वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 141–150
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 141–150
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वेदार्थपारिजातः १११ वक्तुं शक्यते । तदेव तु न सिद्धम् । अंशिद्रव्यस्य शुक्त्यंशभूयस्त्वे सिद्धे शक्तिव्यपदेशसिद्धि:, तत्सिद्धौ च तदंशस्य शुक्त्यंशव-सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयात् । यदप्युक्तम्- ' शुक्तिरजतज्ञानयोर्बाध्यबाधकभावः शुक्ति भूयस्त्वसाकल्यवैकल्यग्रहप्रयुक्तो न तु मिथ्यार्थसत्यार्थ-विषयत्वनिवन्धनः ' इति, तदपि न किञ्चित् शुक्तौ शुक्त्यंशभूयस्त्वात् शुक्तिरिति ज्ञानं बाधकम्, रजतांशस्वल्पत्वाद् रजत-मिति ज्ञान बाध्यमिति वक्तुं न शक्यते, बहुषु ताम्रखण्डेषु एकस्यां रूपिकायां सत्यामपीयं रूपिकेति ज्ञानस्य ताम्रखण्ड-ज्ञानेन बाधादर्शनात् ज्ञानमात्रं सत्यमित्यभ्युपगच्छता ज्ञानयोर्बाध्यबाधकभावस्य वक्तुमशक्यत्वात् । तस्मात् सत्यार्थविषय-ज्ञानेन मिथ्यार्थविषयज्ञानं विषयेण सहैव बाध्यत इत्येव स्वीकार्यम् । यत्तु केचिदाहुः -- साधारणाकारग्रहणभेदाग्रहदोषादृष्टानि सर्वेरुपेयन्ते । शुक्त्यादिषु प्रतीयमानानामवयवानां रजताद्यवयवत्वं सम्प्रतिपन्न रजताद्यवयवत्वसु सदृशाकारत्वमेव, न तु रजतादिभ्य आनीय निवेशितत्वम् । एवमेव पूतिकादिषु प्रतीयमानानां सोमलताद्यवयवानामपि सोमाद्यवयत्वं नाम सम्प्रतिपन्न सोमलनाद्यवयव सौसादृश्यमेव । तच स्फुटतरप्रतीति-सिद्धमवाधितं च । नहि शुक्तिशकलपूतिकादिषु रजतसोमादिसौसादृश्यं नास्तीति बाधकप्रत्यय उदेति । शुक्त्यवयवेषु शुक्तित्वं तद्व्यवहारावुपपन्नी, तत्र विरुद्ध जात्यन्वयाभावात् । तदपि न सत्ख्याति साधयति, सादृश्यप्रत्ययस्य प्रवर्तकत्वा-भावात्, रजतसदृशमिदमिति ज्ञानेन न रजतार्थिनः प्रवृत्तिः सम्भवति । यत्रोक्तम् -- ' नेदं रजतमित्यत्र नत्रर्थः शुक्तित्वमेव । यदाकारग्रहणेन पूर्वप्रतिपन्नायाः प्रवृत्तनिवृत्तेर्वा निवारणं स एवाकारो नञर्थः । स चानरः प्रतियोगिसापेक्षो नेदं रजतमित्यादिशब्दैस्तदनपेक्षैः शुक्त्यादिशब्दैश्च व्यवह्रियते । ' नाम हो तो अभी प्रसिद्ध नहीं हुआ है, क्योंकि अंशी द्रव्य में शुक्ति के अंशों का आधिक्य देखकर ' शुक्ति ' नाम से उसको अभिहित किया जायगा और शुक्ति द्रव्य के सिद्ध हो जाने पर ही शुक्ति के अंशों की सिद्धि हो सकती है | इस प्रकार यहाँ पर अन्योन्याश्रय दोष उपस्थित हो जायगा । यदि कहो कि शुक्ति और रजत ज्ञान का वाध्यबाधकभाव शुक्ति के अंश के बहुतायत को संपूर्ण रूप से और कम रूप से जान लेने के कारण ही है । विषय की सत्यता और मिथ्यात्व के कारण नहीं, पर यह भी कहना ठीक नहीं । क्योंकि शुक्ति में शुक्ति के अंश के बाल्य के कारण शुक्तिज्ञान बाधक है और रजत के अंशों की स्वल्पता के कारण रजत ज्ञान बाध्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक रुपये में तांबे के अनेक टुकड़े होने पर भी ताम्रखण्ड का ज्ञान रुपये के ज्ञान में बाधक नहीं बनता । फिर आप तो सभी ज्ञानों को सत्य मानते हैं, ऐसी अवस्था में दो ज्ञानों का परस्पर बाध्यबाधकभाव ही नहीं रह जायगा । इसलिये यही मानना उचित है कि सत्य-ferae ज्ञान से मध्याविषयक ज्ञान का वाघ होता है और साथ ही सियाविषय का भी बांध हो जाता है । कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे स्थलों में साधारण आकार का तो ज्ञान होता है, किन्तु उनके भेद का ठीक से ज्ञान नहीं हो पाता, वाकविक्यादि दोष और अदृष्ट भी यहाँ कारण है, ऐसा सबका मानना है । शुक्ति प्रभृति में प्रतीयमान अवयवों को रजतादि के अवयवों के रूप में प्रतीति बादी और प्रतिवादी उभयसंगत रजत के अवयवों की अत्यन्त समानता के कारण होती है, रजतादि से लाकर उनको शुक्ति में निवेशित नहीं किया जाता । इसी तरह से प्रतिका ( मगर वेल ) प्रभृति में प्रतीयमान सोमलता नादि के अवयवों की समता भी स्वीकृत सोमालता के अवयवों की अत्यन्त समानता के कारण ही मानी जाती है । स्पष्ट प्रतीतियों के भी इसकी सिद्धि होती है और उसका बाद में बाघ नी नहीं होता | शुक्तिशकल, पूतिका प्रभृति में रजत, सोमलता आदि से अत्यन्त समानता न हो, ऐसा बाधक प्रत्यय बाद में नहीं होता । शुक्ति के अवयवों में शुक्तित्व सामान्य और सुक्ति निष्पाद्य व्यवहार संपन्न होते देखे गये हैं, क्योंकि यहाँ पर विरुद्ध जाति से इसका सम्बन्ध नहीं होता । यह पुरा कथन भी सत्ख्याति को नहीं सिद्ध कर सकता, क्योंकि सादृश्य ज्ञान को see नहीं माना जाता । यह रजत के सदृश है, इस ज्ञान से रजत को चाहने वाले व्यक्ति की वहाँ प्रवृत्ति नहीं हो सकती । यह कथन भी गलत है कि " यह रजत नहीं है- यहाँ पर नत्र का अर्थ शुक्तित्व है । जिस आकार के ग्रहण से पूर्व प्रतिपत्र प्रवृत्ति या निवृत्ति का निवारण होता है, वही आकार नव् का अर्थ है । यह आकार प्रतियोगी की अपेक्षा रखता है, अतः ' यह रजत नहीं
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११२ देवार्थपारिजातः इति, तत्रोच्यते, कि नञः शुक्तित्वमर्थः? किं वा नेदं रजतमिति वाक्यास्थनत्रः? अथवा नेदं रजतमिति पदत्रयात्मकवावयस्य? नाद्यः, न घट इत्यादावपि शुक्तिर्घट इत्याद्यर्थापत्तेः । न द्वितीयः नेदं रजतमिति वाक्यस्य इदं रजतं शुक्तिरित्यर्थापत्तेः । न चेष्टापत्तिः । इयं शुचिरिति पुरोवर्तिद्रव्यमेव शुक्तित्वेन प्रतिपद्यते पुरुषो न रजतं शुक्तित्वेन तथा सति शुक्तौ रजतज्ञानस्येव रजते शुक्तिज्ञानस्याप्ययथार्थत्वापत्तेः । न च रजतस्वेन प्रतिभातमिदं वस्तु शुक्तिरेवेति तदर्थं इति वाच्यम्, तद्रजतत्वेन प्रतिभातं वस्तु किं रजतं शुक्तिर्वा? आद्ये, नेदं रजतमित्यस्यैव भ्रमत्वं स्यात् । द्वितीयेऽन्यथाख्यातिमतप्रवेशः, शुक्तिरेव रजतत्वेन ख्यातेत्यभ्युपगमात् । न तृतीयः, वाक्यार्थज्ञानस्य पदार्थज्ञानपूर्वकत्वात् पदमयस्य प्रातिस्विकोऽर्थी वाच्यः, किं नत्रपदस्य सादृश्यमर्थोऽ-न्यो वा? अन्यत्व मत्पत्त्वविरोधित्वमप्राशस्त्यमभावो वार्थः? नाद्याश्चत्वारः रजतसादृश्यं रजतादन्यद् रजतादल्प रजत-विरोधि वा शुक्तिरेवेति नियमाभावे शुक्तित्वरूपवाक्यार्थासिद्धेः । नान्त्यौ द्वौ त्वन्मतेऽभावानभ्युपगमात्, अप्राशस्त्यस्यापि प्राशस्त्याभावरूपत्वाच्च । नववंशब्दस्य शुक्तित्वमर्थः, नत्रः सादृश्यमर्थः । तथा चेदं न रजतमिति वाक्यस्य रजतसदृशी शुक्तिरर्थः । तथा च रजताभेदेनेतः प्राग् य आसीच्छुक्तिग्रहस्तस्य बाधोऽनेनेति बेन्न, नत्रर्थः शुक्तित्वमेवेति स्ववचनविरोधात् । इदंपदं च पुरो-तिवस्तुसामान्यवाचि न शुक्तिरूपवस्तुविशेषयाचि । नहि शुक्तिर्न रजतमिति वाक्यप्रयोगो येनोकार्थलाभः स्यात् । तेन शुक्ति दृष्ट्वा भ्रान्त्या रजतं मन्यमानस्य भ्रान्तिनिवृत्तये नेदं रजतं किन्तु शुक्तिरेवेति शुक्तिपदघटिताप्तप्रयुक्तवाक्यश्रवणादेव है ' इत्यादि शब्दों से अथवा केवल शुक्ति प्रभृति शब्दों से इसका व्यवहार होता है ", क्योंकि इस पर हम पूछते हैं कि म मात्र का अर्थ शुक्र है, या नेदं रजतम् ' इस वाक्य में स्थित नञ् का अथवा ' नेदं रजतम् ' इस पदत्रयात्मक वाक्य का? इनमें पहला पक्ष इस-लिये मान्य नहीं हो सकता कि ' न घट: ' इत्यादि वाक्य का भी शुक्ति पट है यह वर्ध होने लगेगा । द्वितीय पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि ' नेदं रजतम् ' इस वाक्य का ' यह रजत शुक्ति है । ऐसा अर्थ होने लगेगा | इस आपत्ति को थाप स्वीकार भी नहीं कर सकते, क्योंकि यह शुक्ति है, इस तरह से सामने विद्यमान द्रव्य को हो पुरुष शुक्ति के रूप में देखता है, वह रजत को शुक्ति के रूप में नहीं देखता । ऐसी परिस्थिति में यदि आपका कथन मान लिया जाय तो शुक्ति में रजत के ज्ञान के समान रजत में शुक्ति का ज्ञान भी अथार्थ हो जायगा । यह कहता भी ठीक नहीं है कि रजतत्व के रूप में प्रतीत हो रही यह वस्तु शुक्ति है, ऐसा उसका अर्थ करेंगे । क्योंकि इसमें यह विकल्प उठाया जा सकता है कि वह रजत के रूप में प्रतीत हो रही वस्तु रजत है या शुक्ति? प्रथम पक्ष मानने पर ' यह रजत नहीं है ' इस प्रतोति को ही भ्रम मानना पड़ेगा । द्वितीय पक्ष में अन्यथाख्याति को पड़ेगा, क्योंकि तब आप मान लेंगे कि शुक्ति ही रजत के रूप में प्रतीत होने लगी है । ' नेदं रजतम् ' इस पदत्रयात्मक वाक्य का अर्थ शुक्तित्व है, यह तृतीय पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि वाक्यार्थ का ज्ञान पदार्थ के बाद ही हो सकता है, मत्तः पहले तीनों पदों का पृथक् पृथक् अर्थं बताना पड़ेगा । नञ पद का सादृश्य अर्थ है या कोई अन्य? अन्यत्व, अल्पत्व, विरोधित्व, अनाशस्त्य और अभाव इसमें से मनु का कौन सा अर्थ है? इनमें से प्रथम चार पक्ष नहीं बनेगे, रजतसादृश्य, रजत-भिन्नता, रजताल्पता और रजतविरोधिता शुक्ति में ही है, इस नियम के अभाव में शुक्तित्वरूप वाक्यार्थ सिद्ध नहीं हो सकेगा । अन्तिम दो पक्ष भी नहीं माने जा सकते, क्योंकि आप अभाव को नहीं मानते । अप्राशस्त्य भी प्राशस्त्य का अभाव स्वरूप ही है । यह कहना भी गलत है कि " इदं शब्द का अर्थ शुक्ति है, नञ का अर्थ सादृश्य है । इस तरह मे ' यह रजत नहीं है ' इस arrer का अर्थ यह होगा कि शुक्ति रजत के सदृश है | अतः इससे पहले रजत से अमिन रूप से जो शुक्ति का बोध हो रहा था, उसका इससे बाघ होता है ", क्योंकि शुक्तित्व हो नव का अर्थ है, अपनी ही इस बात से उक्त वाक्य का विरोध होगा । ' इम् ' पद सामने विद्यमान वस्तुसामान्य का वाचक है, शुक्तिरक्त रूप विशेष वस्तु का वाची नहीं है । शुक्ति रजत नहीं है, ऐस rate प्रयोग तो होता नहीं, जिससे कि उक्त अर्थ का लाभ हो । इससे शुक्ति को देखकर प्रान्ति से उसको रजत मानने वाले व्यक्ति की शान्ति की निवृत्ति के लिये ' यह रजत नहीं है, किन्तु शुक्ति है ' इस तरह के शुक्तिपद से युक्त बाप्त मनुष्य के द्वारा प्रयुक्त वाक्य को सुन कर ही सामने free-
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वैवार्थपारिजातः ११३ पुरोवर्तिनि रजतभ्रान्तिनिवृत्तिपूर्वक शुक्तिप्रमोदयः । यदा तु चक्षुःप्रणिधानादिना स्वयमेव शुक्तिरिति प्रतिपद्यते भ्रान्तः, तदापि नेदं रजतमिति न प्रतिपद्यते, किं तर्हि नेदं रजतं किन्तु शुक्तिरित्येव प्रतिपद्यते । तस्मात् प्रतियोगिसापेक्षेनेदं रजत-मित्यादिशब्दैः शुक्त्यादयो व्यवह्रियन्त इति न युक्तम्, रजतस्य सत्वेन नेदं रजतमिति वाक्यस्य प्रतियोगिसापेक्षत्वाभावाच्च । तस्मान्नञः शुक्तित्वं नार्थः । यत्तु ख्यातिमरीत्या स्वाप्नाः पदार्था अपि परमेशसृष्टा इति तन्न ' पुरत्रये क्रीडति यश्च जीवस्ततस्तु जातं सकलं विचित्रम् | आधार मानन्दमखण्डबोधं यस्मिल्लयं याति पुरत्रयं च ॥ ' ( कैव. उ. १४ ) इति श्रुतेर्जीवस्यैव तत्सृष्टिकर्तृत्व-श्रवणात् यावदज्ञानमेव जीवेशादिद्वैतप्रतिपत्तेः । ' यथार्थेन विना पुंसो मृषैवार्थविपर्ययः । प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदना-दिकम् ॥ ' इति बादरायणोकेश्च । नहि स्वप्नदृष्टवस्तु यथार्थ मन्यते लोकः । यदप्युक्तम् -- ' पीतः शङ्ख इति ज्ञानमपि यथार्थमेन है नयनवर्तिपित्तसम्भिन्ता नायनरश्मयः शङ्खेन संयुज्यन्ते । तत्र पित्तगतपीतिमाऽभिभूतशुलिमा न गृह्यते, अतः सुवर्णानुलिप्तशङ्खवत् गीतः शङ्ख इति प्रतीय । पित्तद्रव्यं तद्गतपीतिमा चातिसौक्ष्म्यात् पार्श्वस्थैर्न गृह्यते । पित्तोपहतेन तु स्वनयननिष्क्रान्ततयाऽतिसामीप्याद् द्वे अपि गृह्येते । तद्ग्रहणसंस्कार-सचिवैर्नायनरश्मिभिर्दूरस्थमपि गृह्यते ' इति, तदपि न सङ्खस्य सुबर्णानुलिप्तस्यैव पीतत्वेऽन्यैरपि पार्श्वस्थैस्तद्ग्रहप्रसङ्गात् । न चातिसौक्ष्म्यात्तदग्रहः, तथाविधस्यातिसूक्ष्मस्य पीलिनः शङ्खगतशुक्तिमाऽभिभावकत्वानुपपत्तेः । किन्तु शङ्खप्रतिफलित-नायनरश्मीनां नयनगतपित्तद्रव्यपीतिमग्रहणेन तदुपपत्तिः । एवं रक्तः स्फटिकमणिरिति ज्ञानमपि जपाकुसुमसन्निधानरूपदोष-मान वस्तु में रक्त भ्रान्ति की निवृत्ति होकर शुक्ति के यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । जब सावधानी से अवलोकन कर भ्रान्त व्यक्ति स्वयं ही यह जान लेता है कि यह है, तब भी ' यह रजत नहीं है ' किन्तु शुक्ति ही है, यही ज्ञान होता है । इसलिये यह कहना ate नहीं है कि प्रतियोगी की अपेक्षा रखने वाले, ' यह रजत नहीं है ' इस तरह के शब्दों से शुक्ति प्रभृति का व्यवहार होता है । रजत की विद्यमानता में ' वह रजत नहीं है ' इस वाक्य की प्रतियोगी सापेक्षता ' बनेगी भी नहीं । इसलिये नञ का अर्थ शुक्तित्व नहीं किया जा सकता ख्यातिवादी के अनुसार स्वप्न के पदार्थ भी परमेश्वर रति है । किन्तु यह मत ठीक नहीं है, " यह जीवात्मा तीन लोकों में अथवा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में नाना प्रकार की क्रीडा करता है । उसी से यह नाना प्रकार की सृष्टि उत्पन्न हुई है । इसका बाधार जान स्वरूप अखण्ड ज्ञान हा है । आत्मा के इसी स्वरूप में और सारे प्रपंत्र लीन हो जाते हैं " इस कैवल्य उपनिषद के वचन के अनुसार जीव को ही थप्न की सृष्टि का कर्ता माना गया है । जब तक अज्ञान की स्थिति रहती है, तभी तक जीव - परमेश इत्यादि रूप में द्वैत की प्रतीति भावी जाती है । बदावण ने भी इस विषय में कहा है कि " यथार्थ बोध के अभाव में पुरुष को ' झूठमूठ ही विषयों का विपरीत ज्ञान होने लगता है, जैसे कि स्वप्न में व्यक्ति अपने ही शिर को काटता हम देता है " । स्वप्न में देखी गई वस्तु को लोक में कोई यथार्थ नहीं मानता । " पीला है, यह ज्ञान भी सच्चा ही है, नेत्र में विद्यमान पित्त से मिली हुई नेत्र की किरणें शंख से संयुक्त हो जाती है । इस दशा में पिलगत पीलेपन के कारण शंख को भी नहीं दिखाई देती, गतः पानों शंख पर सुवर्ण पोत दिया गया हो, इस तरह से शंख पीला नजर आता है । पित्त द्रव्य और उसमें विद्यमान पीतिभा अति सूक्ष्म होती है, अतः पास वाले व्यक्ति को वह नहीं दिखाई देती, किन्तु जो व्यक्ति पित्त से पीडित है उसको तो अपने नेत्र से निकलने के कारण अत्यन्त समीप होने से पित्त और पीतिमा दोनों का ही ज्ञान होता है । इस ज्ञान के संस्कार से संयुक्त क्षेत्र की रश्मियों दूरस्थ वस्तु में भी उनका ज्ञान कर लेती है " यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि शंख में यदि सुवर्ण थे पोती गई वस्तु के समान पीलेपन की प्रतीति होती है तो वह पास में बैठे हुए अन्य व्यक्ति को भी दिखाई पड़नी चाहिये । वह अत्यन्त सूक्ष्म है, अतः नहीं दिखाई पड़ती, यह कहना भी गलत है, क्योंकि यदि वह इतनी सूक्ष्म है तो फिर उस पीतिमा से शंख में विद्यमान सफेदी कैसे दबाई जा सकती है । ऐसे स्थलों में होता यह है कि शंख में प्रतिफलित हो रही क्षेत्र की किरणें नेत्रगत पितद्रव्य और पीतिमा का ग्रहण करती है, उसी से बह पीला मालूम पड़ता है । इसी तरह से स्फटिक मणि लाल है, यह १५
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वेदार्थपारिजातः प्रयुक्तत्वाद् भ्रमात्मकमेव यथा जिह्वादोषप्रयुक्तो गुडे तिकनाऽवभासः । दोषजन्यज्ञानस्यायथार्थत्वात् प्रमाणजन्यानुभवसिद्धस्यैव यथार्थत्वात् । यदुक्तम् --- ' तेजः पृथिव्योरपि अम्बुनो विद्यमानत्वेनेन्द्रियदोषेण केवलस्याम्बुनः ग्रहणान्मरुमरीचिषु जलज्ञान यथार्थम् ' इति, तदपि न किञ्चित् त्रिवृत्करणमिद्धे तेजसि वयादी जलांशसत्त्वेऽपि साधारणैरुपलब्धुमशक्यत्वात् । तस्मान्मरीचिसम्पृकमरुभूमी जलज्ञानं मिथ्यैव । एवमलातस्य द्रुततरगमनेऽपि तत्तदेशं बिहायान्यदेशं गतमलात-मिति कृत्वा नैकदा सर्वदेशसंयोगः, चक्रस्यैव तस्य सर्वदेश संयोगासंभवात् । एवं प्राच्यां दिशि पश्चिमा दिग्वर्तत इत्यपि कल्पनामात्रम् । दिङ्मोहृदिग्भ्रमादिशब्दः प्रख्यात भ्रमस्यापि यथार्थत्वसाधनमपि साहसमेव । एवं ग्रीवास्थमुखस्य दर्पणगतत्वे सव्यदक्षिणभागयोर्दक्षिणसव्यभागत्वेन चान्यथाग्रहणात् प्रतिविम्बप्रतीतिरपि भ्रमात्मिव । यदुक्तस्- ' द्विचन्द्रज्ञानादावप्यङ्गुल्यवष्टम्भ तिमिरादिर्नायनतेजोगतिभेदेन सामग्रीभेदात् सामग्रीद्वयमन्योन्यनिरपेक्षं चन्द्रग्रहणद्वय हेतुर्भवति । तत्रैका सामग्री स्वदेशविशिष्टं चन्द्रं गृह्णाति 1 द्वितीया तु किञ्चिद् वक्रगतिचन्द्रसमीपदेशग्रहणपूर्वकं चन्द्र स्वदेशावियुक्तं गृह्णति । तदेवं सामग्रोद्वये युगपद्देशयविशिष्टचन्द्रग्रहणे ग्रहणभेदेन ग्राह्याकारभेदाद् एकत्वग्रहणा-भावाञ्च द्वौ चन्द्राविति प्रतीतिविशेषः । देशान्तरस्य तद्विशेषणत्वं देशान्तरस्यागृहीतस्वदेशचन्द्रस्य च निरन्तरग्रहणेन भवति । तत्र सामग्रीद्वित्वं पारमार्थिकम् । ग्रहणद्वित्वेन चन्द्रस्यैव ग्राह्याकारद्वित्वं च पारमार्थिकम् । विशेषणद्वयविशिष्ट-चन्द्रग्रह्णद्वयस्यैक एव चन्द्रो ग्राह्य इति ग्रहणे प्रत्यभिज्ञानवत् केवलचक्षुषः सामर्थ्याभावात् चाक्षुषं ज्ञानं तथैनावतिष्ठते । द्वयोश्चक्षुषोरेकसामय्यन्नर्गतत्वेऽपि तिमिरादिदोषभिन्नं चाक्षुषं तेज: सामग्रीद्वयं भवतीति कार्यभेदो भवति । अपगते तु ज्ञान भी जपाकुसुम के सान्निध्य रूप दोष पैदा होने के कारण भ्रम रूप माना जाता है । जैसे कि जिह्वा के दोष के कारण गुड़ तीता मालूम होने लगता है | अतः यही मानना उचित है कि दोष के कारण जिस किसी ज्ञान की उत्पत्ति हो, उसको मिथ्या कहते हैं, क्योंकि प्रमाण से उत्पन्न हुए अनुभव से परीक्षित ज्ञान ही सत्य होता है । " तेज और पृथिवी में भी जल विद्यमान है, वतः इन्द्रिय के दोष के कारण जब केवल जल का ग्रहण होने लगता है, तेज बोर पृथ्वी का नहीं, अतः मृग मरीचिका में होनेवाला जल ज्ञान भी सत्य है " यह क er भी गलत है, क्योंकि त्रिवृत्करण पद्धति मे सिद्ध ते वति प्रभृति पदार्थों में यद्यपि जल का अंश भी विद्यमान है, किन्तु साधारण जन उसको देख नहीं सकता । इसलिये सूर्य किरणों से संयुक्त यदभूमि में न की प्रतीति मिथ्या ही पानी जायगी । इसी तरह से अलातचक्र ( दुकारी ) अर्थात् आप से जलती हुई वस्तु को यदि तेजी से गोलाई में घुमाया जायगा तो इल अवस्था में एक देश को छोड़ देने के बाद ही बात दूसरे देश न जायगा, इस तरह से एक साथ सभी स्थानों में सम्पन्न नहीं होता । अतः उसकी चक्र के रूप में प्रतीति भ्रान्त है । इसी तरह से पूर्व दिशा में पश्चिम दिशा विद्यमान है, यह कथन मी केवल कल्पनामात्र है । दिमोह, दिग्भ्रम आदि शब्दों की सहायता से प्रख्यात भ्रम को यथार्थ सिद्ध करना भी दुःसाहस ही माना जायगा । इसी तरह प्रतिबिम्ब ज्ञान को भी भ्रमात्मक ही मान जायगा, क्योंकि यहाँ पर ग्रीवा पर विद्यमान मुख जब दर्पण में दिखाई पड़ता है, तो उसका नया भाग दाहिनी तरफ और दाहिना भाग बाईं तरफ दिखाई पड़ने लगता है । इसलिये सत्य होकर मिथ्या हो है । कहा जाता है कि द्विचन्द्र ज्ञान यादि में भी अंगुली आदि से आँखों को दबाने के कारण आंखों में अंधेरा सा छा जाता है और उसके कारण अक्षों की रोशनी की गति में भिन्नता आ जाती है । इस गतिभेद रूपी सामग्री की भिन्नता के कारण एक दूसरे की अपेक्षा न रखने वाली दो सामग्रियों दो चन्द्रज्ञान को कारण होती हैं । इनमें से एक सामग्री अपने स्थान में हो चन्द्रमा को देखती है और दूसरी सामग्री कुछ तिरछी जाकर चन्द्रमा के समीपवर्ती प्रदेश को ग्रहण कर बाद में अपने स्थान में स्थित चन्द्रमा को देखती है । इस तरह से दोतरह की सामग्री से एक साथ दो स्थानों पर चन्द्रमा को देखने के कारण, ज्ञान के आकार में भेद होने के कारण, ज्ञान के विषय के आकार में भी भेद हो जाने के एकत्व का ग्रहण नहीं होता, फलतः दो चन्द्रमा है, इस तरह की विशेष प्रकार की प्रतीति होने लगती है । इनमें दोनों ही तरह की सामग्री वास्तविक है, क्योंकि देशान्तर का चन्द्रमा से सम्बन्ध उसके साथ अपने स्थान में स्थित चन्द्रमा का
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वेदार्थपारिजातः ११५ दोषे स्वदेश विशिष्ट चन्द्रस्यैकग्रहणवेद्यत्वादेकश्चन्द्र इति भवति प्रत्ययः । दोषकृतं तु सामग्री द्वित्वं ग्रहणद्वित्वं ग्राह्याकारद्वत्वं च, तेन द्विचन्द्रादिज्ञानं यथार्थमेव ' इति । तन्न, कारणजन्यत्ववर्णनेऽपि तस्य भ्रमत्वाभावासिद्धेः । ज्ञानकारणतयाऽभिमत-तत्कारणसामग्र्यतिरिक्तदोषरूपं कारणजन्यं ज्ञानं भ्रम इत्युक्तः । तेन चिन्द्रज्ञानादेर्दोषसहकृतकारणसामग्रीजन्यत्वेन भ्रमत्वमेव । यावद् व्यवहारं योऽर्थः सत्यः सद्विषयं ज्ञानं यथार्थमित्युच्यते । चन्द्रद्वित्वादिकं तु प्रतीतिकाल एव सत्यमिव भवति नहि यावद् व्यवहारं रज्जुसर्प - शुक्तिरजत - द्विचन्द्र- स्वप्न रथादीनामनुवृत्तिः । भ्रमेऽगते मया दृष्टं द्विचन्द्रादिकं मिथ्यैवेति लोको जानाति । नहि शुक्तिरजत- स्वप्नस्थादयः सत्या इति भवति कस्यचित् प्रत्ययः । दोषकृतस्यापारमार्थिकत्वमेव | पारमार्थिकत्वं तु स्वाभाविकस्यैव । दोषकतत्वेन सामग्री द्वित्वस्यापारमाथिकत्वे ग्रहणद्वित्वं ग्राह्याकारद्वित्वमप्यपार-मार्थिकमेव । न च दोषस्य तिमिररोगादेः सत्यत्वे तत्कृतस्य सर्वस्य सत्त्वमेवेति वाच्यम्, अविद्यादशायां सत्यत्येऽपि परमार्थ-सत्यत्वानभ्युपगमात् । किञ्च, तिमिरादेर्दोषत्वमेव कुलः? यथार्थज्ञानजनकल प्रयुक्तम्, अयथार्थज्ञानप्रयुक्तं वा? आधे तिमिरादेः स्वतो दोषत्वाभावेन तन्निवृत्त्यर्थमोषधसेवनादिप्रवृत्यनापातात् । पितिमिरनेत्र एकं चन्द्रं पश्यति, तिमिरनेत्रस्तु तद्वयं पश्यतीति स एव स्पृहणीयः स्यात् । न द्वितीय:, यथार्थज्ञानजनकत्वस्थ दोषत्वे कालात्ययापदिष्टता । तस्मादयथार्थज्ञानजनकत्वप्रयुक्तमेव । न च चन्द्रद्वित्वा दिज्ञानं पत्यमिति वाच्यम्, चन्द्रद्वित्वस्य प्रत्यक्षादिविरुद्धत्वात् । न च देशद्वयविशिष्टत्वेनेोऽपि चन्द्रो ग्रहण न होने पर भी नैरन्तर्य के ग्रहण के कारण होता है । इस प्रकार ज्ञान के भेद के कारण एक हो चन्द्रमा के दो वाकारों का ज्ञान भी पारमार्थिक हो है । प्रत्यभिज्ञा में तो यह सामर्थ्य है कि यह पहले देखी हुई वस्तु और वर्तमान में देखी जा रही वस्तु के अभेद का ज्ञान करा देती है, किन्तु द्विचन्द्र जैसे स्थल में विद्यमान सामग्री में यह शक्ति नहीं है, अतः वहाँ एक ही चन्द्रमा है, इस बात का ज्ञान न होकर दो चन्द्रमा है, इस तरह का ज्ञान होगा । दोनों चक्षु aaf प एक ही सामग्री के अन्तर्गत संचालित होते हैं, किन्तु तिमिर प्रभृति दोषों से दो भिन्न मार्गों में विभक्त हुई ने की किरणें दो कार्गो को पैदा कर देती हैं । दोष के हट जाने पर अपने स्थान पर स्थित चन्द्रमा की प्रतीति एक ही सामग्री से होती है, अतः चन्द्रमा एक ही है, यह ज्ञान होने लगता है । दो सामग्री का होता, दो ज्ञानों का होना और विषयों के आकार का भी को होना यहां स्पष्ट है, इसलिए एक चन्द्रमा में दो चन्द्रमा का ज्ञान भी सत्य हो मानना चाहिये | यह पूरा कथन गलत है । यद्यपि आपने द्विचन्द्र प्रतीति की कार्यकारण प्रक्रिया को न विस्तार से बताया है, किन्तु इससे यह भ्रम नहीं है, ऐसा सिट नहीं हो पाता । वस्तुत: भ्रम का लक्षण यह है कि वह ज्ञान के कारण रूप में स्वीकृत सामग्री से भिन्न दोष रूप कारण सामग्री से पैदा होता है । इसलिए द्विचन्द्र प्रभृति ज्ञान दोषवत कारण सामग्री से उत्पन्न होने के कारण भ्रमात्मक ही यथार्थ माना जाता | दो चन्द्रमा का ज्ञान याने जायेंगे । व्यवहार के निष्पन्न हो जाने तक जो वस्तु राज्य है, तद्विषयक ज्ञान को हो तो ज्ञान काल में सत्य भाता है । सम्पूर्ण व्यवहार काळपर्यंन्त रज्जुसर्प, शुक्तिरजत, द्विचन्द्र, स्वरण आदि की अनुवृत्ति नहीं चलती । भ्रम के दूर हो जाने पर मैंने अभी जो दो चन्द्रमाओं को देखा था, वह मिथ्या प्रतीति थी, ऐसा सभी जान जाते हैं । किसी को भी ऐसी प्रतीति नहीं होती कि शुफिरजत, स्वप्नरष आदि सत्य हैं । दोष के कारण जिसकी सत्ता है, उसको अपारमार्थिक ( मिथ्या ) ही माना जायगा | स्वाभाविक वस्तु ही पारमार्थिक ( सत्य ) मानी जा सकती हैं । दो तरह की सामग्री के दोषी सिद्ध हो जाने के कारण ज्ञान के दो आकार और उसके विषय के दो आकार आदि समी ा ही हैं । तिमिर प्रभूति इन्द्रिय दोष तो सत्य है, अतः इनकी सत्यता के रहते इनसे उत्पन्न होने वाले ज्ञान को सत्य ही मानना पड़ेगा, ऐसा आप नहीं कह सकते, क्योंकि अविद्या दशा में ये भले ही सत्य हो, किन्तु इनकी वास्तविक सत्यता नहीं मानी जाती । आप यह are ft तिमिर प्रभृति को दोष क्यों कहा जाता है? ये सत्य ज्ञान कराते हैं, इसीलिए अथवा ये मिथ्या ज्ञान कराते हैं, इसलिये । यदि ज्ञान कराने के कारण तो वे स्वयं तो दोष है नहीं, तब उन्हें मिटाने के लिए औषध सेवन में प्रवृत्ति कैसे होगी? जिस व्यक्ति को तिमिर रोग नहीं है, वह तो एक ही चन्द्रमा देखता है, किन्तु तिमिर नेत्र वाला व्यक्ति दो चन्द्रमा देखता है,
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११६ नेदार्थपारिजातः द्वेधा भवतीति वाच्यम्, तथात्वे सञ्चारवशादनन्तदेशसम्बन्धे तदानन्त्यप्रसङ्गात् । न च युगपदेशद्वयसम्बन्धेन चन्द्रद्वित्वमिति वाच्यम्, एकस्य युगपदेशद्वय वैशिष्ट्यासम्भवात् । न च सामग्रीभेदाञ्चन्द्रदेशभेद इति वाच्यम्, चक्षुर्गतसामग्री द्वित्वस्य गगनगत-चन्द्रभेदाप्रयोजकत्वात् । एतेनेका सामग्री चन्द्र स्वदेशविशिष्टं गृह्णाति, द्वितीया तु स्वदेशवियुक्तमित्यपि प्रत्युक्तम् एकस्यैव चन्द्रस्यैकस्मिन्नेव क्षणे स्वदेशविशिष्टत्वस्वदेशनियुक्तत्वयोरयोगात् । किञ्च, या स्वदेशवियुक्तं चन्द्रं गृह्णाति सा किं देशान्तरविशिष्टं गृह्णति, उत निर्देशमेव? आद्ये कथमन्यदेश-विशिष्टस्यान्यदेशविशिष्टत्वेन ग्रहणम्? द्वितीये कथं निराधाराधेयग्रहणम्? कथं वा देशं विना चन्द्रस्य सत्त्वम्? तस्यादेकस्य चन्द्रस्य चन्द्रद्वयत्वेन स्वदेशविशिष्टचन्द्रस्य चन्द्रद्वयत्वेन स्वदेशविशिष्टस्य स्वदेशवियुक्तत्वेनान्यदेशविशिष्टत्वेन च ग्रहणमय-थार्थम् । अत एव तस्यैकश्चन्द्र इति ज्ञानवाध्यत्वम् । तेनावाधितार्थविषयज्ञानमेव यथार्थम् । सर्वथाऽबाध्यत्वेन ब्रह्मज्ञानस्य मुख्यं यथार्थत्वम्, घटादिज्ञानानां तु यावद् व्यवहारावाध्यत्वेन यथार्थज्ञानत्वव्यवहारः । aratoda निर्वाह सम्भवत्यनिर्वचनीयख्यात्यभ्युपगमो व्यर्थ एवेति चेन्न } इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षमिति भ्रमप्रमासाधारणम् अन्यथाख्यातिवादिभिर्लक्षणमुक्तम् । तथा च बल्मीकादिगतस्य गृहाङ्गणगतदेवदत्तचक्षु-इस तरह से तो तिमिर नेत्र वाला व्यक्ति ही स्पृहणीय माना जायगा । यथार्थ ज्ञान के जनक को दोष सामने में कालात्ययापदिष्ट ' नामक tearere होगा । इसलिये दोष की व्याख्या अयथार्थ ज्ञान को जनकता के रूप में ही की जा सकती है, अर्थात् दोष मिथ्या ज्ञान पैदा कराने वाले ही होते हैं । द्विचन्द्रादि ज्ञान को हम सत्य नहीं मान सकते, क्योंकि दो चन्द्रमा का ज्ञान प्रत्यक्ष, आगस प्रभुति सब प्रमाणों के विरुद्ध है । दो देशों से संयुक्त होने से भी एक ही चन्द्रमा को दो तरह की स्थिति भी नहीं मानी जा सकती । ऐसा मानने पर तो मनन्त चन्द्रमाओं की स्थिति माननी पड़ेगी, क्योंकि चन्द्रमा के संचरण के समय उसका अनन्त देशों से सम्बन्ध होता है । एक साथ दो देशों से संबन्ध होने से ऐसो प्रतीति होती है, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक वस्तु का एक साथ दो देशों से सम्बन्ध नहीं हो सकता । सामग्री के भेद से भी चन्द्र का देशभेद स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि चक्षु में विद्यमान दो सामग्रियों आकाश में विद्यमान चन्द्रमा में भेद का ज्ञान नहीं करा सकती । इसी से इस उक्ति का भी खण्डन हो जाता है कि एक सामग्री चन्द्रमा को अपने देश के साथ देखती है और दूसरी सामग्री उस देश से वियुक्त चन्द्रमा को देखती है, क्योंकि एक चन्द्रमा का एक ही क्षण में अपने देश संयोग और वियोग एक साथ संभव नहीं हो सकता । जो सामग्री अपने देश से वियुक्त चन्द्र का ग्रहण करती है, वह क्या देशान्तर से विशिष्ट चन्द्र का ग्रहण करती है, अथवा देश अन्य देश ffee का ग्रहण करती है तो उससे मित्र विशेषणदेव से विशिष्ट का ग्रहण कैसे रहित चन्द्र का? प्रथम पक्ष में यदि वह करेगी? दूसरे पक्ष में बिना आधार के आधेय का ग्रहण कैसे होगा? बिना देश के चन्द्र की स्थिति कहाँ रहेगी? इसलिए एक चन्द्रमा की दो चन्द्र के रूप में प्रतीति स्वदेश विशिष्ट चन्द्र की स्वदेश से वियुक्त होकर तथा अन्य देश से संयुक्त होकर हो रही प्रतीति है । अबाधित वस्तु विषयक मानना बिलकुल गलत है । इसीलिए चन्द्रमा एक ही है, इस ज्ञान से पहले ज्ञान का बाथ हो जाता airat er कहा जाता है । ब्रह्म ज्ञान का कभी बाध नहीं होता, अत: मुख्य यथार्थ ज्ञान यही है । घटादि ज्ञान का भी व्यवहार ear में बाध नहीं होता, अत: इनमें भी पारमार्थिक अवस्था को छोड़कर यथार्थ ज्ञान का व्यवहार होता है । अन्यथाख्याति मानने से भी इस तरह के व्यवहार को निष्पत्ति हो सकती है, ऐसी अवस्था में अनिर्वचनीय ख्याति को मानने से क्या फायदा है? इसका उत्तर यह है कि अन्यथाख्यातिवादी इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुए ज्ञान को प्रत्यक्ष मानते हैं । जिस अनुमान के पक्ष में आप जो साध्य सिद्ध करना चाहते हैं, उस साध्य का अभाव यदि दूसरे प्रमाणों से सिद्ध हो जाय तो उस अनुमान को कालात्ययापदिष्ट अथवा बाधित कहा जाता है । जैसे मनुष्य का सूत्र पवित्र है, सूत्र होने के कारण, गोमूत्र की तरह इस अनुमान में मनुष्य मूत्र पक्ष है और उसमें पवित्रता साध्य । इसलिये मूत्रत्व हेतु से यद्यपि for fea हो सकती है, किन्तु मनुष्य सूत्र में साध्य पवित्रता का शास्त्ररूप दूसरे प्रमाण से बाथ हो जाता है, अतः अनुमान बाधित या कालात्ययापदिष्ट कहलाता है । प्रकृत में यथार्थ ज्ञान के जनक को दोष मानने में यहीं बाधा है कि दोष कभी यथार्थ ज्ञान नहीं कराते, किन्तु मिथ्या ज्ञान हो कराते हैं ।
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दार्थपारिजातः ११७ रिन्द्रियस्य सन्निकर्षाभावेन रज्जौ सर्पोऽयमिति भ्रमोत्पत्त्यसम्भवात् । न तत्र सर्प आसीदिति प्रत्ययस्य लौकिकपारमार्थिकत्वा-वच्छिन्नसर्वो विषयः, न तु प्रातिभासिकः सर्पः । प्रातिभासिके सर्वे व्यावहारिकसर्पबुद्धिस्तु अतस्मिंस्तद्बुद्धित्वाद् भ्रान्तिरेव । रज्जुसर्पप्रत्ययस्य तु रज्ज्वध्यस्तसर्प एव विषयः, न केवलं रज्जुः, नापि देशान्तरस्थः सर्पः । तस्मादन्यत्र सतोऽन्यत्र ख्यात -त्वासम्भवेन नान्यथाख्यातिसिद्धिः । तस्मादनिर्वचनीयख्यातिरेव । न च दोषवशाद् व्यवहितेनाप्यर्थेनेन्द्रियसम्बन्ध इति वाच्यम्, दोषशतादपि चक्षुरिन्द्रियस्यापुरोयतिदिषयसंयोगा-योगात् तत्कल्पनस्यानुभवविरुद्धत्वात् । न च यथा दोषवशाद्रज्जौ सर्पोदयस्तथैव संयोगोऽपि भवत्विति वाच्यम्, दोशवशाल्ली-किक सर्पोदयस्यासम्भावितत्वेऽपि मिथ्यासर्पोदयस्य सम्भावितत्वात् । यथा निद्रादोषवशादात्मनि प्रातिभासिका रथगजादय उत्पद्यन्ते 1 तथैवेहापि तन्मन्तव्यम् । न च तत्राप्यन्यथाख्यातिरेवेति वाच्यम्, ' रथान् रथयोगान् पथः सृजते ' ( बृ. उ. ४ | ३ | १० ) इति श्रुतिविरोधात् । न चाख्यातिमते तदुपपत्तिः । स्मर्यमाणानुभूयमानयोः सर्परज्ज्वोर्भेदाग्रहात् सर्पप्रतीतिः, तद्भेदग्रहात्तु सर्पबाध इति तन्मतम् । तच्च निर्युक्तिकम्, रज्ज्वनुभवे सर्पभ्रमस्यानुदयप्रसङ्गात् । आन्तरस्य स्मर्यमाणस्य बाह्यस्य दृश्यमानस्य चाभेद-ग्रहायोगाद् रज्जुसर्पद्वये पुरोवर्तिनि सति तत्र रज्ज्वां सर्पाभिदग्रहः सर्वे रज्ज्वभेदग्रहश्व साम्यात् सम्भवेत् । नापि यथार्थख्यातिमते तदुपपत्तिः । ' रज्ज्वां सन्तेव सर्पः प्रतीयते रज्जुप्राचुर्यात् सर्पबाध: ' इति, तदपि न, रज्ज्वां पूर्वं जातस्य सर्पेभ्रमस्य पश्चाज्जातेन दण्डभ्रमेणापि बाधदर्शनात् । रज्ज्वां रज्जुप्राचुर्यस्य दण्डादिलेशस्य च सत्त्वादर्शनात् । यह लक्षण भ्रम और प्रमा दोनों में ही घटित होता है । इस लक्षण को मान लेने पर बिल में बैठे हुए सर्प के साथ देवदत्त की चक्षुरिन्द्रिय कान तो है नहीं, तब रज्जु में सर्प का भ्रम कैसे होगा? वहाँ पर सर्प नहीं था, इस परवर्ती प्रत्यय का विषय लौकिक पारमार्थि कता से युक्त सर्प ही है, प्रतिनासिक सर्प नहीं । प्रतिभासिक सर्प में व्यावहारिक सर्प की बुद्धि अन्य में अन्य की बुद्धि होने से भ्रान्ति ही मानी जायगी । रज्जुसर्प ज्ञान का विषय रज्जु में अध्यस्त सर्प को ही मानना पड़ेगा । इसका विषय न केवल रज्जु है और न बिल में रहने वाला सर्प ही । इसलिए जो अन्यत्र अर्थात् बिल आदि में विद्यमान है, उसकी अन्यत्र अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों के समक्ष ख्याति नहीं हो सकती, इस तरह से अन्यथाख्याति नहीं बनती । फलतः आपको अनिर्वचनीय ख्याति को ही मानना पड़ेगा । दोष के कारण व्यवहित विषय से भी इन्द्रिय के सम्बन्ध की कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि सैकड़ों दोष मिलकर के भी क्षुद्र का विषय से सम्बन्ध नहीं बना सकते, जो कि सामने नहीं है । इस तरह की कल्पना अनुभव के भी विरुद्ध हैं । आप यह भी नहीं कह सकते कि जैसे दोष के कारण रज्जु में सर्प का उदय हो जाता है, उसी तरह से संयोग भी हो जायगा, क्योंकि दोष के कारण लौकिक व्यावहारिक सर्प की कल्पना नहीं की जा सकती, प्रातिभासिक सर्प की ही की जा सकती है, अतः व्यावहारिक विषयेन्द्रिय संनिकर्ष की कल्पना नहीं की जा सकती । जैसे निद्रा दोष के कारण स्वप्नावस्था में आत्मा में प्रातिभासिक स्थान आदि की उत्पत्ति मानली जाती है, उसी तरह यहाँ भी समझना चाहिये । स्वप्न में भी अन्यथाख्याति ही क्यों न मानी जाय, तो इसका उत्तर है कि स्वयं ही प्रतिपादित करती है कि " उस अवस्था में द्रष्टा रथ, अश्व, मार्ग आदि की सृष्टि करता है " । refore में भी इस श्रुति की उपपत्ति नहीं बनती | उनका यह मानना है कि स्मर्यमाण सर्प और अनुभूयमान रज्जु में भेद न कर पाने के कारण रज्जु में सर्प की प्रतीति होती है । इनका जब अलग - अलग ग्रहण होने लगता है तो सर्प का बाध हो जाता है । इस कथन का कोई आधार नहीं है, क्योंकि अब रज्जु का अनुभव हो रहा है तो उस अवस्था में सर्प का भ्रम कैसे पैदा हो सकता है? स्मर्यमाण वस्तु तो भीतर है और दिखाई पड़ रही वस्तु बाहर, इन दोनों का अभेद बोध हो भी कैसे सकता है । रज्जु और सर्प दोनों जब सामने दिखाई पढ़ें, तभी रज्जु में सर्प का और सर्प में रज्जु का अभेदग्रह समानता के कारण संभव हो सकता है । यथार्थख्यातिवाद के मत में भी इसकी उपपत्ति नहीं होती । उनका कहना है कि रज्जु में सत्य सर्प को ही प्रतीति होती है । रज्जु के अंशों की प्राचुर्येण प्रतीति होने पर सर्प का बाध हो जाता है । इससे भी बात बनती नहीं, क्योंकि रज्जु में पहले जो सर्प का भ्रम हुआ, उसका बाद में पैदा हुए दंड के भ्रम से भी बाध देखा जाता है । रज्जु में रज्जु के अंशों का प्राचुर्य और दंड में दंड के अंश की
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११८ Žarefarizam: नहि रज्जो चिरं चक्षुषि प्रणिहितेऽपि दण्डसर्पादिलेशसाक्षात्कारः सम्भवति, रज्ज्वारम्भकाणां तन्तूनामेव साक्षात्कारो भवति । असत्ख्यातिमतमपि नोपपद्यते, शशशृङ्गवदत्यन्तासतः ख्यात्ययोगात् । नाप्यात्मख्यातिमतम्, तद्रीत्या आन्तर एव सर्पो दोषवशाद् बाह्य इव प्रतिभाति, तदप्यसङ्गतम्, वल्मोकादिस्थस्य सर्पस्यान्तरत्वे प्रमाणाभावात् । यदि वासनामयो हृदयस्थ एव सर्पो बाह्यत्वादवभासते तर्हि बाह्यरज्ज्वपेक्षा व्यर्थैवेति तदभावेऽपि सर्पभ्रमः स्यात् । न च बाह्यरज्जुदर्शन-सहकृत एवान्तरः सर्पो बाह्यवदवभासते 1 तद्दर्शने सर्पभ्रमस्यैवानुदयप्रसङ्गात् । न चान्तरं विज्ञानमेव वहिः सर्पवदवभासत इति वाच्यम्, सर्ववदेवेति नियमासङ्गतेः । तन्मते सर्वस्यैवान्तरत्वेन वाह्यार्थस्यैवाभावात् । सिद्धान्ते तु न बाह्यापलापः, किन्तु तन्मिथ्यात्वमेव । वस्तुतस्तु असख्यात्यात्मख्यातिवादिनो बाह्यानपहाय अख्यात्यन्यथाख्यातिसत्ख्यात्यनिर्वचनीयख्यातिवादिनः सर्वेऽपि वेदानां प्रामाण्यमूरीकुर्वन्ति । सर्वेऽप्यास्तिका आदरणीयाः । प्रामाण्यस्वतस्त्वविचारः ' द्वे विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च । तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद: ' ( मुण्डक ० ११११३-४ ) ' पुराण न्याय - मीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ ' ( याज्ञ ० स्मृ ० ११३ ), ' आन्वीक्षिकी star र्ता दण्डनीति शास्वती | विद्याश्चतस एवैता लोकसंस्थितिहेतवः ॥ ' ( का ० २१२ ) अत्र सर्वत्र विद्याशब्दस्य ग्रन्थपरत्वं विज्ञायते । श्रुतावकारान्तो वेदशब्द आद्युदात्तः, अन्तोदात्तम्बेति द्विधोपलभ्यते । प्रथमः शब्दराशिपरः, अपर: अल्पता का दर्शन नहीं होता । रज्जु को बहुत देरतक सावधानी से देखने पर भी उसमें दण्ड - सर्प आदि के रूपवेश का भी साक्षात्कार नहीं होता, वहाँ पर रज्जु के बनावट में लगे सतुयों की ही प्रतीति सूक्ष्म निरीक्षण करने पर होती है । अख्याति को वालों का मत भी सही नहीं है, क्योंकि खरहे की सींग की तरह अत्यन्त यत् पदार्थ की ख्याति ( ज्ञान ) हो ही नहीं सकती | इसी प्रकार आत्मख्याति मानने वालों का मत भी गलत है । उनके मत से मान्तर सर्प ही दोष के कारण बाहर वाला सा प्रतीत होने लगता है । यह भी असंगत बात है । चिह्न में बैठे हुए सर्प की स्थिति विज्ञान में है, ऐसा मानने से कोई प्रमाण नहीं है । यदि हृदय में विद्यमान वासनामय सर्प की ही बाहर प्रतीति होती है तो फिर इसकी प्रतीति में रज्जु को अपेक्षा रखना व्यर्थ है, यहि ऐसा मान लिया जाता है तो रज्जु के अभाव में भी सर्प का भ्रम होना चाहिए । यह कहना भी गलत है कि बाह्य रज्जु के दर्शन के सहयोग से ही वान्तर ज्ञान में विद्यमान सर्प को बाह्य सता के रूप में प्रतीति होती है, क्योंकि बाह्य रज्जु का यदि वर्तन हो गया तो सर्प का भ्रम पैदा हो कहाँ होगा? आन्सर विज्ञान ही बाहर सर्प के समान प्रतीत होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह बताइये कि उसकी सर्प की सी प्रतीति में होती है? इसकी संगति बैठाने के लिए जिस दिवस का सहारा लिया जाता है? atta f वज्ञानवाद के मत में सब कुछ आन्तर विज्ञान का ही विकास है, बाह्य अर्थ का कोई अस्तित्व है ही नहीं । वेदान्तों के मत में बाह्य वस्तु का पाप नहीं किया जाता, केवल इतना ही माना जाता है कि यह सब कुछ मिथ्या है । वास्तव में तो असख्याति औरआत्मख्याति मानने वाले शूत्यवादी और विज्ञानवादी वेदवाह्य बौद्धों के अतिरिक्त अध्याति अन्ययाक्ष्पाति, सत्ख्याति और अनिर्वचनीयख्याति को मानने वाले सभी दार्शनिक वेदों का प्रामाण्य मानते हैं । यतः वे सभी वास्तिक होने के कारण आदरणीय हैं । स्वतः प्रामाण्य की परीक्षा " दो प्रकार की विद्या जाननी चाहिये ---- परा और अपरा । इनमें अपरा विद्या के अन्तर्गत ॠग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और redda इतिहास - पुराण आदि है " इस गुण्डक वन में तथा -- " पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, छः अंगों सहित चार वेद, ये विद्या और धर्म के चतुर्दश स्थान हैं ", " आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और शाश्वत ( सभी कालों में स्थिर रहने वाली ) दण्डनीति इन चार fara से लोक की स्थिति बनती है " इन सब वचनों में विद्या शब्द ग्रन्थपरक प्रतीत होता है | श्रुति में अकारान्त वेदशब्द माधुदात
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वैवार्थपारिजातः ११६ कुशमुष्टिपरः । अनयोर्द्वयोर्वेदशब्दयोराद्युदात्तान्तोदात्तयोः सिद्धयर्थमेव पाणिनिनाऽपि उच्चादिगणे वृषादिगणे च वेदशब्दद्वयं पठितम् । कुशमुष्टिवाचको रूढः, तत्रावयवव्युत्पत्तेरसंभवात् । ग्रन्थराशिवाचकस्तु योगरूढः केवलयौगिकस्वीकारे ज्ञानेति-प्रसङ्गात् । अत एवालौकिकमर्थं यो वेदयति स वेद इति वेदलक्षणमुक्तमाचाय्यैः । पाश्चात्त्यैस्तु ख्रिष्टजन्मतस्त्रिसहस्रवत्स रपूर्वकाल एव वेदप्रादुर्भाव कालो मन्यते तच्च निष्प्रमाणमेव । यतः - इतो वर्ष -सहस्रद्वियात्पूर्वं भगवान् पतञ्जलिरासीत् । ततोऽपि प्राचीनो जैमिनिः । ततोऽपि प्राचीनतमः काशकृतिनः । कामकृत्स्तना प्रोका मीमांसा काशकृत्स्नी ( पा ० ४११११ ) इति महाभाष्येणावगम्यते । कात्यायनेनापि स्वग्रन्थे सद्यस्त्वं काशकृत्स्नरित्यु-क्तम् । पाणिनिकाल: ख्रिष्टजन्मत: पूर्व सप्तमी शताब्दीति पाश्चात्यैरङ्गीकृतम् । सत्यव्रतसामश्रमिणा व निरुत्तालोचने कलेरष्ट-म्यामेव शताब्द्यां ख्रिष्टजन्मतः प्राक् चतुर्विंशतिशताब्द्यामिममाय्र्यावर्तभूमि भूषयामास पाणिनिरिति बहुभिः प्रमाणैः साधितम् । सर्वथापि काशकृत्स्निर्वर्षसहस्रत्रितयात्प्राग् भूमिनिमासलचकार । तेन च वेदानामपौरुषेयत्वं साधितमेव भवेत् । यदि तेन वेदकर्ता श्रुतः स्यात्तदाऽवश्यं तेन तनिर्देशः कृतः स्यात् । यदि ततो वर्षसहस्रात्पूर्वमपि वेदा रचिता अभविष्यन्, तदा कथं नाम नास्मरिष्यन् तदानीन्तनाः । को नाम महान प्रतिबन्ध एषामासीत् स्वपूर्वकालिके महासपरिज्ञाने, येन ते समपरिज्ञाय वेदेऽपौरुषेयत्वं साधयन्ति, ' उक्तं तु शब्दपूर्वत्वम् ' ( ११११२ ९ जे ० ) इत्यत्र । ननु पौरुषेयत्वस्थ दौर्बल्यहेतुत्वाङ्गीकारेणापौरुषेयत्वसाधनाय कर्ताऽपह्वयत इति चेन्न, भागवतादिपौरुपेयग्रन्थेष्व-प्यादरातिशयदर्शनात् । और अन्तोदात्त इस तरह से दो प्रकार का मिलता है । प्रथम का अर्थ शब्दराशि और दूसरे का कुशमुष्टि अर्थ है । इन मायुदात्त और अन्तोदात दोनों वेद शब्दों के लिए पाणिनि ने भी उच्चादिगण और वृषादिगण में दो वेद शब्द पढे हैं । इनमें से कुटियाचक नद शब्द रूढ है, क्योंकि यहां पर अवयवों की व्युत्पत्ति के आधार पर यह अर्थ नहीं निकल सकता | ग्रन्थराशि का वाचक वेद शब्द योगरूढ माना पायगा, क्योंकि केवल यौगिक कहने पर इसका अर्थ ज्ञान भी हो सकता है, अतः अतिप्रसंग दोष की आपत्ति होगी । अर्थात् केवल ज्ञान को पेद मानने पर घटादि का ज्ञान भी वेद हो जायगा । इसीलिए बाबा ने वेद का लक्षण " जो भलोषिक अर्थ को बताता है " यह किया है । पाश्चात्य विद्वान् ईशा के जन्म में तीन हजार वर्ष पहले वेद का प्रादुर्भाव मानते हैं | इसमें कोई प्रमाण नहीं है ' ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर भी यह गलत है, क्योंकि नाज से दो हर वर्ष पहले भगवान् पतंजलि हुए । जैमिनि इनसे भी पहले हुए थे और G जैमिनि से श्री पहले दाचार्य कावकृत्स्न हो चुके थे, यह बात पातंजन महाभाष्य ( 1 १ । १ ) से ज्ञात होती है । काल्यायन भी अपने वार्तिक ग्रन्थ में इनको स्मरण करते हैं । पचात्य विद्वान मानते हैं कि पामिति का पत्र देशा पूर्व सातवीं शताब्दी है । निरुतालोचन में सत्यव्रत सामामों से तो कलियुग की आठवीं शताब्दी अर्थात् ईशा के जन्म के पूर्व नोवीस शताब्दी में पाणिनि ने इस वार्यावर्त भूमि को किया था, इस बात को अनेक प्रमाणों से सिद्ध किया है । किसी भी तरह से यह मानना ही पढ़ेगा कि आचार्य काशकृत्स्न तीन हजार वर्षं पहले हुए थे । इससे वेदों को अपौरुषेयता ही सिद्ध होती है । यदि कोई वेद का कर्ता उस समय सुना गया होता तो निर्देश छात्रायें काशकृत्स्न प्रभृति ने अपने ग्रन्थ में ब ata fear atar | यदि उनसे एक हजार वर्ष पहले भी वेदों की रचना हुई होती तो उस समय विद्यमान मनुष्यों को उसकी स्मृति क्यों न रहती? अपने पूर्व काल के इतिहास को जानने में आने के फोन सी नही arer ft fo जससे f वे वेद के कर्ता को नहीं जान पाये और वेद की अपौरुषेयता सिद्ध करने लगे, जैसा कि " उ राव " ( १ । १ । २ ९ ) इत्यादि जैमिति सूत्र में किया गया है । आप यदि यह कहें कि वेदों को पौरुषेय बताने पर उनके प्रामाण्य में दुर्बलता की आशंका के भय से उनको अपौरुषेय सिद्ध करने के लिए कर्ता को छिपाया जाता है, तो यह बात ठीक नहीं है, क्योंकि भागवत प्रभृति पौरुषेय ग्रन्थों में भी अतिशय आदरबुद्धि देखी जाती है और उनके कर्ता को छिपाया भी नहीं जाता ।
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१२० वेदार्थपारिजातः सर्वोऽयुत्सर्गः सापवाद इति नहि लौकिकशब्दसन्दर्भस्य पुरुषकृतत्वे वैदिकशब्दराशिनाऽपि तथैव भाव्यमिति समस्ति नियमः । प्रमाणेनोपलम्भाल्लौकिकशब्दराशीनां सकर्तृकता निश्चीयते । वैदिकेषु तु प्रयत्नेनान्विच्छन्तोऽपि न वेदकर्तारं ज्ञानगोचरतामापादयितुं शक्नुमः । न प्रमाणेनानधिगतोऽर्थः स्वमनीषया कल्पयितुं शक्यते । अतो वाक्यस्थ सकर्तृकत्वे उत्सर्ग-सिद्धेऽपि वैदिकशब्दे तदपोद्यते । यत्तु व्यासपैलादीनां वेदविभागकतृत्वमितिहासपुराणयोः श्रूयते, तदेकतयाऽवस्थितानां तेषां विभागे प्रपाठकानुवा-कादीनां पौर्वापर्यसन्निवेशकरणमात्रे पर्यवस्यति, न तु पदान्यथाकरणे मन्त्रान्यथाकरणे वा तेषामासीदधिकारः, यद्येतेषा-मन्यथाकरणेऽधिकारोऽभविष्यत्तहि शास्त्रादिवाधित्वाद्धेतोस्तदसमीचीनमभविष्यत् । यथा-गोमयं पायसं गव्यत्वात् क्षीरवत्, नरशिरःकपालं शुचि प्राण्यङ्गत्वात् शङ्खवत्, स्वस्त्री अगम्या स्त्रीत्वात् पर-स्त्रीवत् - इत्याद्यनुमानाभासान्यप्रमाणानि । साध्यहेत्वोर्व्याप्तिसम्बन्धस्य दृढतमत्वेन हेत्वाभास रहितान्येवानुमानानि ग्राह्याणि । पूर्वमीमांसकास्तु यत्र साध्यसत्त्वमूलकमेव हेतुसत्त्वं तत्रैव शुद्धानुमितिः, यथा धूमधूमध्वजयोः । अतादृशस्थले व्याप्ति-रेव न भवति । पूर्वोक्तानुमानाभासेषु क्वापि न हेतुसत्त्वं साध्यसत्त्वप्रयुक्तम् । कार्यकारणभावश्च क्वचिदप्राप्तप्रापको योग-लक्षणः, क्वचित् प्राप्तपालकक्षेमरूपः । अप्राप्तशरीरस्य प्रापको मातापित्रादिः, प्राप्तपालकं त्वाहारादिकम् । प्रकृते गव्यत्वस्य सत्त्वे पायससत्त्वमुभयथापि न कारणं भवति । सभी सामान्य नियमों का कहीं न कहीं विशेष नियम अर्थात् अपवाद मिल जाता है, इस न्याय के अनुसार शब्दसन्दर्भ पुरुष कृत है, यह सामान्य नियम लौकिक काव्य में तो लागू होगा, किन्तु वैदिक शब्दराशि को पुरुषकृत सिद्ध करने में वह समर्थ नहीं हो सकेगा, क्योंकि लोकिक शब्दराशि की सकर्तृकता का निश्चय अन्य प्रमाणों के आधार पर किया जाता है, इसके विपरीत वेद में प्रचरन पूर्वक अन्वेषण करने पर भी किसी वेद के कर्ता का ज्ञान हम नहीं कर पाते । जो वस्तु प्रमाणों से ज्ञात नहीं होती, उसकी हम अपने मन से कल्पना नहीं कर सकते । इसलिए वाक्य को सकर्तृकता यद्यपि सामान्य नियम से सिद्ध है, किन्तु वेद वाक्यों में इसका बाध हो जाता है । इतिहास पुराण में व्यास, पैल प्रभृति महर्षियों ने वेद का विभाग किया, ऐसा सुना जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि पहले वेद एक अविभक्त रूप से विद्यमान था । इन महर्षियों ने उ aer faare faar, sust ar त्पर्य केवल इतना ही है कि इनका पाठक, अनुवाक आदि रूप से पौर्वापर्य संनिवेश मात्र किया । इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इससे उनको किसी पद अथवा मन्त्र को बनाने का याद का अधिकार मिल गया, क्योंकि यह बात उन शास्त्र वचनों से बाधित है, जिनमें बताया गया है कि पूर्व कप की आनुपूर्वी के अनुसार ही उत्तर कल्प की वेद की आनुपूर्वी रहती है, उसमें एक भी वर्णं अथवा मात्रा का परिवर्तन नहीं होता । गोबर खीर है, क्योंकि यह दूध की तरह गाय से प्राप्त हुआ है, मनुष्य की खोपड़ी शुद्ध है, क्योंकि यह शंख की तरह हो प्राणी का अंग है, अपनी स्त्री भी गन्ध नहीं हैं, क्योंकि यह पर स्त्री के समान स्त्री है-- ये सब अनुमानाभारा है । साध्य और हेतु का जहां व्याति सम्बन्ध अत्यन्त दृढ हो चुका है ऐसे हेत्वाभास रहित अनुमान हो प्रमाण रूप से गृहोल हो सकते हैं । पूर्व मीमांसकों का तो कहना है कि जहाँ पर साध्य की सत्ता के आधार पर हेतु की सत्ता रहती है, वहीं शुद्ध अनुमिति होती है । जैसे कि धूम के द्वारा ! वह्नि की अनुमिति । उक्त प्रकार की स्थिति न हो तो वहीं व्याप्ति हो नहीं बनती । ऊपर बताये अनुमानाभासों में कहीं मी साध्यरात्य प्रयुक्त हेतु नहीं है । कार्यकारणभाव कहीं योग और कहीं क्षेम के रूप में रहता है । अप्राप्त की प्राप्ति योग और प्राप्त की रक्षा क्षेम कह-लाती है । अप्राप्त शरीर की प्राप्ति में माता - पिता की स्थिति योग के रूप में और बाहार की स्थिति प्राप्त शरीर के प्रतिपालक ( क्षेम ) के रूप में है । उपर्युक्त गलत अनुमानों में गव्यत्व प्रभृति की सत्ता में पायसत्व प्रभूति को योगक्षेम रूप उमयविध कारणता नहीं बनती । अर्थात् पायसत्व गव्यत्व की न तो उत्पत्ति में ही कारण है और न उसकी रक्षा मे ही ' । इसी प्रकार शुक्त्वि, अगम्यत्व आदि की सिद्धि शास्त्रवचन से होती है, इसमें प्राप्यत्व, स्त्रीत्व आदि की योगक्षेमता नहीं बनती । १. जैसे अग्नि ही धूप को उत्पत्ति में कारण है और उसकी रक्षा में भी । इसीलिए अग्नि ( साध्य ) को सिद्ध करने में धूम हेतु बन सकता है | किन्तु गव्यत्व, पावसत्व में ऐसा नहीं है । यदि पारसत्व ही गव्यत्व की उत्पत्ति में अग्नि के धूम की उत्पति में कारण की तरह कारण हो और पायसत्व ही गव्यश्व की रक्षा में भी कारण हो, तभी व्यस्थ हेतु से पासव को सिद्धि हो सकती है, किन्तु ऐसा है नहीं । इसी तरह दूसरे अनुमानाभावों में भी समझना चाहिये ।