Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 71–80
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80
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तृतीयखण्ड परिमिता पढ़ानि ० ' इत्यादि पूर्वप्रतिपादित अनुगममन्त्र के अनुसार “ वाकू - शब्द, ध्वनिः शब्द, नादृशब्द, प्रयोगशब्द " भेदसे चार भागों में विभक्त माना गया है । ( १ ) - ' शब्द करो, शब्द न करो ' ( शब्दं कुरु मा शब्दं कार्षीः ) इत्याकारक शब्द प्रयोगभावात्मक बनता हुआ प्रयोगलक्षण शब्द है । साथ ही ' अग्निर्वाग भूत्त्वा मुखं प्राविशत ' - ' मनः कावाग्निमाहन्ति ० ' इत्यादि श्रुति - मृति के अनुसार यह प्रयोगलक्षण शब्द ' आग्नेय ' है । · ( २ ) - निर्गतिलक्षण वायव्य शब्द ' नादशब्द ' है । हमारे मुख से ( वागिन्द्रिय से ) विनिर्गत शब्द ही नादशब्द माना जायगा, जिस की मूलप्रतिष्ठा वायवीयसंयोगविभाग मानें गए हैं । तात्पर्य्य कहने का यही है कि, जिसप्रकार श्राकाशप्रदेश में इतस्ततः संचार करने वाला वायु अपने धरातल पर पुष्पादि गन्धमात्राओं का वहन करता हुआ । इन्हें इतस्ततः ले जाया करता है, एवमेव यही सदागतिधर्म्मा वायु शब्दमात्रा का वहन करता हुआ । शब्दों को इतस्ततः ले जाया करता है । शब्दवक्ता की वागिन्द्रिय से आरम्भ कर शब्द श्रोता की श्रोत्रेन्द्रिय पर्य्यन्त शब्दका वीचिन्याय से व्याप्त होना इसी वायु का अनुग्रह है । इस उरु अन्तरिक्ष में सर्वत्र वाक समुद्र भरा हुआ है । यह वाक तत्त्व आकाशात्मक है, जैसा कि पूर्व में विस्तार से स्पष्ट किया जाचुका है । ' बागिन्द्र: ' के अनुसार यह आकाशात्मिका वाक ' शुन ' नामक व्यापक इन्द्र से भिन्न है । शुन - इन्द्र के कारण ही अवकाशात्मक प्रदेश को ' शून्य ' कहा जाता है । ' नेन्द्राने पत्रते धाम किचन ' ( ऋक्रसं ०६ ६ ६ ६ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार इस वागूरूप ( आकाशात्मक ) इन्द्र से कोई भी प्रदेश वञ्चित नहीं है । ' इन्द्रतुरीया महा गृह्यन्ते ' इस निगम के अनुसार इन्द्र में एक चतुर्थांश वायुतत्त्व प्रतिष्ठित रहता है । जहीं वायु है, वहाँ इन्द्र है । जहाँ इन्द्र है, वहाँ वायु है । जहाँ वायु नहीं रहता, वहाँ का श्राकाशप्रदेश ( इन्द्रतत्त्व ) इन्द्रविरोधी वारुण प्राण से युक्त हो जाता है । पाशधर्म्मावच्छिन्न वारुण प्रारण से दम घुटने लगता है, जैसा कि - ' यद्वै वातो नाभियाति, तन सर्व वरुणदैवत्यम् ' इत्यादि निगम से स्पष्ट है । ' खुली हवा - खुला आकाश ' जीवनके आनन्द का मुख्य कारण है । क्योंकि श्राकाशात्मक इन्द्र ही हमारा आत्मा है । अतएव श्राकाश को आनन्द माना गया है, जैसा कि—- ' को ह्ये वान्यात, कः प्राख्यात्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात ' इत्यादि उपनिषच्छ्रति से प्रमाणित है । तात्पर्य्यं यह हुआ कि इन्द्रात्मिका वाक् ( आकाश ), और प्राणात्मक वायु, दोनों विनाभूत हैं । ‘ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्? ( गीता ६।६ । ) हत्यादि स्मार्त्ती उपनिषत् भी इसी स्थिति का दिगदर्शन करा रही है । वाक्समुद्र के आधार पर प्रतिष्ठित यह वायु ही शब्द का जनक बनता है, जैसाकि ' वायुः खान, शब्दस्तत् ' इत्यादि प्रातिशाख्य सिद्धान्त से स्पष्ट । वक्त की वागिन्द्रिय का संयोग - विभागात्मक आघातरूप व्यापार होता है । इस श्राघातप्रक्रिया के अनुरूप वायु में संयोग - विभाग उत्पन्न होते हैं । इन संयोग - विभागों से वाक समुद्र में उत्तरोत्तर बीचियाँ उत्पन्न होतीं हैं । इस वीचियों के नैरन्तर्थ्य से उत्पन्न वायवीय संयोग - विभाग श्रोता की कर्णशष्कुली पर आघात करते हैं । श्राघातजनक यह वायवीय संयोगविभाग ही ' नाद ' है । संयोग-विभागात्मक नादाघात से श्रोत्रेन्द्रिय में शब्दश्रुति का अनुभव होता है । यह शब्द नादनिबन्धन बनता हुआ ' वायव्यशब्द ' ही माना गया है । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिए कि, प्रयोगलक्षण शब्द जहाँ ' आग्नेय ' हैं, वहाँ नादलक्षण शब्द ' वायव्य ' हैं । वागिन्द्रिय से बोला गया शब्द ' आग्नेय ' है, ओत्रेन्द्रिय से मुना गया शब्द ' वायव्य ' है । यही वाक् का दूसरा विवर्त है ॥ २ ॥
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भाष्यभूमिका ( ३ ) - तीसरा विवर्त्त ' ' ध्वन्यात्मक शब्द ' का है । क - च - ट - त- पादिलक्षण ऐन्द्रशब्द ' ध्वनि शब्द ' है । श्रोत्रेन्द्रिय में नादरूप से प्रविष्ट शब्द क - च - ट - त- पादिरूप से विभक्ताववत्र बनता हुआ प्रतीत होता है । ५०, किंवा ६४ वर्णविभक्तियाँ ध्वन्यात्मिका मानी गई है । एक ही शब्द स्पर्शोष्मा के तारतम्य से इन ध्वनियों के कारण५०,, किंवा ६० विभक्तियों में परिणत हो जाता है, जैसाकि निम्नलिखित ऐतरेयश्रुति से प्रमाणित है--यो ौ तां वेद, यस्या एष विकारः स सम्प्रतिवित् । यकारो नै सर्वा वाक् । मैषा स्पर्शोष्म मिर्व्यज्यमाना बही नानारूपा भवति ( ऐतरेय आरण्यक २।३।६ । ) ॥ at निमित्त अर्थात्मिका विभक्तियों का है, वही निमित्त शब्दात्मिका विभक्तियों का है । अर्थात्मिका विभक्ति में ' अग्नि- सोम ' तत्त्वों का व्यापार निमित्त है, एवं यह व्यापार तेजः - स्नेह भेद से दो भागों में त्रिभक्त है । तेजोलक्षण ग्रग्नि विकासधम्र्म्मा है, स्नेहलक्षण सोम संकोचधर्म्मा है । संकोच -विकास- लक्षा सम्बन्ध के तारतम्य से हौ अन्ति सोम के समन्वय से अर्थविभक्तियों का विकास हुआ है । वही नियम शब्द-विभक्तियों में है । अग्निव्यापार ' ऊष्मा ' है, सोमव्यापार ' स्पर्श ' है । ऊष्मा विकास है, स्पर्श संकोच है । एक ही ‘ अकार ' शब्द स्थानादि के स्पर्शलक्षण सोमव्यापार, तथा ऊष्मा - लक्षण श्रग्निव्यापार के तारतभ्य से पाणिनीय व्याकरण के अनुसार ६४ वर्ण विभक्तियों में, एवं वैदिकवर्णमात्रिका के अनुसार २८८ वणों में विभक्त हो रहा है । इस वर्णविभक्ति का मूलकारण प्रज्ञान इन्द्र है । कर्णशष्कुलो पर प्रतिष्टित प्राज्ञेन्द्रमूर्ति प्रज्ञान के संयोग से ही नादात्मक वायव्य शब्द के ' क - ख - गादि रूप ध्वन्यात्मक विभाग होते हैं । शब्दविभक्तिकरण- लक्षण व्याकरण इन्द्र का व्यापार है, यही ऐन्द्रव्याकरण है । अविच्छिन्न नादशब्द को वरूप से विभक्त करन । ज्ञान-रूप इन्द्र का ही कार्य्यं है । पशुश्नों में प्रज्ञामात्रा ( ज्ञानमात्रा ) श्रनुबुद्ध है, अतएव उनके वाक् - प्रयोग में वर्ण-विभक्ति का प्रभाव है | बच्चों में प्रज्ञान अस्फुट है, अतएव इनका बाकप्रयोग भी अलग्ल ( अस्फुट - सम्मिलित वर्णयुक्त ) है । कहना यही है कि, वर्णात्मिका वाक् ही ध्वनिः शब्द है, एवं यही ' ऐन्द्रशब्द ' है । और यही वा का तृतीय पद है || ३ || प्रयोगलक्षण श्राग्नेयशब्द, नादलक्षण बाय - शब्द, ध्वनिलक्षण ( वर्णलक्षण ) ऐन्द्रशब्द, तीनों वाकूपढ़ उस सर्वव्यापक बाक्तत्त्व ( वाक समुद्र ) के ही विकार हैं । वही तीनों का प्रकृतिभाव है । मुखोपाधिरूप से वही आकाशात्मिका वाक् श्राग्नेयी बाक की, अन्तरिक्षोपाधिरूप से वही वायव्यवाक् की, एवं कर्णोपाधिरूप से बही ऐन्द्री वाक की प्रतिष्ठा बन रही है । इसप्रकार एक ही प्रकृतिभता नित्यावाक् — मूलप्रकृति, अग्नि, वायु, इन्द्र, भेदसे ' वाक् - प्रयोग - नाद - ध्वनि ' इन चार विवर्त्त ' भावों में परिणत हो रही है || ४ || चचारि वाक्परिमिता पदानि -१ - वाक्- शब्दः – सर्वमूलभूता नित्या प्रकृतिलक्षणा वाक् २ - प्रयोगशब्द: -- बागिन्द्रियानुबन्धिनी श्राग्नेयी बाक् ३ - नादशब्दः - - श्रोत्रे न्द्रियानुबन्धिनी वायव्या वाक् ४- ध्वनिः शब्दः - कर्णशष्कुल्यनुबन्धिनी ऐन्द्री वाक ५४
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तृतीयखण्ड हमें यह देखना है कि, उक्त चार वाचिवतों में कौन तो नित्य है, एवं कौन अनित्य है । विचार करने पर हमें इस तथ्य पर पहुँचना पड़ता है कि, वागिन्द्रिय से सम्बन्ध रखने वाला प्रयोगलक्षण वागू-सर्वथा है । कारण इसका यही है कि, मीमांसा के जिन ६ सूत्रों से शब्द की अनित्यता बतलाई गई है, वे ६ हेतु प्रयोगलक्षण श्राग्नेय शब्द के सम्बन्ध में चरितार्थ बन रहे हैं । और इसी दृष्टिकोण के माध्यम से शब्द - अनित्यवादी दार्शनिकों का मत सर्वथा सुरक्षित है । नादात्मक वायव्य शब्द, तथा ध्वन्यात्मक ऐन्द्र शब्द, इन्हें हम ' नित्यानित्य ' कह सकते हैं । प्राणवायु, प्राणेन्द्र, दोनों देवता जहाँ नित्य हैं, वहाँ इनके अनुबन्ध अनित्य हैं । देवतादृष्टि से नाद - ध्वनिशब्द नित्य हैं, तो अनुबन्ध - दृष्टि से अनित्य हैं । चौथा वाकू - लक्षण शब्द सर्वथा नित्य है । मनः - प्राण - वाङ्मय श्रात्मा सर्वथा नित्य है । इस नित्य आत्मा की नित्या वाक कला ही यजुः- रूप से प्रयोग - नाद - ध्वनि - नामक तीनों वाविवर्तों की प्रतिष्ठा बन रही है । यही अनादिनिधना नित्या वेदवाक् है । सिद्धान्तपक्षीय जैमिनि - सूत्र इसी नित्यावाक की, किंवा वागू लक्षण नित्य शब्द की स्वतः सिद्ध नित्यता का समर्थन कर रहे हैं । प्रयोगादि लक्षण शब्द अनित्य हैं, वागू लक्षण शब्द सर्वथा नित्य है, यही जैमिनिसूत्रों का विज्ञानसम्मत अर्थ है । वेदवाकू की नित्यता सूत्रकार सिद्ध करना चाहते हैं । वादी प्रयोगलक्षणा वाक को लक्ष्य में रखता हुआ ' कम्मैके ` तत्र दर्शनात् ' ( १ | १ | ६ | ) से आरम्भ कर ' वृद्धिश्च कर्तृ भूम्नाऽस्य ' ( १ | १ | ११ ) इन ६ सूत्रों से शब्दों की अनित्यता सिद्ध कर रहा है । सूत्रकार - प्रकृतिभूता नित्याचाकू को लक्ष्य में रखते हुए पहिले तो ' समं तु तत्र दर्शम् ' ( १ | १ | १२ ) से आरम्भ कर ' नादवृद्धिर । ' ( १ | १ | ७ | ) इन ६ सूत्रों सेनित्यता हेतुत्रों का निराकरण करते हुए अपना यह भाव प्रकट करते हैं कि, परपक्षी जिन ६ हेतुत्रों से शब्द की अनित्यता सिद्ध करना चाहता है, वे ६ यों हेतु प्रयोगलक्षण, अतएव सर्वथा अनित्य शब्दों में होते हुए भी वाकू लक्षण नित्य शब्दों से असम्बद्ध हैं । फलतः इन ६ हेत्वाभासरूप हेतुत्रों से वाग् - लक्षण नित्य शब्द की अनित्यता कथमपि सिद्ध नहीं की जा सकती । इसप्रकार परपक्ष का निराकरण कर आगे जाकर सूत्रकार- “ नित्यस्तु स्यात्, दर्शनस्य परार्थत्वात् " ( १ | १ | १८ ) से आरम्भ कर “ लिङ्गदर्शनाच्च ” ( १ | १ | २३ | ) इन ६ सूत्रो से बागूलक्षण नित्य- शब्दों की नित्यता का समर्थन कर रहे हैं । इसप्रकार पूर्वमीमासा के ' औपत्ति कस्तु ० ' ( १ | १ | ५ ) सूत्र से आरम्भ कर ' लिङ्गदर्शनाच्च ' ( १।१।२३ ) पर्य्यन्त १६ सूत्र क्रमशः १-६ - ६-६ - इन विभागों में विभक्त होते हुए स्वसिद्धान्तोद्घाटन, ( १ ), परपक्षोद्घाटन ( ६ ), परपक्ष निराकरण ( ६ ), स्वपक्षसमर्थन ( ६ ) इन चार श्रेणियों में विभक्त होकर शब्द- नित्यत्त्व, अनित्यत्त्व विचार का विश्लेषण करते हुए अन्त में ( वागलक्षण नित्य- शब्द की अपेक्षा से ) ' शब्दनित्यता ' का ही स्थापन कर रहे हैं, जैसाकि दार्शनिक प्रकरणारम्भ में उद्ध ुत सूत्र-प्रतृपाठ में स्पष्ट कर दिया गया है । १६ सूत्रों से शब्दनित्यत्त्वानित्यत्त्व का विचार करने के अनन्तर सूत्रकार ने १ | १ | २४,१।१।२५,१।१।२६, इन तोन सूत्रों से शब्दों के वाचकत्व का समर्थन किया है, जैसा कि दार्शनिक प्रकरण में बतलाया जा चुका है । इन तीन सूत्रों के विज्ञानसम्मत अर्थ के सम्बन्ध में अभी कुछ कहना शेत्र रह जाता है । शब्दार्थ के औौत्पत्तिक सम्बन्ध स्वं. कार कर लेने पर प्रश्न यह उपस्थित होता है कि, अर्थोत्पत्ति में शब्द निमित्त नहीं ५
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भाष्यभूमिका है, अतः शब्द को अर्थं का बाचक कैसे माना जाय । ' उत्पन्नौ वाऽचनाः स्युः, श्रर्थस्यातन्निमित्तत्यान ' ( १ | १ | २४ ) यह सूत्र इसी प्रश्न का स्पष्टीकरण कर रहा है । सूत्रकार ने इस प्रश्न का यह समाधान किया है कि, औत्पतिक सम्बन्ध युक्त शब्दार्थों में अर्थोत्पति में शब्द निमित्त नहीं है, तथापि शब्दा-विर्भावानुबन्धिनी प्रक्रिया अवश्य ही अर्थोत्पत्ति में निमित्त बन रही है । जिस किया से जैसी क्रिया से अर्थों का आविर्भाव हुआ है, उसी क्रिया से, वैसी ही क्रिया से शब्दों का आविर्भाव हुआ है । दूसरे शब्दों में शब्दार्थाविर्भावानुबन्धिनी प्रक्रिया परस्पर समतुलित है । यही इन दोनों का औत्पत्तिक सादृश्य है । एवं इसी सादृश्य से शब्दों को अर्थों का वाचक मानना सुसङ्गत बन रहा है । ' तद्भूतानां - क्रियार्थेन समाम्नायः-श्रर्थस्य तन्निमित्तत्वात् ' ( १ । १ । २५ ) यह सूत्र इसी समाधान का स्पष्टीकरण कर रहा है । = -- शब्दब्रह्म एवं अर्थब्रह्म का समतुलन--अत्र इस सम्बन्ध में जिज्ञासा यह शेष रह जाती है कि, शब्द, तथा अर्थ के श्रौत्पत्तिक किया-सादृश्य का क्या स्वरूप है? इसी प्रश्न का समाधान कर यह वाचकत्त्व - प्रकरगा समाप्त किया जाता है । वैदिक - विज्ञान के अनुसार सृष्टिधारा शब्द, अर्थ, भेद से वो भागों में विभक्त मानी गई है । सूर्य्य-चन्द्र - ग्रह - नक्षत्रादि पदार्थ अर्थसृष्टि धारा है, एवं सूर्थं, चन्द्र - नक्षत्रादि नाम शब्दसृष्टिधारा है । दोनों के किया समतुलन से पहिले अर्थसृष्टिधारा का स्वरूप अवगत कर लेना उचित होगा । विश्व के जितनें भी पाञ्चमौतिक पदार्थ हैं, वे ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार ' क्षरात्मक ' हैं । ' क्षरात्मक ' कह देने मात्र से पदार्थ के पदार्थत्व का पूरा पूरा स्पष्टीकरण नहीं हो रहा । इसके लिए हमें उस वैकारिक सृष्टिधारा - क्रम पर दृष्टि डालनी पड़ेगी, जो गुण, अणु, रेणु, महाभूत, सत्त्व, भेद से पांच भागों में विभक्त है । वैदिक विज्ञान में ' विश्वसृट् ' नाम से प्रसिद्ध, सांख्यदर्शन में ' पञ्चतन्मात्रा ' नाम से व्यवहृत तात्त्विक भूत ' गुणभूत ' है । गुणभूतों से अणुभूतों का, अणुभूतों से रेणुभूतों का, रेणुभूतों से महाभूतों का, एवं महाभूतों से सत्त्व नामक थों का विकास हुआ है, जिनका कि विशद वैज्ञानिक विवेचन ईशादि भाष्यों में किया जा चुका है । इस-प्रकार प्रत्येक अर्थ गुणा - णु - रेणु - महासत्त्व - भेद से पञ्चात्मक बन रहा है । ये पाँचों क्षरविवर्त्त हैं । एव पञ्चात्मक इस अर्थ को हम अवश्य ही ' क्षर ' कह सकते हैं । इस तरकूट को एक सूत्र से बद्ध रखने वाला, नियत कालपर्य्यन्त क्षरकूटात्मक अर्थ को स्वस्वरूप से सुरक्षित रखने वाला ' कूटस्थ ' नाम से प्रसिद्ध, विधर्त्ता - प्राणात्मक तत्त्वविशेष ही ' अक्षर ' है । यही अर्थ का दूसरा विवर्त है । क्षारविवर्त्त उपादानात्मक है, अक्षरविवर्त निमित्तकारणात्मक है । दर कार्य्य है, अक्षर कारण है । कार्य्य - कारणातीत सर्वालम्बन तत्त्व ' अव्यय ' नाम से प्रसिद्ध है, यही अर्थसृष्टि का तीसरा विवर्त है । इसप्रकार प्रत्येक अर्थ ' अव्यय - अक्षर-चर ' भेद से त्रिपर्वाब न रहा है । क्षर अक्षर को आधार बनाकर ही स्वरूप में अवस्थित रहते हैं । अक्षर के बिना क्षरस्वरूपावस्थान असम्भव है । श्रक्षर श्रव्ययाधार पर प्रतिष्ठित है । क्षर ' स्व ' लक्षण ( वस्तुबाह्य स्वरूपलक्षण ) बनता हुआ ' स्वार्थ ' नामक अर्थ है । अक्षर ' परमलक्षण ' ( महालक्षण ) बनता हुआ ' परमार्थ ' नामक अर्थ है । एवं अन्यय ' परलक्षण ' बनता हुआ ' परार्थ ' नामक अर्थ है । स्वार्थ परमार्थ - परार्थत्रितय की समष्टि एक - एक अर्थ है । तीनों में मध्यस्थ अक्षर है । यही अपने प्रकृतिभाव से अव्यक्त रहता हुआ अपने उत्तर के ५६
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तृतीयखण्ड महल्लक्षण एकाक्षररूप से क्षरात्मक सम्पूर्ण भूतार्थों का निमित्त बन रहा है, जैसाकि निम्नलिखित बचनों से स्पष्ट है-१ - " भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि, महद्ब्रह्मकमक्षरम् 1
बहु ब्रह्मैकमक्षरम् “ । ( शत ० १०।२ । ७ । ६ ) ॥
२– “ एतद्ध्येवाक्षरं सर्वे देवाः, सर्वाणि भूतान्यभिसम्पद्यते ” ( शत ० १० | २ | ७ | ६ । ३– “ एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ” ( ऋक्सं ० ८ । ५८ । २ ) । ४- " यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सौम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ” - मुण्डकोपनिषत् । १ । ११ उक्त वचनों से यही तात्पर्य्यं निकल रहा है कि, भूतात्मिका मर्त्य अर्थसृष्टि का विकास अमृतलक्षण एक ही अक्षर से हुआ है । ' ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ' के अनुसार अक्षर से ही तर नामक ' ब्रह्म ' का प्रादुर्भाव हुआ है । ' बहुब्रह्मक मतरम् ' इत्यादि शातपथी श्रुति का तात्पर्य यही है कि, अनेक क्षरों में एक अक्षर कूटस्थ क्षरब्रह्म का विकास अक्षर से हुआ है । यह विकासक्रम ६ स्थानों में विभक्त बना रहता है । कूटात्मक हो रहा है । अव्ययेश्वर नामक अश्वत्थवृक्ष की सहस्र शाखा मानी गई है । प्रत्येक शाखा में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथवी ' ये पाँच पाँच पर्व हैं । पर्व को विज्ञानभाषा में ' पुण्डीर ' कहा गया है, शास्त्रा को ' बल्शा ' कहा गया है, ईश्वर को ' प्रजापति ' कहा गया है । अतएव वह श्रश्वत्थी, पञ्चपर्वात्मिका शाखा-' पञ्चपुण्डीरा ( पुडी रात्मिका ) प्राजापत्य - वल्शा ' नाम से व्यवहृत हुई है । स्वयम्भू पर्व ' सत्यलोक ' है, परमेष्ठी पर्व ' जन - लोक ' है, सूर्य्यपर्व ' स्वर्गलोग ' है, चन्द्रपर्व ' अन्तरिक्ष लोक ' है, पृथिवीपर्व ' भूलोक ' है । श्रश्वत्थेश्वर के पाँच पर्व अग्नी सोम नामक तत्त्वों के विवृत - स्पर्श प्रयत्नों से नौ संख्याओं में परिणत हो जाते हैं । अग्न्यक्षर विकासधर्म्मा है, सोमाचर संकोच धम्र्मा है । विकास लक्षण ऊष्मा, संकोच-लक्षण स्पर्श, इन प्रयत्नों के सारतम्य से महद्ब्रह्मलक्षण वह एकाक्षर पाँच स्थानों में विभक्त होता हुआ रु संस्थानों में परिणत हो जाता है । ये ही उस एक अक्षर पुरुष के ६ ब्रह्मरूप ( क्षररूप ) हैं | इस सम्बन्ध में यह और ध्यान रखना चाहिए कि, विषृतभाव श्रसङ्ग - अत्रन्धनलक्षण बनते हुए प्राणप्रधान हैं, एवं स्पर्शभाव ससङ्ग - धन लक्षण बनते हुए वाक प्रधान है । इन प्राण - वाक - प्रधान विवृत स्पर्श भावों का विशद वैज्ञानिक विवेचन तो ' वैदिकवर्णमातृकाविज्ञान ' नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ में ही देखना चाहिए । यहाँ केवल उनसे सम्बन्द्ध नौ ब्रह्म - पुरुषों की तालिका उद्धृत कर दी जाती है । ५७
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सत्यलोकाः पारमेष्ठ्याः स्वः ( स्वयम्भूः ) ( परमेष्ठी ) ( सूर्यः ) भाष्यभूमिका भूलोकाः आन्तरीक्ष्याः ( पृथिवी ) ( चन्द्रः ) १ २ ३ ४ ५ इति पञ्चपुण्डीरस्थानानि १ ब्रह्मा विष्णुः इन्द्रः अग्निः सोमः इति पचाक्षराणि → २ ब्रह्मा विष्णुः इन्द्रः अग्निः सोमः इति पञ्चात्मक्षराणि ३ प्राण: आपः बाकू अन्नादः अन्नम्. इति पश्च विश्वसृजः ४ऋपयः पितरः देवाः असुराः गन्धर्वाः इति पच प्राणाः ५ आकाशः वायुः तेजः पृथिवी आपः इति पञ्च भूतान्यापः ६ सत्या बृहती अनुष्टुप् सुब्रह्मण्या इति पश्च वाचः ७ स्वयम्भूः परमेष्ठी सूर्य: पृथिवी चन्द्रमाः इति - पञ्चाग्नयोऽन्नादाः = पुरुषः अश्वः गौः अवि: अजः इति पञ्च परावोऽमानि .1 प्रवर्ग्य: प्रवर्ग्यः प्रवर्ग्यः इति पञ्च प्रवर्ग्यभावाः सत्त्वसृष्टिप्रवर्त्तकाः अर्थसृष्टिधारा से सम्बद्ध त्रिपुरुष विवर्त्त, ६ ब्रह्मविवर्त ', इन दो दृष्टियों को लक्ष्य में रखते हुए शब्द-सृष्टिभ्वारा का विचार कीजिए । अर्थब्रह्म ही ईश्वर है, जिसके अव्यय - अक्षर - क्षरात्मक तीन विवर्त हैं । इस त्रिपुरुषात्मक ईश्वर का वाचक ' प्रणव ' ( ओङ्कार ) है । श्रोङ्कार में ' अ - उ - मू ' ये तीन पर्व हैं । मनः प्रधान अव्यय ज्ञानात्मक बनता हुआ प्रसङ्ग है । एवमेव शब्दसृष्टि में अकार कण्ठ - ताल्वादि के स्पर्श से पृथक् रहता हुआ प्रसङ्ग है । प्राणप्रधान प्रक्षर क्रियात्मक - बनता हुआ क्षरदृष्टि से असम, तथा अव्ययदृष्टि से ससन बनता हुआ ‘ ससङ्गासङ्ग ’ है । एवमेव शब्दसृष्टि में उकार श्रोष्ठादिस्पर्श से पृथक रहता हुआ भी संकोचभावयुक्त ५८
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तृतीयखण्ड चनता हुआ ससङ्गासङ्ग है । वाकप्रधान दर अर्थात्मक बनता हुआ सर्वथा समुङ्ग है । एवमेव शब्दसृष्टि में प्रकार श्रोष्ठस्पर्शमर्य्यादा से युक्त रहता हुआ सर्वथा ससङ्ग है । अकारोच्चारण में कण्टादि का स्पर्श नहीं होता, उकारो-चारण में श्रोष्ठ मिलते तो नहीं, किन्तु सिकुड़ जाते हैं, एवं मकारोच्चारण में प्रष्ट मिल जाते हैं । इस समान-धर्म से प्रकार अव्यय का, उकार अक्षर का, एवं मकार क्षर का वाचक मान लिया गया है । इसप्रकार प्रणवदृष्टि से शब्दब्रह्म - अर्थब्रह्म, दोनों का औत्पत्तिक प्रक्रियासादृश्य समतुलित बन रहा है । अर्थत्रह्म- - शब्दब्रह्म १ – अव्ययः --- अकारः - " तस्य वाचकः प्रणवः " ( योगसूत्र ) २ -- अक्षर: --- उकारः ३ - क्षरः -- -मकारः दूसरी दृष्टि से समतुलन की मीमांसा कीजिए । परब्रह्म चतुष्पाद माना गया है । विश्वातीत, विश्वात्मा, विश्व, भेद से परब्रह्मसंस्था के तीन मुख्य पर्व हैं । महामायाचल को अपने गर्भ में रखने वाला, सर्ववलविशिष्ट-रसमूर्ति, ग्रमायी, व्यापक, तुरीय, मात्र, किंवा श्रद्ध मात्र पद ' परात्पर ' है, यही विश्वातीत है । अव्यय - अक्षर समष्टि विश्वात्मा है, क्षर विश्व है । इसप्रकार परात्पर, अव्यय, अक्षर, क्षर, भेद से परब्रह्म चतुष्पाद बन रहा । अव्यय - श्रानन्दादि भेद से पञ्चकल है, अक्षर ब्रह्मादि भेद से पञ्चकल है । परात्पर निष्कल है, सर्वाधार है है, एवं क्षर प्राणादि भेद से अनेककल है । ठीक यही व्यवस्था शब्दब्रह्म की है । ' अर्द्ध मात्रा, स्फोट, स्वर, वर्ण ' भेट से शब्दब्रह्म भी चतुष्पाद है | श्रद्ध मात्रा परात्पर से समतुलित है, एवं यह निष्कल है । स्फोट ग्रव्यय से समतुलित है, एवं पञ्चकला-व्यय की भाँति तत्समतुलित इस स्फोट के भी महावाक्यादि पाँच विवर्त्त हैं । स्वर अक्षर से समतुलित है, एवं पञ्चकल - अक्षर की भाँति तत्समतुलित इस स्वर के भी अकारादि पाँच विवर्त्त हैं । वर्ण दर से समतुलित है, एवं अनेककल क्षर की भाँति तत्समतुलित इस वर्ग के भी अनेक विवर्त्त हैं । क्षर के प्राणादि पाँच विवर्त्त पञ्चीकरणप्रक्रिया से ही अनेककल बन रहे हैं । इसप्रकार निम्नलिखित रूप से भी दोनों का समतुलन हो रहा है— * - परब्रह्म * शब्दब्रह्म १ – परात्परः - - - - अर्द्ध मात्रा २- अव्ययः- -स्फोटः ३ -- अक्षरः-४ --क्षरः ---- स्वरः -वर्णः - ' द्व े वाव ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म परं च यत् ' ५६
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परब्रह्म 8- परात्परः १ - अव्ययः भाग्यभूमिका क - आनन्दः स्व-- विज्ञानम् -ग- मनः ध- प्राणः ङ - वाक २ – अक्षरः कब्रह्मा ख - विष्णुः ग -- इन्द्रः घ - अग्निः ङ सोमः ३- तरः-१ – प्राणः – आपः 8-शब्दब्रह्म * - श्रर्द्ध मात्रा - १ –रकोटः -क - महावाक्यस्फोटः -ख - वाभ्यस्फोट: -ग- पदस्फोटः घ- श्रतरस्फोट. . ङ - वर्णस्फोटः . २ – स्वरः क- श्र - कारः -ख - इ - कारः ग - उ - कारः घ- ऋकारः -उल - कारः वाकू अभादः – अन्नम् । २ श्रपः — बाकू - श्रनादः - श्रन्नम् —प्राणः । ३- वाक - अन्नादः - अन्नम् – प्राणः आपः । ४ –अन्नादः – अन्नम् - - प्राणः आपः — वाक् । ५ — अन्नम् — प्राणः —–श्रपः —वाक्- -अन्नादः । ४- वः-१ – अ - ह - ग — क - ध - ख- ड – ह २ - अ - य् - ज - च - झ - छ – – श ३ र – ड़ —- ड – १–४– प ४ -दत - ध - थ - न - स -भ - फ - सह ६०
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द्वितीयखण्ड अथवा एक अन्य दृष्टि से समन्वय कीजिए । त्रिपुरुष पुरुषात्मक अर्थब्रह्म से समतुलित शब्दब्रह्म में भी ' ध्वनि, स्वर, वर्ण ' भेद से तीन हीं शब्दपुरुषविव प्रतिष्ठित हैं । जिसप्रकार अर्थधारा में अक्षर के बिना क्षर प्रतिष्ठित नहीं रह सकता, एवमेव शब्दधारा में भी अक्षर से समतुलित स्वर को प्रतिष्ठा बनाए बिना क्षरसमतुलित वर्ण स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित नहीं रह सकते । एवमेव अर्थवारा में जैसे अव्यय को आलम्बन बना कर ही अक्षर क्षर की प्रतिष्ठा बनता है, वैसे ही अव्ययसमतुलित ध्वनि को चालम्बन बना कर ही स्वर वर्ण की प्रतिष्ठा बनता है । जिसप्रकार एकाक्षरब्रह्म ( पूर्वप्रदर्शित तालिका के अनुसार ) क्षरव्यूहरूप में परिणत होता है, एत्रमेव तत्स्थानीय एक प्रकार स्वर ही स्पर्शोष्मा के तारतम्य से वर्णव्यूहरूप में परिणत होता है, जैसा कि – ' अकारो वै सवा वाक् ' इत्यादि ऐतेरेयश्रुति से पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है— परब्रह्म शब्दब्रह्म १- श्रव्ययः-- १ - ध्वनिः २ - अक्षरः--२- स्वर: -३ - वर्णः - " शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः -परंत्रह्माधिगच्छति ” ३ - क्षरः ---जिसप्रकार आधिदैविक विश्व में स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्यादि पाँच स्थान हैं, एवमेव आध्यात्मिक विश्व में भी पाँच ही मुख्य स्थान मानें गए हैं । शव्यप्रयोक्ता जीवपुरुष जिस मुख से शब्दों का प्रयोग करता है, उस में मुखावयवरूप कण्ट, तालु, मूद्ध, दन्त, ओष्ठ, नामक पाँच स्थान हैं! इन पाँच स्थानों में विचार-स्पर्श के द्वारा प्रयत्नों का भेद हो जाता है । इनमें स्थान एवं करण के स्पर्श से उत्पन्न विवृतवर्ण ' स्वरवर्ण-भावात्मक ' बनते हुए प्राणस्थानीय हैं । एवं स्थान - करण के स्पर्शतारतम्य से उत्पन्न स्पृष्ट वर्ण व्यञ्जनवर्ण-भावात्मक ' बनते हुए वाकूस्थानीय है । प्राण वाक् भेद से जो ६ विवर्त्त ' अर्थब्रह्म में हैं, वे ही ε विवर्त स्वर-वर्ण भेद से शब्दब्रह्म में प्रतिष्ठित हैं । इसप्रकार त्रिपुरुषदृष्टि से, चतुष्पाददृष्टि से, एकाक्ष रोत्पत्तिदृष्टि से, नव विवर्त्त दृष्टि से अर्थब्रह्म के साथ शब्दब्रह्म अनुरूपतः समतुलित है । अर्थब्रह्म के प्राण वाङ्मय नौ विवत्त के पूर्वोद्धन परिलेख को सामने रखिए, एवं शब्दब्रह्म के स्वर - वर्णमय नौ विवत्त के निम्नलिखित परिलेख को सामने रखिए । दोनों के समतुलन से यह प्रमाणित हो जायगा कि, अर्थोत्पत्ति में निमित्त बनता हुआ भी शब्द प्रक्रिया सादृश्य से निमित्त बन रहा है । एवं इसी आधार शब्दों को अथों का वाचक माना जा सकता है । ६१
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भूमिका * कण्ठ्याः तालव्याः मूर्द्धन्याः दन्त्याः ओष्ठवाः 8 १ २ ३ ४ ५ इति पञ्च मुखस्थानीयाः १ श्र इ ॠ 3 इति - अस्पृष्टाः स्वरः २ IS य र ल व इति ईषनस्पृष्टा अन्तस्थाः II II I I I I I य ड़ व इति दुःस्पृष्टा अन्तस्थाः ४ ग ज 15 ङ. दThe ब इति - मृदुस्पृष्टाः स्पर्शाः ५ क च ट I प इति- तीव्रस्पृष्टाः स्पर्शाः 6 G घ II I I I I I I II II II I म इति - नासिक्यस्पृष्टाः स्पर्शाः भ इति - मृदुस्पृष्टाः सोष्माणः U ख छ थ फ इति - तीष्ठाः सोमाणः Σ इ श प स ६ इति श्रर्द्ध स्पृष्टा ऊष्माण: ऐतरेयोक्त- ' अक्षितिविज्ञान ' दृष्टि से भी उक्त समतुलन की मीमांसा की जा सकती है । वर्णमातृका-विज्ञान हो ' अक्षितिविज्ञान ' है । अकारादि - दकारान्त मातृकावर्णसमाम्नाय को लक्ष्य बनाते हुए महर्षि ऐतरेयने लोक, देव, वेट, इन्द्रियप्राण, वायव्यप्राण, इनके साथ शब्दब्रा का साम्य बतलाते हुए यह प्रमाणित कर दिया है कि, शब्दार्थों का परस्पर प्रक्रिया -सादृश्य है । अतएव अवश्य ही शब्द अर्थ का वाचक है । निम्नलिखित ऐतरेयश्रुति ही इस सम्बन्ध में पर्प्यात प्रमाण है-६२