वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 121–130

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 121–130

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वेदार्थपारिजातः ६१ नन्वेवं नेदं रजतमिति पूर्वावगतरजतप्रतिषेधबोधितवाघप्रत्ययस्य का गतिरिति चेन्न प्रागगृहीतविवेकप्रख्यात्यति. रिक्तस्य रजतबाधस्याननुभवात् । स्वप्ने तु स्मृतिरेव स्मृतित्वेन न गृह्यते । न सदृशदर्शनमन्तरा कथं स्मृतिः? निद्राकषा-वितान्तःकरणस्यापि स्मृतिकारणत्वाभ्युपगमात् । द्विचन्द्रादी वृत्तिरेव तिमिरादिना द्विधा भवति । तदुक्तम् -'न सर्वत्र स्मृतेरेव प्रमोषोऽभ्युपगम्यते । किन्त्वख्यातिरतश्चासौ कथञ्चित् कस्यचित् क्वचित् ॥ भवत्यनुभवस्मृत्योर्विवेकाग्रहणं क्वचित् । क्वचित् स्मर्यमाणस्य तथात्वेनानुपग्रहः । द्विधा कृता वर्षाचिद वृत्तिनेत्रस्य तिमिरादिना ॥ तहि ग्रहीतुन शक्नोति शिशिर त्विषम् । क्वचिदसनसम्पृक्ते पित्ते वितत्वदेदनात् ॥ परिच्छेत्तु न शक्नोति माधुर्यं शर्करागतम् । गृह्णाति यत्तु तिक्कत्वं वस्तुतः पित्तवति ॥ तथा तु न विजानाति निगिरन्नेष शशम् । नदेवं सति सर्वत्र सम्यग्रहणं भ्रमः ॥ न मिथ्याप्रलयः कश्चिदस्ति शङ्खानिबन्धनम् | अजातमिथ्याशङ्कश्च न संवादमपेक्षते ॥ तस्मान्न कश्चित् परतः प्रामाण्यमधिगच्छति । एवं स्वतः प्रमाणत्वे सिद्धे वेदेऽपि मा गतिः । अपवाद्वयाभावो वकव्यश्चात्र पूर्ववत् ॥ ' न्यायमञ्जरीकाराः सर्वमेतत् सङ्कल्य्य प्रतिक्षिपन्ति प्रत्यभिज्ञावदेकत्वेनव संवद्यमानत्वान्नंदं रजतमिति द्वं ज्ञाने । यदिदमग्रतः स्थितं तद्रजतमिति सत्यरजतप्रतीतिः । किञ्च नानानुभूततया रजतं प्रकाशते किन्त्वनुभूयमानतया । अनुभूतता-ग्रहणं स्मरणमुच्यते नानुभूयमानताग्रहणम् । स्वप्रकाशा च संवित्तिरिति भवदर्शनम् । तत्रेणा संवित् स्मरणात्मना भासते पुनः प्रश्न उठता है किस तरह से तो यह रजत नहीं हैं, ऐसे पहले रजत रूप से इस ज्ञान के निषेध का बोध कराने वाले बाधक ज्ञान की क्या गति होगी? उत्तर यह है कि ऐसे स्थलों में पहले जो विवेक ( सेव ) का नग्रहण ( अज्ञान ) है, वही हट कर बाद में विवेक के ग्रहण होने से दोनों जान पृथक - पृथक प्रतीत होते हैं । इसके अतिरिक्त रजत ज्ञान के वाधक ज्ञान नाम की कोई चीज नहीं है । स्वप्त में तो स्मृति का भी स्मृति के रूप मे ज्ञान नहीं होता | स्वप्नावस्था में सट्टा दर्शन के बिना स्मृति कैसे होगी? यह प्रश्न गलत है, क्योंकि निद्रा - कामित चित्त से भी स्मृति की उत्पत्ति मानी गई है । जहाँ पर दो चन्द्र का ज्ञान होता है, ऐसे स्थलों में चक्षु की वृत्ति हो तिमिरादि दोष के कारण दो भागों में बट जाती है । जैसा कि कहा गया है --- " सभी स्थानों पर केवल स्मृति का प्रमोष ही नहीं माना जाता, किन्तु माननी पड़ती है । इसी किसी को किसी प्रकार से कभी कभी अनुभव और स्मृति में विवेक करने की बुद्धि नहीं रह जाती और कहीं कही स्मर्यमाण वस्तु का उसी रूप में बोध नहीं हो पाता । कहीं पर नेत्र की वृत्ति हो तिमिर प्रभृति दोषों के कारण दो भागों में बद जाती है तो वह एक हो चन्द्रमा को दो देखने लगती हैं । कहीं पर जिल्हा से संपृक्त पित्त के कारण तिक्तता ज्ञान की afe वृद्धि होने पर शर्करा खण्ड के माधुर्य को भी ग्रहण नहीं कर पाती । वह शर्कंग में भी जो तीतेपन का अनुभव करती हैं, वह वस्तुतः पित्त में वर्तमान है, किन्तु वह ऐसा नहीं समक्ष पाती और पर्कराखण्ड को frre ते समय वह उसी को तोता समझ लेती है । इस प्रकार सभी स्थलों में यह बात निश्चित है कि वह वस्तु को ठीक समझ नहीं पाता है । इन स्थलों में कहीं पर भी मिध्याज्ञान नहीं होता, जिससे कि किसी प्रकार की शंका उठ सकती हो । जब व्यक्ति को मिथ्या आशंका नहीं उठेगी तो उसको अपने अपने ज्ञान के संवाद के लिये अन्य किसी प्रमाण को आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी । इस तरह से कोई भी व्यक्ति परतः प्रामाण्य को अवगत नहीं करता, प्रामाण्य की अवगति उनको स्वतः हो जाती है | ऐसी परिस्थिति में वेद का भी स्वत: सिद्ध प्रामाण्य मानना पड़ेगा | स्वतः प्रामाण्यस्वाभाविक है, इसमें परवर्ती बाघ ज्ञान और विपरीत ज्ञान ही अपवाद माने जा सकते है, जैसा कि पहले बताया जा चुका है 1 " न्यायमंजरीकार जयन्त भट्ट ने उपर्युक्त प्राभाकर मत को संक्षेप में बताकर उसका इस प्रकार खण्डन किया है- प्रत्यभिज्ञा स्थल में जैसे ज्ञान एक ही माना जाता है, उसी प्रकार ' इदं रजतम् ' यहाँ पर भी एक ही ज्ञान है दो नहीं । यह जो मागे वस्तु दिखायी देती है, वह रजत है, यह सत्य रजत की प्रतीति होती है । यहाँ पर भूतकाल में अनुभूत हुई वस्तु की तरह रजत का रूप से मान नहीं होता, किन्तु वर्तमान समय में प्रतीत हो रही वस्तु की तरह अनुभव रूप में ही होता है । अनुमुतत्त्ररूप से वस्तु का ज्ञान ही स्मरण होता है, अनुभूयमानत्व रूप से नहीं । आपके मन में संवित्ति स्वयं प्रकाशित होती है । ऐसी अवस्था में यह संवित् यदि स्मरण के रूप में मासित होती है, तो उसमें प्रमोष कैसा? और यदि अनुभव के रूप में प्रकाशित होती है, तो यहाँ पर विपरीत

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२ वेदार्थपारिजातः चेत् कः प्रमोषार्थः? अनुभवात्मना चेद्विपरीतख्यातिरेव । सविन्मात्ररूपेण प्रकाशत इत्यपि न युक्तम्, रजतरयापि तत्रोल्ले-खात् । न चेयमप्रतिपत्तिरेव, मदमूर्छादिदशाविसदृशस्वप्रकाशसंवेदनानुभवात् । यथेदमंशे स्वप्रकाशवेदनं तथैव रजतांशेऽपि । द्वयोश्चाशयोः समाने संवेदने कथमेकस्य प्रत्यक्षता, अपरस्य स्मृतिविषयतेति कल्पयितुं शक्यते । ततश्च कथं विभागः? इद-मित्यत्र किं भाति? यदि शुक्ति: सकलस्वगतविशेषविशिष्टा भाति, तदा तद्दर्शने सति रजतस्मरणस्य क्वावसरः? सादृश्य-निबन्धने स्मरणे सत्यपि कुतोऽविवेकः? यदि त्विदमिति प्रत्यये धर्मिमात्रं भाति न शुक्तिशकलम्, तदा तु सामान्यधर्मग्रहण-वशाद् विरुद्ध संस्कारोपनिबन्धनविरुद्धविशेषस्मरणकारणकमिदं रजतमिति सामान्योपक्रमे विशेषपर्यवसानं ज्ञानम्, यदिदं तद्रजतमिति सामानाधिकरण्यावमर्शात् । रजतानुभवाभिमानेनैव रजतार्थिप्रवृत्तिरपि भवति । ननु ग्रहणस्मरणयोर्विवेकाग्रहात् प्रवृत्तिरित्युक्तम् इति चेन्न, रजतज्ञानमन्तरा विवेकाग्रहमात्राद् रजतार्थिप्रवृत्त्य-नुपपत्तेः । यथा धर्मकीर्तिदृश्यविकल्पावेकीकृत्य प्रवर्तत इति वक्ति, तदनुकरणमा त्रमिदम् । तत्र यथा यावद् दृश्यं गृहीतमिति न जातः प्रत्ययस्तावत्कथं दृश्यार्थिन: प्रवृत्ति:? तथैव प्रकृतेऽपि वक्तुं शक्यते । तस्मादस्ति रजतग्रहणं न स्मरणप्रमोषमात्रम् । यद्यपि रजतगतविशेषस्मरणमन्यथाख्यातिवादिभिरप्युपेयते, तथापि पुरोऽवस्थिते धर्मिण्यूर्ध्वत्वादिसाधारणधर्मग्रहणात् स्थाणु-पुरुषगतविशेषाग्रहणाद् उभयविशेषस्मृतेः संशयो भवति, एवमिहापि तेजस्विता दिसामान्यधर्मग्रहणाद विशेषाग्रहणाद् रजत-विशेषस्मृतेश्च तस्मिन् धर्मिणि रजतप्रत्ययो भवति विपर्ययात्मकः । संशये ह्यभयत्र विशेषस्मरणमिति विशेषः । अत एवा-ख्याति माननी पड़ेगी । केवल संवित् के रूप मे प्रकाशित होती है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि साथ में रजत का भी उल्लेख विद्यमान है । यह प्रतिपत्ति नहीं है, क्योंकि यह f पर मद, मुर्च्छा प्रभूति दशाओं से विलक्षण स्वप्रकाश संवेदन जैसे ' इदम् ' अंश में स्वप्रकाश संवेदन होता है, का अनुभव होता है, उसी तरह से ' रजत ' अश में भी होता है । जब दोनों ही अंशों का संवेदन समान है, तो एक प्रत्यक्ष का विषय और दूसरा स्मृति का विषय कैसे हो सकता है? एक ही समान संवेदन के दो विभाग कैसे हो सकते हैं? ' इदम् ' यहाँ पर किसका भान होता है? यदि अपनी सारी विशेषताओं के साथ शुक्तिका का भान होता । तो उसके रहते रजत के स्मरण का अवसर हो कहाँ है? सादृश्य प्रयुक्त स्वरण हो भी सकता है, किन्तु स्मृति और अनुभव में विवेक के अग्रहण का प्रसंग हो कहाँ है? यदि यह कहा जाय कि ' इम् ' इस प्रत्यय में धर्मी मात्र का ग्रहण होता है, शुक्ति शकल का नहीं, तब तो यह मानना पड़ेगा कि सामान्य धर्म का ग्रहण कर पाने से विरुद्ध संस्कारों से उत्पन्न हुई विशेष प्रकार की विरुद्ध स्मृति के कारण ' यह रजत है, इस तरह से उपक्रम दशा में सामान्य ज्ञान का भी उपसंहार में विशेष ज्ञान में पर्य ear हो गया है, क्योंकि जो यह है, वह रजत है, इस तरह से सामानाधिकरण्य का परामर्श देखा जाता है । मुझे रजत का अनुभव हुआ है, उस प्रकार के अभि-मान से ही रजतार्थी पुरुष की वहाँ प्रवृत्ति भी होती है । हले यह जो कहा गया है कि ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) और स्मरण का विवेक न होने से प्रवृत्ति होती है, यह बात गलत है, क्योंकि रजत के ज्ञान के बिना केवल विवेक के ग्रहण के न होने से रजतार्थी की प्रवृत्ति नहीं हो सकती । धर्मकीर्ति का कहना है कि और विकल्प प्रत्यय को एक में मिलाने पर ही प्रवृत्ति होती है, प्रभाकर का उक्त कथन धर्मकीर्ति का अनुकरण मात्र है । विनिता यह है कि एक दूसरे का अनुकरण करके भी दोनों एक ख्याति न मानकर भिन्न - भिन्न अख्याति और आत्मख्याति मानते हैं । वहाँ पर जैसे जब तक her et का ग्रहण होता है, तब तक ज्ञान नहीं होता तो उसको देखने की प्रवृत्ति कैसे होगी, उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी कहा जा सकता है । इसलिए यहाँ रजत का भी ग्रहण होता है, अतः स्मृति का प्रमोष मात्र नहीं माना जा सकता । यद्यपि ऐसे स्थलों में अन्यथा ख्याति को मानने वाले भी रजतगत विशेषता की स्मृति मानते हैं, तो भी जैसे सामने विद्यमान धर्मी में कत्व आदि साधारण धर्मों के ग्रहण से और स्थाणु अथवा पुरुषगत विशेषत धर्मो का ग्रहण ( ज्ञान ) न होते से और दोनों के विशेष धर्मों की एक साथ स्मृति होने से सन्देह होता है, I उसी प्रकार से यहाँ पर भी चमचमाहट जैसे सामान्य धर्म के ज्ञान होने से, विशेष धर्मो का ज्ञान न होने से और रजत विशेष की स्मृति के कारण उस धर्मों में विपर्ययात्मक रजत ज्ञान हो जाता है । इन दोनों में इतना ही अन्तर है कि संशय स्थल में दोनों स्थलों की विशेषताओं का स्मरण होता है और विपर्यय में केवल एक की ही विशेषता का स्मरण होता है । इसीलिये जिसको

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वेदार्थपारिजातः २३ गृहीत रजतस्येदं ज्ञानं नोपपद्यते, सदृशाग्रहणे वा निशीथादौ न त्वेतावता स्मरणमात्रम्, स्मरणजन्यस्य विपर्ययप्रत्ययस्यापि संवेदनात् । यत्तु विपर्ययावयतेः कारणं विकल्पितम्, तदपि न किञ्चित्, ' कार्य वेदवगम्येत कि कारणपरीक्षया । कार्यं चेन्नाव-गम्येत कि कारणपरीक्षया ॥ ' इति । कार्याकस्मिफतानुपपत्तेः कारणं कल्प्यताम् । क्लुप्तं च दोषसहितमिन्द्रियम्, था संस्कारसहकारि तत् प्रत्यभिज्ञायाम् । यद्यपि दुष्टाः शालयो न यदाङ्कुरं जनयन्ति, तथापि दावदग्धाद्वेत्रबीजात् कदलीकाण्डप्ररोहदर्शनात्, भस्गकदोष-दुष्टस्योदर्य वह्नेर्बह्वन्नपचनसामर्थ्यदर्शनाच्च दुष्टमिन्द्रियं विपरीतप्रत्ययजनकमित्युपपद्यते । तस्माद् दोषकलुषिता दन्द्रियात् पुरोऽवस्थितधमिगत त्रिकोणत्वादिविशेषावमर्श कौशलशून्यात् सामान्यधर्मसहचरित पदार्थान्तर्गतविशेषस्मरणोपकृताद् भवति विपरीतप्रत्ययः । सम्यज्ज्ञानापेक्षया तद् दुष्टमुच्यते । स्वकार्ये विपर्ययज्ञाने तु कारणमेव तन्न दुष्टम् । किञ्च नेदं रजतमिति बाधकं ज्ञानं पूर्वानुभवविषयीकृः रजत निषेधमवगमयदेवोत्पद्यते । यदहमद्राक्षं तद्रजतं न भवतीति । प्रसक्तस्य चायं निपेधः । अननुभूतमप्रसक्तमिति प्रतिषिध्यमानं रजतमिव कनकमपि किमिति न प्रतिषिध्यते? यत्तु अनुभवस्मरणविवेकप्रतिपादकं बाधकज्ञानमिति तन्न तथाननुभवात् । नहि यदविविक्तं तद्विविक्तमिति बाधकज्ञानमिति पहले से रजत का ज्ञान नहीं होता है, उसको इस प्रकार का ज्ञान नहीं होता और रात्रि में जब सादृश्य का ग्रहण नहीं होता, तब भी इस तरह का ज्ञान नही होता | इससे यह नहीं कहा जा सकता कि यह केवल स्मरण मात्र है, क्योंकि साथ में स्मरण से उत्पन्न farta प्रत्यय का भी ज्ञान होता है । पहले विपर्यय की अति कैसे होगी, इस प्रसंग में जो कारणों का विकल्प दिखलाया गया है, वह भी कुछ सिद्ध नहीं कर पाता | क्योंकि - " कार्य की यदि अवगति होती है तो उसके कारण की परीक्षा करना व्यर्थ है और यदि कार्य को अवगति नहीं होती, तत्र भी कारण की परीक्षा व्यर्थ है " । कार्य आकस्मिक रूप से न हो जाय, इसलिए कारण की कल्पना करनी पड़ती है और यहाँ पर fair कार्य की उत्पत्ति में दोष सहित इन्द्रियों का कारण माना गया है, जैसा कि ' प्रत्यभिज्ञा में संस्कार सहकृत इन्द्रियों को कारण माना जाता है । यद्यपि दुष्ट शालि व जादि अंकुर को नहीं पैदा करते, तो भी दावानल से जले दुष्ट वेत्र के बीज से कदली समूह निकल आता है और मक रोग से दुष्ट उदर की बह्नि ढेर सारे खाये गये अन्न को पचा डालती है, उसी तरह से दुष्ट इन्द्रियों से विपरीत ज्ञान पैदा हो जाता है । इसलिये दोष से कलुषित इन्द्रिय से सामने विद्यमान धर्मीगत त्रिकोणत्वादि विशेष धर्मो का परामर्श न होने से और सामान्य धर्म के साथ दूसरे पदार्थों में विद्यमान विशेष धर्मो का स्मरण हो जाने से विपरीत ज्ञान हो जाता है । इसलिए सम्यम् ज्ञान की अपेक्षा से यह दोष से दुष्ट कहलाता है, किन्तु अपने कार्य विपरीत ज्ञान का तो वह कारण ही है, दोषग्रस्त नहीं । अपि च, यह रजत नहीं है, यह परवर्ती बाधक ज्ञान पूर्व ज्ञान में विषयीमूत रजत निषेध का ज्ञान कराते हुए ही पैदा होता है कि जो मैंने देखा, वह रजत नहीं है । यह निषेध पूर्व प्रसक्त का किया गया है --- अननुभूत और अप्रसक्त का भी यदि निषेध होने लगे तो रजत के समान ही कनक का भी निषेध क्यों नहीं हो सकता? यह कहना कि अनुभव और स्मरण का विवेक बाधक ज्ञान से होता है, यह भी गलत है, क्योंकि ऐसा अनुभव नहीं होता । बाधक ज्ञान भी हो और यह अविविक्त का विवेक भी कर सके, ऐसा संभव नहीं है । स्वप्न में जिसका कभी अनुभव नहीं किया है, ऐसे अपने शिर के कट जाने जैसी बातों की स्मृति कैसे होती है? जन्मान्तर में इसका १. पहले भिन्न देश - काल में देखी हुई वस्तु के पुनः भिन्न देश - काल में देखे जाने को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं । जैसे किसी ने कुछ ad पहले feet fear को मथुरा में तत्ता । फिर उसी मित्र को कुछ वर्ष बाद काशी में देखने पर कहा कि यह वही मेरा मित्र है | दार्शनिक इसी को सत्ता - इन्ता-- अवगाही ज्ञान प्रत्यभिज्ञा कहते हैं । तत्ता अर्थात् पूर्वानुभूतता और इवन्ता ' अर्थात् एतत् देश - कालानुभव विषयता । यहाँ इतना समझ लेना चाहिये कि पूर्व के देश और काल तथा इस समय के देश और काल में भेद होने पर भी व्यक्ति में अभेद ही है । जैन दार्शनिक इसको स्वतन्त्र प्रभाग मानते हैं ।

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च व्याख्यायते । स्वप्ने स्वशिरश्छेदादे रत्यन्तमननुभूतस्य कथं स्मृतिः सम्भवति? जन्मान्तरे तदनुभूतमित्यपि निःसारम्, कदाचिदेव तत्स्मर्यते न सर्वदा विशेषहेतोरभावात् । असन्न प्रतिभातीति सत्यम्, अननुभूतमपि मयान्येनानुभविष्यते । परानु-भूतमपि सदिति वक्तुं शक्यते । परानुभूते तु स्मरणं न घटते । अत्र नावयोः समानयोगक्षेमत्वम् । किञ्च, स्वप्नस्मृतेः स्मृतित्वेनाग्रहणे केन रूपेण ग्रहणम्? रूपान्तरेण ग्रहणे विपरीतख्यातिः । सर्वात्मना त्वग्रहणे स्वप्नसुषुप्तयोरविशेषप्रसङ्गः । अनुभवप्रत्ययश्च स्वप्ने बेद्यते न स्मरणानुल्लेखमात्रमिति स्मृतिप्रमोषसमर्थनं युक्तम् । एवं द्विच-न्द्रादिप्रत्ययेष्वपि सुषिरभिन्ना नयनवृत्तिरेकत्वं माग्रहीत्, परन्तु भ्रान्तं द्वित्वानुभवं क्व प्रच्छादयामः । नतु चक्षुर्वृत्तिगतं द्वित्वं तद्गतत्वेन यत्तस्याग्रहणं तदेव भ्रमः । नैतदेवम्, नेत्रवृत्तेः सर्वत्र परोक्षत्वात् । ' किसेकचन्द्रबोवेऽपि वृत्त्येकत्वं प्रतीयते । इयं ह्यगृह्यमाणैव वक्षुवृत्तिः प्रकाशिका ॥ ' एवं चैकचन्द्रग्रहणेऽपि वृत्येकत्वाग्रहणादख्यातिरेव भवेत् । एवं तिक्तशर्करादिप्रत्य-येष्वपि शर्करायां तिबुद्धिरख्यातिवादे न शक्यसमर्थना । तदप्युक्तम्- ' मोहात्पित्तगतत्वेन तिक्तता चेन्न गृह्यते । मा ग्राहि शर्करा तु किं कृता तिकतामतिः ॥ पित्तं त्विन्द्रियगतमगृह्यमाणमपि तिमिरवद् भ्रमं जनयति । किञ्चैवमख्यात्यभ्युपगमेऽपि संशयो भवत्येव । ' रजतेऽनुभवः किं स्यादतः प्रमुषिता स्मृतिः । द्वैविध्यदर्शनादेव भवेत्तत्रापि संशयः ॥ ' तस्मादेवमख्यातिसमाश्रयणेन वेदस्य स्वतः प्रामाण्यं प्रसाध्य शून्यतादिनिरासो न कर्तुं शक्यः । निर्दग्ध-पित्रादावनर्थजा स्मृतिरभ्युपेयत इति तामेव दृष्टान्तीकृत्य सर्वत्रार्थशून्यत्वं साधयितुं शक्यम् । तस्मादन्यथाख्यातिरेव युज्यत । अनुभव किया है, यह कथन भी निःसार है, क्योंकि जन्मान्तर में अनुभूत वस्तु का कभी कदाचित् ही स्मरण होता है, सदा नहीं, क्योंकि इसका विशेष हेतु उपलब्ध नहीं होता । असत् वस्तु का भान नहीं होता, यह तो सही है, किन्तु जो वस्तु अननुभुत है, उसका तो argha में अथवा कोई अन्य व्यक्ति कर हो सकते हैं । परानुभूत वस्तु भी सत् हो सकती है, किन्तु परानुभूत वस्तु का स्मरण संभव नहीं । यहाँ आकर हमारे और आपके दृष्टिकोण में अन्तर पड़ जाता है । स्वप्न की स्मृति का यदि स्मृति के रूप में ग्रहण नहीं होगा तो फिर किस रूप में होगा? यदि किसी भिन्न रूप में ग्रहण होगा, तो यह तो विपरीतख्याति ही हुई । स्वप्न स्मृति का सर्वात्मना अग्रहण मानने पर स्वप्न और सुषुप्ति में कोई अन्तर नहीं रह जायगा । स्वप्न में स्मरण का अनुल्लेख मात्र हो नहीं रहता, किन्तु अनुभव की प्रतीति भी होती है । इस तरह से स्मृति के प्रमोष का किसी प्रकार समर्थन नहीं किया जा सकता । इसी तरह द्विचन्द्र की प्रतीति में भी दो नयन गोलकों में विभक्त हुई नयन की वृत्ति एकत्व का ग्रहण भले ही न करे, परन्तु यह दो चन्द्रमा वाला अनुभव कोरा भ्रम है, इसको कैसे छिपा सकते हैं? यह कहना कि fare यहाँ पर चक्षु की दो वृत्तियों के कारण है, वृत्तिगत द्वित्व को चन्द्रगत मान लेना ही भ्रम का कारण है, तो यह भी उचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि नेत्रवृत्ति तो सदा परोक्ष है । अतः वह भ्रम में कारण नहीं हो सकती । " क्या जहाँ एक चन्द्र का ज्ञान होता है, वहीं वृत्ति का एकत्व गृहीत होता है? वस्तुतः चक्षु की वृत्ति परोक्ष है, अतः बिना ही इस वृत्ति के ग्रहण के चक्षु - वृत्ति विषय को प्रकाशित करती है " । इस प्रकार एक चन्द्र ग्रहण स्थल में वृत्ति के एकत्व को गृहीत न होने के कारण भ्रान्ति हो माननी होगी । इसी तरह से तिक्त afat after at में भी शर्करा में तिक्तता की प्रतीति का समर्थन प्रख्यातिवाद से न हो सकेगा । जैसा कि कहा गया है- ' अज्ञानवश पित्तगत तिक्तता का अनुभव नहीं होता है तो न हो, किन्तु शर्करा में जो तिकता का अनुभव हो रहा है, उसका क्या कारण हूँ " । अतः यहीं मानना पड़ेगा कि अगृह्यमाण इन्द्रियगत पित्त ही यहां पर तिमिर के समान भ्रम का कारण है? अख्याति को मान लेने पर भी संशय होता है । " रजत का अनुभव होता है या यहाँ पर स्मृति का प्रमोष है? इस प्रकार की द्विविधा के कारण यहाँ पर भी संशय होता ही है " । अतः अख्याति का सहारा लेकर वेद की स्वतः प्रमाणता को सिद्ध कर शून्यता प्रभृति बौद्ध सिद्धान्तों का निरास नहीं किया जा सकता, क्योंकि मृत पिता के जला दिये जाने पर पिता आदि के न रहते हुए भी पिता आदि का स्मरण तो जैसे होता है, वैसे ही विश्व के सर्व विषयक ज्ञानों की विषय के fear हो सिद्धि की जा सकती है ।: बौद्ध मत का खण्डन कठिन हो जायगा । इसलिए अन्यथा ख्याति हो मानना उचित है । यहीं १. जिसे कामका रोग हो जाता है, उसे शक्कर कड़वी लगती है ।

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वेदार्थपारिजातः तत्र रजतमालम्बनम् । तदेव तत्र स्फुरति । न चैवमसत्ख्यातिरेवापतति देशान्तरादौ रजतस्य विद्यमानत्वात् । असत्ख्याती तु रजतमत्यन्तमसदेव - ' तत्रैकान्तासतोऽर्थस्य किं देशान्तरचिन्तया । किं कुर्मस्तादृशस्यैव वस्तुनः ख्यातिदर्शनात् ॥ यस्तु देशान्तरे ह्यर्थो नास्ति कालान्तरेऽपि वा । न तस्य ग्रहणं दृष्टं गगनेन्दीवरादिवत् ॥ ' इति । अयमेव द्वयोरसत्त्वयोविशेषो यदेकस्य ग्रहणं दृष्टं नापरस्य । यदुक्तम् - तत्रासतोऽर्थस्य कथं ज्ञानजनकत्वमजनकस्य कथं प्रतिभास:? इति तदपि समाहितमेव । सदृशपदार्थ -दर्शनोभूतस्मृत्युपस्थापितस्य रजतस्यात्र प्रतिभासनम् । न चास्योपस्थापनं पशोरिव रज्ज्वा संयम्य ढौकनम् अपि तु हृदये परिस्फुरतोऽर्थस्य बहिरबभासनम् । न चैतावतेयमख्यातिर सत्ख्यातिर्वा, विज्ञानाद् विच्छेदप्रतीतेः, अत्यन्तासदर्थप्रतिभासा-भावाच । तेन शुक्तिकैव प्रच्छादितस्वाकारा परिगृहीतपराकारा भाति । ननु कथं रजतज्ञाने शुक्तिका भातीति चेन्न, भावानवबोधात् । शुक्तिकेति वस्तुस्थितिः कथ्यते । पुरोऽवस्थितं धर्मिमात्रं भास्वररूपादिसादृश्योपजनितरजतविशेषस्मरणं प्रतिभाति यदेतत्पुरः किमपि वर्तते तद्रजतमित्यनुभवात् । वस्तुस्थित्या तु शुक्तिरेव त्रिकोणत्वादिविशेषग्रहणाभावाद निगूहितनिजाकारा रजतविशेषस्सरणाञ्च परिगृहीतरजताकारा | तदेतद्विषयेन्द्रियदोषप्रभवेषु शुक्तिकारजत्त- मृगतृष्णिका - गन्धर्वनगर - रज्जुसर्प - द्विचन्द्र शङ्खशर्करापीततिक्तावभासादिषु मनोदोष-मृलकेषु मिथ्याप्रत्ययेषु तु निरालम्बनेषु स्मृत्युल्लिखिताकारोऽवभासते । अन्यदालम्बनमन्यश्च प्रतिभातीति पक्षोऽप्यस्ति । न चात्र सन्निहितस्यालम्बनत्वम्, येन भूप्रदेशस्यापि तदापत्तिः । पर यह रजत बालम्बन है, उसी का यहाँ भान होता है । इस तरह से तो असत्ख्याति ही माननी पड़ेगी? नहीं, क्योंकि देशान्तर में रजत विद्यमान है । असत्ख्याति में तो रजत का re यन्त जमाव है । " ऐसी परिस्थिति में जिस वस्तु का नितान्त are है, उसके सम्बन्ध में देशान्तर की पिता करना व्यर्थ है कि वह frit दूसरे स्थान में होगी । यदि ऐसी वस्तु की ख्याति होती है तो उसका हम क्या कर सकते हैं? जो वस्तु देशान्तर अथवा कालान्तर में भी विद्यमान नहीं है, उसी का ग्रहण नहीं होता, जैसा कि आकाश के कमल का अनुभव नहीं होता " । इन दोनों प्रकार की असत्तानों में इतना हो अन्तर है कि एक का ग्रहण ( ज्ञान ) होता है और दूसरी का नहीं । यह जो कहा गया है कि असत् अर्थ ज्ञान का जनक कैसे हो सकता है? और जो जनक नहीं है, उसका प्रतिभास कैसे होगा? इसका भी समाधान कर दिया गया है कि यहाँ पर सहा पदार्थ के देखने से उत्पन्न स्मृति से उपस्थापित रजत का प्रतिभास होता है । यह उपस्थापन पशु को रस्सी से बांधकर ले जाने के समान न होकर हृदय में स्फुटित अर्थ को बाहर प्रकाशित कर देना है । केवल इतने से से यह अख्याति या असत्ख्याति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि उसकी प्रतीति विज्ञान से पृथक् ही होती है । यहाँ पर अत्यन्त असत् वस्तु का प्रतिभास भी तो नहीं होता इस प्रकार ऐसे स्थलों में शुक्तिका का अपना आकार छिप जाता है और दूसरे का आकार प्रतिभासित होने लगता है । रजत ज्ञान में शुक्तिका का भान कैसे हो सकता है? इस तरह का बिना पूरी बात समझे ही उठा दिया जाता है | शुक्ति तो वस्तुस्थिति का कथन है । ऐसे स्थलों में सामने अवस्थित धर्मी मात्र के चमकीलेपन के सादृश्य को देखकर रजतविशेष के रूप में स्मृति होने लगती है | यह सामने जो कुछ है, वह रजत है, ऐसा अनुभव वहाँ होता है । वास्तव में तो शुक्ति ही अपनी त्रिकोणत्व आदि farara का परिग्रह न हो पाने के कारण अपने आकार के छिप जाने से और इसी अवसर पर रजत विशेष की स्मृति के जाग उठने के कारण रजतरूप में गृहीत होने लगती है । विषय और इन्द्रियगत दोषों से उनन्त शुक्तिकारजत, मृगतृष्णिका, गन्धर्वनगर, रज्जुसर्प, द्विचन्द्र, पीतशंख, तिक्तशर्करा आदि आमासात्मक free ज्ञानों में इस प्रकार से मन के दोष के कारण निरालम्बन स्मृति आकारों की प्रतीति होती रहती है । एक पक्ष यह भी यह है - आलम्बन कछ दूसरा ही है और मालूम कुछ दूसरा ही होता है | यहाँ पर सन्निहित की बालम्बनता नहीं मानी जाती, जिससे कि भूप्रदेश की भी आलम्बनता की आपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता । आलम्बन की अजनकता भी I

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वैवार्थपारिजातः न वालम्बनस्याजनकत्वम्, येन चक्षुरादौ तत्प्रसक्तिः । किन्त्विदमित्यङ्गुल्या निर्दिश्यमानं कर्मतया यज्ज्ञानस्य जनकं तदा-लम्बनमित्युच्यमाने न दूषणमेव । tatusaarast fa ञ्चित्तिमिर रोमराजिरिव नयनधास्नोर्मध्य एवास्ते । तेन द्विधाकृतो नयनरश्मिद्वित्वेन चन्द्रमसं गृह्णाति । किञ्चित्तु विवस्वदन्तरान्तरा तिष्ठति । तेन विरलप्रसृता नयनरश्मयः सूक्ष्माः सूर्यांशुभिराहन्यमानाः केशकूर्चाकारा भवन्ति । तत्र तदेवालम्बनम्, अनुदितेऽस्तमिते सवितरि केशोण्डुकप्रत्ययानुपलम्भात् । गन्धर्वनगराकारे तु पाण्डुरविषो गृहाट्टालिकाद्याकारा जलदा एवालम्बनम् । स्मृतिप्रभोषाभ्युपगमेऽपि रजतानुभवसमर्थनमन्तरा न बुद्धिविश्राम्यति । तस्माद्विपरीतख्यातिरेव । विषयापहार एव बाधः । तत्रापि विषयस्य प्रतिभातत्वं न परिह्रियते किन्तु प्रतिभातस्यासत्त्वं ख्याप्यते, पूर्वा-वगतबाधकप्रत्ययोत्पादात् । यन्मया तदा रजतमिति गृहीतं न तद्रजतमिति, अन्यदेव तत् । एतेन स्वकालनियतत्वाद ज्ञानानां कथमुत्तरस्य ज्ञानस्य पूर्वज्ञानोत्पादकालावच्छिन्न तद्विषयाभावग्रहणसामर्थ्यमित्यपि समाहितं भवति, तथा प्रत्ययोत्पादात् । न भग्नघटवदिदानीं तन्नास्तिताऽनुभूयते, अपि तु तदैव तदसदिति प्रतीतिः । यथा च न वर्तमानैकनिष्ठा एव विषयप्रतीत-यस्तथा क्षणभङ्गनिरासे वक्ष्यामः । ' अथवा फलाहार एवं बाधः । हानादिबुद्धीनां प्रमाणफलत्वं भवत्येव । तदपहरणादपि प्रमाण बाधितं भवति । एकस्मिन् विषये विरुद्धाकारग्राहिणोर्ज्ञानयोर्वाध्यवाधकभावाभ्युपगमात् समानासमानविषयविकल्पोऽपि न युक्तः । चित्रादि-नहीं मानी जाती, जिससे कि चक्षुरादि में मालम्बनता की प्रसक्ति नहीं होती । किन्तु अंगुली से ' यह है ' इस तरह से निर्दिश्यमान जो वस्तु ज्ञान की कर्मतया जनक है, वह आलम्बन है, ऐसा कहने पर कोई दोष नहीं आवेगा । hotos क ज्ञान में भी कुछ अन्धकार सा केशसमूह के समान नयन गोलकों के बीच में प्रतीत होने लगता है | इससे नयन रश्मि दो भागों में बदकर दो चन्द्रमा देखने लगती है । कुछ अन्धकार विवर के समान चक्षु के बीच - बीच में रह जाता है । इससे सूर्य की किरणों से टकराकर केश के समूह के समान प्रतीत होने लगती है । अथवा जब सूर्यास्त हो जाता है, सब इस प्रकार की पाण्डुरछनि वाले गृह, अट्टालिका आदि का आकार लिये हुए बादल अनुभव का समर्थन किये बिना बुद्धिविश्राम नहीं लेती । इसलिये विपरीत नयन की सूक्ष्म रश्मियों ठीक से फैल नहीं पाती और वे hatue शान में यही आलम्बन | क्योंकि जय सूर्य का उदय नहीं हुआ है, प्रतीत नहीं होती । गन्धर्वनगर का आकार ग्रहण करने में तो ही आलम्बन होते हैं । इसे स्मृति प्रमोष माने तब भी रजत के ख्याति को ही मानना पड़ेगा । विषय के बहार को ही बाध कहते हैं । यहाँ पर भी विषय के प्रतिभान का परिहार नहीं किया जाता, किन्तु यह बताया जाता है कि जिसकी प्रतीति हो रही है, उसकी सत्ता नहीं है । क्योंकि यहाँ पर पूर्व में जो कुछ ज्ञात हुआ है, उसका बाधक प्रत्यय ( ज्ञान ) उत्पन्न हो जाता है कि जिसको मैंने पहले रजत के रूप में जाना था, वह रजत न होकर कुछ दूसरी ही वस्तु हैं । ऐसा मानने से इसका भी समाधान हो जाता है कि ज्ञानों को अपने - अपने काल में नियतता मानने पर उत्तरवर्ती ज्ञान की पूर्व ज्ञान के उत्पाद काल से अवछिप्त विषय के अभाव को ग्रहण करने की सामर्थ्य कहाँ से आवेगी, क्योंकि हमको इस तरह की प्रतीति होती है । फूट हुए घड़े के समान हमको अभो उसका अभाव नहीं प्रतीत होता, किन्तु प्रतोति यह होती हैं कि उसी समय वह प्रतीति गलत थी । विषय की प्रतीति केवल वर्तमान काल में ही नहीं होती, इस बात को हम विस्तार से क्षणभङ्ग का खण्डन करते समय बतायेंगे! अथवा फलाहार की ही बाध कह सकते हैं । हान, उपादान बादि बुद्धियाँ प्रमाण का फल होती हैं । उनके अपहरण से मी प्रमाण बाधित हो जाता है । एक ही विषय में दो विरुद्ध आकारों के ग्रहण करने वाले ज्ञानों में arsenares are की मानता के कारण समान और असमान विषयक विकल्प उचित नहीं माना जा सकता | चित्र प्रत्यय में पूर्वज्ञान का उपमर्दं नहीं होता, यतः बाध्यबाधकभाव नहीं बनता । जिसने पहले प्रतिष्ठा पाई है, ऐसा पूर्वज्ञान उत्तर ज्ञान का बाधक नहीं हो सकता, क्योंकि

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वेदार्थपारिजातः & # प्रत्यये तु पूर्वज्ञानोपमर्दाभावान्न बाध्यबाधकभावः । प्राप्तप्रतिष्ठमपि पूर्वज्ञानं न बाधकं विषयसहायत्वात् प्रमाणान्तरानुगृह्य-माणत्वात्रज्ञानस्यैव प्राबल्यात् । स चायं बाघप्रत्ययो विपरीतख्याती सङ्गच्छते । अत्रोपनिषदास्तु विषयस्यापरोक्षावभासहेतुत्वेन विषयमन्तरापरोक्षावभासानुपपत्त्या स्मर्यमाणस्य रजतस्य परोक्ष-देशकालावस्थायित्वेनात्र तदभावान्न तद्धेतुत्वं सम्भवति । परमार्थसतो वाध्यत्वानुपपत्त्या चानिर्वचनीयरजतस्यैव शुक्तिरजत-प्रतीतो विषयत्वम् । तत्र रजतं तदाकारवृत्तिश्चेत्युभयमप्यनिर्वचनीयम् । शुक्तीदमंशाकारवृत्यनावृतशुक्त्यवच्छिन्नचैतन्य-निष्ठायाः शुक्तित्वविषयिण्या अविद्यायाः संस्कारसादृश्यादिसध्रीचीनाया रजताकारेण परिणामः । वृत्त्यवच्छिन्नन्नैतन्यनिष्ठाया-स्तादृश्या अविद्याया रजतवृत्त्यात्मना परिणामः । नेदं रजतमिति वाधकज्ञानेन सकारणयोरुभयोर्निवृत्तिरेव बाधः । अत एव सविषयं रजतज्ञानं बाध्यते । तत्रेदं रजतमिति प्रतीतिः शुक्तित्वाज्ञानवशात् तदाश्रयशुक्त्यवछिन चैतन्यात्मना रजतमद-गाहते । तेनैव तस्य भ्रमत्वम् । तस्य नेदं रजतमिति रजतात्मताया इदमो रजतस्य बाधो भवति । बाध्यत्वं नाम शुक्तित्व-साक्षात्कारेण रजतकारणाविद्याया: स्वरूपतः समूलस्य रजतस्य वा स्वरूपहानिः । प्रतीतिदशायां सदित्यपरीक्षत्तया प्रतीयमानं नासत् । व्यवहारदशायामेव शुक्तित्वज्ञानवाध्यत्वान्न स्वरूपतः सदिति सदसद्विलक्षणम् । यदुक्तम्- नेदं रजतमिति प्रत्ययो निषेधत्येव रजतम्, न विद्यमानरजतस्यालौकिकत्वमवद्योतयत इति तन्न पूर्वोक्तयुक्त्याऽलौकिकत्वस्यार्थसिद्धत्वात् । यदुक्तम् -- ' अगृह्यमाणे तु रजताख्येऽन्यधर्मिणि कथं तद्धर्मस्वेन लौकिकत्वं गृह्यते? रजताभावग्रहणे तु नैष दोष:, भावतदभावयोर्धर्मधर्मिभावाभावात् । स्मर्यमाणप्रतियोग्यवच्छिन्नो हि अभावो गृह्यते । उत्तर ज्ञान का एक तो विषय सहायक है, दूसरे प्रमाणान्तर से भी उसका समर्थन होता है, अतः उत्तर ज्ञान ही यहाँ पर पूर्व ज्ञान को अपेक्षा प्रबल सिद्ध होता है । इस प्रकार यह बाध का ज्ञान विपरीत ख्याति में संगत हो सकता है । affair कहना है कि प्रत्यक्ष प्रतोति ( ज्ञान ) में विषय की विद्यमानता को कारण माना जाता है, अतः विषय के बिना प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं बन सकता । स्मर्यमाण रजत को तो परोक्ष देश और काल में अवस्थिति है, अतः यहाँ पर उसका अभाव होने से वह रजत के ज्ञान का कारण नहीं बन सकता | जो वस्तु परमार्थसत् हो, उसका बाध नहीं हो सकता, अतः अनिर्वचनीय रजत को ही शुक्ति में रजत प्रतीति का विषय मानना चाहिये । यहां रजत और रजताकार वृत्ति ये दोनों ही अनिर्वचनीय हैं । शुक्ति इदमंशाकार वृत्ति से अनावृत है, अत: शुक्ति से अवच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ शुक्तित्व को अपना विषय बनाने वाली aftar का संस्कार साह आदि के सहयोग से ' रजत के रूप में परिणाम हो जाता है और वृत्ति से अवच्छिन्न चैतन्यनिष्ट अज्ञान का रजताकार वृत्ति के रूप में परिणाम हो जाता है । यह रजत नहीं है, इस प्रकार के ज्ञान से अनिर्वचनीयता के कारण उत्पन्न हुई उक्त दोनों प्रकार की प्रतीतियों को निवृत्ति को ही बाघ कहते हैं । इसीलिये यहाँ पर विषय सहित रजत ज्ञान का बाध होता है | यहाँ पर ' इर्द रजतम् ' यह प्रतीति शुक्तित्व का ज्ञान न होने के कारण शुक्तित्व के बाश्रयभूत शुक्ति से भवच्छिन्न चैतन्य के रूप में रजत का ज्ञान करा देती हैं । इसीलिये यह ज्ञान भ्रमात्मक माना जाता है । ' यह रजत नहीं है इस प्रकार के ज्ञान से इर्द रूपेण गृहीत रजत का बाव हो जाता है । बाघ का अर्थ यह है कि शुक्तिव का प्रत्यक्ष हो जाने से रजन ज्ञान को पैदा करने वाले अज्ञान का नाश अथवा स्वरूपत: अज्ञान सहित रजत के स्वरूप का नाश हो जाना जिस समय ज्ञान हो रहा है, उस समय विद्यमान है, इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाले को असत् नहीं कहा जा सकता । व्यबहार दशा में हो शुक्ति का ज्ञान हो जाने पर उसी रजत का बाघ हो जाता है, अतः इसको ear: सत् भी नहीं कह सकते । फिर तो सत् और असत् दोनों से विलक्षण अनिर्वचनीय हो कहना पड़ेगा । यह कहना -- ' यह रजत नहीं है ' यह प्रत्यय ( ज्ञान ) रजत का निषेध करता है, विद्यमान रजत की बलौकिकता को नहीं बताता ", इसलिये गलत है कि अभी ऊपर बताई गई युक्ति से उसकी अलोकिकता सिद्ध हो चुकी हैं । पुनः यह शंका उठाना कि " रजत रूप अन्य धर्मी का बिना ग्रहण हुए उसके धर्म के रूप में अलौकिक रजत का ग्रहण कैसे होगा? रजत के अभाव के ग्रहण में यह दोष नहीं आता, afe are और अभाव का धर्म - धर्मी भाव नहीं होता । स्मयमाण प्रतियोगी के साथ ही अभाव का ग्रहण होता है । इसलिये यहाँ पर ' रजत नहीं है ' यही निषेध का अर्थ होगा, ' वह रजत अलीक है ' यह अर्थ किसी प्रकार नहीं हो सकता ", इसलिए गलत है १३

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६८ वेदार्थपारिजातः तस्मादत्र नास्त्येव रजतमित्येव निषेधार्थः, न पुनरलीकं तदस्ति ' इति । तन्न, वस्तुसत्तामन्तरेणापरोक्षप्रतीत्यसम्भवेन तदन्यथानुपपत्त्या तत्र रजतसत्वस्याभ्युपगन्तव्यत्वेन व्यवहार एवं शुक्तित्वसाक्षात्कारेण तद्वाधदर्शनाच्च तत्रानिर्वचनीयत्वपर्य-वसानेन दोषाभावात् । अत एव पारमार्थिकत्वेन रजतं नास्तीति निषेधस्वरूपं पर्यवस्यति, व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नप्रतिषेध-स्यापि सम्मतत्वात् । अत एव नाबाधितरजतज्ञानगम्यत्वं रजतलक्षणम्, प्रतिभासकाला बाध्यत्वे शुक्तिरजतादौ व्यभिचारः । freeread तु नाल्पज्ञस्य तद्ग्रहः । शेदोऽप्ययं व्यवहारे वाध्यत्वाबाध्यत्वाभ्यामेव । घटादिकं व्यवहारकाले न बाध्यते, शुक्तिरजतादिकं तु बाध्यते । ब्रह्मसाक्षात्कारयन्तच यस्य न बाधः स व्यवहारः । स्वप्नाङ्गनालिङ्गनकूटकार्षापणादीनां ब्रह्मज्ञानमन्तरापि प्रबोधादिना बाधो भवत्येव । यदुक्तम् -- यदि चेदमलौकिकम निर्वचनीयं रजतं तत्किमर्थं तत्र प्रवृत्तिः? लौकिकत्वेन गृहीत्वेति चेत्, सैवेयं तपस्विनी विपरीतख्यातिरायाता | स्यात्यन्तरवादिनां सुदुरमपि गत्वाऽन्यथावभासोऽवश्यमाश्रयणीयः । कल्प्यमानमिदमनिर्व-aati afrata या प्रतीयते, तथात्वे प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । अन्यस्यान्यथाभानविरहे प्रतीतिप्रवृत्तिवाधभ्रमत्वानामनुपपत्तेः । तथा चानिर्वचनीयं पारमार्थिकरजतात्मना प्रतीयत इति मन्तव्यम् । तदपि न युक्तम्, अन्यथाख्यात्या शुक्तिरजत प्रतीतिनिर्वाह तयैव सृद्घटादिप्रतीतिनिर्वाहसम्भवेन वटादिकार्योलत्तिस्वीकारस्यापि वैयर्थ्यापातात् । शुक्तिर्यथा रजतात्मना प्रतीयते, तथैव मृदेव घटाकारेण भासत इति तुल्यत्वात् । नहि शुक्तिव्यतिरेकेण रूप्य सव मृद्व्यति रेकेण घटोऽस्ति, कार्य-मिथ्यात्ववादिनस्तदिष्टत्वेऽपि कार्यसत्यत्ववादिनस्तदनित्यात् । न च मृदेव घटात्मना न भाति, किन्तु मृदि घटो जायत कि वस्तु की पत्ता के बिना अपरोक्ष व्रतोति नहीं हो सकती, इनको उपपत्ति के लिए यहाँ पर रजत की सत्ता माननी पड़ेगी, किन्तु व्यवहार दशा में ही शुक्ति का सार हो जाने पर उसका याव भी देखा जाता है, ऐसी परिस्थिति में उस रजत को अनिर्व-चनीय मान लेने पर ही इस दोष से छुटकारा लिए पकता है । इसलिये पारमार्थिक रूप में रत नहीं है, यही निषेध का रूप बनता है । व्यधिकरण धर्म से अवच्छिन प्रतिषेव भी शास्त्रसंत है । इसीलिये रजत का लक्षण ' अबाधित रजत ज्ञान से गृहीत होने वाला ' यह नहीं है, क्योंकि शुक्तिरजतादि ज्ञान में जब कि रक्त का प्रतिभास हो रहा है, यह लक्षण संगत नहीं होगा । यदि त्रिकाला बाध्यत्व लक्षण में जोड़ा जाय तो अल्पज्ञ को कैसे मालूम होगा कि यह त्रिकालाबाधित है । व्यवहार दशा में इनमें बाध्यत्व और अवध्यत्व के कारण से ही भेद है । घटादि का व्यवहारदशा में बाघ नहीं होता, हिन्दु शुक्तिरजतादि का बाध होता है । ब्रह्म के साक्षात्कार के बिना जिसका बाध नहीं होता, वह व्यवहार कहलाता है । स्वप्न में स्त्री का आलिन, खोटी मुद्रा आदि का, ब्रह्म ज्ञान के बिना ही, जाग जाने पर अथवा ठीक से मालूम हो जाने पर बाघ देखा जाता है । यह जो कहा गया है कि " यदि यह अलोकिक, अनिर्वचनीय रजत है तो उसके लिये प्रवृत्ति क्यों होती है? बलोकिक वस्तु ht लौकिक रूप में ग्रहण कर लेता है, अतः प्रवृत्ति होती है, ऐसा मान लेने पर तो आपको उस बेचारी विपरोत ख्याति की ही शरण में आना पड़ा । अन्य ख्यातियों के मानने वालों को भी आगे चलकर अन्यथा अवभास ( अन्य वस्तु का अन्य रूप से ज्ञान, अर्थात् शुक्ति का रजत के रूप में ज्ञान अबश्य मानना पड़ता है । जिस अनिर्वचनीय को आपने कल्पना की है, इसकी अनिर्वचनीय रूप में प्रतीति ( ज्ञान ) नहीं होती, क्योंकि ऐसा मानने पर प्रवृत्ति ही नहीं होगी । वस्तु दूसरी ही है और भान ( ज्ञान ) दूसरी ही वस्तु का ही रहा है, इसको माने बिना प्रतीति, प्रवृत्ति, बाध, भ्रम इनमें से किसी की भी उपपति आप नहीं कर सकते । इसलिये यही मानना पड़ेगा कि यहाँ पर अनिर्वचनीय रजत का पारमार्थिक रजत के रूप में भान होता है " । यह पूरा कथन अयुक्त है, क्योंकि ऐसा मानने पर तो अन्यथाख्याति से ही शुक्तिरजत प्रतीति का निर्वाह करने पर उसी प्रतीति से मृदुषट प्रतीति का भी निर्वाह हो सकता है, फलतः घटादि कार्य की उत्पत्ति मानना भी व्यर्थ ही है । शुक्ति का जैसे रजत रूप से भान होता है, उसी तरह से मिट्टी ही तो घट के रूप में मासित हो रही है । इनमें अन्तर कहा है? ये दोनों ही प्रतीतियों समान हैं । जैसे यहाँ पर शुक्ति के अतिरिक्त रजत की सत्ता नहीं है, उसी तरह से मिट्टी के अतिरिक्त घट की भी सत्ता नहीं है । कार्य को मिथ्या मानने वाले के मत में इस बात में कोई आपत्ति न होने पर भी कार्य को सत्य मानने वाले इसको कभी नहीं मान सकते । " मिट्टी ही घट के रूप में भासित नहीं होती, किन्तु मिट्टी में घट पैदा होता है, इस प्रकार इनमें अन्तर है ", यह कहना भो उचित नहीं है, क्योंकि हम इसी तरह से यह कह सकते हैं कि शुक्ति ही

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वेदार्थपारिजातः ६६ इति वैषम्यमिति वाच्यम्, तथा सति शुक्तिरेव रजतरूपेण न भासते, किन्तु तत्र रजतं जातमित्यपि तुल्यत्वात् । न च मृदि घटोत्पत्तौ दण्डवक्रसलिलकुलालादिकारणसामग्रीसत्त्वेन तदुपपत्तावपि रजतोत्पत्तिसामग्र्यभावान्न तदुत्पत्तिः सम्भवतीति वाच्यम्, तत्रापि रजतसंस्कारचाकचिक्याविद्यादिकारणसामग्रीसत्त्वात् । न च घटः सन्नित्येव प्रतीयत इति वाच्यम्, शुक्तिरजतस्यापि प्रतीतिसमये तथात्वानपायात् असतः प्रतोत्यनुपपत्तेः । न चानिर्वचनीयमित्येव प्रत्येतव्यम्, न तु सदिति वाच्यम्, प्रतीतिसमये तस्यानिर्वचनीयत्वाभावात् । नहि घटोऽपि स्वोत्पत्तेः प्राक् स्वनाशात् पश्चाच्चासन्नपि स्वकालेऽ-सन्निति प्रतीयते । यदुक्तम् — प्रतीतिकाले सत्त्वादन्यकालेऽसत्वाच्च सदिति असदिति च यन्निर्ववतुं शक्यते तच्छुक्तिरजतं नानिर्वच-नीयम्, घटवत् ' इति, तन्न, सतो बाधायोगादसतः प्रतीत्ययोगाच्च । प्रतीयमानस्य बाध्यमानस्य च निर्वचनीयत्वानपायात् । प्रतीतिकालेऽपि शुक्तिव्यतिरेकेण रजतं नास्त्येव यथा मृद्व्यतिरेकेण घटः । तथा च सदिति न वक्तुं शक्यते, नाप्यसदिति, प्रतीयमानत्वात् । तस्मात्तदुभयमपि निर्वक्तुमशक्यत्वाद् अनिर्वचनीयमेव । न च घटादिनिर्वचनीय एवेति वाच्यम्, सिद्धान्तरीत्या तस्यापि मिथ्यात्वेनानिर्वाच्यत्वात् । ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' ( छा. उ. ६ ११४ ) इति श्रुतेः । शुक्तिरजताद्रजतस्य वैलक्षण्याय व्यावहारिकसत्यत्वं हि रजते कल्पितम्, पारमार्थिकसत्यत्वं तूभयत्रापि नास्ति, इत्युभयं मिथ्यैव । रजत रूप से नहीं भासित होती, किन्तु शुक्ति में रजत उत्पन्न हो जाती है । यह कहना कि मिट्टी से घट की उत्पत्ति होने में दण्ड, चक्र, जल, कुम्हार आदि कारण सामग्री को अपेक्षा रहती है, मृतिका से घट का पैदा होना युक्तियुक्त माना जा सकता है, किन्तु ( शुक्ति से ) रजत की उत्पत्ति में तो कोई सामग्री है नहीं, तब उसे युक्तियुक्त कैसे माना जा सकता है? तो इसका उत्तर यही है कि वहाँ भी ( शुक्ति रजत ज्ञान में भी ) रजत का संस्कार, चाकचिक्य, अविद्या आदि कारण सामग्री विद्यमान है । इस कथन का भी कोई अर्थ नहीं है कि घट की सद्रूपेण प्रतीति होती है, क्योंकि शुक्तिरजत की भी प्रतीति की बेला में सद्रूपता हटती नहीं । अर्थात् उसका सद्रूप से ही ज्ञान होता है । क्योंकि असद्वस्तु ( खरगोश के सींग ) की प्रतीति हो ही नहीं सकती । इसको अनिर्वचनीय कहना चाहिए, सद् नहीं, ऐसा भी बाप नहीं कह सकते, क्योंकि प्रतीति ( ज्ञान के समय में वह अनिर्बंननीय नहीं है । यह रजत नहीं है, ऐसे निषेध के ज्ञान होने पर ही उसकी अनिर्वचनीयता का निश्चय होगा । घट भी अपनी उत्पत्ति से पहले और ग्रूपने नाश के बाद मसत् है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह वर्तमान काल में भी असत् रूप से प्रतीत हो । पुनः यह कहा गया है कि " प्रतीतिकाल में विद्यमान होने से और अन्यकाल में अविद्यमान होने से जो सलु और असत् रूप में देखा जा सकता है, वह शुक्ति - रजत ज्ञान घट के समान ही अनिर्वचनीय नहीं हो सकता " ( क्योंकि उसका निर्वचन इस रूप से किया जा सकता है ), यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि सत् वस्तु का बाघ नहीं होता और जो वस्तु असत् है, उसकी प्रतीति ( ज्ञान ) नहीं होती । जिसका ज्ञान भी हो और बाथ भी हो वह जनिर्वचनीय ही होता है । प्रतीतिकाल में भी शुक्ति से भिन्न रजत की उस प्रकार की सत्ता नहीं है, जैसी कि मिट्टी से पृथक घट की भी होती है । इसलिये इसको सत् महीं कह सकते | प्रतीत होती है, अतः इसको असत् भी नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार शुक्ति - रजत की दोनों ही तरह से निरुक्ति ( निर्वाचन, विश्लेषण, लक्षण ) नहीं बनती, फलतः अनिर्वचनीयता हो माननी पड़ेगी । शुक्तिरजत निर्वचनीय न हो, घटादि तो निर्वचनीय है, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सिद्धान्ततः घट के भी मिथ्या होने से वह भी अनिर्वाच्य ही है | छान्दोग्य श्रुति में बताया गया है कि " मृत्तिका ही सत्य है, घट, शराब, ( कसोरा ) उन ( घड़ा ) आदि नाम केवल वाणी से विकार है ", अर्थात् मुँह से बोलने मात्र के लिये हैं । अर्थात मृत्तिका के ये नाना प्रकार के विकार नाना नामों से कहे जाते हैं, अत: मृत्तिका हो सत्य है और सब उसके बिकार हैं । रिजत से reaf क रजत के te के लिए रजत में व्यावहारिक सत्ता कल्पित की जाती है । पारमार्थिक सत्ता तो दोनों ही जगह नहीं है, इसलिए ये दोनों ही रजत मिथ्या है ।. १. वस्तु मात्र के अनिर्वचनीय होने पर भी प्रमाणं स्वात्मनिश्चयात् ' के आधार से घट, पट आदि व्यावहारिक सत्यता से fretta बन जाते हैं ।

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१०० वेदार्थपारिजातः न च शुक्तौ रजतमुत्पद्यत इति मतेऽप्यन्यस्यान्यथाभानमवर्जनीयमिति, तन्मत उत्पन्न रजतस्यैव रजताकारेण भानस्, न तु शुक्तेरित्यन्यस्यान्यथाभानाभावात् । न च शुक्तायुत्पन्नमपरमार्थरजतं तत्तु परमार्थरजतरूपेण भातीति कृत्वाऽस्त्येवान्य-स्यान्यथाभानमिति वाच्यम्, परमार्था परमार्थयोस्तयोराकारभेदाभावात् आकारभेदे भ्रमोत्पत्तेरभावात् । न च तथापि परमार्थरजतमिवापरमार्थरजतं भातीति कुतो नान्यथाख्यातिरिति वाच्यम्, शुक्तिकायां परमार्थरजतसदृशं रजतमुत्पन्नं सत् परमार्थ रजतसदृशाकारेणैव भातीति तदप्रसङ्गात् । अत एव परमार्थरजतबुद्धया प्रवृत्त्युपपत्तिः । तस्याश्च बुद्धेरतस्मिंस्तद्-बुद्धित्वेन भ्रान्तित्वोपपत्तिः । न च शुक्तेरेव परमार्थरजतसदृशत्वात् तदेव परमार्थरजतसदृशाकारेण भातीति किमनिर्वचनीय-तत्कल्पनयेति वाच्यम्, नीलपृष्ठत्रि कोणत्वादिरूपरजतविसदृशाकारस्यापि तत्र सत्वात् । न च तदंशस्याभानात् सदृशाकारस्यैव भानाद् रजतसदृश एव शुक्त्यंशो रजताकारेण भातीति वाच्यम्, शुक्ति-रजतयोः सादृश्यस्य सत्त्वाद् अत्रैवमुच्यतां नाम, गगननीलान्धकारपिशाचभ्रमादिषु तदभावतैवं वक्तुं शक्यम् । तथा च गगनान्धकारादपरमार्थंनीलपिशाचादयः परमार्थनील पिशाचादिसदृशा उत्पन्ना इत्यभ्युपेयम् । तथा तादृश्येव व्यवस्थान्यत्रापि विज्ञेया, तेन परमार्थरजतसदृशमपरमार्थ रजतं शुक्तादुत्पन्नमेवेति नान्यस्यान्यथाभानम् । यद्वा शुक्ती दोषवशादुत्पन्नं सहजत-मित्येव भाति, न तु परमार्थरजतमिति, नाप्यपरमार्थरजतमिति, भ्रमसमये पुरुषस्य परमार्थापरमार्थविचाराभावात् । ततो रजतस्य रजतत्वेनैव ख्यातत्वान्नान्यथाख्यातिः । एतद्रजतबुद्धेर्भ्रान्तित्वं तु शुक्तिज्ञानबाध्यत्वादेव, न त्वतस्मिंस्तद्बुद्धित्वात्, रजत एव रजतबुद्धिरित्युक्तत्वात् । " शुक्ति में रजत उत्पन्न होती है, इस मत में भी तो अन्य वस्तु यह कहना तो इसलिए गलत है कि उस मत में उत्पन्न रजत का ही रजत के का अन्यथा भान यहाँ नहीं होता | शुक्ति में उत्पन्न रजत वास्तविक नहीं है, का अन्यथा भान अनिवार्य रूप से मानना ही पड़ेगा ' रूप में भाव होता है, सीप का नहीं, अतः अन्य वस्तु किन्तु यहाँ पर तो उसका परमार्थ रजत के रूप में भान होता है, इस तरह से अन्य वस्तु का अन्य भान है ही, यह कथन भी इसलिए गलत है कि परमार्थ और अपरमार्थ रजत में कोई आकार का भेद नहीं है, यदि आकार का भेद माना जाय तो भ्रम की उत्पत्ति हो नहीं होगी । इतने पर भी यह कहना कि " परमार्थ रजत की ही तरह यदि अपरमार्थं रजत की भी प्रतीति होती हैं, तो बन्यथा ख्याति क्यों न होगी ", इसलिए गलत है कि शुक्तिका में परमार्थ रजत के समान रजत उत्पन्न होकर परमार्थ रजत के रूप में ही प्रतीति होती है, इसलिए अन्यथाख्याति का कोई प्रसंग ही नहीं उठता । इसीलिए परमार्थ ( वास्तविक ) रजत की बुद्धि के कारण उसको उठाने की प्रवृत्ति होती है और यह बुद्धि, जो रजत नहीं है, उसमें रजत ( चांदी ) बुद्धि को उत्पन्न कराने के कारण, अन्तिमूलक मानी जाती है । परमार्थ रजत के सहरा होने से वह शुक्ति ही परमार्थ रजत के रूप में प्रतीत होती है. ऐसी स्थिति में अनिर्वचनीय की कल्पना की क्या आवश्यकता है? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि नीलपृष्ठ, निकोणत्व प्रभृति रजत के विसदृश आकार भी तो वहाँ वर्तमान हैं । " ऐसे स्थलों में नीलपृष्ठ, त्रिकोण आदि शुक्तिगत अंशों का भान नहीं होता, मतः रजत सहरा आकार का ही मान होने से शुक्ति का रजत सहा अंश हो रजत के आकार में प्रतीत होता है ", यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शुक्ति मोर रजत में सादृश्य होने से ऐसा आप भले ही कर ले, किन्तु आकाशवर्ती घने काले अन्धकार में जहां पिशाच का स्रम होता है, वहीं ऐसा सादृश्य न होने से आप उक्त बात नहीं कह सकते । अतः यह मानना पड़ेगा कि आकाशवर्ती अन्धकार से अलीक नीलपिशाच आदि ( राक्षस यादि ) को परमार्थ fof ] आदि के समान उत्पत्ति होती है । इसी तरह की व्यवस्था अन्यत्र भी माननी पड़ेगी । इस प्रकार परमार्थ रजत के स अपरमार्थ रजत शक्ति में उत्पन्न हुआ है. ऐसा मानने से अन्य का अन्यथा या नहीं होगा । अथवा शुक्ति में दोष के कारण उत्पन्न हुई रजत की सत्तामात्र का भान होता है यह रजत परमार्थ ( सत्य ) है या अपरमार्थ ( असत्य ), इसका नहीं, क्योंकि जब पुरुष भ्रम में रहता है, उस समय उसको परमार्थ ( सत्य ) और अपरमार्थ ( असत्य ) का विचार नहीं हो सकता । इसलिये रजत के रूप में ही भान होने से अन्यथाख्याति नहीं होगी । यह रजत बुद्धि भ्रान्त है, इसका ज्ञान शुक्ति के होने से रजत ज्ञान का बाघ होने से होता है, वस्तु में वस्तु के ज्ञान के कारण नहीं, क्योंकि यह बताया जा चुका है कि यहाँ पर रजत में ही रजत बुद्धि है ।