वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 171–180
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 171–180
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II वेदार्थपारिजातः यदि दृष्टस्वभावातिक्रमेण सर्वज्ञः सिद्धयति, तदा सर्वशक्तिमत्त्वमपि कुतो न सिद्धयेत्? सर्वकर्तृत्वस्येव सर्वार्थ प्रतिपादकशास्त्रनिर्मातृत्वस्यापि लोकोत्तरत्वाविशेषात् । किञ्च यदि प्रमाणाभावरूपतया अभावस्य प्रमाणत्वव्यपदेशा-नुपपत्त्या तस्यार्थपरिच्छित्तिहेतुत्वं नोपपद्यते, तदा सुनिश्चितासम्भवद्वाधकप्रमाणत्वस्यापि नाशेषज्ञसाधनत्वं संभवति, तस्यापि सुनिश्चितबाधकप्रमाणासस्थानतिरेकेणाभावरूपत्वात् । तदयं स्वपादयोः कुठाराघातः । किञ्च, बाधकप्रमाणं त्वयैव न ज्ञायते, सर्वेर्वा? नाद्यः, बुद्धिदोषादपि तत्सम्भवात् । नान्त्य:, असर्वज्ञेन तज्ज्ञातु-tatacar त् । किञ्च बाधकप्रमाणाभावेन सर्वज्ञः साध्यते प्रमाणेन वा? नान्त्यः, तस्यैवोपन्यसनीयत्वात् । नाद्यः, अभावस्य त्वया प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । अपि च बाधकप्रमाणाभावेन सर्वेषां सार्वश्यं कि न स्यात्? न चाहमज्ञ इति बाधक-प्रत्यक्षेण तद्विरोध इति वाच्यम् तेन त्वदसार्वश्यसिद्धावप्यन्यस्य तदयोगात् । न ह्यन्यस्याज्ञानमन्येन ज्ञातुं शक्यते । न चानुमानेन तज्ज्ञानम्, तेनैव तर्हि स्वदभिमतसर्वज्ञस्यापि तत्सिद्धेः । त्वदुक्तयुक्तया एकस्यैव सर्वज्ञस्य सिद्धिर्बहूनां वा? नाद्यः, विशेषहेत्वभावात् । नान्त्यः, बुद्धातोः सर्वज्ञयोविरोधानुपपत्तेः । बुद्धोपदेशस्य सर्वार्थप्रतिपादकत्वाभावान्न सार्वज्ञ्यमिति तन्न, महावीरोपदेशस्य सर्वार्थप्रतिपादकत्वे शपथमन्तरेण मानाभावात् । अपि चैवं सप्तमरस - गगनेन्दीवरादावप्युक्तहेतोः सत्त्वेन तत्सत्त्वापत्तिः । नैवात्राप्याश्रयासिद्धिः त्वन्मतरीत्या प्रमाणाप्रमाणसाधारणशाब्दप्रतीतिरूपविकल्पप्रसादात्तस्यापि सिद्धी बाधाभावात् । नापि स्वरूपासिद्ध्यादिकम्, तद्वाधकस्य कस्यचिदपि प्रमाणस्यासंभवात् । न च प्रत्यक्षं बाधकम् तेन कदाचित् क्वचित्तदभावसिद्धावपि सर्वत्र सर्वदा तदभावासिद्धेः । नार्वादृक्प्रत्यक्षं सर्वदेशकालादिकं गाहते । सर्वज्ञसिद्धेस्त्व-afe स्वभाव के विरुद्ध सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है, तो फिर सर्वशक्तिमात् क्यों नहीं सिद्ध हो सकता? सर्वकर्तृत्व के समान ही सर्वार्थ प्रतिपादक शास्त्र का निर्माण भी तो लोकोत्तर कार्य ही है । ' प्रमाणाभाव रूप हो जाने से अभाव प्रमाण ही नहीं है ', तो उससे अर्थ की परिच्छित्ति कैसे मानी जा सकती है? यदि आप ऐसा मानते हैं, तो इस अवस्था में आपका ' सुनिश्चितासम्भवद्वाव-* यह हेतु मी सर्वज्ञ की सिद्धि नहीं कर पायगा, क्योंकि ' सुनिश्चित बाधक प्रमाणासत्व ' ( सुनिश्चित बाधक प्रमाण का न होना ) भी तो अभाव से अतिरिक्त नहीं है । इस प्रकार अभाव को प्रमाण न मानकर आप खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रहे हैं । आप यह बताइये कि ' बाधक प्रमाण को केवल आप नहीं जानते या उसको कोई भी नहीं जानता '? ' आप नहीं जानते ' यह बात तो आपकी बुद्धि के दोष के कारण भी हो सकती है । कोई भी नहीं जानता, इस बात को असर्वज्ञ नहीं जान सकता, अर्थात् सर्वत्र व्यक्ति ही यह कह सकता है कि बाक प्रमाण को कोई नहीं जानता । सर्वज्ञ की सिद्धि अभी हुई नहीं है, तो असर्वज्ञ यह कैसे बता सकता है कि इसमें किसी भी व्यक्ति को बाधक प्रमाण का ज्ञान नहीं है । आप यह भी बताइये कि बाधक प्रमाण के भाव से आप सर्वज्ञ को सिद्ध करते हैं या प्रमाण से । अन्तिम पक्ष इसलिये नहीं मान्य है कि प्रमाण का उपन्यास करना तो अभी बाकी ही है | प्रथम पक्ष भी आपके अभाव को प्रमाण न मानने के कारण सही नहीं हो सकता । फिर बाधक प्रमाण के अभाव में सभी मान लिये जांय? में अज्ञानी हूँ, इस बाधक प्रत्यक्ष के कारण यह सम्भव नहीं होगा, यह उक्ति भी गलत है, क्योंकि इससे आपकी ही सर्वज्ञता सिद्ध होती है, दूसरे के सर्वज्ञ होने में यह बाधक नहीं हो सकती । दूसरे व्यक्ति के अज्ञान को दूसरा नहीं जानता । अनुमान से इसका ज्ञान मानने पर आपकी अनभिमत सर्वज्ञता की सिद्धि भी उसीसे हो जायगी । आपकी युक्ति से एक ही सर्वज्ञ की सिद्धि होती है या अनेक को? एक की सिद्धि मानने में कोई विशेष कारण नहीं दिया गया है । अनेक की सिद्धि मानने पर बुद्ध और महावीर इन दो सर्वशों में परस्पर विरोध नहीं होना चाहिये | बुद्धोपदिष्ट शास्त्र सर्वार्थ का प्रतिपादक नहीं है, अतः वे सर्वज्ञ नहीं माने जा सकते, तो महावीर का उपदेश सर्वार्थ का प्रतिपादक है, इसमें भी आपके हठ के सिवाय और कोई प्रमाण नहीं हो सकता । ऐसा मानने पर सप्तम रस, आकाश कमल आदि में भी उक्त हेतु की सत्ता होने से इनको भी सत् मानना पड़ जायगा | यहाँ पर आश्रय की असिद्धि भी नहीं होती, क्योंकि नापके मत के अनुसार प्रमाण और अप्रमाण में समान रूप से रहने वाले शाब्द तीत रूप free की कृपा से उसकी सिद्धि हो जायगी । स्वरूपासिद्धि भी नहीं होगी, क्योंकि उसका बाधक प्रमाण कोई उपलब्ध नहीं है । प्रत्यक्ष उसमें बाधक नहीं होगा, उससे किसी समय कहीं उसका अभाव सिद्ध हो सकता है, सर्वत्र सर्वदा नहीं । अल्प का प्रत्यक्ष समस्त देश और काल का अवगाहन नहीं कर सकता और सर्वज्ञ की सिद्धि तो अभी बाकी ही है । आपकी बताई पद्धति से
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वेदार्थपारिजातः ज्ञातुमशक्यत्वात् । कार्यानुपलम्भोऽपि एकस्यैव सर्वेषां वा? न प्रथमः, एकानुपलम्भस्य तदसाधकत्वात् । न चरमः, असर्व-विदा तस्य ज्ञातुमशक्यत्वात् । कारणानुपलम्भस्यापोयमेव गतिः । सप्तमे नभसि चतुःशृङ्गः पुरुषोऽस्तीति प्रतिज्ञा नहि बाधकप्रमाणाभावादेव सिद्धयति, लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धि:, मानाधीना मेयसिद्धिरित्यादिप्रामाणिकप्रसिद्धेर्जागरूकत्वात् । यदुक्तम्- ' ज्ञानावरणादिकर्म प्रक्षयस्यानुमानादिनोपलम्भसम्भवेन कारणसत्त्वेन सर्वज्ञसिद्धिः सम्भवति ' इति । तन्न, त्वन्यते कर्मणां प्रपञ्चस्य च मिथ्यात्वाभावेन सम्यग्दर्शनज्ञानादिनिवर्त्यत्वासम्भवात् । न हि सत्यं वस्तु ज्ञाननिवत्यं दृष्टम् । नापि तप आदिभिस्तन्निवृत्तिः सम्भवति, पापानां विरुद्धकर्मणां निवृत्तावपि पुण्यानामविरोधित्वेन तन्निवर्त्यत्वा-भावात् । किञ्च सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्राणां कर्मक्षयहेतुत्वज्ञानमपि सर्वज्ञताधीनमेव । तथा च सर्वज्ञतायास्तपःसापेक्षत्वं तपःप्रवृत्तेश्च सर्वज्ञतासापेक्षत्वमित्यन्योन्याश्रयता! न व तत्सन्तानस्यानादित्वेन तत्समाधानम्, बीजाङ्कुरा दीनामिव कार्यकारणभावासिद्धेस्तत्परम्परायाश्चान्धपरम्परात्वात् । किञ्च, जैनैः प्रत्यक्षं विशदं ज्ञानमित्यादिरीत्या इन्द्रियानपेक्षं प्रतिबन्धकापाये आत्ममात्रनिबन्धनं स्वविषये निःशेषतो विशदमवधिमनः पर्यय केवलाख्यज्ञानमेव मुख्यतः प्रत्यक्षमभ्युपेतम् । तच्च खण्डितमेव भट्टपादैः-एवं यैः केवलं ज्ञानमिन्द्रियाद्यनपेक्षिणः । सूक्ष्मातीतादिविषयं जीवस्य परिकल्पितम् || न तदागमात् सिद्धयेन्न च तेनागमां विना । दृष्टान्तोऽपि व तस्याम्यो नृषु कश्चित् प्रवर्तते ॥ इति । नहीं | कार्य का अनुपलम्भ मी एक को ही होगा या सबको? एक की अनुपलन्धि से कार्य का अनुपलम्भ नहीं सिद्ध हो सकता और सूर्य का अनुपलम्भ विना सर्व के जाना नहीं जा सकता । कारणानुपलम्भ की भी यही स्थिति होगी । सातवें आसमान पर चार सींग वाला आदमी रहता है, यह प्रतिज्ञा केवच बाधक प्रमाण के अभाव में नहीं सिद्ध हो जाती, क्योंकिवस्तु की सिद्धि लक्षण और प्रमाण से होती है, प्रमेय की सिद्धि प्रमाण के अधीन है, इस तरह की प्रामाणिकों की प्रविद्ध उक्तियों इस विषय में जागरूक है । यह कहना ' ज्ञान के बावरक ( ढक देनेवाले, रुकावट पैदा करनेवाले, रोक देनेवाले ) कर्म के क्षत्र की उपलब्ध अनुमान से जानी जा सकती है, मतः कारण के विद्यमान होने से सर्वज्ञ की सिद्धि हो सकेगी ', इसलिये नहीं बन सकता कि आपके मत में कर्म और sea मिया नहीं है, अतः उनकी निवृत्ति सम्यग्दर्शन आदि ज्ञानों से नहीं हो सकती । अन्य वस्तु की ज्ञान से निवृत्ति कहीं नहीं देखी गई । तप आदि से भा उसकी निवृति नहीं हो सकती, क्योंकि विरोधी कम होने से पाप की निवृत्ति भले ही हो पाय, पुण्प कर्म तो विरोधी नहीं है, अतः उनकी निवृत्ति हो नहीं सकती । फिर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकारित्र को कर्म क्षय की कारणता का ज्ञान भी तो सर्वज्ञ के ही अधीन है । इस प्रकार विज्ञता को तमादि की और तप के लिये प्रवृति को सर्वज्ञता की अपेक्षा होने से अन्योन्याश्रय दोष भी होगा । सन्तान ( परम्परा ) श्री अदिता से इसका समाधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि बीजांकुर न्याय से इसमें कार्यकारणभाव नहीं सिद्ध किया जा सकता और अन्धपरम्परा से कोई यथार्थं वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती | जैन दार्शनिक ' प्रत्यक्ष विशद ज्ञान है ' इत्यादि उद्धरणों के आधार पर इन्द्रियों की अपेक्षा के बिना, प्रतिबन्धक के जाने पर केवल आत्मा के अधीन पूरी तरह से स्पष्ट अवधि, मन: पर्यय और केवल ज्ञान को ही मुख्यतः प्रत्यक्ष मानते हैं । उसका खण्डन भट्ट कुमारिल ने इस प्रकार किया है--" इसी प्रकार जो जैन दार्शनिक विना इन्द्रिय की अपेक्षा के जीव में सूक्ष्म, अतीतादि वस्तुविषयक केवल ज्ञान की परिकल्पना करते हैं, वह बिना आगम के सिद्ध नहीं हो सकता और इस प्रकार के ज्ञान के fear आगम को भी सिद्धि नहीं हो सकती । लोक में इस प्रकार का कोई टान्त भी देखने में नहीं आता । "
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यद्यप्यनादित्वमाश्रित्यान्योन्याश्रयवारणाय प्रयतितमकलडुन--१४३
एवं यत्केवलं ज्ञानमनुमानविजृम्भितम् । नर्वे तदागमात् सिद्धयेन्न च तेन विनागमः ॥
सत्यमर्थादेव पुरुषातिशयो मतः । प्रभवः पौरुषेयो s स्य प्रधनादियिते ॥ इति । अर्थागमोपदिष्टसम्यग्दर्शनाद्यभ्यासमन्तरा केवलं ज्ञानं न सिद्ध्यति, न च केवलज्ञानमन्तरेणागमसिद्धिः, तथापि ज्ञागमसन्तानस्यानादित्वात्तत्सिद्धिरिति परमेतन्न सङ्गतम्, यतो यत्र बीजाङ्कुरादीनां कार्यकारणभाव: प्रत्यक्ष-सिद्धस्तत्रैवानादिकल्पना परस्पराश्रयदोषव्यापादिनी भवति नान्यत्र । यत्र तु क्वचिदपि कार्यकारणभावो न सिद्धयेत्तत्र नेयं कलाना साधीयसी । पूर्वपूर्वागमानाश्रित्योत्तरोत्तरसर्वज्ञानां सिद्धि:, पूर्वपूर्वसर्वज्ञांश्चाश्रित्योत्तरोत्तरागमानां सिद्धिः । बीजादङ्कुरस्योत्पत्तिः प्रत्यक्षेण दृश्यते, अङ्कुराञ्च बीजानात्यत्तिस्तथैव दृश्यते । न चैवमागमबलात् सर्वज्ञो भवन् दृश्यते, न च सर्वज्ञादुत्पद्यमानश्चागमो दृश्यते । अन्यदपि भट्टपादैरुक्तम्- ' सर्वज्ञोऽसाविति ह्येवं तत्कालेऽनुबुभुत्सुभिः । तज्ज्ञानज्ञेय विज्ञानरहितैर्गम्यते कथम् ॥ कल्पनीयाश्च सर्वशा भनेयुर्बहवस्तव । य एव स्यादसर्वज्ञः स सर्वज्ञं न बुद्धयते ॥ सर्वज्ञोऽनवबुद्धश्च येनैव स्थान तं प्रति । तद्वाक्यानां प्रमात्वं स्यान्मूलाज्ञानेऽन्यवाक्यवत् ॥ रागादिरहिते चास्मिन्निर्व्यापारे व्यवस्थिते । देशनान्यप्रणीतैव स्यादृते प्रत्यवेक्षणात् ॥ सान्निध्यमात्रतस्तस्य पुंसश्चिन्तामणेरिव । निःसरन्ति यथाकामं कुड्यादिभ्योऽपि देशनाः ॥ एवमाद्युच्य -मानन्तु श्रस्य शोभते । कुड्यादिनिःसृतत्वाच्च नाश्वासो देशनासु नः । किन्तु बुद्धप्रणीताः स्युः किमु कैश्चिद् दुरात्मभिः । अदृश्येविप्रलम्भार्थं पिशाचादिभिरीरिताः । नित्यागमावबोधोऽपि प्रत्याख्येयोऽनया दिशा । नहि तत्रापि विस्रम्भो दृष्टोऽनेन यद्यपि दही बनादता का सहारा लेकर अन्योन्याभरा दोष को दूर करने का जैन दार्शनिक ' क ' ने प्रत्ल किया है । जैसा “िएवं यत्येव ं ज्ञानम् " इत्यादि के श्लोकों में कहा गया है । इसका यह अभिप्राय है कि यद्यपि काम के हाथ उपदिष्ट सम्यग् शैन बादि के सम्पास के बिना केवल ज्ञान नहीं सिद्ध हो सकता और केवल ज्ञान के बिना नागम को सिद्धि नहीं हो सक्ती तो भी भयंज्ञ प्रणीत जागन सन्तान की अनादिता के कारण केवल ज्ञान की सिद्धि मानी जा सकती है । किन्तु कळक का यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि जहां पर बीज बीर अंकुर का कार्यकारणभाव प्रत्यक्ष प्रमाण से प्रसिद्ध है, वहीं पर अनादि परम्पदा अन्योन्याश्रय दोष का परिहार कर पाती है, बसन नहीं । जहाँ पर किसी प्रकार कार्यकारणभाव नहीं सिद्ध होता, वही पर यह कल्पना ठीक नहीं मागोवा सकती, क्योंकि पूर्व पूर्व के आगमों का सहारा लेकर उत्तर उत्तर के सर्वज्ञों की सिद्धि होगी और पूर्व पूर्व के सर्वज्ञों के सहारे से उत्तर-काल के आगमों की सिद्धि माननी पड़ेगी । किन्तु जैसे बाप से अंकुर को उत्पत्ति और अंकुर से बीज श्री उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है, उसी प्रकार से बागम से सर्वज्ञ को और सर्वज्ञ से आगम की उत्पति कहीं देखी नहीं गई है । ट्ट कुमारिल ने इस विषय की और भी विवेचना की है । जैसे - “ तत्काल जो यह अनुभव करना चाहते हैं कि यह सर्वज्ञ है, उनको उस सर्वेश का ज्ञान और सब ज्ञेय पदार्थों का विज्ञान न होने पर कैसे सर्वज्ञ का ज्ञान हो सकता है । इस तरह से अनेक सर्वज्ञों की कल्पना करनी पड़ेगी: जो सर्वज्ञ न होगा, वह सर्वज्ञ को न जान पायगा और जब सर्वज्ञ का ज्ञान न हुआ तो उसके लिए उसके वचन भी उसी प्रकार प्रमाण नहीं होंगे, जैसे कि वे वाक्य प्रमाण नहीं होते, जिनके कि मूल बक्ता का ज्ञान न 1 जब कि यह सर्वज्ञ राग आदि से रहित है, तो उसका कुछ कर्तव्य न रहने से वह निर्व्यापार रहेगा । अर्थात् कुछ भी करेगा नहीं, फिर शास्त्र कैसे बनायेगा? ऐसी परिस्थिति में देशना ( ज्ञानोपदेश ) अन्य प्रणीत ही मानी जायगी, वह तो मात्र पर्यवेक्षक रहेगा । यह कहा जाता है कि चिन्ता-मणि से जैसे विचार करते ही वस्तु प्राप्त हो जाती हैं, उसी तरह से सर्वज्ञ पुरुष के सानिध्यमात्र से दीवाल से भी शास्त्रोपदेश निकलते लगते हैं । यह बात केवल अन्ध श्रद्धालु व्यक्ति ही पान सकते हैं । दोवाल से निकले शास्त्रोपदेश में हम विश्वास नहीं कर सकते कि ये बुद्ध के द्वारा ही उपदिष्ट हैं या अदृश्य, दुष्ट पिशाच आदि ने प्रवचना के लिये इनको कह दिया है । इसी पद्धति से काम की नित्यता को मानने वाले जैनों का भत भी खण्डित हो जाता है, क्योंकि वहाँ भी यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि यह नित्य है या
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II वेदार्थपारिजात: कृतोऽथवा ॥ सर्वदा चापि पुरुषाः प्रायेणानृतवादिनः । यथाद्यत्वे न विलम्भस्तथातीतार्थकीर्तने ॥ ” इति । ( चो ० सू ० वा ० १३४-१४०, १४३-१४४ ) । किञ्चहानुमाने कोऽप्यस्ति सर्वज्ञः, तत्सर्वज्ञत्वमिति वा प्रतिज्ञायाः सिद्धावपि नेष्टसिद्धिः, अभिमतस्य तदसिद्धेः । बुद्धस्य सर्वज्ञत्वसिद्धया आर्हतागमस्य प्रामाण्यासिद्धेः । जिनस्य महावीरस्य वा सर्वज्ञत्वसिद्धो न बौद्धागमप्रामाण्यं सिद्धयति । यो मार्गजिज्ञासया ग्रामं प्रविशञ्छ्वभिस्वज्यंते स सर्वज्ञ इत्युपहासास्पदमिति रीत्या परस्परव्याघाताच्च तदसिद्धिः । बौद्धजिनस्य सार्वश्यं खण्ड्यते, जैनैश्च बुद्धस्य तन्निरस्यते । न चोभयोरपि सार्वश्यं वक्तु शक्यम्, परस्परविरोधात् । बुद्धः सर्वज्ञो न कपिलकणादगोतमादयः, जिनः सर्वज्ञो न बुद्धव्यासजैमिन्यादय इति को वक्तु क्षमः, तत्तदनुयायिमतेन सर्वेषामेव सार्वश्या पायात् । सर्वमतेन तु न कस्यापि सार्वश्यम् । समेषां सार्वश्ये परस्परविरोधो न स्यात्, वस्तुनि विकल्पासम्भवात् । अत एवोच्यते---- " नरः कोऽप्यस्ति सर्वज्ञस्तत्सर्वज्ञत्वमित्यपि । साधनं यत्प्रयुज्येत प्रतिज्ञान्यूनमेव तत् ॥ सिषाधयिषितो योऽर्थः सोऽ-नयानाभिधीयते । यत्तूच्यते न तत्सिद्धौ किञ्चिदस्ति प्रयोजनम् ॥ यदीयागमसत्यत्वसिद्धयै सर्वज्ञतोच्यते । न सा सर्वज्ञसामान्य-सिद्धिमात्रेण लभ्यते ॥ यावद् बुद्धो न सर्वज्ञस्तावत्तद्वचनं मृषा । यत्र क्वचन सर्वज्ञे सिद्धे तत्सत्यता कुतः ॥ अन्यस्मिन्नहि सर्वज्ञे वचसोऽन्यस्य सत्यता । सामानाधिकरण्ये हि तयोरङ्गाङ्गिता भवेत् ॥ ” इति । किञ्चार्हतानां मतेन ज्ञानादर्थान्तरमात्मा, पूर्वोत्तर चिह्नर्तिनोऽनुस्यूत चैतन्यस्यैवात्मत्वात् । प्रतिनियतार्थावभास-ज्ञानेषु अहमहमिकतया प्रतिप्राणि भासमानमन्वितं चिद्रूपमेवात्मतत्त्वमिति तदभ्युपगमात् । तस्य च परिणामिनित्यता किसी का बनाया हुआ । प्रायः पुरुष असत्यभाषी होते हैं, जैसे आज उनकी बात पर विश्वास नहीं किया जाता, वैसे ही उनकी बीती बातों पर भी विश्वास करना कठिन है | " Free के द्वारा सर्वज्ञ या सर्वज्ञत्व प्रतिज्ञा की सिद्धि हो जाने पर भी आपके अभिमत की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि बुद्ध की सर्वज्ञता की सिद्धि होने पर जैनागमों का प्रामाण्य न सिद्ध हो सकेगा और जिन अथवा महावीर की सर्वज्ञता की सिद्धि होने पर बौद्ध आगमों का प्रामाण्य नहीं सिद्ध होगा । इस प्रकार परस्पर व्याघात के कारण कोई सर्वज्ञ सिद्ध नहीं हो सकेगा । यह सर्वज्ञता का उपहास नहीं तो और क्या है कि सर्वज्ञ पुरुष मार्ग की जिज्ञासा से गाँव में जाता है और वहाँ पर कुत्ते उसको देखकर भौंकने लगते हैं । बोद्ध जिनकी सर्वज्ञता का खण्डन करते हैं और जैन बुद्ध की सर्वज्ञता का । परस्पर विरोध के कारण कोई भी सर्व सिद्ध नहीं हो सकता । यह कौन हता है कि बुद्ध सर्वज्ञ है, कपिल कणाद, गौतम नहीं | जिन सर्वज्ञ हैं, बुद्ध, व्यास, जैमिनि नहीं । उन उनके अनुयायियों में अनुसार सभी सर्वज्ञ हैं । सर्व मत से कोई भी सर्वेश नहीं हैं । यदि सभी सर्वज्ञ हों, तो उनमें परस्पर विरोध नहीं रहेगा, क्योंकि वस्तु का स्वभाव तो एक ही होता है । इसीलिये यह कहा जाता है--" कोई पुरुष सर्वज्ञ है, इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर उसकी सर्वज्ञता की सिद्धि के लिये जो साधन प्रयुक्त किया जाता है, वह प्रतिज्ञा की अपेक्षा fir होने के कारण प्रतिज्ञा को सिद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि इससे जो अर्थ सिद्ध किया जा सकता है, उसको प्रतिज्ञा नहीं कहते और जो मर्थं कहा जाता है, उसको सिद्ध करने का कोई प्रयोजन नहीं है । जिस आगम की सत्यता की सिद्धि के लिये सर्वज्ञता सिद्ध की जाती है, उसकी सिद्धि सामान्य रूप से सर्वज्ञ की सिद्धि होने पर नहीं हो सकती । जब तक बुद्ध की सर्वज्ञता सिद्ध न होगी, तब तक उसका वचन मिथ्या हो माना जायेगा । चाहे जिस व्यक्ति में सर्वज्ञता की सिद्धि होने से बुद्ध का वचन कैसे प्रमाण हो जायगा? अन्य व्यक्ति के सर्वज्ञ सिद्ध होने से अन्य व्यक्ति का वचन सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि सर्वज्ञ और वचन का सामानाधिकरण्य होने से, अर्थात् दोनों एक व्यक्ति में रहने से यह हो सकता है । " जैन दार्शनिकों के मत में आत्मा ज्ञान से भिन्न नहीं हैं । पूर्व और उत्तर वर्ती चित्ति ( ज्ञान ) से मन्वित चैतन्य ही उनके मत में आत्मा है । प्रतिनियत ( अपने - अपने रूप से निश्चित ) अर्थ वस्तु के आमासक ( बताने वाला ) ज्ञानों में अहम् रूप से ( यह ज्ञान में ही हूँ, इस रूप से ) प्रत्येक प्राणी में भासित हो रहा चिद्रूप ही आत्मतत्त्व उनके मन में माना गया है । इस प्रकार के परिणामी नित्यता को
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वेदार्थपारिजातः १४५ तैरुपेयते । मध्यमपरिमाणा असंख्यातावयवाश्च जीवास्तैरुपेयन्ते । तेषामनावृतत्वेऽपि सर्वसम्बन्धाभावात् कथ सर्वभासकत्वस्? सम्बन्धाभावेऽपि प्रकाशकत्वेऽविशेषादावृतानामपि कुतः सार्वश्यं न स्यात्? यदप्युक्तम्- ' धर्माद्यविशेषार्थप्रतिपादकस्यागमस्य तत्कार्यस्योपलभ्यमानत्वेन कार्यानुपलम्भोऽपि न वक्तुं शक्यः ' इति, तदपि न तदागमस्याशेपार्थप्रतिपादकत्वासम्प्रतिपत्तेः । बौद्धा बुद्धागमस्याशेषार्थप्रतिपादकत्वं जैना जिनागमस्य च तथात्वं वदन्ति, परस्परविरोधादेकस्यापि तदसिद्धेः । तेनापीरुषेयवेदस्याशेषार्थं प्रतिपादकत्वं युक्तम् । यदुक्तम् - गुणवद्वक्तृत्वेनैव तत्प्रामाण्यमिति, तदपि न, अनाप्ताप्रणीतत्वेन तत्प्रामाण्योपपत्तौ गुणवद्वत्तृकत्वस्या-नपेक्षणात् । यदुक्तम्- ' सर्वज्ञत्वस्य व्यापकं सर्वार्थसाक्षात्कारित्वम्, तदप्यनुमानेन प्रसिद्धयति । तथाहि-- कश्चिदात्मा सकलार्थ-साक्षात्कारी, तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिबन्धप्रत्ययत्वात् यथा अपगततिमिरादिप्रतिबन्ध लोचनविज्ञानं रूपसाक्षा-त्कारि । न तावदयं विशेषणासिद्धो हेतु:, आगमद्वारेणाशेषार्थग्रहणस्वभावत्वस्यात्मनि प्रसिद्धत्वात् । नापि विशेष्यासिद्धो हेतु:, प्रक्षीणप्रतिबन्धप्रत्ययत्वस्य प्रसाधयिष्यमाणत्वात् । तस्माद् व्यापकानुपलम्भादपि न सर्वज्ञाभावसिद्धिरिति तन्न, सर्वार्थग्रहण-स्वभावत्वासिद्धया विशेष्यासिद्धेः । न चागमेन तत्सिद्धिरिति वाच्यम्, तदागमप्रामाण्यासम्प्रतिपत्तेः । अन्यथा तेनैव सर्वज्ञसिद्धिरपि स्यात् किमनुमानेन? विशेष्यासिद्धिरपि, भावकर्मादिभावरूपप्रतिवन्धकानां सम्यग्दर्शनज्ञानाभ्यां निवृत्त्यसंभ-वात् । न च कायक्लेशरूपेण तपसा तत्सम्भवः, तस्य सर्वकर्मनिवर्तकत्वासम्भवात् । बौद्धरीत्या कायक्लेशस्य कर्मफलतया नारकादिकायसन्तापवन्न कर्मक्षयहेतुत्वम् । अथ तपःकर्मशक्तीनां सङ्करेण क्षयकरणशीलं तप इति, तदपि न, एकरूपादपि मानते हैं | मध्यम परिणाम वाले असंय जीवों की सत्ता मानते हैं । वे यद्यपि अनावृत हैं, अर्थात् ढँके हैं, दबे या ज्ञान शुन्य नहीं हैं, तब भी उनका सबके साथ सम्बन्ध तो है नहीं, फिर उनमें सर्वभासकता कैसे रह सकती है? सम्बन्ध के अभाव में भी यदि प्रकाशता मानी जाय, तो समान रूप से आवृत जीवों की भी सर्वशता में कौन बाधक होगा? " का कार्य है र्मादि अशेष अर्थों का प्रतिपादन इसको उपलब्धि होने से कार्यानुपलम्भ वाली आपत्ति नहीं दी जा सकती । " यह कथन भी इसलिये गलत है कि ये आगम धर्मादि अशेष कार्यों का प्रतिपादन करते हैं, ऐसी प्रतीति नहीं होती । क्योंकि बौद्ध बौद्धगम को सब विषयों के प्रतिपादक और जैन जिनागम को वैसे अशेषार्थ प्रतिपादक मानते हैं । परस्पर विरोध के कारण दोनों में से एक भी प्रमाण नहीं हो सकता । इसलिये अपौरुषेय वेद की ही अशेषार्थं प्रतिपादकता मानी जा सकती है । यह कहना भी गलत कि ' वेद का प्रामाण्य तभी माना जा सकता है, जब कि उसका कोई गुणवान् वक्ता माना जाय । " क्योंकि अनाप्त द्वारा प्रणीत न होना ही उसके प्रामाण्य के लिए पर्याप्त है, फलतः उसके लिए गुणवात् वक्ता की आवश्यकता नहीं है । यह कहा जाता है कि " सर्वार्थसाक्षात्कारित्व सर्वज्ञत्व का व्यापक है, यह अनुमान से सिद्ध होता है । जैसे कि कोई आत्मा सकलार्थ साक्षात्कारी है, क्योकि उसका ऐसा स्वभाव है और साथ ही उसके सब प्रतिबन्धक प्रत्ययों का क्षय हो चुका है, जैसे अन्धकार प्रभृति प्रतिबन्धों के हट जाने पर लोचनविज्ञान रूप का साक्षात्कार करता है । यह हेतु विशेषणसिद्ध नहीं है, क्योंकि आगम के द्वारा आत्मा का अशेषार्थं ग्रहण स्वभाव प्रसिद्ध है । यह हेतु विशेष्यासिद्ध भी नहीं होगा, क्योंकि यह आगे सिद्ध किया जा रहा है कि आत्मा का ज्ञान सभी प्रतिबन्धों से रहित है । इस प्रकार व्यापकानुपलब्धि के द्वारा भी सर्वज्ञ का अभाव नहीं सिद्ध किया जा सकता ", किन्तु यह कथन इसलिये गलत है कि आत्मा की सर्वार्थग्रहणस्वभावता सिद्ध नहीं होती, अतः विशेष्यासिद्धि का परिहार नहीं हो सकता । आगम से विशेष्य की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि उनके आगम का प्रामाण्य स्वीकृत नहीं है, अन्यथा उनके शास्त्र के अनुसार सो सर्वज्ञ की सिद्धि हो ही गई, फिर अनुमान की क्या आवश्यकता है । फिर भी विशेष्यसिद्धि तो वर्तमान ही रहेगी, क्योंकि भावरूप कर्म श्रादि प्रति arasi की निवृत्ति सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान आदि से नहीं हो सकती । कायक्लेशरूप तप से भी उनकी निवृति नहीं होगी, क्योंकि प म का free नहीं हो सकता | बौद्ध मत में कायक्लेश कर्म का फल है, फलतः वह नारकादि कायसन्ताप के समान कर्मक्षय का हेतु नहीं हो सकता | यदि आप ऐसा माने कि तप और कर्म की शक्तियों के सांकर्य के कारण तप कर्मक्षय का कारण हो जायगा', तो यह भी नहीं संभव है, क्योंकि ऐसा मानने पर एक समानरूप वाले विचित्र शक्तियों वाले कर्म का क्षय होने लगेगा । १ ९.
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१४६ चित्रशक्तिस्य कर्मणः क्षयोपपत्तेः । वस्तुतस्तु प्रमाणाभावान्न तपसः कर्मक्षयहेतुत्वम् । न च तत्रागमप्रामाण्यम्, तत्प्रामाण्यस्य सर्वज्ञसिद्धयायत्तत्वात् । raft धर्मकीर्तिना जल्पितम् -'निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः । न वाचो यत्नवत्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपाततः ॥ सर्वेषां विपक्षत्वान्निसातिशयाश्रिताः । सात्मीभावात्तदभ्यासाद्धीयेरन्नास्रवाः क्वचित् ॥ ' ( प्र. या. ३।२२१-२२२ ) । दोषा हि निसातिशयधर्माण:, सर्वेषां विपक्षस्यात् । ते हि विकल्पप्रभवाः, सत्यप्युपादाने कस्यचिन्मनोगुणस्याभ्यासादपकर्षिणः, तत्पाट निरन्वयविनाशधर्माण: स्युः, ज्वालादिवत् । यथा ज्वालादयः प्रतिपक्षस्योदकादेत्कर्षे सत्यत्यन्तविनाशधर्माण-स्तद्वत् । तथा च प्रयोगः - ये वदुपधानादपकर्षिणस्ते तदत्यन्तवृद्धा सदभिभवान्निरन्वय विनाशधर्माणः, यथा ज्वालादयः सलिलाभिवृद्धौ । नैरात्म्यदर्शनेन च सर्वेषां दोषाणा निवृत्तिः, सत्कायदर्शनस्येवाविद्यात्वात् । तत एव स्नेहस्ततश्च द्वेषः । सत्कायदर्शनजन्मनां दोषाणां तत्प्रतिपक्षतैरात्म्यदर्शनाभ्यासात् प्रहाणं भवत्येवति । तदपि निःसारम्, नैरात्म्यदर्शनस्याविद्यारूपत्येन निरुपद्रवभूतार्थत्वानुपपत्तेः नेरात्म्यस्य मोहमूलत्वात् । किञ्च, क्षणभङ्गपक्षे वन्धमोक्षव्यवस्थाया वैयधिकरण्येनैकाधिकरण्यानुपपत्तेः । बौद्धमते वोज्यः क्षणः सवनानुष्ठान मन्यस्मिन् क्षणे, तत्फलं चान्यचैव, क्षणस्यास्थापितया निर्विकल्पात्या च व्यापारासम्भवात् । सन्तानस्यापि सन्तान्यनतिरिक्ततया तथापि तदनुपपत्तिरेव | किन ¥ निरन्वयविनश्वरत्वपक्षे नंरात्म्यदर्शनाभ्यासाऽपि नोपपद्यंत, रागाद्युपरमस्य विनाश-रूपत्वात् । विनाशस्य निर्हेतुकत्वेनापत्नसिद्धत्वमेवेति तदर्थमनुष्ठानादिप्रपामा व्यर्थं एव । किञ्च तेनाभ्यासेन रागादि-वस्तुतः तप को कशय की हेतुता में कोई प्रमाण नहीं है । नागम भी इसमें प्रमाण नहीं हो सकता, क्योकि इस वायम का अनाथ हो सर्वज्ञ की सिद्धि के अधीन है । धर्मकीर्ति में भी जो यह कहा है कि -- " दोष रहित सिद्ध वस्तुविषयक ज्ञान का विपर्यय में बाथ विपरीत प्रयत्नों के रहते taar, aaf बुद्धि ( ज्ञान ) का यह स्वभाव है कि यह वस्तुस्वभाव की ओर ही स्वभावतः प्रवृत्त होती है । सभी रागादि आसवों का कभी न कभी विनाश अवश्य हा जाता है क्योंकि ये सभी चयापचय ( बढ़त घटना ) लगाव वाले हैं और इनके विपक्ष में चिन्ता निरन्तर क्रियागोल है " । इस उक्ति के अनुसार दोष सहा अत्यन्त ह्रासमय स्वभाव के हैं, क्योंकि इनका दिपक्ष प्रबल स्वभाव का है । दोषों की उत्पत्ति विकल्प में होती है । योग्य उपाधान में गुणों से विकास होने पर ये दोष क्षीण हो जाते हैं और इसी अभ्यास में पटुता आने पर उनका विश्वव विनाष अग्रवाल के हो जाता । अग्नि के पक्षी जल के अभिय होने पर जैसे क्षग्निज्वाला एक दम शान्त हो जाती है, उसी प्रकार समोगुणों का अत्यन्त विकास होने पर ये दोष भी पूरी तरह से बह हो जाते हैं । अनुमान का स्वरूप इस प्रकार का होगा जो ( दोष ) जिस ( गुण ) के माने से दब जाते हैं, वे उसका उत्कर्ष होने पर उससे अभिभूत होकर पूरी तरह से नष्ट हो जाते है, जैसे जल की अधिकता में ज्याला का अवन्त विनाश हो जाता है । नैवस्य दर्शन से सभी दोषों की निवृत्ति हो जाती है, क्योंकि सत्कायवृद्धि, स्वष्टि को ही अविद्या माना गया है । इस सत्कायदर्शन के कारण हो आत्मीय में सोह बौर पर में द्वेष बुद्धि उत्पन्न होती है । तत्त्वदृष्टि के कारण उत्पन्न दोषों का प्राण उसको प्रतिपक्षभूत नैरात्म्यदृष्टि के अभ्यास अवश्य हो जायगा " { feng यह पूरा कथन निःसार है, नैरात्म्य दर्शन अविद्या रूप अर्थात् अज्ञान रूप होने के कारण वह कभी भी सत्स्वरूप नहीं हो सकता, अत: वह दोष रहित सिद्ध वस्तु विषयक ज्ञान ( निरुपद्रवभूतार्थस्वभाव ) हो नहीं सकता, मूल में क्योंकि नैरात्म्य मोह रूसो याम विद्यमान है | क्षण में बन्धन्यो व्यवस्था का सामानाधिकरण्य ( एक साथ होना ) कभी नहीं बन सकता, क्योंकि सभी वस्तुको क्षणगंनिता के कारण ही बम्ध है वहां मोक्ष की स्थिति बन ही नहीं सकती । बोद्धपत्र में बद्ध क्षण भिन्न है, साधन का अनुष्ठान किसी दूसरे क्षण में है और उसका फल कहीं अन्यत्र ही । क्षण तो अस्थायी है, frfo ल्य है, अतः एक में ही वे सब व्यापार नहीं हो सकते । सन्तान भी सन्तानी से अतिरिक्त है, मतः वहाँ भी यह संभव नहीं हो सकता । जब आप निरन्वय विनाश मानते हैं तो नैरात्म्य दर्शन का अभ्यास मी टिक न सकेगा । रागादि की उपरति विनाश स्वभाव ही है । विनाश तो निर्हेतुक है, अतः उसके लिये यत्न की अपेक्षा न रहने से किसी प्रकार का अनुष्ठानादि का प्रयत्न व्यर्थ ही है | आप यह बताइये कि ' उस अभ्यास
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वैदार्थपारिजातः १४७ चित्तक्षणस्य नाश: क्रियते, भाविनो वाऽनुत्पादः, निरास्रर्वाचित्तसन्तत्युत्पादो वा? नाद्यः भवन्मते विनाशस्य निर्हेतुकतया कुतश्चिदुत्पत्तिविरोधात् । नापि द्वितीयः, उत्पादाभावस्यैवानुत्पादत्वेनाभावरूपस्योत्पादासम्भवात् तथात्वेऽपसिद्धान्त-प्रसङ्गात् । तत्छक्तिक्षयायापि प्रयासो नोपपद्यते, क्षयस्याभावरूपत्वात् । एतेन सन्तानस्योच्छेदार्थोऽनुत्पादार्थोऽपि प्रयासोऽनुप-पन्न एव । तदुच्छेदानुत्पादयोग्भावरूपत्वेन कुतश्चिदात्मलाभासम्भवात् । किञ्च सिद्धे वास्तवे सन्ताने तदुच्छेदाद्यर्थ प्रयासो युक्तः, क्षणातिरिक्तस्य तस्य भवतानभ्युपगमात्; सन्तानिनिषेधे तन्निषेधस्य सिद्धत्वात् । अन्त्यज्ञानस्य ज्ञानान्तराकर्तृत्वे सन्तानोच्छेदो भवति । तच्च कुतो न करोति? सत्त्वात् तदुत्पादे शक्तत्वाद्वा? शतमपि सहकारिणामभावान्नोत्पादयतीति न सङ्गतम्, तदभावस्याप्रतिबन्धकत्वात् । तेन हि प्रतिबन्धो भावस्योत्पत्तेः, उत्पादकत्वस्य वा? नाद्यः त्वन्मते कारणान्तरा-भावस्याभावरूपतया सकलशक्तिविरहस्वभावाभावस्य नोत्पत्ति प्रतिबध्नाति शशविषाणयत् । न द्वितीयोऽपि यत उत्पाद-कत्वस्य प्रतिबन्धः कार्योत्पादक पदार्थसत्तापहारः 1 सोऽपि शशविषाणप्रख्ये दुर्घटः । अन्त्यचित्तक्षणस्यार्थक्रियाकारित्वाभावेऽ-वस्तुत्वम्, ततस्तज्जनकस्यापीत्यशेषचित्तसन्तानस्यैवावस्तुत्वम् । यदुक्तम्- ' स्वसन्तानवर्तिनोऽज्ञानक्षणस्याजनकत्वेऽपि योगिज्ञानस्य जननान्नाशेषस्य तत्सन्तानस्यावस्तुत्वम् । यदा सर्वज्ञस्तमन्त्यक्षणं जानाति, तदा सोऽन्त्यः क्षणो योगिज्ञानस्य सहचारितया तदुत्पादको भवति, नाकारणं विषय इति सिद्धान्तादिति ', तन्न, रमादेरेककालस्य रूपादेरव्यभिचार्यनुमानाभावप्रसङ्गात् । एकसामग्र्यधीनत्वे रूपरसयोर्नियमेन कार्यारम्भकत्वेऽन्यत्रापि कार्यद्वयारम्भकत्वं स्यात्, योगिज्ञानान्त्यक्षणयोरेकसामग्र्यधीनत्वाविशेषात् । से आग १ रागादिति क्षण का नाश करते हैं, २ भावी क्षण के उत्पाद को रोकते हैं, या व विरासत चित्तसन्तति का उत्पादन करते हैं? पहला पक्ष इसलिये मान्य नहीं होगा कि आपके मत में विनाश के निर्हेतुक होने से उसकी किसी से उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती । द्वितीय पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि उत्पत्ति का प्रभाव ही तो अनुत्पाद है बोर अभाव किसी की उत्पत्ति में कारण नहीं हो सकता । फिर ऐसा मानने पर आपके सिद्धान्त की हानि हो पायी । उसकी शक्ति के क्षय के लिये भी प्रयास की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि क्षय अभाव रूप है । इसीलिये सन्तान के उच्छेद अथवा अनुत्पाद के लिये भी प्रयास की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उच्छेद ( नाश ) और अनुत्पाद ( पैदा न होना ) भी अभाव रूप ही है, अतः इनसे कभी स्वरूपाम नहीं हो सकता । दूसरी बात यह है कि वास्तविक सन्तान की सिद्धि होने पर हो उसके उच्छेद वादि के लिये प्रयास हो सकता है । आप सन्तान को को क्षण से अतिरिक्त नहीं मानते । सन्तानी का जब निपेध हो गया तो सन्तान का निषेध तो स्वतः सिद्ध है । अन्य ज्ञान जब ज्ञानान्तर को पैदा नहीं करता तो सन्तान का उच्छेद माना जाता है । यह अन्त्य ज्ञान सत्त्व और उत्पाद सामर्थ्य के रहते भी क्यों ज्ञानान्तर को पैदा नहीं करता । ' समर्थ है, किन्तु सहकारी के अभाव में वह ज्ञानान्तर की उत्पन्न नहीं करता ' यह कथन भी संगत नहीं, क्योंकि अभाव की प्रतिबन्धकता मान्य नहीं है । वह ( सहकारी का अभाव ) अभाव की उत्पत्ति में प्रतिबन्धक होगा या उसको उत्पादकता में? प्रथम पक्ष इसलिये मान्य नही होगा कि आप के मत में कारणान्तराभाव अभाव रूप है, अत: वह सकल शक्ति विरह स्वभाव के बनाव की उत्पत्ति में शशविषाण की तरह प्रति-बन्धक नहीं हो सकता । द्वितीय पक्ष भी इसलिये मान्य नहीं होगा कि उत्पादकता के प्रतिबन्ध को निवृत्ति उस समय हो जाती है जब कि उसमें कार्योत्पादक पदार्थ की सत्ता देखी गई हो । शशविषाण के तुल्य उस अभाव में उत्पादकता की प्रतिका का मिलना है । अस्य विलक्षण में अर्थक्रियाकारिता के न रहने पर यह अवस्तु मान लिया जायगा और ऐसा होने पर इसके जनक ज्ञान को भी जबस्तु मानना पड़ेगा, फलतः सारी चिन्तसन्तति ही अवस्तुभूत ( तथ्यहीन ) सिद्ध हो जायगी । इस पर कहा जाता है कि " अपने सन्तान में विद्यमान अज्ञान क्षण के स्वयं कारण न होने पर भी योगिज्ञान से उसमें अर्थक्रिया-कारिता होती है, अत: पूरे सतान की अवस्तुता न होगी । जब सर्वश उस अन्य क्षण को जान लेता है, उस समय वह अस्य क्षण योगि ज्ञान की सहायता से उसका उत्पादक होता है । ऐसी मान्यता है कि ' दिना कारण के कोई विषय नहीं होता ', किन्तु यह उक्ति भी fe नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर रसादि के साथ रूपादि की एककालता में अव्यभिचारी अनुमान नहीं होने पावेगा । एक सामग्री के अधीन रूप और रस की, नियमतः दो कार्यों की आरम्भकता मानने पर अन्यत्र भी इस प्रकार की कार्यद्वयारम्भकता - माननी पड़ेगी, क्योंकि योगिज्ञान और अन्त्य क्षण की एक सामग्री की अधीनता उसी प्रकार की है ।
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१४८ वेदार्थपारिजातः अयमाशयः --- बौद्धमते द्वितीयक्षणवर्तनो रसस्य प्रथमक्षणवर्ती रस उपादानम् प्रथमक्षणवर्ति रूपं च सहकारि । प्रथमक्षणवति रूपं सजातीयं द्वितीयक्षणवति रूपं जनयित्वैव विजातीये द्वितीयक्षणवर्तिनि सहकारि भवति । तथा च यदि अन्त्यो ज्ञानक्षणः सजातीयं ज्ञानक्षणान्तरमनुत्पाद्येव विजातीये सन्तानान्तरवर्तिनि योगिज्ञाने आलम्बनतया सहकारी भवेत्, तदा पूर्वक्षणवति रूपमपि सजातीयं रूपक्षणान्तरमजनयित्वैव विजातीये द्वितीयक्षणवर्तिनि रसे सहकारि स्यात् । तथा च द्वितीयक्षणतिरसाद रूपानुमानं न स्यात् । यदि चान्त्यक्षणस्य भिन्नसन्तान कार्यजननसामर्थ्य न स्यात्, तदार्थक्रियाकारित्वा-भावेनासत्त्वमेव स्यात् । तस्यापि सत्वेऽर्थक्रियारहितस्वाक्षणिकस्यापि कुतः सत्त्वं न स्यात्? निरास्रवचित्तसन्तत्युत्पत्ति-लक्षणा सा तत्प्रयाससाध्येति पक्षेऽपि तस्याः सस्वे क्षणिकत्वम् असत्वे साध्यत्वानुपपत्तिः । सान्वयचित्तसन्तानेऽभ्युपगम्य-सिद्धान्तः, निरन्वये च बन्धमोक्षव्यवस्थानुपपत्तिः । यदि सन्तानं परमार्थसत्, तदा नामान्तरेणात्मैव स्वीकृतः स्यात्, अपरमार्थसत्वे तत्र बन्धमोक्षव्यवस्थानुपपत्तिः । न च रागादिदोषाणां कम्बलादिवज्ज्ञानावरकत्वमिति प्रोक्तमेव, सत्यपि रागादी घटादिज्ञानदर्शनात् । चित्तविक्षेपजनकत्वेन भावनाप्रतिबन्धकत्वेनैव तदपसारणं युक्तम् । भावनायास्तज्जन्यसाक्षात्का-रस्य विधुरपरिभावित कामिनीसाक्षात्कारवद् मिथ्यात्वमेवेति न भूतार्थविषयत्वम् । अपि च ज्ञानमन्तरा भावना, सार्वश्य-मन्तरा धर्मादिज्ञानम्, सति ज्ञाने तद्भावनया सार्वश्यमित्यादि परस्पराश्रयत्वमपि । सति ज्ञाने भावनानैरर्थक्थम् । न च मिथ्याज्ञानभावनया सम्यग्ज्ञानं संभवति । नैरात्म्यभावना मिथ्याज्ञानभावनैवेति न तयाऽविद्यानिवृत्तिः सम्भवति, न वा रागादिदोषनिवृत्तिः, ब्रह्मज्ञानस्यैवाविद्यानिवर्तकत्वात्, ' तमेव विदित्वातिमृत्युमेति ' ( वा. सं. ३१-१८ ) इति श्रुतेः । मिथ्याज्ञान-निवृत्ति विना प्रतिपक्षभावनयापि निःशेषसर्गादिनिवृत्तिर्न सम्भवति किन्तु यथा क्रोधेन कामाभिभवोऽपि सातिशय एव, इस कथन का अभिप्राय यह कि बौद्ध मत में द्वितीय क्षणवर्ती रस का प्रथम क्षणवर्ती रस उपादान है और प्रथम क्षणवर्ती रूप सहकारी है । प्रथम क्षणवर्ती रूप सजातीय विजातीय क्षणवर्ती रूप को उत्पन्न करके ही विजातीय द्वितीय क्षणवर्ती रस का सहकारी होता है, किन्तु इस परिस्थिति में अन्त्य ज्ञान क्षण सजातीय अन्य ज्ञानक्षण को विना पैदा किये ही विजातीय सन्तानान्तरवर्ती योगिज्ञान में बलम्बन रूप सहकारी होगा तो पूर्व क्षणवर्ती रूप भी अन्य सजातीय रूपक्षण को बिना पैदा किये ही विजातीय द्वितीय क्षणवर्ती रस का सहकारी हो जायगा, तब द्वितीय क्षणवर्ती रस से रूप का अनुमान नहीं होगा । यदि अन्त्य क्षण की भिन्न सन्तान को पैदा करने की सामर्थ्य नहीं मानी जाती तो अर्थक्रियाकारिता के अभाव में उसकी असत्ता माननी पड़ेगी । इस पर भी यदि उसकी सत्ता मानी जाती है तो अर्थक्रिया से रहित क्षणिक की सत्ता क्यों न मानी जाय? यदि यह माना जाय कि अर्थक्रिया यहाँ पर faraa चिन्तसन्तति की उत्पत्ति के रूप में विद्यमान हैं, जो कि उसके प्रयास से ही साध्य होती है, तो इस पक्ष में भी यदि उसकी सत्ता मानी जाती है तो वह भी क्षणिक होगी और यदि मसव मानते हैं तो वह साध्य नहीं हो सकती । सान्वय चित्तसन्तान को मानने पर आपको अपने सिद्धान्त के farta red feat न्त मानना पड़ेगा और चित्तसन्तान की निरन्वयता में बन्ध और मोक्ष की व्यवस्था नहीं बन पावेगी । यदि आप सन्तान को परमार्थसत् मानें तो यह अन्य नाम से आत्मा को ही मानना हुआ । यदि वह अपरमार्थसत् है तो उसकी बन्ध और मोक्ष की aaratar कैसे होगी । यह कहा जा चुका है कि रागादि दोष कम्बल आदि जैसे किसी वस्तु को ढंग लेते हैं, उसी तरह ज्ञान के आवरक नहीं होते, क्योंकि रागादि के रहते भी घट आदि का ज्ञान होता ही है । ये चित्त में विशेष पैदा करके भावना में विघ्न डालते हैं, इस for इनको हाया जाता है । भावना और उससे पैदा हुमा दृष्ट का साक्षात्कार विधुर के द्वारा भावित कामिनी साक्षात्कार के समान ही मिथ्या है, अत: उसका विषय वास्तविक नहीं होता । दूसरी बात ज्ञान के बाद भावना, सर्वज्ञता के बाद धर्मादि का ज्ञान, ज्ञान होने पर उसकी भावना से सर्वज्ञता, इस प्रकार इनकी परस्पराश्रयता है । जो महान् दोष है | यदि ज्ञान हो गया तो फिर भावना व्यर्थ है । मिथ्या ज्ञान की भावना से सम्यज्ञान हो मो नहीं सकता । वैरात्म्यमाना मिथ्याज्ञान की हो भावना है, अतः इससे अविद्या की fagta नहीं हो सकती और न रागादि दोषों की ही निवृत्ति हो सकती है | after आदि की निवृत्ति तो ' उस ब्रह्म को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को जीतकर अमरता की ओर बढ़ता है " इस श्रुति के अनुसार ब्रह्म ज्ञान से ही होती हैं । मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति के बिना प्रतिपक्ष की भावना से भी सारी सृष्टि की निवृत्ति नहीं हो सकती, किन्तु क्रोध से जैसे कुछ देर के लिये काम दब जाता है, उसी
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वेदार्थपारिजातः १४६ तथैव नैरात्म्यादिप्रतिपक्षभावनयापि तदभिभव एव नात्यन्तविनाशः, ' नान्यः पन्था ' ( वा. सं. ३१-१८ ) इति श्रुतेः । सलिला -भिवृद्धावपि ज्वालादीनामभिभव एव न विनाशः, पुनरप्युद्भवदर्शनात् । एवं विरुद्धविधेरपि सर्वज्ञाभावः सिद्धयत्येव । विमतोऽसर्वशः, जीवत्वान्नरत्वाद्वा, अस्मदादिवत् । तादृशैरेवा-नुमानः सर्वज्ञत्वव्यापकसर्वसाक्षात्कारित्वविरुद्धस्य तदसाक्षात्कारित्वस्य नियतार्थसाक्षात्कारित्वस्य वा सिद्ध्यापि सर्वज्ञत्वा-भावसिद्धिर्भवत्येव । न चात्मविशेषे तद्वयापकसिद्धिः सम्भवति, तस्य खण्डितत्वात् । एवं मूलभूतवेदरूपागमप्रामाण्याभ्युप-गममन्तरा सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणामसिद्धिः । न च सर्वज्ञनिमितेनागमेन तत्सिद्धिः सर्वज्ञताया अद्याप्यसिद्धेः । न च ज्ञानेन सत्यभूतानां कर्मणां प्रक्षयः, ज्ञानस्य ज्ञापकत्वात् । ज्ञापकमेव प्रमाणम्, न त्वकृतकर्तृ प्रमाणम् । न च कायक्लेशैरनन्तानां सञ्चितकर्मणां प्रक्षयः सम्भवति, प्रमाणाभावात् । पुण्यानां पुण्यात्मकेन तपसा विरोधाभावादपि तदप्रक्षयः । एवं कर्माप्रक्षय-सिद्धया कारणविरुद्ध विधिनापि सर्वज्ञत्वाभावः सिद्धयति । तद्विरुद्ध कार्यविधिरपि सर्वत्राभावसाधकः । भवदभिमतसर्वज्ञनिमिते आगमे आत्मनां मध्यमपरिमाणवत्त्वं नित्यत्वं सावयवत्वं चोक्तम् । तदेतत्सर्वज्ञत्वेन विरुद्धस्यात्पज्ञत्वस्यैव कार्यम् । न चैतच्छक्यसमर्थनम्, घटादीनां तथाभूतानामनित्यत्व-दर्शनात् । वक्तृत्वादिकमपि सर्वज्ञत्वाभावसाधकम् । न च तदसत्त्वाभ्युपगमे वक्तृत्वादिधर्मोपेतत्वानुपपत्तिः, व्यामोहादपि तत्सम्भवात् । ' अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् । यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ ' इति रीत्या सरह से नैरात्म्य प्रभूति प्रतिपक्ष की भावना से भी उनका केवल अभिभव मात्र ही होता है, आत्यन्तिक विनाश नहीं । इसके लिये श्रुति प्रतिपादित मार्ग के सिवाय ' अन्य कोई मार्ग नहीं है । ' पानी की अधिकता हो जाने पर भी ज्वाला केवल दब जाती है, वह सर्वथा नष्ट नहीं होती, क्योंकि समय पाकर वह फिर नमक उठती है । इसी प्रकार विरुद्ध विधि से भी सर्वज्ञ का अभाव सिद्ध हो ही जाता है । विवादास्पद व्यक्ति असर्वज्ञ है ( सब कुछ जानते वाला नहीं है ) । क्योंकि वह हमारी ही तरह मनुष्य है, अथवा जीव है । इसी तरह के अनुमानों से सर्वज्ञत्व के व्यापक सर्वसाक्षा-करिव ( सबका प्रत्यक्ष ज्ञान करने वाला होना ) के विरुद्ध सर्वसाक्षात्कारित्व अथवा नियतार्थसाक्षात्कारित्व ( निश्चित वस्तु विषयक प्रत्यक्ष ज्ञान वाला होना ) की सिद्धि होने से भी सर्वज्ञ के अभाव की सिद्धि हो जाती है । किसी विशेष आत्मा में भी सर्वज्ञत्व के व्यापक सर्वसाक्षात्कारित्व की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि उसका खण्डन किया जा चुका है । इसी तरह मूलभूत वेदरूप आगम के प्रामाण्य को पाये बिना सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की सिद्धि भी नहीं हो सकती । सर्वज्ञ निर्मित मागम से इनकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योकि सर्वज्ञता तो अभी भी सिद्ध नहीं हुई है । ज्ञान से सत्यस्वरूप कर्मों का क्षय भी नहीं हो सकता, artfe are has ar पक होता है । अर्थात् वस्तु का ज्ञान मात्र कराने वाला होता है । अविद्यमान वस्तु को पैदा करने वाला नहीं । जो कुछ करता नहीं है, केवल ज्ञान मात्र कराता है उसको प्रमाण नहीं माना जाता । काय क्लेश से अनन्त संचित कर्मों का क्षय fear प्रमाण के नहीं हो सकता | पुण्यात्मक तप से पुण्य कर्मों का कोई विरोध न होने से भी उन पुण्य कर्मो का नाव तप से नहीं होगा । इस तरह से कर्मों के प्रक्षय के सिद्ध न होने से कारण विरुद्ध विधि से भी सर्वज्ञ का अभाव सिद्ध होता है | सर्वज्ञ के स्वरूप के विरुद्ध कार्यविधि भी सर्वज्ञ के अभाव में साधक है । आपके द्वारा स्वीकृत सर्वज्ञ ( महावीर ) के द्वारा निर्मित आगम में आत्मा को मध्यम परिणाम वाला, नित्य और सावयव माना है । यह कथन सर्वज्ञ के विपरीत किसी अल्पज्ञ का ही हो सकता है । इसका समर्थन किसी प्रकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये सब लक्षण घटादि में भी विद्यमान है, किन्तु नित्य नहीं माने जा सकते | जो वस्तु परिणामवाली अथवा अपरिमाणवाली हो, साथ ही जो वस्तु अवयव वाली भी हो, वह भी क्या कभी नित्य हो सकती है? agre आदि हेतु भी सर्वज्ञत्व के अभाव के साधक हैं, क्योंकि सर्वज्ञत्व के अभाव में भी वक्तृत्वादि धर्म की सत्ता मानी ही जा सकती है । आजकल के मनुष्य सर्वज्ञ न होते हुए भी बक्ता हैं ही । व्यामोह के लिये भी यह सब कुछ सम्भव है । ' विना कामना
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१५० वेदार्थपारिजातः वचनादिलक्षणं चेष्टितं नाकामस्य सम्भवति । कामे सति न रागाद्यभावनिबन्धनं सार्वश्यं शक्यसमर्थनम् । एतेन ' सर्वज्ञस्या-सत्ता न साधयितुं शक्या, नाप्यसर्वज्ञता, स्ववचनविरोधात् ' इत्यादिकमपास्तम्, निरुक्तरीत्या विमतस्यासर्वज्ञतायाः सर्वज्ञस्यासत्तायाश्च साधने बाधाभावात् । एतेन प्रमाणविरुद्धवक्तृत्वं हेतुत्वेन विवक्षितं तद्विपरीतं वा, वक्तृत्वमात्र वेत्याद्य-पास्तम्, सर्वथापि तत्सम्भवस्योक्तत्वात् । यदुक्तम् -'भगवतस्तथाभूतार्थवकृत्वासम्भव ' इति, तदपि श्रद्धामात्रम्, सर्वज्ञत्वाभावेन भगवत्त्वासम्भवात् । ज्ञानपूर्वकवकृत्वस्यापि कामचेष्टितत्वेन सर्वज्ञे तदभावात्तदसम्भवः । ज्ञानिनां परमेश्वरस्य च सत्यपि ज्ञाने मायाविद्यावत्त्वेन कामाभासमूलकं वचनादिचेष्टितं न विरुद्धयते, व्यवहारकाले पश्वादिभिश्चाविशेषादिति सिद्धान्तात् । नहि सुगतादि • सर्वज्ञता प्रतिपेधेऽन्येषां विधिरवश्यंभावी, नायं सर्प इति प्रतिषेधस्य क्वचित् सर्पविधानापर्यवसायित्वात् । न च तत्रापि विधिपर्यवसानम्, तस्य वक्तृतात्पर्याविषयत्वात् । न च सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तितया वक्तृत्वं तदसाधकम्, वचनस्य काममूल-कत्वसिद्धयेव तदभाववति तद्व्यावृत्तिसिद्धेः सर्वज्ञे कामाभावस्य त्वयाऽपीष्यमाणत्वात् । किञ्च, सर्वज्ञज्ञानार्थं सर्वज्ञापेक्षायां सत्यामपि न सर्वज्ञाभावज्ञानार्थं सर्वज्ञापेक्षा, पूर्वोक्तैरनुमानैरसर्वज्ञस्यापि तज्ज्ञानसंभवात् । अनुपलम्भेनापि सर्वज्ञाभावज्ञानं भवत्येव । यदि स्यात्प्रमाणपञ्चकैरुपलम्येत, नोपलभ्यतेऽतस्तदभावसिद्धिः । के इस जगत् में कहीं भी कोई किया नहीं देखी जाती यह प्राणी जो कुछ भी करता है, वह सब कामना के अधीन होकर ही करता है ' इस सिद्धान्त के अनुसार वचनादि लक्षण चेष्टा निष्काम व्यक्ति में नहीं हो सकती । इस नकार जब कामना सिद्ध हो जाती है तो इसके रहते रागादि के अभाव से बंधी हुई सर्वज्ञता का समर्थन किसी प्रकार नहीं किया जा सकता । इस प्रतिपादन से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि ' सर्वश की असत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती और न ही असर्वज्ञता ही सिद्ध की जा सकती है, क्योंकि ऐसा करने पर अपने ही वचन से विरोध होगा ' । कारण, ऊपर यह जलाया जा चुका है कि विवादास्पद व्यक्ति की असर्वज्ञता और सर्वज्ञ की असत्ताको सिद्ध करने में कोई बाधा नहीं है । इसी प्रकार उक्त प्रतिपादन से इसका भी खण्डन हो जाता है कि ' यहाँ हेतु के रूप में प्रभाष विरुद्ध वक्तृत्व विवक्षित है या उससे विपरीत, अथवा केवल वतृत्व विवक्षित है? ', क्योंकि इनमें से कोई भी पक्ष माना जाय, वह उक्त सिद्धि में बाधक नहीं हो सकता, यह कहा जा चुका है । यह कहना केवल अपनी अन्धमा को ही व्यक्त कर सकता है कि ' भगवान् कोई गलत बात नहीं कह सकते ', क्योंकि सर्वशत्व के अभाव में भगवत्व की ही सिद्धि कैसे हो सफेमी? ज्ञानपूर्वक वक्तृत्व भी बिना कामना के हो नहीं सकता और सर्वक्ष में कामरा का जब अभाव है तो उसमें वक्तृत्व कैसे सम्भव हो सकता है । ज्ञानी और ईश्वर में वो ज्ञान के रहते भी साथ और विद्या या विद्या के कारण कामाभास ( कल्पित कामना ) मूलक वचनादि चेष्टा को विद्यमानता में कोई बाधा नहीं होगी । वेदान्त सिद्धान्त में यह माना गया है कि व्यवहार काल में ज्ञानी और पशु दोनों ही समान रूप से व्यवहार करते हैं । सुगतादि की सर्वज्ञना का निपेक्ष पाद देने से कहीं अन्यत्र सर्वज्ञता की सिद्धि नहीं मानी जा सकती । ' यह सर्पे नहीं है ' यह निषेध कहीं भी सर्प का विधान करता नहीं देखा गया है । वक्ता के तात्पर्य का विषय न होने से ऐसे स्थलों मे वाक्य की विधि में तात्पर्य नहीं मानी जाती । यह कहना कि ' ree हेतु की विपक्ष से व्यावृत्ति संदिग्ध है, अत: उससे सर्वज्ञ की असत्ता अथवा बसर्वज्ञता की सिद्धि नहीं की जा सकती ', इसलिये असत्य है कि aur at anyatar की सिद्धि से ही सभी प्रकार की कामनाओं से रहित सर्वंश में वक्तृत्व की arga ( ragee का न होना ) सिद्ध ही है, क्योंकि सर्वज्ञ में कामना का अभाव आपके मत में भी स्वीकृत है । सर्वज्ञ के ज्ञान के लिये सर्वेश की अपेक्षा होने पर भी सर्वज्ञ के अभाव न होने ) के ज्ञान के लिये सर्वज्ञ की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त अनुमानों से असवंश को भी सर्वज्ञ के अभाव का ज्ञान हो ही सकता है । अनुपलम्भ से भी सर्वत के अभाव का ज्ञान होता ही है । यदि सर्वज्ञ हो तो उसकी उपलब्धि पाँचों प्रमाणों से होनी चाहिये, वह इनमें से किसी भी प्रमाण से उपलब्ध नहीं है, अतः उसका अभाव है । एक का अनुपलम्भ उसके अभाव का साधक है या सब का? इस तरह के विकल्पों को भी प्रवृत्ति वहाँ नहीं होगी, क्योंकि ऐसे विकल्पों से तो सक्षम रस की भी सत्ता सिद्ध हो सकती है, यह हम पहले बता चुके हैं । अस्मदादि के