वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 111–120
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 111–120
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वेदार्थपारिजातः ८१ वाक्यरचनायां ज्ञानापेक्षया विवक्षा प्रत्यासन्ना भवति । भ्रान्तस्य त्वन्यविवक्षायामन्यद्वाक्यं दृश्यते । तथा च यदि वाक्यानुरूपविवक्षा s पि निश्चेतुं न पार्यते, तदा वाक्यानुरूपं ज्ञानकल्पनं तु दूरापास्तम् । ततो यथाविवक्षं यथाज्ञानं वाक्यं प्रवर्तत इति वक्तुं न शक्यते, तथाप्याप्तवाक्येषु वक्तृज्ञानपूर्वकत्वं निखेतुं शक्यते । ततोऽन्यत्र भ्रमविप्लवादिसम्भवः । तथा च पौरुषेयवाक्यानां सामान्येन मूकज्ञानावधारणशकिर्भवधि, अनाप्तवाक्यानां तदशक्तिश्च । तत एव केषाञ्चित्प्रामाण्यम-प्रामाण्यञ्चान्येषाम् । ननु तर्हि कथं वाचकत्वविरहिताद् वाक्यात् तज्ज्ञानमवगम्यत इति चेन्न, ज्ञानावधारणस्यानुमानिकत्वेन बाधा-भावात् । पदपदार्थरचनाधीना हि वाक्यार्थप्रत्ययाः । उक्तरचता च विवक्षाधोना । सा च ज्ञानाधीना । अन्वयव्यतिरेकाभ्या-मेतदवगम्यते । यद्यपि पौरुपेववाक्यादर्शनश्चय मदवि तथापि तत्प्रामाण्यं वज्ञानमुखेनैव भवति । त । एवाप्तोक्तकारी पर्यंतु-युक्तः सन् आप्तमेव निर्दिशति । न चैवमर्थयनवचितः शब्दस्य वाचकत्वमेव न स्यात्, न चानवगतबोधकत्वानां लोके वेदे वा बोधकत्वं सम्भवति, ततो वेदप्रामाण्यमपि दुर्घटमिति वाच्यम्, वक्तृज्ञानान्तरितत्वेन सब्दानामुदासीनत्वात्, बक्तज्ञानस्यैव तत्र प्रामाण्यप्रयाजकत्वात् । वावात् पूर्वमर्थप्रतीतो सत्यामपि तत्प्रतिष्ठाया वक्तृज्ञानान्तरितत्वात् यावत्तन्नावगतं भवेत्, तावदुत्पन्नस्यापि निचयस्यासत्सगात् शब्दा उदासीना इव भवन्ति । वक्तृज्ञानेऽवधारित तु शब्दैः पूर्वसञ्जातमप्यर्थे प्रामाण्यं पुनः प्रतिष्ठाप्यते । वाक्यस्य पुरुषपुहिमवत्येन तद्दोषेण दोपसम्भवात् संशयो जायते । मूलज्ञानस्य सम्यक्त्वे तु संशयनिवृत्त निश्चयः प्रतिष्ठितो भवति । यद्यपि वक्तुमानमर्थज्ञानगम्यमेवेत्यर्थज्ञानं वज्ञानात् पूर्वमेव भवति, तथापि वाक्य की रचना में ज्ञान की अपेक्षा कहने की इच्छा अधिक समीप है । भ्रान्त व्यक्ति में देखा गया है कि वह कहना कुछ चाहता है और बोलता कुछ और ही है । इस तरह मान्य अनुरूप विवक्षा का निश्चय होना भी जब कठिन है, तब वाक्य के अनुरूप ज्ञान की कल्पना तो बहुत दूर की बात है । अतः विवक्षा नीर ज्ञान के अनुसार वाक्य को प्रवृत्ति होती है, यह नहीं कहा जा सकता । तो मी आप्त प्रयुक्त वाक्यों में बक्ता को उन विषय का ज्ञान है, इसका विलय किया जा सकता 4 इसके अतिरिक्त अनाप्त वादयों में भ्रम, आदि की सम्भावना रहती है । इस प्रकार पौरुषेय वाक्यों में सामान्य रूप मूल ज्ञान के अवधारण की शक्ति रहती है, अनाप्त वाक्यों में यह नहीं रहती । इसीलिये कुछ वाक्य प्रसाधयुक्त होते हैं और कुछ नहीं । है कि ' जब वाक्य वाचक नहीं होते तो उनसे अर्थ की अवगति कैसे होगी? उत्तर है कि अनुमान के द्वारा ज्ञान के reer में कोई बाधा नहीं है । वाक्यार्थ का ज्ञान पर और पदार्थ के ज्ञान के अधीन होता है । वाक्य की रचना विवक्षा के अधीन है और face ज्ञान के अधीन है । अन्वय और व्यतिरेक से इसका ज्ञान होता है । पौरुषेय से कार्य का निश्चय होता है, तो भी उसका प्रामाण्य वक्ता के ज्ञान के अनुसार ही होता है । इसीलिए आत पुरुष की आता का पालन करने वाला व्यक्ति पूछने पर उस प्राप्त पुरुष का ही हवाला देता है । इससे यह नहीं कहा जा सकता कि अर्थ का ज्ञान न कराने वाले शब्द की वाकता नहीं बन सकती और न यहीं कहा जा सकता है कि जिन शब्दों की बोवकता सिद्ध नहीं हुई है, ऐसे शब्दों की बोचकता लोक अथवा वेद में भी सिद्ध नहीं हो सकती, फलतः वेद का प्रामाण्य सिद्ध होना बढ़ा कठिन है, क्योंकि शब्द वक्ता के ज्ञान से अन्तरित होकर उदासीन हो जाते हैं । वक्ता का ज्ञान ही इनमें प्रामाण्य का प्रयोजक है, अर्थात् बक्ता की माप्तता अनाप्तता के आधार पर ही इसमें प्रामाण्य और अप्रामाण का निश्चय होता है । वाक्य से पहले ही अर्थ की प्रतीति हो सकती है, किन्तु उसकी प्रतिष्ठा अर्थात् प्रामाण्य वा के ज्ञान के बाद ही होगी, अतः जब तक इस प्रामाणिक वक्ता की अवगति नहीं हो जाती, तब तक उत्पन्न हुआ निश्चय भी अनिश्चय के समान ही है, यतः इस अवस्था में श er उदासीन ही रहते हैं । वक्ता के ज्ञान के निश्चित हो जाने पर तो शब्दों के द्वारा पहले से उत्पन्न अर्थ के प्रामाण्य को पुनः प्रतिष्ठा होती है । वाक्य पुरुष की बुद्धि से प्रसूत होते हैं, अतः बुद्धि दोष से वाक्य में भी दोष की सम्भावना बनी रहने से संशय उठ खड़ा हो जाता है । मूल ज्ञान यदि सही है, तो संशय की १. वाचकता पदों में ही मानी जाती है और पदजन्य पदार्थोपस्थिति से वाक्यार्थ का बोध होता है । ११
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२ वेदार्थपारिजातः तत्प्रामाण्यनिर्णये वज्ञानस्यैव पूर्वभावित्वम् । एवं पौरुषेयेषु वाक्येषु पुरुषबुद्धिनिमित्तत्वाद् अप्रामाण्यं युज्यते । वेदे तु वक्तुरभावाद वक्तबुद्धयनपेक्षत्वात् स्वत एव प्रामाण्यम् । यत्तु अनाप्तवचनवद् वचनत्वेन वेदस्याप्यप्रामाण्यं शङ्क्येत, तदपि न क्षोदक्षमम्, लौकिकवाक्यस्याप्रामाण्यं दोपनिमित्तं न वाक्यत्वहेतुकम् । प्रत्यक्षस्य भूतार्थविषयकत्वेन भव्यस्य धर्मादिर्न तद्विषयत्वसम्भवः । इन्द्रियाद्यगम्यभूत-भविष्यदाद्यर्थबोधकत्वं शब्दस्यैव सम्भवति । तदुक्तम्-“ अत्यन्तासत्यपि ज्ञानमर्थे शब्द: करोति हि " ( चो ० सू ० वा ६ ) इति । ननु वेदो यदि पौरुषेयस्तर्हि प्रत्यक्षाद्यनवगतधर्मादिबोधकत्वेनासम्भवन्मूलकत्वेन बुद्धादिवाक्यवत् तस्याप्यप्रामाण्य-मेव । अपौरुषेयश्चेत् प्रामाण्यहेतुभूताप्तोच्चरितत्वाभावेन सुतरां तस्याप्रामाण्यमिति चेन्न, ज्ञानस्य प्रामाण्यस्वतस्त्वाभ्युपगमेन प्रामाण्यकारणानपेक्षत्वेनापीरुषेयत्वे दोषाभावात् । अप्रामाण्यं तु कारणाधीनम् । तच्च ज्ञानानुत्पत्तिः, उत्पन्नस्य ज्ञानस्य संशयाद्यात्मकता, उत्तरकाले बाधकप्रत्ययान्तरोतात्तिः करणे दोषवत्ताज्ञानञ्च । प्रकृते वेदस्य कर्तृस्मरणाभावादियुक्तिभि-रपौरुषेयत्वसिद्धया न कारणदोषज्ञानं शक्यशङ्कम्, " अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः " इत्यादिवाक्यैरग्निहोत्रहोमात् स्वर्गा भवतीति ज्ञानमुत्पद्यत एव । न चैभिः संशयाद्यात्मकं ज्ञानमुत्पद्यते । अग्निहोत्रहोमात् स्वर्गो न भवतीति बाधकज्ञानमपि कस्यापि न भवत्येव । अग्निहोत्रहोमात् स्वर्गो न भवतीति नहि केनापि प्रमातुं शक्यते । येन प्रमाणेन लौकिकसाध्यसाधन-भावो ज्ञायते, तेनैव तदभावोऽपि । नहि चक्षुरन्तरा रूपाभावो ज्ञायते । तथा चाप्रामाण्यकारणत्वेन सम्भावितेष्विह कस्यापि अनुपलम्भादप्रामाण्यशङ्काया दूरापास्तत्वात् स्वतः सिद्धं प्रामाण्यमनपोहितमेव स्थितं भवति । निवृत्ति हो जाने पर निश्चय की प्रतिष्ठा हो जाती है । यद्यपि वक्ता का ज्ञान अर्थ के ज्ञान से ही जाना जाता है, इसलिए अर्थ का ज्ञान वक्ता के ज्ञान से पहले ही होता है, तो भी उसके प्रामाण्य के निश्चय में वक्ता का ज्ञान ही पहले मानना पड़ता है । इस तरह पौरुपेय ों में पुरुष की बुद्धि के ही निमित्त होने से उसमें अप्रामाण्य की कल्पना उचित है । वेद में तो वक्ता के न होने से वक्ता की बुद्धि की अपेक्षा के were में स्वतः प्रामाण्य में कोई बाधा नहीं है । dant at antara हात्मक हो है, अतः उसमें भी अनाप्त व्यक्ति के वाक्यों की तरह अप्रामाण्य की उठ सकती हैं, यह कथन भी तर्क के सामने नहीं टिक सकता, लौकिक वाक्य का अप्रामाण्य दोष के कारण होता है, उसमें वाक्यस्थ हेतु नहीं है । निष्पन्न अर्थ का ही प्रत्यक्ष हो सकता है, अतः निष्पाद्य धर्मादि प्रत्यक्ष के विषय नहीं हो सकते । इन्द्रियादि से अगम्य भूत, भविष्य आदि faster as a से ही हो सकता है । जैसा कि कहा गया है --- " अत्यन्त अविद्यमान अर्थ का भी ज्ञान शब्द के द्वारा हो सकता है । " प्रश्न उठता है कि यदि वेद पौरुषेय है, तो प्रत्यक्षादि से अनवगत धर्मादि को बोधकता में वह प्रमाण नहीं हो सकता, अतः बुद्ध आदि के वाक्यों की तरह उसको भी प्रमाण नहीं माना जायगा । यदि वेद अपौरुषेय है, तो उसके बाप्त द्वारा उच्चरित न होने के कारण यह ही प्रमाण मान लिया जायगा, क्योंकि आप्त द्वारा उच्चरित शब्द ही प्रमाण होता है । इसका उत्तर यह है कि ज्ञान को स्वतः प्रमाण माना गया है, अतः वपौरुषेय वाक्य में प्रामाण्य के कारण की अपेक्षा न होने से यहां कोई दोष नहीं है । का ज्ञान तो कारण के अधीन है । ज्ञान की अनुत्पत्ति, उत्पन्न ज्ञान की संशय - त्रिपर्ययात्मकता, उत्तर काल में अन्य बाधक ज्ञान की उत्पत्ति, करण में दोषयुक्तता का ज्ञान -- ज्ञान के अप्रामाण्य में ये चार कारण होते हैं । प्रकृत स्थल में वेद के कर्ता की किसी को स्मृति नहीं है, अतः इस तरह की युक्तियों के सहारे वेद की अपौरुषेयता के सिद्ध हो जाने पर कारणगत दोष ज्ञान की आशंक t at a sot | " अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम: " इस तरह के वाक्यों से अग्निहोत्र का अनुष्ठान करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इस तरह का ज्ञान उत्पन्न होता ही है । इससे संशयात्मक ज्ञान नहीं होता और न बाधक ज्ञान ही होता है कि अग्निहोत्र से स्वर्ग नहीं होता | अग्नि-atra करने से स्वर्ग नहीं होता, इस प्रकार का ज्ञान किसी को हो नहीं सकता । जिस प्रमाण से लोकिक साध्य - साधन मात्र का ज्ञान होता है, उसीसे उसके प्रभाव का भी ज्ञान होता है । बिना चक्षु के कोई रूप के अभाव की जान नहीं सकता । इस तरह अप्रामाण्य के जितने भी संभावित कारण हैं, उनमें से किसी की भी उपलब्धि यहाँ ( वेद में ) नहीं होती, शता अप्रामाण्य की शंका का यहाँ कोई प्रसंग न होने से वेद वाक्यों का प्रामाण्य किसी भी तरह से अपोदित ( वाषित ) नहीं होगा ।
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वेदार्थपारिजात: ८३ ननु यथा चक्षुषों रूपोपलम्भहेतुत्वं रूपोपलम्भेन कार्येण सिद्धयति, एवं मनुबुद्धादेरुपदेशित्वरूप कार्येण बेदमन्त-रापि धर्माधर्मज्ञानवत्त्वसिद्धिरिति चेन्न, वैदुष्योपदेशित्वयोः व्याप्त्यसिद्धेः । तथाहि - बालोन्मत्तादिष्वनवगतार्थेष्वप्युपदेशित्वं ' दृश्यत इति व्यभिचारः । मन्वादिवैदिकानां तु वैदिकार्थज्ञानपूर्वकत्वमेवोपदेष्टत्वमिति सिद्धसाधनम् । देवानामपौरुषेयत्वम् यत्तु सामान्यतो दृष्टं वितथमुपलभ्य वाक्यत्वसाम्येन वेदस्यापि वैतथ्यं शक्यते, तदज्ञान-विजृम्भितम् वाक्यत्वस्याप्रामाण्याप्रयोजकत्वात् । पौरुपेयवाक्यस्य तु पुरुषाश्रितदोषादिभिरेवाप्रामाण्यम्, न वाक्यत्व-प्रयुक्तम् । वेदे तु संशयविपर्ययाजनकत्वात् बोधकत्वात् बाधकाभावाच्चानधिगतासंदिग्धाबाधितार्थविषयज्ञानजनकत्वदर्शनेन अप्रामाण्य कारणाभावात् स्वाभाविकं प्रामाण्यमेव । ननु ' वेदा: पौरुषेया वाक्य कदम्बरूपत्वात्, महाभारतादिवत् ' इत्याद्यनुमानैर्वेदानां पौरुषेयत्वमेवेति चेन्न, स्मर्य-माणकर्तृकत्वस्योपाधित्वात् । पौरुषेयमहाभारतादिवाक्यं स्पर्यमाणकर्तृकमेव । न च तथा वेदे तत्साधयितुं शक्यते । यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि जैसे चक्षुरादि इन्द्रियों की रूप के ग्रहण की कारणता रूप के उपलम्भ रूपी कार्य से सिद्ध होती है, उसी तरह से बतु, बुद्ध आदि में भी उपदेशकर्तृस्वरूप कार्य को देखकर वेद के बिना भी धर्म - अधर्म आदि के ज्ञानवस्वरूप कारण की सिद्धि क्यों नहीं हो जायगी? तो इसका उत्तर यह है फि वैदुष्य और उपदेशित्व इन दोनों की व्याति नहीं बन सकती, क्योंकि बालक, उन्मत्त मादि में उपदेश करने की प्रवृत्ति देखी जाती है, जब कि वहाँ वैदुष्य का अभाव रहता है । इस प्रकार उक्त दोनों बातें साथ - साथ नहीं रहती, इनका व्यभिचार मानना पड़ेगा । मतु प्रभृति वैदिकमत के अनुयायी तो वैदिक अर्थ को जानकर ही उपदेश करते हैं, अतः उनमें वैदुष्य विद्यमान है ही उसको पुनः अनुमान से सिद्ध करना सिद्ध साधन दोष होगा 1 वेदों को अपौरुषेयता areer: arari के मिथ्यात्व को देखकर समान न्याय से वेद वाक्य में भी मिध्यात्व की शंका करना तो अपने अज्ञान को ही प्रकट करता है, क्योंकि वाक्यत्व हेतु अप्रामाण्य का प्रयोजक नहीं है | पौरुषेय वाक्यों का मप्रामाण्य पुरुषाश्रित दोषों के कारण होता है, उसमें वाक्यत्व की कारणता नहीं बनती । वेदवाक्यों में तो संशय - विपर्यय आदि की जनकता अविद्यमान है, ये किसी न किसी अर्थ के ates हैं, इनका कोई बाधक ज्ञान नहीं है और ये अनधिगत, असंदिग्ध, अबाधित अर्थ के ज्ञान को उत्पन्न करते हैं, अतः अप्रामाण्य के प्रवर्तक किसी भी कारण की यहाँ प्रवृत्ति न होने के कारण इनका स्वाभाविक प्रामाण्य माना जाता है । यह कहना कि " वेद गौरुषेय है, वाक्य कदम्वरूप होने से, महाभारत भादि ग्रन्थों के समान " इस तरह के अनुमानों से वेदो * को पौरुषेय ही मानना पड़ेगा, इसलिये गलत है कि उक्त अनुमान में स्मर्यमाणकर्तृ कता उपाधि है । महाभारत प्रभृति ग्रन्थ पौरुषेय हैं तो इनके कर्ता की स्मृति भी विद्यमान है । वेद में इस प्रकार का कर्ता किसी की भी स्मृति में नहीं है, मतः उक्त सोपाषिक अनुमान ' वेद की पौरुषेयता को सिद्ध नहीं कर सकता । १. जो साध्य का व्यापक हो और हेतु का अयापक हो, उसे उपाधि कहते हैं । जैसे कोई अनुमान करें कि इस अंगोष्ठी में है, क्योंकि यहाँ नि है, जहाँ अग्नि होती है, वहीं धुआं होता है, किन्तु यह अनुमान गलत है, क्योंकि इस अनुमान में - आन्धनयोग ( गीले ईंधन का संयोग ) उपाधि है । अग्नि से धुंआ को सिद्ध करने में बुआ होगा साध्य और अति होगा साधन । पर अग्निरूप साधन से धुंआरूप साध्य की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि आन्न-संयोग उपाधि लग जायगी । जहाँ - जहाँ हुआ रहता है, वहाँ - वहाँ भन्न संयोग अवश्य रहता है, इसलिये आस्थत संयोग साध्य धुआँ का व्यापक हुआ और जहाँ - जहाँ अग्नि रहती है, वहाँ वहाँ आश्वन संयोग रह भी सकता है और नहीं भी । गोली लकड़ियाँ, गोले कंडे या कोयले आदि का अग्नि के साथ तो आश्चन संयोग रह जायगा, किन्तु सुखी लकड़ी, सुखे कोयले या कण्डों के साथ अथवा प्राइम्स, गैस आदि की अग्नि के साथ मन्चन-संयोग नहीं रहता, अत: आर्द्रेन्धनसंयोग धुआँरूपी साध्य को सिद्ध करनेवाले अनुमान के साधन रूप हेतु का अव्यापक हो गया । अर्थात् अग्नि के साथ सब जगह नहीं रहा । इसलिये अग्नि से धुआँ की सिद्धि करनेवाला अनुमान सोपाधिक हो गया | वेद के पौरुषेयत्व को सिद्ध करनेवाले अनुमान में artice हेतु है और पौरुषेयत्व साध्य हैं । इसलिये यह
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वेदार्थपारिजातः नन्दवश्यं वाक्यानि केनचित्प्रणीतानि 1 तथैव शब्दानामर्थः सम्बन्धोऽपि सकर्तृक एवाभ्युपेय इति चेत्र, कर्तुरनु-पलम्भात् । यदि स्यात् कर्ता, प्रत्यक्षादिप्रमाणैरुपलभ्येत । यद्दर्शनयोग्यमुपलम्भसाम्रगीसत्वेऽपि नोपलभ्यते तन्नास्त्येवेति मन्तव्यम्; यथा -- शशशृङ्गादिकम् । न च चिरवृत्तत्वात् कर्ता नोपलभ्यते, नासत्त्वादिति वाच्यम्, तथात्वेऽपि तत्स्मरणस्या-वश्यकत्वात् । नहि चिरवृत्तोऽपि न स्मर्यते । तथा च वेदकर्तुः स्मरणाभावान्नास्त्येव कविद्वेदकर्तेति प्रतीयते । ननु कचिदरण्यादिप्रदेशेषु कूपारामादीनां मुक्तकश्लोकानाञ्च सन्तोऽपि कर्तारो न स्मर्यन्ते तथेहापि समयव्यव-हारयोः कर्त्रस्मरणमुपपन्नमिति । तदसारम्, देशोत्साद - कुलोत्साद -- सम्प्रदायविच्छेदादिभिः पूर्वोक्तकर्तृगामस्मरणोपपत्ता-वप्यध्ययनाध्यापनतदर्थानुष्ठानशब्दार्थ गवहारपारम्पर्यस्याविच्छेदेऽपि कर्तृविस्मरणानुपपत्तेः । अत एव प्रयोग: - " वेदा अपौ-रुषेयाः, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वादात्मवत्, व्यतिरेके भारतवत् इति । " न च घटकर्तृकुलालस्मरणवत् वेदतत्पदार्थसम्बन्ध कर्तृस्मरणे व्यवहर्तॄणां निष्प्रयोजनेइति कर्तृविस्मरणमुपपद्यत एवेति वाच्यम्, वैषम्यात् । तथाहि - निष्प्रयोजनत्वात् कुलालविस्मरणमुपपद्यते, न तु तथा वेदकर्त्रादिस्मरणं निष्प्रयोजनं Harta fear a frat के बनाये हुए ही हो सकते हैं, इसी तरह से शब्दों का अर्थों के साथ संबन्ध भी किसी के द्वारा स्थापित हो मानना पड़ेगा " यह कथन भी इसलिये गलत है कि वेद में कोई कर्ता उपलब्ध नहीं है । यदि कोई कर्ता होता तो उसकी प्रत्यक्ष प्रभूति प्रमाणों में से किसी न किसी से उपलब्ध होती । जिसकी किसी न किसी प्रमाण से उपलब्ध हो सकती है, उसकी यदि पूरी सामग्री की विद्यमानता में भी उपलब्धि नहीं होती तो समझ लेना चाहिये कि उस वस्तु की सत्ता नहीं है, जैसा कि खरगोश की सोंग | " बहुत समय बीत जाने के कारण वेद का कोई कर्ता स्मृति में नहीं रह गया है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसका कोई रचयिता ही नहीं है ", आप को यह उक्ति भी इसलिये उचित नहीं है कि यदि ऐसा होता तो उसकी स्मृति अवश्य बनी रहती । समय अधिक बीत गया है तो इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि उसकी स्मृति भी नहीं रहेगी । अतः यही मानना उचित है कि वेद के वार्ता के रूप में किसी के नाम की स्मृति विद्यमान नहीं है, अतः वेद का कोई कर्ता है ही नहीं । यह कहना भी सारहीन है कि किसी घने जंगल में किसी के बनाये कुऐं अथवा उपयन का तथा मुक्तक श्लोकों का कोई कर्ता रहते हुए भी उसकी स्मृति नहीं रह जाती, उसी तरह से वेद के संबन्ध में भी समय और व्यवहार में कर्ता की स्मृति का न रहना बन सकता है ", क्योंकि कूप, उपवन, मुक्तकश्लोक आदि में देश, कुल, सम्प्रदाय नादि के विनष्ट हो जाने से कर्ता की स्मृति नष्ट हो जाती है । किन्तु बंद में तो ऐसा नहीं है । यहीं पर तो अध्ययन - अध्यापन की परम्परा, वैदिक यागादि के अनुष्ठान की परम्परा, और शब्द एवं अर्थ के व्यवहार की परम्परा समाप्त नहीं हुई है, तो फिर कर्ता को स्मृति कैसे नष्ट हो सकती है? इसके समर्थन में यह अनुमान दिया जा सकता है -- वेद अपौरुषेय है, इसके सम्प्रदाय का विच्छेद न होने पर भी इसके कर्ता को कोई स्मृति विद्यमान न होने से, बामा की तरह, यह अन्य का उदाहरण हुआ । इसका व्यतिरेक में उदाहरण महाभारत होगा । वेद के विपरीत महाभारत का कर्ता स्मृतिपथ में विद्यमान है, अत: वह पीरुपेथ माना जायगा । बात्मा सम्प्रदाय विच्छेद न होने पर भी कर्ता के स्मरण से रहित है, इसी लिये यह किसी पुरुष का बनाया हुआ नहीं है, इसी तरह वेद भी किसी पुरुष का बनाया हुआ नहीं है | प्रश्न उठता है कि जैसे बट मृति से व्यवहार चलाने वाले व्यक्ति के लिये इस घड़े का बनाने वाचा कुम्हार कौन है? यह जानना व्यर्थ है, उसी तरह वेद के पद - पदार्थ का कर्ता फोन है? इसको भी जानने का कोई प्रयोजन न होने से कर्ता की विस्मृति हो सकती है, तो इसका उत्तर यह है कि उक्त दोनों बातों में कुछ अन्तर । कोई प्रयोजन न होने से कुम्हार के नाम का विस्तृति तो हो सकती are गत है, क्योंकि इस अनुमान में भी स्मर्यमाणक कल्य, अर्थात् कर्ता का स्मरण गोधरा प कि कम जायगी । जहाँ - जहाँ पर ( पुरुषक ' कता ) रूप साध्य रहता है, वहाँ वहां स्मर्यमाणत्व हैं, जैसे रामायण, महाभारत आदि में पुरुष निर्मितत्व भी हैं और वाल्मीकि, व्यास आदि कर्ता का स्मरण भी है । इसलिए यह साध्य पौरुषेयत्व का व्यापक हो गया और सावन का रूप हेतु का अव्यापक हो गया, क्योंकि रामायणादि में कर्ता का स्तर होने पर भी गेंद में कर्ता का स्मरण नहीं है ।: सोपाधिक अग्नि साधन से साध्य धुआं को जैसे सिद्धि नहीं हो सकती, ऐसे ही सोपाधिक वाव हेतु से बंद में पुरुषकरूप साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती ।
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वेदार्थपारिजातः ८५ व्यवहाराणां तदधीनत्वात् । नहि पाणिनेविस्मरणे आदेचां वृद्धिशब्देन व्यवहारः सम्भवति । तथा च यः पदपदार्थसम्बन्धं करोति, यक्ष वेदं निर्माय तदध्ययनाध्यापनतदर्थयागोपासनजानादिव्यवहारं प्रवर्तयति, न तस्य विस्मरणे व्यवहारः सम्भवति । वाक्या-दर्थप्रतिपत्तिस्तदर्थानुष्ठान वाक्यकर्तुः तदाप्तत्वस्य च स्मरणमन्तरा न सम्भवतः अनाप्तवाक्यात्तददर्शनात् । यागादेः स्वर्गादिसाधनतायाः प्रमाणान्तरागोचरत्वात् । कर्तरि विश्रम्भादेव सर्वे वेदार्थयागाद्यनुष्ठाने प्रवर्तेरन्निति कथं कर्ता विस्मर्येत? तेनावश्यस्मर्तव्यत्वे सत्यस्मर्यमाणः स्वस्याभावमेवावगमयिष्यति । पाणिनिभिन्नस्य पाणिनिमतान-नुसारिणो वा वृद्धिशब्दावहारतो न केचिदाचोऽवगच्छन्ति । यथा वाऽपिङ्गलस्य पिङ्गलानुसारिणो वा मकारव्यवहारतो न केचित् सर्वगुरुत्रिकं प्रतिपद्यन्ते । किन्तु वृद्धिरादैजिति वृद्धिसंज्ञाकर्तुः पाणिनेर्वृद्धिर्यस्या-चामादिस्तद वृद्धमिति व्यवहारतो वृद्धिशब्देनादेवो जानन्ति । एवमेव ' सर्वगुरुर्मः ' इति मगणसम्बन्धकर्तुः पिङ्गला-चार्यस्य व्यवहारतः सर्वगुरुत्रिक प्रतिपद्यन्ते तथैव वेदवाक्यादर्थप्रतिपत्तृभिरवश्यं पदपदार्थसम्बन्धकर्ता तादृशपद-कदम्बात्मकवेदवाक्यकर्ता चैक एव स चाप्त इति ते स्मर्तव्याः, न च स्मर्यन्ते । समयव्यवहारयोरे ककर्तृकत्वविस्मरणे च नार्थनिश्चयः । प्रकृते च विनापि कर्तृस्मरणं वेदवाक्यादर्थनिश्चयस्य प्रसिद्धत्वान्न कचिद् वेदकर्ता सिद्धयति । यदि कथञ्चिद् विस्मरणमुपपद्येतापि, तथापि प्रमाणमन्तरेण न कर्तृनिर्णयः कर्तुं शक्यः । केवलस्यानुपलम्भस्य वस्त्वभावासाधकत्वेऽपि प्रमाणाभाव सहकृतस्य शशविषाणादिवत् तथात्वे बाधकाभावात् । ये पौरुषेयतां समर्थयन्ते, तेऽपि परम्परया कर्तृविशेषस्मरणं वक्तुं न शक्नुवन्ति । सामान्यतो दृष्टेन कर्तारमनुमाय स्वाभिमतं है, किन्तु वेद के कर्ता का विस्मरण निष्प्रयोजन नहीं हो सकता, क्योंकि लोकिक और वैदिक सारे व्यवहार उसी के अधीन हैं । पाणिनि का विस्मरण हो जाने पर बात और ऐन् वर्णों को वृद्धि संज्ञा का व्यवहार संभव नहीं है । इसी प्रकार जा पद - पदार्थ के सम्बन्ध का विधान करता है और जो वेद की व्यवहारों को प्रसति करता है; नुसार प्रयोजन का अनुष्ठान तब तक करके उसके अध्ययन - अध्यापन तथा उसके द्वारा संपादित होने वाले याग, उपासना आदि विवरण हो जाने पर ये सब व्यवहार भी नहीं चल सकते | बाद से अर्थ का ज्ञान और तद-नहीं हो सकता, जब तक कि उस कर्ता की और उसकी आतला की स्मृति न हो, अनाप्त या से अर्थ की यथार्थ अवत और तदनुसार प्रयोजन की निष्पत्ति नहीं होती । यावादि की स्वर्गादि की सघनता अन्य प्रमाणों में नहीं जानी जा सकती । कर्ता मेवात होने पर ही शर्थ प्रतिपादित यागादि में सब कोई की प्रवृत्ति हो सकती है, ऐसी मवस्था में कर्ता का विस्मरण कैसे सकता है? इस पर जिसका स्मरण अवश्य बना रहना चाहिये उसको स्मृति के अभाव में यही मानना उचित है कि इसका कोई कर्ता है नहीं । पाणिनि से भिन्न वक्वा पाणिनि के मत का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के व्यवहार से कोई व्यक्ति वृद्धि शब्द के व्यवहार से बात और को नहीं जानने, जैसे कि पिंगल से मित्र यथवा पिंगल के मत का अनुसरण न करने वाले व्यक्ति के व्यवहार से कोई भी सर से सभी गुरु अक्षरों वाला गण गृहीत होता है, इसको नहीं जान सकता । किन्तु " वृद्धिगवैज् " इस सूत्र से वृद्धि संज्ञा करने वाले पाणिनि के " वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद्वृद्धम् " इस सूत्र में वृद्धि पद से आत् और ऐचु का ग्रहण होता है, यह जान लेना है और ' सर्वगुरुर्मः इस सूत्र मे गण का स्वरूप बनाने वाले पिंगलाचार्य के व्यवहार से तीन अक्षरों के गुरु होने पर मगण की स्थिति मान लेना है, उसी तरह से वेद वाक्य से जिनको अर्थ की प्रतिपत्ति होती है, उन st area हो पदार्थ के संबन्ध का कर्ता और इस प्रकार के पद समूहात्मक वेद वाक्यों का कर्ता एक ही है, तथा वह प्राप्त है, इस प्रकार की स्मृति अवश्य होनी चाहिये, किन्तु वेद के संबन्ध में वह होती नहीं, अतः वेद अपौरुषेय अर्थात् किसी पुरुष का रना हुआ नहीं है, ऐसा ही मानना पड़ेगा । समय ( पारिभाषिक शब्द के अर्थ का ज्ञान कराने वाली शक्ति ) और व्यवहार का एक ही कर्ता है, इसका जब विस्मरण हो जाता है तो अर्थ का मिश्रय नहीं होता । प्रकृत ( वेद ) में विना कर्ता की स्मृति के भी वेदवाक्य से अर्थ का निश्चय होता है, अतः यह सिद्ध होता है कि वेद का कोई कर्ता नहीं है । afa fit प्रकार से कर्ता की विस्मृति उपपन्न हो भी सकती हो, तो fear प्रमाण के कर्ता का निश्चय नहीं किया जा सकता । केवल मनुपलम्भ वस्तु के अभाव का साधक भले ही न हो, किन्तु जब उसमें Tera सहायक हो जाता है, तो शश के विषाण के समान वह वस्तु के अभाव का साधक हो ही जाता है । उसमें कोई बाधा नहीं पढ़ती । जो वेद की पौरुषेयता का समर्थन करते हैं, वे भी परम्परा से किसी विशेष कर्ता की स्मृति उनको हो, ऐसा नहीं बता सकते |
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८६ वेदार्थपारिजातः कञ्चन कर्तारं साधयन्ति । केचिदीश्वरम् अन्ये हिरण्यगर्भस् केचित् प्रजापितम्, अपरे अग्न्यादीन् देवान् । मन्वादिवत् स्मर्यमाणे वेदकर्तरि नैतादृशी विप्रतिपत्तिर्युज्यते । स्मर्तव्यत्वे सत्यस्मरणात् कर्तभाव एवाध्यवसीयते । " ब्रह्म स्वयम्भु " ( तै. आ. २२ ९ ), " वाचा विरूपनित्यया " ( ऋ. सं. ८ | ७५१६ ), " अनादिनिधना नित्य बागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा " ( म. सा. शा. प. २३२/३५ ), " अत एव च नित्यत्वम् " ( ब्र. सू. ११३१२ ९ ) इत्यादिश्रुतिस्मृत्यनुसारेण वेदानां नित्यत्वावगमाच्च कर्त्रभावोऽध्यवसीयते । अत एव " तस्माद् यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे " अग्नेर्ऋग्वेद " इत्यादिवचनानां तु सम्प्रदायप्रवर्तक बोधपरत्वमेव, न तु कर्तृबोधकत्वम् । ' यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै " इति श्रुत्यनुरोधात् । चतुर्मुखस्य विधातापीश्वरो न वेदान् विदधाति, किन्तु विद्यमानाने ब्रह्मणो हृदि प्रहिणोति । अपि च, को वेदकर्ता भवेत्? कश्चिन्मनुष्यो वा योगी वा ईश्वरो वा? नाद्यः, मनुष्येषु धर्मादिज्ञानस्य वेदजन्य-त्वादेव तत्कर्तृत्वासम्भवात् न द्वितीयः, धर्माधर्मादिज्ञानं योगिनो बाह्येन्द्रियजन्यं मनोजन्यं वा? नाद्यः; धर्माधर्मादेर्वाह्येन्द्र-योग्यत्वात् । न द्वितीयोऽपि, आत्मनस्तद्योग्यगुणातिरिक्तज्ञानजनने मनसोऽसामर्थ्यात् । धर्माधर्मयोरात्मगुणत्वेऽप्ययोग्यत्वान्न मनोविषयत्वं सम्भवति । अपि च योगिनो योगजसामर्थ्यमपि निर्हेतुकं सहेतुकं वा? तत्र न प्रथमः ' सर्वेषामपि तथात्वापा-तात् । नाप्यन्त्यः, योगादिलक्षणधर्मस्य हेतुत्वे ततः प्राकू तज्ज्ञानमावश्यकमेवेति तद्धेतोर्वेदस्य प्राकृत सिद्धत्वस्याभ्युपेयत्वात् । सामान्यतोदृष्ट अनुमान से कर्ता का अनुमान करके वे स्वाभिमत किसी कर्ता को सिद्ध करते हैं । कुछ लोग ईश्वर को, दूसरे हिरण्यगर्भ को कोई प्रजापति को और अन्य लोग अग्नि प्रभृति देवताओं को वेद का कर्ता मानते हैं । किन्तु निश्चित रूप से मनु, वाल्मीकि, व्यास आदि मनुष्यरचित मनुस्मृति, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थो के कर्ताओं के संबंध में ऐसा मतभेद नहीं है । कर्ता की स्मृति अवश्य रहनी चाहिये, किन्तु है नहीं, इससे यही निश्चय करना उचित है कि वेदों का कोई कर्ता नहीं है । " ब्रह्म स्वयम्भु " इत्यादि श्रुति, स्मृति और सूत्रों के प्रमाण पद वेदों को नित्यता अवगत होती है, इससे यह निश्चित होता है कि वेदों का कोई कर्ता नहीं है । इसीलिये " उस यज्ञ ऋ, साम को उत्पत्ति हुई ", " अग्नि से ऋग्वेद हुआ; इस तरह के वचन केवल सम्प्रदाय की प्रवृत्ति का बोध कराते हैं, इनमें वेदों के कर्ता का निर्देश नहीं है । " जो पहले ब्रह्मा की रचना करता है और बाद में उसकी वेद का उपदेश देता है " इस श्रुति के अनुसार चतुर्मुख ब्रह्मा के विधाता ईश्वर भी वेद की रचना नहीं करते, किन्तु विद्यमान वेदों को ही ब्रह्मा के हृदय । में भेजते है दूसरी बात --- आप यह बताइये कि बंद का कर्ता कौन है? कोई मनुष्य है, योगी है, अथवा ईश्वर? मनुष्य वेद का कर्ता नहीं हो सकता, क्योंकि मनुष्यों को धर्मादि का ज्ञान वेद से ही होता है, अतः वह उसका कर्ता कैसे हो सकता है? योगी भी वेद का कर्ता नहीं हो सकता | योगी को धर्म - अधर्म आदि का ज्ञान बाह्य इन्द्रियों से होगा या मन से? यह बाह्य इन्द्रियों से नहीं हो सकता, क्योंकि - आदि का ज्ञान बाह्य इन्द्रियों से सम्भव नहीं हो सकता । मन से भी इनका ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि आत्मा के योग्य गुणों से अतिरिक्त अन्य विषयों में ज्ञान उत्पन्न करने की सामर्थ्य मन में नहीं है । धर्म और अधर्म यद्यपि आत्मा के गुण हैं, तो भी ये अयोग्य ' होने से मन के विषय नहीं हो सकते । दूसरी बात यह भी है कि योगी का योगज सम्म निर्हेतुक है या सहेतुक? यह fange नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर तो यह किसी को भी हो सकता है । सहेतुक भी नहीं हो सकता, क्योंकि योगादि लक्षण धर्म के हेतु होने पर उससे पहले उसका ज्ञान आवश्यक है । यह ज्ञान वेद से ही संभव है, यह स्वभावतः मानना पड़ेगा १. तात्पर्य यह है कि बाहर की अथवा अन्दर की इन्द्रियों से प्रत्यक्ष के योग्य वस्तु का प्रत्यक्ष होता है । चक्षुरिन्द्रिय से रूप का ही प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि वहीं प्रत्यक्ष के योग्य है । इसी तरह अन्तःकरण मन से भी सुख - दुःख का प्रत्यक्ष भ ही हो जाय, क्योंकि वे प्रत्यक्ष के योग्य हैं, किन्तु धर्म - अधर्म आत्मा आदि का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि ये scree के योग्य हैं हो नहीं ।
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८७ नापि तृतीयः वेदादीश्वरसिद्धि:, ईश्वरश्च वेदानां प्रणेता इत्यन्योन्याश्रयात् । बौद्धादयस्तु बुद्धादीनां सर्वज्ञत्वं प्रसाध्य तदभिप्रायानुसारीणि बोद्वाद्यागमवाक्यान्येव धर्ममूलत्वेनाभ्युपयन्ति । स्थातिविचारः अख्यातिवादरीत्या बाध्यप्रत्ययो न भवत्येव 1 बाधार्थानिरूपणात् । तथाहि -- यदि नाश एव बाधः, स न तेषामेव, बुद्धेर्बुद्धयन्तराद्विरोधः सम्बोधसाधारणत्वात् । अथ सहानवस्थानम्, तदपि समानम् अवाधितानामपि ज्ञानानां सहावस्थानासम्भवात् । अथ संस्कारोच्छेदो बाधः सोऽपि तथाविधः सम्यक् प्रत्ययजनितसंस्कारस्याप्युच्छेददर्शनात् । विषयापहारो बाध इत्यपि न, प्रतिभासत्वेन विषयापहारासम्भवात् । नहि बाघकज्ञानेन पूर्वप्रतिभानापलापः । तदभाव-ग्रहोऽपि न बाधः, तस्य कालान्तरभावित्वे मुद्गरदलितघटाभावग्राहिणोऽपि विज्ञानस्य बाधकत्वप्रसङ्गात् । तात्कालिकत्वे तु प्रत्ययद्वयसमर्पितद्वितययोगाद् उभयात्मकमेव तद्वस्तु । किं कस्य बाधकम्? फलापहारोऽपि न बाधः, ज्ञानस्य प्रमाण-फलस्योत्पन्नत्वेनापरिहरणीयत्वात् । नहि यदुत्पन्नं तदनुत्पन्नं वदति वाधकः । दानादिफलापहारो बाध इत्यपि न, तस्य पुरुषेच्छाधीनत्वेन प्रमाणफलत्वाभावात् । किञ्च, बाध्यबाधकभावः समानविषययोर्भवति भिन्नविषययोर्वा? नाद्यः, धारावाहिज्ञानेष्वदृष्टत्वात् । नान्त्यः, घटकुछयोपलम्भयोस्तदभावात् । यदि पूर्वज्ञानेन गृहीतादर्थाद्भन्नोऽर्थ उत्तरेण ज्ञानेन गृह्यते, तदापि न बाधसिद्धिः । किञ्च, fore भी वेद का कर्ता नहीं हो सकता, क्योंकि वेद से ईश्वर की सिद्धि होगी और ईश्वर वेदों का प्रणेता होगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष होगा । बोद्ध प्रभृति तो बुद्ध आदि को सर्वज्ञता सिद्ध करके उनके अभिप्राय का अनुसरण करने वाले बोद्धादि नागमों के वाक्यों को ही धर्म का मूल मानते हैं । ख्याति विचार अख्यातिवाद अर्थात् भ्रम को न मानने वाले प्रभाकर के मत में वाध्य ज्ञान होता ही नहीं है, क्योंकि उनके मत से बाध के स्वरूप का निरूपण ही नहीं किया जा सकता । जैसे -- यदि नाश को ही बाध कहा जाय तो इस प्रकार एक बुद्धि से दूसरी बुद्धि का नाश तो सभी ज्ञानों में सामान्य रूप से विद्यमान है, केवल बाघस्थल में ही नहीं । यदि बाघ का अर्थ यह किया जाय कि ये बाध के साथ में नहीं रह सकते, तो यह आपत्ति भी सभी ज्ञानों में समान रूप से विद्यमान है, क्योंकि अबाधित ज्ञान भी एक साथ नहीं रहते | अब यदि यह कहा जाय कि संस्कार के उच्छेद ( नाथ ) को are कहते हैं, तो उसकी भी वही स्थिति है, सम्यक ज्ञान से are संस्कार का भी उच्छेद देखा हो जाता 1 विषय के अपहार को भी बाव नहीं कह सकते, एक बार प्रतिभासित विषय का अपलाप aire है, बाक ज्ञान से उससे पहले प्रतिमास ज्ञान का अपलाप नहीं किया जा सकता । पूर्व गृहीत वस्तु के अभाव का atra ज्ञान भी are नहीं कहलाता, क्योंकि यह बाध यदि कालान्तर में होने वाला है तो मुद्गर के बाघात से फूटे हुए घड़े के अमान को देखने वाला विज्ञान मी पूर्व ज्ञान का बाधक माना जाने लगेगा | अब यदि बाघ तत्काल भावी है तो दो ज्ञानों से दो प्रकार के स्वरूप की अवगत होने से वस्तु की उभयात्मकता माननी पड़ेगी ऐसी अवस्था में क ta free are होगा । फल का अपहार भी बाध नहीं कहलाता, प्रमाण के फल के रूप में जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसका अपलाप नहीं किया जा सकता । जो उत्पन्न है, बाघक ज्ञान उसको अनुत्पन्न नहीं कह सकता । रजतादि के दानादि फल का अपहार भी बाघ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह तो पुरुष की इच्छा heart, as प्रमाण का फल नहीं हो सकता । आप यह बताये कि बाध्यबाधकभाव समानविषयक ज्ञानों में होता है या भिन्न विषयक? प्रथम पक्ष इसलिये नहीं afe मानविषयक धारावाहिक ज्ञान में बाध्यबाधकभाव नहीं होता | दुसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि एक ज्ञान से घट और दूसरे से कुड ( दीवाल ) की उपलब्धि होने पर भी बाध्यबाधकभाव नहीं होता । यदि पूर्वज्ञान से गृहीत अर्थ से भिन्न अर्थ
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८८ वेदार्थपारिजातः प्राप्त प्रतिष्ठे पूर्वस्मिन् प्रत्यये परचाभावी प्रत्यय एव दुर्बलत्वाद् बाधितुं योग्यः । न चैवं दृश्यते, तस्मान्न बाध्यं ज्ञानं भवतीति न तद् दृष्टान्तेन सावयनिबन्धनः परायः, तदभावात् संवादाद्यनपेक्षणान्न परतः प्रामाण्यमिति । ननु तर्हि शुक्तिरजतादिग्राहिणां विपरीतप्रत्यया अवाधिता एवेति चेन्न, विपरीतग्राहिप्रमाणासिद्धया तदसिद्धेः । न चेन्द्रियं विपरीतग्राहम् तथात्वे सर्वदा तदुत्पादप्रसङ्गात् । न च दोषदुष्टं तत्तथा स्वकार्यकरणे क्षीणशक्तिकत्वात् । दोषाणां कार्यप्रतिबन्धकत्वमेव भवति न विलक्षणकार्यकारित्वम्, तथात्वे दुष्टेभ्यः शालिबीजेभ्यो यवाङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । किन्तु -शुक्तिरजतस्थळे ग्रहणस्मरणरूपं प्रत्ययद्वयमेव विवेकाग्रहणात् विपरीतप्रत्ययत्वेनाख्यायते । अत एवाननुभूतरजतस्यानुद्बुद्ध-उत्तर ज्ञान से उपलब्ध होता है, तब भी बाध नहीं सिद्ध हो सकता । दूसरी बात यह भी है कि जब पहले ज्ञान ने प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली, तब उसके बाद होनेवाला मादी ज्ञान ही दुर्बल होने से बाधयाग्य हो सकता है । किस्तु ऐसा देखा नहीं जाता । इससे मानना पड़ेगा कि ज्ञान बाध्य नहीं होता । फलतः उसको दृष्टान्त मानकर साधम्र्य से होने वाला संशय नहीं होगा और संशय के न होने से संवादादि की अपेक्षा के अभाव में परतः प्रामाण्य भी नहीं होगा । तब तो शुक्ति में रजतादि का ग्रहण कमवाले विपरीत ज्ञान का भी बाध नहीं होगा? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि विपरीत वस्तु के ग्राहक प्रमाण की सिद्धि न हो पाने से विपरीत ग्रहण की संभावना ही नहीं है । इन्द्रिय विपरीत ज्ञान की ग्राहिका नहीं होती, क्योकि ऐसा मानने पर सदा विपरीत ज्ञान की उत्पति का प्रसंग का सकता है । इन्द्रियों स er faani न हैं । बाप से दुष्ट पन्द्रियों से भी यह नहीं होगा, क्योंकि इन्द्रियों की कार्य करने के बाद अन्य विषय में असमर्थ हो जाती हैं । दोष कार्य के प्रतिवन्धक ही होते हैं, वे किसी विलक्षण कार्य को नहीं कर सकते । यदि शेष विलक्षण कार्य के जनक पाने जय हो दोष प्ररतशालि के बीजों से यब के अंकुर की उत्पत्ति का प्रसंग हो जायगा । किन्तु जहाँ पर शुक्ति में रजत का ज्ञान होता है, ऐसे स्थलों में ग्रहण और सारण रूप दो ज्ञान दोनों ज्ञानों के विवेक अर्थात् भेद का ज्ञान होने से विपरीत ज्ञान के रूप में प्रसिद्ध हो जाते हैं । इसलिये जिसने चत का अनुभव नहीं किया है, उसको रक्त का संस्कार भी सबुह नहीं होगा । फलतः उसको गुक्ति में यह रजत है, ऐसा ज्ञान भी नहीं होगा । स्मरण भी दोष के कारण पताविष्टि नहीं होला, अर्थात् इस स्मृति में केवल चक्षि हो प्रतिभासित होती है, उससे सम्बद्ध तत्ता अर्थात् यह वही दुकान आदि में रखती चांदी है, मोप हो जाता है । इसमें सामने रखी हुई चमकीली वस्तु रूप धर्मी का प्रतिभाससून जो ' इदम् ' अनुभव है, उसकी भी तसा के प्रमोष हो जाने के कारण यह रजत है, इस स्मरण का विवेक न हो पाने से यह रजत है, इस प्रकार का वान अख्याति ही कहलाता है । इस कवन का अभिप्राय यह है कि ' इदे रजतम् ' इत्यादि स्थल में ' हृदम् ' १. एकदेशी मीमांसक आचार्य प्रभार और रामानुज के मत में सब ज्ञान सत्य ही हैं, श्रम होता हो नहीं । यदि कहो कि फिर रज्जु में होनेवाले सर्प के ज्ञान को भी क्या काम न कह कर सत्य ही कहेंगे? तो उत्तर हाँ में होगा । उन लोगों का यह कहना है कि ' यह साँप है ' यह एक ज्ञान नहीं है, किन्तु ' यह इतना एक ज्ञान है और ' सॉप है यह दूसरा ज्ञान है । सामने पड़ी वस्तु का ' यह ' इस रूप में जो ज्ञान हो रहा है, वह प्रत्यक्ष ज्ञान है और ' रजतम् ' ( चांदी ) यह द्वारा ज्ञान स्मरण रूप है । दोनों काम भी भिन्न हैं । एक है ज्ञान और दूसरा है स्मरण ज्ञान । सामने पड़ी हुई वस्तु का ' ह ' इस रूप में प्रत्यक्ष शान हो रहा है और साथ ही चाँदी का स्मरण के रूप में ज्ञान हो रहा है । विशेषता यह है कि सारण में ' यह ' जो मंत्र रहता है, वह यहाँ दोष के कारण नष्ट हो गया है और प्रत्यक्ष ज्ञान का श्री नीव के कारण नष्ट हो गया है । इसलिये दोनों ज्ञानों के भेद का और दोनों प्रत्यक्ष और स्मरण रूप कानों के दो मित्र - भित्र, सामने पड़ी हुई वस्तु और बाजार में रक्खी हुई चाँदी, इन दोनों विषयों का दोष के कारण ज्ञान नहीं रहता । इसीलिये दोनों ज्ञानों को मिलाकर समझनेवाला एक ज्ञान समझ लेता है और दोनों ज्ञानों के दो free - fo विषय सामने पड़ी हुई वस्तु और बाजार में पड़ी हुई चाँदी को एक समझ करके व्यवहार करता और लेने के लिए भी दौड़ पड़ता 1 वास्तव में यहाँ दो तुओं के दो भिन्न - भिन्न ज्ञान है और ज्ञान के दो विषय भो free - free हैं, feng re कार आदि दोषों के कारण ज्ञान और विषय का भेद न समझ कर व्यवहार और प्रवृत्ति करता है । यही अति प्रभाकर, रामाकृत आदि का मत है ।
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वेदार्थपारिजातः ८६ संस्कारस्य न ' रजत ' मिति ज्ञानं भवति । स्मरणमपि दोपवशात् प्रमुष्टतत्ताकं भवति । तेन पुरोवस्थिति भास्वराकारधर्म-प्रतिभासरूपस्येदमनुभवस्य प्रमुष्टतत्ताकस्य रजतमिति स्मरणस्य विवेकाग्रहणादिदं रजतमित्यख्यातिरेबोच्यते । विपरीतख्याती रजतमन्यदेशकालस्थमालम्वनम्? शुक्तिका वा निगूहिताकारा सती परिगृहीतरजताकारा? अथवाऽन्यदालम्बनम् अन्यदाभातीति? अन प्रकारत्रयमेव सम्भवति । प्रथमे असत्ख्यातिरेव असतो रजतस्य प्रतिभासात् देशकालान्तरे सतोऽप्यत्र तदसत्त्वात् । यदि देशकालौ सुन्तावेव भाषेते, तदा न भ्रान्तिः । यद्यन्तौ तदा कथमालम्बनता -मुपगतौ? यदि स्मृत्यारूढं रजतमत्र स्फुरति तदापि तस्य कोऽर्थः? स्मृतिरपि ज्ञानमेव । तदपि कथमनालम्बनं स्फुरति? स्मृतेरनर्थजत्वं रूपमेवेति चेत्तदापि तया कथमिह रजतं सन्निधापयितुं शक्यम्? तस्मादसन्निहितावलम्बनाविपरीतख्याति-रसत्ख्यातिरेव । द्वितीयोऽपि पक्षो निर्मूल एच, यदि रजतप्रतीतिस्तहि कथं शुक्तिरालम्बनम्? बाधकप्रत्ययादेवमिति चेन्न, ज्ञानान्तरेणास्य विपयव्यवस्थापनात् । तस्माद्यदेव चकास्ति तदेवास्य विषयः । शुक्तिस्तु निगूहितनतुरित्यपि न युक्तम्, तथात्वे विषयत्वानुपपत्तेः । न च सन्निधानेनालम्बनता तथात्वे तत्रत्यभुप्रदेशस्यालम्बनतापत्तेः । तेन यस्यां बुद्धी यो s वभासते स एव तद्विपयः । न अन्यद् भाति, अन्यदालम्बनन् । यदि रजतमेव बुद्धिग्राह्यम्, तच्चासञ्चेत् तदामख्यातिरपि नोपपद्यते । तथाहि-- किमेकान्तासतः पदार्थस्य प्रथनमाहोस्विद् देशान्तरादौ विद्यमानस्यैव? उत्तरस्मित् पक्षे विपरीत-ख्यातिरेव, अन्यथाख्यातिवादिभिरपि तत्र तत्सत्त्वानभ्युपगमात् । प्रथमोऽपि पक्षो न युक्तः, खपुष्पादेरपि प्रतिभासप्रसङ्गात् । वासनावशात्तथा भवतीति चेन्न, अर्थमन्तरेण वासवाया अप्यनुपपत्तेः अर्थानुभव जनितस्य संस्कारस्यैव वासनात्वात् । रूप से प्रतिभासित हो रही शक्ति का अनुभव तो दब जाता है और पूर्वानुभूत ' रजत ' की स्मृति जाग उठती है । इस प्रकार यहाँ पर agar air मृति के धर्मो के प्रमोष के कारण इनमें परस्पर विवेक के अग्रहण के कारण, एक ही प्रतीति होती है । यह वास्तविक ही है, अतः इसमें किसी प्रकार की नवीन प्रतीति न होने से यह अख्याति कहलाता है । विपरीत ख्याति में अन्य देश और काल में स्थित रजत यहाँ आलम्बन होती है, अथवा शुक्तिका का ही अपना आकार छिप जाता है और रक्त का आकार गृहीत हो जाता है, अथवा आलम्बन है कुछ दूसरा हो और प्रतीत कुछ दूसरा ही होता है, ये तीन ही प्रकार हो सकते । प्रथम प्रकार में अमत्ख्याति माननी पड़ेगी, क्योंकि अविद्यमान रजत का आपने ज्ञान मान लिया । देशान्तर और कालान्तर में वह भले ही हो, किन्तु यहाँ तो वह है नहीं । यदि सत् देश और काल की प्रतीति होती है तब तो भ्रान्ति नहीं मानी जायगी, किन्तु यदि देश और काल की सत्ता नहीं है तो वे आलम्बन कैसे होंगे? यदि स्मृति में आयी हुई रजत का यहाँ ज्ञान होता है आ? स्मृति को तो ज्ञान ही है । बिना आलम्बन के स्मृति का स्फुरण भी कैसे हो सकता है । स्मृति का तो यह स्वरूप ही है कि वह बिना अर्थ की उपस्थिति के भी होती है, तो ऐसी अवस्था में भी उस स्मृति से यहाँ रजत कैसे लाई जा सकती है? इसलिये जिसका आलम्बन संनिहित नहीं है, इस प्रकार की विपरीत ख्याति का असरख्याति में ही संनिवेश होगा । दूसरा पक्ष भी निर्मूल है, यदि रजत की प्रतीति ( ज्ञान ) हो रही है, तो उसका आलम्बन ( बाधार ) शुक्ति कैसे हो सकती है? बाधक प्रत्यय से इसका ज्ञान होता है, तो यह कथन भी इसलिये ठीक नहीं है कि दूसरे ज्ञान से इसकी विषय - व्यवस्था हो जाती है । इसलिये जो प्रतीत हो रहा है, वहीं उसका विषय है । शुक्ति का स्वरूप यहाँ छिपा हमा है, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर वह किसी ज्ञान का विषय न हो सकेगा । संविधान होने पर वह ज्ञान का आलम्बन बन सकेगा, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर शुक्ति-रजतादि स्थल में स्थित भूप्रदेष भी आलम्बन हो जायगा । संनिहितला यह भी है । इसलिये जिस बुद्धि में जिसका आभास होता है, a fart सकता है | आभास किसी दूसरे का हो और आलम्बन कोई दूसरा हो, यह संभव नहीं हो सकता । यदि रजत ही बुद्धि का विषय है और वह यदि असत् है, तब तो असत्ख्याति को भी बापत्ति नहीं हो सकती । जैसे कि ऐसे स्थलों में एकदम से असत् पदार्थ का ज्ञान होता है, या देशान्तर कालान्तर में स्थित पदार्थ का हो? दूसरे पक्ष विपरीत ख्याति होती है । अभ्ययाख्याति को मानने वाले भी वहाँ पर उस पदार्थ की सत्ता नहीं मानते । प्रथम पक्ष इसलिये उचित नहीं है कि ऐसा मानने पर आकाशपुष्प की भी प्रतीति माननी पड़ जायगी । वासना के कारण ऐसा हो सकता है, यह भी नहीं कह
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६० वेदार्थारिजातः सा कथमसदर्थप्रतिभासहेतुः स्यात् । असत्त्वाविशेषेऽपि किमिति रजतप्रतीति जनयति? खपुष्पप्रतीति न जनयति? अतः पक्षत्रयासम्भवाद् विपरीतख्यातिरपि न सम्भवति । यत्तु - ' विज्ञानमेवात्मनात्मानं गृह्णाति श्राह्मार्थानुपपत्तेः इत्यात्मख्यातिरेव ', तदपि न, तथात्वे ' अहं रजतमिति ' प्रतीत्यापत्तेः । यदन्तर्ज्ञेयं तद्बहिर्वदवभासते । तथात्वे विपरीतख्यातिरेव भवेदियमपि बहिर्बुद्धेरभावादसत्ख्यातिर्वक्तुं शक्या । अत्र सर्वत्र स्मृत्युपस्थापितं रजतं भाति । तेन रजतस्मृतिरपरिहार्य । तत्रांशप्रमोषोऽपि सर्वैरनुभूयते । तदुक्तम् —'तस्मा-त्प्रमुषितामेनां स्मृतिमिच्छन्ति तार्किकाः । अभ्यस्ते विषये लिङ्गप्रतिवन्धां स्पृति यथा ॥ एवं सतीयमख्यातिरिष्यते सर्व-वादिभिः । तथा प्रकटयद्भिस्तु पीतं प्राभाकरैर्यशः ॥ ' ननु रजतमिति स्मृतेः स्वरूपोल्लेख मा भूत्, इदमित्यत्र पुरोऽवस्थितधर्मप्रतिभासात् कथमख्यातिरिति चंदुच्यते, न पुरोऽवस्थितो धर्मी शक्तिकेयमिति स्पष्टतया गृह्यते, तथाऽभ्युपगमे भ्रमाभावप्रसङ्गात् किन्तु तेजस्विता दिविपरीतं मात्रमवभासते । धर्मसारूप्याञ्च तदानीं रजतं स्वयंते । ते एते ग्रहणस्परणे विविक्ते अपि विविक्ततया न गृह्येते इति विवेकाग्रहणमख्यातिरुच्यते, न तु सर्वथा अप्रतिपत्तिरेवाख्यातिः । ग्रहणस्मरणयोर्वैयधिकरण्येनाग्रहणेन यत्र सामानाधिकरण्यं तत्र सामानाधिकरण्यव्यवहारः । न तु यदेवेदं तदेव रजतमिति सामानाधिकरण्येन ग्रहणं भवति, तथात्वे विपरीतख्यातिरेव स्यात् । वैयधिकरण्यानुग्रहादेव रजतार्थिप्रवृत्तिर्भवति । सकते, क्योंकि किसी वस्तु की वासना भी उस वस्तु के बिना उत्पन्न नहीं होगी । अर्थ के अनुभव से उत्पन्न संस्कार हो तो बासना कहलाते हैं । यह वासना असत् अर्थ के प्रतिभाग में कैसे कारण हो सकती है? मान रूप से सत्ता का अभाव रहने पर भी वह रजत प्रतीति को तो पैदा करती है, किन्तु आकाशपुष्प की प्रतीति को नहीं पैदा करती, इसमें क्या कारण है? इस प्रकार तीनों ही पक्षों के न बन पाने से विपरीत ख्याति की उपपत्ति नहीं की जा सकती । यह कहना कि विज्ञान ही अपने से अपने को ग्रहण करता है, क्योंकि विज्ञान के अतिरिक्त बाह्य वस्तु सिद्ध नहीं हो सकती | इस प्रकार आत्म ख्याति हो माननी चाहिये, तो यह भी उचित नहीं है । ऐसा मानने पर तो मैं रजत है, इस तरह की प्रतीति ( ज्ञान ) होने लगेगी । जिसका मीतर ज्ञान होना चाहिये वह बाहरी वस्तु की तरह होना के इस तरह से तो यहाँ पर विपरीत रूपति हो हुई और यह प्रतीति मां बाहा स्थित किसी बुद्धि के अभाव में असत्ख्याति ही कहीं नागी । ऐसे भी स्थलों में स्मृति से उपस्थापित रजत का मान होता है । इससे रजत स्मृति को कोई रोक नहीं सकना और यहाँ पर नमी जानते हैं कि इस स्मृति के साथ तत्तांश ( पूर्वानुभूत अंश ) का बोध छूट जाता है । जैसा कि कहा गया है --- " इसलिये तार्किक जनों जा यह मानना है कि इस स्मृति में तत्तांव का प्रमोष हो जाता है, जैसे कि अभ्यस्त विषय में लिंग से प्रतिवद्ध स्मृति का प्रमोष होना है । ऐसी अवस्था में सभी वाद इसने ख्याति हो मानेंगे | किन्तु इस सिद्धान्त को प्रकट करने का सारा श्रेय प्राभाकरों ( प्रभाकर तथा उसके अनुयायी मीमांसकों ) को मिला है " । प्रश्न उठता है कि रजत की स्मृति के समय उसके सल्य का उल्लेख हो न हो, ' इस ' इस तरह से सामने स्थित धर्मी का जब प्रतिभास हो रहा है, उस अवस्था में अख्याति कैसे मानी जा मकती? तो इसका उत्तर यह है कि सामने स्थित धर्मी का ' यह शुक्ति है ' इस तरह से स्पष्ट प्रतिभास नहीं होता, यदि ऐसा माने तब तो भ्रम होगा ही नहीं । किन्तु रजत की तरह ही चमक - दमक वाले धर्मी मात्र का उस समय आम होता है और धर्म में समानता होने से उस समय रजत की स्मृति जाग उठती है । इस प्रकार से यहाँ पर ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) और स्मरण ये दो मिनभिन्न ज्ञान है, किन्तु इन दोनों की भिन्नता की प्रतीति नहीं होती । इस प्रकार यह विवेक का अग्रहण ही यहाँ पर अख्याति कहलाती है, सर्वदा अप्रतीति को जयख्याति नहीं कहा जाता । ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) और स्मरण की जब after से प्रतीति नहीं होती तो यह भी एक प्रकार का सामानाधिकरण्य ही हुआ, बरा: यहाँ पर सामानाधिकरण्य का सा व्यवहार होता है । जो यह है, वही रजत है, इस तरह से सामानाधिकरण्य से प्रतीति नहीं होती, यदि ऐसी प्रतीति होती तो विपरीत ख्याति हो सकती थी । वैधिकरण्य का बोध नहीं होता, इसीलिये रजतार्थी पुरुष को ऐसे स्थलों में प्रवृत्ति भी देखी जाती है ।