Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 61–70

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70

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तृतीयखण्ड अधिदैचतसंस्था में इस वाक्चतुष्टयी के चार विवर्त्त हैं । इन चारों विवतों को क्रमशः प्राजापत्या-वाकू, लोकत्राकू, व्याहृतिवाकू, ब्रह्मवाकू, इन नामों से व्यवहृत किया गया है, । जैसाकि परिलेख से स्पष्ट है-१ १ – सत्यावाकू ( स्वायम्भुवी ) - श्रुतिजननी २ – श्रम्भृणीवाक् ( पारमेष्ठिनी ) - ध्वनिजननी ३ - गौरिवीतावाक. ( सॉरी ) - - - स्त्ररजननी -- तदित्यमेकधा - ( प्राजापत्यवाक् चतुष्टयी ) । ४ – गायत्रीवाक ( पार्थिवी - वर्णजननी २ ३ ४ * १ - दिव्यवाक् — जागती - आदित्यानां प्रतिष्ठा २– आन्तरीक्ष्या -- त्रैष्टुभी – रुद्राणां प्रतिष्ठा ३ – पार्थिवी — — गायत्री - वसूनां प्रतिष्ठा * ४— पशत्र्यावाक् - श्रानुष्टुभी - पशूनां प्रतिष्ठा * १ – ओम् — अर्द्ध मात्रात्मिकावाक्- अमृता २ -- स्वः - --मात्रात्मिकाचाकू मर्त्या - भुवः - - - मात्रात्मिकावाक् मर्त्या ४ -- भूः-* - मात्रात्मिकावाक् मर्त्या 8 १ – श्रम् — — तुरीयमात्रा २ - सामानि - तृतीयमात्रा ३ - यजूंषि - - द्वितीयमात्रा ४ - ऋचः --- प्रथममात्रा - तदित्थं द्विधा ( लोकवाकूचतुष्टयी ) । - तदित्थं त्रिधा ( व्याहृतिवाक्चतुष्टयी ) - तदित्थं चतुर्द्धा ( ब्रह्मवाकूचतुष्टयी ) । ४३

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भाष्यभूमिका परिलेख से स्पष्ट है-अधियज्ञसंस्था में इस वाक् के दो निवर्त्त है, जैसाकि निम्नलिखित १ - मन्त्राणि १ - गाथा २- कल्याः ३ - ब्राह्मणानि २– कुम्या - तदित्य विवर्त्तद्वयी - यज्ञे । ३ - नाराशंसी ४ - सूत्राणि ४- रेंभिः * परिलेख से स्पष्ट है-श्रधिभूतसंस्था में इस बाक के दो विवस हैं, जैसा कि निम्नलिखित १- नाम - वर्ण ६ - श्वर २- प्रख्यात - तदित्थं विवर्त्तद्वयी - भूतप्रपच । ३ – उपसर्ग ३ – पद ४ - निपात ४ -त्राक्य * है— अघोतिहाससंस्था में इस वाकू का एक विवर्त्त है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट १ - सर्पाणां वाकू २- वयसां वाक् ३ — भुद्रसरीसृपाणांवाक्_ ४ – मनुष्याणां वाक् - सैपा वाक् चतुष्टयी निरुक्तमतानुगतावगन्तव्या । ७- ‘ गौरीर्मिमाय सलिलानि ' मन्त्र रहस्यार्थ -के अनेक अर्थ हो जाते हैं । इन इसप्रकार ' चत्त्वारि वाक् परिमिता पदानि ० ' इस अनुगममन्त्र प्रथमपक्ष में ' आम्भृणीसूक्त ' द्वारा सम्पूर्ण वाग्विवतों की मूलप्रतिष्ठा वही श्रम्भृणी वाकू है, जिस का बतलाया पूर्व के गया है कि, ' गौरी ' नाम की स्वाय-स्पष्टीकरण हुआ है । श्राम्भृणीवाकू का स्पष्टीकरण करते हुए यह आदि वाग्विवर्त जहाँ ' अपरावाकू ' नाम से भुवी सत्यावाक- का प्रथमावतार यह । श्राम्भृणी वाकू है । श्रम्भणी ४४

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तृतीयखण्ड प्रसिद्ध हैं, वहाँ गौरीवाक श्राकाशात्मिका बनती हुई आत्मकोटि में आकर ' परावाक ' कहलाई है, जैसाकि प्रकरणारम्भ में ही स्पष्ट कर दिया गया है । ' गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षती ' इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करते हुए गौरी- स्वायम्भुवी वाक् के द्वारा सम - विषम- अनन्तभेट से त्रेधा तक्षण बतलाया गया है । अत्र एक दूसरी दृष्टि से इस तक्षणकर्म्म का स्पष्टीकरण किया जाता है । श्रवधान के लिए मन्त्र यहां भी उद्धृत कर दिया जाता है-गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षती एकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी | अष्टपदी नवी भृषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥ स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, तीनों पदों ( पिएडों ) के पुन: पद ( महिमामण्डल - साममण्डल- माहस्रीमण्डल-वषट्कार ) क्रमशः परमाकाश, परमसमुद्र, परमाण्ड, नामों से प्रसिद्ध हैं । प्रज्वलित अङ्गार रक्त है, दग्धाङ्गार कृष्ण है, भूर्ति ( भस्म ) श्व ेत । तीनों साममण्डलों के ये ही रूप हैं I । सावित्राग्नियन सौर परमाण्ड रक्त है, ज्योतिरभावात्मक पारमेष्ठ्य परमसमुद्र कृष्ण हैं, एवं ज्ञानज्योतिर्धन स्वायम्भुव परमाकाश श्व ेत है । इसीलिए स्वायम्भुवी श्राकाशात्मिका वाकू को उक्त श्रुति ने ' गौरी श्वेता ( ) कहा है, जो कि गौरीवाक परम-वाक्, स्त्यावाक, ब्राह्मीवाक्, वेदवाकू, इत्यादि विविध नामों से व्यवहृत हुई है । अपने प्रातिस्थिक परमाकाश-लक्षण एक आयतन के सम्बन्ध से विशुद्धा गौरीवा एकपदी है । इस एकपदी गौरीवाक से ही - ' सोऽपोऽसृजत बाच एव लोकान, वागेव सासृज्यत ' इत्यादि वाजिश्रुति के अनुसार परमसमुद्ररूप परमेष्ठी का जन्म हुआ है 1 । यहाँ आकर इस वाक् के दो रूप हो जाते हैं । पारमेष्ठ्य ऋपतत्त्व के सम्बन्ध से वही ' श्राप्यावाक ' है, जिसे ' ग्राम्भणी ' कहा जाता है । एवं पारमेष्ठ्यसोम के सम्बन्ध से वही ‘ सौम्यावाक ' है, जिसे ' सरस्वती ' कहा जाता है । दोनों वाग्वाराएँ एक ही स्थान से विभिर्गत है । आम्भृणी - वाग्धारा अर्थप्रपञ्च की जननी बनती है एवं सरस्वती - वाग्धारा शब्दप्रपञ्च को जननी बनती है । दोनों का मूलसूत्र एक है, और यही शब्दार्थतादात्म्य का मोलिक रहस्य है । इसप्रकार पारमेष्टय समुद्र की जननी बनती हुई आप्य - सौम्य - श्रायतन भेद से एकपदी गौरी वाक् द्विपदी बन जाती है । आगे जाकर ग्राम्भणी वागूरूप में परिणत इसी गौरीवाक के आम्भृणी, सुब्रह्मण्या, बृहती, ग्रनुष्टप् ये चार विवर्स ' हो जाते हैं । ग्राम्भाणी का प्रधान श्रायतन परमेष्टी है, सुब्रह्मण्या का प्रधान आयतन चन्द्रमा है, बृहती का प्रधान आयतन सूर्य्य है, एवं अनुष्टुप् का प्रधान श्रायतन पृथिवी है । इसप्रकार परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन चार आवतनों के भेदसे वह द्विपदी चतुष्पदी बन जाती है । इन चारों के साथ क्रमशः प्राण - इन्द्र - वायु- अग्नि, इन देवताओं का सम्बन्ध है । ' आपोमयः प्राणः ' के अनुसार ग्रापोमयी ग्राम्भ गीवाकू प्राणात्मिका है । सोमतत्त्व ( श्रम्भः नामक ब्रह्मणस्पतिसोम ) भी यहीं प्रतिष्ठित है । अतएव इसे हम पोविधा, सोमविधा, प्राणविधा कहते हुए अन्ततः प्राणात्मिका कहेंगे । सौम्यावाक सुत्रह्मण्या है । चान्द्रसोम भावरसोम है । अन्तरिक्ष मे चन्द्रमा - वायु दोनों की सत्ता मानी गई है अतएव इसे हम सोमविधा, वायुविधा कहते हुए अन्ततः वाय्वात्मिका कहेंगे । सूर्य्यपिण्ड द्वादश आदित्य प्राणों की समष्टि है । साथ ही इस का मुख्य प्रारण इन्द्र ( ' मवा ' नामक दिव्य इन्द्र ) है । इन दोनों के सम्बन्ध से सौरी बृहतीवाक को श्रादित्यविधा, इन्द्रविधा कहते हुए अन्ततः इन्द्रात्मिका कहेंगे । ४५

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भाष्यभूमिका भूपिण्ड - ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा चौरिन्द्रेण गर्भिणी ' के अनुसार अग्निप्रधान है । अतएव पार्थिवी अनुष्टुपवाक को अग्न्यात्मिका कहा जायगा । इसप्रकार चारों वाग्विवर्त्तं प्राण - वायु - इन्द्र - अग्नि - से भुक्त मानें जायेंगे । १- पोविधा, २- सोमविधा, वायु विधावेयं सुब्रह्मण्यवाक् ३ - श्रादित्यक्धिा, इन्द्रविधा वेयं बृहतीवाकू सोमविघा, प्राणविधा वेयमाम्भृणीवाक् “ प्रारणः ” । ( स्वयम्भूः ) " वायु " । ( चन्द्रमाः ) “ इन्द्रः ” । ( सूर्य्यः ) ४- अग्निविधा – वेयं —— अनुष्टुवाक " अग्निः ” । ( पृथिवी ) वायुविधा सुब्रह्मण्यावाक का यद्यपि हमने लोकसंस्थान क्रम से चन्द्रमा से सम्बन्ध बतलाया है | परन्तु जब इसके मूलस्वरूप की दृष्टि से विचार किया जाता है, तो इसे भी पारमेष्ठिनी ही माना जायगा । पारमेष्ट्य शिववाय्वात्मक सौम्य वाक्तत्त्व ही ' सुब्रह्मण्या ' वाकू है । यही वाक् सप्तस्वरोत्पादिका है, यही सप्तश्रुति - मेद से श्रुत्यात्मिका है । इसी के मेद से पशु - पक्षी - मनुष्यादि की वाक विभिन्नरूप से प्रतीत होती है । आम्भृणीबागाधार पर प्रतिष्ठित वायुविधा इस सौम्या सुबहझण्या श्रुत्यात्मिका वाक् के आधार पर सौरी इन्द्रात्मिका बृहतीवाक् प्रतिष्ठित है । यही मक् स्वरात्मिका बनती हुई अपनी नौ चिन्दुओं के सम्बन्ध से ' बृहती ' कहलाई है । सूर्य्य जिस छन्द के केन्द्र में प्रतिष्ठित है, वह ' बृहतीच्छन्द ' है, जिसे ज्यौतिष में विष्वद्त्त कहा गया है! अक्षरविज्ञानानुसार बृहती नवाक्षरछन्द है । इसी नवाक्षरछन्दः सम्बन्ध से सौरीवाक नवन्द्वात्मिका बनती हुई ' नवपदी ' बन रही है । आरम्भ में नवपदी बनने की इच्छा रखती हुई ( बनती हुई— नवपदी भू-घती ) यही वाक सहस्ररश्मि - सम्बन्ध से ' सहस्राक्षरा ' बन जाती है । इसी सहस्राक्षरावाक के सम्बन्ध से सूर्य-देवता सहस्रांशु कहलाए हैं । सौरी वागात्मक स्वर नवविन्द्वात्मक कैसे है? इस प्रश्न का उत्तर पूर्व में ' स्पर्क टू ' उदाहरणद्वारा दिया जा चुका है । नवबिन्द्वात्मिका - इन्द्रात्मिका इस बृहतीवाक के आधार पर पार्थिवी श्राग्नेयी अनुष्टुप्वाक प्रतिष्ठित है । यही वाक " वर्णात्मिका है । स्वर यदि नवत्रिन्द्वात्मक है, तो वर्ण श्रष्टबिन्द्वात्मक है । अनुष्टुप छन्द क्योंकि अष्टाक्षर है, अतएव इस श्रष्टचिद्वात्मिका पार्थिवीवाक को अनुष्टुप् कहा जाता है । यही वाकू का ' अष्टापदी ' रूप है । इसप्रकार एक ही सत्यावाक ( गौरी - स्वायम्भुवी श्रव्याकृतावाक ) लोकायतनभेद से एकपदी— द्विपदी - चतुष्पदी - अष्टापदी - नवपदी बनती हुई सर्वत्र व्याप्त हो रही है । यही उस वाक का चतुर्द्धा व्याकरण ( विभक्तीकरण - व्याकृति ) है । चारों वाविवर्त्त ' उम अनादिनिधना - सत्या - स्वायम्भुवी- नित्या बाक के ही विवर्त हैं । एवं इस दृष्टि से यद्यपि चारों हीं वाग्विवत्तों को ' नित्य ' कहना चाहिए था । तथापि चारों में से जो चौथी पार्थिवी वर्णात्मिका अनुष्टुपवाक है, उसे नित्य नहीं माना जा सकता । कारण स्पष्ट है । वर्णात्मिका ( शब्दात्मिका ) वाक सांयोगिकी वाक ्म है । वाक समुद्र में वीचि उत्पन्न होती है, तत्काल शब्द उत्पन्न हो जाता है, साथ ही तत्क्षण विलीन भी हो जाता है । इस यौगिकभाव से, तथा उत्पन्न - प्रध्वस्त - मर्य्यादा से, उभयथा वर्णवाक का अनि-४६

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gateaus त्यत्त्व ही स्वीकार करना पड़ता है । तात्पर्य इस अनित्यता का यही है कि, इस वाक का जितना सा श्रोत्रप्राह्य-गुणात्मक धर्म्म है, वही अनित्य है । सत्या नित्यावाक के भक्ति सम्बन्ध से सम्बद्ध जो वाग्भाग है, वह तो इस-का भी नित्य ही भाग है । निष्कर्ष यह निकला कि मनःप्राणगर्भिता वाक् प्रत्येक दशा में नित्य है, वही आकाशात्मिका है, श्राकाशरूपा है । सम्पूर्ण भूत, सम्पूर्ण देवता. यत् किञ्च जगत्यां जगत्, इसी वागाकाश से उत्पन्न हुए हैं, इसी पर प्रतिष्ठित हैं, इसी में प्रतिसञ्चरावस्था में सबका विलयन है । ' आकाशो वै नामरूप-यो र्निर्वहिता ' के अनुसार यही वागाकाश नामरूपात्मक विश्वप्रपञ्च का सर्वेसर्वा है । वाग्देवी की इसी सर्वव्याप्ति का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है--वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, काचं गन्धर्वाः पशवो, मनुष्याः । " वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥ इस आकाशात्मिका वाक से उत्पन्न सम्पूर्ण विश्व वाङ्मय है । वाक से [ वाक के प्राप्यरूप आम्भृ-णीविवर्त ' से ] ही सम्पूर्ण अर्थ उत्पन्न हुए हैं, एवं वाक से ही [ वाक के सौम्यरूप सरस्वतीविवर्त्त से ही ] सम्पूर्ण शब्द उत्पन्न हुए हैं । यच्चयावत् अर्थ भी वाक् हैं, यच्चयावत् शब्द भी वाक हैं । इसप्रकार यद्यपि दोनों का वाङ्मयत्त्व - वागरूपत्व निर्विवाद है । तथापि जो वाक वागिन्द्रिय से उच्चारण का विषय बन है, एवं जो श्रोत्रेन्द्रिय से सुनी जाती है, उसे अर्थवाक से पृथक कर बतलाने के लिए, साथ ही उसके आक्रोशधर्म्म * को व्यक्त करने के लिए उसे ' शब्द ' नाम से व्यवहृत कर दिया जाता है । वाग्देवी के उक्त स्वरूप को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें जैमिनिसूत्रों की वैज्ञानिक व्याख्या करना है । बिना वाक के तात्त्विक स्वरूप परिचय के सूत्रार्थसङ्गति असम्भव थी, अतएव सूत्रव्याख्यान से पहिले वा का तात्त्विक स्वरूप बतलाना पड़ा । अत्र जैमिनिसूत्रों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । प्रक्रान्त प्रकरणानुवन्धी प्रथम सूत्र निम्मलिखित है-८वैज्ञानिक दृष्टि, और मीमांसा सूत्र-“ औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यति-कश्चार्थेऽनुपलब्धे तत् प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् ” । प्रश्न हमारे सामने यह है कि, शब्द और अर्थ का परस्पर क्या सम्बन्ध हैं? हमारी श्रोत्रेन्द्रिय के साथ जब भी कपिल - कणाद - गोतम - वसिष्ठादि शब्दों का सम्बन्ध होता है, तभी अव्यहितोत्तरकाल में इन शब्दों से पञ्चभूताकाराकारित कपिलादि व्यक्तियों का बोध हो जाता है । मानना पड़ेगा कि, इन शब्दों का ठन व्यक्तिरूप अर्थों के साथ अवश्य ही कोई ऐसा सम्बन्ध है, जिसके प्रभाव से इनके द्वारा उनका बोध होता जाता है । श्रासमहर्षियोंनें उस सम्बन्ध का अन्वेषण किया । अन्त में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शब्द-और अर्थ का परस्पर औत्पत्तिक सम्बन्ध है । जो सम्बन्ध सहोत्पन्न - एकद्र व्योत्पन्न शरीरावयवों का है, वही सम्बन्ध शब्दार्थ का है । दोनों का उपादान एक ही वाग्ब्रह्म है । एक ही बाग्ब्रह्म एक ही समय में एक * ' शप ' आक्रोशे । शपम् - आक्रोशं ददाति - इति शब्दः । ४७

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भाष्यभूमिका ही साथ एक ही क्षेत्र में अर्थ, तथा शब्द, दोनों धाराओं का उद्गम हुआ है । अर्थ स्वतन्त्ररूप से किसी अन्य तत्त्व से ग्रन्य क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो, एवं शब्द स्वतन्त्ररूप से किसी अन्य तत्त्व से अन्य क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो, और पीछे से विद्वानों ने अपनी सुविधा के अनुसार तत्तच्छदों के साथ तत्तदर्थों के सम्बन्ध की कल्पना कर ली हो, ऐसा नहीं है । उस दशा में तो इस सम्बन्ध को हम श्रौत्पत्तिक ( उत्पत्तिसृष्ट ) न कह कर उत्पन्नसृष्ट सम्बन्ध ही कहते । स्पष्ट किया जा चुका है कि, स्वायम्भुव वाग्वझ ही पारमेष्ठिनी वागुरूप में परिणत होकर शब्दार्थ का जनक बन रहा है । गौरीवाक से श्राप्यावाक का उदय हुआ है । यह अप्तत्त्व ही घन - तरल - बिरलावस्था भेद से ग्राप: - वायुः सोमः रूप में परिणत हो रहा है । श्राप्यभाग आप्या श्रम्भृणी वाक है, सौम्याभाग सौम्या सरस्वती वाक ्म है । मध्यस्थ वायु का दोनों से सम्बन्ध है । वायु की प्रेरणा से ब्राम्हणी वाक अर्थजननी बन रही है, इसी वायुप्रेरणा से सरस्वती वाक् शब्दजननी बन रही है । दोनों एक ही परमेष्ठी क्षेत्र में एक ही तत्व से उत्पन्न होते हुए परस्पर अविनाभूत हैं । दोनों का क्योंकि औत्पत्तिक सम्बन्ध है, अतएव बो विवर्त्त अर्थ ब्रह्म के हैं, वे ही विवर्त शब्दब्रह्म के हैं । अर्थलक्षण परब्रह्म के अव्यय - अक्षर - क्षर भेद से तीन विवर्त्त हैं, तो शब्दब्रह्म के भी स्फोट - स्वर - वर्ण भेद से तीन विवर्त हैं । अर्थब्रह्म के अक्षर विव की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम नाम की पांच कलाएँ हैं, तो शब्दब्रह्म के स्वविचर्त की भी -इ - उ - ऋ-ल नाम की पांच हीं कलाएँ हैं । शब्दब्रह्म के ज्ञान से अर्थब्रह्म गतार्थ है, अर्थब्रह्म के ज्ञान से शब्द ब्रझ गतार्थ है । इसी तादात्म्यभाव का स्पष्टीकरण करते हुए उपनिषच्छ्र ुति ने कहा है— द्व े

वाव त्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म परं च यत् ।

शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

क्योंकि से उसी वाक शब्द, अर्थ दोनों उत्पन्न हुए हैं, अतएव कभी दोनों एक दूसरे के बिना उपलब्ध नहीं होते । शब्दार्थ का यह पारस्परिक सम्बन्ध उपादानैक्य - दृष्टि से औत्पत्तिक बनता हुआ सर्वथा नित्य ही माना जायगा । दोनों का मूल क्योंकि एक ही वाक्तत्त्व है, यही कारण है कि, सम्पूर्ण शब्दों से सब अर्थ उत्पन्न किए जा सकते हैं, एवं सम्पूर्ण अर्थों से सम्पूर्ण शब्द उत्पन्न किए जा सकते हैं । घट - पट -वस्त्रादि जितने भी अर्थ हैं, उनके पारस्परिक संयोग - विभाग से शब्दोत्पत्ति प्रत्यक्ष दृष्ट है । श्राकाश में अनाहतनादात्मक शब्द विद्यमान है, वायु में सनसनाहटरूप शब्द विद्यमान है, अग्नि में धक् धक् रूप शब्द विद्यमान है, नल में कल - कल शब्द विद्यमान है, पृथिवी में संयोगविभागव्यापारजनित शब्द विद्यमान है । विश्वस्त्ररूपसम्पादक पांचों महाभूत ( अर्थ ) शब्दमय बनते हुए न ह्यशब्दमित्रास्ति ' को चरितार्थ कर रहे हैं । इसीप्रकार निगमागमोका प्रयोगों में पठित ततच्छदों से उत्पन्न तत्तदर्थों का दृष्टि से साक्षात्कार किया जा सकता है । ' शब्द से अर्थोत्पत्ति, अर्थ से शब्दोत्पति ' इस दृष्टि से भी हम दोनों का औत्पत्तिक सम्बन्ध मानने के लिए तय्यार है । इकप्रकार समानोपादाननिमित्त से, तथा पारस्परिक कार्य-कारण दृष्टि से दोनों का श्रोत्पतिक सम्बन्ध ही व्यक्त हो रहा है । विश्वप्रपञ्चको ' नाम - रूप - कर्म्म ' भेद से तीन विवर्तों में विभक्त किया जा सकता है । नामरूप-कम्र्मात्मक इस विश्व का आत्मा कौन है, इसका उत्तर है - मनः प्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षीब्रह्म । ' यस्य यदुक्थं ४८

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तृतीयखण्ड सत्, ब्रह्म सत् साम स्यात् स तस्यात्मा ' इस लक्षण के अनुसार जो तत्त्व जिस वस्तु का उक्थ ( उपादान-रूप प्रभव ) होता है, ब्रह्म ( प्रतिष्ठास्थान ) होता है, तथा साम ( उत्पन्न वस्तुमात्र में समान, एवं विलयन-स्थान ) होता है, वही तत्त्व उस वस्तु का आत्मा कहलाया है । जितनें भी रूप हैं, सबका प्रभव मन है, उत्पन्न रूप मन पर ही प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं परस्पर सर्वथा विभिन्न रूपों के लिए मन समान है, अतएव रूपों का उक्थ - ब्रह्म - साम बनता हुआ मन रूपों का ग्रात्मा है । जितनें भी कम हैं, सबका प्रभव प्राण है, उत्पन्न कर्म्म प्रारण पर ही प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं परस्पर सर्वथा विभिन्न कम्मों के लिए प्राण समान है, अतएव कर्म्मो का उक्थ - ब्रह्म – साम बनता हुआ प्राण कम्मों का श्रात्मा है । एवमेव जितनें भी नाम हैं, सबका प्रभव बाकू है, उत्पन्न नाम बाकू पर ही प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं परम्पर सर्वथा विभिन्न नामों के लिए सकू समान है, अतएव नामों का उक्थ ब्रह्म - साम बनता हुआ । वाक तत्त्व नामों का आत्मा है । एक ही ग्रात्मा के मनः- प्राण- वाक् ये तीन विवर्त्त हैं । मनः- प्राण - वाक, तीनों की समष्टि एक आत्मा है । आत्मतत्त्व के इसी त्रिपुटीभाव का स्पष्टीकरण करनी हुई वाजिश्रुति कहती है-त्रयं बाऽइदं नाम, रूपं, कर्म्म । तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थम्, अतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्त्रि, एतदेषां साम, एतद्धि सर्वैर्नामभिः समं एतदेषां ब्रह्म, एतद्धि सर्वाणि नामानि विभर्त्ति । ( १ ) । तदेतत् त्र्यं सन्देकमयमात्मा, आत्मा उ एकः सन्नतत् त्रयम् ” ( शत ० ना ० १४।४।५ ) । उक्त श्रात्मप्रतिपत्ति से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, शब्दात्मक नामप्रपञ्च का ग्रात्मा वाकू-तत्त्व ही है । एक ही ग्रात्मवाक से जहां घटपटादि सम्पूर्ण अर्थ उत्पन्न हुए हैं, एवमेव उसी श्रात्मवाक् से घटपटादि सम्पूर्ण शब्द उत्पन्न हुए हैं । फलतः वागुत्पन्न यच्चयावत् अथों, तथा शब्दों का परस्पर नित्य-सम्बन्ध भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । यही कारण है कि, सत्र शब्द सत्र थों के परिचायक बन सकते है । यह विश्वास करने की बात है कि, जिस घट शब्द को ग्राज हमनें व्यावहारिक जगत् में केवल कम्बुग्रीवादिमत्-घट नामक विशेष पदार्थ का संग्राहक मान रक्खा है, वह घट शब्द पट- तन्तु - सूत्र - पृथिवी - जल - तेज - वायु आदि - आदि यच्चयावत् पदार्थों का वाचक बन रहा है । कारण यही है कि ' घट ' शब्द जिस वाक तत्त्र से उत्पन्न हुआ है, एवं घट अर्थ जिस वाक तत्त्व से उत्पन्न हुआ है, उसी वाकृतस्व से इतर गत्र श्रर्थ उत्पन्न हुए हैं । इसी वाक के सम्बन्ध से घटशब्दात्मिका वाक इतर सत्र अर्थात्मिका वाक ू के संग्रह में समर्थ है । यह तो हमें व्यवहारसौकर्य के लिए वृद्धों ने सिखा रक्खा है कि, इसे घट ही कहा करो, इसे पर ही । यदि श्रारम्भ में घोड़े को हाथी शब्द से, तथा हाथी को बोड़े शब्द से व्यवहार करने का सङ्केत कर दिया जाता, तो निश्चयेन श्राज हम घोड़े को हाथी कह कर, एवं हाथी को घोड़ा कह कर पुकारते । राइम, अक्षत, तन्दुल, चावल, ग्राखा, आदि शब्द पृथक - पृथक हैं । परन्तु इसी श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध से सब समानार्थ के ग्राहक बन रहे हैं । इसी सर्वता के आधार पर वैज्ञानिकों का ' ब्रह्मविद्यया ह वै सर्वं भविष्यन्तो मन्यन्ते ' यह भिद्धान्त स्थापित हु जिसे हम मनुष्य कहते हैं, उसकी उत्पत्ति भी उसी वाक तत्त्व से हुई है । जिसे हम अश्व कहते हैं, उसकी उत्पत्ति भी उसी वाक ्मतत्त्व से हुई है । वागा धारपर प्रतिष्ठित वाङ्मय सब प्राणविशेष सर्वत्र हैं । जो ४६

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माय भूमिका वाङ्मय विशेष जिसमें अधिक रहता है, उसका स्वरूपसंघठन तदनुरूप बन जाता है । फलतः सद्वादन्याय से वह उसी नाम से व्यवहृत होने लगता है । यदि एक प्राणविज्ञानवित् विद्वान् मनुष्य में से मानवप्राण का अभिभव करता हुआ उडी में पहिले से ही प्रतिष्ठित अश्वप्राण को विकसित कर देता है, तो मनुष्य श्रश्वाकार में परिणत हो सकता है । सत्र मात्राएँ गौण - प्रधान रूप से सबमें प्रतिष्ठित हैं । अतएव सत्र सत्र शब्दों से गृहीत हैं । एवं यही - ' सर्वे सर्वार्थवाचका दाती - पुत्रस्य पाणिनेः ' का मौलिक रहस्य है । शब्दार्थ के इसी सहजसिद्ध - नित्य श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध का दिगदर्शन कराते हुए सूत्रकार ने कहा है-" प्रोत्पत्तिकस्तु शब्दस्थार्थेन सम्बन्धः ” शब्द का अर्थ के साथ जो श्रौत्पतिक सम्बन्ध है, वह श्रतीन्द्रिय है । यही कारण है कि, बिना उपदेश के श्रस्मादादि सामान्य व्यक्तियों को नित्य विद्यमान भी उस सम्बन्ध का तत्रतक परिशान नहीं होता, जबतक कि उपदेष्टा उस सम्बन्ध का परिचय न करा दे । केवल सम्बन्ध ही बोध का कारण नहीं है, अपितु सम्बन्ध का ज्ञान हो प्रतिपतिका कारण माना गया है । ' एकसम्बन्धिज्ञानम परसम्बन्धिनः स्मारकं भवति ' इस न्याय के अनुसार सम्बन्धपरिज्ञानलक्षणज्ञान ही वाचक शब्द से ज्ञेय ज्ञान का परिचायक बना करता है | जबतक यह सम्बन्धज्ञान नही हो जाता, तबतक ' गवादिशब्द घटादि पदार्थों के बोधक हैं ' यह परिज्ञान नहीं होता । तात्पर्य्यं कहने का यह है कि, श्रौत्यत्तिक सम्बन्ध से सच शब्द सत्र अर्थों के बोधक हैं, फलतः गवादि शब्द घटादि के भी बोधक हैं, इस प्रकार के नित्य सम्बन्ध का ज्ञान उन शास्त्रद्रष्टा महर्षियों के उपदेश पर निर्भर है, जिन्होंनें अपनी दृष्टि से उस अतीन्द्रिय सम्बन्ध का साक्षात्कार कर शब्दो-पदेश के द्वारा हमें बोध कराया है । उन श्राप्तपुरुषों ने जहाँ हमें इस अतीन्द्रिय सम्बन्ध का ज्ञान कराया, वहाँ साथ ही लोकव्यवहार की सुविधा के लिए यह भी नियम बनाना आवश्यक समझा कि, यद्यपि तत्त्वतः औत्पत्तिक सम्बन्ध से सभी शब्द सभी अर्थों के वाचक हैं, तथापि व्यवहार - सञ्चालन के लिए अमुक शब्द को श्रमुक नियत अर्थ का ही वाचक मानना चाहिए । यही न्यायशास्त्र का सुप्रसिद्ध ' संकेत ' पदार्थ है । इस संकेत का मूल रहस्य वही ' तद्वादन्याय ' है, जिसका पूर्व में स्पष्टीकरण कर दिया गया है । औत्पतिक सम्बन्ध के इसी ज्ञान का हेतु बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-“ तस्य ज्ञानमुपदेशः " । जब तक हमें न तो यही बोध है कि, सब सब्द सत्र अर्थों के वाचक हैं, साथ ही न यही बोध है कि, व्यवहार में अमुक शब्द से अमुक अर्थ का ग्रहण होता है, तबतक घटपटादि शब्दों से हमारे ज्ञानीय धरातल में घटपटादि अर्थों की उपलब्धि नहीं होसकती । परन्तु जब सम्बन्धज्ञान हो जाता है, तो उस दशा में उस शब्द से श्रोतप्रोत सा वह अर्थ तत्काल उपस्थित होजाता है । जब हमें यह विदित है कि, गौ शब्द का गौ अर्थ के साथ ौत्पतिक सम्बन्ध है, तो उस दशामें वक्ताके मुख से गौशब्द निकलते हो उसे सुन कर सामने गौन्धक्ति के उपस्थित न रहने पर भी तत्क्षण गौव्यक्ति पर बुद्धि पहुँच जाती है । गौशब्द के श्रवणमात्र से गौ अर्थ पर बुद्धि का चला जाना तभी सम्भव हो सकता है, जब कि दोनों का नित्य सम्बन्ध हो । इसी अर्थोपलब्धि का स्पष्टी-करण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— “ श्रव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे " ( इति पश्यामि ) ५०

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तृतीयखण्ड ' तस्य ज्ञानमुपदेशः ' - ' अव्यतिरे कश्चार्थे ऽनुपलब्धे ' इस प्रकार विभाग करने पर सूत्र का उक्त अर्थ होता है । इन दोनों का ' तस्य ज्ञानम् ' - ' उपदेशोऽव्यतिरेकञ्श्चर्थे ऽनुपलब्धे ' यह विभाग मानते हुए भी अर्थसमन्वय किया जासकता है । पूर्वकथनानुसार यद्यपि तत्त्वतः शब्दार्थ का ज्ञान अपेक्षित है - ‘ तस्य ज्ञानं ' ( अपेक्ष्यते ) । जत्र सम्बन्धज्ञान का उपदेश हो जाता है, तो इस उपदेश के अव्यवहितोत्तरकाल में हीं अनुपलब्ध अर्थ ( सामने न रहने वाले अर्थ ) की ओर बुद्धि दौड़ पड़ती है-- ' उपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थे ऽनुपलब्धे ' । भगवान् वेदव्यास, भगवान् श्रीराम कृष्णादि अवतारपुरुष आज हमें भौतिक शरीररूप में सर्वथा-अनुपलब्ध हैं । परन्तु व्यास - राम कृष्णादि शब्दों के साथ रहने वाले उन अथों के नित्यसम्बन्ध का हमें परिज्ञान है, अतएव इन नामों के सुनते ही उन के स्वरूपों पर हमारी बुद्धि चली जाती है * । अथवा — ' तस्य ज्ञानसुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे ' को एक भक्ति मानते हुए भी सूत्रार्थ का समन्वय किया जासकता है । अमुक शब्द अमुक अर्थ का बोधक है, किंवा शब्द अर्थ का बोधक है, शब्दार्थ का श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध है, एवंविध अर्थज्ञान शब्दोपदेशाकाराकारित ही माना जायगा । उपदेशकाल में ही अर्थज्ञान हो जाता है । इस ज्ञान से अनुपलब्ध भी अर्थ के सम्बन्ध में अर्थज्ञान का व्यतिरेक ( ग्रहण ) देखा जाता है । यही इस विषय में दृढ़ प्रमाण है कि, शब्दार्थ का परस्पर यौत्पत्तिक सम्बन्ध है । अत्र इस सम्बन्ध में यह जिज्ञासा बनी रह जाती है कि, शब्दोपदेश को प्रमाण किस आधार पर माना नाय । प्राचीनों नें कह दिया कि, शब्दार्थ का औत्पत्तिक सम्बन्ध है, क्या एकमात्र इसी आधार पर हम इस उपदेश को प्रमाण मान लें । ओमित्येतत् । प्रमाण प्राप्त अनाप्त भेद से दो भागों में विभक्त है । सामान्य मनुष्यों का वचनप्रमाण अनाप्त प्रमाण है । अतीन्द्रियार्थद्रष्टा महर्षियों का वचनप्रमाण श्राप्तप्रमाण है । और यह प्रमाण किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा न रखता हुआ असंदिग्ध स्वतः प्रमाण है । श्राप्तमहर्षियों नें अपनी अतीन्द्रिय दृष्टि से जिस सम्बन्ध का साक्षात्कार किया, उन की वह प्रत्यक्ष प्रमाणात्मिका दृष्टि ही हमारे लिए प्रत्यक्षप्रमाणस्थानीया श्रुति है । श्रुति उन श्राप्त पुरुषों की दृष्टि है । वह एकान्तत: निर्भ्रान्त है, जैसाकि ' श्रुतिशब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एकदृष्टि ' नामक प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । श्रौत प्रमाण निर्भ्रान्त प्रमाण है । ऐसे शब्दोपदेश प्रमाण पर कोई आपत्ति नहीं उठाई जासकती । लोक में भी तो लौकिक अर्थों के पूर्ण परीक्षक लौकिक पुरुष का शब्दोपदेश ही ततल्लौकिक विषयों में अनपेक्षप्रमाण माना जाता है । इसप्रकार शास्त्रीय अलौकिक ग्रंथों के सम्बन्ध में अवश्य ही श्रति को प्रमाण माना जायगा । स्मृतिशब्द भी प्रमाण मानेंौं जायँगे, परन्तु श्रुतिसापेक्षता सुव्यवस्थित रहेंगी । यह ठीक है कि, स्मृति-शब्दों, तथा निबन्धशब्दों के उपदेश से भी शब्दार्थसम्बन्ध का बिना किसी प्रतिबन्धक के परिज्ञान हो जाता है । तथापि श्रुतिसापेक्ष होने से इस उपदेश को स्वतः प्रमाण नहीं माना जासकता । हाँ परतः प्रामाण्य इन शब्दों का भी प्रत्येक दशा में सुरक्षित है । निरपेक्ष - श्रुति - शब्दात्मक इसी उपदेशप्रामाण्य का स्पष्टीकरण करते ने कहा है-' हुए सूत्रकार " तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षच्चात् " । * “ शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः " ( योगदर्शन १।६ । ) ५१

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माष्यभूमिका सूत्र निष्कर्ष यह निकला कि, वाक नित्य है । इस नित्याचाकू से उत्पन्न शब्दार्थ का सम्बन्ध भी

नित्य, तथा औत्पत्तिक है । साथ हो नित्यसम्बन्धावच्छिन्न शब्द भी नित्य है ।

( इति प्रथमसूत्रसङ्गतिः ) ॥१ ॥

इसप्रकार ' औत्पत्तिकस्तु ' इत्यादि सूत्र से सूत्रकार ने शब्दार्थ का श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध बतलाते हुए सिद्धान्ततः शब्दों का नित्यत्व स्थापित किया । आगे जाकर - १० – कम्मैके तत्र दर्शनात् ' २ - ' श्रस्थानात ' ३ - करोति शब्दात् ', ४ - ‘ सत्त्वान्तरे च यौगपद्यात् ' ५ - ' प्रकृतिषिकृत्योश्च ', ६ – वृद्धिश्च कर्तृ भूम्ना S स्य ' इन ६ सूत्रों से परपक्ष ( शब्दानित्यत्व ) का उद्घाटन करते हुए - १ - ' सभे तु तत्र दर्शनम् ' २ - ' सतः परमदर्शनम् ', ३ – ' प्रयोगस्य परम् ', ४ - आदित्यवद्यौगपद्यम् ', ५- ' वर्णान्तरमत्रिकारः ', ६ – ' नादवृद्धि-परा ' इन ६ सूत्रों से परपक्षीद्वारा शब्दों की अनित्यता सिद्ध करने वाले ६ कारणों का क्रमशः निराकरण किया । अन्ततः १ – ‘ नित्यस्तु स्यात्, दर्शनस्य परार्थत्वात् ', २ - ' सर्वत्र यौगपद्यात् ', ३ – ' संख्याभावात् ', ४ – ' अनपेक्षत्त्वात् ', ५- ' प्रख्या भावाच्च योगस्य ', ६ - ' लिङ्गदर्शनाच ', इन ६ सूत्रों से प्रथम सूत्रद्वा प्रतिनादित स्वसिद्धान्तलक्षण शब्द - नित्त्यत्व का समर्थन किया । परपक्षोद्घाटन ' कम्मैके तत्र दर्शनात् ', इत्यादि ६ सूत्रों की, परपक्षनिराकरणात्मक ' समं तु तत्र दर्शनम् ' इत्यादि ६ सूत्रों की, एवं स्वपक्ष समर्थनात्मकु ' नित्यस्तु स्यात् ० ' इत्यादि ६ सूत्रों की, सम्भूव इन १८ सूत्रों की व्याख्या पूर्व परिच्छेद में की जाचुकी है । उस व्याख्या का दार्शनिकभाव से केवल इसी दृष्टि से सम्बन्ध है कि, व्याख्याताओं ने सूत्रकार के नित्यशब्द-वाद से प्रयोगलक्षण शब्द का ग्रहण करते हुए ही शब्दनित्यता का समर्थन करने का प्रयास किया है, जोकि सूत्रकार के अभिप्राय से सर्वथा विपरीत है । यदि शब्दनित्यता से वागू लक्षण नित्य शब्द अभिप्रेत है, तो पूर्वपरिच्छेदानुगता श्रष्टादश - सूत्रव्याख्या वैज्ञानिक व्याख्या मानी जायगी । केवल इसी संशोधन से इन १८ सूत्रों की वैज्ञानिक व्याख्या क्योंकि गतार्थ बन रही है, श्रतएव उसका इस वैज्ञानिक परिच्छेद में विवेचन करना हमनें निष्प्रयोजन समझा है । इस सम्बन्ध में केवल इसी प्रश्न को मीमांसा कर लेना पर्याप्त होगा कि, महासन्दर्भ के साथ शब्दार्थ का औत्पत्तिक सम्बन्ध बतलाते हुए सूत्रकार ने जिन शब्दों को नित्य बतलाया है, शब्द कौन से हैं? | प्राचीनों की दृष्टि में तो नित्यशब्द से वे ही शब्द गृहीत हैं, जिनका हम अपनी वागिन्द्रिय से व्यवहार में प्रयोग किया करते हैं । वेदग्रन्थों का क्योंकि इन प्रयोगात्मक शब्दों से सम्बन्ध है, दूसरे शब्दों में वेदग्रन्थ प्रयोगशब्दात्मक हैं, एवं प्रयोगशब्द क्योंकि नित्य सिद्ध है अतएव प्रयोगशब्दसंघातलक्षरप वेदग्रन्थ अवश्य ही नित्यकूटस्थ, तथा अपौरुषेय हैं । इसप्रकार जैमिनि सूत्रों के द्वारा प्रतिपादित शब्दनित्यता से प्रयोगशब्दों का ग्रहण करते हुए प्राचीनों ने प्रयोगशब्दात्मक वेदग्रन्थों की नित्यता, तथा अपौरुषेयता सिद्ध करने का वृथा प्रयास किया है, जबकि वाकू लक्षण शब्दों के नित्य रहने पर भी प्रयोगलक्षण शब्द सर्वथा अनित्य हैं | इस सम्बन्ध में निम्न लिखित शब्दमीमांसा पर विशेषरूप से लक्ष्य देना चाहिए । ८- शब्दनित्यानित्यत्वमीमांसा -नित्यवाक से प्रादुर्भूत अर्थ - तथा शब्द, दोनों हीं वाङ्मय हैं, वागूरूप हैं । फलतः शब्दप्रपञ्च को भी हम ‘ वाक ' नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । यह शब्दात्मिक वाक्, किंवा वागात्मक शब्द ' चत्वारि वाक् ५२