वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 151–160
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 151–160
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वेदार्थपारिजातः १२१ पौरुषेयत्वानुमानेऽपि सैव दशा । न पौरुषेयत्वं येन केनचिदुच्चार्यमाणत्वमेव तथात्वे रघुवंशादेरप्यस्मदुच्चार्यमाण-त्वेनास्मत्प्रणीतत्वापत्तेः । किन्त्वाद्योच्चरितत्वेनैव पौरुषेयत्वम् । उच्चारणे आद्यत्वश्च स्वसजातीयोच्चारणानपेक्षत्वमेव । तथा च स्वसजातीयोच्चारणनिरपेक्षोच्चारणविषयत्वमेव पोरुषेयत्वम् । तत्सापेक्षोच्चारणविषयत्वं चापौरुषेयत्वम् । आकाङ्क्षा-योग्यता- संनिधिमत्पदकदम्बत्वमेव वाक्यत्वम् । एवंविधस्य विशिष्टपदसमृहत्वरूपहेतोरस्तित्वं पदसमूहोच्चारयितुः कस्यचि-त्पुरुषस्यासत्वेन सम्भवतीति स्वीक्रियते, परन्तुच्चारणस्य सजातीयोच्चारणनिरपेक्षत्वं तादृशहेत्वस्तित्वे कारणमिति न वक्तुं शक्यते । तादृशं निरपेक्षोच्चारणं विनाऽप्यध्याप्यमाने रघुवंशादिकाव्ये वाक्यत्वस्य दर्शनेन पूर्वोक्तनिरपेक्षोच्चारणं विनाऽप्युपपद्यमानवाक्यत्वं प्रति निरपेक्षोच्चारणस्य कारणत्वाभावस्यैव सिद्धेः । यद्विनाऽपि यदुत्पद्यते न तत्तत्कारणम् । रासभं विनोपपद्यमानस्य घटस्य रासभो न कारणम् । साध्यास्तित्वप्रयुक्त हेत्वस्तित्वस्य वक्तुमशक्यत्वेन व्याप्तेरदृढतया शिथिलमूलं पौरुषेयत्वानुमानम् । एवं साध्यास्तित्वहेत्वस्तित्वयोर्मध्ये प्रयोज्यप्रयोजकभावशून्यान्येव पौरुषेयत्वानुमानानि । अपौरुषेयत्वा-नुमानं तु निर्दुष्टमेव । विधिनिषेधयोः कस्तावदर्थं इति विचार्य्यमाणे प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतज्ञानविषयः कश्चिदित्यविवादमेव । विधिवाक्यार्यविचारः नव्यास्ताविकास्तु बलवदनिष्टाननुबन्धित्वविशिष्टकृतिसाध्यत्वविशिष्टेष्टसाधनत्वरूप एव विध्यर्थं इति साधयन्ति । प्राचीनताकिकास्तु आप्ताभिप्राय एव विध्यर्थः । यद्यपि बलदवनिष्टाननुबन्धित्वविशिष्टकृतिसाध्यत्वविशिष्टेष्टसाधनत्वज्ञान-मन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्रवृत्ति प्रति कारणमित्यत्र न विवाद:, तथाप्याप्ताभिप्रायज्ञानस्यापि परम्परया प्रवृत्तिकारणत्वमस्त्येव । पौरुषेयत्व के बवान की की यही स्थिति है । जिस किसी के द्वारा उच्चारित होना ही पौरुषेयत्व का प्रयोजक नहीं होता, क्योंकि ऐसा मानने पर रघुबंध प्रभृति ग्रन्थों का जब हम उच्चारण करते हैं तो वे भी हमारे द्वारा प्रणीत हैं, ऐसी आपत्ति होने लगेगी । किन्तु उस कृति का प्रथम उच्चारण जिसने किया है, वहीं उसका प्रणेता वाया जाता है । उच्चारण की प्राथमिकता का तात्पर्य यह है कि वह अपने वजातीय उच्चारण से निरपेक्ष होता है । इस तरह पीवेयत्व का अभिप्राय यह हुआ कि उसका विषय स्वराजातीय उच्चारण से निरपेक्ष उन्नारण है । दनके विपरीत जो इण्चारण स्वयजातीय उच्चारण की अपेक्षा रखता है, वह अपौरुषेय है । आकांक्षा, योग्यता और संनिधि से युक्त पदसमूह को ही वाक्य कहा जाता है । इस तरह के विशिष्ट पदसमूह रूप हेतु का अस्ति इस पदसमूह के उच्चारयिता पुरुष के अभाव में नहीं बन सकता, ऐसा माना जाता है, किन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उच्चारण की सजातीय उच्चारण से निरपेक्षता उस तरह के योगक्षेमात्मक हेतु के अस्तित्व में कारण है । इस तरह के निरपेक्ष उच्चारण के बिना भी जब रघुवंशप्रभृति काव्यों को पढ़ाया जाता है, तो उसमें वाक्यश्व की प्रतीति होती ही है | अतः पूर्वोक्त निरपेक्ष उच्चारण के बिना ही वाक्यत्व बन जाता है, अतः उसके निरपेक्ष उच्चारण को वाक्य का कारण नहीं माना जा सकता । जिसके बिना भी जो हो सकता है वह उसका कारण नहीं होता | वट रासभ ( गदहा ) के बिना भी बन जाता है, अतः घट के प्रति राक्षम की कारणता नहीं मानी जाती । प्रकृत स्थल में साध्य के अस्तित्व से प्रयुक्त हेतु के अस्तित्व को सिद्धि नहीं की जा सकती, अतः दृढ़ व्याप्ति नहीं बन पाती, फलतः पौरुषेयत्व के अनुमान का आधार शिथिल है । इस तरह से साध्य और हेतु के अस्तित्व के बीच में पौरुषत्व अनुमान में प्रयोज्य प्रयोजक भाव नहीं बन पाता । पोषेयत्व अनुमान तो निर्दुष्ट है, क्योंकि विधि और निषेध hra क्या है? इस प्रश्न पर विचार करते समय प्रवृत्ति और निवृति का कारणभूत कोई ज्ञानविषय ही निर्विवाद रूप से विधि और और निषेध का अर्थ होता है, यह निर्विवाद है । विधिवाक्यों के अर्थ का विचार नव्याकों के मत के अनुसार विधि का अर्थ ' बलवान् अनिष्ट ar ar तुस्पादक और अपने प्रयत्न से साध्य अपने इष्ट का साधक ही है, अर्थात् जिसको करने से कोई बलवान् अनिष्ट न होकर किसी ममोष्ट वस्तु की सिद्धि हो और जो अपने प्रयत्न से साध्य भी हो, a fafararta or वर्ष है । प्राचीन तार्किक आस व्यक्ति के अभिप्राय को ही fafe at a र्थ मानते हैं । यद्यपि यह बात ठीक है कि बलवान् अनिष्ट का अनुत्पादक और अपने प्रयत्न से साध्य तथा अपने इष्ट की साधनता का ज्ञान अन्वयव्यतिरेक के द्वारा प्रवृत्ति के १६
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१२२ वेदार्थपारिजात: अत एव स्वाध्यायमधीष्वेति श्रुत्वा सुधीर्वालक: --- अध्ययनं बलवदनिष्टाननुबन्धित्वविशिष्टमदीयकृतिसाध्यत्वविशिष्टेष्ट-साधनत्ववत्, मत्कर्तव्यतया मदीयाप्ताभिप्रायविषयत्वात्, यत्र यत्र व यत्कर्तव्यतया यदीयाताभिप्रायविषयत्वं तत्र तत्र तदीय-बलवदनिष्टाननुबन्धित्वविशिष्टेष्टसाधनत्यविशिष्टकृतिसाध्यत्वमिति व्याप्तेः । भ्रमप्रमादविप्रलिप्साकरणापाटवादिदोषराहित्य-मेवात्वम् । तेन भ्रान्ताज्ञायां न व्यभिचारः । तेन पठने कार्ये विशिष्टेष्टसाधनत्वमनुमिनोति बालकः, पठने च प्रवर्तत इति विशिष्टेष्टसाधनताज्ञानस्य प्रवृत्तिहेतुत्वे निर्विवादेऽपि पूर्वोक्तानुमितिरूपे तादृशज्ञाने हेतुभूतं ज्ञानं ( हेतुज्ञानं ) पूर्वोक्तरीत्या अभिप्रायज्ञानमेव भवति । तच्च पूर्वोक्तानुमितिद्वारा प्रवृत्ति प्रांत कारणमिति परम्परया प्रवृत्तिकारणीभूततादृशाप्ता-भिप्रायज्ञानविषयीभूतः पूर्वोकाभिप्रायोऽपि प्रवृत्तिहेतुज्ञानविषय एवेति कृत्वा विध्यर्थो भवति । अनन्यलभ्यस्यैव शब्दार्थत्वेन पूर्वोक्तस्थले आप्ताभिप्रायस्य विध्यर्थत्वाभ्युपगमे तद्वलेन इष्टसाधनत्वादिकं न तार्किकाभिप्रेतानुमानबलेन लब्धं शक्यत इत्यनन्यलभ्यमेव । नव्यरीत्या तु आप्ताभिप्रायरूपोऽर्थः कथमपि लब्धुं न शक्यः, विशिष्टेष्टसाधनत्यहेतुना आप्ताभिप्रेतत्वस्यानुमातु-मत्वात्, बहूनां कार्याणां स्वयमेवेष्टसाधनत्वमनुमाय तत्र प्रवृत्तिसम्भवात्, आप्ताभिप्रायस्य तत्र वक्तुमशक्यत्वात्, तत्रेष्ट-साधनत्वादेराप्ताभिप्रायेण सहानेकान्त्याच्च । तथा च आप्ताभिप्रायरूपोऽर्थोऽनन्यलभ्यः । तेन स एव विध्यर्थः । स चाप्ता-भिप्रायः प्रवृत्तिहेतुत्वात् ' प्रवर्तना ' इत्युच्यते, कार्यस्य प्रवृत्तेः कारणत्वाद् भावना चोच्यते । वाचकत्वसम्बन्धेन शब्द-प्रति कारण हैं, इसमें कोई विवाद नहीं है, तो भी समय का ज्ञान भी परम्परा से प्रवृत्ति के प्रति कारण होता ही है । इसी लिए ' वेद पढ़ो ' are पुरुष की च बात को सुनकर समझदार पलक इस प्रकार का अनुमान करता है कि वेद का अम्न मेरे लिए वा अनिष्टका हेतु नहीं है, मेरे प्रयत्न में साध्य हैं और मेरे इष्ट का भी साधन है, क्योंकि मेरे शुभ चिन्तक प्रामाणिक व्यक्ति ने मुझे इसको करने के लिए कहा है, जहाँ जहाँ पर नि व्यक्ति के कर्तव्य के रूप में उस व्यक्ति के शुभक्ति भक्ति में इस तरह की किसी are को करने का निर्देश दिया है वहाँ वहां पर यह बात उस उस व्यक्ति के लिए बिना किसी बलवान् जन को पैदा किये उसकी अभी वस्तु की सिद्धि में ही कारण हुई है । बास पुरुष का रूण यही है कि यह भ्रम, प्रमाद, विलिया ( ठगी की इ ), करापाटन ( इन्द्रियों की दुर्बला ) जादि दोषों से रहित हो । इससे भ्रान्त व्यक्ति की आज्ञा सात वचन नहीं की जायगी । ही सरह से बालक अध्ययन करने से मेरे विविध पष्ट की सिद्धि होगी, ऐसा अनुमान से नाता है, उनमें प्रबूत होता है । ल प्रकार विशिष्ट इष्ट - साक्षरता का ज्ञान निर्विवाद रूप से पि प्रकृति का कारण है, तो भी प्रति हे काम पूर्वोक पद्धति से बात के अभिजाय का शान हो जाना चारा बड़ी पूर्वोक्त अनुमिति के द्वारा अमृति प्रतिक है । इसलिए परकाश में प्रवृत्ति का कारणीभूत बाल के अभिनाष को जानने वाले बालक के ज्ञान विषयको के ही है, अतः यह भी विध्यर्थ माना जाता है । यह माना जाता हे हि भन्दा अनन्यस्म हो हो है, वर्षात् पितामथ वहीं कहा जा रायता के बिचको कि किसी अन्य प्राणों से प्राप्त न हो । इस नि के अनुसार कि स् में शाह के अभिप्राय को गति विवर्य माना जाता है तो यह ठीक ही है, क्योंकि तार्किक अभिमत अनुमान आदि में एष्टाधनताज्ञान वहाँ नहीं होता, अतः तय होने से आप्ता-fat fasar मानी जायगी, क्योंकि बी के आधार पर वह आये इष्टपात का ज्ञान करता है । नव्य नैयायिक की पद्धति से तो बाताभिप्राय प ग का शा किसी भी तरह से नहीं हो पाता क्योंकि विशिष्ट स्थाप मला रूप हेतु से प्ताभित्व का अनुमान नहीं किया जा सकता । स्वयं ही बहुत कार्यों की बनता का अनुदान कर वहाँ प्रवृत्ति मानी जा सकती है, वहीं पर आप्त के अभिप्राय का पता नहीं लग सकता | इस प्रकार यहाँ पर इष्टसाधनता की साभिप्राय के साथ नैतिकता है, अर्थात् नियत सात्र्यं नहीं है । इस प्रकार आता ftara er अर्थं ही है | इसलिए उसी को विध्यर्थं माना जा सकता है | यह आप्त का अभिप्राय प्रवृत्ति का हेतु है, अतः प्रवर्तना कहलाता है, यह कार्य की प्रवृति का कारण बनकर भावना हसता है । वाचकत्व सम्बन्ध से यह भावना शब्द में रहती है, अतः इसको शाब्दी भावना महते हैं । ' विधिनिमन्त्रणा ० ' इत्यादि पाणि f त सूत्रों से लिङ्, लोट्, तव्य, लक्ष्यत् इत्यादि प्रत्ययों की भावना रूप अर्थ में शक्ति का ज्ञान होता है । लोक में गुरु मुझे
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वेदार्थपारिजातः १२३ निष्ठत्वात् शाब्दी भावनेत्युच्यते, विधिनिमन्त्रणामन्त्रणेत्यादिसूत्रे तत्रैव शक्तिग्रहात् । लोके गुरुमं प्रवर्तयतीति व्यवहारवद् गुरुच्चरितलिङ्मां प्रवर्तयतीत्यपि व्यवहारो दृश्यते । तेन गुरौ लिङि तद्युक्ते वाक्ये तदावेदकपुरुषान्तरे च प्रवर्तकत्वमनु-गतम्, तेन प्रवर्तनावत्त्वमेव वाच्यम् । गुरौ समवायेनान्येषां तु तदभिधायकत्वतद्वाचकघटितत्वतद्वाचकोच्चारयितृत्वसम्बन्धेः प्रवर्तनावत्त्वं भवति । सम्वन्धाननुगमस्तु एको घट एकं रूपमित्यादि व्यवहारयोः समवाय सामानाधिकरण्याभ्यां तार्किकैरङ्गी-कृतत्वान्न दोषाय । न च पुरुषाभिप्रायस्य प्रवर्तक देऽपि लिङादोनां तदसिद्धत्वमिति वाच्यम्, ' निद्रालोकमिच्छामि ' इति कुम्भ-कर्णवरप्रार्थनावाक्ये कुम्भकर्णाशयविपरीतायाः शब्दगत्तप्रवर्तनाया अङ्गीकृतत्वात् । प्रतिज्ञावाक्यराजशासनवाक्यादीनां लौकिकप्रवर्तनाबोधकत्वं च लोके प्रसिद्धमेव । तादृशाभिप्राय राहित्येऽपि प्रतिज्ञावाक्यपारतन्त्र्येण त्रैलोक्यत्यागे हि बलिप्रवृत्ति-दृष्टेव । तादृशाब्दी भावनायाः कार्य्यभूता पुरुषप्रवृत्तिस्तु ' अर्थयते कामयते फलम् ' इति व्युत्पत्याऽर्थयितृपुरुषनिष्ठत्वादार्थी-भावनेति व्यवह्रियते । सेयमार्थी भावना मध्यवर्तीप्टसाधनत्वाद्यनुमितिजन्येति पूर्वोकशब्दभावनया सह तस्याः स्वज्ञानाधीनानुमिति-जन्यत्वरूपः परम्परासम्बन्धोऽपि तार्किकेरुपेयत एव । तथा च सर्वत्र विधिवाक्यस्थले विध्यर्थं भूतायामार्थभावनानां विध्यर्थ -भूताया शाब्दभावनाया अन्नयो भवतीति स्वीकारेण सर्वस्याद्विधिवाक्यादार्थभावना पूर्वोक्तसम्बन्धेन शाब्दभावनावती इत्येवान्वयबोधो भवति । पाकादेरन्वयव्यतिरेकाभ्यामिष्टसाधनत्वानुमानेन पाकमनुष्ठाय भोजने प्रवृत्तं देवदत्तं यदि कश्चन ' त्वं पच ' इति वदेत् तदा स लोके उपहास्यो भक्त्ति । तदेतन्नव्यरीत्या न सम्भवति । पाकः इष्टसाधनमिति तन्मतरीत्या वियर्थी भवति । प्रवृत्त करते हैं इस व्यवहार की भाँति गुरु के द्वारा उच्चरित भावनावाचक लिङ् लकार भुक्के प्रवृत्त कराता है ' इस प्रकार का भी व्यवहार देखा जाता है । इस प्रकार गुरु में, लिङ मे विड्युक्त वाक्प में और उसको बताने वाले दूसरे पुरुष में भी प्रवर्तकत्व की स्थिति अनुगत है । इसलिये इन सब में प्रवर्तता माननी पड़ेगी । यह प्रवर्तना गुरु में समवाय सम्बन्ध से और अन्य स्थलों में तदभिधाय-यत्व, तद्वाचणा - पटितत्व और तद्वाकोणामित्व सम्बन्ध से रहेगी । अर्थात् लिड में अभिधायक सम्बन्ध से, लिङ्युक्त वाक्य में वाचक-घटितत्व सम्बन्ध से और उस बाघ के उच्चारण करने वाले पुरुष में वाचक वाक्य के उच्चारयिता के सम्बन्ध से रहेगी । एक ही प्रकार के सम्बन्ध का अनुगम न होना कोई दोष नहीं है, क्योंकि एको घटः एकं रूपम् ' इत्यादि व्यवहारों की निष्पत्ति समवाय और सामा-नाधिकरण्य इन दो राज्यों से तार्किक भी मानते हैं । पुरुष के अभिप्राय में प्रवर्तकता मानी जा सकती है, लिङादि में प्रवर्तकता किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकती, यह कहना गलत है क्योंकि ' निहालोकमिच्छामि ' इस कुम्भकर्ण के वरप्राप्ति के अभिप्राय से कहे गये वाक्य में कुम्भकर्ण के आशय से विपरीत शब्दयत प्रदर्शन स्वीकृत है । प्रतिज्ञावाक्य, राज्यशासन के बाक्य यादि से लोक में लोकिक प्रवर्तना प्रसिद्ध ही है । बलि के द्वारा त्रिलोकी के राज्य के त्याग में प्रवृत्ति तो प्रतिज्ञा के पराधीन होने से ही हुई । अतः वहाँ पूर्वोत अभिप्राय के न रहने पर वो कोई अनोषित्व नहीं है । इस तरह की शाब्दी भावना से पैदा होने वाली पुरुष की प्रवृत्ति तो आर्थी भावना कहलाती है । क्योंकि वह फल को चाहने वाले पुरुष में रहती है । यह बार्थी भावना अर्थात् पुरुष प्रवृति मध्यवर्ती उष्टसाधनत्वादि अनुमिति से उत्पन्न होकर शाब्दी भावना से सम्बद्ध होती है । तार्किकों ने इस प्रकार सम्बन्ध कराने वाले परंपरा सम्बन्ध को भी स्वीकार किया । यह परम्परा सम्बन्ध स्वज्ञानाधीनानुमितिजन्यत्व-रूप ही है । अर्थात् विधि को सुनकर सभी पुरुष ' यह मेरी प्रवृत्ति के अनुकूल व्यापार बाला है ऐसा जानकर प्रवृत्ति के विषय में इट सत्य आदि का अनुमान कर प्रवृत्त होता है । अतः प्रवृत्ति का कारण दष्टसाधनत्व ज्ञान हुआ । स्वद्दष्ट साधनत्व, तज्ज्ञानाधीना अनुमति ' se after नम् ' | इस धतुमिति से जन्य है प्रवृत्ति अर्थात् आार्थी भावना | एवं न इस सम्बन्ध से आर्थी भावना शाब्दी भावना से विशिष्ट बन जाती है । arar ale व्यतिरेक के द्वारा पाक आदि की इष्टसाधनता को जानकर भोजन बनाकर खाने में प्रवृत्त देवदत्त को यदि कोई कहे कि ' तुम खाना बनाओ ' तो उसकी लोक में हँसी ही होगी । नव्य मत से यह परिहास संभव न होगा, क्योंकि उनके मत में विधि का
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१२४ वेदार्थपारिजात: तत्रोपहास्यता नोपपद्यते । मीमांसकरीत्या तुपपद्यते, यशार्थभावनारूपा पाके प्रवृत्तिः स्वयमेव पाकादेरिष्टसाधनतामनुमाय सम्पन्ना न विधिवाक्यश्रवणानन्तरमाप्ता भिप्रायरूपशाब्दीभावनामवगम्य तद्विषयत्वेन हेतुना पाकादेरिष्टसाधनत्वमनुमाय सम्पन्ना । प्रकृतस्थळे पुरुषप्रवृत्तिरूपार्थभावनायाः प्रकृतविधिवाक्यावगम्यमानशाब्दभावनया सह स्वज्ञानाधीनानुमितिजन्यत्व-सम्बन्धी नामात्रेणापीति कृत्वा मीमांसकरीत्या शाब्दबोधेऽङ्गीक्रियमाणे पूर्वोक्तविधिवाक्यात् शब्दम्बाभाव्याल्लभ्यमाना पूर्वोक्तसम्बन्धेन शाब्दभावनावती आर्थभावना इत्ययमर्थो मिथ्याभूत एवेति वक्तुरनृतवादितयोपहास्यत्वमेवेति तस्मादन्वय-व्यतिरेकाद्यनगतार्थत्वेन मीमांसकाभिमत एव विध्यर्थः । तथा च " स्वाध्यायोऽध्येतव्यः " ( श ० ११/५/६/३ ) इत्यध्ययनविधिरुक्तविधविध्यर्थज्ञानमन्तरेण क्रियमाणं धर्मानुष्ठानं विफलमेवेति वदन् मीमांसकानां मन्वादीनामद्ययावदनुवर्तमानधर्मानुष्ठानहेतुरित्यनुमिति तद्धेतुभूतमुक्तप्रवर्तनाज्ञानं वाऽनाहाय्र्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितनिश्चयरूपं गमयतीति मीमांसकैः प्रत्यक्षानुमानप्रामाण्यवादिनां शैली धर्ममूलविचारे परि-पात्यते । तथा च " स्वर्गकामो यजेत " ( ता ० प्रा ० १६ ३ ३ ) इति वाक्ये यागः स्वर्गसाधनम्, स्वर्गकामकर्तव्यतया आप्त-प्रवर्तनाविषयत्वादिति मन्वादिभिः क्रियमाणायामनुमितौ पक्षादिकं स्पष्टमेव । तत्र कीदृशं हेतुस्वरूपं पुरस्कृत्यानुमिति: क्रियते स्म इति विचारे हेतुज्ञानमनुमितेः प्राणास्तदत्र प्रवर्तनाविषयत्वहेतुकानुमाने त्रैविध्यं लोके दरीदृश्यते । अर्थ ' पाक इष्ट का साधन है यह होता है । यहाँ पर उपहास्यता नहीं बन सकेगी, क्योंकि खाना पकाना इष्ट का साधन तो है ही | फिर उसका उपहास कैसा? मीमांसक के मत में यह परिहास ठीक हो जाता है, क्योंकि यहाँ पर वार्थी भावना रूप पाक में प्रवृत्ति स्वयं ही पाक आदि को इष्टसाधनता का अनुमान करके होती है, विधिवाक्य को सुनने के बाद आसाभिप्राय रूप शाब्दी भावना की अवगति के ETE इसी को हेतु बनाकर पाक आदि की इष्टसाधनता का अनुमान करके नहीं । प्रकृत स्थल में पुरुष प्रवृत्ति रूप वार्थी भावना का प्रकृत विधि वाक्य से ज्ञात हो रही शादी भावना के साथ स्वज्ञानाधीत वनुमिति जम्यत्वरूप सम्बन्ध अणुमात्र भी नहीं है, क्योंकि विधिवाक्य के पूर्व ही देवदत्त पाक में इष्टसाधनत्व ज्ञान से प्रवृत हो गया है । बतः मीमांक पद्धति से पाब्दवो मानने पर पूर्वोक्त विधि वाक्य से वाब्द से स्वभावतः उपलब्ध हो रही पूर्वोक्त सम्बन्ध से युक्त शाब्दी भावना वाली आार्थी भावना है, इस प्रकार का अर्थ गचत है । वहाँ पर वक्ता गलत बात कह रहा है । बत: उपहास्य होता है । इस प्रकार विधि का मीमांसक संमत अर्थ ही सही है । जहाँ अम्बय-व्यतिरेक जादि से इष्टसाधनता का ज्ञान हो जाता है, वहाँ विधि मान्य ही नहीं है, क्योंकि अत्यन्त अप्राप्ति में ही विधि को प्रवृति होती है । इसी प्रकार स्वाध्याय ' का अध्ययन करना चाहिए इस विधि वाक्य में उक्त प्रकार के विधार्थ को बिना जाने किया गया धार्मिक अनुष्ठान व्यर्थ है, ऐसी प्रतीति तो होती ही है, साथ में ही यह भी मालुम होता है कि सीमांसकों और मनु प्रभृति के द्वारा प्रति-पादित धर्मानुष्ठान का बाज तक चला जा रहा कारण भी यह विधि वाक्य ही है । इस प्रकार इस हेतु वाक्य से अनुमिति और उसके कारणभूत प्रवर्तना ज्ञान को यह ममाहार्य अत्रामान्य ज्ञान से असंपृक्त होने के कारण निश्चयात्मक मानता है । मीमांसक गण धर्म के के सम्बन्ध में विचार करते समय प्रत्यक्ष और अनुमान इन दो प्रमाणों को स्वीकार करने वाले araft को तर्क पद्धति को हो मान्यता देते हैं: fro कर्ष यह निकलता है कि स्वाध्यायाध्ययन विधि के पूर्वोक्त विध्यर्थ ज्ञान के बिना वार्यमाण धर्मानुष्ठान निष्फल ही है, ऐसा कहते हुए मीमांसक एवं मनु आदि महर्षियों में आज तक प्रचलित धर्मानुष्ठान का कारण है और पूर्वोक्त अनुमिति एवं उसके हेतु-भूतपूर्वोक्त प्रवर्तना ज्ञान को अवगत कराता है, जो कि अनाहार्य और अप्रामाण्य ज्ञान से असंपृक्त होकर निश्चय रूप है, इस प्रकार arries a he f वचार में उस शैली का परिपालन करते हैं, जिसको प्रत्यक्ष और अनुमान प्रामाण्यवादियों ने अपनाया है । अत एक ' या की इच्छा वाला पुरुष यज्ञ करे ' इस वाक्य में याग य का साधन है, क्योंकि स्वर्गकाम व्यक्ति के कर्तव्य के रूप में आप्त प्रवर्तन का विषय है, इस प्रकार मनु प्रभृति के द्वारा किये गये अनुमान में पक्ष आदि स्पष्ट हैं । वे लोग किस प्रकार के हेतु के स्वरूप का सहारा लेकर अनुमिति करते थे, इस पर विचार किया जाता है, तो मालूम होता है कि अनुमिति में हेतु का ज्ञान ही मुख्य आधार है । ader fr षयक हेतु के अनुमान में लोक में तीन प्रकार देखने को मिलते हैं ।
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बेदार्थपारिजातः १२५ प्रभुशक्तिसमृद्ध राजाज्ञारूपप्रवर्तनाविषयत्वहेतुना इष्टानिष्टसाधनत्वे अनुमाय लोको नियमितो राजशासनेषु । तत्र हि हेतुतावच्छेदककोटी राजा, तस्य प्रभुशक्तिसमृद्धिथेति द्वयं वर्तमानतयाऽनुभूयमानमपेक्ष्यते । तदुक्कं भारविणा-अवन्ध्योपस्य विहन्तुरापदां भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः । अशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः ॥ अत्र हेतुतावच्छेदककोटी प्रवर्तकपुरुषनिष्ठप्रभुशक्तिरवश्यं ज्ञातव्या भवति । अयमेव प्रभुसंमित उपदेश: । द्वितीयस्तु - अनुमेयगतेष्टसाधनानिष्टसाधनत्वविषयकप्रमात्मकज्ञानवत्पुरुषसमवेत प्रवर्तना विषय त्वहेतुकानुमितिस्थले दृश्यते । यथा लौकिकातोच्चरितवाक्येषु । अत्र हेतुतावच्छेदककोटी प्रवर्तकपुरुषस्यानुमेयेष्टसाधनत्व विषयकयथार्थज्ञान-वश्यं ज्ञातव्यं भवति । केवलप्रवर्तनाविषयत्वं च तादृशस्थले प्रवर्तकस्य तादृशयथार्थज्ञानवत्त्वानिश्चयेऽप्रयोजकत्वशङ्का-safe शिथिलमूलमेव भवति । ' बुद्ध- मुहम्मद- यीशु ' इत्यादिप्रणीतधर्मेष्वयमेव प्रकार आदृतः । तृतीयस्तु वैदिकवावये एवादृतः, अनादिसिद्धसजातीयोच्चारणसापेक्षोच्चारणका नुपूर्वी सम्बन्धिप्रवर्तनाविषयत्वेन हेतुना हि यागादौ स्वर्गादिसाधनत्वमनुमीयते । मन्यादिभिः क्रियमाणायां धर्मानुष्ठानमूलभूतानुमितौ तृतीय एवं प्रकारः । Hearts प्रथितप्रभावा ऐतिहासिकैरप्यभ्युपेयन्ते । तेऽपि कर्तारं न स्मरन्ति, किन्तु ' प्रजापतिना वेदशब्देभ्यः सृष्टिः कृता ' इत्यपि वर्णयन्ति -- " वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् " इति । उपदेश सहकृतश्रावणप्रत्यक्षेणैव षड्जत्वादिविवेको जायते । तेन तत्समाहारात्मको गान्धर्ववेदोऽपि परम्परामूलक एव । एवायुर्वेदस्यापि संवादबाहुल्येन प्रामाण्यमेव, आवापोद्वापयोगानामानन्त्येन नान्वयव्यतिरेकमूलकं तज्ज्ञानं सम्भवति, प्रभुति से समृद्ध राजा की वाज्ञारूप प्रवर्तना वादय में वह इष्ट का साधन है या घनिष्ट का, इसका अनुमान कर लोक राजशासन से नियमित होता है, अर्थात् में राजाज्ञा का पालन करू, इसी में मेरा हित है, ऐसा जानकर ही लोक उसका पालन करते है । यहाँ पर इस राजाज्ञा के साथ राजा और उसकी समूह प्रभुशक्ति इन दोनों की भी अनुभूति साथ में ही रहनी चाहिए । जैसा कि भवि ने कहा ' अपराधी को कभी क्षमा न करने वाले और शरणागत की रक्षा करने वाले राजा के बध में प्रजा स्वयं हो जाती है । जिस राजा में प्रभुशक्ति की समृद्धि का faara नहीं हुआ है, उसके साथ न तो मित्रता करने से कोई लाभ है और न उसके शत्रु हो जाने से ही किसी को डर रहता है । इससे प्रतीत होता है कि प्रवर्तनवाद के साथ प्रवर्तक पुरुष में विद्यमान प्रभुशक्ति का ज्ञान अवश्य रहता है । इसी को प्रभुसंमित उपदेश कहते हैं । दूसरा प्रकार अनुमेय गत इष्ट साधनता अनिष्ट साधनता विषयक प्रभात्मक ज्ञान वाले पुरुष में रहने वाली प्रवर्तना को विषय बनाने वाले हेतु से जहाँ अनुमिति होती है, वहाँ देखा जाता है । जैसे कि लौकिक बास पुरुष के उच्चरित वाक्यों में । यहाँ पर हेतु-तावच्छेदक कोटि में अर्थात् हेतु की नियामकता में प्रवर्तक पुरुष अनुमेष इष्टसाधनताविषयक यथार्थ ज्ञान वाला है, ऐसा अवय जानना पड़ता है । ऐसे स्थलों में यदि यह निश्चय नहीं हो पाता कि प्रवर्तक पुरुष यथार्थ ज्ञान वाला है या नहीं, तो अप्रयोजक शंका से Safe हो जाने के कारण उस आप्त वाक्य की प्रवर्तन का मूल शिथिल हो जाता है । बुद्ध, मुहम्मद, यीशु प्रभृति के द्वारा उपदिष्ट धर्मो के सम्बन्ध में इस दूसरे प्रकार को ही स्वीकार किया गया है । atre artis के लिये तृतीय प्रकार माना जाता है । यहाँ पर याग नादि की स्वर्गसाधनता इसलिए मानी जाती है कि अनादि सिद्ध सजातीय उच्चारण की अपेक्षा रखने वाले उच्चारण को आनुपूर्वी से सम्बद्ध प्रवर्तना इन वेद वाक्यों के द्वारा प्रतिपादित होती है । प्रभृति के द्वारा की गई धर्मानुष्ठान की प्रमाणभूत अनुमिति में यह तृतीय प्रकार ही देखा जाता है । मनु प्रभृति अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति रहे हैं, यह बात आजकल के ऐतिहासिक भी मानते हैं । उनको भी वेद के कर्ता की मूर्ति नहीं है । वे तो कहते हैं कि " प्रजापति शब्दों की सहया से ही सृष्टि की " । यह भी कहा जाता है कि सम्पूर्ण वेद का अध्ययन गुरु परम्परा के सहारे ही आगे बढ़ता है " । षड्ज, ऋषभ नादि संगीत के स्वरों का विवेकज्ञान भी श्रावण प्रत्यक्ष के साथ किसी संगीतज्ञ के उपदेश के सहयोग पर ही निर्भर है | अतः इस ज्ञान को अपने में समेटने वाले गान्धर्व वेद का ज्ञान भी गुरु परम्परा पर ही आवृत है । इसी प्रकार आयुर्वेद का
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१२६ वेदार्थपारिजातः विषादी तथा करणेऽनर्थप्रसङ्गात् । तक्रकरकादीनामुष्णत्व शीतत्त्वे तु आगमगम्ये एव, विरुद्धसंयोगानां परिगणनदर्शनाच्च तदेव सिद्धयति । कुमारभृत्यादिकमपि प्रत्यक्षादिनाऽवगम्यमेव । पाश्चात्त्यचिकित्सापद्धतिरप्यायुर्वेदमूलिकैव । मन्त्रग्रामादि-बहुलो धनुर्वेदोऽपि तथाभूतगुरूपदेशपूर्वक एवं कार्य्यकारी आसीदितीतिहासादवगम्यते । अर्थशास्त्रेऽपि प्रधानतया विविच्य -मानस्वत्वं दायभागकृन्मते शास्त्रकगम्यम् । मिताक्षराकृन्मते प्रत्यक्षमपि शास्त्रीयोपायैरभिव्यङ्ग्यमिति तदपि न शास्त्रा-नपेक्षम् | अर्थशास्त्रप्रतिपाद्यो न्यायोऽपि शास्त्रोपदिष्टपरिपालनव्यवस्थारूप: शास्त्रसापेक्ष एव । महाभारते ब्रह्मणाऽर्थशास्त्र प्रणीतमितीतिहासो विद्यते, तेन तदपि वेदमूलकम् । तथा च वेदानां मनुष्यबुद्धयनधीनत्वमपौरुषेयत्वं च सिद्धयति । बेदा अपि स्वात्मानमपौरुषेयतया प्रकाशयन्ति " पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदृचुः " ( तै ० ब्रा ० ३ | १२ | ९ / २ ), “ वाचा विरूप-नित्यया " ( ऋ ० सं ० ८/७५/६ ) इत्यादिभिः । " यत्साक्षादपरोक्षात् " ( बृ ० उ ० ३/४/१ ) इत्यादि श्रुतिपादितमपरोक्षमपि ब्रह्मतत्त्वम् —'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः || ” ( श्वे ०६।२३ ) गुरूपदेशगम्यमेवेति वदति । " सं स्वोपनिषदं पुरुषं पृच्छामि " ( बृ ० ३१ ९ / २६ ) " नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ” ( तै ० ब्रा ० ३ | १२ | ९ | ७ ) इति वदन् गुरोरपि ब्रह्मज्ञानं वेदाधीनमेवेति ब्रह्मज्ञानमेव सर्ववेदतात्पर्य्यविषय इति वदन् सकलमेव वेदमपौरु-यं वदति, “ सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति " ( कठो ० ११२/१५ ) इति श्रुतेः । शौचाशौचयोः शब्दैकमृलकत्वेन तत्राप्यपौरुषेयत्व-प्रामाण्य भी रोगनिवृति के संवाद बाहुल्य को देखकर हो होता है । औषधियों के एक दूसरे में संयोग - वियोग " तो अनन्त है । इसलिए आयुर्वेद का प्रामाण्य अन्वयव्यतिरेक मूलक नहीं हो सकता, क्योंकि एक गोषत्र में विष मिलाने से लाभ हुमा, अतः दूसरी में भी विष मिला दिया जायगा तो अनर्थ ही होगा । मट्ठा और बरफ परिपाक में शीतवीर्य हैं या उष्णवीर्य, इनका ज्ञान शास्त्र से ही होता है । विरुद्ध स्वभाव के द्रव्यों के संयोग शास्त्रों में परिगणित हैं, इससे भी उक्त बात सिद्ध होती है । आयुर्वेद की कौमारभृत्य शाखा का ज्ञान भी प्रत्यक्ष से संभव नहीं है । पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति का आधार भी बायुर्वेद शास्त्र ही है । धतुर्वेद, जिससे कि अनेक प्रकार के सत्रों की सहायता ली जाती है, तदभिज्ञ गुरु के उपदेश में प्राप्त होने पर ही सफल हो पाता है, इतिहास पुराण आदि से यह ज्ञात होता है । वायभागकारके मत ' अर्थशास्त्र का प्रधान विमेच्य विषय स्वान है, इसका ज्ञान केवल शास्त्र से ही हो सकता है । मिताक्षराकार के मत में यह स्वत्व यद्यपि प्रत्यक्ष है, तो भी शास्त्रीय उपायों से अभिव्यक्त होने के कारण शास्त्र से अनपेक्ष किसी प्रकार नहीं माना जा सकता | अर्थशास्त्र का प्रतिपाद्य न्याय भी है, यह एक प्रकार के शास्त्र के द्वारा उपदिष्ट प्रजा के परिपालन, अर्थात् रक्षा की एक व्यवस्था है, अतः यहाँ पर मी शास्त्र की अपेक्षा है हो । महाभारत में बताया गया है कि ब्रह्मा ने राजशास्त्र | नीतिशास्त्र = अर्थशास्त्र ) की रचना की, इसलिये यह भी वेदमूलक ही है । इस प्रकार इन सब शास्त्रों के आधारभूत वेदों की अपीयता इसलिये सिद्ध हो जाती है कि इसकी रचना केवल मनुष्य की बुद्धि से नहीं हुई है । स्वयं वेदों में भी बनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे कि इनकी अपौरुषेयता सिद्ध होती है । " इन वेदों का उपदेश पूर्वजों ने अपने पूर्वजों से पाया है ", " इस निर्विकार नित्य वाणी से " इत्यादि अनेक श्रुतियाँ इसी विषय का प्रतिपादन करती हैं । " जो साक्षात् अपरोक्ष है, वह ब्रह्म है " इस श्रुति में प्रतिपादित a परोक्ष ब्रह्मतत्त्व भी " जिस व्यक्ति की देवता में भक्ति है और देवता के हो समान गुरु में भी भक्ति है, उसी महात्मा को उपनिषत् प्रतिपादित उक्त अर्थों का यथार्थ प्रकाश मिलता है " इस श्रुति के अनुसार गुरु के उपदेश से ज्ञान होता है । मैं उस उपनिषत्प्रतिपाय पुरुष के विषय में पूछता हूँ ", " उस बृहत् ब्रह्म को अवेदज्ञ नहीं जान पाता " इन श्रुतियों से ज्ञात होता है कि गुरु को भी वेदों के द्वारा ही बह्म का ज्ञान होता है । यह ब्रह्मज्ञान ही सारे वेदों का मुख्य प्रतिपाद्य है, ऐसा कहने से ज्ञात होता है कि यह सारा वेद अपोसथ है, " सारे वेद इस ब्रह्मपद का ही विवेचन करते हैं " यहाँ पर यही बात कही १. आ are अर्थात् fee औषधी में कितनी मात्रा में किस - किस ओषधी को मिलाने से क्या लाभ होगा और उहा अर्थात् fear arati feat मात्रा में कितने अंश को निकाल देने से क्या लाभ होगा, इस पद्धति का ज्ञान आयुर्वेद शास्त्र से होता है ।
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वेदार्थपारिजातः १२७ मेव सिद्धयति । वेदाध्ययनसामान्यादिति विहितवेदाध्ययनं ग्राह्यम् । सूर्यमण्डलस्याप्रक्षयो वेदप्रतिपादिताहुतिमूलकः, " वेदैरशून्यस्त्रिभिरेति सूर्य्य: " ( तै ० ब्रा ० ३ / १२ / ९ / १ ) इति मन्त्रवर्णात् । " ऋग्भ्यो जातं वैश्यं वर्णमाहुः " ( तै ० प्रा ० ३ | १२ | २ ९ | १ ) " वाचा विरूपनित्यया " ( ऋ ० सं ० ८७५१६ ), " ब्रह्म स्वयम्भ्वभ्यनात् " ( तै ० आ ० २१ ९ ) इत्यादिभिरप्यपौरुषेयत्वमेव । प्रामाण्यं त्वर्थगतसत्यत्वमेव । तच्च वेदान्तिमते " सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " ( तै ० उ ० २२१११ ) इति श्रुतिसिद्धसत्य-स्वरूपब्रह्मतादात्म्यवत्तयैव, ज्ञानमात्रे विषयस्य भानाभ्युपगमात् । स्वतः सिद्धमेव स्वतो ग्राह्यमित्युच्यते । भट्टमते तु काल-fine सत्यत्वम् । रात्यत्वं स्वतः सिद्धम्, “ न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यत्र काली न भासते " इति तदुक्तः । ज्ञानमात्रस्वप्रकाशता-वादिप्रभाकरमते ज्ञानविषयत्वरूपं सत्यत्वम् ज्ञानमात्रस्यैतद्रीत्या यथार्थत्वात् । अतो रजतभ्रमे सत्यतादात्म्यस्य स्वभावतः स्फुरणादेव रजतार्थिप्रवृत्तिः । पश्चाद्वाधकज्ञाने दुष्टकरणजन्यत्वशङ्कायां वा प्रातिभासिकरजतादी मिथ्यात्वग्रहात् पूर्वगृहीतं प्रामाण्यमपोद्यतं । एवं च प्राप्ताप्राप्तविवेके क्रियमाणे मिथ्यात्वेनाज्ञायमानरजतविषयज्ञानस्यैव शुक्तिरजतादिस्थले प्रवृत्तिहेतुत्व-मिति पर्य्यवमिले मिथ्यात्वेनाज्ञायमानत्वमेव प्रवृत्तिप्रयोजकमर्थंगतं सत्यत्वं यत्पूर्वमासीत्, तदेव कारणदोषबाधकज्ञानादि-सम्भवे प्रातिभासिकरजताद्विलुप्यति । भूतले घटानयनानन्तरं घटाभावस्येव मिथ्यात्वेन ज्ञायमानतादशायां तेन रूपेणाज्ञाय-मानतारूपस्य तदभावसमशीलार्धसत्यत्वस्यापि विलोपे न विप्रतिपत्तिः । नैयायिका अप्यप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितस्य शुक्तिरजतज्ञानस्य प्रवर्तकत्वं मन्यन्ते । प्रयोजककोटिप्रविष्टं तत्र ज्ञानगतमप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितत्वं वेदान्तिसम्मतेन मिथ्यात्वे नाज्ञायमानत्वरूपेणार्थगतसत्यत्वेन समानमेव । तथा च बाधक-गई है । धर्मशास्त्र प्रतिपादित शौच, अशौच आदि भी केवल शास्त्रमूलक हैं, अत: इनकी भी अपौरुषेयता सिद्ध होती है । " देवाध्ययन-सामान्यालु ' यहां पर निहित वेदाध्ययन गृहीत होता है । सूर्यमण्डल का जो सो क्षय नहीं होता, इसका कारण मेदप्रतिपादित बाहुतियाँ है । " सूर्य सपा तीनों वेदों के साथ चलता है " यह वैदिक मन्त्राण है । " म्यो जातं ", " वाया विरूप ", " या स्वयं ० " उत्वादिति भो वेदों की अस्पेक्ता को ही सिद्ध करती है । 1 अर्थगत सत्यता ही प्रमाण कहा जाता है । " सत्यं वाम " इत्यादि श्रुति से सिद्ध सत्य स्वरूप ब्रह्म के साथ तादात्म्य होने से ही वेदान्ती जनमान में अर्थात सत्यता का ज्ञान भागते हैं । इसलिये इसके मत से प्रमाण स्वतःसिह एवं स्वग्राह्य है । कुमरिल भट्ट के मत में सत्य की सिद्धि काल के अधीन है, अतः यहाँ पर भी पयस्य स्वतः सिद्ध है, क्योंकि कुमारिल का कहना है फिलो कोई भी प्रतीति नहीं है, जिसमें कि काल व भावित होता हो । " area साचने वाले प्रभाकर के मत में शाप का विषयमात्र सत्य है, क्योंकि इनके मत में सभी ज्ञान पदार्थ है 1. इस ियुक्ति में रजस का भ्रम होने पर सत्य के तादात्म्य का स्वतः स्फुरण होने से ही रतार्थी को प्रवृत्ति होती है । ज्ञाप पर क्या यह शंका होने पर कि कहीं यह ज्ञान ज्ञान हो जाने पर पूर्वगृहीत प्रामाण हट जाता सविषयक ज्ञान में मिथ्यात्व की प्रतीति नहीं पर मिथ्यास्वरूप से अज्ञात अर्थगत प्रवृत्ति का दुह कारणों से तो उन नहीं हो गया है, प्रातिभासिक रजतप्रतीति के सिवाय का है । इसमें दजतकी होती है कि नहीं, इस विदेश के नवरपर घिरा होती, वही प्रतीति तस्य में भी प्रवृत्ति का कारण बनती है ऐश भाव प्रयोजक जो सत्य पहने पा, यही कारणदोष, बाधज्ञान पाहि के होते पर प्रतिभासिक रजत से लुप्त हो जाता है, यह मानना पड़ेगा । भूतल पर पह के आने के बाद जैसे घटाभाव नहीं रहता, उसी तरह से जल की मिध्याप्रतीति होने पर रजत रूप में शास न होने वाले पदार्थ न स्वाद उसके अभाव के साथ ही मानना पड़ेगा, क्या पायाव के समान ही उसकी सत्यता का भी दिलोप हो हो जायगा, इसमें कोई विवाद नहीं है । नैयायिक अवमण्य ज्ञान असंपृक्त शुक्तिरक्त ज्ञान को प्रवर्तक मानते हैं, अर्थात् जब तक शुक्तिरजत ज्ञान अप्रमाण नहीं है, ऐसी बुद्धि होती है, तभी तक प्रवृत्ति होती है । इसलिये प्रवृत्ति में शुक्तिरजत के ज्ञान के साथ अप्रामाण्य ज्ञानवान होना ही प्रवृत्ति कराने वाला है । यहाँ नैयायिक का मत वेदान्सी के समान ही है, क्योंकि जैसे नेयायिक शुक्तिरजत ज्ञान को अप्रामान्य ज्ञान से अछूता कहता है, वैसे ही वेदान्ती मिथ्यारूप से बज्ञायमान कहता है । मिथ्याप से नहीं जाना गया, इसलिये उस ज्ञान के अर्थ में
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१२८ वैवार्थपारिजातः ज्ञानकारणदोषज्ञानादिभिर्नैयायिकमलेऽगि प्रवृत्तिप्रयोजकीभूताप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितत्वस्यापवादो निरपवाद एव । तथा च प्रामाण्यपरतस्त्ववादिभिर्नैयायिकः स्वतः प्रामाण्यपक्षे उद्भाव्यमानं दूषणं व्यर्थमेव । वेदान्तिरीत्या साक्षिप्रत्यक्षप्राह्यत्वात् संशयविपर्य्ययाद्यविषयत्वम् । नैयायिकमते तु प्रतियोगिस्मरणयोग्यानुपलब्धि-सहकृतमनोजन्यप्रत्यक्षविषयत्वसम्भवस्थले मनोग्राह्यत्वम्, असम्भवस्थलेऽपि संशयविपर्ययाद्यविषयत्वमेव । ज्ञानाज्ञानविषयत्व-सन्देहं प्रति ज्ञानाज्ञानयोः स्वरूपत एव हि तन्मते प्रतिबन्धकत्वम् । तदुक्तम् - " नहि जानलेव न जानामीति प्रत्येति " इति । अत्र जानन्निति अजानन्नित्यस्याप्युपलक्षणम्, न जानामीति च जानामीत्यस्याप्युपलक्षणम्, अनुभवतौल्यात् । भट्टमतेऽप्ययमेव न्यायः । तथा च सर्वमतेन मिथ्यात्वेनाज्ञायमानत्वस्य प्रवृत्तिप्रयोजकप्रामाण्यस्यासंदिग्धत्वरूपस्वतः सिद्धत्वेऽविप्रति-पत्तिरेव | नहि त्रिकालाबाधितत्वरूपं व्यावहारिकसत्यत्वं वा सर्वथाऽबाध्यरूपं वा परमार्थिकसत्यत्वं वा उत्पत्ती ज्ञप्तौ वा स्वतः सिद्धमिति वेदान्तिनो भाट्टाः प्राभाकरा वा वदन्ति तस्यातीन्द्रियकालत्रयघटितत्वेन वेदान्तिरीत्या साक्षिभास्यत्वा-सम्भवात् तदन्यरीत्याऽसंदिग्धत्वासम्भवाच्च परतस्त्वस्यैव तैरङ्गीकारात् । एवं च तदभाववति तदप्रकारकत्वरूपप्रमात्वस्य ज्ञानगतस्य प्रतिपत्रोपाधी वैकालिकनिषेधाप्रतियोगित्वरूपवेदान्तिमतसिद्धार्थंगतसत्यत्वसमशीलस्य परतस्त्वं नैयायिकैरुच्य मानं नापराधः तद्विषये उभयोरपि समानत्वात् । तथा चोभयमतरीत्या तदनुमेयमेव न साक्षिमात्रभास्यम् । तदनुमितिस्तु सत्यता है ही । इस तरह से बाधकज्ञान, कारणगत दोष आदि के द्वारा नैयायिक के मत में भी प्रवृत्ति के प्रयोजक अप्रामाण्य शाम से अछूतेपन का बाघ अपने आप हो जाता है, अतः प्रामाण्य का परतस्त्व मानने वाले मैमायिक का स्वतः प्रामाण्य के पक्ष में दोष का उद्भावन करना व्यर्थ है । वेदान्ती के मत में प्रामाण्य के साक्षी के प्रत्यय से गृहीत होने से उसमें संशय, विपर्यय आदि की संभावना नहीं रहती | तैयायिक तो प्रतियोगी ' स्मरण और योग्यानुपलब्धि सहहत मन से उत्पन्न प्रतक्ष की संभावना स्थल में मनोग्राह्यता मानी जाती है और जहाँ इसकी संभावना नहीं रहती वहाँ पर भी संशय विपर्यय नाहि की वियता नहीं बनती, क्योंकि नैयायिकों के मत में ज्ञान और अज्ञान विषयक सन्देह के प्रति ज्ञान और अज्ञान स्वयं ही प्रतिक माने जाते हैं । जैसा कि कहा गया है --- " जानते हुए ही नहीं जानता हूँ ऐसा बोध नहीं होता " । यहाँ पर जानन् पद ' अजान ' का उपलक्षण है और इसी प्रकार ' न जानामि ' भी ' जानामि ' का उपलक्षण है, क्योंकि इस प्रकार का अनुभव दोनों में समान है, मर्थात् जैसे जानते हुए ' नहीं जानता ' ऐसा ज्ञान नहीं होता, वैसे ही न जानते हुए ' जानता हूँ ' ऐसा ज्ञान भी नहीं होगा | कुमारिल भट्ट के मत में भी यही रीति है | अतः सभी के मत मिथ्यारूप से न जाने गये प्रवृत्ति के प्रयोजक प्रामाण्य का सन्देहरहित रूप स्वतः सिद्ध है, इसमें किसी की विप्रतिपत्ति नहीं है । वेदान्ती, मीमांसकों में भाट्ट एवं प्राभाकर ऐसा नहीं कहते हैं कि प्रामाण्य की उत्पत्ति या ज्ञति में तीनों कालों में अवाधित रहना व्यावहारिक सत्यता अथवा सर्वथा अवाचित रहना पारमार्थिक सत्यता स्वतः सिद्ध है, क्योंकि वेदान्तियों की रीति से यह अतीन्द्रिय कालय पटित होने से साक्षिभास्य नहीं हैं ( साक्षिमास्यता के लिए कालमय घटित होना बावश्यक नहीं है ) । मीमांसक मत की रीति से प्रामाण्य में असंदिग्धता का संभव न होने से परतत्व ही स्वीकृत किया जाता है । वसन्दिग्धता का अभाव संवादि प्रवृत्ति जनकत्व हेतु से निराकृत होने पर यह असन्दिग्ध है तो प्रमाण है । इस प्रकार प्रामाण्य का परतस्त्व ही सिद्ध होता है । जैसा कि तद्वति तत्प्रकारक ज्ञान प्रमा है, उसी प्रकार तदभाववति तद्प्रकारक ज्ञान भी प्रया है । इससे असंदिग्धता का संभव निराकृत हो जाने पर प्रामाण्य गृहीत होता है | अतः ज्ञानगत इस प्रकार के प्रमात्व को परतस्त्व व्यवहार करना नैयायिकों का उचित ही हैं, क्योंकि पूर्वोक्त प्रभाव काल-निषेध का प्रतियोगी नहीं है, अर्थात् कालत्रय - निषेध का प्रभात्व प्रतियोगी तब बन सकता है जब कि बाघ या सन्देह होकर यह ज्ञान प्रभा नहीं, ऐसा निषेध मिलता हो । जैसा कि वेदान्तियों के मत में सर्वथा अबाध्यत्व रूपी पारमार्थिक सत्यता ( अर्थात् सिद्ध अर्थत १. जो वस्तु बाहर मिल सकती हो, किन्तु मिल न रही हो और उसका स्मरण हो रहा हो, साथ ही मन से उसका agra संभव हो, वह मानसिक ज्ञान का विषय बनती है, ऐसा नैयायिक मानते है ।
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देवार्थपारिजातः १२६ संवादिप्रवृत्तिजनकत्वादिभिरुभयमतेऽपि कर्तव्यैन । ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादिवाक्यजन्यबोधे ऐहिकदेहानुभोग्यपारलौकिक-सुखसाधनताविषयकसंवादिप्रवृत्तिजनकत्वस्य हेतोर्ज्ञानं कस्यापि न सम्भवतीति तादृशबोधस्य त्रिकालाबाध्यवस्तुविषयकत्वं कथमनुमेयमित्यंशी विमर्शनीयः । संवादिप्रवृत्तिविषयत्वेन हेतुना त्रिकालाबाधितविषयकत्वरूपं प्रामाण्यमनुमीयत इति वदतां नैयायिकानामेकमात्रे-ानेनैव हेतुना त्रिकालाबाध्यवस्तुविषयकत्वमनुमेयमिति नाशयः, ' इयं पृथिवी ' इति ज्ञाने हि प्रामाण्यं गन्धवद्विशेष्यकत्वे सति पृथिवीत्वप्रकारकत्वेन हेतुनाऽप्यनुमीयत इति हि ते वदन्ति । तथा च संवादिप्रवृत्तिजनकत्वं प्रामाण्यानुमितौ हेतुरिति तेषामभिधानं यथासम्भवमन्येषामपि हेतुनामुपलक्षणमित्येव तेषामाशयः । अतः स्वर्गकामादिवाक्यजन्यज्ञानसाधारण्येन व्यावहारिकसत्यत्वानुमानहेतवः के वा सम्भवन्तीति विमृश्यते । तत्र नैयायिकमते ज्ञानसामान्य एव विशिष्टविषयकत्वं नाम अग्रे विवक्ष्यमाणस्वरूपप्रामाण्यचिह्नं स्वतो ग्राह्ये स्वीकृतमस्ति । यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिप्रतिबन्धकत्वं तत्त्वं हेत्वाभासत्वम् । पर्वतो बह्निमान् धूमादिति सद्धेतुस्थले ' पर्वतोभाववान् ' इति प्रमात्मकज्ञानमादायानुमितिप्रतिबन्धकीभूतवादृशज्ञानविषयत्वस्य प्रमाविषयीभूते पर्वतादी सत्त्वा दतिव्याप्तिमा यद्विपयत्वव्यापिका प्रकृतानुमितिप्रतिबन्धकता तत्त्वं हेत्वाभासत्वमिति परिष्कारेणाऽतिव्याप्तिपरिहारः । पर्वतविषयत्वस्य पर्वत ह्रयभाववानिति यत्किञ्चिज्ज्ञानस्यानुमितिप्रतिबन्धकत्वेऽपि पर्वत विषयकाणां बहूनां ज्ञानानां पर्वत मात्र पर्वतो धूमात्र, पर्वतः पाषाणमयः -- इत्यादीनामनुमित्यप्रतिबन्धकत्वेन लक्षणे यत्पदोपादेयपर्वतविषयकत्वं तादृशबहुज्ञानसाधारणं प्रति अस्तु, इति प्रतिबन्धकतायास्तादृशबहुज्ञानव्याप्तेर्व्यापकत्वासम्भवात् । त्यता ) है उसी के समान यह भी है । इस मे नैयायिकों का ज्ञानगत प्राण्य में परतस्य कहना अपराव नहीं है । जब कि ' यह ज्ञान भूत भविष्यद् वर्तमान कालों में अनाषित विषयक प्रामाण बाला है अथवा सर्वथा अवादित विषयक प्रामाण्य बाला है ' सिद्ध करने के लिए संवादिप्रवृत्तिजनकत्व को हेतु मानना अनिवार्य हैं, तब दोषों को समानता भाती हो है । दोनों में यह अनुमेय ही हैं, साक्षिभाय नहीं है । इस प्रकार की पद्धति स्वर्गकाम आदि वेद वाक्यों ये उत्पक्ष शाप में नहीं हो सकती है, क्योंकि यागजन्य स्वर्ग आदि फल अलोकिक है, इस शरीर से वे उपभोग करने की स्थिति में नहीं है । पारलोकिक सुख साधन के विषय में संवादिप्रवृत्तिजनकत्व हेतु का ज्ञान असंभव है । अतः वेदवाक्यजन्य गोध में कायावाच्यवस्तुविमकत्व ( अर्थात् यह ज्ञान तीनों कालों में बबाध्य वाषित नहीं होने वाले वस्तु को विषय बनाता है ) कैसे अनुमेय हो सकता है? यह अंधविमर्शनीय है । नैकों का यह मान नहीं है कि ज्ञानगत प्रामाण्य का अनुमान एकमात्र संचादिप्रवृत्तिजनकत्व हेतु से ही करता है । स्थल के अनुसार वह हेतु मित्र भी है । जैसा कि ' यह पृथ्वी है ' ज्ञान में हेत्वन्तर से ही प्रामाण्य अनुमित है । गन्धवत्ता को विशेष रखते हुए पृवित्रीत्य विशेषण हो, इस हेतु से प्रामाण्य का अनुमान है । इसी प्रकार वाक्यवन्य ज्ञान में प्रामाण्य ' आसोचारित्व ' हेतु से अनुमित होता है । यतः प्रामाण्य की अनुमिति में संवादिप्रवृत्तिजनकत्व हेतु अन्य हेतुवों का भी उपलक्षक है । अब यह विमर्श करना आवश्यक है स्वास वाक्य में उत्पन्न ज्ञान में वह साधारण हेतु कौन है, जो व्यावहारिक सत्यता का अनुमान कर सकेगा । सभी प्रकार के ज्ञानों में चाहे प्रत्यक्ष मे हो वा अनुमिति हो या शब्द हो, सब जगह प्रामाण्य का एक चिह्न माना है जो ' विशिष्ट ' कहलाता है । इस अनुमितजन्य ज्ञान में विशिष्टविषयकत्वरूप प्रामाण्य चिह्न की सिद्धि के लिए निष्कृष्ट हेत्वाभास लक्षण का मूत्र में पूज्य स्वामी जी ने विस्तृत रूप से विचार किया है । हेत्वाभास सामान्य का यह लक्षण है --- ' याहा विशिष्टविषयकत्वेनानुमितितत्कारणान्यतरतिबन्धकत्वं तत्वं हेत्वाभासस्यम् ' । इस क्षण के द्वारा fro कर्ष निकलता है कि सभी यथार्थं ज्ञानों में शुद्ध विषय के अतिरिक्त अन्य भी विषय विशेषण रूप से अनुमान हैं । tana aane frfu ष्ट ferre fea होता है । एक दो उदाहरणों में विशिष्टजिषयकत्व दिखाया जाता है- ' पर्यंत वह्निमान् है ' इस अनुमिति में ' पर्वत वह्निविरहित है ' ऐसा यत्किचिज्ज्ञान होने पर वह अनुमिति का प्र free हो जाता है, किन्तु पर्वत को विषय रखनेवाले ' पर्वत पाषाणमय है '
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१३० वेदार्थपारिजातः पुनम् - ह्रदो वह्निमान् धूमादित्यादिस्थले साध्याभाववत्पक्ष रूपबाधहेत्वाभासस्य वह्न्यभाववद्ह्रदादेर्यत्पदेनोपादाने " विशिष्टं शुद्धान्नातिरिच्यते " इति न्यायेन तादृशह्रदविषयकत्वस्य शुद्धह्रदविषयकेषु हृदो जलवान् मीनवान् शैवावान् इत्यादिषु बहुषु ज्ञानेषु विद्यमानतया, अनुमितिप्रतिबन्धकत्वस्य च पूर्वोक्तरीत्येव तादृशबहुज्ञानावृत्तित्वेनाव्यापकतया यद्वि-पयत्वव्यापिका प्रकृतानुमितिप्रतिबन्धकता नास्तीति लक्षणानुपपत्तिमाशङ्कय यद्विषयत्वपदेन विशिष्टविषयकत्वमेव लक्षणे विवक्षितम् । गूढार्थतत्त्वालोकक्रोडपत्रिकायां सर्वनैयायिकसम्मतोऽयमर्थ उक्तः । अस्ति च यथार्थज्ञानमात्रे शुद्धविषयत्वा-दन्यद्विशिष्टविषयकत्वमनुभूयमानम् । ' ह्रदो वह्रयभाववान् ' इति ज्ञानानन्तरं ' वह्न्यभाववद्ह्रदमहं जानामि इति पूर्वोत्पन्नं ज्ञानं प्रत्यवमृश्यते । तदेव विशिष्टविषयतायां प्रमाणम् । तथाहि-- पर्वतो वह्न्यभाववानिति भ्रमानन्तरं तस्य भ्रमत्वाज्ञान-दशायां यद्यपि ' भाववन्तं पर्वतमहं जानामि ' इति प्रत्यवमर्शो यथार्थज्ञानपरामर्शेन तुल्य एव, तथापि भ्रमत्वे ज्ञाते तादृशपरामर्शो न भवत्येव, पर्वतं वह्नयभाववत्तया जानामीत्येव वदन्ति लौकिकाः । तेन विशिष्टविषयकत्वपरामर्शो भ्रमत्वा-ज्ञानदशायामेव जायते । अन्यथा तु न भवति । भ्रमत्वाज्ञानरूपदोषवशाद् वह्न्यभाववत्पर्वतमहं जानामीत्याकारको विशिष्टविषयकत्वावगाही परामर्शो दोषजन्यत्वाद् भ्रमरूप एव । ' हृदो बह्न्यभाववान् ' इत्यादि यथार्थज्ञानेषु तु वह्रयभाव-वदमहं जानामीति परामर्शस्याबाधाद् विशिष्टविषयकत्वसिद्धिनिष्प्रत्यूहेति । ' अजमहं जानामि ' इति विशिष्टविषयकेऽपि धूर्तत्रयवाक्यैर्दुर्बलविषयेऽप्रामाण्यमुत्पाद्यते । तत्र यथा गृहीतमपि विशिष्टविषयकत्वं ज्ञानगतमप्रामाण्यं ज्ञानेऽतितिरोहितं भवति, न पुनर्नास्त्येवेति तादृशज्ञानस्य यथार्थत्वे विशिष्टविषकत्वा-नपायात् निर्दुष्टकरणजन्यतया यथार्थज्ञानमात्रस्य विशिष्टविषयकत्वमस्तीति । तथा च ज्ञानप्रामाण्यस्थलेऽपि पूर्वोक्तरीत्या तत्तन्मतानुसारेण सत्तादात्म्यकालसम्बन्धित्वादिसत्यत्वविशिष्टविषयकत्वं ज्ञानसामान्यसामग्री प्रयोज्यत्वम्, मिथ्यात्वेनाज्ञायमानविषयकत्वं च दोषज्ञानाभावबाधकज्ञानाभावप्रयोज्यमित्युभयं तत्प्रवृत्ति-प्रयोजकमिति रीत्या पूर्वोकाभावज्ञानद्वय सहकृतज्ञा नसामान्यसामग्रीजन्यज्ञानत्वे तद्विषयत्वव्याप्तिरुत्सर्गरूपा । तदुक्तं भट्टपादैः-' पर्वतमाला है ' इत्यादि ज्ञान पूर्वोक्त अनुमिति के प्रतिबन्धक नहीं हैं, अतः अनुमिति का विषय पर्वत पूर्वोक्त थोक ज्ञानों का साधारण विषय हो जाने में यरिञ्चिज्ज्ञान के द्वारा अनेक ज्ञानों की व्यावृत्ति नहीं हो सकती । अर्थात् यत्किञ्चिज्ज्ञान प्रतिबन्धक नहीं हो सकता । इस प्रकार हेत्वाभास में अतिव्याति का परिहार बन जाता है । इसी प्रकार नहीं पक्ष साध्याभाववान् होने से बाध हेाभास है, जैसा कि ' तालाब महिवाला है, घून होने से यहाँ तालाब वह्नि मे विरहित है, ऐसा ज्ञान होकर ' बह्नि से विरहित तालाब का मैं अनुभव करता हूँ इस प्रकार परामर्श होता है तो यही ज्ञान fafe free में प्रमाण है । यही प्रामाण्य का चिह्न है । बकरे के साथ जाते हुए व्यक्ति को ' बकरे को मैं जानता हूँ ' ऐसा विशिष्ट विषयक ज्ञान होने पर भी कई पूतों के अनेक वाक्यों से अपने ज्ञान में सूक्ष्म रूप से अप्रामाण्य बुद्धि रहती ही है! यह ज्ञान भी विशिष्ट विषयक ही है । इस तरह से यह सिद्ध होता है कि यथार्थ ज्ञानों में शुद्ध विषय से अतिरिक्त अन्य भी विषय विशेष रूप से अनुभूयमान हैं । इसी प्रकार वेद वाक्य द्वारा उत्पन्न यथार्थ ज्ञान भी अप्रामाण्य शंका से कबलित होने पर सफल नहीं बनता है तो मिथ्या-रूप से ज्ञायमान होते हुए भी अर्थात सत्यता को मानने पर वह अप्रामाण्य शंका का अपवाद बन जाता है | प्रामाण्य के विशिष्टविषयकत्व चिह्न है । नैायिकों की रीति से विशिष्टविषयकत्व रूप प्रमावि ज्ञानगत अप्रामाण्य शंका का अपवाद बन जाता है । मतः ज्ञानगत प्रामाण्य स्थल में भी पूर्वोक्त रीति से अर्थगत सत्तादात्म्य कालसम्बन्धित्वादि सत्यता आदि विशिष्ट विषयकता ज्ञान सामान्य सामग्री प्रयोज्य है, एवं मिथ्या रूप से वशायमान विषयकता दोषज्ञानाभाव तथा बाधक ज्ञानाभाव प्रयोज्य है । अर्थात् जहाँ जहाँ ज्ञान सामान्य सामग्री है वहाँ वहाँ अर्थगत पूर्वोक्त सत्यता विशिष्टविषयकता है, एवं जहाँ जहाँ दोष ज्ञानाभाव तथा बाधक ज्ञानाभाव है, वहाँ affair रूप से अज्ञायमानविषयकता रहेगी । इस प्रकार ये दोनों प्रामाण्य की प्रवृत्ति के प्रयोजक हैं | इसरीति से दो एवं