वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 101–110

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 101–110

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वेदार्थपारिजातः 19 ननु चोदनाप्रामाण्यमसिद्धमिति कुतस्त्योऽनुमानवाध इति । तन्न त्वन्मते चोदनाप्रामाण्यासिद्धावपि वैदिकानां तत्सिद्धेर्निष्प्रत्यूहत्वात् । तवापि संवादसंदिग्धाविपर्यस्तार्थवुद्धेनिष्पन्नत्वेन प्रामाण्यासिद्धेरभावाच्च द्वेषादसिद्धयुक्त्याऽपि न तदप्रामाण्यम् । न वात्मेच्छाद्वेषादिभिरप्रामाण्यं वक्तुं युक्तम्, अग्निदाहादिदुःखप्रत्यक्षस्याप्रामाण्यापादना भिवात् । अभिलपिःस्य ज्ञानस्याभिलाषाविपयत्यमात्रे प्रामाण्यानुपपत्तेश्च । तस्मादालोकवद् वेदेन सर्वसाधारण्येनासंदिग्धा विपर्य-स्वार्थावबाधजननात् स्वाभाविकमेव प्रामाण्यम् । यदुक्तम् ' वेदार्थो दुर्बोधः, लोके प्रमाणान्तरच्छेद्यत्वाद्वाक्यार्थस्य तदवगमोपायत्वं शब्दानां योजयितुं शक्यते । वेदार्थस्त्वतीन्द्रियः । न च गवादिमतां तद्दर्शनकौशलमस्ति । अत एव तदर्दाशिनां वृद्धव्यवहारादिना व्युत्पत्तिरपि न सम्भवति । न च वेदे ' वृद्धिरादैजि ' ति पाणिनिरिव हस्तः करः पाणिरिति, अभिधानमालाकार इव एषोऽस्य मानकस्थ शब्दस्थार्थ इत्युपदेशोऽस्ति । तदुक्तं धर्मकीर्निना ---स्वयं रागादिमानर्थं वेति चेत्तस्य नान्यतः । न वेदयति वेदोऽपि वेदार्थस्य कुतो गतिः? ॥ यदि far मनिरुक्तव्याकरणवशेन तदर्थकल्पना क्रियते, तर्हि नानामतित्वादुपदेश्याना मनेकार्थत्वाच्च नाम्ना-मुपसर्गनिपातानाच न नियतः कश्चनार्थः, अन्यथा तत्कल्पनासम्भवाच्च । तदप्युक्तं तेनैव तेनाग्निहोत्र ' जुहुयात्स्वर्गकाम: । ' " अन्य इन्द्रियों से ग्रहण न होने पर रसादि का अभाव नहीं मान लिया जाता, क्योंकि यह नियम देखा गया है कि रसादि का ग्रहण निश्चित रूप से जिह्वा प्रभृति से ही होता है " । है कि वेद का ना हो जब सिद्ध नहीं है तो उससे अनुमान का जाध कैसे होगा? इसका उत्तर यही है कि आने मत में वेद का शारण्य गले ही हो, किन्तु वैदिकों की दृष्टि से वेदों का निर्वाध रूप से सिद्ध है । आपको भी वेद अदिग्ध और विपरीत ज्ञान की प्राप्ति होता है तो फिर उसमें प्रामाण्य की सिद्धि क्यों न होगी । न दी गई गन्त युक्तियों में वह माण नहीं हो सकता । अपने में विद्यमान वच्छा, द्वेष यादि के कारण वेद में अप्रामान्य सिद्ध नहीं किया जा सकता? नाव से काने पर व्यक्ति को जो दुख की प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है, उसने अन्य व्यक्ति अप्रमाण नहीं सिद्ध कर सकता । इच्छा के विषभूत ज्ञान का सभी इच्छा के विषय में प्रामाण्य तो बन ही नहीं सकता । इसलिये जैसे प्राण में व्यक्ति को असंदिग्ध और अविपरीत अर्थ का ज्ञान होता है, उसी प्रकार बंद में भी सर्वसाधारण को सब प्रकार के संशयों से रहित और विपर्यय ( विपरीत ज्ञान ) से रहित ज्ञान ही स्वभावतः होता है, ततः उसका प्रामाण्य भी स्वाभाविक ही है । कहा जाता है कि वेद का अर्थ समझना बड़ा कठिन है । लौकिक वाक्यों का अर्थ अन्य प्रमाणों से भी परीक्षित हो सकता है, अत: शब्दों के द्वारा भी उनका गम हो सकता है | वेद प्रतिपादित अर्थ तो अतीन्द्रिय है । राग - द्वेष प्रभृति दोषों से युक्त पुरुष इतनी सामर्थ्य नहीं है किं वेद प्रतिपादित अर्थ का साक्षात्कार कर सके | इसीलिये वृद्ध व्यवहार आदि से भी यहाँ पर व्युत्पत्ति ( तत्तत् शब्दों की तत्तत् अर्थ का ज्ञान कराने वाली शक्ति का ज्ञान ) में सहायता नहीं मिल सकती । पाणिनि ने जैसे " वृद्धिरादैज् " इस सूत्र में वृद्धि पद को प frafta fear हैं, aar जैसे कोई कोशकार हस्त, कर, पाणि प्रभृति पदों की पर्यायता बताता है, उस तरह की कोई व्यवस्था वेद में शब्दों का अर्थ समझने की है नहीं । जैसा कि धर्मकीर्ति ने कहा है ----" रागादिमान् पुरुष स्वयं वेदार्थ को जान लेता है, में वेदार्थ की क्या गति होगी? अर्थात् उसको कैसे समझा जा यह संभव नहीं है । वेद भी अपने अर्थ को नहीं बताता, ऐसी परिस्थिति सकेगा " । यदि निगम, निरुक्त, व्याकरण की सहायता से उसका अर्थ किया जाता है जिनको वेदार्थ समझाना है, उनकी बुद्धि aff त भाँति की है, शब्द मी अनेकार्थक हैं, नाम, उपसर्ग और निपास इनका कोई निश्चित अर्थ भी नहीं होता, इनके अर्थ के ज्ञान के लिये दूसरे किसी प्रकार या साधन की कल्पना भी संभव नहीं है और विपरीत अर्थ की भी कल्पना की जा सकती है, जैसा कि धर्मकीर्ति ही कहा है कि स्वर्ग की कामना वाला व्यक्ति ननिहोन करें इस वाक्य से यह अर्थ क्यों नहीं निकलेगा कि कुत्ते का मांस खाय ",

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७२ इति श्रुतौ । खादेच्छ्वमांसमित्येष नार्थ इत्यत्र का प्रभा ॥ ' इति, तदपि लुच्छम्, य एव लौकिकाः शब्दास्तदर्थाच त एव वैदिकाः शब्दास्तदर्थारचेति सिद्धान्तानभिज्ञानात् । तथाहि नाभिनवाः केचन वैदिकाः शब्दाः, वाक्यरचनामात्र ' तु वेदे भिद्यते । वेदश्च तदर्थाश्च तदवगमश्च तदुपायश्च तदनुष्ठानञ्च नाद्यत्वे प्रवृत्तानि, किन्तु सीमांसकानां मते तान्यनादीनि, तैयायिकादीनां मते तु सर्गात्प्रभृतिप्रवृत्तानि, कस्तेष्वद्य पर्यनुयोगावसरः? तेन पूर्वोक्तपारम्पर्यं सहकृतेषु निरुक्तव्याकरण मीमांसादिशास्त्रेषु सत्सु कुतो वेदार्थावगमे विप्रतिपत्तिरपि । रागादिमानपि ' अग्निहोत्र ' जुहुयात्स्वर्गकाम: ' इति वाक्यादग्निहोत्राख्यं कर्म स्वर्गसाधनमिति जानात्येव । द्वेषादपि नान्यथार्थं प्रत्येतुं कश्चनापि शक्नोति । धर्मकीर्तिना तु ' खादेच्छ्वमांसम् ' इत्याद्यपभापणेन वेदनिन्देव कृता । तत्पात चीनादिदेशीयेषु बोद्धेषु श्वमांसाशित्वं जातमिति । तस्मात्-शक्तिग्रहादिभिस्तैस्तैर्बोधोपायैः सुनिश्चितेः । लोके यथा तथा वेदे शब्दार्थावगतिः सदा ॥ रागादिमानपि प्राज्ञः शब्दार्थं वेद निश्चितम् । द्वेषादपि विरुद्धार्थं न कर्तुं प्रभवेत्ततः ॥ पारम्पर्यसमायातमर्थ त्यक्त्वा प्रमादतः । वेदनिन्दा कृता तेन बौद्धास्तं कुक्कुरादिनः ॥ पारम्पर्यसमुच्छित्था ह्यन्यथार्थप्रसाधनम् । यदीष्टं प्रभवेत्तेषां बुद्धमन्त्रोऽपि गालिदः ॥ यदपि च ' यदि रागादिराहित्येन जमिन्यादीनां वेदार्थशता तदा बुद्धादीनां रागादिराहित्येन सर्वज्ञता कि न स्यात्? यदि वृद्धादिपु रागादिराहित्यं न सम्भवति तदा जंगिन्यादिपु तत्कथं सम्भाव्येत? ' तदपि न रागादिसापि वेदार्थशत्व-सम्भवात् । नदि रागादय: कम्बलादिवदावरका विज्ञानस्य, किन्तु तदाक्षिप्तमना विविधविषयतृष्णापरिष्कृतो न शक्नोति यह पूरा कथन कोरी बकवास है, वक्ता ने इस बात को ठीक से नहीं समझा है कि जो कि एक और अर्थ हैं वैदिक शब्दार्थ उनसे भिक्ष नहीं है । वैदिक शब्दों में कोई नवीनता नहीं है । वेद में केवल काव्य रचना में थोड़ा अन्तर हो जाता है । देन्द्र, उसका अथें, उसका ज्ञान उसको जानने के उपाय और उनका अनुष्ठान ये सन बाज नहीं प्रयुक्त हुए हैं, ferg मीमांसकों के मत से ये सब अनादि काल से प्रवृत्त 1 नैयायिक इनको सर्ग के आरम्भ काल से ईश्वर के द्वारा प्रवृत्त मानते हैं । उन पर शंका ठानेका दाज अवस्रद ही कहीं है । इसलिये पूर्वोक परम्परा के साथ निस्क, व्याकरण मोबांसा प्रभृति शास्त्रों की परम्परा के रहते वेदार्थ की अवनति ( ज्ञान ) विप्रतिपत्ति ( संशय ) का प्रसंग ही कहा है? रामादिमान् व्यक्ति भी " अग्निदोन जुयात् स्वर्गपाय: " इत्यादि पायों से अग्निहोत्र नामक कर्म स्वयं का साधन है, यह जान ही देता है । द्वेष भी कोई यह नहीं जान सकता कि इसका अर्थ यह नहीं है । धर्मकीर्ति ने ' कुत्ते का मांस खाय ' ऐसा दुर्वचन कहकर केवल वेद की दवा की है । उसी का यह परिवार है कि चीन प्रभृति दों में बौद्ध कुत्ते, गधे आदि का मांस भी खाने लगे हैं और कीड़े - मकोड़े, मुग आदि को सलर चटनी प्रचार बादि वहा भी था जसे है । इसलिये ---" लोक में जैसे किस शब्द को fee अर्थ में शक्ति है, इस बात के जानने के व्याकरण प्रभृति सुनिश्चित उपायों से शब्दों के aa की अति होती है, उसी प्रकार वेद में भी होती ही है । समादि से युक्त विद्वान् भी इन निश्चित उपायों से अर्थ को जान लेता है और द्वेषवश भी कोई यह नहीं कह सकता कि इसका यह अर्थ न होकर कोई दूसरा अर्थ है । प्रसाद वन पर प्राप्त अर्थ को छोड़कर बौद्धों ने वेद की निन्दा की, उसका नाज परिणाम यह है कि वे भाजकल वास्तव में कुले का मांस खाने लगे हैं । परम्परा को न मानकर यदि मन का ही अभीष्ट हो तो इस पद्धति से वृद्ध मन्त्र को भी किसी माली का पर्यायवाचो मानने में क्या बाधा होगी " । यह जो कहा गया है कि रागादि से विमुक्त होने के कारण जैसे आप जैमिनि प्रभृति को वेदार्थं का ज्ञाता मानते हैं, उसी तरह रागादि से रहित होने से बुद्ध आदि को भी सर्वेश क्यों न माना जाय? यदि बुद्ध प्रभृति में रागादि का बसाव नहीं सिद्ध हो सकता तो वह जैमिनि प्रभूति में कैसे सिद्ध हो सकता है? इसका उत्तर यही है कि रागादि के रहते भी बेदार्थ के ज्ञान में कोई बाधा नहीं है । रागादिदोष कम्बल की तरह विज्ञान को ढक नहीं देते, किन्तु इन दोषों से मन के विक्षिप्त हो जाने पर विविध विषय तृष्णा में

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वेदार्थारिजातः ७३ भावयितुमिति भावनादरमात्र एव रागादिविरहोपयोगः । वेदार्थज्ञानस्य वेदप्रमाणमूलत्वेन सम्भवेऽपि सर्वज्ञानस्य प्रमाणा-भावान्न सम्भवः । शब्दार्थज्ञानाय शब्द एवापेक्षितो न भावनादिः, अन्यथा भावनाविधिज्ञानस्यापि भावनापेक्षायामन्योन्यो-न्याश्रयादयो दोषा अपरिहार्या एव स्युः । तेन रागादिमतोऽतीन्द्रियेऽर्थे प्रत्यक्षासम्भवेऽपि वाक्यार्थज्ञाने वाघासम्भवात् । बुद्धादिवचनानामप्रामाण्यम् नन्वेवं बौद्धवाक्यादपि ज्ञानोत्पत्तेस्तस्यापि वेदवत् प्रामाण्यमिति चेन्न । अतीन्द्रियेऽर्थे पुरुषस्य दर्शनाशक्त्या भ्रान्तिविप्रलम्भमूलतया तद्वाक्यस्य दुष्टत्वेनोत्सर्गिकस्यापि प्रामाण्यस्य तत्रापवादात् । वेदस्य त्वपौरुषेयत्वात् तत्रा-प्रामाण्यशङ्काऽपि नोदेति । न च वेदस्य किमिति कर्त्ता नाङ्गीक्रियत इति वाच्यम्, कल्पनागौरवात् । तथापि -- सम्यक्त्व-वादिनो वेदानां प्रामाण्याय महाजनपरिग्रहं वर्णयन्ति । अन्येष्वागमानाम् । तदिदं सर्वमप्रमाणमेव । नैतत्सर्वं मीमांसकैः कल्प्यते वेदप्रामाण्याय । " न दृष्टादधिकं किञ्चिददृष्टं परिकल्प्यते । " हुआ मन ठीक भावना नहीं कर सकता, अतः रागादि के अभाव का प्रयोजन केवल भावना में आदर बुद्धि उत्पन्न करना मात्र है | वेद प्रमाण मूलक होने से बेदार्थ का ज्ञान हो भी सकता है, ferg सर्व विषयों का ज्ञान संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं जिससे सर्व विषय का ज्ञान हो जाय । शब्दार्थ के ज्ञान के लिये शब्द ही अपेक्षित हैं, भावनादि नहीं । अन्यथा ' भावना विधि के ज्ञान में भी भावना को अपेक्षा मानने पर अन्योन्याश्रय प्रभृति दोषों का परिहार करना कठिन हो जायगा । इससे अन्त में यही मानना पड़ेगा कि रागादि से युक्त पुरुष को अतीन्द्रिय अर्थ का भले ही प्रत्यक्ष न हो, किन्तु वाक्यार्थ के ज्ञान में किसी प्रकार की बाधा नहीं उठ सकती । बुद्ध आदि के वचनों की अामाणिकता इस प्रकार से तो बोद्ध वाक्य से भी ज्ञान की उत्पत्ति होती ही है, तब उसको भी वेद के समान प्रभाव क्यों न माना जाय? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अतीन्द्रिय वस्तुओं को पुरुष देख नहीं सकता, अतः ऐसी वस्तुओं से सम्मद्ध पुरुष के वाक्यों में भ्रान्ति अथवा ठगी आदि दोपों को संभावना रहने से स्वाभाविक प्रामान्य बाधित हो जाता है । वेद तो अपोम्पेय है, अतः वहाँ भग, विप्रलम्भ आदि न होने के कारण अप्रामाण्य की शंका हो ही नहीं सकती । वे का कोई कर्ता आप नहीं मानते? वेद का कर्ता मानने में कल्पना करती होगी इससे दोष होगा । कुछ लोग वेद को प्रमाण इसलिये मानते हैं कि बड़े - बड़े महापुरुषों ने इसको मान है । अन्य लोगों का कहना है कि हमारे आगम ग्रन्थों को भी महापुरुषों ने माना है, अतः वे प्रमाण हैं । ये सब बातें अप्रमाण है । वेद के प्रामाण्य के लिये मीमांसक महाजन परिग्रह आदि को नहीं मानते । " दृष्ट से अधिक अदृष्ट की कल्पना करना उचित नहीं है " । १० १. एक भावना विधि के ज्ञान के लिये दूसरी भावना की जरूरत होगी तो दूसरी के लिये भी किसी तीसरी की जरूरत होगी या नहीं? यदि कहो कि तासरी की जरूरत नहीं होगी किन्तु दूसरी भावना का ज्ञान पहली भावना करा देवी, तो पहली से दूसरी का मान होने पर पहली भावना का ज्ञान होगा और उन पहली भावना का ज्ञान दूसरी भावना के बिना नहीं हो सकता । इसलिये एक दूसरे के अधीन एक दूसरे का ज्ञान. यह अन्योन्याश्रय होगा । यदि कहो कि पहली का दूसरी से और दूसरी का तीसरे से तो तीसरी के बात के लिये चौथी मानोगे या पहली के अधीन उसका ज्ञान मानोगे? यदि चोथी न मानकर पहलों से मानोगे तो तीसरी का पहली से, पहलो का दूसरी से, दूसरी का तीसरी से और तीसरी का फिर पहली से, पहली का दूसरी से, दूसरी का तीसरी से यह चक होगा | अगर तीसरी का पहली से न मानकर जौथो से मानोगे, तो चौथी का पाचवीं से और पाँचवें का छठी से इस तरह से अनवस्था हो जायगी । इन सब दोषों को दूर करने के लिये पहली का यदि पहली से ही ज्ञान मानें तो न्यायदोष होगा ।

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{ sa अपौरुषेयत्वेन नित्यनिर्दोषस्यासंदिग्धाविपर्यस्ताबाधितज्ञानजनकस्य वेदस्याप्रामाण्यशङ्काया नास्त्यवकाशः | दोषसंशयात् प्रामाण्यसंशयः, दोषनिश्चयाच्चाप्रामाण्यनिश्चयः । यथा चक्षुरादीनां प्रमाजनकत्वं स्वाभाविकम्, तथैव शब्द-स्यापि स्वाभाविकमेव तत् । अन एव ' स्वर्गकामो यजेत ' इति वेदवाक्येन विदितादतदर्थशाब्दन्यायसतस्त्वस्य यागात् स्वर्गो भवतीत्य संदिग्धमेव गम्यते । भवति स्वर्गो न वा? न भवत्येवेति संशयविपर्ययादिकमनेन न भवत्येव । तदुक्तं शवरस्वामिना-" यो हि जनित्वा प्रध्वंसते नैतदेवमिति स मिथ्याप्रत्ययः । न चैष कालान्तरे पुरुषान्तरेऽवस्थान्तरे देशान्तरे वा विपर्येति । " न हि बुद्धादिवाक्यस्यापि प्रमाजनकत्वस्वाभाव्याद् भवतु प्रामाण्यमिति चेन्न । तस्य पुरुषबुद्धिप्रभवत्वेन पुरुषाश्रितभ्रमविप्रलम्भादिदोषसद्भावसम्भवेन अलौकिकेऽर्थेऽप्रामाण्यात् । आप्तवचनस्य सम्भवत्प्रमाणमूलकस्य च वाक्यस्य प्रामाण्येऽपि अतथाभूतस्याप्रामाण्यानश्चयात् । नन्वेवं सम्बङ्मूलसापेक्षत्वेन प्रामाण्यस्य गुणापेक्षत्वमेवेति न प्रामाण्यस्वतस्त्वसिद्धिरिति चेन्न, अपवादभूता-प्रामाण्यनिवृत्यर्थमेव गुणद्वारा दोषाभाववर्णनात् । अनाप्ते ऽनृतवादिनि शक्येऽर्थे यद्यपि प्रमातृत्वशक्तिर्भवति, तथाप्यनाश्वा-सात् तत्राप्रामाण्यबुद्धिर्भवति । एवं सत्यवादिन्यपि अशक्येऽर्थे प्रमातुं शक्तिर्नास्तीति हेतोरप्रामाण्यम् । अप्रामाण्यञ्चात्र मृदोषादेव | नातीन्द्रियेऽर्थे पौरुपेय वैदिकया क्यमन्तरेणावगतिः सम्भवति । तथा च ' स्वर्गकाम त्यं वन्देत ' ' सर्व शून्यम् ' इत्यादीनि बौद्धवाक्यान्यसम्भवमूलकत्वेनाप्रमाणान्येव । यच्चोपदेष्टृत्वेन मन्वादिवद् वक्तव्यार्थज्ञानवत्त्वं बुद्धा-अपौरुषेय होने से नित्य निर्दोष, असंदिग्ध, अविपरीत, अबाधित ज्ञान का जनक होने के कारण वेद में अप्रामाण्य की आशंका के लिये कोई अवसर नहीं है । दोष की आशंका होने पर प्रामाण्य में संशय उठ सकता है और दोष का निश्चय हो जाने पर अत्रामाण्य निश्चित हो जाता है । जैसे चक्षुरादि इन्द्रियां स्वाभाविक रूप से प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) को ही पैदा करतो हैं, उसी प्रकार शब्द से भी स्वाभाविक रूप से यथार्थ ज्ञान ही उत्पन्न होता है । इसीलिये " स्वर्गकामो यजेत " ( स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे ) इस वेद वाक्य से उस व्यक्ति को यज्ञ करने से स्वर्ग होता है, यह वयं असंदिग्ध रूप से ज्ञात हो जाता है, जो के पद पदार्थ और उनके सम्बन्ध के ज्ञान को ठीक प्रकार से जानता है । ' इससे स्वर्ग होता है या नहीं ', यह संशय अथवा ' इससे स्वर्ग नहीं होता ', इस प्रकार का विपरीत ज्ञान इससे नहीं होता । जैसा कि शबर स्वामी ने कहा है --- " जो ज्ञान उत्पन्न होने के बाद नष्ट हो जाता है, अर्थात् बाधित हो जाता है कि यह ऐसा नहीं है, उसको मिथ्याज्ञान कहा जाता है | वेद वाक्य से जन्य ज्ञान कालान्तर पुरुषान्तर, अवस्थान्तर reat देशान्तर में बाधित नहीं होता " । प्रश्न उठता है कि इस परिस्थिति में तो बुद्ध प्रभृति के वाक्य भी स्वाभाविक रूप से प्रभा ( ज्ञान ) को पैदा करते हैं तो arer प्रामा क्यों नहीं माना जायगा? इसका उत्तर यही है कि बुद्ध प्रभृति के ये वाक्य पुरुष बुद्धि से पैदा हुए हैं, अतः इनमें पुरुष में I वर्तमान भ्रम, विप्रलिप्सामादि दोषों की संभावना होने से अलौकिक अर्थ में ये प्रमाण नहीं माने जा सकते | आप्त के बचन में और जिन वाक्यों के विषय में यह ज्ञात हो जाता है कि इनकी उत्पति सम्यक् प्रमाण मूलक है, तो उनमें प्रामाण्य की अवगति होने पर जी जो वाक्य ऐसे नहीं हैं, उनमें अप्रामाण्य का निश्चय हो जाता है । इस पर यह आपत्ति उठ सकती है कि यदि वाक्य का प्रामाण्य उसकी सम्यक् प्रमाणमूलकता की अपेक्षा रखता है तो की सदा ही अपेक्षा होने से प्रामाण्य का स्वतस्त्व कैसे बनेगा? उत्तर यह है कि अपवादस्वरूप अप्रामाण्य को निवृति के लिये ही दोषाभाव का निरूपण किया जाता है और वह होता है गुणों के द्वारा । अनात, असत्यवादी व्यक्ति के द्वारा उच्चरित वाक्यों में शक्यार्थ में यद्यपि प्रमातृत्व शक्ति विद्यमान है, तो भी afarare के कारण वहाँ पर अप्रामाण्य बुद्धि होती है । इसी तरह सत्यवादी के वाक्य में अशक्य अर्थ को समझने की शक्ति नहीं है, अतः वह उस अर्थ में अप्रमाण माना जाता है । कारणगत दोष के कारण हो airat स्थलों में aerer ष्य अभिप्रेत है । अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से न जाने जा सकने वाले ) अर्थ को अवगति ( ज्ञान ) अवैदिक arta fear नहीं हो सकती । इस प्रकार " स्वर्ग की कामना वाला चैत्य की FERT करे ", " सब कुछ शून्य है " इस तरह के बौद्ध वच सम्यक् प्रमाण मूलक न होने से अप्रमाण हैं । मनु प्रभृति स्मृतिशास्त्रों के उपदेष्टाओं को जैसे अपने वक्तव्यार्थ का ज्ञान था,

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वेदार्थपारिजातः ७५ दिष्वपि कल्पनीयमित्युक्तम्, तन्न; बालोन्मत्तादीनामपि तद्दर्शनेन व्यामोहमूलकत्वेनाप्युपदेष्टृत्वसम्भवेन बुद्धोक्तः प्रामाण्या-योगात् । मन्वादीनां वेदमनुसृत्यातीन्द्रियार्थोपदेष्टृत्वसम्भवेऽपि वेदमपलपती बुद्धादेस्तदसम्भवात् । यत्तु बुद्धादेः सर्वज्ञत्वेन अतीन्द्रियार्थोपदेष्टृत्वं सम्भवतीत्युक्तम्, तदप्यकिञ्चित्करम् षड्भिः प्रमाणैः सर्वज्ञश्वेत विरोधः । यज्जातीयैः प्रमाणैर्यज्जातीयार्थदर्शनं भवति तद्भवत्येव । एकेन तु प्रमाणेन सर्वज्ञतासमर्थने चक्षुषा रसादि-प्रतिपत्तिरपि प्रसज्येत । यत्तु योगजसामर्थ्येन साम्प्रतिकयन्त्रादिसाचिव्येन च सर्वज्ञता समर्थ्यते, तदपि तुच्छम् सामर्थ्यातिशयस्य स्वविषय एव कार्यातिशयकरत्वेनाविषये तदयोगात् । तदुक्तं भट्टपादैः-यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलङ्घनात् । सूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता ॥ ( चो. सू. वा. ११४ ) इति । योगजादिसामर्थ्यरपि न रूपे श्रोत्रप्रवृत्तिर्भवति, किन्तु व्यवहित विप्रकृष्टदेशस्थशब्दादेः श्रवणं सम्भवति, चक्षुषा च दूरस्थसूक्ष्मरूपादिदर्शनं सम्पद्यते । अत एवाद्यत्वेऽपि प्रमातृभेदेन सातिशयं प्रत्यक्षमुपलभ्यते । केचिदतिदूरमति -सूक्ष्मञ्च पश्यन्ति । ज्ञानमपि लौकिकं शास्त्रीयं च सातिशयं दृश्यते । एतेन कस्यचिद् बुद्धादेज्ञानमत्यन्तातिशयितं सर्वविषय-कमपि कथं न भवेदित्यपास्तम् । स्वविषये दूरसुक्ष्मादिदर्शन एव सामर्थ्यातिशय उपयुज्यते, न तदतिलङ्घने । न ह्यतिशयि-तमपि श्रोत्रं रूपे प्रवर्तते, नेत्रादयो वा शब्दे प्रवर्तन्त इति पार्थसारथिमिश्राः । air verr बुद्ध प्रभृति में क्यों नहीं माना जाय? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि बालक ओर उन्मत्त आदि में भी अपने वक्तव्यार्थ का ज्ञान होता है, तो भी इनके वचन व्यासोहमूलक हैं, अतः उनको जैसे प्रमाण नहीं माना जाता, वही स्थिति बुद्ध प्रभृति के वचनों की भी है, अर्थात् उनका भी उपदेशकत्व व्यामोहमूलक हो सकता है । मनु प्रभृति के उपदेश तो वेद का अनुसरण करते हैं, अतः ये अतीन्द्रिय अर्थ का भी उपदेश कर सकते हैं । किन्तु वेद का अपलाप करने वाले वुद्ध प्रभृति के वचन अतीन्द्रिय अर्थ में प्रमाण नहीं माने जा सकते । बुद्ध प्रभृति सर्वज्ञ हैं, अतः वे अतीन्द्रिय अर्थ के उपदेष्टा हो सकते हैं, यह कथन भी अर्कचित्र है, क्योंकि हमने छः प्रमाण मान रक्खे हैं । इन सबसे यदि उनकी सर्वज्ञता सिद्ध होती हो तो हमको कोई विरोध नहीं है । जिस तरह के प्रमाणों से जिस तरह के अर्थ का दर्शन होता है, वह होता ही है । एक प्रमाण से सर्वशता का समर्थन मानने पर चक्षु से भी रस आदि का ज्ञान हो सकता है, किन्तु होता नहीं । यह जो कहा जाता है कि योगज सामर्थ्य से अथवा आधुनिक यन्त्रों की सहायता से सर्वज्ञता का समर्थन हो सकता है, यह भी व्यर्थ की बात है, क्योंकि किसी भी करण में सामर्थ्य का after अपने विषय में हो कार्य को अतिशयिता का संपादक होता हैं, यह अविषय में प्रवृत नहीं होता । जैसा कि भट्ट कुमारिल ने कहा है --- " जहाँ पर भी अतिशय का दर्शन होता है वह अपने स्वार्थ ( अपने विषय का उल्लंघन नहीं करता । दूर की वस्तु और सूक्ष्म वस्तुस्वरूप को देखने का दृष्टि का तरतम भाव होता है, इस कार्य में श्रत्र की प्रवृत्ति नहीं हो सकती " । योगसामर्थ्य से भी रूप के ग्रहण में श्रोत्र की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, किन्तु व्यवहित wear fasave देश में स्थित शब्द का हो ग्रहण उससे हो सकता है और चक्षु से दूर स्थित और सूक्ष्म रूप का ही दर्शन ( दूरबीन आदि से ) हो सकता है । इसीलिये आजकल के यन्त्रों की सहायता से प्रमाता के भेद के अनुसार प्रत्यक्ष में अतिशयिता देखी जाती है । इनकी सहायता से लोग बहुत दूर की और acre सुक्ष्म वस्तु को भी देख सकते हैं । लौकिक और शास्त्रीय ज्ञान में को अतिशय देखने को मिलता है । इस कथन से किसी का यह कहना कि बुद्ध प्रभृति का ज्ञान अत्यन्त विशिष्ट सर्वविषयक क्यों नहीं हो सकता, खण्डित हो जाता है । अपने विषय में दूर, सूक्ष्म आदि के दर्शन में ही सामर्थ्य का अतिशय उपयोगी हो सकता है, इस नियम के उल्लंघन में नहीं | अतिशय शक्तिसंपन्न श्रोत्ररूप दर्शन में प्रवृत्त नहीं हो सकता और न अतिशय शक्ति संपन्न नेत्र की ही प्रवृत्ति शब्द के श्रवण में हो सकती है, यह पार्थं सारथि मिश्र का कहना है ।

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वेदार्थपारिजातः यत्तूक्तं प्रत्यक्षस्य न विषयनियमोऽस्ति रूपवतां घटादीनामरूपवतां रूपादीनां दूरमुक्ष्माणाञ्च प्रत्यक्षदर्शनादिति बुद्धादेः सर्वविषयज्ञानवत्त्वं कुतो न स्यादिति तन्न; प्रत्यक्षस्य वर्तमानविषयत्वनियमात् । ततश्च भविष्यति धर्मे प्रत्यक्षस्य न प्रवृत्तिर्नतरां सर्वविषयेपु । ज्ञानस्याप्यस्ति विषयनियमः J यत्रास्य कारणं सम्भवति तत्रेव प्रवर्तते नान्यत्र | ज्ञान-कारणमिन्द्रियलिङ्गादि । इन्द्रियं वर्तमानविषयमिति तज्जन्यं ज्ञानमपि वर्तमानविषयमेव । न तत् धर्माधर्मेषु नापि सर्वार्थेषु प्रवर्तते । लिङ्गादिरहिततयाऽनुमानमपि न प्रवर्तते । अतो नानुमानादिभिरपि सर्वज्ञत्त्वमिद्धिः । लोकायतिस्तु सर्वज्ञत्वकल्पनाबदेव अपौरुपेयत्वकल्पनाऽपि निष्प्रामाणिकैवोच्यते । तैरेवोच्यते-सर्वज्ञा दृश्यत तावन्नेदानीमस्मदादिभिः । निराकरणवच्छक्त्या न चासीदिति कल्पना ॥ ' अतीत काल: सर्वज्ञशून्यः " कालत्वादद्यत्ववत् । न वागमो बुद्धादिसर्वज्ञत्वसिद्धौ प्रमाणम् । सिद्धे सर्वज्ञे तदागमस्य प्रामाण्यम्, तत्प्रामाण्ये च सर्वज्ञत्यसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयात् । पुरुषान्तरप्रणीतस्य तु मूलान्तरासम्भवात् न सर्वज्ञ-सद्भावे प्रामाण्यम् । यत्ततम् — " नित्यागमगम्य: सर्वज्ञः " इति तत्र तदभावात् । न च यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इति नित्यागमोऽस्त्ये-यह जो कहा गया है कि प्रत्यक्ष का विषय नियत नहीं है, क्योंकि उससे रूपवान् घटादि का और अरूपवान् रूपादिका तथा दूरवर्ती एवं सूक्ष्म विषयों का भी ग्रहण होता है, अतः बुद्ध प्रभृति की सर्वविषयक ज्ञानवत्ता अर्थात् सर्वज्ञता क्यों न सिद्ध होगी? यह बात एकदम निराधार है । प्रत्यक्ष का यह नियम है कि वह वर्तमान वस्तु का ही ग्रहण करता है । इसलिये भविष्य में होने वाले धर्म में उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी । सर्वविषयों में तो इसकी प्रवृत्ति सुतरां नहीं होगी । ज्ञान में भी विषय का नियम वर्तमान है | asi geet कारण हो सकता है, वहीं उसकी प्रवृति होती है, अन्यत्र नहीं । इन्द्रिय, लिंग आदि ज्ञान के कारण हैं । इनमें इन्द्रिय वर्तमान विषय की ही ग्राहक हो सकती है, अत: इन्द्रियजन्य ज्ञान की वर्तमान विषय का ही होगा । धर्म, अधर्म में एवं सर्व अर्था में इसकी प्रवृत्ति नहीं होती । लिगादि के अभाव में अनुमान भी धर्माधर्मादि में तथा सर्वार्थ में प्रवृत्त नहीं हो सकता, इसलिये अनुमान आदि से भी सर्वज्ञता नहीं सिद्ध हो सकती । लोक rafts अर्थात् चा afs an अनुयायी तो सर्वज्ञत्व की कल्पना के समान वेद के अपौरुपेयत्व की कल्पना को भी प्रमाण नहीं मानते । उनका कहना है कि " मी हमको कोई सर्वज्ञ नहीं दिखाई देता, अत: पहले भी सर्वज्ञ कोई नहीं या, यह कल्पना बड़ी सरलता से की जा सकती है । इसमें अनुमान भी हो सकता है । जैसे कि - " अतीत काल सर्वज्ञ से शून्य पा, काल होने के कारण, वर्तमान के समान " । अर्थात् आज का काल भी काल है और पहले का काल भी काल ही था । फिर जब वर्तमान काल में कोई सर्वश नहीं है तो पूर्व काल में भी कोई सर्वज्ञ नहीं था, यह बात अनुमान से सिद्ध हो जायगी । नागम के प्रमाण पर भी बुद्ध प्रभृति को सर्व सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि बुद्ध की सर्वशता सिद्ध हो जाने पर ही उनके शास्त्र प्रमाण माने जायेंगे और शास्त्र के प्रामाण्य के आधार पर बुद्ध की सर्वेक्षता सिद्ध हो सकती है । इस प्रकार यह बात ' अन्योन्याश्रय दोष से टूपित हो जायगी । पुरषान्तर से प्रणीत शास्त्र का कोई आधार न होने से वह भी सर्वज्ञ के सद्भाव में प्रमाण नहीं हो सकता | अर्थात् दूसरे पुरुष के बनाये हुए ग्रन्थ से बुद्ध को सर्वज्ञ कहें, तो दूसरे पुरुष के ग्रन्थ का भी कोई भूल न होने से वही प्रमाण हैं । यह कहना कि सर्वज्ञ नित्य आगम ( वेद ) से जाना जाता है, गलत बात है, क्योंकि ऐसा है नहीं । " जो सामान्यतया सर्वज्ञ है, वही विशेषतया प्रतिपदोक्त प्रत्येक पदार्थ को सबको जानता है " यह दिश्य आगम इसमें प्रमाण इसलिये नहीं हैं कि यह वाद उनसे किसी बात को सिद्धि नहीं होती । जैसे किसी ने किसी से पुत्रा ने कहा कि जिसका यह मकान है । यह महान कि यह किसका है? तो कह दिया कि १. अन्योन्याश्रय वाक्य निर्थक होते हैं । मोटर किसकी है? उत्तर देनेवाले जिसकी यह मोटर है | यहाँ मोटर के मालिक का ज्ञान मकान के मालिक के ज्ञान के का ज्ञान मोटर के मालिक के ज्ञान के अधीन है | यहाँ पर अन्योन्याश्रय होने से यह वाक्य व्यर्थ है । अधीन और मकान के मालिक

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वैवार्थपारिजातः वेति वाच्यम्; तस्यार्थवादरूपत्वेन तत्र तात्पर्याभावात् । बुद्धादिपर्वज्ञत्वबोधपरत्वेऽनित्यबोधकत्वेनागमस्याप्यनित्यत्वापत्तेः । किञ्च यद्यागमनित्यत्वमिष्यते, तहि सर्वज्ञकल्पना व्यर्थेव । येन नित्येनागमेन सर्वज्ञो बोद्ध्यते, तेनैव धर्माधर्मबोधो भवतु, किं सर्वज्ञकल्पनया, यतः सर्वज्ञत्वेनाभिमता बुद्धादयोऽधर्ममेव प्रतिपादयन्ति । कैश्चित्तु इन्द्रियार्थसंबन्धविषये सर्व क्षणिकं संस्कृतमित्यादि सत्यवचनं दृष्ट्रा श्रद्धेयेऽर्थे धर्मे चैत्यवन्दनादिवाक्य-मपि तद्वचनात्प्रमाणमित्युच्यते । तदुक्तम्-कीटसंख्यापरिज्ञानं तस्य नः कोपयुज्यते । दूरं पश्यतु मा वाऽसौ तत्त्वमिष्टं तु पश्यति ॥ इति । तदप्यपेशलम् क्षणिकादिवाक्यस्यापि बाधसिद्धया चैत्यवन्दनादिवाक्यस्य सुतरां बाधोपपत्तेः । वस्तुतस्तु ' चैत्यवन्दनादिवुद्धवाक्यम्, अप्रमाणम्, अलौकिकार्थत्वे सति वाक्यत्वात् उन्मत्तवाक्यवत् ' इत्यनुमानेन बुद्धवाक्यानां प्रामाण्याभाव: सिद्धयति । यत्क्तं बुद्धेनैव सर्वज्ञोऽस्मीत्युक्तमिति । तदप्यसत्; बुद्धोऽसर्वज्ञ इत्यन्यैरुक्तत्वात् । वस्तुतस्तु एवमनृतमुद्धतञ्च बुद्धो वदतीति न सम्भाव्येत । यत्तु बुद्धः सर्वज्ञ इत्यस्ति लौकिकानामविच्छिन्ना स्मृतिः 1 तेन तदानीन्तनैर्बुद्धस्य सर्वज्ञत्वं प्रमितिमिति कल्प्यत इति । तदपि तुच्छम्; विप्रलिप्सया बुद्धेनागमः प्रणीत इति पुराणादिस्मृतिविगानात् । सर्वज्ञत्वस्मरणस्य चासम्भवन्मूलत्वात् शिष्टैरपरिग्रहाच्च । न च बुद्धस्य सर्वज्ञत्वे किञ्चित् प्रमाणमस्ति । सर्वविषयज्ञानरहितैस्तस्य ज्ञातुमशक्य-वात् । यदि तु बुद्धस्य सर्वज्ञत्वज्ञानार्थमन्योऽपि सर्वज्ञः कल्प्यते, ततस्तेनैव प्रकारेणान्यान्यसर्वज्ञकल्पनायामनवस्थापातात् । तदुक्तम् वाक्य है, अतः उसका स्वार्थ मे तात्पर्य नहीं है । यह आम यदि बुद्ध प्रभृति को सर्वज्ञता का बोधक माना जाय तो अनित्य वस्तु का atas are मी अनित्य ही माना जायगा | आगम को यदि बाप नित्य मानते हैं तो फिर सर्वज्ञ की कल्पना व्यर्थ हो है, क्योंकि जिस त्यि आगम से सर्वेश का होता है, उससे धर्म और धर्म आदि का भी बोध हो जायगा, तब सर्वज्ञ कला की क्या आवश्यकता है? क्योंकि सर्वज्ञ के रूप में स्वीकृत बुद्ध प्रभृति केवल अधर्म का ही प्रतिपादन करते हैं । कुछ लोगों का कहना कि इंद्रिय और अर्थ के समकक्ष से परिज्ञान विषयों में यह सारा संसार क्षणिक है, संस्कृत है, इस तरह की सही बातें सुनकर बुद्ध के द्वारा उपदिष्ट चैत्य वन्दन प्रभूति विषयों में भी श्रद्धा उत्पन्न होती है, अतः बुद्ध का वचन मी प्रामाण्य में कारण माना जायगा । जैसा कि कहा गया है " उस सर्वज्ञ को संसार में कितने कीट पतंगे है, इसका यदि ज्ञान है तो उस ज्ञान का हमारे लिये क्या उपयोग है? वह ( बुद्ध ) दूर की वस्तु को देखे अथवा न देखे, किन्तु हमारे लिये जो कल्याणकारी वस्तु है, उसको वे अवश्य देखते हैं " । यह अति भो गत है, क्योंकि क्षणिकत्व के प्रतिपादक वाक्यों का ही जब बाघ हो जायगा तो फिर चैत्यन्दनप्रभृति वाक्यों का बाघ तो सहज ही हो जायगा । पस्तुतस्तु चैत्यबन्धन प्रभृति बुद्धवाक्य अप्रमाण हैं, क्योंकि यहाँ पर पुरुष के द्वारा अलौकिक अर्थ का प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि कोई उन्मत्त मनमाना प्रलाप करता हो, इस अनुमान से बुद्ध वाक्यों की अप्रमाणता सिद्ध होती है । यह कहना कि कुछ स्वयं ही कहा है कि मैं सर्वज्ञ है, गलत बात है, क्योंकि दूसरों का कहना है कि बुद्ध सर्वज्ञ नहीं है । वास्तव में बुद्ध ऐसी गलत और उद्दंडता से भरी बात कहेंगे, ऐसी सम्भावना नहीं की जा सकती । यह कहना कि बुद्ध सर्वज्ञ है, यह ara लोक में affer स्मृति परम्परा से प्रचलित है, इससे ऐसा अनुमान होता है कि उस समय के व्यक्तियों ने बुद्ध की सर्वज्ञता का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लिया था, यह भी तुच्छ बात है । प्रजा को ठगने के लिये बुद्ध ने नये शास्त्र की रचना की, इस प्रकार की उक्तियाँ पुराणादि स्मृति ग्रन्थों में उपलब्ध हैं । बुद्ध के सर्वेशत्व की परम्परा का सूत्र सही नहीं है और शिष्टजनों ने इसको स्वीकार भी नहीं किया है । बुद्ध के सर्वज्ञ होने में कोई प्रमाण नहीं है । जिनको सभी विषयों का ज्ञान नहीं है, वे सर्वज्ञ को जान भी नहीं सकते । बुद्ध की सर्वज्ञता को जानने वाले किसी अन्य सर्वेश को यदि कल्पना करनी है तो उसी पद्धति से उसकी सर्वज्ञता के ज्ञान के लिये भी एक और सर्वज्ञ को कल्पना करनी पड़ेगी, इस प्रकार अनवस्था दोष की आपत्ति होगी । जैसा कि कहा गया है ---

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७८ वेदार्थपारिजातः य एवं स्यादसर्वज्ञः स सर्वज्ञं न बुद्धयते । सर्वज्ञोऽनवबुद्धश्च येनैव स्यान्न तं प्रति । तद्वायानां प्रमाणत्वं मूलाज्ञानेन वावयवत् ॥ ( चो. सू. वा. १३५,१३६ ) किञ्च, रागद्वेषादिरहितो निर्व्यापारः शून्यनिष्ठो बुद्ध आसीदिति बुद्धेरभिप्रेयते । तादृशस्य प्रक्षीणरागद्वेषस्य बुद्धस्य लाभ पूजाख्यातिरागनिमित्तं स्वयूथ्यनिमित्तं वा न सम्भवत्यागमप्रणयनम् । निर्व्यापारस्य च तस्य निर्विकल्पेन प्रत्यक्षेण विश्वं प्रत्यक्षयत: विकल्पमूलिका देशनाऽपि न सम्भवत्येवेति तदन्यप्रणीत एव बौद्धागमः । यत्तु तत्सान्निध्यमात्रतश्चिन्तामणेरेव कुड्यादिभ्योऽपि देशना निःसरन्तीति । तत्त् श्रद्धाजडस्यैव शोभते । कुड्या-दिनिःसृतास देशनासु बुद्धप्रणीतत्वानिर्णयेन प्रामाण्यासम्भवात् । विप्रलम्भकैः पिशाचादिभिरपि विप्रलम्भार्थं तादृक् देशना-प्रकाशसम्भवात् । यत्तम् " स्वभावादेव तत्तदिन्द्रियाद्यनपेक्षमेव पुरुषः सर्वं वेत्ति । देहावृतस्तु इन्द्रियादिद्वारेण किञ्चिदेव जानाति । विगलितदेहस्य तु स्वाभाविकं सार्वज्ञमभिव्यज्यते " इति । तदप्यपेशलम् इन्द्रियाद्यनपेक्षस्य जीवस्य सूक्ष्मातीतादिसर्वविषयं ज्ञानं भवतीत्यत्र तदागममन्त रान्यस्य प्रमाणस्यासत्त्वात् । तदागमस्य प्रमाणत्वे सर्वज्ञत्वसिद्धिः I सर्वज्ञत्वसिद्धौ तदागम-प्रामाण्यमित्यन्योन्याश्रयः । अपि च विगलितशरीरस्याशरीरस्य ताल्वादिरहितस्य कथमागमप्रणयनम्? सशरीरस्यासर्वज्ञत्वेन तत्प्रणीतागमस्य च कथं प्रामाण्यम्? यदि तादृक् कश्चन मुक्तः सर्वज्ञोऽद्यत्वे दृश्येत, ततोऽन्योऽपि सम्भाव्येत । " जो व्यक्ति स्वयं असर्वज्ञ है, वह सर्वज्ञ को नहीं जान सकता । जिस असर्वज्ञ ने सर्वज्ञ के रूप में किसी को नहीं जाना है तो उसके प्रति उस सर्वज्ञ के वाक्य उसी प्रकार प्रमाण नहीं हो सकते, जैसे कि वे वाक्य प्रमाण नहीं माने जाते, जिनके कि मूल वक्ता का कोई ज्ञान नहीं है " । बुद्ध के शिष्य ऐसा मानते हैं कि बुद्ध राग, द्वेष आदि से रहित थे, सब प्रकार के व्यापारों से मुक्त थे और शून्यनिष्ठ थे । ऐसे बुद्ध जो राग, द्वेष आदि से रहित थे, उन्होने फिर लाभ, पूजा, प्रसिद्धि, राम आदि में अनुरक्त होकर केवल अपने अनुयायियों के लिये शास्त्र की रचना क्यों की? फिर जब वे सभी प्रकार के व्यापारों से निर्लिप्त थे, तो शास्त्र रचनारूपी व्यापार कहाँ से आया? निर्विकल्प समाधि में निरत थे तो विकल्प मूलक उपदेश कहाँ से आया? अत: यह निश्चित है कि बागमों की रचना किसी दूसरे में ही की है, बुद्ध ने नहीं । यह कहना कि चिन्तामणि के समान बुद्ध की सनिधि मात्र से दीवाल भी शास्त्र का उपदेश करने लगती थी, केवल अतिशय श्रद्धा के कारण जिसकी बुद्धि जड़ हो गई हैं, उसी के लिये शोभा की बात हो सकती है । दीवाल में निकली देशना में यह बुद्ध द्वारा प्रणीत है, ऐसा निश्चय न होने से प्रामाण्य का निश्चय भी नहीं हो सकता । जनता को ठगने के लिये इस प्रकार की देखना पिशाच प्रभृति के द्वारा और ठगों के द्वारा भी दी जा सकती है । यह जो कहा गया है कि पुरुष स्वभाव में हो उन उन इन्द्रियों की सहायता के बिना ही सब कुछ जानता है । वह जब देह से आवृत हो जाता है तो इन्द्रियों की सहायता से कुछ थोड़ी सी वस्तुओं को जान पाता है । पुनः जब वह इस देह से मुक्त हो जाता है तो उसकी स्वाभाविक सर्वज्ञता अभिव्यक्त हो जाती है " । यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि जीव को इन्द्रिय प्रभृति की अपेक्षा के बिना सूक्ष्म, अतीत, स्नामत मादि सभी विषयों का ज्ञान होता है, इसमें बौद्ध भगम के fears और कोई प्रमाण नहीं है । उनके आगम के प्रामाण्य के सिद्ध होने पर सर्वज्ञ की सिद्धि होगी और सर्वज्ञ की सिद्धि होने पर उनके आगम का प्रामाण्य सिद्ध होगा । इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष होगा | दूसरी बात यह है कि शरीर के विगलित हो जाने पर शरीर के अभाव में तालु प्रभृति स्थानों के सुतरां THE होने के कारण आगम का प्रणयन कैसे होगा? यदि इस प्रकार का कोई मुक्त सर्व आज दिखाई दे तो हम तत्सह किसी अन्य की संभावना कर सकते हैं ।

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वेदार्थपारिजातः ७ ९ एवमेव प्रजापतेः प्रथमेनार्षज्ञानेनैव वेदोऽवबुद्धो भवतीत्यपि न विचारसम्; अनुच्चरितशब्दज्ञानमपि सर्वज्ञज्ञान-वत् धर्माधर्मविज्ञानवच्च सकारणमेव तत्रापि तेन कृतो वा नित्यसिद्ध एव प्राप्तो वेत्यनाश्वासस्यैवाप्रामाण्यकारणत्वसम्भ-वात् । न च तद्वचनात् विश्रम्भसम्भवः, अद्यत्ववत् तदानोमपि पुरुषाणामनृतवादित्वसम्भवात् । अयमागमप्रतिभास: स्वप्नादि-वत् आकस्मिको निर्निमित्तश्चाप्रमाणश्च भवतीत्यविश्रम्भ एव । अस्मिन् पक्षे बहून्यदृष्टानि कल्पनीयानि । अनुच्चारित-शब्दग्रहणसामर्थ्यनतोऽसाधारणपुरुषस्य कल्पनम् । तथैवागमनित्यतां कल्पयित्वा जन्मान्तरानुभनबन्धनं तत्स्मरणकल्पनं गौरवास्पदम् । कथं द्विपरामितं प्रलयकालमतीत्य एतावान् ग्रन्थराशि: मत्रियाऽपि अन्यूनानतिरिक्तः स्मर्तुं शक्ये-तापि? यादे चैवं नित्यागमस्य जन्मान्तरानुभवजन्पस्मरणविषयत्वं सम्भवति, तर्हि बुद्धादेर्धर्मविषयस्मृत्यभ्युपगमे को विरोध:? यद्यनुच्चरितशब्दग्रहणं सम्भवति, तहि धर्माधर्माद्यर्थग्रहणे का बाधा । यत्तूच्यते शब्दस्यैन्द्रियकत्वाद ग्राह्यत्वाद ग्राह्यत्वम्, धर्माधर्मादेस्त्वतीन्द्रियत्वाद् अग्राह्यत्वमिति तन्त्र अनुच्चरित-शब्दस्यापि अतीन्द्रियत्वात् । अपि च, धर्माधर्मादिग्रहणवादिनां नये पुमानू स्वतन्त्र एवाभिप्रेतः । अतः तत्प्रत्ययाद् अर्थनिश्चयो युक्तः । नित्यागमग्रहणवादिनां तु प्रजापत्यादिपुरुषा धर्माधर्मग्रहणेऽपि वेदपरतन्त्राः । स्व स्वरूपमियेऽपि तत्परतन्त्र इति न कस्यचित्स्वातन्त्र्यम् । न च पूर्वमीमांसकनयेऽपि पूर्वपूर्वपुरषाधीनमुत्तरोत्तरपुरुषाणां वेदस्वरूपनिर्द्धारणमिति समानमेव पारतन्त्र्यमिति वाच्यम्:, भावानवबोधात् । तथाहि - एक पुरुषाधीनत्वे कृतकत्याशङ्कया यथावद् दृष्टो विप्लवो वा जात इति संशयाद न इसी तरह प्रजापति के प्रथम आर्य ज्ञान से ही वेद जान लिया जाता है, यह बात भी सर्कसंमत नहीं है । अनुच्चरित शब्द का ज्ञान भी सर्वज्ञ के ज्ञान की तरह और धर्म - अधर्म के ज्ञान की तरह सकारण हैं, वहाँ पर भी प्रजापति ने इसको बनाया अथवा fre यसिद्ध को प्राप्त किया, इसका निश्चय न होने से उसमें अप्रामाण्य की काफी सामग्री विद्यमान है । प्रजापति के वचन से मो उसमें विश्वास नहीं हो सकता, क्योकि आज की तरह उस समय भी पुरुषो के असत्यभाषी होने की संभावना । यह आगम का जैसा प्रतीत हो रहा बौद्धागस स्वप्न आदि के समान आकस्मिक f जना निमित का और अप्रमाण भी है, अतः इसमें विश्वास नहीं किया जा सकता | इसके पक्ष में अनेक अदृष्टों को कल्पना करनी पड़ती है । पहले अनुच्चरित शब्द को ग्रहण करने की सामर्थ्य वाले किसी असाधारण पुरुष की कल्पना, इसी तरह आगम के नित्यत्व की कल्पना करके जन्मान्तर के अनुभव से होने वाले स्मरण को करना करने में स्पष्ट ही गौरव है । यह कैसे हो सकता है कि दो परार्ध परिमित प्रलय काल के बीत जाने पर इतनी बड़ी ग्रन्थ राशि को दिना एक मात्रा की भी न्यूनता जलवा अधिकता के कोई स्मरण कर सकता हो? यदि इस तरह से नित्य आगम जन्मान्तर के अनुभव से उत्पक्ष स्मृति का विषय हो सकता है, तो बुद्ध प्रभृति की धर्म विषयक स्मृति को मानने में क्या विरोध हो सकता है? यदि अनुच्चरित शब्द का ग्रहण हो सकता है तो वर्म - अधर्मप्रभृति अर्थों के ग्रहण में क्या बाधा हो सकती है? यह कहा जाता है कि " शब्द तो इन्द्रियों के द्वारा ग्राह्य होता है, अतः इसका ग्रहण माना जा सकता है, धर्म - अधर्म आदि तां अतीन्द्रिय है, अत: इनकी ग्राह्यता सम्भव नहीं हो सकती " यह बात भी गलत हैं, क्योंकि अनुच्चरित शब्द मी अतीन्द्रिय है । दूसरी बात --- धर्म - अधर्म आदि की ग्राह्यता मानने वालो ( बौद्धा ) के पक्ष में पुरुष स्वतन्त्र माना गया है । अर्थात् बौद्धों के मत में बुद्ध सर्वज्ञ है, बतः उसको धर्माधर्मादि के ज्ञान में किसी की अपेक्षा न रहने से वह इस विषय में स्वतन्त्र है । इसलिये पुरुष के ज्ञान से अर्थ का निश्चय करना ठीक हो सकता है । नित्य आगम ( वेद ) से अतीन्द्रिय पदार्थों का ज्ञान मानने वालों के पक्ष में तो प्रजापति आदि पुरुष भी धर्म और अधर्म आदि के ज्ञान में वेद के पराधीन हैं अर्थात् वेद से हो धर्म और अधर्म का ज्ञान इन्हें भी होता है । प्रजापति आदि अपने स्वरूप की सिद्धि में भी वेद के परतन्त्र हैं, अर्थात् वेद से ही प्रजापति के स्वरूप की भी सिद्धि होती है, वेद के बिना नहीं । अतः वैदिकों के मत में कोई भी पुरुष स्वतन्त्र नहीं है । इस प्रकार से तो पूर्व मीमांसा के मत में भी परवर्ती पुरुष पूर्ववर्ती पुरुष के प्रमाण पर ही वेद के स्वरूप का निर्धारण करता हैं । इस तरह से मीमांसा और बौद्ध दोनों सिद्धान्तों में परतन्त्रता समान रूप से विद्यमान है । तब वेदों में ही क्या विशेषता हुई? किन्तु ऐसी शंका ठीक नहीं, क्योंकि आपने मीमांसक मत का अभिप्राय ही ठीक से नहीं समझा है । वेद के स्वरूप का निर्धारण यदि एक पृष के अधीन माना जाता है, तो उसमें कृत्रिमता की आशंका होने से उसने ठीक से किसी विषय को देखा है अथवा इसमें कुछ व्युत्क्रम हो

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८० वेदार्थपारिजातः स्वातन्त्र्येणागमस्य प्रामाण्यं सम्भवति । अनेकपुरुषस्थले तु नेष दोषः; जन्मान्तरानुभूतस्य दीर्घकालव्यवहितत्वेन स्मर्तु-मशक्यत्वेन कृत्वैव वेदं श्रद्धार्थं स्मृतमुपदिशतीति शङ्कया तत्राविश्रम्भः । एकस्मिन्नेव जन्मनि बहुशोऽनुभूय स्मर्यमाणे तु नायमपि दोष इति न स्वातन्त्र्यहानिः । एकस्य प्रतिभाने तु कृतकत्वाशङ्कया सम्भवत्येव पारतन्त्र्यम् । अत एव सम्प्रदाये बहवः पुमांसोऽभिप्रेयन्ते । ततो यथा वेदानां कर्ता कञ्चन नास्ति तथैवैकः कश्चन सम्प्रदायप्रवर्तकोऽपि नास्ति तथात्वे कृत-कत्वसंशयापत्तेः, तत्तदन्यकुरान बाइबिलादिग्रन्थानुयायिभिरपि ग्रन्थकर्तुः सम्प्रदायप्रवर्तकत्वमेवोच्यत इति तदवैलक्षण्यमेव वेदस्य स्यात् । बहुषु पुरुषेषु सम्प्रदायस्याद्यत्ववत् पूर्वकालेऽपि विद्यमानत्वेन न शङ्कावकाशः । यथाद्यत्वे सर्वे पूर्वपूर्वपुरुषेभ्यो वेदमधीयाना दृश्यन्ते, न कर्तारः, कालान्तरेऽपि तथात्वाङ्गीकारेण न दृष्टानिनं वाग्दुष्टकल्पना, कर्तुस्तद्दोषाणां चास-स्वात् स्वाभाविकमेव वेदानां प्रामाण्यम् । तत एवानुमानिकबाधोऽपि आभास समानयोगक्षेम एव । यत्तूपदेशित्वान्यथानुपपत्त्या मन्वादिवद बुद्धादेरपि ज्ञानवत्त्वोपपत्तिरिति । तदप्यकिञ्चित्करम्, बालोन्मत्तादौ व्यभिचारात् । वेदान् ज्ञात्वोपदेशश्वेत्; सिद्धसाधनमेव मन्वादेस्तथात्वाभ्युपगमात् । बुद्धोपदेशस्य च वेदरसिद्धत्वान्न तत्र वेदजन्यज्ञानवत्त्वमप्यभ्युपगन्तुं शक्यते । पुरुषवचनादर्थनिश्चये जातेऽपि प्रत्यक्षादिनिश्चयवत् मू - दोषावगमे बाध्यत एवेति तदप्रामाण्यम् । वेदस्यानपेक्षितत्वेन स्वत एव प्रामाण्यम् । पुरुषस्तु अन्यथा संविदानोऽप्यन्यथा विवक्षति, अत एव पौरुपेय-वचनात् तन्मृलप्रत्ययो नावधारयितुं शक्यः । गया है, इस प्रकार का संशय उठ सकता है, अतः ऐसे स्थलों में आग का स्वतन्त्र रूप से प्रामाण्य सम्भव न होगा । किन्तु जहाँ पर विद्यमान है, वहां पर इस प्रकार की आपत्ति नहीं उठ सकती । उठ सकती है - जन्मान्तर में विषय अनेक पुरुष द्रष्टा के रूप में अनुभूत का एक लम्बे समय के व्यवधान के कारण स्मरण कर पाना कठिन है । इस पर भी श्रद्धा को जगाने के लिये कह दिया गया है कि प्रजापति प्रभृति वेद को स्मरण कर उसका उपदेश देते हैं, इस प्रकार की आशंका होते पर वेद में विश्वास ही नहीं रहेगा । एक ही जन्म में अनेक बार के अनुभव के आधार पर स्मृत विषय में तो यह दोष नहीं रहेगा, फलतः यहाँ पर व्यक्ति के स्वातंत्र्य की हानि भी नहीं होगी । एक ही व्यक्ति को प्रतिमान होता है, ऐसा मानने पर कृत्रिमता की आशंका के कारण पारतन्त्र्य की सम्भावना बनी रहती है । इसीलिये संप्रदाय में अनेक व्यक्तियों को मान्यता दी गई है । इसलिये जैसे कोई एक व्यक्ति वेद का कर्ता नहीं माना जाता, उसी तरह कोई एक व्यक्ति सम्प्रदाय का प्रवर्तक भी नहीं माना जाता । क्योंकि एक व्यक्ति के साथ कृतकत्व की आशंका जुड़ी रहती है । ऐसा मानने पर तो वेद की कुरान, बाइबिल आदि से कोई विलक्षणता नहीं मानी जा पाती, क्योंकि इन ग्रन्थों के अनुयायी भी इनके रचटिता को सदाय का वर्क मान सकते हैं । बाज को तरह पहले भी feat are at f वद्यमानता अनेक व्यक्तियों में मानी जाती है, तो उस परिस्थिति में आदि की शंका का कोई अवसर नहीं रह जाता । जैसे कल सभी व्यक्ति अपने पूर्ववर्ती पुरुष से वेद का अध्ययन करते देखे गये हैं, उसके कर्ता नहीं, उसी प्रकार कान्तर में भी इसी बात को न मानने पर न तो दृष्ट वस्तु का विरोध ही होता है और न कोई अदृष्ट की कल्पना ही करनी पड़ती है । वेद का कोई कर्ता नहीं है, अतः कर्ता में विद्यमान भ्रमन्प्रमादादि दोषों के भी न रहने से वेद का ग्रामाण्य स्वभावतः सिद्ध है | इसीलिये अनुमान ' के द्वारा वेद के प्रामाण्य का खण्डन प्रमाणाभास से प्रामाणिक वस्तु के खण्डन के समान ही व्यर्थ सिद्ध हो जाता है । यह कहना कि मनु प्रभृति के समान बुद्ध आदि को भी ज्ञानवान् मानना पड़ेगा, अन्यथा वे उपदेष्टा कैसे हो सकते हैं? यह बात भी तुच्छ है, क्योंकि बालक, उन्मत आदि में इसका व्यभिचार देखा जाता है । अर्थात् बालक, उमस आदि भी उपदेश तो करने ही लगते हैं । बुद्ध ने वेद को जानकर उपदेश दिया, यह कहना सिद्धसाधन दोष है, क्योंकि मनु प्रभृति के विषय में यह माना हो जाता हैं कि दो जानकर के ही तदनुसार धर्म का उपदेश करते हैं । बुद्ध का उपदेश तो वेद से सिद्ध नहीं है, अतः क्रुद्ध को वेदजन्य ज्ञान था, ऐसा नहीं माना जा सकता । पुरुष का वचन होने से उससे का निश्चय तो हो जायगा, किन्तु कारणगत दोष के ज्ञान में जैसे प्रत्यक्षादि निश्चय बाधित होता है, वैसे ही पुरुषगत दोष के ज्ञान से उसका वचन भी बाधित होकर अप्रमाण हो जायगा | वेद किसी भी अपेक्षा से शून्य है, अतः उसका स्वतः प्रामाण्य है । पुरुष तो जानता कुछ है, कहना कुछ और ही चाहता है । इसीलिये पौधेय वचन से उसके मूल प्रमाण को अवगति होना कठिन है ।