Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 431–440
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 431–440
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तृतीयखण्ड आत्मक्षरानुगत शिपिविष्टात्मा इनका मुख्य लक्ष्य था । इनकी यह श्रात्मविद्या इनके इस ( ऋषि ) नाम सम्बन्ध से गीतापरिभाषा में ' विद्या ' कहलाई है, एवं तत्प्राप्तिसाधनभूत प्रवृत्तिकर्म्मलक्षण योग ' धर्म्मबुद्धियोग ' ( कर्म्मयोग ) नाम से व्यवहृत हुआ है । अव्यक्त अक्षरात्मोपासक सिद्ध कपिलानुयायी तपस्वी ब्राह्मण ' सिद्ध ' कहलाते थे । इनका प्रधान लक्ष्य ज्ञानयोग ( ज्ञानबुद्धियोग ) था । एवं उक्त चार आत्मसंस्थाओं में से इनका लक्ष्य कायक्लेश - द्वारा प्राप्त होने वाला अक्षरात्मा था, इनकी यह आत्मविद्या इनके इस ( सिद्ध ) नाम से ' सिद्धविद्या ' कहलाई है, एवं तत्-प्रान्तिसाधनभूत निवृत्तिकर्म्मलक्षण योग ' ज्ञानबुद्धियोग ' ( ज्ञानयोग ) नाम से प्रसिद्ध हुआ है । कर्मठ ब्राह्मणों का कर्म्मयोग गीता में ' योगनिष्ठा ' नाम से, एवं तपस्वी ब्राह्मणों का ज्ञानयोग ' सांख्यनिष्टा ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जिनका निम्न लिखित भगवदुक्ति से विश्लेषण हुआ है-लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ! ज्ञानयोगेन सांख्यानां, कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ( गी ० ३।३ । ) । दूसरा क्षत्रियवर्ग क्रमप्राप्त हमारे सामने आता है । अव्ययात्मप्रसादानुगत आत्मक्षर जिन क्षत्रिय राजाओं का प्रधान लक्ष्य था, वे क्षत्रियराजा तत्प्राप्तिसाधनभूता निष्कामकर्म्मलक्षणा परानुरक्ति ( भक्ति ) के अनुगामी थे । इनकी यह ग्रात्मविद्या इन्हीं के नाम से ' राजविद्या ' नाम से प्रसिद्ध थी । एवं तत्साधनभूत योग ' ऐश्वर्यबुद्धियोग ' ( भक्तियोग ) नाम से प्रसिद्ध था । सर्वप्रपञ्चानुगत - ज्ञान कम्मंभियसमतुलित - अमृत मृत्युमूर्ति - सदसल्लक्षण अव्ययात्मा को अपना लक्ष्य बनाने वाला, फलाफल —– सुखदुःखादि द्वन्द्वों से एकान्ततः पृथक् रहने बाला क्षत्रियवर्ग ही ' राजर्षि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इन्हीं के नाम से यह अव्ययात्मविद्या ' राजर्षिविया ' नाम से प्रसिद्ध हुई । एवं तत्प्राप्ति-साधनभूत योग ‘ वैराग्यबुद्धियोग ' ( बुद्धियोग ) नाम से प्रसिद्ध हुआ । राजर्षिविद्या परम्परया राजर्षि क्षत्रियों में ही प्रतिष्ठित रही । आगे जाकर राजपियों के सम्पर्क से ही ब्राह्मणों में इस औपनिषद ज्ञान का प्रचार - प्रसार हुआ । इसप्रकार कर्म्मठ, तपस्वी, राजा, राजर्षि, भेद से उस युग का ब्रह्म क्षत्रबल चार भागों में विभक्त था । चारों क्रमशः उक्त विद्यात्मक योगों के उपासक थे । यही इन चारों योगों का पूर्वापरक्रम था । चारों में राजर्षियों से सम्बन्ध रखने वाला अव्ययज्ञान ही औपनिषद ज्ञान है, एवं वैराग्यबुद्धियोग ही योग है, जबकि लोकसंग्रहमूला अधिकारी - भेददृष्टि से इतर तीनों संस्थाओं का भी उपनिषदों में ग्रहण हुआ है । १ – राजर्षिविद्या – वैराग्यबुद्धियोगः - ( बुद्धियोगः -- अव्ययानुगतः ) -- राजर्षीणाम् २ - राजविद्या -- ऐश्वर्य बुद्धियोगः - ( भक्तियोगः - आत्मक्षरानुगतः ) - राज्ञाम् ३ – सिद्धविद्या -- ज्ञानबुद्धियोगः - - - ( ज्ञानयोगः - - अक्षरानुगतः ) --- सिद्धानाम् ४ – आर्षविद्या -- धर्म्मबुद्धियोग: - --- ( कर्मयोगः– शिपिविष्टानुगतः ) — ऋषीणाम् ४२१
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भाष्यभूमिका ३ - ब्रह्म - क्षत्र का समन्वय कट, पिप्पलाद, मुण्डक, माण्डूक्य, तित्तिरि, जात्राल, श्वेताश्वतर, मैत्रायण, आदि - ब्रह्मर्षियों के नाम मे ही कठ - पिप्पलाद ( प्रश्नादि ) उपनिषद्द्मन्थ प्रसिद्ध हैं । इसी आधार पर कहा जा सकता है कि, औपनिषट ज्ञान की प्रवृत्ति के श्रेय से उपनिषत् - द्रष्टा महर्षियों को पृथक नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त स्वयं उपनिषदों में भी विस्पष्टरूप से यत्र तत्र इस विषय का पूर्ण समर्थन हुआ कि, श्रौपनिषद - शानमूला ब्रह्मविद्या बह्मर्षिपरम्परा में ही सुरक्षित रही है, जैसाकि निम्न लिखित मुण्डकवचनों से प्रमाणित है— ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ॥ स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥१ ॥
अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ॥ स भरद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भरद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥
( मुण्डक १॥१,२, ) । जिन विद्यापदों का आरम्भ में उल्लेख किया गया है, उनमें कुछ एक पर्दे राजर्षि - क्षत्रियों की थी, एवं इन ब्रह्म - क्षेत्र - पर्षदों का परस्पर ' ब्रह्मोद्य ' ( ब्रह्मचर्चा ) के नाते सम्बन्ध हुआ करता था । यह मान लेने में हमे कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए कि, उपनिषदों ने जिस निगूढ ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन किया है, उसके प्रथमद्रष्टा राजर्षि ही हुए हैं । राजत्रियों के द्वारा ही वह श्रौपनिषद ज्ञान ब्रह्मर्षिपरम्परा में प्रतिष्ठित हुआ है । शबर्षियोंनें ब्रह्मर्षियों से कभी किसी तत्त्ववाद के सम्बन्ध में अपनी बिशासा प्रकट की हो, ऐसा उपनिषदों में उपलब्ध नहीं होता । अपितु ठीक इसके विपरीत ऐसे कथानक स्थान - स्थान पर उपलब्ध हो रहे हैं, जिनसे स्पष्ट प्रमाणित हो रहा है कि, श्रोपनिषद तत्व एकमात्र राजर्षियों की ही देन है । उदाहरण के लिए दिग्दर्शन करा देना प्रासङ्गिक न माना जायगा -( १ ) -शालावत्य ‘ शिलक ’, चैकितायन ' दाल्भ्य ', ये दोनों ब्रह्मर्षि, एवं जैबलि ' प्रवाहरण ' नामक राजर्षि तीनों ' उद्गीथ ' विद्या में बड़े कुशल थे । एक समय इन तीनों नें उद्गीथ विद्या पर विचार विमर्श प्रकट करने की इच्छा की । वर्णमर्य्यादाभिश राजर्षि प्रवाहण ने कहा कि, पहले इस सम्बन्ध में आप अपने विचार प्रकट कीजिए | आपसे पहिले मैं सुनना चाहता हूँ । दोनों में से शिलक दाल्भ्य से बोले, पहिले आप । तदनुसार सर्वप्रथम उद्गीथ के सम्बन्ध में दालम्भ ने अपने विचार प्रकट किए । ' आपने जिस साम को उद्गीथाक्षर की चरम प्रतिष्ठा बतलाया, वस्तुतः ऐसा नहीं है । मैं आपसे निवेदन करता हूँ, कह कर शिलक ने इस लोकप्रतिष्ठा पर विश्राम माना । सर्वान्त में नैचलि ने सिद्धान्त किया कि, श्राकाश ही उद्गीय का परोवरीय परायण है । इसप्रकार राजर्षि का मत सर्वमान्य रहा " ( छान्दो ० १२०/८० ) । ( २ ) - औपमन्यव - ' प्राचीनशाल ', पौलुषि - ' सात्ययज्ञ ', माल्लवेय - ' इन्द्रद्युम्न ', शार्क राक्ष्य - ' जन ', श्राश्वतराश्वि - ' बुडिल ', पाँचों ब्रह्मर्षि ' महाशाल ' थे, महाश्रोत्रिय थे । एक बार पाँचों महाविद्वान् एकट्टे * अनेक शालाएँ जिनकी अध्यक्षता में चलतीं थीं, वे ' महाशाल ' उपाधि से विभूषित किए जाते थे, एवं कर्मकाण्डपारावारण को ' महाश्रोत्रिय ' की उपाधि से अलङ्कत किया जाता था । ४२२
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तृतीयखण्ड हुए, और इस विषय की मीमांसा प्रारम्भ की कि, श्रात्मा कौन है, ब्रह्म क्या पदार्थ है? | अपनी आत्म-ब्रह्म - मीमांसा के निश्चयात्मक निर्णय के सम्बन्ध में इन्होंनें यह परामर्श किया कि, भगवान् उद्दालक इस समय वैश्वानरात्मा के विशेषज्ञ मानें जाते हैं । उनके समीप चलना चाहिए । परामर्शानुसार पांचों ग्रहणपुत्र उद्दालक के आश्रम में पहुँचे । स्वयं उद्दालक यह जानते थे कि, वर्तमान में इस विषय के पूरे जानकार सुप्रसिद्ध राजर्षि अश्वपति केकय महाराज हैं । फलतः श्रागत महाशालों को साथ लेकर उद्दालक केकयराजधानी पहुँचे । राजर्षिने सम्मान्य अतिथियों के लिए पृथक् पृथक् भवनों का प्रबन्ध कर दिया | दूसरे दिन प्रात: राजर्षि इनकी सेवा में पहुँचे, और विनीतभाव से उनके आगे भेंट धरते हुए इसे ग्रहण करने की प्रार्थना की । जत्र उद्दालकादि नें भेंट ग्रहण न की, तो राजर्षि क्षुब्ध हो कर कहने लगे - भगवन्! मेरे राज्य में जब कोई चोर नहीं है, प्रदाता नहीं है, मद्यप नहीं है, श्रनाहिताग्नि नहीं है, मूर्ख नहीं है, व्यभिचारो पुरुष नहीं है, कुलटा स्त्री नहीं है, इसप्रकार भेंट - महगा प्रतिबन्धक जब कोई दोष नहीं है, तब भी आपको मेरे श्रातिथ्य स्वीकार करने में क्या आपत्ति है? । महाशाल लोग कहने लगे, राजर्षिप्रवर! आपका कथन यथार्थ है । हम जिन अभिलाषा से आपके समीप श्राए हैं, हमें वही मिलना चाहिए, और हमारी वह अभिलाषा है - ' वैश्वानरात्मा का आपसे ज्ञान प्रात करना ' । राजर्षि ने प्रातःकाल का समय निश्चित किया । यथासमय ६ श्रो समित्पाणि बन कर शिष्यबुद्धि मे केकयभवन में उपस्थित हुए । राजर्षि ने बर्णमर्य्यादानुसार चिना शिष्य बनाए ही निवेदन के रूप में आत्म-स्वरूप का विश्लेषण कर इन्हें सन्तुष्ट किया " । ( छा ० ३०५ प्र ० । ११ खण्ड ) । ( ३ ) आरुखेय श्व ेतकेतु श्रभी युषा थे । सुप्रसिद्ध तत्त्व गौतम आपके पिता थे । कुमार श्वेतकेतु एक बार पञ्चाल - राजसभा में निमन्त्रित हो कर पधारे । वहाँ सुप्रसिद्ध राजर्षि जैवलि भी विद्यमान थे । प्रसङ्ग हो प्रम में राजर्षि श्वेतकेतु से प्रश्न कर बैठे कि- कुमार! क्या आपने अपने पिता से सत्र विद्या ग्रहण कर ली है । उत्तर में श्वेतकेतु ने कक्ष, हाँ मैंनें पिता से ही विद्या प्राप्त की है । अव्यवहितोत्तरक्षण में ही राजर्षि ने पाँच प्रश्न उपस्थित कर दिए । श्रारुणेय स्तब्ध हो गए । पाँचों में से वे एक का भी समाधान न कर सके | इस पर श्वेतकेतु का उपहास सा करते हुए राजर्षि कहने लगे कि, क्या इसी बल पर तुमने यह कहने का साहम किया था कि, मैंनें पिता से सब कुछ सीख लिया है? । तुम्हें स्मरण रखना चाहिए कि, जो इन प्रश्नों का समाधान नहीं कर सकता, वह विद्वन्मण्डली में विद्वान् नहीं कहला सकता । राजर्षि से प्रतारित श्वेतकेतु खिन्नमना होकर अपने घर लौटे । श्राते ही श्रावेशपूर्वक पिता के सामने प्रपने ये उद्गार प्रकट किए कि, हे पितः! उस राजन्यधन्धु ( क्षत्रियनामधारी - श्रभिमानी राजा ) ने मुझ से पाँच प्रश्न किए | खेद है कि, मैं एक का भी उत्तर न दे सका । पिता कहने लगे - पुत्र! तुमनें जिन पाँच प्रश्नों का स्वरूप मेरे सम्मुख रखा है, मैं स्वयं उनका उत्तर नहीं जानता । यदि जाने रहता, तो अवश्य तुम्हें बतला देता । इसप्रकार अपनी स्पष्टवादिता से गौतम ने श्वेतकेतु का तो जैसे तैसे सन्तोष कर दिया । परन्तु— स्वयं इनके ग्रन्तःकरण में प्रश्न रहस्यार्थपरिज्ञान की उत्कण्ठा उत्पन्न हो गई । परिणामस्वरूप गौतम राजर्षि के स्थान पर पहुँच गए । राजर्षि ने यथाविधि गौतम का सत्कार किया । आतिथ्य ग्रहण करने वाले ४२३
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भाष्यभूमिका गौतम दूसरे दिन प्रातः जब राज सभा में पहुँचे, तो राजर्षि ने निवेदन किया कि, आप मुझ से यथेच्छ सम्पत्ति प्राप्त कर सकते हैं । गौतम उत्तर देते हैं कि, राजन्! मुझे आपका मानुष वित्त नहीं चाहिए, अपितु कुमार से आपने जो पांच प्रश्न किए थे, आप कृपा कर उन्हीं का समाधान कीजिए । आपसे केवल मैं यह विद्यावित ही प्राप्त करना चाहता हूँ । भगवान् गौतम के इन नम्र शब्दों ने राजर्षि का मस्तक लज्जा से अवनत कर दिया | राजर्षि को कुमार श्वेतकेतु के प्रति कहे गए अपने अनुचित शब्दों पर पश्चात्ताप हुआ । विचार किया कि, मेरी कटूक्ति पर अप्रसन्न होना तो दूर रहा, अपितु विश्वविख्यात गौतम जैसे पत्ब्रह्मा मेरा शिष्यत्व स्वीकार करने पधार श्राए । इसप्रकार अपने कर्तव्य पर मानस परिताप का अनुभव करते हुए राजर्षि बड़े ही विनय-भाव से कहने लगे कि, भगवन्! आज मैं आपको इस ब्रह्मविद्या का निधि बनाता हूँ । विश्वास कीजिए! आज से पहिले इसे ब्राह्मणसम्प्रदाय में कोई नहीं जानता था । सदा से इस विद्या का क्षत्रियव शपरम्परा में ही समावेश रहा है, परन्तु आज मैं इसे आपके द्वारा ब्राह्मणवंश में प्रवृत्त कर रहा हूँ ” ( छान्दो ०५ प्र ० ३ खं ० ) । आख्यान से सम्बन्ध रखने वालीं निम्नलिखित मूल, तथा भाष्य पंक्तियाँ इस सम्बन्ध में स्पष्ट प्रमाण है कि, औपनिषद ज्ञान ब्रह्म - क्षेत्र के समन्वय का फल है, एवं क्षत्रसमाज ही इसका प्रथमप्रवर्तक है । क्षत्रिय राज राजर्षियों के अतिरिक्त अन्य को इस विद्या का शिप्य नहीं बनाते थे । क्षत्रियों में ये ही ऐसे प्रथम क्षत्रिय हुए, जिन्होंनें अपनी मर्यादा तोड़ी । एवं ब्राह्मणों में ये ही पहिले ब्राह्मण हुए, जिन्होंने क्षत्रियराजा से ब्रह्मविद्या प्राप्त की, एवं उसे ब्राह्मणसम्प्रदाय में प्रचलित किवा | देखिए -“ तं होवाच ( राजर्षिः ) —यथा मा त्वं गौतमाऽवदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति । तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभृत् " ( बां ०3० ५ | २ | ७ | ) । “ तत्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रकारेणेयं विद्या प्राक् त्वत्तो ब्राह्मणान- गच्छति, न गत-बनी, न च ब्राह्मणा अनया विद्ययाऽनुशासितवन्तः । तथैतत् प्रसिद्ध लोके यतस्तस्मादु पुरा पूर्वं सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव क्षत्रजातेरेवानया विद्यया प्रशासनं प्रशास्तृत्वं शिष्याण।-मभूद्- बभूव । क्षत्रियपरम्परयैवेयं विद्या - एतावन्तं कालमागता । तथाऽप्यहमेतां तुभ्यं वक्ष्यामि, त्वत्सम्प्रदानादूर्ध्व ब्राह्मणान् गमिष्यति ” ( शाङ्करभाष्य ) । ४ - राजर्षिविद्यात्मक औषनिपदज्ञान के प्रथम प्रवर्तक औपनिषद ज्ञान आरम्भ में राजर्षिपरम्परा में प्रतिष्ठित था, आगे जाकर ब्रह्म - क्षेत्र के समन्वय से यह ब्रह्मर्षिपरम्परा में भी प्रतिष्ठित हो गया, यह उक्त परिच्छेद से भलीभांति सिद्ध हो जाता है । अब इस सम्बन्ध में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, राजर्षिविद्यात्मक इस औपनिषद ज्ञान के प्रथम प्रवर्तक कौन? | सन्तोष के लिए माना जा सकता है कि, सांख्यनिष्ठात्मिका सिद्धविद्या के प्रथम प्रवर्त्तक कपिल सिद्ध थे | योग-निष्ठात्मिका श्रार्षविद्या के प्रथम प्रवर्तक हिरण्यगर्भ ऋषि थे । तथैव भक्तियोगात्मिका राजविद्या को अपने गर्भ ४२४
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में रखने वाली बुद्धियोगात्मिका राजर्षिविद्या की प्रथम प्रवृत्ति किस से हुई?, इस समस्या का निराकरण उस समय भलीभांति जाता है, जबकि भारतीय ' अवतार रहस्य ' की ओर हमार ध्यान आकर्षित होता है । वासुदेवतत्व ही इस विद्या, तथा योग के प्रथमप्रवर्त्तक मानें गए हैं, जो कि कालातिक्रम से समय समय पर विलुप्त हो जाने वाले योग के पुनरुद्धार के लिए नरावतार धारण किया करते हैं । देवयुगारम्भ में किसी अन्य शरीर से इसी वासुदेवतत्व ने राजर्षि विवस्वान् को इस योग का प्रथम शिष्य बनाया । विवस्वान् भारतवर्ष के प्रथम मनु ( सम्राट् ) वे । इन्होंनें अपने ज्येष्ठपुत्र श्रद्धा देव मनु को, जो कि पुराणों में ' वैवस्वतमनु ' नाम से प्रसिद्ध हुए, इस योग का उपदेश दिया । वैवस्वत के द्वारा इनके ज्येष्ठपुत्र अयोध्याधिप महाराज इक्ष्वाकु इनके शिष्य बने । इसप्रकार वासुदेवतत्त्व के द्वारा राजर्षि विवस्वान् के प्रति प्रथमोपदिष्ट यह विद्यात्मक योग राजर्षि-परम्परा में ही प्रतिष्ठित रहा । आगे जाकर कालातिक्रम से वह घोग विलुप्तप्राय हो गया । यहाँ तक कि, विवस्वान् की १२८ वीं पीढ़ी में उत्पन्न महाभारतकालीन सूर्य्यवंशी महाराज सुमित्र के युग में तो एक प्रकार से इसका सर्वथा उच्छेद ही हो गया । इसी युग में उसी वासुदेवतत्त्व के द्वारा अर्जुन के प्रति पुनः उस विलुप्त योग का उपदेश हुआ था, यह सार्वजनीन है । एवं इसी आधार पर यह भी सर्वसम्मत ही पक्ष माना जायगा कि, औपनिषद ज्ञान एकमात्र राजर्षिवंश की ही प्रातिश्विक वस्तु बनता रहा है । उपनिषदों में उपवर्णित यह औपनिषद ज्ञान स्वयं औपनिषद पुरुष ( श्रीकृष्ण ) द्वास प्रथम प्रवृत्त है । अतएव भगवान् ने स्पष्ट शब्दों में- ' ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ' रूप से इसे अपना प्रातिस्त्रिक मत बतलाते हुए राजर्षिपरम्परा की ओर ही सङ्केत किया है, जैसा कि निम्न लिखित भगवदुक्ति से प्रमाणित है— " इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ॥ विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिचा कवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ॥ स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप! ॥ २ ॥
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ॥ भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्य ेतदुत्तमम् " ॥ ३ ॥ ( गीता ४।१,२,३, । ) ।
५ - लोकभावुकतासंरक्षक - प्रकरण का उपसंहार -वस्तुतस्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्बन्ध रखने वाले, अतएव ' अपौरुषेयभावाक्रान्त ' किसी भी ' अपौरुषेय ज्ञान के सम्बन्ध में प्रवर्तक का अन्वेषण करना स्वयं श्रामय्यादा के ही सर्वथा विपरीत है । आर्षज्ञान, जो कि औपनिषद् ज्ञान का नामान्तर है - सहजज्ञान है । एवं ऐसा सहजज्ञान - जिसका मानवीय -मानस प्रवृत्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है - सर्वथा अपौरुषेय है । ' यमैवेष वृणुते तेन लभ्यः ' के अनुसार जन्मान्तरीय दिव्य संस्कारों से पवीत्रीकृत निर्मल अन्तःकरणों में वह स्वतः प्रकट हो जाता है । ' तत स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' भी इसी पक्ष को समर्थन कर रहा है । ऐसी दशा में दृष्टि से यद्यपि ' औपनिषद ज्ञान के प्रवर्त्तक कौन थे? इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं रह जाता, तथापि वर्तमानदृष्टि के आधार पर विचारपद्धति का आश्रय लेने से हमें इसी तथ्य पर पहुँचना पड़ता है कि, ' औपनिषद ज्ञान ' आये ४२५
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चल कर यद्यपि ब्रह्म - क्षेत्र, भाष्यभूमिका दोनों वर्गों से सम्बद्ध हो गया है । तथापि इसके प्रथमप्रवर्त्तकत्त्व का श्रेय राजर्षि-वंश को ही है । एवं यही उक्त प्रश्न का कण्डूनिवारक समाधानाभास 1 ६ – प्रकस्योपसंहास्दृष्टि का उपलालनभाव, एवं सिद्धान्तपक्ष -उक्त समाधान को कण्डूनिवारक इसलिए कहा गया है कि, दिग्देशकालावच्छिन्न प्राकृत विश्वसर्ग की दृष्टि से कालात्मक बुद्धिवाद के माध्यम से ही - ' यथेयं न प्राक्रू त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति ' ( छान्दोग्य • ५ | ३ | ७ | ) इत्यादि रूप से श्रौपनिषद ज्ञान की सम्प्रदाय प्रवृत्ति राजर्षिक्षत्रियपरम्पर | से अनुप्राणित मान ली गई है । कुछ एक विशेष विद्याएँ राजर्षिपर - परा में हीं प्रतिष्ठित रहतीं थीं, एवं तद्द्वारा ही उन कतिपय विद्याओं की सम्प्रदायप्रवृत्ति ब्राह्मणवर्ग में हुआ करती थी, एतावता ही यह निष्कर्ष निकाल लेना कि, " औपनिषद ज्ञान के प्रथम सम्प्रदायप्रवर्तक राजर्षि क्षत्रिय ही थे " कदापि सुसङ्गत इसलिए नहीं बन सकता कि, ' एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' ( ऋक् ) ' तस्माद्धान्यः - न परः किञ्चनास ' ( ऋक् ) ' अजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ' इत्यादि मन्त्रवचनों के अनुसार मन्त्रद्रष्टा ब्राह्मण महर्षि ही ' अज ' नामक अव्ययपुरुष से सम्बन्ध रखने वाले बैराग्यबुद्धियोगात्मक ' औपनिषद् - ज्ञान ' के प्रथमद्रष्टा, तथा प्रथमसम्प्रदाय प्रवर्त्तक उद्घोषित हैं । सर्वादिभूत ईशोपनिषत् तो स्वयं ऋषिद्रष्टा यजुः-संहिता का ही अन्तिम भाग है । " श्रमुक विशेष विद्याओं का प्रथमसम्प्रदाय प्रवर्त्तकत्व क्षत्रियों के साथ कैसे सम्बद्ध मान लिया गया? प्रश्न का समन्वय किसी विशेषदृष्टि से सम्बन्ध रखता है, जिसे अवगत कर लेने पर छान्दोग्यवचन से उत्पन्न होने वाली भ्रान्ति का सर्वात्मना निराकरण हो जाता है । ' ब्राह्मणेन निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येयो, ज्ञेयश्च ' इस आदेश को शिरोधार्य करने वाले ब्राह्मणश्रेष्ठ चिना किसी लोकैषणा - वित्तणा के सर्वथा कर्त्तव्यनिष्ठात्मिका उत्तरदायित्त्व की निष्ठा से * गुहा-निहितरूपेण तत्त्वान्वेषण – कर्म में हीं प्रधानरूपेण तल्लीन रहते हैं । लोकन्यासङ्ग - सामाजिक प्रचार - लोक-ख्याति - जनकलकलसंसर्ग श्रादि प्राकृतिक अनुबन्धों से ब्राह्मणवर्ग सदा से ही तटस्थ रहता आया है, रहना चाहिए । स्वयं राजर्षि मनुने भी - ' सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ' ( मनुः २।१६२ ) इत्यादि रूप से ब्राह्मणवर्ग को लोकैषणा प्रवर्तक - समद्ध'क सम्मानात्मक सामाजिक अनुबन्धों से श्रात्मत्राण किए रहने का ही सङ्केत किया है | अनन्यनिष्ठा से चिन्तन करने वाला कदापि प्रचारक नहीं बन सकता, एवं प्रचारक कभी अनन्यनिष्ठा से तत्त्वचिन्तक नहीं बना रह सकता । भावुकता के निग्रहानुग्रह से दुर्भाग्यवश जब से भारतराष्ट्र की ब्राह्मणप्रज्ञा में तत्त्वचिन्तन के साथ साथ प्रचार का मोह जागरूक हो पड़ा, तभी से इसका तत्त्वचिन्तन लोकानुरञ्जक - लोकभावुकता - संरक्षक बनता हुआ सर्वथा अभिभूत हो गया । यही नहीं, इसी प्रचारव्यामोहनानुग्रह से इसकी आत्मबुद्धिनिष्ठा मनः शरीरप्रधाना बदती हुई लोकैषणा- वित्तैषणा की लिप्सा से आमूलचूड़ ओतप्रोत हो गई । और कुफलस्वरूप इसका एकान्तनिष्ठ तत्त्वचिन्तन सर्वथैव * सामाजिक बाह्य वातावरण में मुक्तरूप से विचरण करते रहने वाला क्षत्रिय, तथा वैश्यवर्ग जहां-‘ सौय्यंमारुतिक ’ - ‘ वातातपिक ' कहलाया है, वहाँ - ' अरतिर्जनसंसदि ' लक्षणा एकान्तनिष्ठा का अनुगामी तत्त्वचिन्तक ब्राह्मण वर्ग ' गुहानिहित ' माना गया है । ४२६
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श्रमिभूत हो गया । ' दूसरं कैसे सन्तुष्ट रहें?, लोक - समाज में हमारा लोकैषणामूलक ( नामख्यातिरूप ) कल्पित व्यक्तित्त्व कैसे अनुदिन पुष्पित - पल्लवित हो?, सभी वर्ग हमें हीं सर्वात्मना कैसे विद्वान् - तत्त्वज्ञ - मर्मज्ञ-पक्षपातरहित - यशस्वी उद्घोषित करते रहें?, इत्यादि जघन्य प्रश्नों के तात्कालिक समाधानों में हीं अहोरात्र प्रवृत्त ये प्रचारकधुरीण - ‘ दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढाः ' x को अक्षरशः अन्वर्थ प्रमाणित कर रहे हैं । ' तत्त्वचिन्तक ब्राह्मणवर्ग गुहा निहिता श्रात्ममूला: तत्त्वनिष्ठा में अनन्यनिष्ठा से निष्कारण प्रवृत्त रहता हुआ लोक - समाज - प्रचार से तटस्थ है । तृतीय वैश्यवर्ग अपने विश्वेदेवानुगत समाजप्रिय विड्वीर्य्य से सामाजिक बनता हुआ भी प्रचार में अनधिकृत है । चतुर्थ वर्ग तो केवल योगक्षेमतन्त्र पर ही विश्रान्त है | शेष रह जाता है क्षत्रियवर्ग, जिसके सामान्य क्षत्रिय, तथा मूर्द्धाभिषिक्त राजा, ये दो विभाग हैं । दोनों में सामान्य क्षत्रिय भी लोकैषणानुगति से प्रचार में अनधिकृत है । शेष रह जाता है - मूर्द्धाभिषिक्त राजन्यवर्ग । अवश्य ही इसे पहिले से ही वह लोकसम्मान प्राप्त है, जिसके समतुलन में इसे अन्य सामान्य लौकिक सम्मानों की कोई अपेक्षा नहीं रहती । अतएव भारतीय प्रचारपद्धति में लोकसत्ता - सञ्चालक राजर्षिक्षत्रिय ही विद्या-प्रचार का मूलाधार मान लिया गया है । राजा ही लोकतन्त्र की प्रज्ञा का संरक्षण करता हुआ लोकानुरञ्जन-विधा से कालस्थिति का स्वरूप निर्वाहक माना गया है, जैसा कि - ' इति ते संशयो मा भूद् - राजा कालस्य कारणम् ' ( महाभारत ) इत्यादि से स्पष्ट है । मूर्द्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा ही सम्पूर्ण सांस्कृतिक प्रचार का मूलाधार बनता हुआ ' राजर्षि ' उपाधि से सुविभूषित मान लिया गया है । किसी विद्या विशेष के कारण ' राजर्षि ' उपाधि व्यवस्थित नहीं हुई है, अपितु यह तो अभिषिक्त सत्ताधीश की सामान्य उपाधि है । तभी तो ' वेन ' जैसे हीनकर्मा - वेदविरोधी - आध विरोधी - सत्ताधीश भी मनुद्वारा ' राजर्षि ' नाम से व्यवहृत हो गए हैं । तत्त्वचिन्तन के द्वारा सुव्यवस्थिता लोका-नुगता विविध विद्याएँ सत्ताधीश से ही अनुप्राणित होकर लोकप्रचारानुगता बनतीं रहीं हैं । जब से यह परम्परा शिथिल हो गई, दूसरे शब्दों में जब से राजसत्ता अपने इस महान् सांस्कृतिक उत्तरदायित्त्व से पराङ्मुख हो गई, तभी से भारतीय विद्याक्षेत्र, तथा तन्मूलक सांस्कृतिक क्षेत्र उन अर्थ - श्रमाधिपठियों के उपलालन का क्रौड़ाक्षेत्र बन गया, जो प्रकृत्या ही प्रत्येक क्षेत्र को अर्थ की तुला से, तथा शारीरिक श्रमतुला X विद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः । - कठोपनिपत्
- अणोरणीयान् - महतोमहीयान् - आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥
- कठोपनिषत् १ | | २८ | * स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा । वर्णानां सङ्करं चक्रे कामोपहतचेतनः ॥ ( मनुः ) ४२७
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भाय भूमिका से तौला करते हैं । सम्पूर्ण विश्व आज तत्त्वदृष्टया तुन्य त्रस्त -संत्रस्त क्यों है?, प्रश्न का यही बीज है । मन से सम्बन्ध रखने वाले अर्थ ने, एवं शरीर से सम्बन्ध रखने वाले श्रम ने, दोनों नें बुद्धि - सम्बन्धी धर्म्म, तथा आत्मसम्बन्धिनी निष्टा, दोनों को निस्तेज प्रमाणित कर दिया है । साहित्य संस्कृति - धर्म - निष्ठा - आस्था-आदि का मूल्याङ्कन आज वित्त - श्रम - जीवियों के द्वारा उसी प्रकार हो रहा है, जैसे कि वे अपने आपण-व्यवसाय ( दुकानदारी ), तथा श्रमव्यवसाय ( मेहनत ) के माध्यम से लौकिक - भौतिक नड़ - पदार्थों का मूल्याङ्कन किया करते है । आपणस्थित भूतपदार्थों के प्रति माव - ताव - मोल - जोल - लेखा - जोखा - बही - खाता रखने वाले ही आज ब्राह्मणप्रज्ञा से अनुप्राणिता सांस्कृतिक निष्ठा का, जन्मजात ब्रह्मभाव का ' बाजारभाव ' लगाने का अक्षम्य अपराध करने की घृष्टता करते हुए यत्किञ्चित् मी तो लज्जा से अवनतशिरस्क नहीं हो जाते । ऐसा क्यों हो रहा है?, कैसे हो पड़ा?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान है अर्थ - श्रमजीवियों के हाथों में प्रचार का उत्तरदायित्त्व - समर्पण । यही विश्वक्षोभ का महान् कारण है । क्योंकि दोनों हीं वर्ग अपने प को न तो लोकैषणा से ही बचाए रख सकते, न वितैषणा ही इन्हें मुक्त कर सकती । इन्हीं सत्र प्राकृतिक स्थितियों के आधार पर भारतीय ऋषिप्रज्ञा ने प्रचार का ममस्त उत्तरदायित्त्व लोकसत्तातन्त्र से ही सम्बद्ध माना है । देशभिपति ही स्वयं अन्वेषण कर राष्ट्रीय विद्याक्षेत्रों को प्रोत्साहित करता रहता था, एवं तद्विद्याएँ इसके द्वारा राष्ट्रीय ज्ञानकोष को ममृद्ध करती रहतीं थीं । स्वयं तत्त्वचिन्तक भी वैसी विद्याओं को जिाका लोकाभ्युदय से विशेष सम्बन्ध है - सत्ता क्षेत्र में उपहाररूप से समर्पित कर जाते थे, एवं सत्ताधीश उनका सम्प्रदायप्रवर्त्तक बना करता था । पूर्वोक्त छान्दोग्यवचनों का, तथा शङ्करमाध्य का यही तत्त्वसम्मत समन्वय हो सकता है । ब्रह्म - क्षेत्र के इस सहज समन्वय का अभिभत्र हुआ एकमात्र ब्राह्मण की लोकंषणा से हो । प्रचारैषणा में श्रामस्त बाह्मणवर्ग का ही सर्वप्रथम एक्लन हुआ । इस स्खलन के जो जो भीषण परिणाम राष्ट्र को भोगने पड़े, एवं पड़ रहे हैं, स्पष्टतम है । वर्त्तमान सभी झञ्झावातों की उपशान्ति का एकमात्र निदान है अभिभूता ब्रह्मप्रज्ञा का जागरण | यह तभी सम्भव है, बबकि ब्रह्मप्रज्ञा प्रचार - प्रसारादि समस्त लोगों का हि बुकियत् परित्याग कर अन्यन्यनिष्ठा से गुहा निहित बन कर न्यूनतम एक शताब्दिपर्यन्त गुहानिहित - व्रतमाध्यम से तत्त्वचिन्तन - वेदस्वाध्याय में प्रवृत्त हो पड़े । इसी मङ्गलकामना के साथ प्रस्तुत स्तम्भ इस निष्कर्ष पर उपरत हो रहा है कि, " औपनियद - ज्ञान हो, अथवा आरण्यकोपासना, विधिभागात्मक कर्म्माड हो, अथवा तो मन्त्रसंहितात्मक तत्त्ववाद, सम्पूर्ण वेदशास्त्र की प्रथम प्रवृत्ति का मूल य ब्रह्मर्षिवर्ग को ही प्राप्त है " । वेद और ब्राह्मण का परसर आत्म - शरीर सम्बन्ध है । जिस
- वैश्य - शूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् ।
तो हि च्युतौं स्वकर्म्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ॥
-मनुः ८ | ४१८ | ४२८
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तृतीयखण्ड प्रकार शब्द और अर्थ का उत्पत्तिसृष्ट ( सहज - नित्य ) सम्बन्ध है, एवमेव वेदशास्त्र, और तत्प्रथम प्रवर्त्तक ब्राह्मण का उत्पत्तिसृष्ट सम्बन्ध ही है, जिस प्रथम प्रवर्त्त कत्त्वमूलक सहजसम्बन्ध का निम्न लिखित शब्दों में यशोगान हुआ है— - तत्सदिति निद्द शो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ॥
ब्राह्मणा - स्तेन वेदाश्च - यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ १ ॥ —गीता १७ । २३ ।
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य, क्षत्रियस्य च रक्षणम् ॥
वार्ता कम्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ॥२ ॥
-मनु २०5०1 उपनिषदिज्ञानमाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' औपनिषद - ज्ञानप्रवर्त्तके तिवृत्तदिग्दर्शन नामक सप्तम - स्तम्भ उपरत -61 -७ ४२६
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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' औपनिषद - ज्ञानप्रवर्त्तकेतिवृत्त दिग्दर्शन ' सप्तम - स्तम्भ उपरत 19 नामक