वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 161–170

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 161–170

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वेदार्थपारिजातः १३१ तस्माद्बोधात्मकत्वेन प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता । अर्थान्यथात्वहेतुत्थदोषज्ञानादपोद्यते । ( चो ० सू. वा. ५३ ) त्रिकालाबाध्यवस्तुविषयकत्वस्य प्रमात्वस्य सिद्धिरपि प्रोक्तयुक्त्यैव सिद्धयति । तथाहि-- मिथ्यात्वेनाज्ञायमानवस्तु-विषकत्वस्य पूर्वोक्तरीत्या सिद्धौ विशिष्टविषयकत्वरूपं न्यायसम्मतमपि प्रामाण्यचिह्नं व्यज्यते, विशिष्टविषयत्वस्य तादृशप्रमात्व-व्याप्यतायामव्यवस्थापितत्वात् । अनभ्यासदशायां ' इदं ज्ञानं प्रमा न वा ' इति संशयानुपपत्तिः, प्रामाण्यस्य स्वतो ग्राह्यत्वोः । सत्त्वेऽपि विशिष्टविषयत्वरूपप्रामाण्यचिह्नस्य स्वतोग्राह्यत्वे कस्याप्यविवादात् । अप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितज्ञानमात्रे प्रत्यव-मृश्यमाणस्य तस्य चिह्नस्य त्रिकालाबाध्यवस्तुविषयत्वानुमापकत्वेऽविवाद एव । सर्वेषां तादृशविशिष्टविषयत्वेऽनुभूयमानेऽपि यदि देवाद व्याप्तिसंस्कारस्यानुद्बोधः, तदा तत्कल्पितस्य चिह्नस्यापि प्रामाण्यानुमित्यपर्याप्ततया अनभ्यासदशायाम् ' इवं ज्ञानं प्रमा न वा ' इति संशयोत्पत्तिः । ' } बानिश्चयः कारणदोषनिश्चयश्च प्रामाण्यापवादकारणम् । श्रुतिजन्ये तत्प्रयोज्ये वा यागादिनिष्ठस्वर्गसाधनताज्ञाने पूर्वोक्तावादकयोरभावात् प्रामाण्यमेव । प्रतियोगिग्रहणसमर्थस्यैव तदभाववोधकत्वस्य रसाभावादेश्चक्षुरादिक्रियाग्राह्यत्वोप पत्तये वक्तव्यत्वेन यागनिष्ठस्वर्गसाधनत्वाग्राहिणः प्रत्यक्षप्रमाणस्य तदभावबोधकताया वक्तुमशक्यत्वात् । एवं प्रत्यक्षमूलकानु-मानादीनामपि तदभावसाधकत्वासम्भवः । दोषज्ञानमपि निश्चयात्मकं श्रुतिजन्ये बोधे न सम्भवत्येव । तज्जन्यबोधस्य भ्रम-स्थले निश्चित एव भ्रमात्मकं निश्चितकार्य प्रत्यन्वयव्यतिरेकादिना कल्प्यमानस्य कारणविशेषस्य भ्रमजनकत्वरूपदोषत्वं नियेतव्यम् | भ्रमस्यासंप्रतिपत्ती कुतस्त्या दोषजन्यत्वनिश्चितिः? दुष्टकरणजन्यत्वनिश्चयस्तु तर्कविरुद्ध एव । arunararara f वशिष्ट ज्ञानसामान्य सामग्री से उत्पन्न ज्ञान में तद्विषयकत्व व्याप्ति उत्सर्ग सिद्ध है । इसी बात को भट्टपाद में ' तस्माद बोधात्मकत्वेन ' इत्यादि कारिका से कहा है । तीनों काल में बाधित न होनेवाली वस्तु के ज्ञान की सत्यता की सिद्धि भी इसी युक्ति से होती है । जैसे कि पूर्वोक्त रीति से मिथ्यात्व रूप से अप्रतीयमान वस्तु विषयक ज्ञान की सिद्धि होने पर व्यायसंमत विशिष्ट विषयकत्व रूप प्रामाण्य का चिह्न afe हो जाता है, क्योंकि उस प्रकार की विशिष्टविषयता उस प्रकार की प्रमात्व की व्याप्ति के लिये स्थापित है । अनय-दक्षा में ' यह ज्ञान मा है या नहीं? इस तरह के संशय की उपसि नहीं जानती, क्योंकि प्रामाण्य की स्वतः ग्राह्यता बताई गई है । विशिष्टविषयता रूप प्रामाण्य चिह्न की स्वतःयहाता में किसी प्रकार का विवाद दार्शनिकों में नहीं है | प्रामाण्य ज्ञान से अछूते ज्ञानमात्र से उस चिह्न का परामर्श होने के कारण त्रिकाल में बाधित न होनेवाली वस्तु के अनुमान कराने में कोई विवाद नहीं है । सभी को इस प्रकार का विशिष्टविषयक अनुभव होते हुए भी यदि किसी आकस्मिक कारण से व्याप्ति के संस्कार न जगें तो उससे कपि विष भी प्रामाणिक अनुमान के लिये अपर्याप्त होने के कारण अनभ्यास दशा में ' यह ज्ञान प्रमा है या नहीं? " इस प्रकार का संशय उत्पन्न हो सकता है । ara का निश्रय और कारण में दोष का निश्चय प्रमय के ाद के कारण हैं । वेदवाक्य से होने वाले ' वादि स्वर्ग के साधन हैं ' इस ज्ञान में पूर्वोक्त दोनों अपवादों के अभाव के कारण ध न होने से arr कारण दोष का न होने से प्रमाण ही है । इसके भाव का भी ज्ञान रखना है मित्र नेत्र आदि इन्द्रियों के द्वारा नहीं होता, अत: यह नियम मानना आवश्यक है कि जिस विषय का ज्ञान जो इन्द्रिय कराती है, वही इन्द्रिय उसके जमाव का भी ज्ञान करानी है । इस नियम के अनुसार क्योंकि ' are eaf का साधन है ' इस बात का ज्ञान किसी भी इन्द्रिय द्वारा होनेवाले प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं होता, अतः ' याम स्वर्ग का साधन नहीं है ' इस बात का ज्ञान भी किसी भी इन्द्रिय द्वारा होनेवाले प्रत्यक्ष ज्ञान से नहीं हो शकता, क्योंकि इन्द्रियों उसी विषय के अभाव का ज्ञान करा सकती हैं, जिस विषय का स्वयं ज्ञान करा सकती हो । इसी तरह से प्रत्यक्ष अनुमान प्रादि प्रमाणों में tatara नहीं fra fear at सकता । निश्चयात्मक दोषज्ञान भी वेदवाक्यों से होनेवाले ज्ञान में सम्भव नहीं है | art से होनेवाले ज्ञान का भ्रम स्थल निश्चित हो जाने पर ही अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा कल्पित किसी कारण विशेष को भ्रम का tre free दोष कहना पड़ेगा, किन्तु जब भ्रम की कहीं प्रतीति नहीं होगी, तो उसके आधार पर दोषजन्यता का निश्रय कैसे हो सकता है? dearer से होनेवाला ज्ञान दूषित इन्द्रियों से हुआ है, यह निश्चय तो तर्कविरुद्ध ही है ।

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१३२ वेदार्थपारिजातः दोषजन्यत्वसंशयोऽपि द्विविधः -- परिगणितदोषजन्यत्वरूप एकः तद्भितोऽन्यः । तत्र प्रत्यक्षजातीये ज्ञाने दूरत्वादि-रूपाः, अनुमानजातीये पञ्चविधहेत्वाभासरूपाः शाब्दबोधे भ्रमप्रमादविप्रलिप्साकरणापाटवरूपचतुर्णामन्यतमवत्पुरुषो-च्चरितस्वरूपा दोषाः शास्त्रज्ञः परिगणिता एव । तत्रापीरुषेये वेदे वक्तुरेवाभावात् तादृशदोषा न सन्त्येव । तदेतत्कामसूत्रस्य व्याख्यायां जयमङ्गलायां बौद्धेनाप्यङ्गीकृतम् - " दोषाः सन्ति न सन्तीति पौरुषेयेषु युज्यते । वेदे वक्तुरभावात्तु दोषशङ्केव नास्ति नः || ' कथञ्चिद्दोषकल्पनया दोषजन्यत्वसंशये तु सकलप्रामाण्यव्यवहारोच्छेद एव स्यात् । इमानि पदानि वाक्यतात्पर्य-विषयीभूतार्थबोधेच्छयोच्चरितानि, अनाप्तानुच्चरितत्वे सत्याकाङ्क्षादिमत्पदकदम्बत्वात् - इत्याद्यनुमानेन तात्पर्यविषये वेदानां प्रामाण्यस्याव्याहतत्वात् । वैशेषिका अर्थबोधमात्रस्यानुमितावन्तर्भावं वदन्ति । तद्रीत्या वैदिकलिङ् प्रवर्तनानुमितीच्छ्योच्चरितः, अनाप्तानु-च्चरिततात्पर्य्यं कलित्वात्, लौकिकप्रवर्तनाबोधकलिङ्ङ्क्त् । तेनेष्टसाधनत्वानुमितिहेतुभूतप्रवर्तनाप्यनुमानेनैव सिद्ध्यति । वैदिकलिङ्ङ्घर्मकानुमित साध्यमानेच्छा तु अध्यापक परम्परेच्छेव तादृशी सम्भवति । हेत्वाभासशून्यहेतोरनुमीयमानार्थविप-रीतार्थसाधकानुमितेर्भ्रमत्वनियमोऽङ्गीकृतः । तदुक्तम् -- " अथवा तत्त्वनिर्णयः साध्यवत्ताज्ञाने प्रमात्वनिर्णयः, अदुष्टकारण-अन्यत्वज्ञानादेव ज्ञानस्य प्रामाण्यम् । " व्यवहारेऽपि गुणवतां साक्षिणामलाभस्थले दोषवत्तयाऽनिश्चितानामपि साक्षिणां परिग्रहो भवत्येव । गुणवत्साक्षिस्थलेऽपि गुणवत्त्वेन निर्दोषत्वमनुमायैव साक्षिणः साक्ष्यं गृह्यते । तेन निर्दुष्टकरणजन्यत्वमेव साक्ष्यस्य प्रमात्वे चिह्नम् | अदुष्टहेतोरसाधकत्वशङ्कायामनुमानप्रामाण्यस्योच्छेदः । दोषों के कारण होनेवाला संशय भी दो प्रकार का है -- परिषित दोषों से उत्पन्न पहला तथा दूसरा उससे भिन्न । इनमें से प्रत्यक्ष ज्ञान में दूरस्व प्रभृति, बनुमान में पांच प्रकार के हेत्वाभास प्रभृति, शामलोध में भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटन ( इन्द्रियों की गड़बड़ी ) --- इसमें से किसी एक दोप से युक्त पुरुष का उच्चारण - ये हो दोष शासकारों ने गिनाये हैं । अपीरुषेय वेद में यक्ता के अभाव में ये दोष नहीं है । कामसूत्र की व्याख्या पथमंगला में बौद्धों ने भी इस बात को माना है - ' दोष हैं या नहीं? यह बात पुरुष के वाक्यों में ही विचारणीय हो सकती है । वेद में तो वक्ता ( रमत ) का अभाव है, अतः यहाँ पर हुदै दोष की शंका ही नहीं है " । किसी प्रकार दोष को हल्पना कर दोषजन्यता हा संशय यदि बार उठाते हैं, तो इस परिस्थिति में मारे प्रामाणिक व्यवहारों का ही उच्छेद हो जायगा, क्योंकि इस प्रकार का संशय तो कहीं भी खाया या पता है । " ये पद बार के सात्पर्य को समझाने वाले अर्थ का बोध कराने की इच्छा से बोले ये हैं, क्योंकि ये मनास पुरुष के बहे हुए नहीं है और आज योजना आदि से युक्त है " इस अनुमान से सात्पर्यविषयक वेदों का प्रामाण्य अव्याहत रूप से सिद्ध होता है । वैशेषिक, शान्यां मात्र का अनुमान में अन्तर्भाव करते हैं । उनके मत मे " वैदिक लिङ् ना का अनुमान करने की इच्छा से उच्चरित है, क्योंकि यह मनात के द्वारा सम्पत्ति नहीं है और इसमें वात्पर्य भी विद्यमान है, जैसा कि लोक में उच्चरित लिङ् der की अनुमिति कराता है ", इस अनुमान के आधार पर अनुमिति की कारणभूत प्रवर्तना भी अनुमान से ही ज्ञात होती है । वैदिक fas, कार को अपना विषय बनाने वाले अनुमान में सायमान इच्छा अध्यापक - परम्परा की इच्छा से ही संचालित होती है | त्वाभास से रहित हेतु भी यदि अनुमेय अर्थ से विपरीत अर्थ को बताता है तो वह अनुमान भ्रमात्मक माना जाता है । जैसा कि कहा गया है --- " अथवा साध्यवत्ता ज्ञान में प्रमात्व का विलय ही तत्त्वनिर्णय कहलाता है । अदुष्ट कारणों से उत्पन्न ज्ञान से ज्ञान के प्रामाण्य की अति होती है " । लोक व्यवहार में भी यह देखा गया है कि जहाँ गुणवान् साक्षी नहीं मिल पाते तो वहीं पर उन साक्षियों को भी ले लिया जाता है, जिनमें कि किसी प्रकार का दोषारोपण नहीं हुआ है । गुणवान् साक्षी के मिलने पर भी उसकी गुणवत्ता के कारण यह निर्दोष है, ऐसा अनुमान कर लेने के बाद हो उसकी साक्षी ली जाती है । अतः निर्दुष्ट करणजन्यता ही are की servant की पहचान है । दोषरहित हेतु में भी यह हेतु अनुमान का स ree नहीं हैं, ऐसी शंका होने पर अनुमान का प्रामाण्य ही समाप्त हो जायगा ।

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वेदार्थपारिजातः १३३ ज्ञानस्यापरिपूर्णत्वमेव भ्रमत्वम् । सर्वाणि ज्ञानानि यथार्थानीति प्राभाकरं मतम् । तादृशमपरिपूर्ण ज्ञानं भ्रम-सामान्ये कारणमिति ख्यात्यन्तरवादिनां मतम् । अपरिपूर्णत्वकल्पनाऽपि कचिदुपाधौ कोटेस्नैकालिकनिषेधस्य तद्व्याप्यस्य वा प्रमाणान्तरप्रतीतत्व एवोपपद्यते । वैदिकवाक्यजन्ययागादिनिष्ठस्वर्गसाधनत्वादिवोधस्थले च तज्ज्ञातुमशक्यमेव । तथा व यागादेः स्वर्गसाधनत्वज्ञानेऽपरिपूर्णत्वस्य निश्वेतुमशक्यत्वात् प्रमात्वमेव । यत्तूच्यते - ' भावरूपस्याज्ञावण भ्रम सामान्यहेतुत्वमिति वेदान्तिमते प्रमाणसिद्धस्यैवाज्ञानविषयत्वं स्वीकृत्य तस्याधिष्ठानस्य सर्वथाऽप्रामाणिकत्वेन यथार्थाज्ञानाविषयत्वेन तदज्ञानस्य भ्रमहेतुत्वं वक्तुमशक्यमेवेति तादृशस्थले ज्ञानस्या-परिपूर्णत्वं न शक्यशङ्कम् ' इति, तन्त्र, ब्रह्मणः स्वतः सिद्धत्वेन प्रमाणसिद्धत्वासम्भवात् । अधिष्ठानसामान्यज्ञानस्याध्यासहेतुत्वं दृष्टम् । तच ज्ञानं नयनतो मनसः स्वतो वेत्यन्यदेतत् । तथाप्यदुष्टकरणजन्यस्य भ्रमवश न भवति । ' अबाधातु प्रमामत्र स्वतः प्रामाण्यनिश्चलाम् ' इति । अनुमितिप्रतिबन्धकयथार्थज्ञानविषयत्वं हेत्वा-सत्वमितिवद् यागादिस्वर्गसाधनत्वबोधप्रतिबन्धकयथार्थज्ञानविषयत्वमेव शाब्दबोधस्याप्रमात्वम् । ' अत्यन्तासत्यपि ह्यर्थे जानं शब्दः करोति हि ' इति । आहार्य्यशाब्दबोधस्य शाब्दबोधप्रतिबन्धकयथार्थज्ञानविषयत्वरूपदोषलक्षणस्यासम्भवेऽपि यद्विषयकनिश्चयोत्तरानाहाय्र्य्यमानसज्ञाने विरोधिविषयतात्रयुक्तः पक्षे साध्यवैशिष्ट्या वगाहित्वस्य तद्वयाप्यहेतुवैशिष्ट्यावगाहि-स्वस्य च द्वयोर्व्यतिरेकस्तत्त्वं हेत्वाभासलक्षणमितिवद् यद्विषयनिश्चयोत्तरानाहाय्र्य्यमानसज्ञाने शाब्दबोधविषयत्वस्य तत्कारण-ज्ञानविपय विषयकत्वस्य च द्वयोर्व्यतिरेकस्तत्त्वं शब्ददोषत्वमिति शब्ददोषत्त्वलक्षणस्य तत्र सत्त्वात् । ज्ञान की अपरिपूर्णता हो भ्रम कहलाती है । प्रभाकर के मत में सभी ज्ञान यथार्थ है । अन्य ख्यातियों को मानने वाले af का मत है कि इस प्रकार का अपरिपूर्ण ज्ञान भ्रम सामान्य में कारण होता है । ज्ञान में अपरिपूर्णता की कल्पना भी किसी उपाधि में किसी कोटि के ककि दिषे अर्थवा उसके किसी अंश की प्रमाणन्तर से प्रतीत होने पर ही होती है । वैदिक वादय से बावे ' यागादि स्वर्ण के साधन है इत्यादि ज्ञानों ने पूर्वोक्त क्षेपों की सम्भावना नहीं हो सकती । इसलिप यागादि की स्वर्गपावना केक्षण में परिपूर्णता का विश्व किती प्रकार नहीं किया जा पकता, फलत: ' ऋक्ष स्वर्ग के सामय है वह ज्ञान और उसके ज्ञान को कराने वाले वेदवाक्य प्रभाव हो है । प्रकार की शंका उठाई जाती है कि भारूप महान ही बहाली के मत में भ्रम सामान्य का कारण है, अत: प्रमाण से शिव वस्तु को ही अज्ञान का विषय बनकर उसके अधिष्ठान के सर्वथा अप्रामाणिक होने के कारण यह क्वार्थ ज्ञान का विषय नहीं हो सकता | ऐसी स्थिति में यह भावरूप बज्ञान प्र का हरण से माना जा सकता है? फलतः ऐसे स्थलों में ज्ञान का अपरिपूर्णता की शंका उठेगी ही रहीं । किन्तु ऐसी शंका व्यर्थ है, क्योंकि ब्रह्म वो स्वतः सिद्ध है, यतः उसको प्रमाणसिद्ध नहीं माना जा सकता । अन्य कान वध्यास में कारण माना जाता है । अर्थात् जिस वस्तु में अन्य वस्तु का भ्रम हो, उन दोनों वस्तुओं के समान रूप का ज्ञान होने पर विशेष रूप का अज्ञान होने पर भ्रम होता है । यह ज्ञान बीस से होता है, मन से होता है, या व्यतः होता है, यह दूसरी बात है, तो भी अदुष्ट कारण से उत्पन्न होने से उसमें भ्रम की शंका नहीं होती । " बाव न होने से ही प्रमा का स्वतः प्रामाण्य निश्चित हो जाता है " । हेयाभास उसको कहते हैं, जो अनुमान में रुकावट डालने वाले वथार्थ ज्ञान का विषय हो । इसी प्रकार वैदिक शब्दों से होने वाले ज्ञान को भी मिथ्या तब कह सकते हैं, पन ' यज्ञ स्वर्ग का साधन नहीं है ऐसा सत्य ज्ञान हो जाय । यह माना गया है कि " खरगोश के सींग तीन काल में भी असम्भव है, तथापि खरगोश के सींग ' इन शब्दों के उच्चारण मात्र से कुछ देर के लिये उस अर्थ की प्रतीति होने लगती है " । इस नियम के अनुसार यद्यपि शब्द से होने वाले कल्पित ज्ञान में शाब्ददोष के प्रतिबन्धक यथार्थ ज्ञानविषयक बोष के लक्षण की सम्भावना नहीं है, सो भी " जिस विषय के निश्चय के बाद अनाहार्य मानस ज्ञान में विरोधी विषयता के कारण पक्ष में साम्य को विशिष्टता और साध्य के व्याप्य हेतु की विशिष्टता sarat ज्ञान का अभाव हो जाता है " । हेत्वाभास के इस लक्षण के अनुसार ही जब शाब्द दोष का भी यह लक्षण किया जाता है fe " fra fa षय के निश्चय के बाद आहार्य मानस ज्ञान में शाब्द बोध की विषयता और उसके कारण ज्ञान की विषयता इन दोनों का व्यतिरेक रहता है " तो इस शाब्द दोष के लक्षण की उपस्थिति वहाँ है हो ।

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वेदार्थपारिजातः नैयायिकमीमांसकास्तु कर्कोटकप्रेरितनलक्रियमाणसंख्यानान्तर्गतदशेतिवाक्यस्थले घटादन्य इत्यादिवाक्यस्थले चानु-मिलावन्तर्भावयितुमयोग्यस्यापि शाब्दबोधस्यानुभवसिद्धत्वात् तस्य च व्याप्तिपक्षधर्मताद्यननुसंधानदशायामाकाङ्क्षायोग्यता-द्यननुसंधानमात्रेण जायमानतया सामग्री सम्पादने लाघवात् स एव बोधोऽध्ययनविधितात्पर्य्यविषयीभूतवेदवाक्येभ्यो भवति । श्रय्या हि रक्षितो लोकः प्रसीदति न सीदति " इति । नातिकामानुसारेण वर्तनमिति चार्वाकानामपि धर्म: -स्वर्गानन्त्याय धर्मोऽयं सर्वेषां वर्णिलिङ्गिनाम् । अस्याभावे तु लोकोऽयं संकरान्नाशमाप्नुयात् ॥ ( २।३३ ) इति कामन्दकनीतिसारे । किं स्यात्परत्याशङ्का कार्ये यस्मिन्न जायते । न चार्थघ्नं सुखं चेति शिष्टास्तत्र व्यवस्थिताः || सर्वज्ञताविचार: वो बुद्धस्य महावीरस्य च सर्वज्ञतां प्रसाध्य पौरुषेयवेदमन्तरापि सर्वज्ञवचनाद धर्माधर्मज्ञानं साध्यते । नैयायिको और मामांसों का कहना है कि कटक के कहने पर नल द्वारा की गई गिनता के बीच में उच्चरित दस संख्या के बोधक वाक्य में और ' यह घर से भिन्न है ' इत्यादि area स्थल में जो शाब्दबोध होता है, उसका अनुमिति में किसी भी प्रकार से अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता, यह अनुभव से सिद्ध है | यहाँ पर व्याहि, पक्षधर्मता आदि का अनुसन्धान न होने पर भी आकांक्षा, योग्यता यादि के अनुसन्धान मात्र से शाब्दबोध होता है । इस प्रकार शाब्दबोध की सामग्री के सम्पादन में लाघव है इसी प्रकार का ज्ञान अध्ययनविवि के सात्पर्य को aurt विषय बनाने वाले वेद वाक्यों से भी होता है । " वेदत्रयी मे रक्षित होने से ही यह लोक सब प्रकार की उन्नति की और बढ़ता है और किसी कष्ट की अनुभूति नही करता " । वास्तिक शिरोमणि are ने भी इस धर्म के रूप में स्वीकार किया है कि कामनाओं का अत्यन्त मनुवर्तन नहीं करना चाहिये । " दु धर्म का पालन सभी वर्णों, आश्रमों और सम्प्रदायों के अनुयायियों को करना चाहिये । इस स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है: इसका पालन न करने पर संकर के कारण इस लोक का नाश हो सकता है " । नीतिसार में भी कहा गया है --- " जिस कार्य को करने पर यह शंका न हो कि बाद में इसका क्या परिणाम होगा, जिससे किसी प्रकार को अर्थ को हानि न हो और जो सुख का सम्पादक हो, ऐसे ही कार्यों में शिष्ट जनों की प्रवृत्ति देखी गई है " । सर्वक्षता संबन्धी विचार बौद्ध और जैन मत वाले वुद्ध और महावीर को सर्वज्ञ मानकर अपौरुषेय वेदवाक्यों के बिना भी सर्वज्ञ के वचन से धर्म और अधर्म का ज्ञान हो सकता है, ऐसा सिद्ध करना चाहते हैं । १. राजा नल जुए में हार कर राज्य को छोड़ जंगल में चले गये । दमयन्ती हमारे साथ रहेगी तो कष्ट पावेगी, यह सोचकर वे उसे भी छोड़कर चले गये । रास्ते में उन्हें ना में जलता हुआ एक नाग मिला । उस नाग ने कहा कि मुझे अपने सिर पर रखकर आग से बाहर निकाल दो । बाहर निकाल देने पर नाग ने कहा कि एक से दस तक की संख्या बोलते एस कर चलो और मुझे छोड़ दो । मल में एक एक कदम चलते हुए एक, दो, तीन बोलना शुरू किया । नौ बोलने hara की संख्या का वाचक ' नव ' शब्द पूरा होने के बाद, यों ही नल ने बस की संख्या का वाचक ' हरी ' शब्द कहा, त्यों ही नाग ने इसके शिर पर उस लिया । यहाँ यह समझना चाहिये कि संस्कृत में ' यस ' संख्या के वाचक ' दश ' शब्द का अर्थ जैसे दस संख्या होता है, वैसे ही ' उस लो ' यह भी होता है । इसीलिये नाग ने उस लिया । यहाँ ' दक्ष ' इस शब्द के कहने न का तो संख्या में ही था, किन्तु कर्कोटक नामक नाग ने संख्यारूप अर्थ न लेकर क्रिया रूप अर्थ को लेकर उस लिया । प्रकृत में शब्द के दोनों अर्थ शाब्दिक अनुभव से ही हो सकते हैं, न कि अनुमान से । इसलिये शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न है, यह न्यायशास्त्रज्ञों का मत है ।.

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वेदार्थपारिजातः १३५ यदुक्तम् -- सर्वज्ञता साधयितुं न शक्येति, स्ववचनविरोधस्यात्राप्यविशिष्टत्वात् । सर्वज्ञोऽसर्वज्ञ इति ब्रुवतः स्ववचन-विरोधोऽपरिहार्यः स्यात् । किञ्च, सर्वज्ञस्य प्रमाणविरुद्धार्थवत्वं हेतुत्वेन विवक्षितम्? ' तद्विपरीतम्? वतृत्वमात्रं वा? प्रथमेऽद्धि हेतुः भगवतस्तथाभूतवत्कृत्वासम्भवात् । द्वितीये विरुद्ध हेतुः दृष्टेष्टाविरुद्धार्थवकृत्वस्य तत्परिज्ञाने सत्येव सम्भवात् । तृतीयेऽनैकान्तिकता, वक्तृत्वमात्रस्य सर्वज्ञत्वेन विरोधाभावात् । एतेन सुगतर्धामिपक्षोऽपि व्याख्यातः । सत्त्वादि-साध्यापेक्षया अनुपलम्भादिसाधनापेक्षया उक्तदोषानुषङ्गात् । किञ्च सुगतस्य सर्वज्ञताप्रतिषेधेऽन्येषां तदापत्तिः, विशेष-प्रतिषेधस्य शेषाभ्यनुज्ञानान्तरीयकत्वात् । अथ सर्वपूपान् पक्षीकृत्य वक्तृत्वादेरसर्वज्ञता प्रसिसाधयिषितेति, तन्न, पक्षस्य संदिग्धसाध्यवत्त्वेन तस्य च विपक्षाद् व्यतिरेकासिद्धी सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तितयाऽसर्वज्ञताप्रसाधकत्वानुपपत्तेः । यत्तु रथ्या-पुरुषादावसर्वज्ञत्वे सत्येव वक्तृत्वादेरुपलम्भात् सर्वज्ञे च कदाचिदप्यनुपलम्भात् ततो व्यतिरेकसिद्धिः, तदपि न, सर्वात्म-सम्वन्धिनोऽनुपलम्भस्यासिद्धाने कान्तिकत्वप्रतिपादनात् । ननु सर्वज्ञस्य कस्यचिदभावात् सिद्धान्ततो वक्तृत्वादेर्व्यतिरेकसिद्धिः कुतः पुनस्तदभावसिद्धि:? अत एव, अन्यतो बा? अत एव चेत्, चक्रकप्रसङ्गः । तथाहि-- वक्तृत्वादेः सर्वज्ञत्वाभावसिद्धिः, ततोऽस्य व्यतिरेकसिद्धिः तत्सिद्धौ चास्य असवंज्ञत्वेन व्याप्तिः । अथान्यतस्तदास्य वैयर्थ्यम् । न चान्यत्तदभावग्राहकं प्रमाणमस्ति । अनुलम्भोऽप्यस्तीति चेन्न, अस्य सर्वात्मसम्वन्धिनोऽसिद्धानैकान्तिकत्वे तदभावसाधकत्वानुपपत्तेः । यद्यनुपलम्भमात्रेण तदभावसिद्धिः साध्यते, तदापि तद-भावज्ञस्याप्यतोऽभावः किन साध्येत? यदि च सत्त्वपुरुषत्वाद्यविशेषेऽपि कश्चिद् वेदार्थज्ञः सर्वज्ञाभावज्ञः, तदा तद्वदेव सर्वज्ञोऽपि किन्न स्यात् । ये लोग सर्वक्षता सम्बन्धी शका इस प्रकार उठाते हैं --- " सर्वज्ञता किसी प्रकार सिद्ध नहीं की जा सकती, क्योंकि अपने ही वचन का विरोध यहाँ पर विद्यमान है । सर्वज्ञ असर्वज्ञ है. इस कथन में स्पष्ट हो अपने वचन का विरोध है | आप यह बताइये कि सर्वज्ञ के न होने में प्रमाण विरुद्ध बात कहने वाले को हेतु कहेंगे या प्रमाण सिद्ध बात कहने वाले को, अथवा केवल बल मात्र को? प्रथम पक्ष में इसलिये हेतु असिद्ध हो जायगा कि भगवान् प्रमाण विरुद्ध बात नहीं कह सकते । द्विपाय हेतु इसलिये विरुद्ध पड़ेगा कि दृष्ट, दृष्ट, विरुद्ध बात तभी कहो या सकती है, जब कि उसका ठीक से परिज्ञान हो जाए । तृतीय पक्ष मानने पर हेतु में नैकानिक व्यभिचारी हेत्वाभास बोप लागा, क्योंकि केरल वत्य का सर्वशत्व के कोई विरोध नहीं है । इसी पद्धति से बुद्ध को सर्वज्ञ मानने वालों का पक्ष भी खण्डित हो जाता है, क्योंकि ' कोई सर्व हीं है ' इनको विद्ध करने के लिये क्योंकि उपलब्ध नहीं होता ' इस हेतु में अवंशता ही सिद्ध होती है । अर्थात् सर्वज्ञ कोई होता तो, वह जरूर कभी किसी को मिलता, सर्वेश नहीं मिलता, इसीसे सर्वज्ञ कोई नहीं है, यह सिद्ध हो जाता है । सुगत पेश नहीं है, ऐसा सिद्ध करने पर यह आपति होगी कि तब कोई अन्य सर्वज्ञ है, क्योंकि विशेष का निषेध करने पर सामान्य में उसका रहना आवश्यक हो जाता है । अब यदि सभी पुरुषों पान कर वक्तृलादि हेतुमों से असर्वज्ञता सिद्ध करना चाहते हैं, तो इस परिस्थिति में पक्ष में साध्य की स्थिति संदिग्ध रहने से उनकी विपक्ष से व्यावृत्ति सिद्ध न हो सकेगी, फलत: उसकी विपक्ष की व्यावृति के संदिग्ध होने के कारण असता की arreat नहीं देगी । वह चलते सर्वज्ञ व्यक्ति में ही वस्तुत्य आदि की उपब्धि होती है, वंश व्यक्ति में वह कभी उपलब्धि नहीं होती, अत: व्यतिरेक सिद्ध हो जायगा, किन्तु यह कथन इसलिये गश्त है कि सभी व्यक्तियों से संद्ध अनुपलम्भ कभी सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि कहीं उसकी उपलब्धि होती है, कहीं नहीं । किसी सर्व के अभाव में सिद्धान्ततः वक्तृत्वादि के व्यतिरेक को ही सिद्धि होगी, इससे सर्वज्ञता का अभाव कहाँ सिद्ध हुआ? क्या इसकी सिद्धि इसी से होती है अथवा इसमें कोई अन्य कारण है? यदि इसी से तो यहाँ चक्रक दोष होगा । जैसे त्वादि से सर्व-अता के अभाव की सिद्धि, तब व्यतिरेक की सिद्धि और व्यतिरेक के सिद्ध होने पर उसकी असर्वज्ञता से व्याप्ति | यदि असता की सिद्धि किसी अन्य हेतु से होती है तो हेतु व्यर्थ हो जायगा । सर्वज्ञता के अभाव को बताने वाला और कोई प्रमाण है भी नहीं | agrorr अतः वह सर्वज्ञता के अभाव को ( न मिलना ) इसमें प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि इसकी असिद्धानैकान्तिकता अभी बताई जा चुकी है, नहीं सिद्ध कर सकता । यदि अनुपलम्भ ( न मिलने ) मात्र से उसका अभाव सिद्ध किया जा सकता है, तब तो उसके अभाव को जानते वा का भी अभाव क्यों नहीं सिद्ध किया जा सकता । यदि सत्व, पुरुषत्व आदि के रहते कोई वेद के अर्थ को जानने वाला सर्वज्ञ के भाव को जानता है, तो उसी रीति से वह सर्वज्ञ को जानने वाला भी क्यों नहीं हो जायगा ।

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१३६ नतु तदभावतत्त्वज्ञो न कश्चिदनुपलब्धेरित्ययुक्तमुक्तम्, दृश्यानुपलम्भस्यैव प्रमाणत्वोपपत्तेः । न चायं दृश्यानुप-लम्भोऽर्वादृशः परचेतसोऽदृश्यत्वादिति चेन्न तथात्वे सर्वज्ञत्व - वेदकर्तृत्व- निषेधेऽपि तदनुपलम्भस्याप्रामाणिकत्वापत्तेः । नाप्यर्थापत्तिः, तदभावमन्तरेणानुपपद्यमानस्य प्रमाणषट्क विज्ञातस्य कस्यचिदर्थस्यासम्भवात् । वेदप्रामाण्यं च सर्वज्ञे सत्येवोपपद्यते । नाप्युपमानं तद्बाधकम्, तत्खलु उपमानोपमेययोरध्यक्षत्वे सति गोगव्यवत् सादृश्यालम्बनमुदेति, नान्यथा । न चारोषपुरुषाः सर्वज्ञश्च केनचिद दृष्टाः, येनाशेषपुरुषवत् सर्वज्ञः सर्वज्ञवद्वाऽशेषपुरुषा इत्युपमानं स्यात् । तद्दृष्टौ तस्यैव सर्वज्ञत्वसम्भवः । तेनः -- ' ' नरान् दृष्ट्वा त्वसवंशान् सर्वानेवाधुनातनान् । तत्सादृश्योपमानेन शेषाऽसार्वज्ञसाधनम् ॥ ” इत्यप्यपास्तम् । किच, सर्वज्ञस्यादशेषप्रमातृशरीरसंस्थानतया विलक्षणशरीरसंस्थानतया वोपमेयता स्यात्? इन्द्रियप्रभवप्रत्यक्षेणार्थ-परिच्छेदकतया खरविषाणवज्जीवरूपतया वा? नाद्यः सर्वज्ञाबाधकत्वात्, शरीरसंस्थानस्य सर्वज्ञतानभ्युपगमात् । आत्मनस्तु शरीरवैलक्षण्यमेव । तत्कथं तद्वलक्षण्येनात्मनोऽसर्वज्ञता स्यात्? न द्वितीयः यतो हि स्मर्यमाणमेव वस्तु पुरोवर्तिपदार्थ सादृश्य-पाधि सादृश्यं वा । तेन विशेषितमुपमानस्य प्रमेयम् । स्मरणञ्चानुभूतविषय एव प्रवर्तते नान्यत्र । न चाशेषपुरुषास्तद्वर्तीनि चेतांसि केनचिदल्पज्ञेनानुभूतानि ततः कथं स्मरणम्? नाप्यनुभूतानां तेषां सर्वज्ञत्वसाधारणः किञ्चिद्धमों निश्चेतुं शक्य. यद्वशादहमिन सर्वदा सर्वे पुरुषाः प्रतिनियतमर्थमिन्द्रियैः पश्यन्ति सर्वपुरुषवद्वाऽहमित्यसर्थज्ञतयोपमीयेरन् । ' सर्वज्ञता के अभाव को तत्त्वतः जानने वाला कोई नहीं है, क्योंकि वैध कोई मिलता नहीं ' यह बात भी गलत है, क्योंकि ' स्यानुपलन्धि ' ( दिखाई देने की संभावना होने पर न मिलना ) ही प्रमाण माना गया है । यह हरयानुव्य पार जन को नहीं हो सकती, क्योंकि दूसरे का चित बर होता है, किन्तु ऐसा मानने पर सर्वशत्व, वेदकर्तृत्व यादि के निषेध में भी दृश्यानुपलब्धि की ब्रामाणिकता माननी पड़ जागी । अर्थापति भी भाग नहीं हो सकती, क्योंकि वहीं प्रमाणों से परिचाल ऐसी कोई व हो सकती हो । बंद की प्रामाणिकता तो सर्वज्ञ को सिद्धि पर भी वस्तु नहीं है, जो कि सर्वज्ञता के भाव के पिता उपप ही निर्भर है । उपमा प्रमाण मी सर्वज्ञता का वाधक नहीं है । उपमान प्रणाम की तब प्रवृत्ति होती है, जव कि उपमान और जाप के क्ष होने पर गो और गयय के साहश्य को अनुभूति हो, अन्यथा नहीं । सभी पुरुषों और सर्वज्ञ को तो किसी ने देखा नहीं है, जिससे कि सर्वज्ञ भी सभी असर्वज्ञ पुरुषों के समान है, अथवा सत्र के समान सभी पुरुष है, इस प्रकार को उपमिति हो । यदि फिसों ने इस सादृश्य को देखा है, तो फिर वही सर्वज्ञ हो जायगा | पराये इस उदरण का भी खण्डन हो जाता है --- " आजकल के सभी व्यक्तियों को असर्वज्ञ देखकर उन्हीं के साक्ष्य में उपमिति के द्वारा नाकी सभी व्यक्तियों की भी सर्वक्षता सिद्ध की जा सकती है " । आप यह भी बताइये कि " सर्वज्ञ की उपमेयता सभी सामान्य प्राणियों के सह शरीर के बयब होने के कारण है या विल-क्षण शरीर वाले जययवों के कारण? तथा इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष को परिच्छेदकता ( निश्वयात्मकता ) के कारण है या याराग के समान जीवरूप होने से? इनमें पहला पक्ष सर्वज्ञता में वाषक नहीं है । शरीर संस्थान में सर्वज्ञता पायी भी नहीं जाती । नात्मा शरीर से विलक्षण है ही । तब शरीर के वैलक्षण्य से आत्मा को बसर्वज्ञता कैसे होगी? द्वितीय पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि स्पर्यमाण वस्तु हो सामने विद्यमान पदार्थ की चादयोपाधि अथवा सदस्य है । उपमान का विषय इसी से संबद्ध रहता है और यही उपमान प्राण का प्रमेय है । स्मृति की प्रवृत्ति पूर्व अनुभूत विषय में ही होती है, अन्यत्र नहीं । सभी पुरुषों की और वदन्तर्गत चितों की अनुभूति किसी अल्पज्ञ पुरुष को हो नहीं सकती । ऐसी स्थिति में स्मृति कैसे होगी? यदि अनुभव किसी प्रकार मान भी लिया जाय तो किसी ऐसे साधारण धर्म की निश्चित कल्पना कठिन है, जो कि सभी सर्वज्ञों में उपलब्ध हो सकता हो, जिससे कि सर्वज्ञता की इस प्रकार उपमिति को जा सके कि मेरे समान ही सभी पुरुष सदा इन्द्रियों से ही प्रतिनियत ( निश्चित ) विषयों का ग्रहण करते हैं, अथवा सभी पुरुषों के समान मैं भी इन्द्रियों से ही प्रतिनियत ( निश्चित ) विषयों का ग्रहण करता हूँ |

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वेदार्थपारिजातः १३७ यदपि सत्त्वादिकं क्वचिदल्पज्ञे दृष्टम्, तदपि नासर्वज्ञत्व एव साधारणम्, सर्वज्ञत्वेऽपि सत्वाद्यविरोधात् । अन्यथा सर्वपुरुषाणामवेदार्थज्ञत्वं मूर्खत्वादिवोपमीयेत । यथा वा न कश्चिद् बालिश इति गवये सत्त्वादिधर्मदर्शनाद् घटादीनामपि गवयसादृश्यापत्तेः । एतेन खरविषाणवत् सर्वज्ञः सर्वज्ञवद्वा खरविषाणमिति नीरूपतया सर्वज्ञत्वस्योपमेयता प्रत्युक्ता । नागमो बाधकः, स हि नापीरुषेयस्तस्य प्रतिषेत्स्यमानत्वात् । पौरुषेयोऽपि किं सर्वज्ञप्रणीत उत तदभावविधातृ-पुरुषप्रणीतः, अन्यप्रणीतो वा? न प्रथमः तद्विरोधात् । द्वितीयपक्षेऽपि तत्प्रणेता सकलज्ञविकलं सर्वं जगत् प्रतिपद्यते न वा? यदि प्रथमः, तत्प्रणेतुरेव सर्वज्ञत्वापातात् । न प्रतिपद्यते चेन्न प्रमाणम् । अन्यप्रणीतपक्षेऽप्येतदेव दूषणम् । नाप्यभावः प्रमाणम्, तस्य निराकरिष्यमाणत्वात् । अस्तु तावत् । तथापि प्रमाणपञ्चकनिवृत्तिरूपमेतद्भवदिष्टम् । तन्निवृत्ति: प्रसज्यप्रतिषेधरूपा पर्युदासरूपा वा? नाद्यः, प्रसज्यप्रतिषेधपक्षे तस्यार्थपरिच्छित्तिहेतुत्वानुपपत्तिः, नीरूपत्वात् । यथा नीरूपं तन्न तथा यथा गगनेन्दीवरम् । परिच्छित्तिहेतुत्वं हि भावधर्मः । स कथं सर्वथा तुच्छस्वभावस्य स्यात्, विरोधात् । तदभावाच्च कथं प्रमाणता? परिच्छितौ साधकतमस्य प्रमाणाभावरूपत्वाच्चाभावस्य तद्वयपदेशानुपपत्तिः । यो यदभावः, स तद्वयपदेशं नार्हति यथा ब्राह्मणाभावो ब्राह्मणव्यपदेशम् । प्रत्यक्षादिप्रमाणाभावश्चाभावः प्रमाणं कथम्? पर्युदासपक्षेऽपि प्रमाणपञ्चकाभावशब्दाभिधेयं भावान्तरं वाच्यम् । तच्च प्रमाणपञ्चकविमुक्तात्मा तदन्यज्ञानं वा? प्रथमे किं सर्वथा प्रमाणपञ्चकेन विमुक्त आत्मा, निषेध्यविषयकप्रमाणपञ्चकेन वा? यदि सर्वथा, कथं सर्वज्ञाभाव-सत्त्वादि धर्म की स्थिति अल्पज्ञ में देखी गई है । यह धर्म केवल असर्वज्ञ में ही रहता हो, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञ में भी rea की स्थिति में कोई विरोध नहीं है । अन्यथा मूर्ख के समान सभी पुरुषों में वेदार्थ की अनभिज्ञता की भी उपमान से सिद्धि होने लगेगी | अथवा यदि कोई मुर्ख नहीं है तो गवय में सत्त्वादि धर्म के देखने से घटादि को भी गवय से समानता होने लगेगी । इससे भृंग के सदृश सर्वज्ञ हैं अथवा सर्वज्ञ के सदृश शशचंग है, यहाँ पर सर्वज्ञत्व की उपमेयता उसके नीरूप होने से खण्डित हो जाती है । are भी इसमें बाधक नहीं हो सकता | आगम की अपौरुषेयता का खण्डन किया जायगा | पौरुषेय आगम के पक्ष में भी तीन विकल्प हैं - १. क्या वह सर्वज्ञ प्रणीत है, २. अथवा सर्वज्ञता का अभाव बताने वाले पुरुष के द्वारा प्रणीत है, या ३. किसी अन्य के द्वारा? इसमें प्रथम पक्ष नहीं बनेगा, क्योंकि इसमें प्रतिज्ञा का ही विरोध हो जायगा, अर्थात् सर्वज्ञ प्रणीत आगम के द्वारा सर्वश का निषेध हास्यास्पद होगा । द्वितीय पक्ष में उसका प्रणेता सर्वज्ञ से रहित सारे जगत् को देखता है, या नहीं? यदि देखता है, तो उसका प्रणेता सर्वज्ञ हो गया । यदि नहीं देखता, तो उसका कथन प्रामाणिक नहीं माना जा सकता । किसी अन्य को आम का प्रणेता मानने में भी यही दोष होगा । भाव से भी सर्वज्ञ का न होना सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि अभाव का खण्डन किया जायगा । थोड़ी देर के लिए उसको प्रमाण मान भी लिया जाय, तो भी इसका स्वरूप आपको प्रमाणपञ्चक ( पाँच प्रमाणों ) से भिन्न को निवृत्ति हो अभिप्रेत है । पर यह निवृत्ति प्रसज्य - प्रतिषेध रूप है या पर्युदास रूप? यदि इसको प्रसज्य - प्रतिषेध रूप माना जाय, तो इस अभाव प्रमाण के नीरूप होने से उसमें विषय को ग्रहण करने की सामर्थ्य नहीं होगी । जो नीरूप होता है, उसमें किसी की हेतुता नहीं बनती, जैसे आकाश कमल | किसी बात का fear करना कराना यह भाव पदार्थ का धर्म है, सर्वथा तुच्छ स्वभाव वाले पदार्थ में यह कैसे रह सकता है? इस परिच्छित्ति 1 निश्चय ) के अभाव में वह प्रमाण कैसे हो सकता है? क्योंकि परिच्छित्ति, अर्थात् प्रभा का साधकतम ही प्रमाण माना जाता है । अभाव तो प्रमाण rera रूप है, अतः उसको प्रमाण कैसे कह सकते हैं? जो जिसका अभाव है, वह उस नाम नहीं कहा जा सकता, जैसे किसी अब्राह्मण को ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता, सब प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के अभाव स्वरूप अभाव को प्रमाण कैसे कहा जा सकता है? यदि अभावको पर्युदास रूप माना जाय तो प्रत्यक्षादि प्रमाण यंत्रक के अभाव शब्द से अभिषेय किसी भावान्तर को बताना पड़ेगा | वह प्रमाण - पंचक से अपरिच्छेद्य स्वभाव वाला है या उससे भिन्न ज्ञानस्वरूप? प्रथम पक्ष में उसका स्वरूप सामान्यतः प्रमाण-पंच से सर्वथा अपरिच्छेद्य है या निषेध्यविषयक प्रमाणपंचक से? यदि सर्वथा अपरिच्छेद्य है, तो उसकी सर्वज्ञाभाव परिच्छेदकता भी १८

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१३८ वैवार्थपारिजातः परिच्छेदकत्वम्, प्रमाणमन्तरा तदनुपपत्तेः । अन्यथा प्रमाणावैयर्थ्यात् । द्वितीये किं भवदीय आत्मा सर्वज्ञविषये प्रमाणपञ्चकविनिर्मुक्तत्वात् तदभावं साधयेत् सर्वस्य वा? तत्राद्यपक्षो न युक्तः, परचेतो वृत्तिविशेषे रनैकान्तिकत्वात् । द्वितीयोऽप्ययुक्तः, सर्वस्य तद्विषये तद्विनिर्मुक्तत्वस्यात्पज्ञेन ज्ञातुमशक्यत्वात् । नापि तदन्यज्ञानपक्षः यतो निषेध्यात् सर्वज्ञत्वा-दन्यत् किञ्चिज्ज्ञयं तद्विषयं ज्ञानं तदन्यज्ञानम्, तदपि क्वचित् कस्यचित् सर्वज्ञत्वाभावं साधयेत्? सर्वत्र सर्वदा सर्वस्य वा? प्रथमे सिद्धसाध्यता, द्वितीयस्तु श्रद्धामात्रगम्यः । कालत्रये त्रिलोकीस्थितप्राणिनां साक्षात्करणे तत्र किञ्चिज्ज्ञत्वप्रतिपत्ते-पप ततः सर्वत्र सर्वदा सर्वस्यासर्वज्ञत्वसिद्धेरसिद्धेः । अतीतादिकालादिगतं वस्तु स्वेन स्वेन रूपेणैव भासते तस्य । न च तहि अवर्तमानतया प्रतिभासस्य प्रत्यक्षता न युक्तेति वाच्यम्, सन्निहित देशकालतयाऽर्थप्रतिभासस्य प्रत्यक्षलक्षणानभ्युपगमात् । स्वोत्सङ्गस्थबालकशरीरे व्यवहारादिलिङ्गतो जीवसद्भावावभासस्यापि प्रत्यक्षताप्रसङ्गात्, किं तह परिस्फुटतार्थप्रतिभासस्यैव तथात्वात् । स चेदतीतादेरप्यर्थस्यास्ति कुतो न तत्प्रत्यक्षता । यथा चेन्द्रियप्रभवप्रत्यक्षस्य देशविप्रकृष्टार्थग्रहणेऽपि परिस्फुटप्रतिभासत्वं न विरुद्धयते, तथातीन्द्रियप्रत्यक्षस्य कालविप्रकृष्टार्थग्रहणेऽपि । न चैवमतीतादेवर्तमानतापत्तिः, वर्तमानार्थग्रहणग्राह्यत्वादिति वाच्यम्, दूरदेशार्थस्य अदूरदेशार्थग्रहणग्राह्यत्वाद अदूरदेशार्थवद् अदूरदेशता प्राप्तेः । एतेनेदमिदानीमिह सद् इत्यस्यां संविदि वस्तुसत्तावत् तत्प्राक्प्रध्वंसाभावो प्रतिभासेते न वेत्यपास्तम् । कैसे बनेगी, अर्थात् वह ' सर्वज्ञ कोई नहीं है ' ऐसा निश्चय भी कैसे करा सकेगा, क्योंकि बिना प्रमाण के यह हो नहीं सकती । अन्यया प्रमाण की कल्पना ही व्यर्थ हो जायेगी । द्वितीय पक्ष में आपकी आत्मा सर्वज्ञ के विषय में प्रमाणपंचक से विनिर्मुक्त होने से सर्वज्ञाभाव की सिद्धि करेगी या सनकी? इसमें पहला इसलिये ठीक नहीं हैं कि यह हेतु परचितवतीं विशेषताओं के कारण अनैकान्तिक है । द्वतीय पक्ष भी इस लिए ठीक नहीं है कि यदि सभी का यह है तो उससे विनिर्मुक्त की अल्पज्ञता का ज्ञान नहीं होगा । निषेध के विषय प्राण से भिन्न ज्ञानस्वरूप भी पर्युदास नहीं हो सकता, क्योंकि विषेश्य सर्वज्ञत्व से अन्य है सचिव, तद्विषयक ज्ञान है तदन्यज्ञान | यह मी कहीं किसी की सर्वज्ञता के अभाव को सिद्ध गरेका या सर्वत्र सदा सबकी? प्रथम पक्ष में सिद्धसाध्यता दोष होगा, क्योंकि को सर्वज्ञ तो हम भी नहीं मानते । द्वितीय पक्ष केवल श्रद्धा का विषय । तीनों कालों में तीनों लोकों में वर्तमान प्राणियों का साक्षात्कार होने पर उसमें विभिन्नत्व की प्रतिपत्ति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि तब सर्वत्र सदा सबकी असर्वज्ञता की सिद्धि न हो सकेगी, क्योंकि उसको तो अतीत यादि कालात सभी वस्तुओं का अपने अपने रूप में भान हो रहा है । ' जब वस्तु वर्तमान नहीं है तो भ्रमादि में उसके प्रतिभास की प्रत्यक्षता कैसे मानी जा सकती है? यह इसलिये ठीत नहीं है कि प्रत्यक्ष का लक्षण यह नहीं माना जाता कि ' देशिक और कालिक साधने वस्तु का वही रहना आवश्यक हो ', क्योंकि ऐसा मानने पर अपनी गोद में बैठे बालक के शरीर में उसके खेल - कुद आदि व्यवहारों को देखकर जीवन की विद्यमानता की प्रतीति प्रत्यक्ष का विषय माना जाने लगेगा, अनुमान का नहीं, किन्तु है वह अनुमान का हो विषय । इसलिए स्पष्ट रूप से अर्थ की प्रतीति को ही प्रत्यक्ष का कारण माना जाता है । यदि यह परिस्फुट प्रतीति अतीत आदि अर्थों की भी है तो उसको भी प्रत्यक्ष नहीं कहना होगा? इन्द्रिय से उत्पन्न प्रत्यक्ष जैसे हर देश में स्थित वस्तु की भी स्पष्ट प्रतीति कराता है, उसी तरह से अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष द्वारा rite of द काल की दृष्टि से हर वस्तु का भी प्रत्यक्ष कराने में विशेष नहीं होना चाहिये । इस पर यह आपत्ति उठ सकती है कि ' ऐसा मानने पर तो अतीत आदि वस्तु की वर्तमानता माननी पड़ेगी, क्योंकि उसकी प्रतीति वर्तमान अर्थ: ग्राहक साधनों से ही होती है ', किन्तु यह इसलिए उचित नहीं है कि दूर देश में स्थित वस्तु का ग्रहण पास में स्थित वस्तु के ग्राहक प्रमाण से ही होता है, तो क्या इससे दूर देशस्थ वस्तु की जदूरदेशिता हो जाती है? जब यह नहीं होता तो उसी पद्धति से अतीत आदि वस्तु को भी वर्तमानता क्यों होगी? इस युक्ति से ' इस समय इसकी सत्ता है इस प्रतीति में वस्तु की सत्ता के समान उसके प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव का ग्रहण होता है या नहीं? इस शंका का भी समाधान हो जाता है, क्योंकि कालिक सम्बन्ध से इनके प्रतिभास को मानने में कोई बाधा नहीं है ।

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वेदार्थपारिजातः १३६ यथैव हीन्द्रियप्रभवप्रत्यक्षे यद्देशविशिष्टं वस्तु नीलरूपमनीलं वा भावरूपमभावरूपं वा तद्देशविशिष्टतयैव प्रतिभासते, तद्वत् सर्वज्ञज्ञानेऽपि यद्देशकालान्तरविशिष्टं यद्वस्तु भावरूपमभावरूपं वा तद्देशकालविशिष्टतयैव प्रतिभासते । कथं तहि युगपज्जन्ममरणादिव्यपदेशप्रसङ्गः? प्रतिनियतार्थस्वरूपा प्रतिपत्तिर्वा? यतः सर्वशतास्य सुव्यवस्थिता न स्यात् । भविष्यत्कालस्य हि वस्तुस्वभावस्य वर्तमानवस्तुस्वभावतया प्रतीतौ युगपज्जन्ममरणादिव्यपदेशप्रसङ्गः स्यात्, न पुनर्यथा-कालं तत्प्रतीतौ । तस्मान्नेदमप्यशेषविदो बाधकम् । अतः सिद्धं सुनिश्चितासम्भवद्बाधकप्रमाणत्वमशेषज्ञसद्भाव-साधकम् । तदेतत्सर्वमविचारितरमणीयम्, सुनिश्चितासंभवद्वाधकप्रमाणत्वस्य हेतोर्हेत्वाभाससमानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि--यद्युक्तहेतोः सर्वशस्य सिद्धिस्तदा देव सर्वशक्तिमतोऽपि सिद्धि: स्यात् । यथा सर्वज्ञस्य सर्वार्थप्रतिपादकशास्त्रनिर्मातृत्वम्, तथैव सर्वज्ञस्य सर्वशकिमतः सर्वार्थनिर्मातृत्वमपि सम्भवत्येव । यथा प्रमाणराहित्येऽपि बाधकप्रमाणासद्भावात् सर्वज्ञः सिद्धयति, तथैव सर्वशक्तिरपि । यथा पुरुषाणां ग्रहणस्वभावत्वं तथा कर्तृत्वस्वभावत्वमपि । आवरणापाये यथा सार्वश्यं संभवति तथैव सर्वशक्तिमत्त्वमपि । नानातत्कल्पने गौरवापत्या लाघवादेक एव हि स कल्पनीयः । तथा चेश्वरवादाभ्युपगमा-पत्तिः स्यात् । तत एव जैनमन्दिरेषु सकामानामपि सर्वज्ञपूजनादि सङ्गच्छते, कामपूरयितृत्वाभावे तदनुपपत्तेः । तस्माद-नित्याने सर्वज्ञाभ्युपगमापेक्षया नित्यैकसर्वशः सर्वशक्ति रीश्वर एवाभ्युपगम्यताम् । उक्तरीत्यैव तत्रापि प्रमाणपट्कं न बाधकं सम्भवति । तथा सति नैयायिकादिसहकारलाभोऽपि सेत्स्यसि । जैसे इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष में किसी देश से विशिष्ट वस्तु का ही नीलरूप से मथवा अनीलरूप से, भावरूप से या अभावरूप से मान होता है, उसी तरह से सर्वज्ञ के ज्ञान में भी जो वस्तु जिस देश वोर काल से विशिष्ट है, वह भावरूप हो या अभावरूप, उसकी उसी प्रकार से प्रतीति होती है । पुनः उठती है कि ऐसी अवस्था में सर्वज्ञ में एक साथ ही जन्म दौर मृत्यु की आपत्ति होगी घोर उसको प्रतिनियत अर्थ विषयिणी प्रतीति भी कैसे होगी? इन आपत्तियों के रहते उसको सर्वज्ञता नहीं सिद्ध हो सकती । इसका उत्तर यह है कि भविष्यकाल की वस्तु की वर्तमान कारक वस्तु के समान प्रतीति हो, तन तो एक साथ जन्म और मृत्यु बाली आपत्ति उठ सकती है, किन्तु यदि उसी भविष्यत्कालीन वस्तु के रूप में की प्रतीति होती है तो यह आपत्ति नहीं होगी । इसलिये यह सर्वज्ञता में वाधक नहीं हो सकती । व्रतः मानना पड़ेगा कि सर्वज्ञता के वाचक प्रमाण का सुनिश्चित अभाव है, अर्थात् किसी बाधक प्रमाण के न रहने से सर्वज्ञता की सिद्धि सुनिश्चित है । किन्तु ये सारी बातें तभी तक अच्छी लगती हैं, जब तक कि इन पर कुछ विचार नहीं किया जाता | आपने सर्वज्ञता को सिद्धि के लिये ' सुनिश्चितासम्भवदबाधकत्व ' हेतु दिया है । वस्तुतः यह हेतु न होकर हेत्वाभास है । जैसे कि यदि इस हेतु से सर्वश की सिद्धि हो जाय तो फिर इसमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर की भामिद्धि हो जायगी । जैसे सर्वज्ञ को सर्वार्थ प्रतिपादक शास्त्र का निर्माता माना जाता है, उसी भाँति सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सभी पदार्थों का निर्माता भी सिद्ध हो जायगा | जैसे बिना प्रमाण के भी बाधक प्रमाण अभाव से ही सर्वज्ञ सिद्ध हो जाता है, उसी तरह से सर्वशक्ति परमेश्वर भी सिद्ध हो जायगा । जैसे सभी पुरुष स्वभाव ही ज्ञानवान् है, उसी तरह से सभी पुरुष कर्तृस्वभाव वाले भी हैं । आावरण के हट जाने पर जैसे सज्ञता की अभिव्यक्ति हो जाती है, उसी न्याय से सर्वशक्तिमता को भी अभिव्यक्ति हो जायगी । अनेक सर्वज्ञों की कल्पना की अपेक्षा एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कल्पना में काम है । इस तरह से तो आपको ईश्वरवाद हो मानना पड़ जायगा । ऐसा मानने पर ही जैन मन्दिरों में की गई सर्वज्ञ की सकाम पूजा की भी उपपत्ति बन जाती है, क्योंकि सर्वशक्तिमात् ईश्वर ही कामनाओं की पूर्ति कर सकता है । कामना पूर्ति के for get fee are की? इसलिये अनेक, अनित्य, सर्वज्ञ मानने के स्थान पर एक, नित्य, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर को मानना ही ठीक है । आपको बताई पद्धति से ही उसमें छहों प्रमाणों में से कोई भी बाधक नहीं होगा और आपको इसमें नैयायिक प्रति afrat का भी सहयोग मिलेगा ।

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II वेदार्थपारिजात: यदि दृष्टस्वभावातिक्रमेण सर्वज्ञः सिद्धयति, तदा सर्वशक्तिमत्वमपि कुतो न सिद्धयेत्? सर्वकर्तृत्वस्येव सर्वार्थ-प्रतिपादकशास्त्रनिर्मातृत्वस्यापि लोकोत्तरत्वाविशेषात् । किञ्च यदि प्रमाणाभावरूपतया अभावस्य प्रमाणत्वव्यपदेशा-तुपपस्या तस्यार्थपरिच्छित्तिहेतुत्वं नोपपद्यते, तदा सुनिश्चितासम्भवद्वाधकप्रमाणत्वस्यापि नाशेषज्ञसाधनत्वं संभवति, तस्यापि सुनिश्चितबाधकप्रमाणासत्त्वानतिरेकेणाभावरूपत्वात् । तदयं स्वपादयोः कुठाराघातः । free, arecaricat व न ज्ञायते, सर्वैर्वा? नाद्यः, बुद्धिदोषादपि तत्सम्भवात् । नान्त्यः, असर्वज्ञेन तज्ज्ञातु-मशक्यत्वात् । किञ्च बाधकप्रमाणाभावेन सर्वज्ञः साध्यते प्रमाणेन वा? नान्त्यः, तस्यैवोपन्यसनीयत्वात् । नाद्यः, अभावस्य त्वया प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । अपि च, बाधकप्रमाणाभावेन सर्वेषां सार्वश्यं किं न स्यात्? न चाहमज्ञ इति बाधक-प्रत्यक्षेण तद्विरोध इति वाच्यम् तेन स्वदसार्वश्यसिद्धावप्यन्यस्य तदयोगात् । न ह्यन्यस्याज्ञानमन्येन ज्ञातुं शक्यते । न चानुमानेन तज्ज्ञानम्, तेनैव तर्हि त्वदभिमतसर्वज्ञस्यापि तत्सिद्धेः । त्वदुक्तयुक्तथा एकस्यैव सर्वज्ञस्य सिद्धिर्बहूनां वा? नाद्यः, विशेषहेत्वभावात् । नान्त्यः, बुद्धातोः सर्वज्ञयोविरोधानुपपत्तेः । बुद्धोपदेशस्य सर्वार्थप्रतिपादकत्वाभावान्न सार्वज्ञ्यमिति तन्न, महावीरोपदेशस्य सर्वार्थप्रतिपादकत्वे शपथमन्तरेण मानाभावात् । अपि चैवं सप्तमरस- गगनेन्दीवरादावप्युक्तहेतोः सत्वेन तत्सस्वापत्तिः । नैवात्राप्याश्रयासिद्धि:, त्वन्मतरीत्या प्रमाणाप्रमाणसाधारणशाब्दप्रतीतिरूपविकल्पप्रसादात्तस्यापि सिद्धौ बाधाभावात् । नापि स्वरूपासिद्धयादिकम्, तद्वाधकस्य कस्यचिदपि प्रमाणस्यासंभवात् । न च प्रत्यक्षं वाधकम् तेन कदाचित् क्वचित्तदभावसिद्धावपि सर्वत्र सर्वदा तदभावासिद्धेः । नार्वादृक्प्रत्यक्षं सर्वदेशकालादिकं गाहते । सर्वज्ञसिद्धेस्त्व-यदि दृष्ट स्वभाव के विरुद्ध सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है, तो फिर सर्वशक्तिमान क्यों नहीं सिद्ध हो सकता? सर्वकर्तृत्व के समान ही सर्वार्थ प्रतिपादक शास्त्र का निर्माण भी तो लोकोत्तर कार्य ही है । ' प्रमाणाभाव रूप हो जाने से अभाव प्रमाण ही नहीं है ', तो उससे अर्थ को परिच्छित्ति कैसे मानी जा सकती है? यदि आप ऐसा मानते हैं, तो इस अवस्था में आपका ' सुनिश्चितासम्भवद्वाध-* यह हेतु भी सर्वज्ञ की सिद्धि नहीं कर पायगा, क्योंकि ' सुनिश्चित बाधक प्रमाणासत्व ' ( सुनिश्चित बाधक प्रमाण का न होना ) भी तो anta से अतिरिक्त नहीं है । इस प्रकार अभाव को प्रमाण न मानकर आप खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रहे हैं । आप यह बताइये कि ' बाधक प्रमाण को केवल आप नहीं जानते या उसको कोई भी नहीं जानता '? ' आप नहीं जानते ' यह बात तो आपकी बुद्धि के दोष के कारण भी हो सकती है । कोई भी नहीं जानता, इस बात की सर्वज्ञ नहीं जान सकता, अर्थात् सर्वत्र व्यक्ति ही यह कह सकता है कि बाधक प्रमाण को कोई नहीं जानता । सर्वेश की सिद्धि अभी हुई नहीं है, तो असर्वज्ञ यह कैसे बता सकता है कि इसमें किसी भी व्यक्ति को बाधक प्रमाण का ज्ञान नहीं हैं । आप यह भी बताइये कि बाधक प्रमाण के अभाव से आप सर्वज्ञ को सिद्ध करते हैं या प्रमाण से । अन्तिम पक्ष इसलिये नहीं मान्य है कि प्रमाण का उपन्यास करना तो अभी बाकी ही हैं । प्रथम पक्ष भी आपके अभाव को प्रमाण न मानने के कारण सही नहीं हो सकता । फिर बाधक प्रमाण के अभाव में सभी सर्वज्ञ क्यों न मान लिये जाय? मैं अज्ञानी है, इस बाधक प्रत्यक्ष के कारण यह सम्भव नहीं होगा, यह उक्ति भी गलत है, क्योंकि इससे आपकी ही असर्वज्ञता सिद्ध होती है, दूसरे के सर्वक्ष होने में यह ares नहीं हो सकती । दूसरे व्यक्ति के अज्ञान को दूसरा नहीं जानता । अनुमान से इसका ज्ञान मानने पर आपकी अनभिमत सर्वज्ञता की सिद्धि भी उसीसे हो जायगी । आपकी युक्ति से एक ही सर्वज्ञ की सिद्धि होती है या अनेक की? एक की सिद्धि मानने में कोई विशेष कारण नहीं दिया गया है । अनेक सर्वज्ञों की सिद्धि मानने पर बुद्ध और महावीर इन दो सर्वज्ञों में परस्पर विरोध नहीं होना चाहिये । बुद्धोपदिष्ट शास्त्र सर्वार्थ का प्रतिपादक नहीं है, अतः वे सर्वज्ञ नहीं माने जा सकते, तो महावीर का उपदेश सर्वार्थ का प्रतिपादक है, इसमें भी आपके ह के सिवाय और कोई प्रमाण नहीं हो सकता । ऐसा मानने पर सक्षम रस, आकाश- कमल आदि में भी उक्त हेतु की सता होने से इनको भी सत् मानना पड़ जायगा । यहाँ पर आश्रय की सिद्धि भी नहीं होती, क्योंकि आपके मत के अनुसार प्रमाण और अप्रमाण में समान रूप से रहने वाले शाब्द प्रतिरूप विकल्प की कृपा से उसकी सिद्धि हो जायगी । स्वरूपासिद्धि भी नहीं होगी, क्योंकि उसका बाधक प्रमाण कोई उपलब्ध नहीं है | प्रत्यक्ष उसमें बाधक नहीं होगा, उससे किसी समय कहीं उसका अभाव सिद्ध हो सकता है, सर्वत्र सर्वदा नहीं । अल्पज्ञ का प्रत्यक्ष समस्त देश और काल का अवगाहन नहीं कर सकता और सर्वेश की सिद्धि तो अभी बाकी ही है । आपको बताई पद्धति से