Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 421–430

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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भाष्यभूमिका ये दो ही विवर्त शेष रह जाते हैं । प्रत्यक्ष भी शब्दप्रमाण ही है, अनुमान भी शब्दप्रमाण ही है । अनुमान, द्रष्टा का शब्दप्रमाण- प्रत्यक्षप्रमाण है, श्रोता का शब्दप्रमाण अनुमान प्रमाण है । प्रत्यक्षप्रमाणात्मक शब्द. प्रमाण श्रुतिशास्त्र है, अनुमान प्रमाणात्मक शब्दप्रमाण स्मृतिप्रमाण है । इसप्रकार " अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ” ( ब्रह्मसूत्र ३ | २ | २४ ) के अनुसार प्रत्यक्ष श्रुति, अनुमेया स्मृति, इन दो प्रामाणों पर ही भारतीय प्रामाण्यवाद विश्रान्त है । इससे निष्कर्ष यह निकला कि, शब्दप्रमाण का प्रत्यक्ष - श्रनुमान के साथ समतुलन करने से शब्दद्वैविध्य ( श्रुतिस्मृतिशब्दद्वैविध्य ) ही प्रत्यक्षानुमानप्रमाणद्वयी बन जाता है । यदि शब्द को प्रत्यक्षानुमान से पृथक करके देखा जाता है, तो उस समय प्रत्यक्ष, अनुमान का स्वरूप भिन्नवत् प्रतीत होने लगता है । उस समय द्रष्टा की दृष्टि प्र ० प्र ० है, द्रष्टा का वाक्य शब्दप्रमाण है, एवं श्रोता का शब्द अनुमानप्रमाण है । अथवा तो द्रष्टा का वाक्य प्रत्यक्षप्रमाण है, श्रोता का वाक्य शब्दप्रमाण है, एवं निबन्धशब्द अनुमान प्रमाण है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । प्रत्यक्ष, अनुमान, इन दो प्रधान प्रमाणों को ही राद्धान्तपक्ष मानते हुए एक तीसरं ही दृष्टिकोण से विषय का समन्वय कीजिए । दृष्टि, युक्ति, श्रुति, स्मृति, मेद से दो के चार विवर्त्त हो जाते हैं । श्रार्थदृष्ठि से दृष्ट ज्ञान ऋषि की ' अशाब्दी ' दृष्टि है । इस अशाब्दी दृष्टि ( प्रत्यक्षज्ञान ) का अभिनय करने वाली श्रुति ( वेदशब्द ) शब्ददृष्टि है । शाब्दी दृष्टि भी प्रत्यक्षप्रमाण है, शाब्दी दृष्टि भी प्रत्यक्षप्रमाण है, दोनों स्वतः प्रमाण हैं । स्मृतिशब्द शाब्दतर्क ( युक्ति ) है, युक्ति शाब्दतर्क है । इसप्रकार अनुमान प्रमाण भी युक्ति, स्मृति भेंट से दो भागों में विभक्त हो जाता है । फलतः चार प्रमाण सिद्ध हो जाते हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है— १- प्रत्यक्षम् ( १ ) - अशाब्दम् - दृष्टिः - स्वनः प्रमाणम् २- अनुमानम् ( २ ) - अशाब्दम् - युक्तिः --- परतः प्रमाणम् ३- प्रत्यक्षम् ( १ ) - शाब्दम - - श्रुतिः - स्वतः प्रमाणम ४ - अनुमानम् ( २ ) - शाब्दम- - स्मृतिः -- परतः प्रमाणम् * -- प्रत्यक्षे_ २ - श्रनुमाने २ मन्त्रभागवत् विधि - श्रारण्यक उपनिषत् की समष्टिरूप ब्राह्मणभाग भी वेदशास्त्र है, श्रुतिशास्त्र है, यह ' क्या उपनिषत् वेद है? ' प्रकरण में महासमारम्भ से प्रमाणित किया जा चुका है । एवं ' श्रुति ' शब्द का श्रवण – परक अर्थ लगाने वाले सम्भवतः यह स्वीकार करते होंगे कि, ब्राह्मणकाल में ' लिपि ' अवश्य थी । यदि ऐसा है, तो उनके उस रिसर्च का क्या मूल्य रहा?, जिसके आधार पर उन्होंने श्रुति शब्द की प्रागुक्त मीमांसा की है । अपिच थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि, मन्त्रभाग ही ' श्रुति ' है । और यह भी तुष्यद्द ुर्जन - न्याय से स्वीकार कर लेते हैं कि, लिपि के अभाव से मन्त्रभाग ' अति ' कहलाया है । परन्तु उस दशा में हम उनसे यह प्रश्न करेंगे कि - ' स्मृति ' शब्द का उन्होंने अपनी परिभाषा में क्या अर्थ किया है? । तत्र तो श्रुति को ‘ स्मृति ' कहना विशेष सुविधा का द्योतक होगा । क्योंकि, सुनी - सुनाई बातों में स्मृति की विशेष अपेक्षा रहती है । इसीलिए तो हमें विवश होकर कहना पड़ता है कि, आज का यह रिसर्चकाण्ड भारतीय पारि भाविक तत्त्ववाद से सर्वथैव बहिष्कृत है । इन्द्रियातीता श्रादृष्टि के द्वारा प्रत्यक्षीकृत ज्ञान को प्रत्यक्षकर्ता के ४१०

पृष्ठ 422

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तृतीयखण्ड

१ – “ यथोदकं शुद्ध शुद्धमा सिक्तं तागेव भवति ।

एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम! " ॥

२ – “ यदेवेह तमुत्र यमुत्र तदन्विह । — कठोपनिषत् ४ | १५ | मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति " ॥ — कठोपनिषत् ४ | १० |

३ – “ यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः " ॥

- मुण्डकोपनिषत् २२ । ५ ।

४ – गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।

कर्माणि विज्ञानमयश्च श्रात्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥

— मुण्डकोपनिषत् ३ | २ | ७ | -५ — यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्र े

ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।

तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

- मुण्डकोपनिषत् शरान

६ - स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति " ।

—मुण्डकोपनिषत् ३ । २ । ६ ॥

७- एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म " - छान्दोग्योपनिषत् ६।२ । १ ।

ओं पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ” ॥

- ईशोपनिषत् १ | उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' श्रुतिशब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि ' नामक षष्ठ स्तम्भ - उपरत ६ -88 ४१५

पृष्ठ 423

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शब्दों के द्वारा हम सुनते भर हैं, देख नहीं सकते, एकमात्र इसी रहस्यरचन के लिए प्रयुक्त ' श्रुति ' शब्द बुद्धि-मानों में ऐसा व्यामोह उत्पन्न कर देगा, एवं जिसके निराकरण के लिए हमें श्रुतिशब्दमीमांसाप्रकरण में ऐमे प्रिय सत्य का आश्रय लेना पड़ेगा, यह सब कुछ श्रुतिपरायण या देश के लिए विडम्बना ही तो मानी जायगी । ८ - एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि— जो आधुनिक विद्वान् – अग्निर्वै ' देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या - देवता: ' ( ऐ ० ब्रा ० १।१ । ) का यह तात्पर्य्य लगाने की भूल कर सकते हैं कि, किसी समय विष्णुपूजा प्रधान बन गई थी, जो काल्पनिक साङ्केतिक ' श्रुति ' शब्द के आधार पर वेदकाल में लिपि का प्रभाव मानने का दुस्साहस कर सकते हैं, जो इतिवृत्तज्ञ भारतीय सभ्यता के इतिवृत्त को अपनी विशुद्ध कल्पना के आधार पर पाषाणयुग, लोहयुग, ताम्रयुग, आदि काल्पनिक युगों की प्रतिच्छाया से प्रावृत कर सकते हैं, जो राजनैतिक भारतीय स्वत्त्वापहरणवृत्ति को दृढमूल बनाने के लिए प्राग्मेरु ( पामीर ) को भारतीयों का मूलनिवास मानने की पृष्टता कर सकते हैं, वे यदि यह सिद्धान्त स्थापित कर दें कि, भारतीयों का एकेश्वरवाद केवल उपनिषदों की देन है, तो हमें कोई श्राश्वर्य्य नहीं करना चाहिए । “ मन्त्रकाल में भारतीय अनेक देवताओं के ही उपासक रहे हैं । क्योंकि तब तक इन्हें सर्वव्यापक अखण्ड श्रात्मतत्त्व का बोध नहीं था । अनेक शताब्दियों के पीछे उप-निषत्काल में इन्हें अभिन्न ईश्वरात्मा का बोध हुआ " सिद्धान्त एक भारतीय की दृष्टि में इसलिए सर्वथा उपेक्षणीय है कि, इस सिद्धान्त के समर्थन में जो युक्ति - तर्क प्रमाण उद्धत हुए हैं, वे सर्वथा श्रापात-रमणीय I वस्तुस्थिति तो कुछ ऐसी है कि, विगत कतिपय शताब्दियों से भारतीय प्रज्ञा की स्व - निष्ठा अनेक कारणों से विकम्पित हो पड़ी है, जिसके दुष्परिणामस्वरूप भारतीय मानव अपनी आत्मनिष्ठा से सर्वथा पराङ्मुख बन गया है । अतएव च इसकी आत्मिक - बौद्धिक - मानसिक तथा शारीरिक यच्चयावत् प्रवृत्तियाँ ' स्व ' की उपेक्षा कर ' पर ' भाव को ही प्रमुखता प्रदान करने लग पड़ी है । यह अपने स्वरूप से न कुछ सोचता, न करता, अपितु इसका प्रत्येक विचार प्रत्येक कर्म्म निष्ठाभिभवमूला प्ररप्रत्ययनेयतानुगता ‘ भावुकता ' के अनुग्रह से ‘ पर ' को अवलम्ब बना कर ही प्रवृत्त हो रहा है । ' एकेश्वरवाद ' लक्षणा विप्रतिपत्ति भी इसी भावुकता को लक्ष्य बना कर प्रवृत्त हो पड़ी है, जिसका ग्रार्धनिष्ठा के क्षेत्र में कुछ भी तो महत्त्व इसलिए नहीं है कि, वेदशास्त्रसिद्ध अभिन्नब्रह्मसत्तावाद, बहुदेवतावाद, खण्डात्मवाद, विभिन्न कर्म्मभेदवाद, उपास्यदेवताभेदवाद, उपसनाप्रकार-भेदवाद, सत्र कुछ विभिन्न तत्त्ववादों के श्राधार पर प्रतिष्ठित सुव्यवस्थित वैसे ज्ञान - विज्ञान सम्मत दृढ़तम सिद्धान्त हैं, जिनमें भावुकता का प्रवेश भी निषिद्ध है । " अमुक सम्प्रदायविशेष एक ही ईश्वर मानता है, जबकि हमारे यहाँ बहुदेवतावाद है । अवश्य ही इस दिशा में हम उनसे निम्न कोटि में आ गए हैं " इस प्रकार की भावुकतामूला मानस - कल्पना के व्यामोह में आसक्त - व्यासक्त हो पड़ने वाले आतुर मानवों नें हीं ' एकेश्वर-* -गीताविज्ञानभाष्यभूमिका- ' बहिरङ्गपरीक्षा ' नामक प्रथमखण्ड में इन ग्रापातरमणीय कल्पित पाषाणादि युगों के कल्पित इतिहास का स्पष्टीकरण हुआ है । ४११

पृष्ठ 424

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भाष्यभूमिका वाद ' मूला विप्रतिपत्ति को जन्म दे डाला है । और इस विप्रतिरत्ति के निर ( करण के द्वारा अपने आपको उन सम्प्रदायविशेत्रों के समकक्ष ला खड़ा कर देने के व्यामोहन से ही उन्हें यह कल्पित मार्ग निकालना पड़ा है कि, " उपनिषतकाल में भारतीय भी एकेश्वरवाद के ही समर्थक बन गए थे " । श्रवझण्यम्! श्राह्मश्यम्!! महती विडम्वना!!! भ्रान्त भारतीयों को इसी परदर्शनमूना महतो भ्रान्ति के उपज्ञालन के लिए ही हमें भी लोकसंग्रह-बुद्धया ' श्रुतिशब्दमोमांसा, तथा एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि ' जैसे भावुकतापूर्ण परिच्छेद का यहाँ सन्निवेश करना पड़ रहा है, जिसका तच्चेतिवृत्त निम्न लिखितरूपेण भावुकप्रजा के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । हमारे ये विचारशील बन्धु अपने कल्पना प्रसूनों को उपस्थित करते हुए सम्भवतः यह भूल जाते हैं कि, आज के इस होनयुग में मी, जिसमें कि उन्हीं के अनुग्रहविशेष से भारतीयों ने अपने मौलिक वेदशास्त्र का स्वाध्याय छोड़ दिया है, यत्रतत्र वेदभ्यासी प्रकट हो ही जाते हैं । और तब उनकी आंखों में इसप्रकार धूलिप्रक्षेप करना सर्वथा असम्भव बन जाता है । धीरङ्कों का यह कहना कि, " ऋग्वेद सब से प्राचीन ग्रन्थ है | उपनिषदों का निम्मा बहुत आगे जाकर हुआ है । विकासवाद - विद्धान्त के अनुसार भारतीयों ने अपने ज्ञानक्षेत्र में क्रमिक उन्नति की है । पहिले पारायण पूजा आरम्भ की, इन्हीं के शस्त्रास्त्र बनाए । अनन्तर अग्नि- वायु- सूर्य के सामने घुटने टेकने लगे । इनकी शक्तियों से प्रभावित हो कर इन जड़ पदार्थों की उपासना होने लगी | इस क्रमविकास के अनुग्रह से अनन्तकाल के अनन्तर इन्हें एकेश्वर का बोध प्राप्त हुआ । ऋग्वेद केवल देवताग्रन्थ है । उसमें ' देवता ' नामक अग्नि- वायु- सूर्य्य - वर्षा - श्रादि बड़ पदार्थों का ही प्राधान्य है । सिद्ध है कि, ऋग्वेदकाल में श्रमिनात्मतत्त्व से सर्वथा अपरिचित थे । इस परिचय का सौभाग्य प्राप्त हुआ इन्हें ' उपनिषत्काल ' में " कहाँ तक क्षम्य है? इस प्रश्न का उत्तर देने में अतीत परतन्त्र भारतवत् आज का सर्वतन्त्रश्वतन्त्र भारत भी दुर्भाग्यवश इसलिए असमर्थ है कि, इसको सञ्चालिका सत्ता देश की मौलिक-संस्कृति, एवं तदाधारभूत आवेदशास्त्र को अपनी परप्रत्ययनेयता से सर्वथैव विस्मृत किए हुए है । वेदशास्त्र भारतवर्ष की प्रातिस्त्रिक सम्पति है । हमारे पिता- पितामह प्रपितामहों की स्त्रोपार्जिता श्रनुय्य-निधि है | सह कोस दूर बैठे हुए वेदशास्त्र परिभाषानभिज्ञ उन्होंनें तो वेदरहस्य समझ लिया, किन्तु भारतीय उसके इतिवृत्त से भी अपरिचित है?, कैमा प्रलाप! कैसी घृष्टता!! कैसी विडम्बना!!! ' कालाय तस्मै नमः '? | छोड़िए इस श्रप्रिय प्रसन को । हमें उस तथ्य पर थोड़ा विचार अवश्य कर लेना है, जो सनदोष से प्राप्ति कवर्ग में भी भ्रान्ति का कारण बन बाया करता है । जिस ॠग्वेद में अद्वैतमूलक एकेश्वरवाद का अभाव बतलाया जा रहा है, वही ऋग्वेद एकेश्वरवर्णन से श्रथ से इतिपर्य्यन्त श्रोतप्रोत है । तुष्टि के लिए कुछ एक मन्त्रों के उद्धरण ही पर्याप्त होंगे । अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, वरुण, यम, मातरिश्वा, इत्यादि सम्पूर्ण देवता उस एक ही के अनेकरूप हैं । उम्री व्यापक तत्त्व का स्मरण कराते हुए निम्न लिखित मन्त्र ढ़वादियों का उद्बोधन करा रहे हैं-१ – " एक एवाग्निहुधा समिद्धः एकः सूर्यो विश्वमनुप्रभूतः । -एकशेषाः सर्वमिदं विभाति " एकं वा इदं विबभूव सर्वम् " । ( ऋक्सं ०८ | ५८ | २ || ४१२

पृष्ठ 425

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तृतीयखण्ड

२ – “ अचिकित्वाञ्चिकितुष श्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् ।

वि यस्तस्तम्भ पडिमा रजांसि - " जस्य रूपे विमपि वि - ' देकम् " ॥

( ऋक्सं ० १।१६४।६ ) ।

३ – “ नासदासीनो सदात्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।

किमावरीहः कुह कस्य शर्म्मन् - अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम् ॥

न मृत्यु सीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत् प्रकेतः ।

नीवातं स्वधया ' तदेकं ' तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥

तम श्रासीत्तमसा मूलमग्रे ऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । तुच्छये नाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिंना जाय- ' तैकम् " । ( ऋक्सं ०१०।१२६।१,२,३ ) । . ४ – “ तिस्रो मातृ स्त्रीन् पितृ न बिभ्र - ' देकं ' ऊर्ध्वगतस्थौ नेमव ग्लापयन्ति । मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् " ॥ ( ऋक्सं ० ] १।१६४ | १० | ) ।

५ – “ ऋचो अक्षरे ' परमे व्योम ' न्यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ।

यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इाद्विदुरत इमे समासते ” ॥

( ऋक्सं ० १।१६४।३६ । ) ।

६ - " एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।

तं पाकेन मनसा पश्यमन्तितस्तं माता रेल्हि स उ रेल्हि मातरम् ॥

सुपर्ण विप्राः कवयो वचोभि - ' रेकं सन्तं ' बहुधा कल्पयन्ति ।

छन्दांसि च दधतो अध्वरेषु ग्रहान्त्सोमस्य मिमते द्वादश " ॥

( ऋक्सं ०१०।११४।४, ५, ) ।

७ — ' आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः ।

घोषा इदस्य शृविरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम " ॥

( ऋक्सं ०१०।१६८ | ४ | ) ।

- " य आत्मदा वलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः ।

यस्य च्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

यश्चिदापो महिना पर्य्यपश्यद्दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम् ।

यो देवेष्वधिदेव ' एक ' आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

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पृष्ठ 426

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भाष्यभूमिका

प्रजापते! न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।

यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्वाम पतयो रयीणाम् ” ॥

( ऋक्सं ०१०।१२११२.८,१२, ) ।

६ – “ यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।

यो देवानां नामधा ' एक ' एवं तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या ॥

( ऋक्सं ०१० | ८२।३ । ) ।

१० – “ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।

सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव ' एकः ” ॥

( ऋक्सं ० २०८१ | ३ | ) ।

११ – “ इन्द्र ं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।

' एक ' सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः " ॥

( ऋक्सं ० १।१६४।४६ । ) । उक्त ऋग्वेदीय वचन यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि, उपनिषदों का एकेश्वरवाद स्वयं मन्त्र-संहिता में ही पूर्ण रूप से पुष्पित पल्लवित है । एकेश्वरवाद के आधार पर मन्त्र - ब्राहाणात्मक वेदशास्त्र का वितान हुआ है । अन्यदेशीय विद्वान् हमारी निधि से अपरिचित रहने के कारण अनर्गल कहनें लगे, यह अपराध किसी सीमा तक क्षम्य माना जा सकता है । परन्तु आश्चर्य हमें तत्र होता है, जब इसी देश के कतिपय वेदभक्त भी संहिता में अद्वैतसिद्धान्तप्रवर्तक अखण्डात्मवाद पर नच नुच करते दिखलाई देने लगते हैं । भगवान् शङ्कराचार्य्यं के श्रुतिसिद्ध द्वैतवाद की समालोचना करते हुए ऐसे ही एक वेदभक्त ने अपने निम्न लिखित उद्गार प्रकट किये हैं— “ तथा उपसंहार ( त्रलय ) के होने पर भी ब्रह्म - कारणात्मक जड़ और जीव बराबर बने रहते हैं । इसलिए उपक्रम और उपसंहार भी इन वेदान्तियों की झूठी कल्पना है । ऐसी अन्य बहुत सी वाते हैं, जो शास्त्र प्रत्यक्ष प्रमाणों से विरुद्व है ” ( सत्यार्थप्रकाश ११ समुल्लास ) । भारतवर्ष में, तत्रापि ब्रह्मकुल में जन्म लेने वाले अपने आपको वेदोद्धारक कहने - कहलाने वाले, एक भारतीय विद्वान् के मुख से विनिःसृत उपर्युक्त अक्षर सुन कर किस भारतीय को दुःख न होगा । सम्पूर्ण वेदशास्त्र जहाँ एकस्वर से सिद्धान्ततः अखण्डात्मवादमूलक ऐकात्म्यवाद का समर्थन कर रहा है, वहाँ उक्त कल्पना के मिध्यात्त्व में क्या सन्देह रह जाता है । इन्हीं सब परिस्थितियों को देखते हुए कहना पड़ता है कि, मताभिनिवेश ही मानव के सत्यज्ञान - प्राप्ति मार्ग का महा प्रतिबन्धक है । वेतदत्तत्त्वजिज्ञामुत्रों से सानुनय निवेदन किया जायगा कि, यदि वे वस्तुतत्त्व पर पहुँचना चाहते हैं, तो उन्हें वेद की परिभाषाओं के आाधार पर विशुद्ध प्रणाली को ही अपना उपास्य बनाना चाहिए । प्रस्तुत प्रकरण को विश्राम देते हुए निम्न लिखित उन सूक्तियों की ओर उपनिषत् प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जो सर्वतोभावेन एकेश्वर-वादमूलक अभिन्न- श्रात्मतत्त्व का समर्थन करते हुए मृत्युप्रवर्त्तके नानात्व का आमूलचूड़ खण्डन कर रहे हैं.– ४१४

पृष्ठ 427

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भी: उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' श्रुतिशब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि ' नामक षष्ठ - स्तम्भ - उपरत ay ६

पृष्ठ 428

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उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका - तृतीयखण्डान्तगंत-' ग्रौपनिषद - ज्ञान प्रवर्त्तकेतिवृत्त दिग्दर्शन ' सप्तम - स्तम्भ ७ नामक

पृष्ठ 429

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श्रीः औपनिषद - ज्ञानप्रवर्त्तके तिवृत्तदिगदर्शन १ - औपनिषद ज्ञान का स्वरूप-यदि औपनिषद ज्ञान से निरस्तसमस्तोपाधि - सर्वप्रपञ्चोपशम - तुरीयशब्दवाच्य - अव्याकृत- विशुद्ध ब्रह्मज्ञान अभिप्रेत है, जैसाकि व्याख्याताओं का मन्तव्य है, तब तो हमारे प्रकृत - प्रकरण का कोई तात्पर्य्यं शेष नहीं रह जाता है, क्योंकि- ' तत्र ब्रह्म ब्रह्म भवति ० ' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार उस स्थिति में पहुँचने वाले ब्रह्मवेत्ता वर्णमर्य्यादा से अतीत हैं, श्रतएव उनके लिए वर्णव्यवहार करना सर्वथा असङ्गत है । यदि काण्डत्रयी में संगृहीत निवृत्तिकर्म्ममूलक ज्ञानयोग - जिसे हम गीतापरिभाषा में ' ज्ञानबुद्धियोग ' कहेंगे– औपनिषद ज्ञान से अभिप्र ेत है, तो निश्चयेन कहना पड़ेगा कि, औपनिषद ज्ञान के प्रथम प्रवत ' के सिद्धजाति में उत्पन्न, अतएव ‘ सिद्ध ' उपाधि से प्रसिद्ध महर्षि कपिल ध । एवं ऐसे औपनिषद ज्ञान की अपेक्षा प्रकृत प्रश्न के सम्बन्ध में भी यह कहा जा सकता है कि, - ' ब्राह्मण ही औपनिषद ज्ञान के प्रवर्त्तक थे ' । परन्तु जैसाकि पूर्वपरिच्छेदों में यत्रतत्र स्पष्ट किया जा चुका है, विज्ञान, स्तुति, इतिहास, ज्ञान, भक्ति, कर्म्म, इन ६ औं प्रतिपाद्य विषयों के अतिरिक्त उपनिषदों का प्रधान लक्ष्य योगात्मिका वह ब्रह्मविद्या है, जिसे हम गीता - परिभाषा के अनुसार ' अव्ययात्मविद्यानुगता राजर्षिविद्या ' नाम से व्यवहृत कर सकते है । श्रव्ययज्ञान उपनिषदों का ज्ञान है, वैराग्यबुद्धियोग उपनिषदों का योग है, ऐसे ब्रह्मज्ञानात्मक वैराग्यबुद्धियोग का ही उपनिषदों में प्राधान्य है, जैसाकि - ' उपनिषदों में क्या है? - उपनिषत् - इमें क्या सिखाती है?, इन प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जा चुका है । यद्यपि इसमें कोई सन्देह नहीं कि, ब्राह्मणवंश ही इस विद्या, तथा इस योग का सूत्ररूप से प्रवर्तक रहा है, और इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि, ब्रह्मर्षि ही औपनिषद-ज्ञान के निश्चयेन प्रथम प्रवर्तक हैं, तथापि एक विशेष दृष्टिकोण के माध्यम से इस बुद्धियोगात्मक औप-निषद - ज्ञान की सम्प्रदायप्रवृत्ति का श्रेय अमुक सीमापर्य्यन्त राजर्षिवर्ग को भी प्रदान किया जा सकता है । इसी दृष्टिकोण की अपेक्षा से लोकभावुकता - संरक्षणात्मक निम्न लिखित मानस - मन्तव्य पाठकों के सम्मुख उप-स्थित हो रहा है । अभी इस सम्बन्ध में हमें पाठकों के सामने केवल इस परिस्थिति का स्पष्टीकरण करना है कि, ज्ञान-कम्मो भयमूर्ति श्रव्ययपुरुष ही उपनिषदों का प्रधान लक्ष्य है । एवं इसकी प्राप्ति का साधनभूत वैराग्यलक्षण बुद्धियोग ही उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय है । वैराग्यबुद्धियोगावच्छिन्न अव्ययज्ञान ही श्रौपनिषद ज्ञान है । एवं इसी औपनिषद ज्ञान के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होता है कि, ' औपनिषद ज्ञान के प्रवर्त्तक कौन थे? | ब्राह्मण महर्षियों के यश को अणुमात्र भी कम न करते हुए इस सम्बन्ध में स्वयं उपनिषदों के अक्षरों के आधार पर ही हमें जैसा कुछ भान हुआ है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि, - ' औपनिषद ज्ञान के प्रवर्त्तक राजर्षि ही थे ' । ४१६

पृष्ठ 430

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भूमिका २ - देवयुग, और योगव्यवस्था— कर्म्म, भक्ति, ज्ञान, बुद्धियोग, भेद से अनुष्ठेय योग को हम चार भागों में विभक्त कर सकते है । श्रात्मतत्त्व की संस्थाचतुष्टयी ही इस विभागचतुष्टयी का मूलकारण है । श्रव्ययात्मा बुद्धियोग की प्रतिष्ठा है, अक्षरात्मा ज्ञानयोग की प्रतिष्ठा है, आत्मक्षरात्मा भक्तियोग की प्रतिष्ठा है, एवं श्रात्मक्षरानुगत शिपिविष्टात्मा कर्मयोग की प्रतिष्ठा है । ये चारों कर्त्तव्ययोग जिस देवयुग में सुप्रतिष्ठित थे, उस देवगुग में चारों में से प्रधानता श्रव्ययात्मानुगत बुद्धियोग की ही थी । तत्कालीन भूमण्डल पर प्रकृतिवत् त्रैलोक्य व्यवस्था थी । प्रकृति में अग्नि- वायु - इन्द्रादि देवभेद से जैसे पृथिवी - अन्तरिक्ष- -आदि लोक व्यवस्थित हैं, एवमेव यहाँ भी त्रैलोक्य, एवं लोकाधिपति मानुष देवताओं का आवास निवास था । दक्षिण समुद्र से प्रारम्भ कर हिमालय पर्य्यन्त भूलोक की व्याप्ति थी । यही देवयुगकालीन भारतवर्ष था, एवं यहाँ की प्रजा सम्राट् ' मनु ' के सम्बन्ध से ' मनुष्य ' नाम से प्रसिद्ध थी । यहाँ के शवसोनपात् - प्रतिष्ठावा - ( अधिष्ठाता देवता ' भारत ' उपाधि से विभूषित ' अग्नि ' थे । हिमालय पर्वत से प्रारम्भ कर अलतायी पर्वतान्त मध्यप्रदेश उस यगव्यवस्था का अन्तरिक्षलोक था । यहाँ का प्रजावर्ग ' तिर्य्यक ' नाम से प्रसिद्ध था, जिसके यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, गुह्यक, राक्षस, पिशाच, आदि आठ भेद थे । इन्हीं को ' देवयोनि ' कहा जाता था । सुप्रसिद्ध वैभ्राजवन, काननवन, उमावन, स्कन्दवन, आदि वनोपवन इसी लोक की शोभा बढ़ाते थे । इस लोक के प्रतिष्ठावा ' वायु ' देवता थे । अल-तायी पर्बत से आरम्भ कर उत्तरसमुद्रान्त सम्पूर्ण भूप्रदेश उस युग का ' स्वर्ग ' था । यहाँ का प्रजावर्ग ' देवता ' नाम से प्रसिद्ध था, एवं यहाँ के प्रतिष्ठामा देवता ' इन्द्र ' थे । तत्रत: जो लोक- देवादि व्यवस्था प्राकृतिक-आधिदैविक जगत् में व्यवस्थित है, किसी युग में वह सम्पूर्ण व्यवस्था इसी लोक में व्यवस्थित थी । एवं वही युग देवप्राधान्य से ' देवयुग ' नाम से प्रसिद्ध था, जिसे साध्ययुग की तुलना में हम ' द्वितीययुग ' भी कह सकते हैं । उसी देवयुग में पृथिवी - अन्तरिक्ष - य - लोकों में तत्तत् स्थानविशेषों में वैज्ञानिकों की ब्रह्मपर्वदें विद्यमान थीं, जिनका दिग्दर्शन पूर्वप्रकरणों में कराया जा चुका है । इन सब ब्रह्मपदों के प्रधानाध्यक्ष भगवान् ब्रह्मा थे, जो कि ब्रह्मविद्या के प्रवर्तक माने गए हैं । ब्रह्मा के तत्त्वावधान में हीं इन पदों में तत्त्वा-न्वेषण - कर्म्म प्रक्रान्त था । इसप्रकार जिस देवयुग में, जिसे कि आर्षधर्म्ममूलाधार वेद के सम्बन्ध से ' वेदयुग ' भी कह सकते हैं - हमारा ज्ञानक्षेत्र सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित था, उस महा - भव्य युग में ज्ञानक्षेत्र के पथिक चार श्र ेणियों में विभक्त थे । एवं इस श्रेणि - विभाग की मूल प्रतिष्ठा वही पूर्वोक्ता योगचतुष्टयी बन रही थी । यद्यपि ज्ञानक्षेत्र में ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य, तोनों का ही समानाधिकार है, तथापि वर्णक्रमानुसार इस क्षेत्र में भी सदा से भी तारतम्य रहता चला आया है । और जिस देवयुग का हम स्मरण कराने चले हैं, उस देवयुग में भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, इन दो वर्णों के हाथ में ही शिक्षा का प्रचार - प्रसार था । यही कारण है कि, देवयुगकालीन ज्ञानेतिवृत्त के सम्बन्ध में दो वर्णों का ही नामश्रवण उपलब्ध होता है । उस युग के ब्राह्मण, क्षत्रिय, इन दोनों वर्णों को क्रमशः दो दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । कर्म्मठ ब्राह्मण, तपस्वीब्राह्मण, ये दो तो ब्राह्मणवर्ग थे! एवं भक्त क्षत्रिय, तथा बुद्धियोगनिष्ठ क्षत्रिय, ये दो क्षत्रियवर्ग थे । यज्ञमूलक त्रयीतत्त्व के द्रष्टा, त्रयीतत्त्व के आधार पर यज्ञकर्म का वितान करने वाले कर्म्मड ब्राह्मण ' ऋषि ' कहलाते थे । इनका प्रधान लक्ष्य कर्म्मयोग ( धर्म्मबुद्धियोग ) था । एवं उक्त चार आत्मसंस्थाओं में से ४२०