, अतएव ' अग्नीषोमीया ' नाम से व्यवहृत ३६
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तृतीयखण्ड होती हुई आग्नेयी वाक् है । अग्निसम्बन्ध से ही यह ध्वनिवाकू गायत्री छन्दा है । वर्णात्मिका वाकू वायव्या है, स्वाथ ही इसका अनुष्टुप्छन्द से सम्बन्ध है । क्योंकि - ' वाचमष्टापदी महम् ' इत्यादि श्रुति के अनुसार वर्णवाक् आट बिन्दुओं से सम्बन्ध रखती हुई अष्टापदी है, एवं अष्टाक्षरछन्द ही अनुष्टुप् है । गायत्रत्रह्म के सम्बन्ध से ध्वनिवाक ू ब्रह्म है, अनुष्टुप् के सम्बन्ध से वर्णवाक् वाकू है, जैसा कि - ' ब्रह्म वै गायत्री, वागनुष्टुप् ’ इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है | स्वरवाक् को ऐन्द्री कहा गया है, एवं नवाक्षर बृहतीछन्द का इससे सम्बन्ध है । ' वामिन्द्रः ' इत्यादि श्रुति से बृहतीछन्दस्का यही ऐन्द्रीवाक् ( स्वरवाक् ) अभिप्रेत है । वर्णात्मिका अनुष्टुप् की व्याप्ति जहाँ आठ बिन्दुओं में मानी गई है, वहाँ इस स्वरात्मिका बृहतीवाक् की व्याप्ति नौ बिन्दु पर्य्यन्त मानी गई है | बृहतीछन्द नबाक्षर है, अतएव तत्समतुलिता स्वरबाकू को अवश्य ही बृहती कहा जा सकता है । नभ्यप्राणात्मिका स्कोटवाक् अव्ययवाक् ( श्रात्मवाक् ) है । यही इतर तीनों वाग्विवर्ती का कोत्र है । इसप्रकार अात्मदेवतानुगृहीता श्रच्छन्दस्का स्फोटवाक् ( प्राण ), इन्द्रदेवतानुगता बृहतीछन्दस्का ऐन्द्रीवाक् ( स्वर ), बायु-देवतानुगता अनुष्टुप्छन्दका वायव्यावाक् ( वर्ण ), अग्निदेवतानुगता गायत्रछन्दस्का आग्नेयीवाक् ( ध्वनि ) चारों की समष्टि ही ' वाक्संहिता ' है, जिसके ' प्राण - स्वर वर्ण - ध्वनि ' भेद से चार पद हैं, जिसके कि चारों पदों में से चतु: स्तरात्मिका ध्वनिवाक का ही श्रद्धा श्रवण होता है । १ – प्राणः – नभ्यप्राणात्मिका स्फोट रूपा अखण्डा आत्मवाक् -अच्छन्दस्का । २ – स्वरः – इन्द्र देवतानुगता ऐन्द्रीवाकू - बृहतीछन्दस्का । ३ – वर्णः – वायुदेवतानुगता वायव्यावाक्- अनुष्टुप्छन्दस्का । ४ – ध्वनिः -- अग्निदेवतानुगता आग्नेयीवाक्- गायत्रीछन्दस्का । इति - सप्तमः पक्षः १ ) - श्रष्टमः पक्षः-— जिस वैखरीबाक का हम उच्चारण करते हैं, उसके सम्बन्ध में भी ' चत्वारि बाकू परिमिता - पदानि ० ' का समन्वय किया जा सकता है । मानुषीवाकू के ' वर्ण - श्रक्षर - पद - वाक्य ' भेद से चार विभाग किट जा सकते हैं । मानुषी वाकू के ये चार विभाग ही इन्द्र के सम्बन्ध से ' ऐन्द्रव्याकरण ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । घ्यञ्जन ‘ वर्णषाकू ' है, इसका अनुष्टुप् से सम्बन्ध है । स्वर ' अक्षरवाकू ' है, इसका बृहतीछन्द से सम्बन्ध I वर्णगर्भित अक्षरसमष्टि से जिस वाक् का स्वरूप सम्पन्न होता है, वह ' पदवाकू ' है, एवं पदममष्टिरूपा वाक् ‘ वाक्यत्राक् ' है । वाक्य पदों से, पद अक्षरों से, अक्षर वर्णों से स्वस्वरूप विकास में समर्थ हुए ! हैं । वाक्य के गर्भ में पद -अक्षर - वर्ण तीनों क्रमशः अन्तगर्भित होते हुए स्वतन्त्ररूप से शब्दबोध में असमर्थ रहते हैं । वाक्य ही अर्थबोध की प्रतिष्ठा है । इसी अर्थव्यवहार - सञ्चालन के लिए मनुष्यों के द्वारा वाक्यों का प्रयोग होता है, एवं इसी सम्बन्ध से तीनों के लिए जहाँ- ' गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति ' यह कहा जा सकता है, वहाँ वाक्य के लिए ' तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ' यह कहना कन्वर्थ बन रहा है । ३७
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भाष्यभूमिका १ – वर्णवाक् — व्यञ्जनवाक् २ – अक्षर वाक् - स्वरवाक् ३ – पदवाक् — व्यञ्जनस्वर समष्टिरूपा वाक् ४ – वाक्यवाक् -- वर्णाक्षरपद गर्भिता वाक्- शब्दबोधजननी ( 2 ) - नवमः पक्षः --इति- अष्टमः पक्षः -८. पूर्वोक्त अष्टम पक्ष में बाकू के जो चार विवर्त्त बतलाए गए हैं, उनमें प्रत्येक वागविवर्च चार चार विवर्त्तभावों में परिणत हो रहा है । पहिले वर्णवाक को ही लीजिए । “ अस्पृष्ट - ईषत्स्पृष्ट - स्पृष्ट- अर्द्ध स्पृष्ट " भेद से वर्ण चार भागों में विभक्त माना गया है । दूसरी अक्षरवाक् है! अक्षर स्वर है, एवं बृहतीछन्द के सम्बन्ध से इसकी व्याप्ति ६ चिन्दुपर्यन्त रहती है । ६ बिन्दुओं में ५-६ इन दो मध्य बिन्दुओं पर तो स्वयं अक्षर उक्थरूप से प्रतिष्ठित रहता है, एवं ४ बिन्दु पूर्व में, ३ बिन्दु उत्तर में, इन ७ चिन्दुओं में इस उक्थाक्षर के अर्क ( प्राणात्मिका रश्मियाँ ) व्याप्त रहते हैं । ये सात बिन्दु अक्षर का व्यापारक्षेत्र है । यदि पूर्व - अपर दोनों स्थानों की बिन्दुओं में कोई व्यञ्जन नहीं है, तो अक्षर पूर्वापर - उभयविध व्यापार शून्य है, यही अक्षर का पहिला विवर्त्त है । जिसका उदाहरण ' अ ' माना जा सकता है । यदि में व्यञ्जन हैं, उत्तर में व्यञ्जन नहीं है, तो पृष्ठव्यापारविशिष्ट, पुरतोव्यापारशून्य अक्षर अक्षर का दूसरा विवर्त है, जिसका उदाहरण ' स्म ' माना जा सकता है । यदि पूर्व में व्यञ्जन नहीं हैं, उत्तर व्यञ्जन हैं, तो पृष्ठव्यापारशून्य, पुरतोव्यापारविशिष्ट अक्षर अक्षर का तीसरा विवत्तं है, जिसका उदाहरण ‘ ऊर्क ' माना जा सकता है । यदि दोनों ओर व्यञ्जन हैं, तो उभयव्यापारविशिष्ट अक्षर अक्षर का चौथा विवर्स जिसके उदाहरण ‘ वाकू ’ – ‘ स्त्र्यर्क टू ' आदि माने जा सकते हैं । १ – पूर्वापरो भयविधच्या पारशून्यावस्था – ' अ ' इति — १ २ ३ ४ ५ ७ ८ Ε " " ० ० ० ० ० ० ० x X x X X X X २ - पृष्ठव्यापारविशिष्टा - पुरतोव्यापारशून्यावस्था - ' स्म ' इति -१ २ ३ ४ ६ ७ ० ० ० ० ० ० " स्म X x स् म् अ X X X || [ ३८
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तृतीयखण्ड ३ -- पृष्ठव्यापारशून्या - पुरतोव्यापारविशिष्टावस्था - ' ऊर्क ' इति--१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ε ० ० ० ० ० ० " X X x X ऊ ० ० ० र कू x ४ -- उभयतोव्यापारविशिष्टावस्था - ' वाक् ' – ' स्त्र्यक्'टु ' इति —— १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ Ε ० ० ० ० ० ० ० Q ० - " वाकू ” X X x श्रा क x x १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ० ० ० ० ० ० - " पर्क टू ” सू अ तीसरी पदवाक के भी चार ही विवर्त्त मानें गए हैं, जो कि - " नाम - श्राख्यात- त - उपसर्ग - निपात " नामों से प्रसिद्ध हैं | चौथी वाक्यलक्षणा वाक् है । कहा गया है कि, अर्थ जनकत्वेन यही वाक् शब्दबोध की प्रतिष्ठा है । वही वाक् हमारे प्रज्ञानमन से युक्त होती हुई अर्थजननी बनती है । नाभिस्थान इसका प्रथम | पद है, उरः - कण्ठ - शिरोरूप प्रक्रमत्रयस्थान इसका द्वितीय पद है, मुखस्थान तृतीय पद है, एवं श्रोत्रस्थान चतुर्थ पद है । प्रज्ञान मन से प्रेरित यह वाक् नाभि से उठकर दूसरे की श्रोत्रेन्द्रिय से सम्बन्ध करती हुई चार पर्दो में परिणत होती हुई, श्रोता के प्रति स्वानुरूप प्रज्ञान ज्ञान का उदय करती हुई स्वप्रभव अग्न्याकाश में विलीन हो जाती है । ( १० ) - दशमः पक्षः — इति नवमः पक्षः महर्षि – ऐतरेयोक्त महदुक्थविज्ञान के अनुसार भी ' चत्त्वारि वाक ' का समन्वय किया जा सकता है । उनके मतानुसार वाकूतत्त्व का परम विकार ' महदुक्थ ' है, जिसका वैज्ञानिक विवेचन ' उपनिषद्विज्ञान-भाष्यभूमिका ' द्वितीयखण्ड से गतार्थ है । “ मित - श्रमित - स्वर - सत्यानृत " भेद से महदुक्थलक्षणा वाक् के चार पद हैं | ३६
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भाष्यभूमिका वाक् के पद्य - गद्य - गेय - भेद से प्रधानतया तीन विवर्त्त माने गये हैं । छन्दोबद्धा, अतएव सीमाभाव-युक्ता वाक् ‘ पद्यवाक् ' है । इसी सीमाभाव के कारण पद्यात्मिका वाक् को ' मितवाक ' कहा जा सकता है । वैदिक साहित्य में यह मितवाकू ' ऋक - गाथा - कुम्डया ' मेद से तीन भागों में विभक्त है । ' अग्निमीडे पुरोहितम् ' ( ऋ सं ० १ | १ | १ | ) यह ऋकवा है । जिन संकलित मन्त्रों से लोकप्रसिद्ध अथों का प्रतिपादन होता है, साथ ही जिनका कर्म्म में विशेष विनियोग नहीं है, ऐसे पद्यात्मक मन्त्र ' गाथा ' मन्त्र कहलाए हैं । इन्हें ‘ मन्त्र ' न कह कर ' तदेपः श्लोको भवति ' इत्यादि रूप से ' श्लोक ' कहा जाता है । " प्रातः प्रातरनृतं ते वदन्ति ' यह गाथावाक का उदारहण है जिनसे आचारशिक्षा दी जाती है, वे ' कुम्ब्या ' नाम से प्रसिद्ध हैं । " ब्रह्मचार्यम्यपोऽशानकर्म कुरु मा सुपुष्याः " यह कुम्ब्यावाक् का उदाहरण है । ' नाराशंसीवाक् ' का तथा ' रैमीवाक ' का भी इसी में अन्तर्भाव है । दूसरी गयात्मिका वाक् है । यह असीमित है, अतएव इसे ' श्रमितात्राव. ' कहा जाता है । इस अमिता वाक् के ' यजुः, निगद, वृथावाक ' भेद से तीन विवर्त्त हैं । इपे वोर्जेवा ' ( यजुः सं ० १११ ) इत्यादि यजुरात्मिका श्रमितावाक् का उदाहरण है । ब्राह्मण ग्रन्थों में पटित अर्थवादात्मक वचन ' निगद्मन्त्र ' हैं । " अग्ने महां असि ब्राह्मण भारत " इत्यादि निगदात्मिका अमितावाकू का उदाहरण है । परिहासादि रूपा निरर्थक वाक वृथावाक " है । नियतपरिमाणभावत्त्व ही इन तीनों का श्रमितत्त्व है । ती गेयात्मक वा " है । यह सीमित होती हुई भी अपने स्वरूप से वितत है, फैली हुई है । साममन्त्रात्मिका तथा गेयात्मिका ( लौकिक गेयात्मिका ) वाक स्वरात्मिका वाक् है । स्वरवितान ही सङ्गीत की मूलप्रतिष्ठा है । प्रतिभावात्मक ' श्रोम् ' प्रत्यय ही सत्यावाकू है, नास्तिभावात्मक ' न ' प्रत्यथ ही श्रनृताव | क्रू है | सत्य श्रनृताधार पर प्रतिष्ठित अनृत सत्याधार पर प्रतिष्ठित है । श्रनृत से प्रकृत में तमाव ही अभिप्र ेत है । एवं ‘ सत्यं ऋतेऽधायि, ऋतं सत्ये ' के अनुसार दोनों श्रविनाभूत हैं । अतएव दोनों का ' सत्यानृत ' नामक एक वाग्विवर्त्त माना जा सकता है । यदि पृथक - विवक्षा अपेक्षित है, तो पाँच विवर्त ' हो जाते हैं । महदुक्थात्मिका वाकू के इन्हीं विवर्तों का स्पष्टीकरण करते हुए महर्षि ऐतरेये कहते हैं— “ स वा एष वाचः परमो त्रिकारो, यदेतन्महदुक्थम् । तदेतत् पञ्चविधं मितममितं-स्वर: सत्यानृते । ऋग्गाथा -कुम्ब्या - तन्मितम् । यजु - निंगदो - वृथावाक् तदमितम् । साम,
अथ यः कश्च गेष्णः, स स्वर: । ओमिति सत्यं नेत्यनृतम् ” ॥
इति दशमः पक्षः ( ऐ ० ० २/३ | ६ | १६ | ) । इति । .१०. --( ११ ) - समष्टिपक्षा: -विश्वविज्ञान ही सर्वविज्ञान है । ४- अधियज्ञ, ५ - अधीतिहास, " भेद सेपांच एवं इसे - “ १ - अध्यात्म, २ - अधिदैवत, ३ - श्रधिभूत, भागों में विभक्त किया जा सकता है । इन पाँचों दृष्टियों ४०
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तृतीयखण्ड से वागविवर्त्त का विचार करने पर निष्कर्ष वही निकलता है, जो पूर्व के १० पक्षों में निरूपित है । केवल दृष्टिकोण में थोड़ा सा अन्तर | प्रसङ्गोपात्त उसका भी समन्वय कर लेना अनुचित न होगा— ' सर्व ' स्खल्विदं ब्रह्म ' – ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' के अनुसार ब्रह्म ही इस विज्ञानात्मक विश्व का मूल है । एवं वह ब्रह्म मच्चिदानन्द लक्षण माना गया है । ब्रह्म की आनन्द, चेतना, सत्ता, तीनों कलाएँ मनःप्राणवाक के सहज सिद्ध त्रिवृद्भाव के कारण तीन - तीन भावों में परिणत हो रही है । श्रानन्द, विज्ञान अन्तर्मन तीनों श्रानन्दकला हैं । वहिर्मन, प्राण, वाक्, तीन चित् कला है, एवं वाक् आपः-अग्निः, तीनों सत्कलो हैं । आनन्दत्रयी की दृष्टि से वही ब्रह्म ज्ञानप्रपञ्च का अधिष्ठाता बनता हुआ, ' ज्ञानात्मा ' - ' ब्रह्मात्मा ' इत्यादि नामों से प्रसिद्ध होता हुआ, प्रविविक्तब्रह्म ( विश्वातीतब्रह्म ) बन रहा 1 चित्त्रयी की दृष्टि से वही ब्रह्म क्रियाप्रपञ्च का अधिष्ठाता बनता हुआ, ' कामात्मा ' - दैवात्मा ' इत्यादि नामों से प्रसिद्ध होता हुआ, ' प्रविषु ब्रह्म ' ( विश्वचर ) बन रहा है । एवं सत्त्रयी की दृष्टि से यही ब्रह्म अर्थप्रपञ्च का अधिष्ठाता बनता हुआा, ' कर्मात्मा ' - ' भूतात्मा ' इत्यादि नामों से व्यवहृत होता हुग्रा सृष्टब्रह्म ( विश्व ) बन रहा है । तीनों में उसका विश्वरूप वागारब्ध होने से वाङ्मय है, अतएव ' वाचीमा विश्वा भुवना-न्यर्पिता ' इत्यादि श्रुति अन्वर्थ बन रही है । प्रथम विवर्त श्रमृतत्रयी है, द्वितीय विवर्त्त ब्रह्मत्रयी है, तृतीय विवर्त्त शुक्र है । वही अमृतं है, वही ब्रह्म है, वही शुक्र है । शुक्रावच्छेदेन वही अश्वत्थब्रह्म विश्वोपादान बन रहा है, ब्रह्मावच्छेदेन वही विश्वनिमित्त बन रहा है, एवं अमृतावच्छेदेन वही विश्वालम्बन बन रहा है । इसी त्रयीगर्भित त्रयीलक्षण अश्वत्थब्रह्म का निरूपण करती हुई उपनिषन्धुति कहती है-ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तद्ब्रह्म,
देवामृतमुच्यते ।
तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वैतत् ॥
- — कठोपनिपन् ६ | १ | तदेव शुक्र, सर्वं खल्विदं ब्रह्म - सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म-१- श्रानन्दः १ २ - विज्ञानम् -आनन्दत्रयी- ज्ञानात्मा ब्रह्मात्मा - श्रमृतम् ( ज्ञानप्रपञ्चाध्यक्षः ) ३- अन्तर्म्मनः १ - बहिर्म्मनः २ २- प्राणः -चित्त्रयी - कामात्मा दे 1- दैवात्मा ब्रह्म ( क्रियाप्रपञ्चाध्यक्षः ) ३- वाक_ ४१
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१- वाक भाष्यभूमिका ३ २- आपः ३- अग्निः - सत्त्रयी- कम्र्मात्मा भूतात्मा - शुक्रम् ( अर्थ प्रपञ्चाध्यक्षः ) तीसरे शुक ' ' का ' वाविवर्त्त ' ' वाक वायुः - शब्दः ' मेद से तीन भागों में परिणत हो रहा है । बाक मौलिक तत्त्व है, जिसके गर्भ में मनोगर्भित प्राण प्रतिष्ठित है । वायु के द्वारा वाकसमुद्र में वीचियाँ ( लहरें ) उत्पन्न होती हैं, वे लहरें हमारी कर्णशष्कुली पर प्रतिष्ठित प्रज्ञानमन पर श्राघात करती हैं । इसप्रकार वाग्वीचियों के श्राधार पर वायु के सहयोग से शब्द का प्रादुर्भाव हो जाता है, जैसा कि - ' वायुः खान् शब्दस्तत् ’ इत्यादि प्रातिशाख्य वचन से स्पष्ट से । इस दृष्टि से हम तीनों को अवश्य ही वाविवस ' कह सकते हैं । परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, ये चार विवर्त आध्यात्मिक मानें जायेंगे । प्रज्ञाप्राणमय मन के विशुद्ध प्रज्ञाभाग से सम्बन्ध रखने वाली वाक, ' परावाक ' है । प्रज्ञायुक्त प्राणव्यापारावस्था शब्दवाक् ( देखते हुए लिखना, तथा बाँचना ) ' पश्यन्तीवाक ' है । नादशून्या श्वासात्मिका उपांशुवाक_ ( कानाफूसी ) ‘ मध्यमावाक ' है । एवं नादात्मिकावाक, वैखरीवाक है । आत्मा मनःप्राणवाङ्मय है । परा, और पश्यन्ती में आत्मा की मनः कला का प्राधान्य है, मध्यमा में प्राणकला का प्राधान्य है, एवं वैखरी में वाक कला की प्रधानता है । दूसरे शब्दों में आत्मवाक परावाक है, हृदयवाक पश्यन्ती है । बुद्धिवाक मध्यमा है, एवं वक्त्र * वाक वैखरीवाक ्म है । यही सामान्यरूप से व्यवह्रियमाणा वाक का तुरीय पद है । १ - आत्मा - परावाकू ( मनसि घटाभासो घटशब्दरूपः श्रयं घट: ' इत्याकारकः ) । २ – हृदयम् — पश्यन्तीवाक् ( प्रज्ञायुक्त - प्राणव्यापार विस्थापन्ना शब्दशक् ) । ३ – बुद्धिः – मध्यमावाक् ( नादशून्या श्वासात्मिका उपांशुवाक ) । ४ – वक्त्रम् — वैखरीवाक् ( नादयुक्ता ध्वन्यात्मिका श्रद्धावाक् ) । * १ – शुद्धप्रज्ञा वाकू- -परा २– प्रज्ञाप्राणमयी वाक् - पश्यन्ती! --मनोमयी वाक् ३ - श्वासात्मिका वाक् - मध्यमा ] - प्राणमयी बाकू ४ - नादात्मिका वाक् – वैखरी ] वाङ्मयी वाक् 883 * ' यतो वक्ति, तद् वक्त्रम् ' । ४२