वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 131–140

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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वेदार्थपारिजातः १०१ वस्तुतस्तु अन्यस्यान्यथाभानं नामान्यरूपेण स्थितस्यान्यरूपेण भानम्, तच्च रूपभेदप्रयुक्तमेव न तु धर्मभेदप्रयुक्तम् । रूपं नाम स्वरूपं धर्मस्तु स्वभाव इति विवेकः । तथा च कूटरजतस्य सत्यरजतरूपेण भानमिव शुक्तिरजतस्यापि सत्यरजत-रूपेण भानं नान्यथाख्यातिः, रूपभेदाभावात् । अत एव नेदं सत्यरजतमिति शतवारमुपदिष्टमपि कूटरजतं सत्यरजतरूपं न परित्यजति । तेन यदेव सत्यरजतरूपं तदेव कूटरजतस्यापि । यदि रूपभेदाभावेऽपि धर्मभेदे सत्यन्यथाख्यातिरवर्जनीये-त्याग्रहस्तदा विशेषणगतंमेव तदन्यथाभानं न विशेष्यगतमिति कृत्वा विशेष्यरूपभाने नान्यथाख्यातिः । अत एव दुष्टपुरुषे शिष्ट-पुरुष इति ज्ञानं भ्रम इत्युक्ती पुरुषे पुरुषज्ञानं भ्रमो न भवति, किन्तु दुष्टे शिष्टज्ञानमेव भ्रमः । तस्मादपरमार्थरजतस्य परमार्थ-रजतात्मनाख्यातत्वेऽपि रजतमेव रजतात्मना ख्यातमिति कृत्वा नान्यथाख्यातिसिद्धिः । एतेनापरमार्थरजतबुद्धिविषयस्य शुक्त्युत्पन्नरजतस्य परमार्थ रजतबुद्धिविषयत्वेन भानमन्यथाभानमित्यपि परा-स्तम्, तत्रापि स्वभावभेदे सत्यपि स्वरूपभेदाभावात् । अपि चापरमार्थरजतं परमार्थरजतरूपेण भातीत्यस्य को वार्थः? किं पुरोगतपरमार्थरजतरूपेण तद् भाति, उत्तापणस्थपरमार्थरजतरूपेण भाति? नाद्यः, परमार्थरजतस्य पुरोगतत्वाभावात् । नान्त्य:, आपणस्थेन चक्षुषः सन्निकर्षाभावात् । न च दोषवशात् सन्निकर्षः सम्भवति, दोषशतादपि परोक्षस्य सन्निकर्षा -वास्तव में तो अन्य वस्तु के अन्य रूप से ज्ञान का मतलब है कि अन्य रूप से स्थित वस्तु का अन्य रूप से ज्ञान । यह ज्ञान रूप के भेद से ही होता है, धर्म के भेद से नहीं । रूप केवल वस्तु के स्वरूप को कहते हैं और धर्म तो उसका स्वभाव है, यही दोनों में अन्तर है | इस तरह से खोटी चाँदी की जैसे सत्य रजत के रूप में ज्ञान होता है, उसी तरह सीप में चांदी का ज्ञान भी सत्य रूप से ही होता है, अन्य किसी रूप से नहीं । इसको अन्यथा ख्याति नहीं कह सकते, क्योंकि रूप भेद यहाँ है ही नहीं । इसीलिये यह सत्य रजत नहीं है, इस तरह से सैंकड़ों बार समझाने पर भी कूटरजत सत्यरजत के स्वरूप को नहीं छोड़ती । इससे यही प्रतीत होता है कि कूट रजत और सत्य रजत का स्वरूप एक है । यदि स्वरूप भेद के न रहने पर भी धर्म के भेद के कारण अन्यथाख्याति को कोई रोक नहीं सकता ऐसा आपका बाग्रह है, तो वह अन्यथामान विशेषणगत ही हैं, विशेष्यगत नहीं । अतः विशेष्य के स्वरूप के भाव में अन्यथाख्याति नहीं होगी । इसीलिये ' दुष्ट पुरुष में शिष्ट पुरुष का ज्ञान भ्रम है. ऐसा कहने पर पुरुष में पुरुष का शान भ्रम नहीं होता, किन्तु दुष्ट में शिष्ट की प्रतीति ( ज्ञान ) ही भ्रम होगी । इसलिये अपरमार्थ ( अवास्तविक ) रजत का परमार्थ ( वास्तविक ) रजत के रूप में ज्ञान होने पर भी रजत ही रजत में स्वरूप में प्रसिद्ध हो रही है, इसलिये अन्यपास्यति की सिद्धि नहीं होगी । इस युति से यह कथन भी खण्डित हो जाता है कि परमार्थ रक्त बुद्धि विषयक शुक्ति में ही परमार्थ रजत के रूप में उत्पन्न रजत को विशेष बनाने वाले ज्ञान को अन्ययाख्याति ( वन्य में अन्य का ज्ञान मानना ही पड़ेगा, क्योंकि उन स्थानों में भी स्वभाव के मेद के रहने पर भी स्वरूप का भेद नहीं होता । दूसरी बात बाप यह बताइये कि अपरमार्थं रजत परमार्थं रजत के रूप में प्रतीत होता है, इसका क्या अर्थ है? क्या सामने विद्यमान परमार्थ रचत के रूप में वह प्रतीत होता है, अथवा दुकान में रक्खी वास्तविक चांदी के रूप में? पहला पक्ष इसलिये ठीक नहीं है कि परमार्थ रजत सामने विद्यमान नहीं है, दुसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि १. चाँदी का चाँदी के रूप में ही ज्ञान होता है । खीप का चाँदी के रूप में ज्ञान नहीं होता । यदि सीप का चाँदी के रूप में ज्ञान हो जाय तो वे क्यों दोड़ेगा? जन सीप और चाँदी के भेद का ज्ञान हो जायगा, तब तो सत्य ज्ञान हो हो जायगा । तत्र यसको देने नहीं दौड़ेगा, अतः यह मानना पड़ेगा कि तत्काल अज्ञान, चाकचिक्य आदि कारणों से उत्पन्न होने वाली बाजार की व्यावहारिक चाँदी से विलक्षण ( अनिर्वचनीय ) तत्काल उत्पन होने वाली चाँदी में हो चाँदी का ज्ञान होता है । सीप का चाँदी के रूप में ज्ञान नहीं होता । यतः याधशास्त्र के अनुसार अन्य वस्तु में अन्य वस्तु का ज्ञान ( अन्यथा-पति ) कम ज्ञाव से कारण नहीं मानी जा सकती । २. दुष्ट पुरुष में शिष्ट का जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ पुरुष तो पुरुष ही हैं, केवल उसमें दुष्ट पुरुष नहीं है, ऐसा ज्ञान न होकर यह शिष्ट पुरुष है, ऐसा ज्ञान होता है । इस ज्ञान में पुरुष का भेद नहीं है, किन्तु पुरुष के शिष्ट और दुष्ट इन दो विशेषणों में ही भेद का ज्ञान होता है । विशेष्य पुरुष तो वही है । उसमें केवल विशेषण शिष्ट और दुष्ट का ज्ञान है । शिष्ट पुरुष और दुष्ट पुरुष इन दोनों ज्ञानों में विशेष्य पुरुष है और विशेषण विष्ट तथा दुष्ट हैं ।

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१०२ वेदार्थपारिजातः सम्भवात् । यदि तु अपरमार्थरजतं परमार्थरजतमिव भातीत्युच्यते, तर्हि परमार्थरजतसादृश्यमपरमार्थरजतस्यास्त्येवेति कथ मन्यथाख्यातिसिद्धिः? न चैवं शुक्तिरेव रजतमिव भातीति वक्तव्यम्, शुक्तिबोधाभावात् । सति तु तद्बोधे न भ्रमः । न चैवं परमार्थपरमार्थभेदबोधोऽपि तदानीं नास्त्येवेत्यपरमार्थरजतं परमार्थरजतमिव भातीति प्रतीतिरपि न सम्भवतीति वाच्यम्, इष्टापत्तेः । सिद्धान्ते परमार्थरजतमिवापरमार्थरजतं भातीति नाभ्युपगम्यते, किन्तु भ्रमसमये शुक्तावुदितं रजतमेव ' इदं रजतम् ' इति भातीत्युच्यते, अतोऽत्र न तदाशङ्कनीयम् । एतेनेदं रजतमिति भ्रमस्थले शुक्ती रजतमिव भातीति वादः परास्त:, तथा सतीदं रजतसदृशमित्येव प्रतीतेर्भवि-तव्यत्वात् । यदुक्तम्-- शुक्तो रजतसादृश्यमस्त्येव दोषवशात्तदप्रतीतिः, तत इदं रजतमिति प्रतीतिः, दोषभावे त्विदं रजत-सदृशमित्येव प्रतीयेतेति तन्न, विकल्पासहत्वात् । तथाहि -- दोषवशात् सादृश्यस्याप्रतीतावपि शुक्तः प्रतीतिरस्ति न वा? आ भ्रमानुदयप्रसङ्गः, नहि बाधके शुक्तिज्ञाने रजतज्ञानसम्भवः । नान्त्यः, इदंपदस्य निर्विषयत्वापत्तेः । तस्मादिदंप्रयोग-विषयतया शुक्तावपूर्वं रजतमुत्पन्नमित्यभ्युपगन्तव्यम् । नवनिर्वचनीयेन रजतेन चक्षुः सन्निकर्षाभावात् कथमिदं रजतमिति प्रतीति:? न च सन्निकर्षः सम्भवति, प्रतीतेः प्राक् प्रातिभासिकस्य विषयस्यैवाभावात् विषयप्रत्यययोः समसमयत्वादिति चेन्न संस्कारादिसध्रीचीनाया अविद्याया एव रजताद्यर्थाध्यासाकारेण तज्ज्ञानाध्यासाकारेण परिणामाभ्युपगमेन भ्रमस्थले विषयेन्द्रियसन्निकर्षानपेक्षणात् । न चैवं चक्षुषो दुकान में रखी रजत से चक्षु का संनिकर्ष नहीं है । दोष के कारण संनिकर्ष हो जायगा, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि सैंकड़ों दोष मिल-कर भी अप्रत्यक्ष वस्तु से संनिकर्ष ( सम्बन्ध ) नहीं स्थापित कर सकते । आप यदि यह कहें कि अवास्तविक रजत का वास्तविक रजत की तरह मान होता है, तो परमार्थ रजत से समानता अपरमार्थ रजत की है ही, तो इस अवस्था में अन्यथाख्याति कैसे सिद्ध होगी है यह भी नहीं कह सकते कि शुक्ति का ही रजत की तरह भात होता है, क्योंकि वहाँ पर शुक्ति का ज्ञान होता ही नहीं । यदि सीप का ही ज्ञान हो जाय तो भ्रम ही कैसे होगा । इस तरह से तो वहाँ परमार्थ और अपरमार्थ के भेद का ज्ञान भी नहीं है तो फिर अपरमार्थं रजत का परमार्थ रजत की तरह ज्ञान होता है, इस प्रकार का ज्ञान भी कैसे बनेगा? इस प्रश्न का उत्तर हम इष्टापत्ति के रूप में देते हैं, अर्थात् यह आपत्ति हमको स्वीकार है । इस प्रकार का ज्ञान नहीं बनता इस आपत्ति को हम भी मान लेते हैं । हमारे मत में यह नहीं माना जाता कि परमार्थ रजत की भांति अपरमार्थं रजत का मान होता है, किन्तु भ्रम के समय शुक्ति में उत्पन्न हुआ रजत ही यह रजत है, इस रूप में प्रतीत होता है, यही हमारा कहना है, ( उसकी वास्तविकता अवास्तविकता का उस समय ज्ञान नहीं होता ), इसलिये यहाँ पर उक्त आशंका नहीं उठती । ऊपर की बात से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि यह रजत है ' इस भ्रम स्थल में शुक्ति का रजत की भांति ज्ञान होता है । ऐसा मानने पर यह रजत के साथ है, यही प्रतीति होनी चाहिये । कहा जाता है कि शुक्ति में रजत से समानता ferr ही है, दोष के कारण उसकी प्रतीति नहीं होती । इसलिये यह रजत है इस तरह की प्रतीति होती है । दोष के रहने पर तो यह रजत के सहश है ' ऐसा ही होगा, यह कथन भी गलत हैं, क्योंकि इस पक्ष में मो आगे दिये विकल्प का कोई उत्तर नहीं बनता । जैसे कि दोष के कारण साह की प्रतीति न होने पर भी शुक्ति की प्रतीति होती है या नहीं? प्रथम पक्ष में यदि शुक्ति की प्रतीति होती है तो भ्रम का उदय हो नहीं होगा, शुक्ति का ज्ञान रहते उसमें रजत का ज्ञान कैसे हो सकता है । दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा | क्योंकि उस अवस्था में ' इर्व ' पद का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । इसलिये यह मानता पड़ेगा कि ' ' पद का प्रयोग होने से उसके विषय के रूप में पूर्व ( दुकान की चाँद से विलक्षण तत्काल पैदा हुईं प्रातिभासिक सत्ता वाली ) रजत की उत्पत्ति हुई है । प्रश्न उठता है कि अनिर्वचनीय रजत से चक्षु का संनिकर्ष तो होता नहीं, फिर ' यह रजत है ' यह प्रतीति कैसे होती है । संनिकर्ष हो भी नहीं सकता, क्योंकि प्रतीति से पहले प्रातिभासिक विषय की सत्ता ही नहीं है और विषय तथा ज्ञान का समसामयिक ( एक समय में ) होना जरूरी है | इसका उत्तर यही दिया जा सकता है कि संस्कार आदि की सहायता से अविद्या ( सीप का अज्ञान ) ही रजत आदि विषयों के ( अध्य re के रूप में और उनके ज्ञानाध्यास के उप में परिणत हो जाती है, अत: e में fave के साथ इन्द्रिय के संति-

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वेदार्थपारिजातः अमसम्भवः । { सारे संसार को घट - पट आदि वस्तुओं का ज्ञान होता है वस्तुएँ ज्ञान में हो आरोपित हैं । १०३ अतः अन्य का अन्य के रूप में कारण ' यह रजत है यह ज्ञान भान मानते हैं । आत्मख्याति मानने रक्त का ही रजत के रूप में मान पर भी रक्त का ही रजत के रूप में २. ऐक इसलिये कहा कि उसमें स्वगत भेद नहीं है । वृक्ष का अपनी शाखा, पत्र, पुष्प आदि से भेव स्वगत भेद कहलाता है | ऐसा स्वगत भेद ब्रह्म में नहीं है । यह एक पद का तात्पर्य है । दूसरे पद ' एव ' का तात्पर्य यह है कि उसमें स्वजातीय ra ( जातिगत भेद ) भी नहीं है । आम के पेड़ का दाडिम ( अनार ) के पेड़ से भेद सजातीय भेद कहलाता है । यह भव भी वहाँ नहीं है । इसीलिये ' एक ' कहने के बाद भी ' एव ' और कहना पड़ा । उसका तात्पर्य इसमें है कि ब्रह्म में सजातीय भेद भी नहीं हैं, । अत एव ' एक ' कहने के बाद भी ' एव ' कहना व्यर्थ नहीं, सार्थक है । उसके आगे भी वेद मन्त्र में आये हुए तीसरे ' अद्वितीय ' पद का तात्पर्य यह है कि ब्रह्म में विजातीय भेद भी नहीं है । घड़े से कपड़े का भेद विजा-वैयर्थ्यम् पुरोवर्तिवस्तुसामान्यज्ञानार्थं तदावश्यकत्वात्, अन्यथा तादृग्भ्रमस्यैवासम्भवात् । अत एव नान्धस्येदं रजतमिति तदेवमनिर्वचनीयख्यातिवादे रजतस्येत्र रजतात्मनाभावात् नान्यथाभानस्, किन्तु शुक्त्यध्यस्तरजतविषयप्रत्यय-त्वादिदं रजतमिति प्रत्ययस्याध्यासत्वम् । सत्ख्यातिमतेऽपि सत एव रजतस्य रजताकारेण भानमिष्यते । आत्मख्यातिमतेऽपि आन्तरत्ववाह्यत्वप्रयुक्ते स्वभावभेदे सत्यपि रजतस्यैव रजतात्मना भानम् । असत्ख्यातिमते सत्त्वासत्त्वप्रयुक्तस्वभावभेदे सत्यपि रजतस्यैव रजतात्मना भानम् | अख्यातिमते तु स्मर्यमाणं रजतमेव भ्रमे विषयो भवति । ज्ञानमेवार्थस्वरूपेण भातीति विज्ञान-वादिनः । नन्वात्मख्यातिमते ज्ञानमेवार्थस्वरूपेण भ्रात्या पश्यन्तीति कथमन्यस्यान्यथाभानमपलप्यत इति चेन्न, आन्तरस्य रजतस्य रजताद्याकार: स्वाभाविक एव तस्य बाह्यत्वमेव भ्रान्तिसिद्धमिति नान्यथा भानमत्रापि । पाराशर्यमते तु वस्तुतो ब्रह्मैव भ्रान्त्या जगद्रूपेण भातीत्यस्य ब्रह्मज्ञानादुत्पनं जगदेव इदं जगदिति प्रतीतिविषयो भवतीत्येवार्थः । ज्ञान-कर्ष की अपेक्षा नहीं रहती । तब तो नेत्र की कोई आवश्यकता नहीं रह जायगी? यह बात गलत है, क्योंकि सामने विद्यमान वस्तु के सामान्यरूप सेग्रहण के लिये उसकी आवश्यकता है | यदि वस्तु का सामान्य रूप से ग्रहण नहीं होता तो इस तरह से तो भ्रम उत्पन्न हो नहीं होगा । इसीलिये अन्धे को ' यह रजत है ' तरह का भ्रम नहीं होता । इस तरह से अनिर्वचनीय ख्याति को सागने पर चाँदी का ही चाँदी के रूप में भान होता है, ज्ञानबाली अन्ययाख्याति नहीं मानी जा सकती, किन्तु शुफि में व्यस्त रजत को विषय बनाने के अध्यास माना जाता है । सख्याति को सामने वाले भी तत्स्वभाव car का ही र aar कार से वाले भी आन्तरता और बाह्यता प्रयुक्त ( # न्दर और बाहर के ) भाव के भेद के रहने पर भी मानते हैं । असत्ख्यातिवादी का कहना है कि सब वसा के कारण स्वभाव का भेद होने भान होता है | अख्यातिवादी के मत में तो मर्यमाण रजत हो भ्रम का विषय होता है | ज्ञान ही अर्थ के रूप में प्रतीत होता है, यह विज्ञानवादी ' योगाचार बौद्ध का कहना है । आत्मख्यातिवादी के मत में ज्ञान हो अर्थ के रूप में भ्रान्ति से दिखाई पड़ता है, इस परिस्थिति में अन्य वस्तु के अन्यथा मान का aert कैसे किया जा सकता है? इसका उत्तर यही है कि आन्तर रजत का रजतादि आकार स्वाभाविक ही है । उसकी बाह्य प्रतीति ही भ्रान्ति है । इस तरह से यहां पर भी अन्यथा भान नहीं बनता । बादरायण ( वेदव्यास ) के मत में तो वस्तुतः ब्रह्म ही भ्रान्ति से जगत् के रूप में प्रतीत होने लगता है । इस तरह से ब्रह्म में अज्ञानवश उत्पन्न हुआ जगत् ही ' यह जगत् है ' इस तरह से ज्ञान का विषय बन जाता है । ज्ञानस्वरूप ब्रह्म में अर्धस्वरूप जगत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती, अत: अज्ञान से ही उसकी उत्पत्ति माननी पड़ेगी । अन्यथा “ एकमेवाद्वितीयसु " " । बहु एक हो है, कोई दूसरा नहीं हैं ) इस श्रुति से विरोध हो जायगा । इस तरह से १. विज्ञानवादी योगाचार बौद्ध के उस में संसार के सभी पदार्थी ( शब्द के वाच्य वट - पट आदि गोल मटोल - छेद वाल समस्त जगत् की वस्तुओं ) का अपना कोई रूप है ही नहीं, केवल क्षणिक विज्ञान ही है । उस क्षणिक विज्ञान में ही । वस्तुओं का कोई अपना रूप है ही नहीं । सारे संसार की

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१०४ वेदार्थपारिजातः स्वरूपाद ब्रह्मणोऽर्थरूपस्य जगत उत्पत्त्यसम्भवादज्ञानादेव तदुदयो मन्तव्यः । अन्यथा ' एकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६ २१ ) इति श्रुतिविरोधः । न च तर्हि नास्त्येव जगदिति मन्तव्यम्, अविद्यादशायां प्रतीयमानस्यात्यन्तापलापासम्भवात् । न च सिद्धान्त-रीत्या जगतः सर्वथाऽसत्त्वमेवेति वाच्यम्, प्रबोधदशामधिकृत्यैव तथात्वात् । नवनिर्वचनीयरजतोत्पत्तेः कारणाभावात्तदनुपपत्तिः, न च तत्प्रतीतिस्तज्जन्मकारणम्, तस्यास्तद्विषयत्वेन तदुत्पत्तेः प्रागात्मलाभायोगात् । निर्विषया जाता प्रतीतिस्तदुत्पाद्य तदेव विषयीकरोतीत्यपि न सम्भवति, वृत्तेविरस्य व्यापारा-योगात् । न चेन्द्रियगतो दोषस्तत्कारणम्, तस्य पुरुषाश्रयत्वेनार्थंगतकार्योत्पादकत्वायोगात् । नापीन्द्रियाणि तेषां ज्ञानकारण-स्वात् । नापि दुष्टानीन्द्रियाणि तेषामपि स्वकार्ये ज्ञान एव विशेषकरत्वमिति चेदत्रोच्यते-- इदं रजतमिति प्रतीत्या प्रतीति-समसमयस्य रजतस्य सिद्धिरेव न तुत्पत्तिः । न ह्यप्रतीतं रजतमस्ति तस्य प्रतिभासमात्रशरीरत्वात् । यद्यपि सत्य रजतमपि तथाभूतमेव, तथापि लोकानुभवसिद्धं स्थिरत्वमुपेत्य शुक्तिरजतस्य तथात्वमुच्यते । कारणं तु तस्याऽविधैव । काचकामलादि-दुषितलोचनस्य पुरोवर्तिद्रव्यसंयोगादिदमाकारा चाकचिक्याकारा च काचिदन्तःकरणवृत्तिरुदेति । तस्यां वृत्तौ इदमवच्छिन्न-तो यही मान लिया जाय कि जगत् है ही नहीं, सो ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि अज्ञान की अवस्था में प्रतीत हो रही वस्तु का सर्वथा निषेध नहीं किया जा सकता | सिद्धान्त में जगत् का सर्वथा अभाव है ही, फिर निषेध क्यों नहीं किया जा सकता? इसका उत्तर यह है कि ज्ञान को अवस्था में ही वेदान्ती के सत से जैसे सोप का ज्ञान होने पर ही रजत ज्ञान मिथ्या है, सीप के ज्ञान के पहले तो वह सच्चा ही है, ऐसे ही ब्रह्मज्ञान की अवस्था में हो जगत् मिथ्या है, उससे पहले तो रजतज्ञान की तरह वह भी सत्य ही है । प्रश्न उठता है कि अनिर्वचनीय ( व्यावहारिक दुकान में पड़ी चांदी से विलक्षण, ज्ञान होते समय जो सत्य सी लगती है और सीप का ज्ञान होने के बाद उसका बाध होता है, ऐसी चाँदी का ज्ञान ) रजत की उत्पत्ति का कोई कारण नहीं है तो वह उत्पन्न ही कैसे हो सकती है? उसकी प्रतीति को ही उसकी उत्पत्ति में कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रतीति तो रजत विषयक ही है, अतः जब तक रजत उत्पन्न नहीं हो जाती, तब तक उस ज्ञान का स्वरूप हो क्या बनेगा? ज्ञान का पहले कोई विषय नहीं रहता, बाद में उत्पन्न होकर वह उसी विषय का ज्ञान करेगी तो, यह भी संभव नहीं है, क्योंकि एक ही वृत्ति रुक रुक कर अनेक काम नहीं करती । इन्द्रियगत दोष को भी उसमें कारण नहीं मान सकते, क्योंकि पुरुषाश्रित दोष अर्थगत कार्य को उत्पन्न करने में असमर्थ है । इन्द्र भी इसमें कारण नहीं हो सकती, क्योंकि वे तो ज्ञान की कारण होती हैं । दुष्ट इन्द्रियाँ भी यहां कारण नहीं होंगी, क्योकि नहीं पैदा कर सकती । इसका समाधान भी अपने कार्य ज्ञान में ही किसी विशेषता का आधान कर सकती है, किसी नई चीज को यह है कि ' यह रजत है ' इस ज्ञान से उसी समय उत्पन्न होने वाले रजत की सिद्धि तो हो सकती है, किन्तु उत्पत्ति नहीं । बिना प्रतीति के रजत की स्थिति नहीं रहेगी, क्योंकि प्रतिमास ( ज्ञान ) ही उसका स्वरूप ( शरीर ) है । यद्यपि सत्य रजत की भी ऐसी ही स्थिति है, तो भी लोकानुभव से सिद्ध स्थिरता को मानकर शुक्तिरजत की वैसी ही स्थिति मानी जाती है । इसका कारण अविद्या ही हैं 1 | htaar मलादि रोगों से दूषित नेत्र वाले व्यक्ति को सामने विद्यमान वस्तु को देखने पर यह कोई चमकीली वस्तु है, इस तरह की अन्तःकरण की वृत्ति रजत आकारवाली पैदा होती है । इस वृत्ति में ' इदम् ' से वच्छिन्न चैतन्य का प्र ffer गरता f है । यह वृत्ति जब बाहर निकलती है, तब ' इम् " से अवच्छिन्न चैतन्य और वृत्ति से अवच्छिन्न प्रमातृ चैतन्य एक हो जाते हैं । अर्थात् घटावच्छिन तीय भेद कहा जाता है । ऐसा विजातीय भेद भी ब्रह्म में नहीं है । इसीलिये ' एक ' के बाद ' एव ' कहने पर भी ' अद्वितीय ' पद की सार्थकता है | मन्त्र का एक भी पद व्यर्थ नहीं है, क्योंकि तीन पदों से तीन प्रकार के भेद का अभाव हमें बताया गया है । १. घट रूप विषयावधि चैतन्य प्रमेय चैतन्य है । प्रमा ( ज्ञान ) के विषय को प्रमेय चैतन्य कहते हैं । ज्ञान का विषय घट है । इसलिये घटावचिछन्न चैतन्य हो प्रमेय चैतन्य है । अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रमातृ चैतन्य है । वही ज्ञान का कर्ता है | ara के कर्ता को ही प्रमाता कहते हैं । अतः अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य हो प्रभाता है । अन्तःकरण की वृति से अव-छिन्न चैतन्य प्रमाण चैतन्य है । प्रमा ( ज्ञान ) के साधन को प्रमाण कहते हैं । ज्ञान का साधन अन्तःकरण की वृति हो

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वैवार्थपारिजातः १०५ चैतन्यं प्रतिबिम्बते । वृत्तेश्व बहिर्निर्गमनेन इदमवच्छिन्नचैतन्यं वृत्त्यवच्छिन्नप्रमातृचैतन्यं चाभिन्नं भवति । ततश्च प्रमातृ-चैतन्याभिन्नविषयचैतन्यनिष्ठा शुक्त्याकाराविद्या चाकचिक्यादिसादृश्यसन्दर्शनसमुद्बोधित रजतसंस्कारसध्रीचीना काचकाम-लादिदोषसमवहिता रजतरूपार्थाकारेण रजतज्ञानाभासाकारेण च परिणमते । यदुक्तम्- - अनादिभावरूपाज्ञानस्य स्वरूपानादित्वात् तत्कार्यमपि प्रागेव स्यादिति, तन्न, तुलाज्ञानस्यैव तत्कारण-त्वात् । यदुक्तम् —– अपूर्वमनिर्वचनीयमिदं वस्तु कथं रजतशब्दबुद्धिभ्यां विषयीक्रियते रजतसादृश्यादिति चेन्न तर्हि तत्सदृश-मित्येव प्रतीतिशब्दस्याताम् । रजतादियोगाचेत्, सा किं परमार्थभूता अपरमार्थभूता वा? आद्ये तस्या अपरमार्थान्वया-योगः, द्वितीये परमार्थान्वयायोगः । अपरमार्थेन परमार्थबुद्धिशब्दयोर्निर्वाहकत्वायोगश्चेति । तदपि न, शुक्तौ हि अनिर्वचनीयं रजतमेव जातम्, न घटादीति कृत्वा तस्य जातस्य रजतशब्दबुद्धिभ्यामेव विषयीकृतत्वम् । न च रजतस्य जातत्वे कथमनि-वहाँ है ही, घटाकार अन्तःकरण की वृसि के साथ वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य भो यहाँ पहुँच जाता है । वृति के साथ ही मन्तःकरण के भी वहाँ ( घटस्थल में ही ) पहुँच जाने के कारण दोनों चैतन्य एक हो जाते हैं । चैतन्य के विना अन्तःकरण, वृत्ति और विषय, इन तीनों की जड़ता के कारण ज्ञान करा हो नहीं सकते | अतः वेतन का प्रतिबिम्ब मानना मत्यावश्यक है । यह वेदान्ती का व्यावहारिक मत अत्यन्त सत्य है । इसके बाद प्रभातृ चैतन्य से अभिन्न विषय चैतन्य में स्थित शुक्ति के नाकार की अविद्या, ( अर्थात् वृत्ति के द्वारा अन्त: करण से भि रजतावच्छिन चैतन्य में रहने वाला जो सीप का अज्ञान ) जाकचिक्य ( चमचमाहट ) आदि सादृश्य को देखकर for हुए रजत के संस्कार के साथ होकर काचकालादि दोषों के कारण रजतरूप अर्थ के बाकार में मौर रजतज्ञानामास बाकार में परिणत हो जाती है । यह कहा गया है कि अनादि भावरूप अज्ञान स्वरूपतः अनादि है, अतः इसका कार्य भी पहले से ही होना चाहिये, यह उक्ति इसलिए गलत है कि तुलाज्ञान ' ही इसका कारण है, मुलाज्ञान नहीं । पुनः कहा गया है कि " अपूर्व और अतिनीय रूप में उत्पन्न होने वाली यह वस्तु रजत शन्द और रजत ज्ञान का विषय कैसे बन जायगी? रजत के शाहश्य के कारण ऐसा होता है, यदि आप यह कहें तो फिर ' रजत सहश यह है ' ऐसी ही प्रतीति और शब्द व्यवहार होने चाहिये । रजत आदि जाति के योग से भी ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ पर यह न उठ खड़ा होता है कि वह जाति परमार्थ ( सत्य ) हैं या अपरमार्थ ( असत्य )? यदि यह सत्य हैं तो इसका मिथ्या से सम्बन्ध कैसे होगा? यदि मिथ्या है तो उसका सद्रूप ज्ञान के साथ कैसे सम्बन्ध होगा? अपरमार्थ वस्तु परमार्थ बुद्धि और शब्द का निर्वाहक भी नहीं हो सकता ", यह पूरा कथन भी गलत ही है, क्योंकि शुक्ति में अनिर्वचनीय रजत ही उत्पन्न होती है, घटादि नहीं । इस परिस्थिति में उत्पन्न हुई उस रजत का रजत शब्द और ज्ञान से ही विषय - विषयीभाव सम्बन्ध बनता है । र्थात् १४ * है । अन्त: करण की घट आदि आकार वाली वृत्तियाँ हो हैं । इसलिये नृत्य अर्थात् वृत्ति जिसकी उपाधि है, ऐसा चैतन्य हो है । प्रभाता से अवच्छिन्न ( प्रमात्र वशि ) प्रमाण से अवचित्र और प्रमेय से अवछिन्न यहाँ प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय को चैतन्य की उपाधि समझना चाहिये, विशेषण नहीं । विशेषण और उपाधि में यह भेद है कि विशेषण सदा साथ रहता है, जैसे नील घट में नील विशेषण घट के साथ ही रहता है । किन्तु उपाधि सदा साथ न रहने पर भी विशेष्य का अन्य से भेद बता देती है. जैसे लाल स्फटिक, यहाँ ' लाल ' स्फटिक की उपाधि है, विशेषण नहीं, क्योंकि वह घड़े में भीलिमा की तरह सदा साथ तो नहीं रहती, किन्तु मोलभित्र बड़े से तो घड़े का भेद ' नील ' विशेषण बताता है, ऐसे लाल जरा पुष्प सफेद जपा पुष्प से बाल जया पुष्पं का भेद तो बता देती है, किन्तु नी घड़े की तरह लाल जप पुष्प आदि उपाधि सदा साथ नहीं रहती | जब तक रहती है, तभी तक स्फटिक में लाल रूप भेद का ज्ञान कराती है । यह विशेषण से इसको विलक्षणता है । उपलक्षण इन दोनों से भिन्न है । विशेषण और उपाधि तो वर्तमान काल में ही अन्य वस्तु से भेद का ज्ञान करा सकती हैं, किन्तु उप-लक्षण से वर्तमान न होने पर भी अन्य से भेद का ज्ञान करा देता है । जैसे कौए वाले घर का ज्ञान कौए के उड़ जाने पर भी बुद्धिमान पुरुष को हो जाता है । विशेषण नील और उपाधि जमा पुष्प आदि लाल वस्तु दोनों रहने पर ही अन्य से भेद का ज्ञान कराती है, किन्तु उपलक्षण अविद्यमान रहने पर भी भेद का ज्ञान करा देता है । १. अनादि भाव रूपा अविद्या समस्त संसार को कारण जो अविद्या, अर्थात् ब्रह्मविषयक अज्ञान, उसे मूल अविद्या कहते हैं और उससे उत्पन्न होने वाले जो संसार के भिन्न - भिन्न विषयों के अज्ञान, उन्हें सुलाविद्या कहते हैं ।

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१०६ वदार्थपारिजात: वचनीयत्वमिति वाच्यम् जातस्य रजतस्यैवानिर्वचनीयत्वात् । न चानिर्वाच्यस्य कथं रजतशब्दवाच्यत्वम्, रजतशब्दवाच्यत्वेऽपि सदसद्विलक्षणत्वेनानिर्वचनीयत्वेनानिर्वचनीयत्वोपपत्तेः । न च तद्रजतमिति कुतो ज्ञायते I रजतस्यैवानुभूयमानत्वात् । न च तत्र कथं रजतबुद्धिजतिति वाच्यम्, तथा घटे घटबुद्धिस्तद्वत् । न च घटे घटत्वजातिपदवाच्योऽनुगताकारः कम्बुग्रीवादि-लक्षणोऽस्तीति वाच्यम्, रजतेऽपि चाक चिक्याद्यनुगताकारोऽस्त्येव । न चैवं तत्रापि परमार्थपरमार्थरूपपूर्वोक्तविकल्पप्रसरः, अपरमार्थत्वाङ्गीकारेण दोषायोगात् । न च तस्याः परमार्थायोग इति वाच्यम्, इष्टापत्तेः । वस्तुतस्तु सर्वत्रानुगतः कचिदाकारो नास्त्येव, प्रतिघटमाकारभेदात् । अस्मिन् घंटे य आकारः स न घटान्तरे, किन्तु ततोऽन्य एव । तद्धटनिष्ठाकारस्य तद्भिन्नघटनिष्ठत्वायोगात् । एवञ्च सति शुक्तिरजतनिष्ठ आकार: शुक्तिरजतवन्मिथ्यै-वेति न तस्य परमार्थान्वययोगः । परमार्थरजतनिष्ठाकारस्य वा न शुक्तिरजतान्वययोगः, शुक्तिरजतनिष्ठाकारस्य वा न शुक्ति-रजतान्तरान्वययोग इति नानुपपत्तिः । जात्यभ्युपगमेऽपि शुक्तिरजतजातिरपरमार्थैव शुक्तिरजतान्वययोगिन्येव । परमार्थ -रजतान्वयवती तु परमार्थ जातिरेव ( व्यावहारिकाभिप्रायेणैवात्र परमार्थशब्दप्रयोगः ) । न च तर्हि कथमपरमार्थे रजते परमार्थरजतबुद्धिशब्दयोनिर्वाह इति वाच्यम्, भ्रान्त्या निर्वाहसम्भवात् । अथवा शुक्त्युत्यन्ने रजतेऽपि शुक्तिगतः पारमार्थ्यांशः प्रतिभासते । यदुक्तम् -- अपरमार्थभूतजातेनं परमार्थशब्दबुद्धिनिर्वाहकत्वमिति तन्न जातेरपारमा सति तद्विषयबुद्धिशब्दयो-रप्यपारमार्थ्यमेवेति कृत्वाऽपरमार्थभूतजाते रपरमार्थभूत बुद्धिशब्दनिर्वाहकत्वं भवत्येव । न च बुद्धिशब्दयोर्वाधिकादर्शनात् वह रजत शब्द से ही कहा जाता है और रजत ज्ञान का ही विषय भी बनता है । रजत यदि उत्पन्न हुई है तो वह अनिर्वचनीय कैसे होगी? इसका उत्तर यही है कि रजत निर्वतीय रूप में हो उत्पन्न होती है | रजत जब अनिर्वाच्य है तो उसमें रजतशब्दवाच्यता भी कैसे होगी? इस तरह से होगी कि यद्यपि वह रजतन्त्रवाच्य है, तो भी सत् और असत् से विलक्षण होने से अनिर्वचनीय भी है । तब उसका रजत के रूप में ज्ञान कैसे होता है? ऐसे होता है कि वह रजत के रूप में हो अनुभव का विषय बनती है । उसमें रजत बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई? जैसे घट में घटखि उत्पन्न होती है, उसी तरह से रजत में भी रजतबुद्धि उत्पन्न होती है । घट में जैसे घटत्वजातिपदवाच्य अनुगत आकार वाला कम्बुग्रीवादि लक्षण विद्यमान है, उसी तरह से चाकचिवयादि लक्षण अनुगताकार यहाँ पर भी विद्यमान है । तब तो यहाँ पर भी ऊपर जाति के विषय में आये गये विकल्प की प्रवृत्ति होगी? नहीं, यहाँ उक्त विकल्प का अवसर इसलिये नहीं होगा कि यहाँ पर अनिर्वतीय रजत को अपरमार्थ माना है । तब तो उसका परमार्थ से योग कैसे होगा? उत्तर में इस आपसि को हम स्वीकार करते हैं, अर्थात् अनिर्वचनीय रजत का परमार्थ से योग न होना तो हमारे मत में मान्य ही है । वास्तव में सर्वत्र अनुगत आकार भी हमको मान्य नहीं है, क्योंकि प्रत्येक घट में आकार का भेद विद्यमान ही है । एक घट में जो आकार है, वह दूसरे घट में नहीं है, किन्तु उससे भिन्न हो है । एक घट में जो आकार रहता है, वह दूसरे घट में कैसे रह सकता है? इस परिस्थिति में शुक्तिरजत में विद्यमान आकार भी शुक्ति में प्रतीत हो रही रजत के समान ही मिथ्या है, अतः उसका परमार्थ से अन्य होगा ही नहीं: परमार्थ रजतनिष्ठ आकार का शुक्तिरजतनिष्ठ आकार से अथवा एक शुक्तिरजतनिष्ठ आकार का दूसरे शुक्तिरजतनिष्ठ आकार से भी कोई अन्य ( सम्बन्ध ) नहीं होगा, अतः यहाँ पर कोई अनुपपत्ति नहीं है । जाति को यदि स्वीकार कर भी लिया जाय, तो भी शुक्तिरजतनिष्ठ जाति अपारमार्थिक ही मानी जायगी और उसका केवल शुक्ति में ज्ञात हो रही रजत से हो सम्बन्ध होगा । परमार्थ रजत से संयुक्त जाति भी परमार्थ मानी जायगी ( यहाँ पर परमार्थ पद का प्रयोग व्यावहारिक सत्ता में किया गया है ) । तब अपरमार्थं रजत में परमार्थ रजत शब्द और बुद्धि का fre से सम्भव होगा? भ्रान्ति के द्वारा यह सब कुछ संभव हो सकेगा | अथवा शुक्ति में उत्पन्न हुए रजत में भी शुक्तिगत पारमार्थिक अंश प्रतीत हो रहा है, ऐसा माना जा सकता है । यदि कहो कि परमार्थभूत जाति परमार्थ शब्द और परमार्थ बुद्धि की नियामिका नहीं मानी जा सकती, सो गलत है, क्योंकि जाति के अपरमायें होने पर तद्विषयक बुद्धि और शब्द भी अपारमार्थिक ही माने जायेंगे । ऐसी अवस्था में अपरमार्थ जाति अपर-मार्थ शब्द और बुद्धि की नियामिका क्यों न हो जायगी? यह कहना है कि बुद्धि और शब्द का बाध नहीं होता, अतः इनको अपर-

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वेदार्थपारिजातः १०७ परमार्थ्यमेवेति वाच्यम्, नेदं रजतमिति ज्ञानेन शुक्तिरजतस्येव तद्विषयक बुद्धिशब्दयोरपि बाधितत्वात् । नहि बुद्धिमात्र परमार्थम्, किन्तु सत्यवस्तुविषयैव बुद्धिः परमार्था, असत्यवस्तुविषया तु साऽपरमार्थैव, अन्यथा भ्रमप्रमयोः साङ्कर्यप्रसङ्गात् । न च विषयबाधादेव भ्रमाननुवृत्तिः, निर्विषयत्वादेव भ्रमस्यापि बाधात् । तस्माद्वजतवत्तद्बुद्धिशब्दावप्यपरमार्थावेव । रजतं च दोषवशादुत्पन्नमित्युक्तमेव । चित्तु यथार्थ सर्वविज्ञानमित्युक्त्वा सर्वस्य सर्वात्मत्वात् त्रिवृत्करणश्रवणाञ्च-समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयाः । महदाद्या विशेषान्ता ह्यण्डमित्यादिना ततः ॥ श्रयात्मकत्वात्तु भूयस्त्वादिति तेनाभिधाभिदा । सोमाभावे पूतिकाया ग्रहणं श्रुतिचोदितम् ॥

सोमावयवसद्भावादिति न्यायविदो विदुः । रूप्यादिसदृशश्चायं शुक्त्यादिरुपलभ्यते ॥

अतस्तस्यात्र सद्भावः प्रतीतेरिति निश्चितः । कदाचिचक्षुरादेस्तु दोषाच्छुक्त्यंशवजितः ॥ रजतांशी गृहीतोऽत्र रजतार्थी प्रवर्तते । दोषहानौ तु शक्त्यंशे गृहीते तन्निवर्तते ॥ अतो यत्रार्थरूप्यस्य विज्ञानं शुक्तिकादिषु । बाध्यबाधकभावस्तु भूयस्त्वेनोपपद्यते ॥ इति । 1 तन्न, शुक्तौ रजतावयवानां सत्त्वे दाहादौ तदुपलम्भनसङ्गात् । यद्यपि शुक्तेस्त्रिवृत्कृतभूतत्रयकार्यत्वात् तत्र भूत-arrasar: सन्ति, तथापि न तावतैव सर्वस्य सर्वात्मत्वम्, अत एव न तस्या घटपटशुनककनकभृङ्गभृङ्गारस्त्युष्ट्राद्यात्मत्वं वक्तुं शक्यम्, न वा सर्वात्मत्वप्रयुक्तत तच्छन्दवाच्यत्वम्, विरोधात् । तथाहि शुक्ती शुक्त्यवयवा रजतावयवा वा सन्ति? मार्थिक नहीं कह सकते, सो ऐसी बात नहीं है । ' यह रजत नहीं है ' इस ज्ञान से शुक्तिरजत के समान तद्विषयक शब्द और बुद्धि का भी बाध होता ही है । केवल बुद्धि परमार्थ नहीं है, किन्तु सत्य वस्तु को ग्रहण करने वाली बुद्धि ही परमार्थ है, असत्य वस्तु को ग्रहण करने वाली बुद्धि अपरमार्थं ही मानी जायगी, क्योंकि ऐसा न मानने पर भ्रम और प्रमा में सांकर्य होने लगेगा | यह कहना संभव नहीं है कि विषय का बाध हो जाने से भ्रम की अनुवृति नहीं होगी, क्योंकि भ्रम का कोई विषय न रहने से ही भ्रम का बाघ भी हो जाता है । इसलिए रजत के समान ही रजत बुद्धि और रजत शब्द भी अपरमार्थ हो माने जायेंगे । यह पहले ही कहा जा चुका है कि शुक्ति में रजत की उत्पत्ति दोष के कारण होती है । कुछ लोग ( रामानुजाचार्य ) सब ज्ञान यथार्थ है, ऐसा कह कर और यह बता कर कि जगत् के सभी पदार्थ सर्वात्मक है, त्रिवृत्रण श्रुति को भी प्रमाण मानते हैं । महत् से लेकर पंच महाभूत पर्यन्त सभी तत्व परस्पर संयुक्त होकर और परस्पर आश्रित होकर अण्ड का उत्पादन करते हैं, इत्यादि वाक्यों से विष्णुपुराण में यही बात कही गई है कि त्रिवृत्करण प्रकिया ( अथवा पंचीकरण प्रक्रिया से भी ) में किसी एक भूत का आधिक्य होने के कारण नाम भेद की प्रवृत्ति होती है । सोम के अभाव में पूतिका का ग्रहण श्रुति में बताया गया है । इस पर शास्त्र में विचार किया गया है कि यह विधान इसलिये किया गया है कि पूतिका में सोम के nana fart हैं, क्योंकि पंचीकरण न्याय से सब में सबकी विद्यमानता है । हमको रजत के सदृश शुक्ति की उपलब्धि होती है । इससे यह मानना चाहिये कि शुक्ति में भी रजत का अंश विद्यमान है । इसीलिये कभी ऐसा भी होता है कि arora east faar शुक्ति के अंश का भाग हुए केवल रजत के अंश का ही भान होने लगे । ऐसी अवस्था में रजत चाहने वाले की उसको उठा लेने के लिये प्रवृत्ति भी हो जाती है । दोष के हट जाने पर जब शुक्ति का अंश गृहीत हो जाता है तो वह पूर्व व्यापार से निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार यही मानना उचित है कि शुक्तिरजत स्थल में भी यथार्थ रजत का ही भाग होता है । ऐसे स्थलों में बाध्यबाधकभाव की भूयस्त्व उत्पत्ति माननी पड़ेगी, अर्थात् शुक्ति को अपनी विशेषताओं का बोध होगा, तब तो रजत प्रतीति का बाध होजायगा, अन्यथा नहीं । उक्त कथन ठीक नहीं है, क्योंकि शुक्ति में यदि रजत के अवयव हैं तो उसको जलाने पर रजत के अवयवों की उपलब्धि होनी चाहिये । यद्यपि शुक्ति f कृत तीनों भूतों का कार्य है, अतः तीनों भूतों के अवयव उसमें विद्यमान हैं, तो भी इतने से सब वस्तुएँ सर्वात्मक नहीं मानी जा सकतीं । इसीलिये शुक्ति को हम घट, पर, कुत्ता, सुवर्ण, भौंरा, भृङ्गार पात्र ( गुलाबदान, इत्रदान ) हाथी, ऊँट आदि नामों से नहीं कह सकते और न ही सब सब स्वरूप होने के कारण सब वस्तु सब शब्दों से कही ही जा सकती है, क्योंकि इनमें

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१०८ वेदार्थपारिजातः पटावयवाः कनकावयवाः शुनकाद्यवयवा वा सन्ति? आधे शुक्ती शुक्त्यवयवानां रजतावयवानां च सत्त्वेऽपि पटाद्यवयवाना-मभावेन सर्वात्मत्वासिद्धेः । द्वितीये शुक्तौ रजतप्रतीतिवत् तत्र घटपटादिप्रतीतिरपि स्यात् । यत्तूत -- रजतावयवानां बाहुल्यात् तत्प्रतीतिः घटाद्यवयवानामत्पत्वान्न तत्प्रतीतिरिति तन्न इदं रजतमिति प्रतीतिबलात् तत्र रजतावयवानां कल्पनेऽपि घटपटादिप्रतीत्यभावे तत्कल्पनायां बीजाभावेन कल्पनानुपपत्तेः । तथा च कसर्वा-त्मत्वम् । किञ्च, रजतावयवैः शुतेरवयवित्वे शुक्ररावयवा नैव स्युः । न च शुक्त्यवय वैर्बहुभिरल्पैरल्पत रैरल्पतमैश्चान्यावयवैः शुक्रवयवित्वसिद्धिरिति वाच्यम्, श्रवयवसमुदायसंयोगात् प्रागवयविन एवासिद्धया कथं शुक्त्यवयव सिद्धि:? शुक्तेरवयवा हि शुक्त्यवयवाः । न च शुक्तिरूपा अवयवाः शुक्त्यवयवा इत्यवयवानामेव शुक्तिपदवाच्यत्वम्, तादृशावयव बाहुल्याच्चैकस्या-वयविनः शुक्तिरिति व्यपदेश इति वाच्यम्, तथात्वे शुक्तिरूपावयवानां शुक्तिशब्दवाच्यत्वमेव स्यात्, न रजतादिशब्दवाच्यत्व-मिति कथं सर्वस्य सर्वशब्दवाच्यत्वसिद्धि:? कथञ्च शुक्तिरूपावयवविषयकं रजतरूपावयवज्ञानं यथार्थं स्यात्? किञ्च शुक्तौ चूर्णितयां शुक्य r व इव रजताणवोऽप्युपलभ्येरन् । न चाल्पत्वात्तेषामनुपलब्धिः, अल्पत्वेनाप्युपलब्धी बाधाभावात्, अवश्यं तदुपलब्धिसम्भवात् । न च शुक्तिचूर्णगतानां शुक्त्यणूनां रजताणूनां चातिसादृश्याद्विवेकेनानुपलम्भः, अविवेकेन तु तदुपलम्भोऽस्त्येवेति वाच्यम्, तर्हि शुक्तिचूर्णपुञ्जे कनकावयवास्ताम्रावयवाश्च सन्तीति तेषां वा सादृश्यादुपलम्भः किं नासीत्? न च यथार्थं सर्वविज्ञान-मिति प्रतिज्ञां विहाय शुक्ती रूप्यविज्ञानमेव यथार्थम्, शुक्तौ रूप्यावयवसत्त्वे शुक्त रूप्यात्मत्वादित्युच्यत इति वाच्यम्, तथा परस्पर विरोध है | आप यह बताइये कि शुक्ति में शुक्ति के है त्रिरजत के अवयव? अथवा पट के अवयव, कनक के अवयव या शुनक ( कुत्ता यादि ) के अवयव हैं? प्रथम पक्ष में शुक्ति में शुक्ति के अवयव और रजत के अवयवों के रहते हुए भी पदादि के अवयवों के न रहने से सबकी सब रूपता नहीं बनीं । द्वितीय पक्ष में शुद्धि में जैसे रजत की प्रतीति होने लगती हैं, उसी तरह से घटपटादि के रूप में भी उसकी प्रतीति होनी चाहिये । शुक्तिरजत में रजत के अवयवों के आधिक्य के कारण रजत की प्रतीति होती है, घटादि के अवयवों की अल्पता के कारण उनकी प्रतीति नहीं होतो, यह कहना ठीक नहीं है, ' यह रजत है ' इस प्रतीति के बल से शुक्ति में यद्यपि रजत के अवयवों की कल्पना की जा सकती है, किन्तु वहाँ पर घटपटादि की प्रतीति तो होती नहीं । फलतः पद - पदादि के अवयवों की कल्पना करने में कोई कारण fare नहीं है तो उसकी कल्पना कैसे होगी? इस प्रकार सब वस्तुओं की सब रूपता कहां बनी? अपि च, रजत के हो यदि शुक्ति के वन हैं तो फिर शुक्ति के अपने अवयव है नहीं । यह नहीं कहा जा सकता कि शुक्ति के पते arana af धक हैं और अन्य पदार्थों के अवयव स्वल्प, स्वल्पतर, स्वल्पतम हैं नीर दोनों मिलकर अवयवी रूप शुक्ति की निर्मिति करते हैं, क्योंकि अवयव समुदाय के संयोग से पहले aerat a न नहीं सकता, तो उनको शुक्ति के जन कैसे कहेंगे? क्योंकि अवयवी तो अभी नहीं बना । शुक्ति के बन • जाने के बाद ही उसके अवयव शुक्ति के पथ कहे जा सकते हैं, इस तरह से अवयव ही शुक्ति पद से अभिहित होते हैं । ऐसे अवयवों के बाहुल्य के कारण एक अवयवी को शुक्ति नाम ने कहा जाता है, यह कथन भी गलत है, क्योंकि ऐसा मानने पर शुक्ति रूप अवयव शुक्त शब्द के ही वाध्य होंगे, रजतादि शब्दों के बच्चा नहीं । इस परिस्थिति में भी सभी पदार्थों की सर्व शब्द वाच्यता कहाँ बनी? तथा शुक्ति रूप नवयवों का रजत रूप अवयवों के रूप में ज्ञान यथार्थ भो कैसे माना जायगा । दूसरा दोष यह भी आवेगा कि शुक्ति का चूर्ण बना देने पर जैसे शुक्ति के अणु उपलब्ध होते हैं, उसी तरह से उसमें रजत के अणु भी उपलब्ध होने चाहिये । रजत के अणु थोड़े हैं, अतः उनकी उपलब्धि नहीं होती, इस बात को कोई नहीं मान सकता, क्योंकि यदि थोड़े हैं तो थोड़ी मात्रा में ही वे मिलने तो चाहिये । गत शुक्ल के अणु और रजत के अणु में अत्यन्त समानता होने से भेदज्ञान नहीं हो पाता, विवेक के अभाव में उनकी पृथक् - पृथक् उपलब्धि भी नहीं होती, किन्तु अभिन्न रूप से तो इनकी उपलब्धि होती ही है, यदि ऐसा आप कहें तो शुक्ति के चूर्ण के ढेर में सुवर्ण के अवयव और शास्त्र के अवयव भी तो हैं, उनकी उपलब्धि भी साहत्य के कारण क्यों नहीं हुई, क्योंकि आप तो सब में सब का होना मानते हैं | यदि आप यह कहें कि हम ' सब ज्ञान सत्य हैं इस प्रतिज्ञा को छोड़कर ' शुक्ति में रजत विज्ञान ही सत्य है,

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दार्थपारिजातः १० ९ सति दाहाद्युपायेन शुक्तिसमुदायात् सकाशात् रजतार्थी रजतं प्राप्नुयादेवेति कृत्वा शुक्तिज्ञानतत्प्रवृत्तिबाधो न स्यात्, किं कनकाप्रचुरं मधुपिष्टं परित्यजन्ति कनकार्थिनः? शुक्ताविदं रजतमित्यस्य यथार्थत्वेनेदं रजतमित्यस्यायथार्थत्वं मन्तव्यम् । तथा च कथं सर्वविज्ञानं यथार्थ स्यात्? यदुक्तम्-- शुक्तिगतं रजतभागं गृहीत्वा इदं रजतमिति ज्ञानं यथार्थम्, शुक्तिभागं गृहीत्वा नेदं रजतमिति यथार्थमिति तन्न, शुक्तिसाक्षात्कारानन्तरं शुक्तिगतं रजतांशं गृहीत्वा रजतमित्येव किं न प्रतीयात् नेदं रजतमिति नियमेन fatafa प्रतीयात् । न च रजतांशस्याग्रहणादिति वाच्यम्, अनिपुणं चक्षुषि न्यस्तेऽपि यस्य ग्रहणमासीत्तस्य कथं सुनिपुर्ण चक्षुषः प्रणिधानेऽपि ग्रहणं न भवेत्? हठाद्दर्शनाविषयोऽपि मण्यादिगतः सूक्ष्मोऽर्थश्चक्षुः प्रणिधानात् प्रतिभाति । न च शुक्त्यादौ रजतादिसद्भावः श्रुतिबोधित इति वाच्यम्, तादृशश्रुतिवचनानुपलम्भात्, त्रिवृत्करणप्रतिपादनमात्रेण तदसिद्धेः । यदुक्तम्यद्यत् सदृशं तत्तदेकदेशभागिति, तन्न, अन्यद्रव्यस्यान्यद्रव्यैकदेशभाक्त्वायोगात् । नह्यन्यद्रव्यैकदेशस्ततो विच्छिन्नो भूत्वाऽपरद्रव्यं भजत इति कल्पयितुं शक्यम् । न च रजतैकदेशसमवेतैव शुक्तिर्जातेति वाच्यम्, एवं शुक्त्येक देश-समवेतमेव रजतं जातमिति वक्तव्यत्वात् । तथाभ्युपगमेऽपि न निर्वाह:, तथात्वे शुक्त्युदयात् प्राग् रजतं शुक्त्येकदेशभाङ् न भवति, रजतोदयात् प्राक् शुक्तिश्च रजतैकदेशभाङ् न भवतीति मन्तव्यत्वात् । न चेष्टापत्तिः, तथात्वे आदी शुक्ति-रजतयोः परस्परैकदेशरहितत्वं वतव्यम् । न चान्यतरस्य निर्धारणम् । न च द्वयमप्यनादि, जन्यत्वात् न च द्वयमपि युगपदेव जातमिति वक्तु ं शक्यम्, शुक्तिसमवेतं सद्रजतं रजतसमवेता च सती शुक्तिर्युगपदेव जज्ञाते इत्युक्तौ समवेतयोः शुक्र के अवयव होने से वह रजक है ' ऐसा अनुमान करेंगे तो ऐसी अवस्था में दाहादि उपाय से शुक्ति समुदाय में से रजतार्थी को रजत मिलनी ही चाहिये तब शुक्ति का ज्ञात हो जाने पर रजतार्थी की प्रवृत्ति में किसी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिये | सुवर्ण चाहने वाला व्यक्ति क्या सुवर्ण के कणों से भरे हुए प्रधुमक्खी के छत्ते को छोड़ देता है? सुक्ति में ' यह रजत है ' इस ज्ञान को सार्थ मानने पर ' यह रजत नहीं है ' इस ज्ञान को अगषार्थ यादव पड़ेगा । इस तरह से भी ' सब ज्ञान यथार्थ है, यह कहीं सिद्ध हम? कहा गया है कि गित रजत जाग को ग्रहण करने के कारमा ' यह रजत है ' इस ज्ञान की सभ्यता है और शुक्ति भाग को ग्रहण करने के कारण यह रजत नहीं है ' इस ज्ञान की भी सत्यता सिद्ध होती है, यह गलत बात है, क्योंकि शुक्ति का साक्षात्कार होने के बाद भी aana रजत के अंग को ग्रहण करने के कारण यह रक्त है ' ऐसी ही प्रतीति क्यों नहीं होती, ' यह रजत नहीं है ' इस तरह की निश्चित प्रतीति क्यों होती है । यह कहना गलत है कि उस समय रजस अंश का ग्रहण वर्तमान नहीं रहता, क्योंकि आप यह बताइये कि लापरवाही से दृष्टि डाल देने में भी जो वस्तु पहले दिखाई देती थी, अब पूरी सावधानी से चक्षु को एकाग्र करने पर भी क्यों नहीं दिखाई देती । एकाएक दिखाई न देनेवाली भी हीरा जवाहरात आदि की सूक्ष्म विशेषताएं सावधानी से देखने पर दिखाई देने लगती हैं । यह कहना भी गलत है कि शक्ति आदि में रजत का सात श्रुति से प्रतिपादित है, क्योंकि इस तरह की कोई श्रुति उपलब्ध नहीं है । केवल त्रिकरण श्रुति से यह बात सिद्ध नहीं हो सकती । यह कहना भी गलत है कि वो जिसके समान है, उसको उसका एक देश होना चाहिये, क्योंकि एक द्रव्य किसी दूसरे द्रव्य का भाग नहीं हो सकता । हम यह सिद्ध नहीं कर सकते कि एक द्रव्य का कोई अवयव उससे अलग होकर दूसरे द्रव्य से एकाकार हो जाता है । यह मी नहीं कहा जा सकता कि रजत के एक अंश से समवेत होकर ही शुक्ति उत्पन्न होती है, इस तरह से तो यह भी कहा जा सकता है कि शुक्ति के एक अंश से समवेत होकर के ही रजत उत्पन्न हुई है । इतना मान देने पर भी आपकी अभिमत बात नहीं बन सकेगी, क्योंकि ऐसी अवस्था में यह स्वीकार करना पड़ेगा कि वृक्ति की उत्पत्ति से पहले रजत शुक्ति का एक देश नहीं बन सकती और रजत की उत्पत्ति के पहले बुक्ति रजत का एक अंश नहीं बन सकती । इस आपत्ति को यदि आप स्वीकार करते हैं तो उसमें दोष यह आयेगा कि प्रारम्भ में शुक्ति और रजत को एक दूसरे के अंश से रहित मानना पढ़ेगा | ऐसी स्थिति में इनके स्वरूप का निर्धारण नहीं हो सकेगा । इन दोनों को अनादि नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों पैदा होने वाले । दोनों की साथ ही उत्पत्ति

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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११० वेदार्थपारिजात: शुक्तिरजतयोरुदयात्प्राग् असमवेतयोस्तयोः सत्त्वमभ्युपेयम् । न चेष्टापत्तिः, तदानीं शुक्तिरजतभ्रमस्य निर्विषयत्वापत्तेः, असमवेतयोः शुक्तिरजतयोः समवायकर्तुरदर्शनाच्च । नहि पृथिव्यादिभूतत्रयस्य त्रिवृत्करणमिव शुक्तिरजतयोद्विवृत्करणमपि क्वचिच्छ्रयते स्मर्यंत वा दृश्यते वा, येन शुक् शुक्थंशाधिक्योपलम्भ:, रजते च रजतांशाधिक्योपलम्भ: स्वीक्रियेत । शुक्तौ रजतांशाल्पत्वोपलम्भः, रजते शुक्त्यंशा-ल्पत्बोपलम्भरच न वक्तुं शक्यते । तस्माद्यद्यत्सदृशं तत्तदेकदेशभागित्यप्यसङ्गतमेव किन्तु यद्यत्सदृशं तत्तदवयवसदृशा-वयवविशिष्टमित्येव तु युक्तम्, अन्यथा शुक्तिकावयवरजतावयवयोमिथः सादृश्यञ्च न स्यात् । अवयवेऽनवस्थादोषाद अवयवा-नङ्गीकारेण रजतावयत्र शुक्त्यवयवैकदेशस्थितिः शुक्त्यवयवे रजतावयवैकदेशस्थितिश्च नास्ति । यदुक्तम् -- शुक्तिगतास्तेजसाणव एव रूप्यावयवाः, तदपि न, रूप्यस्यापि त्रिवृत्कृतभूतकार्यत्वेन तैजसाणव एव रूप्या-वयवा इति वक्तुमशक्यत्वात् । नहि रूप्यं केवलं तैजसम् न च शुक्तिगतं चाकचिक्यं शुक्तौ रूप्यांशसद्भावप्रयुक्तम्, तथात्वे aruni arafari किशसद्भावप्रयुक्तम्? न च स्वाभाविकं तत् । यदि स्वाभाविकं तदा शुक्तेरपि तत्स्वाभाविकमेव किन स्यात्? यदि तत्र तैजसांशप्रयुक्तमुच्यते, तर्हि तथैव शुक्तावपि तैजसांशप्रयुक्तमेव तद्भवेत् । तत्र किं रूप्यसद्भाव-कल्पनेन? यदुक्तम्- शुक्तौ भूयस्त्वप्रयुक्तः शुक्तिव्यपदेश इति, तदपि न व्यपदेशासिद्धेः । तथाहि -- शुक्त्यंशस्य कथं शुक्त्यंश इति नाम? न च शुक्त्यंशत्वादेवेति वाच्यम्, अंशिद्रव्यस्य शुक्तिरिति नाम्नि सिद्धे हि तदेशस्य शुक्त्यंशत्वमिति होती है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शुक्ति से समवेत रजत और रजत से समवेत शुक्ति की एक साथ उत्पत्ति होती है, ऐसा कहने पर यह मानना पड़ेगा कि शुक्ति और रजत की उत्पत्ति से पहले इनकी स्थिति समवेत अवस्था में विद्यमान यो । इस आपत्ति को स्वीकार कर लेने पर शुक्ति में रजत का भ्रम नहीं बनेगा । साथ ही असमवेत अवस्था में विद्यमान शुक्ति और रजत को समवाय सम्बन्ध से जोड़ने वाली कोई वस्तु भी तो हमें उपलब्ध नहीं होती । पृथिवी आदि तीन भूतों को जोड़ने वाली त्रिवृत्करण श्रुति के समान शुक्ति और रजत को समवेत करने वाली कोई द्विवृत्करण श्रुति या स्मृति ही उपलब्ध है और न प्रत्यक्ष में ऐसा दिखाई ही पड़ता है, जिससे कि शुक्ति में शुक्ति के अंश का आधिक्य और रजत में रजत के अंश का आधिक्य प्रामाणिक रूप में माना जाय । यह भी नहीं कहा जा सकता कि शुक्ति में रजत के कुछ अंश की और रजत में शुक्ति के कुछ अंश की उपलब्धि होती हैं । इसलिये जो जिसके समान है, वह उसका एक देश है, ऐसा मानना असंगत है, किन्तु इतना ही कहा जा सकता है कि जो जिसके समान है, वह उसके समान अवययों से विशिष्ट है । ऐसा न मानने पर शुक्ति और रजत के aara की परस्पर समानता नहीं बन पावेगी । अनवस्था दोष से बचने के लिये अवयव में अवयवान्तर नहीं माने जाते, अतः रजत के rane के एक देश में शुक्ति के अवयव की स्थिति और शुक्ति के अवयव के एक देश में रजत के अवयव की स्थिति भी नहीं मानी जा सकती । यह कहना भी गलत है कि शुक्तिगत तैजस अणु ही रजत के अवयव हैं, क्योंकि रजत भी तो त्रिवृत्कृत भूतों का ही कार्य है, ऐसी अवस्था में केवल तैजस परमाणु ही रजत के अवयव हैं, ऐसा कहना संभव नहीं । रजत केवल तैजस द्रव्य नहीं है । शुक्ति an Treferr से यह सिद्ध होता है कि शुक्ति में रजत का अंश विद्यमान है, यह कथन भी गलत है, क्योंकि ऐसा मानने पर आप यह बताइये कि रजतगत वाकचिक्य किसके अंश के कारण हैं? वह स्वाभाविक नहीं हो सकता, क्योंकि रजत में उसे स्वाभाविक मानना है तो फिर शुक्ति में भी उ est स्वाभाविक क्यों नहीं माना जायगा? यदि रजत में चाकचि तैजस अंश के कारण माना जाता हो तो वह शुक्ति में भी तैजस अंश के कारण ही मान लिया जायगा, फिर वहाँ रजत की faantaarat never करने से क्या लाभ है? यह कहना भी गलत है कि शुक्ति के अंश के after के कारण इस वस्तु का नाम शुक्ति है, क्योंकि इस तरह से तो अभिधान को सिद्धि हो न हो सकेगी । आप यह बताइये कि शुक्ति के अंश को यह शुक्ति का अंश है, ऐसा क्यों कहा जाता है? यदि आप कहें कि यह शुक्ति का अंश है, इसीलिये इसको ऐसा कहा जाता है, तो sent for tara fo अंशी द्रव्य का यह शुक्ति है, ऐसा नाम प्रसिद्ध हो जाने के बाद ही तो उनके अंश को शुक्ति का अंश कहेंगे, वह