Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 81–90

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90

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द्वितीयखण्ड मूलसिद्धान्तः---“ अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत्, सर्वा ह्य वैमाः सर्वस्यै बाच उपनिषदः । इ॒मां त्वेवाऽऽचचने । लोकसाम्यम्-( १ ) – “ पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः " | देवसाम्बम् — ( २ ) - " अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरूष्माणः, आदित्यस्य स्वराः ” । वेदसाम्यम्— ( ३ ) – “ ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेद स्योमाणः, सामवेदस्य स्वराः ” । इन्द्रियप्राणसाम्यम्-( ४ ) - " चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योप्माणः, मनसः स्वराः ” वायव्यमाण साम्यम्— ( ५ ) – “ प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्वोष्माणः, व्यानस्य स्व॒राः ” । ऐतरेय आरण्यक ३।२।५ । १- पृथिवी १ - अन्तरिक्षम १- द्यौः २- अग्निः २- बायुः २- श्रादित्यः अधिदेवतम् ३ - ऋग्वेदः ३ - यजुर्वेदः ३- सामवेदः ४ - चक्षुः ४ - श्रोत्रम् ४ मनः अध्यात्मम् ५- प्राणः ५- अपानः ५- व्यानः स्पर्शाः ऊष्माणः स्वराः अधिभूतम् ' मन: प्राणवाङ्मय ग्रात्मा को लक्ष्य बना कर भी इस प्रक्रियासादृश्य का समन्वय किया जा सकता है । ‘ स श्रा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' इत्यादि बृहदारण्यकश्रुति के अनुसार ग्रात्मा मन: -प्राणवाङ्मय बनता हुआ ज्ञानक्रियार्थमय है । तीनों का मम्मिलित एक रूप ही ग्रात्मा है । इस एकरूपात्मक ६३

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भाष्यभूमिका त्रिपर्वा आत्मा की व्याहृति ( नाम ) ' ओम् ' यह एकाक्षर है । ' स्वरोऽक्षरं, सहार्थं व्यञ्जनैः ' इत्यादि प्रातिशाख्य सिद्धान्त के अनुसार ' ओम् ' यह एकाक्षरा ब्रह्मव्याहृति है । इसके ' अकार उकार मकार ' तीन पर्व हैं । विवृत, निर्विकार, अकार असङ्ग निर्विकार मन का संग्राहक है । विवृत, सविकार, उकार - असङ्ग, किन्तु सविकार प्राण का संग्राहक है । स्पृष्ट, तथा पूर्ण विकारात्मक मकार ससङ्ग - पूर्णविकारात्मक वाग ब्रह्म का मंग्राहक है । इसप्रकार ' अ उ - - म् ' भेद से वर्णत्रयात्मक बनता हुआ ' ओम् ' यह एकाक्षर ' मनः प्राण- वाक ' भेद से त्रिपर्वात्मक बने हुए एकाक्षरात्मक आत्मा का वाचक बन रहा है । मनः प्राणवाङ्मय वस्तुतत्त्व ' आत्मा, शरीर ' भेद से दो भागों में विमक्त है । मन का विकार रूप है, प्राण का विकार कर्म्म है, वाक् का विकार नाम है । नाम - रूप - कर्म्म, इन तीन वैकारिक रूपों की समष्टि ' शरीर ' है । मनः - प्राण वाकू, इन तीन प्राकृतिक रूपों की समष्टि ' आत्मा ' है । मनः - प्राण - वाङ्मय-श्रात्मा सूक्ष्म है, नामरूपकर्म्ममय शरीर स्थूल है । सूक्ष्म आत्मा, स्थूल शरीर, दोनों के एकीभाव से एक वस्तुसंस्था का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । सूक्ष्म आत्मा, स्थूल शरीर, दोनों का एकीभाव, इन तीनों के लिए क्रमशः ' अ - इ - अम् ' ये तीन शब्द नियत माने गए हैं । आत्मा शरीर, दोनों स्थूल सूक्ष्मभावों के एकत्र सन्निपात से सम्पन्न वस्तुतत्त्त्र ' ईश्वर, प्रतिमा, जीव ' इन तीन भागों में विभक्त हैं । सूक्ष्म आत्मा, स्थूल शरीर की समष्टि ही ईश्वर है, इन्हीं दोनों की समष्टि प्रतिमा है, एवं इन्हीं दोनों की समष्टि जीव है । स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी -इन पाँचों को अपने गर्भ में रखने वाला सर्वतः पाणिपादोऽक्षिशिरोमुख पूर्णात्मक तत्त्व ईश्वर है । स्वयम्भू-परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी, ये पाँचों पर्व ईश्वरप्रजापति की भक्ति ( अवयव ) बनते हुए पाँच स्वतन्त्र आत्मपर्व हैं । तीसरा घाटकौशिक जीवात्मा प्रसिद्ध है । इन तीनों विवर्तों के क्रमशः ' ओम् - अहः - श्रहम् ' ये तीन शब्द वाचक माने गए हैं । तीनों में पहिले क्रमप्राप्त ' ओम् ' की ही मीमांसा कीजिए । ईश्वरप्रजापति सर्वतः पाणिपादादिलक्षण जनता हुआ पूर्णपद है, यह कहा जा चुका है । इसीलिए इसे ' पूर्णेन्द्र ' भी कहा गया है । यह सर्वतन्त्रस्वतन्त्र है । किसी दूसरे का अवयव न बनता हुआ स्वयं पद है । इस स्वतन्त्र पद में सूक्ष्म श्रात्मा, स्थूलशरीर, ये दो पर्व हैं । दोनों के वाचक क्रमशः अकार - हकार हैं । दोनों का एकीभाव हो रहा । फलतः ईश्वरवाचक शब्द की आरम्भ में " ( सूक्ष्म आत्मा ) - इ - ( स्थूल शरीर ) -श्रम् - ( दोनों का एकीभाव ) ' यह स्थिति है । क्योंकि ' ग्रह ' वाच्य ईश्वर पूर्णपद है । अतएव इसी पूर्णं-पदत्त्व को सूचित करने के लिए संज्ञाविधायक वैज्ञानिकों ने ईश्वरवाचक ' अह ं के हकार को पदान्त ( पूर्णपद का अन्तभागरूप ) मानते हुए इसे ' उ ' त्त्व कर डाला है । उत्त्व हो जाने पर ' अहम् ' के स्थान में ' उ'-अम् ' यह स्थिति हो जाती है । गुण - पूर्वरूप से ' ओम् ' स्वरूप निष्पन्न हो जाता है । ' ह् ’ यह विसर्गसदृश भास-मान है । ' विसर्गः कर्म्मसंज्ञितः ' के अनुसार ' विसर्ग ' कर्म का सूचक इसलिए बन रहा है कि, कर्म्म क्षणिक बनता हुआ अवस | नधर्म्मा है । उधर विसर्ग भी ' वावसाने ' के अनुसार अवसानधर्म्मा ही बन रहा हैं । विसर्ग-वद्भासमान हकार स्थूलकर्म्म का सूचक है, अकार सूक्ष्मज्ञान का सूचक है । श्रस्मदादि शरीरों में जहाँ स्थूल कर्म्म अपने श्रावरणरूप से विकसित है, वहाँ ईश्वरीय संस्था में यह विसर्गात्मक कर्म ईश्वरीय ज्ञान को वृ करने में असमर्थ है । इस रहस्य को सूचित करने के लिए भी इकार को उत्त्व कर दिया जाता है । तात्पर्थ्य ६४

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तृतीय ars यही हुआ कि, ईश्वर पूर्णपद है, अतएव तद्वाचक ' ग्रह ' का हकार पद का अन्त बनता हुआ पदान्त है । अतएव इसे उत्त्व कर देना न्यायसङ्गत है । पूर्णपदत्त्वसूचनार्थ ही उत्त्व करते हुए ' अह - अम् ' को ' ओम् ' रूप में परिणत किया गया है । ' तस्योपनिषदोम् ' यह सिद्धान्त ईश्वर के इसी पूर्णपदत्त्व का समर्थन कर रहा है । दूसरा प्रतिमा है, जिसे ' अवतार ' विवर्त्त भी कहा जासकता है । ये पाँचों विश्वपर्व अपना अपना स्वतन्त्र वषट्कारात्मक शरीर बनाते हुए उस सहस्रत्रल्श पूर्णेश्वर के अवयव बने हुए हैं । पाँचों स्वतन्त्र पद नहीं हैं, अपितु उस पूर्णपद ( ईश्वर ) के अवयव है । क्योंकि ये स्वतन्त्र पद नहीं हैं, श्रतएव पदान्तत्त्व- सम्पत्ति से वञ्चित इन पाँचों की समष्टि के वाचक ' ग्रह ' के हकार को उत्व नहीं होता । इस के अतिरिक्त इन पाँचों का एकत्र निपात भी नहीं होता । अतएव यहाँ एकीभाव सूचक ' अम् ' का भी अभाव । इस एकीभाव के अभाव का मूलकारण इन पाँचों का दहरोत्तर - सम्बन्ध है । स्वयम्भू की महिमा के गर्भ में समहिम परमेष्ठी अवस्थित है । परमेष्ठी की महिमा के गर्भ में समहिम सूर्य, सूर्य्यमहिमा के गर्भ में समहिमा पृथिवी, एवं पार्थिवमहिमा के गर्भ में समहिम चन्द्रमा प्रतिष्ठित है । इस दहरोत्तरभाव से पाँचों का एकत्र समन्वय असम्भव है । हां पाँचों अपने प्रवर्ग्यभागों से अस्मदादि प्राणियों के जीवन में अवश्य ही उपयुक्त हैं । अतएव जीवनार्थक ' अन् ' शब्द से युक्त होता हुआ इन का वाचक ' अह ' ' अन् ' अवश्य बन रहा है, जोकि ' अहन् ' इन की अहर्गणात्मिका वषट्कार संस्था से ' ग्रह: ' रूप में परिणत हो रहा है । इसप्रकार अहर्गण शरीरात्मक ( वषट्कार-शरीरात्मक - महिमामण्डालात्मक ) इस प्रतिमाप्रजापति का वाचक ' ग्रहः ' बन रहा है । ' तस्योपनिषदह: ' यह सिद्धान्त प्रतिम।प्रजापति के इसी अपदत्त्व का, एवं अनैक्यसम्पत्ति का समर्थन कर रहा है । तीसरा जीवविवत ' है । इसका शरीर पाट्कौशिक माना गया है । ' पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ' - पूर्णमदः पूर्णैमिदम् ' इत्यादि ब्राह्मण, तथा उपनिषच्छ्र ुति के अनुसार प्रत्येक जीवात्मा पूर्णोदक्त बनता हुआ यद्यपि पूर्ण है । तथापि पूर्णपद ईश्वर का अंश बनता हुआ यह भी स्वतन्त्र पदसम्पत्ति से वञ्चित रहता हुआ पद ही माना गया है । इसी आधार पर इसे ' अर्द्धन्द्र ' - अर्द्ध बुगल ' इत्यादि नामों व्यवहृत करना ग्रन्वर्थ न रहा है । इसी अपद सम्बन्ध से इस के हकार को भी उकार नहीं होता । परन्तु एक आध्यात्मिक संस्था में सूक्ष्म आत्मा, स्थूल शरीर, दोनों का एकीभाव अवश्य है । अतएव एकीभावसूचक ' अम् ' का सम्बन्ध अवश्य है । फलत: इस जीव का वाचक ' अहम् ' बन रहा है । ' तस्योपनिषदहम् ' यह सिद्धान्त जीवात्मा के इसो अपदत्त्व का, तथा ऐक्यभावसम्पत्ति का समर्थन कर रहा है । भगवान् ऐतरेयने जीवकी उक्त उपनिषत् ( अहं ) का निम्न लिखित शब्दों में अभिनय किया है— “ त्र्यः ( अह ) इति ब्रह्म । तत्राऽऽगतमहममिति । तद्वा इदं बृहती सहस्र सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य पट्त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । पुरुषायुषो-ऽह्नां सहस्राणि ( ३६००० ) भवन्ति । जीवान्तरेणैव जीवाहराप्नोति, जीवाह्ना जीवाक्षरम् ” इति ( ऐ ० आ ० २ | ३ | ८ | ) । श्रङ्गार, अहस्कार, अहङ्कार, ये तीनों क्रमश: ईश्वर, प्रतिमा, नीव, भावों के स्वरूपपरिचायक हैं । जसी परिस्थिति, जैसा संस्थानक्रम ' ओम् ' - ' ग्रहः ' - ' अहम् ' शब्दों का है, वैसी ही परिस्थिति, वैसा ही संस्थान-६५

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भाण्यभूमिका क्रम ' ईश्वर ' - ' प्रतिमा - ' जीव ' तत्त्वों का है । शब्दद्वारा अर्थ का बोध क्यों हो जाता है?, इस प्रश्न का रहस्या-त्मक यही उत्तर है कि, तत्तदर्थवाचक तत्तद्वैदिक शब्दों का स्वरूपावस्थान तत्तदर्थों के तत्तत्स्वरूपावम्थानों के अनुरूप ही हुआ है । इसी सम्बन्ध में प्रसङ्गोपात्त यह और समझ लेना चाहिए कि, ईश्वरप्रजापति जीवप्रजापति के नेदिष्ट अवश्य है | परन्तु इसका जीवनस्रोत पाँच प्रतिमाप्रजापतियों में आपोमय परमेष्ठी के गर्भ में नामक तत्त्व से उत्पन्न होने वाले मध्यस्थ ' सूय्यं ' नामक सत्यप्रजापति से ही सम्बन्ध रखता है । ईश्वरविभूति का अध्यात्मसंस्था में सूय्र्यद्वारा ही आगमन हुआ है, जैसा कि - ' सूर्य आत्मा जगतस्थ-स्थुपश्च ' – नूनं - जनाः सूर्येण प्रसूताः ' - प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः ' इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट है । सूर्य्य - चर्चा का अभिप्राय यही है कि, जिन पाँच प्रतिमाप्रजापतियों का वाचक ' ग्रह: ' बतलाया है, उस ‘ अहः ' की मूलप्रतिष्ठा सूर्य्य ही है । ग्रहःकालोपलक्षित सृष्टिकाल ( पुण्याह ) की मूलप्रतिष्ठा सूर्य्यसत्ता ही मानी गई है । कारण यही है कि, पञ्चपर्वात्मक विश्व के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता हुआ सूर्य्य परस्तात् - के स्वयम्भू परमेष्टी नामक अमृत प्रजापतियों का, एवं अवस्तात् के पृथिवी - चन्द्रमा नामक मर्त्यप्रजापतियों का संग्राहक बनता हुआ, शमृत - मृत्यु - दोनों से युक्त बनता हुआ सर्वात्मक बन रहा है, जैसा कि - ' निवेशयन्नमृतं मर्त्य च ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । इसी श्राधारपर ब्राह्मणश्रुतिने सौरमण्डल मध्यवर्त्ती, ' परं भाः ' लक्षण आदित्यपुरुष की उपनिषत् ' ग्रहः ' मानते हुए इसे ही अहमुपनिपल्लक्षण जीवात्मा की प्रतिष्ठा बतलाया है । जैसाकि निम्नलिखित ब्राह्मणश्रुति से स्पष्ट है--“ आप एवेदमग्नऽभ्रमुः । ता आपः सत्यमसृजन्त ।....। तद्यत् - तत् सत्यं, असौ स आदित्यः । य एव एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः, तावेता-वन्योऽन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ । रश्मिभिर्वाऽएषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः, प्राणै रयममुष्मिन् । य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, तस्य भूरिति शिरः, एकं शिरः, एकमेतदक्षरम् । भुव इति बाहू, बाहू, एतेऽक्षरे | स्वरिति प्रतिष्ठा, द्वे प्रतिष्टे, द्वं एतेऽक्षरे । ' तस्योपनिषत्-' अहं ' रिति । अथ योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः, ' तस्योपनिषत् - ' अहम् ' इनि ” ॥ ( शत ० २४ कां ० ८ ० ६ ब्रा ० ) । ' ओम् - अहः अहम् ' तीनों में से प्रकृत में हमें उस योङ्कार की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है, जो पूर्ण पखझ का वाचक बन रहा है । ओङ्कार शब्द पूर्णलक्षण परब्रह्म का संग्राहक बन रहा है, इस सिद्धान्त का समन्वय गोपथश्रुति के आधार पर भी किया जासकता है । एकाक्षरमूर्ति, अन्ययालम्बित, क्षरोपादानात्मक, अतएब त्रिपुरुष - पुरुषात्मक परब्रह्म ( ब्रह्म ) ने एकबार यह चिन्ता की कि, मैं ऐसे कौन से एकाक्षर का श्राश्रय लूँ, जिसके द्वारा सम्पूर्ण कामनाओं, लोकों, देवों, वेदों, यज्ञों, शब्दों, व्युष्टियों, एवं स्थावरजङ्गमभूतों का अपने आप में अनुभव कर सकूँ । अपनी इस चिन्ता को दूर करने के लिए ब्रह्मने उम श्रोम् - अक्षर का श्राश्रय लिया, जिसमें दो वर्षा हैं, चार मात्रा हैं, जो सर्वव्यापक है, सत्र में व्याप्त है, एवं श्रयातयाम है | ६६

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तृतीयखण्ड ओङ्कार में ' ओ - मू ' ये वर्ण दो हैं । ' श्रद्ध ' मात्रा, अ - उ - म् ' ये चार मात्रा हैं । श्रद्ध मात्रा अमृत-मात्रा है, शेष तीनों मृत्युमात्रा हैं । इन चार मात्राओं से वह प्रोङ्कार चतुर्मात्र बना हुआ है । अक्षरदृष्टि से वह एक है । अपने दो वर्णों, चार मात्राओं, तथा एक अक्षर से वही अङ्कार भूत - भविष्यत् - वर्त्तमान, इन तीन कालों का, एवं कालातीतभाव का साक्षी बनता हुआ ' सर्वम् ' बन रहा है, जैसाकि निम्नलिखित उपनिष-च्छ्र ु तियों से स्पष्ट है— १ – “ श्रो मित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्, भविष्यदिति सर्ग-मोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ” – माण्डूक्योपनिषन् १ । - " सोऽयामात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा:, मात्राश्च पादाः - प्रकार-उकारो - मकार- इति " । ( माण्डूक्य ० ८। ) । ३ – “ अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः, प्रपञ्चोपशमः शिवः, अद्वैतः । एवमोङ्कार आत्मैव । स विशत्यात्मनात्मानं, य एवं वेद, य एवं वेद " ( माण्डूक्योपनिषत् १२ ) ४- - " तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योऽन्यसक्ता अनुविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ” - प्रश्नोपनिषत् ५।६ । ब्रह्मा ने ओङ्कार के प्रथम वर्ण से ( कार से ) अपू तथा स्नेह तत्त्व की व्याप्ति प्राप्त की, एवं दूसरे बर्ण से ( मकार से ) तेज, तथा ज्योतिर्नामक तत्त्र में व्याप्त हुए । श्रोङ्कार की प्रथम स्वरमात्रा से पृथिवी, ग्रग्नि, ओषधि - वनस्पति, ऋग्वेद, भूः - व्याहृति, गायत्रीछन्द, त्रिवृत्स्तोम, प्राचीदिशा, वसन्तऋतु, इतने तो आधिदैविक तत्त्व प्राप्त किए, एवं अध्यात्म के रसनेन्द्रिय पर प्रभुत्त्व स्थापित किया । दूसरी स्वरमात्रा से अन्तरिक्ष, वायु, यजुर्वेद, भुवः - व्याहृति, त्रिष्टुप्छन्द, पञ्चदशस्तोम, प्रतीचीदिशा, ग्रीष्मऋतु, इन श्राधिदैविक तत्त्वों को,, एवं घ्राणेन्द्रिय नामक आध्यात्मिक तत्त्व को प्राप्त किया | तीसरी स्वरमात्रा से लोक, आदित्य, सामवेद, स्वः - व्याहृति, जगतीछन्द, सप्तदशस्तोम, उदीची-दिशा, वर्षाऋतु, इन आधिदैविक तत्त्वों को, एवं चतुरिन्द्रिय नामक अध्यात्मिक तत्त्व को प्राप्त किया । चौथी स्वरमात्रा से ‘ आपः ' नामक चतुर्थलोक, चन्द्रमा, अथर्ववेद, नक्षत्रों का, ' ग्रोम् ' इस समष्टि से चपनी श्रात्मसमष्टिं का, अनुष्टुप्छन्द, एकविंशस्तोम, दक्षिणा दिकू, शरदऋतु, इन ग्राधिदैविक तत्त्वों का, एवं इन्द्रियलक्षण मनोनामक आध्यात्मिक तत्त्व का संग्रह किया ।

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मायभूमिका श्रोङ्कार की ' मकार ' श्रुति से इतिहास, पुराण, वाकोवाक्य, गाथा, नाराशंसी, उपनिषत्, अनुशासनादि का संग्रह किया । इसप्रकार इस ओङ्कार के द्वारा ब्रह्म ने सब कुछ प्राप्त कर लिया । " ( देखिए- गोपथब्राह्मए, पूर्व भाग १ प्र ०।१६, १७, १८,१६,२० ) । + “ औत्पत्तिक सम्बन्ध को सुरक्षित रखते हुए शब्दों का वाचकत्त्व इसी प्रक्रिया - सादृश्य पर अवलम्बित है ” उक्त शब्दार्थप्रक्रिया -सादृश्य विवेचन का यही निष्कर्ष है । इस निष्कर्ष के साथ ' सर्वे सर्वार्थवाचकाः ” से सम्बद्ध जो विप्रतिपत्ति उपस्थित होती है, उसका निराकरण - " लोके सन्नियमान् प्रयोगसंनिकर्षः स्यात ' ( १ | १ | २६ | ) इस तीसरे सूत्र से हो रहा है । दार्शनिक प्रकरण में इस सूत्रार्थ का स्पष्टीकरण कर दिया गया । है । इसप्रकार शब्दों का ( बागूलक्षण, श्रात्मानुगत नित्य शब्दों का ) नित्यत्व बतलाते हुए मीमांसासूत्र ( २४-२५–२६ सूत्रों से ) वाचकत्व - श्रवाचकत्व की मीमांसा करते हुए प्रक्रिया सादृश्य के आधार पर वाचकत्त्व प्रतिष्ठित कर रहे हैं । और यही इन २२ सूत्रों की वैज्ञानिक मीमांसा है, जिनका प्रधान लक्ष्य वाकू - लक्षण नित्य-शब्द बन रहे हैं । भगवान् जैमिनि ' शब्द ' को अवश्य ही नित्य बतला रहे हैं । परन्तु इस नित्यता के साथ शब्दों के ' वाक्शब्द, नादशब्द, ध्वनिशब्द, प्रयोगशब्द ' इन चार विवतों का विश्लेषण करते हुए हमें यह नहीं मुला देना चाहिए कि, जैमिनि का लक्षीभूत नित्यशब्द केवल वाक् शब्द है, जिसे वाक्शब्द न कह कर हम केवल ' वाकू ' ही कहेंगे, जिस वाक का कि ' सत्या - वेदमयी - नित्या - अनादिनिधना - स्वायम्भुवी ' - इत्यादि नामों से श्रुति ने यशोगान किया है । ऐसे नित्य वाक तत्त्व को मूल लक्ष्य बना कर ही हमें वेदों के पौरुषेयत्त्व-अपौरुषेयत्व का विचार करना है । ११- वेदापौरुषेयन्त्र - पौरुषेयत्व - मीमांसा -विज्ञ पाठकों को स्मरण होगा कि, केवल - ' क्या उपनिषत् वेद है? " इस प्रश्नसमाधि के सम्बन्ध में हमें भूमिका प्रथम खण्ड के ३७ वें पृष्ठसे श्रारम्भ कर प्रथमखण्डसमाप्ति पर्य्यन्त मतवादों का निरूपण करना पड़ा । एवं प्रस्तुत तृतीयखण्ड के आरम्भ से अब तक शब्दनित्यता के समर्थन के लिए मीमांसासूत्रों की दार्शनिक, तथा वैज्ञानिक दृष्टि से मीमांसा करनी पड़ी । इस महारम्भ के अनन्तर अब वह प्रतिज्ञात प्रश्न पाठकों के सम्मुख उपस्थित होने जा रहा है । इस सम्बन्ध में पहिले हम उन मीमांसा - सूत्रों की मीमांसा कर देना आवश्यक समझते हैं, जिनके श्राधार पर शब्द नित्यानुगामी मीमांसकों की दृष्टि में ' वेद ' अपौरुषेय बन रहा है, एवं जोकि पौरुषेयता सर्वथा प्रामाणिक, अतएव सर्वमान्य है । वेदा पौरुषेयत्त्व के समर्थक ६ सूत्रों की समष्टि ' वेदापौरुषेयत्त्वाधिकरण ' नाम से प्रसिद्ध अष्टम अधिकरण है, जिसमें निम्न लिखित सूत्रों का समाधेश है-१ – “ वेदांश्चैके संनिकर्षं पुरुषाख्या: " ( १,१।२७ | ) | २-- " अनित्यदर्शनाच्च " ( १ । १ । २८ ) । ३ – “ उक्तं तु शब्दपूर्णच्चम् ” ( १ । १ । २६ ।, । ४ – “ आख्याः प्रवचनात् ” ( १।१।३० । ) । + - इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' सन्ध्याविज्ञान ' नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ में देखना चाहिए । ६८

पृष्ठ 87

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तृतीयखण्ड ५ – “ परं तु श्रुतिसामान्यमात्रम् ” ( १ | १ | ३१1 ) ६ – “ कृते वा विनियोगः स्यात्, कर्म्मणः सम्बन्धात् ” ( १।१।३२ ) इति वेदापौरुषेयच्चाधिकरणम् ” भगवान् जैमिनि ने ' वाक्- लक्षण ' नित्य शब्द को लक्ष्य बनाते हुए शब्दनित्यत्त्व स्थापित किया है । एवं इसी सिद्धान्त को लक्ष्य बनाते हुए महर्षि ने वेदापौरुषेयत्त्व अधिकरण का समावेश किया है, और यही विज्ञानानुमोदित राद्धान्त है । परन्तु व्याख्याताओं की व्याख्या से ऐसा भान हो रहा है कि, उन्होंनें जैमिनि-सूत्रों को प्रयोगलक्षण - शब्दपरक लगाते हुए इन प्रयोगशब्दों की ही नित्यता का समर्थन किया है, जोकि एकान्तः प्रौढ़िवाद है । उसी प्रयोगशब्द को लक्ष्य में रख कर इसे ही नित्य मानते हुए व्याख्याता श्रोंनें प्रकृत के वेदापौरुषेयत्व अधिकरण के समन्वय करने की चेष्टा की है । अपनी सहजभाषा में व्याख्याताओं के इस मन्तव्य का हम इसप्रकार अभिनय कर सकते हैं कि, शब्दात्मक वेदशास्त्र में पटित प्रयोगात्मक मन्त्रशब्द व्याख्याताओं की दृष्टि में नित्य हैं, एवं ये ही अपौरुषेय हैं । पहिले हम इसी दृष्टि को लक्ष्य बना कर उक्त ६ औं सूत्रों का समन्वय कर देना चाहते हैं । इस सम्बन्ध में व्याख्याताओं की २ सूक्तियों पर विशेष ध्यान रखते हुए ही प्रकृत अधिकरण का समन्वय करना चाहिए

१ - विध्यादिरूपो यः शब्दः सोऽनित्योऽथाविनश्वरः ।

अनित्यो वर्णरूपचाद्वर्णे जन्मोपलम्भनात् ॥

२- अबाधितप्रत्यभिज्ञाबलाद्वर्णस्य नित्यता । उच्चारणप्रयत्नेन व्यज्यतेऽसौ न जन्यते || ( जै ० न्या ० विस्तरः ) " वेदविधिचोदित शब्द अनित्य हैं, अथवा अविनश्वर ( नित्य ) १, इस प्रश्न के उपस्थित होने पर सहसा यही निश्चय हो जाता है कि, शब्द वर्णसमिष्टरूप है, एवं वणों की कण्ठताल्यादि के अभिघात से उत्पत्ति देखी जाती है 1 । उत्पत्तिधर्म्म नश्वर है, फलतः नश्वर वर्णसमष्टिरूप शब्द सर्वथा अनित्य हैं " यह पूर्वपक्ष केवल न्यायनय से ही सम्बन्ध रखता है । व्याकरणशास्त्र जहाँ शब्दनित्यता का पक्षपाती है, वहां न्यायशास्त्र शब्द- अनित्यता का पोषक माना गया है । व्याकरणशास्त्र जिस शब्द को नित्य कहता है, वह वर्णसमष्टिरूप प्रयोगलक्षण शब्द नहीं है । श्रपितु वर्णसमूहलक्षण शब्द सुनने के अनन्तर जिम तत्त्व के आधार पर समूहालम्बनात्मक जो ' मानस प्रत्यय होता है, वर्णातिरिक्त वह ' स्फोट ' रूप ( वाक ) शब्द ही नित्य शब्द है । इस स्फोट की दृष्टि से अवश्य ही शब्द नित्य है । स्फोट पदार्थ को न मानने वाले नैय्यायिकों का वर्णसमूहलक्षण शब्द सर्वथा अनित्य ही है । और इसी न्यायदृष्टि से पूर्वपक्ष बन रहा है । इसप्रकार प्रथम कारिका से पूर्वपक्ष का उत्थान कर व्याख्याता ने उत्तर कारिका से यह समाधान करने की चेष्टा की है कि, एक ही गोशब्द का अनेक पुरुष एक ही समय में अनेक बार उच्चारण करते हैं । इन सभी गोशब्दों ' वे ही गगारादि है ' इसप्रकार की अत्राधित प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा के

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भाष्यभूमिका बल से वर्ण अवश्य ही नित्य हैं । रही बात उच्चारण- प्रयत्न से वर्णों के विनिर्गमन की । इस सम्बन्ध में व्यञ्जक - मर्यादा से काम चलाया जा सकता है । उच्चारण प्रयत्न वर्णों का अभिव्यञ्जक मात्र है, उत्पादक नहीं । मिट्टी में पहले से गन्ध विद्यमान है । पानी के छीटों से उसकी अभिव्यक्तिमात्र हो जाती है । अप-सिञ्चन - प्रयत्न गन्ध का अभिव्यञ्जकमात्र है, न कि उत्पादक । ठीक यही बात यहाँ समझनी चाहिए । वर्ण नित्य, तत् समष्टिरूप प्रयोगलक्षण शब्द भी नित्य, तत्समष्टिरूप वेद भी ( वेदशास्त्र भी ) नित्य, अतएव शब्दात्मक वेदशास्त्र भी अपौरुषेय ही माना जायगा । अत्र इस सम्बन्ध में कुछ एक नए पूर्वपक्ष उपस्थित होते हैं । उनका क्रमशः उल्लेख किया जाता है । अनन्तर इनका क्रमिक समाधान किया जायगा । ( १ ) शब्दात्मक वेदशास्त्र पुरुषप्रयत्नसाध्य बनता हुआ पौरुषेय है?, अथवा पुरुषप्रयत्नासाध्य बनता हुआ अपौरुषेय है?, यह प्रश्न है । यदि किसी प्रकार से वेदों का पौरुषेयत्व सिद्ध हो जाता है, तो पूर्वप्रतिज्ञात ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' यह चोदनाप्रामाण्य निरपेक्ष प्रमाण नही रहता । पूर्वपक्षी पूर्वपक्ष उठाते हैं कि, ' तेन प्रोक्तम् ' ( पा ० सू ०४ | ३ | १०१ ) इत्यादि सूत्रप्रकरणों में ' काठकम् - कौथुमम् - तैत्तिरीयकम् ' इत्यादि रूप से पुरुषसमाख्या देखी सुनी जाती है । ' कट से कहा गया काढक ' यह व्यवहार सिद्ध कर रहा है कि, वेदमन्त्र पुरुषविशेषों के द्वारा तत्तत्समयविशेषों पर बनाए गए हैं । यही पुरुषसमाख्या वेदों के कालसंनिकर्ष की सूचिका भी बन रही है । कटादि पुरुषों से पहिले काठकादि वेद न थे, यह सिद्ध विषय है । फलतः इस पुरुष -समाख्या के आधार पर यह कहा जा सकता है कि, ये पौरुषेय वेद न तो अनादि हैं, अतएव न नित्य हैं । अतएवच न इन्हें निरपेक्ष प्रमाण ही माना जा सकता । क्योंकि भ्रान्त पुरुष की रचना कभी निर्भ्रान्त नहीं हो सकती । यही पहिली विप्रतिपत्ति है, जिसका — ' वेदांों के संनिकर्षे पुरुषाख्या: ' सूत्र से स्पष्टीकरण हुआ है । ( २ ) — अपिच, वेदप्रतिपादित अर्थ जनन - मरण - धर्म से श्राक्रान्त देखे सुने जाते हैं । ' बन्नरः प्राबाहरिणरकामयत ' – ' कुसुरुबिन्द दाल किरकामयत ' इत्यादि वेदवचन स्पष्ट ही श्रनित्यता के समर्थक बन रहे हैं । ' प्रवाहण के पुत्र, श्रतएव प्रावाहणि नाम से प्रसिद्ध बचर ने इच्छा की ' यह वाक्य बतला रहा है कि, प्रावाहणि से पहिले यह ग्रन्थ न था । अपने पूर्वभावी वृत्त का ही ग्रन्थ में निर्देश रहता है । यदि वेद में प्रावाहणि, औद्दालकि, आदि का निर्देश है, तो मानना पड़ेगा कि, ये पुरुष वेद से पहिले उत्पन्न हुए, एवं वेद पीछे बने । फलतः इस हेतु से भी वेद की अनित्यता हो सिद्ध हो रही है, जिस हेतु का- ' अनित्य-दर्शनाच्च ' सूत्र से स्पष्टीकरण हुआ । है 1 ( ३ ) - उक्त दो सूत्रों से पूर्वपक्ष का उत्थान हुआ । अब आगे के चार सूत्रों से उत्तरपक्ष का स्पष्टी -करण किया जाता है । वर्ण नित्य, वर्णों की समष्टि रूप शब्द नित्य, शब्दार्थ का सम्बन्ध नित्य, तद्रूप वेद-शास्त्र नित्य, फिर इसे पौरुषेय क्यों कर माना जा सकता है । शिष्य - गुरु- परम्परा से ही वेदों का अध्ययना-ध्यापन सदा से चला आ रहा है । कहीं भी तो वेदकर्त्ता का उल्लेख नहीं है । इसप्रकार ' श्रत्पत्तिस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः ' इत्यादि पूर्व सूत्रों में ही शब्दनित्यता, शब्दार्थनित्यता द्वारा वेद का अपौरुषेयत्त्व बतलाया जा चुका है । पुनः इस सम्बन्ध में प्रयास करना व्यर्थ है । ' उक्तं तु शब्दपूर्वत्त्वम् ' सूत्र इसी सिद्धान्तपक्ष का विश्लेषण कर रहा है । ७०

पृष्ठ 89

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तृतीयखण्ड ( ४ ) - शब्द नित्यता, एवं शब्दार्थनित्यता के आधार पर वेद का पौरुषेयत्त्व तो पहिले ही प्रतिपादित है । अतः इस सम्बन्ध में ' वेद पौरुषेय हैं?, अथवा अपौरुषेय १, यह प्रश्न उठाना तो व्यर्थ है । हाँ इस सम्बन्ध में पुरुषाख्या, तथा अनित्यदर्शनरूप जो दो आक्षेप हुए हैं, उनका समाधान सामयिक है । पुरुष-समाख्या अवश्य है । परन्तु इसे पौयेयत्त्व का प्रतिबन्धक नहीं माना जा सकता । यह समाख्या केवल अध्ययनसम्प्रदायप्रवृत्ति का ही समर्थन कर रही है । स्वाध्यायपरम्परा का आरम्भ जिसने सर्वप्रथम किया, वही समाख्या का अधिकारी बन गया । कौन कहता है कि, कट तित्तिरि आदि से पहिले वेद न थे । कौन कहता है कि, इन्होंनें कट - तित्तिरि आदि वेदशाखाओं का निर्माण किया । यदि ये इनके निर्माता होते, तो श्रध्ययनपरम्परा में कहीं तो निर्मातृत्त्वेन इनका उल्लेख होता । रही बात ' काटकम् ' ' कौथुमम् ' इत्यादि समाख्याभावों की । इस सम्बन्ध में यही समाधान पर्याप्त होगा कि, यह समाख्या इनके प्रवचनकर्म्म से, दूसरे शब्दों में अध्ययनसम्प्रदायप्रवर्त्तकरूप से गतार्थ है । अतः पुरुषसमाख्या के हेतु से कथमपि वेदों का त्र्यनित्यत्त्व, तथा पौरुषेयत्त्व सिद्ध नहीं किया जा सकता । ' आख्याः, प्रवचनात् सूत्र इसी उत्तर का स्पष्टीकरण कर रहा है । ( ५ ) – दूसरा आक्षेप यह था कि, वेदों में ' बचरः प्रावाहणिरकामयत ' इत्यादि रूप से अनित्य भावों की उपलब्धि हो रही है, अनित्य पुरुषविशेषों का उल्लेख है । इसलिए वेद अनित्य, अतएव पौरुषेय हैं । इस सम्बन्ध में हमें ( व्याख्याता को ) यह कहना है कि, यहाँ प्रावाहणि से किसी मरणधर्म्मा पुरुषविशेष का ग्रहण अभीष्ट नहीं है । ' प्र ' शब्द प्रकृष्टार्थ का वाचक है, ' बहति ' प्रापणार्थक है । फलतः ' प्रावाहरिणः ' का अीँ है— ' य: प्रवाहयति ' । ' चवर ' अनुकरण है, न कि किसी व्यक्तिविशेष का नाम । प्रवहणशील वायु ' ब्रन्त्र ' रूप से शब्द करता हुआ इतस्तत: प्रवाहित रहता है, अतः वायु ही ' बवर प्रावाहणि ' है । इसप्रकार वेद के बो स्थल अनित्यधर्मावच्छिन्न व्यक्तिविशेषों की भ्रान्ति के कारण बने हुए हैं, वे सत्र यथार्थतः व्यक्तियों के नाम न होकर नित्य तत्त्वों के ही बोधक हैं । फलतः ' अनित्यदर्शनात् ' हेतु का भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता । अनित्यभावदर्शन के आधार पर वादी ने वेदों को अनित्यता के सम्बन्ध में जो दूसरा कारण बतलाया है, वह श्रुतिसामान्यमात्र है । शब्द का साम्यमात्र ही ' प्रवाहणस्यापत्यं प्रावाहरिण: ' इस प्रकार की भ्रान्ति का कारण है । वस्तुतः यह प्रवहणशील नित्य वायुतत्त्व का ही बोधक है " । ' परं तु श्रुतिसामान्यमात्रम् ' सूत्र इसी आक्षेप निराकरण का स्पष्टीकरण कर रहा है । 3 ( ६ ) –क्षेप का समाधान हो चुका । अत्र एक स्वतन्त्र शङ्का का अपनी ओर से उत्थान करते हुए सूत्रकार उसका समाधान करते हैं । शङ्का का स्वरूप यह है कि - " वनस्पतयः सत्रमासत ' - ' सर्पाः सत्रमा-सत ' - ' गावो वा एतन सत्रमासत ' इत्यादि वेदवचन उन्मत्त बालप्रलापस्थानीय बनते हुए सम्पूर्ण वेद क प्रामाणिकता के विघातक बन रहे हैं । ' वनस्पतियों नें यज्ञ प्रारम्भ किया । ' यह वाक्य इस लिए प्रलाप है कि, यज्ञ चेतनपुरुषयत्नसाध्य है । भला सर्वथा जड़ वनस्पतियाँ, किंवा चेतन भी सर्प, और गौवें मन्त्र - हविद्रव्य -त्रेताग्नि - ग्रादि से युक्त यज्ञका अनुष्ठान करेंगीं, यह कौन बुद्धिमान् स्वीकार करेगा? | अवश्य ही बेटका कितना ही भाग बुद्धिगम्य पदार्थों का निरूपण करता हुआ तदंश से धर्म में प्रमाण माना जा सकता है । परन्तु ‘ वनस्पतयः सत्रमासत ' इत्यादि लक्षण वेदभाग उन्मत्तप्रलापस्थानीय बनता हुआ कथमपि प्रमाण नहीं माना जासकता । फलत: ‘ चोदनाल क्षणोऽर्थो धर्म: ' इस धर्मलक्षण वा सम्पूर्ण वेद के साथ सम्बन्ध नहीं माना जासकता । ७१

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भाष्यभूमिका सूत्रसूचित शङ्काका सूत्र से ही समाधान करते हुए ( व्याख्याता ) कहते हैं कि, ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्ग-कामो यजेत ' - ' सोमेन यजेत ' इत्यादि विधिवाक्य साध्य - साधनेतिकर्तव्यताविशिष्टार्थभावनाविषयक बनते हुए परस्पर सम्बद्धार्थ के प्रतिपादक बन रहे हैं । ऐसे विधिवचनों को कथमपि मत्तप्रलाप नहीं माना जातकता । अब रही बात ' वनस्पतयः सत्रमासत ' इत्यादि वाक्यों की । इस सम्बन्ध में यही समाधान पर्य्याप्त होगा कि, पुरुषप्रयत्नसाध्य सत्र ( यज्ञ ) में उपयुक्त वनस्पत्यादि की स्तुति ( प्रशंसा ) ही ' वनस्पतयः ० ' इत्यादि वाक्यों से अभिप्रेत है I । " जी श्रमुक के अमुक यज्ञ की महत्ता का क्या कहना, इस में चेतन विद्वान् ऋत्विक ब्राह्मण तो क्या, श्रचेतन वनस्पतियाँ भी भाग ले रहीं हैं " इसप्रकार योग्य कर्म्मट याज्ञिकोंके द्वारा सञ्चालित यज्ञक के वैशिष्ट्य सूचन के लिए ही उक्त स्तुतिवचन प्रयुक्त हुए हैं । इसका यह तात्पर्य नहीं है कि, वनस्पतियाँ सच-मुच में पुरुष की भाँति स्वतंत्ररूप से यज्ञानुष्ठान कर रहीं हैं । लोक में भी ' सन्ध्यायां मृगा अपि न चरन्ति, किं पुनर्विद्वांसो ब्राह्मणाः ' इत्यादिरूप से व्यवहार देखा जाता है । मृग यह नहीं जानते कि, सन्ध्या-वेला में भोजन करना निषिद्ध है । केवल निन्दनीय बतलाने के लिए मृगों के सम्बन्ध में ' मृगा अपि न चरन्ति ' यह कह दिया है । इस प्रकार जिन वेदवचनों के अर्थों में ऐसा बोध प्रतीत होता है, उन्हें स्तुतिपरक मानते हुए ही समन्वय कर लेना न्यायसङ्गत माना जायगा । ' कृते वा विनियोगः स्यात् कर्म्मणः सम्बन्धात् ' सूत्र इसी न्यायसङ्गति का समर्थन कर रहा है । ” इसप्रकार प्रयोगलक्षण शब्दों को नित्य समझने वाले व्याख्याताओंने उक्त ६ मीमांसा -सूत्रों का उक्त तात्पर्य्य लगाते हुए यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि, प्रयोगलक्षण शब्दसमष्टिरूप वेदशास्त्र सर्वथा अपौरुषेय है । व्याख्याताओं के इस प्रातिश्विक मन्तव्य की मीमांसा इसलिए अनावश्यक है कि, अभी उन्हें उस तात्त्विक वेद के स्वरूप का भान ही नहीं है, जिसे लक्ष्य बना कर भगवान् जैमिनि ने शब्दनित्यता का समर्थन करते हुए प्रकृत अधिकरण से उसकी अपौरुषेयता सिद्ध की है । अस्तु, अत्र हमें उस विज्ञानदृष्टि से प्रस्तुत अधिकरण की मीमांसा करनी चाहिए, जो विज्ञानदृष्टि सर्वथा निर्भ्रान्त बनती हुई श्रद्धा - विश्वास की मलभित्ति मानी गई है । सूत्रकारने महारम्भ के साथ वागलक्षण शब्दों की नित्यता सिद्ध करते हुए इनका वाचकत्त्व व्यवस्थित किया । और इन दो उद्देश्यों की सिद्धि में मीमांसा १ अध्याय के प्रथमपाद के १-१-५ से आरम्भ कर १ | १ | २६ पर्य्यन्त के २२ सूत्रों का उपयोग हुआ, जिनमें १-१-५ से १-१-२३ पर्य्यन्त के १६ सूत्रों के द्वारा तो शब्दनित्यत्त्व स्थापित हुआा, एवं २४-२५ - २६, इन तीन सूत्रों के द्वारा बाचकता का समर्थन किया गया । इस उद्देश्य की सिद्धि के अनन्तर सूत्रकारके सम्मुख ' वेद पोरुषेय हैं, अथवा अपौरुषेय?, एतत् - प्रश्न मूलक वेदप्रामाण्यवाद की मीमांसा उपस्थित हुई । इसी के निश्चयार्थ प्रतिपादन के लिए १-१-२७ से प्रारम्भ कर १-१-३२ सूत्र पर्य्यन्त ६ सूत्रों का ' वेदापौरुषेयत्त्व - अधिकरण ' हमारे सम्मुख उपस्थित हुआ । मीमांसा - सूत्रों की इस सङ्गतिको लक्ष्य में रख कर ही हमें इनकी विज्ञानदृष्टि सम्मत मीमांसा करनी है । ( १ ) वामूलक्षण शब्द जहाँ सर्वथा नित्य है, वहाँ प्रयोगलक्षण शब्द सर्वथा श्रनित्य हैं, इस दृष्टि-कोण को लक्ष्य में रखते हुए विषय पर दृष्टि डालिए । प्रयोगलक्षण शब्द क्योंकि सर्वथा अनित्य हैं, अतएव इनका सन्निकृष्ट कालत्त्व सूपपन्न है । तात्पर्य्य यह हुआ कि, प्रयोगात्मक शब्द अनित्य हैं । श्रतएव मानना पड़ता ७२