वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 181–190
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 181–190
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वेदार्थपारिजातः १५१ न चैकस्य सर्वस्य वा तदनुपलम्भस्तदभावसाधक इत्यादिविकल्पः सम्भवति 1 तथात्वे सप्तमरसस्यापि सत्वसिद्धिः स्यादिति प्रागुक्तत्वात् । अस्मदाद्युपलम्भवत् सर्वानुपलम्भस्याप्यनुमातुं शक्यत्वात् । यदुक्तम् ' सर्वज्ञवद्वेदार्थज्ञोऽपि न कश्चित् सम्भवतीति तदुपहासास्पदम् विदितपदतदर्थशाब्दन्यायतत्त्वज्ञस्य वेद-वाक्यार्थपणे तदवबोधस्य दर्शनेन वेदार्थज्ञाभावसाधनस्य कालात्ययापदिष्टत्वात् । यदि चक्षुषा रूपप्रतिपत्तिर्भवति, तदा शब्देन शब्दार्थप्रतिपत्तिः किन्न स्यात्? न तथा सर्वज्ञसाधकं प्रमाणं किमप्युपलभ्यते । अत एव यदि चानुपलम्भमात्रेणातीन्द्रियार्थदर्शिनोऽभावः साध्येत तदा सर्वनाभावतत्त्वज्ञस्याप्यतोऽभावः किन्न साध्येत, विशेषाभावादित्यपास्तम्, विशेषाभावस्थासिद्धेः । तथा हि - यथा कचिद् घटमुपलभमानोऽपि वदेद् नाहं घटमुपलभ, तथैव सर्वबाधकप्रमाणसद्भावं साधकप्रमाणाभावं चोपस्थापयन्नुपलभमानोऽपि वदसि नाहं सर्वज्ञाभावतत्त्वज्ञमुपलभे । एतेन ' नवे जैमिनिरल्यो वा तदभावतत्त्वज्ञः सवपुरुषत्ववकृत्वादेः, रथ्यापुरुषवत् ' इत्यनुमानमप्याभासप्रायमेव, सत्त्वादीनां तदभावतत्त्वज्ञानेन विरोधाभावात्, सर्वज्ञो नास्तीत्यपि रथ्यापुरुषोऽपि जानात्येवेति सिद्धान्तस्य साध्यवैकल्यात् । वेदार्थोऽपि न भवति कश्चिदिति कथनमपि दुराग्रहमूलकमेव, चक्षुषा जायमानस्य रूपज्ञानस्येव वेदवाक्ये जयमानस्यार्थ ज्ञानस्यापलापायोगात् । " अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम: " इति वाक्यश्रवणेनापि स्वर्गाग्निहोत्रयोः साध्यसाधनभावो न प्रतीयत इति वदतो धामेव, स्वानुभवस्यापलापात् । अनुपलम्स की तरह सर्वानुपलम्भ का भी अनुमान किया हो जा सकता है, अर्थात् हम लोगों को सर्वज्ञ कोई वक्त दिखायी नहीं देल, : सभी को वह नहीं दिखायी देता, यह अनुमान सहज है । यह कहना कि ' सर्वज्ञ की तरह वेदार्थश ( वेद के अर्थ का ज्ञाता ) भी कोई सिद्ध नहीं हो सकेगा, एक हास्यास्पद बात होगी, क्योंकि जिसकी और पदार्थ का ज्ञान है और जो शाब्द व्याय ( शब्द से वर्थ का ज्ञान होने के कार ) की पूरी प्रक्रिया को जानता है, उसको वेद के वाक्यों सुनते ही वेदार्थ की प्रतीति देखो गई है, अतः वेदार्थव के नाव को भिद्ध करने वाले हेतु प्रत्यक्ष विरोधी होने मे कालात्ययापदिष्ट नामक हेस्वाभास मे ग्रस्त ही माने जायेंगे । यदि रूप की प्रतिपति होती है तो शब्द से शब्दार्थ की प्रतिपत्ति क्यों नहीं होगी? वंश को सिद्ध करने में तो इस प्रकार का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता । इसी पद्धति से यह कथन भी ण्डित हो जाता है कि ' यदि अनुपलम्भ मात्र से जतीन्द्रियार्षदों का सिद्ध किया जाता है तो सर्वत के अभाव के rear का Tara st इससे क्यों न सिद्ध हो जायगा, जब कि विशेषाभाव समान रूप से विद्यमान मैं ', योंकि विशेषाभाव की ही न होने पावेगी । जैसे कि कोई घट को देखते हुए भी कहे कि मैं घट नहीं देख रहा हूँ, उसी तरह से तुम सर्वत के प्रमाण को उपस्थापित और साधन प्रमाण को न उस्स्थापित करते हुए भी कहते हो कि मैं पर्वत के के तत्त्वज्ञ को नहीं जानता । इसी तरह से ' जैमिनि अपक्षा सम्म कोई मानार्य सर्वशाभाव के तत्त्वज्ञ नहीं हो सकते, क्योंकि वे मी राह चलते व्यक्ति की तरह सत्व, पुरुषत्व, वक्तृत्व मादि से युक्त है, इस अनुमान का भी खण्डन हो जाता है, क्योंकि res eft हेतु का नज्ञ के अमान के सात से कोई विरोध नही है । सर्वज्ञ नहीं है, इस बात को राह चलता व्यक्ति भी जानता है, अत: सर्वज्ञ के साधक हेतु को बाप साध्यनिकल मानते हैं, उसी तरह से वेदार्थज्ञ भी कोई नहीं हैं, अतः वेदार्थज्ञ सायक हेतु भी साव्यविकल होगा, यह कथन भी कोरा दुग्रह है । चक्षु से जैसे रूप ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उसी तरह से वेद वाक्यों से उत्पन्न अर्थज्ञान का किसी मी प्रकार से अपलाप नहीं किया जा सकता | ' स्वर्ग की कामना वाला व्यक्ति वग्निहोत्र करे इस वेद वाक्य के सुनने पर स्वर्ग कोर afra का साध्यसाधनभाव प्रतीत नहीं होता, यह कथन बुष्टतापूर्ण ही कहा जायगा, क्योंकि ऐसा कहने वाला व्यक्ति अपने अनुभव का भी rate करना चाहता है । वेदार्थज्ञत्व और सर्वशत्व का कोई are भी नहीं है, क्योंकि दोनों में यह वैषम्य है कि एक में प्रमाण है और दूसरे में नहीं । चक्षु जैसे स्वयं रूप ज्ञान में साधन है, उसी तरह से वेद स्वयं वेदार्थ के ज्ञान में साधन है । इस तरह का सर्वसाक्षात्कार रूप सर्वशत्व का साधक कोई प्रमाण उपलब्ध न होने से महात् विषमता के रहते भी इनमें साम्य बताना घृष्टता ही मानी जायगी ।
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१५२ वेदार्थपारिजातः नहि वेदार्थज्ञत्वसर्वज्ञत्वयो: साम्यम्, प्रमाणसत्त्वासत्त्वाभ्यां वैषम्यात् । रूपज्ञानसाधनस्य चक्षुष इव वेदार्थज्ञान-साधनस्य वेदस्य सत्वात् । न तथा सर्वसाक्षात्कारस्य साधनं प्रमाणमुपलभ्यत इति सत्यपि महति वैषम्य हेती साम्योति एतेन तदभाववत्त्वज्ञाभावसाधनेऽनुपलम्भमप्रमाणयन् मीमांसकः सर्वज्ञवेदकर्त्रादेरभावसाधने तं कुतः प्रमाणयेदि -त्योद्यमेव पूर्वोक्तवैषम्यात् । सर्वज्ञो वेदकर्ता च न प्रमाणसिद्धः । तद्वाधकानि प्रमाणानि च सन्ति । न तथा सर्वज्ञा-भावतत्त्वज्ञो वेदार्थज्ञो वा, प्रमाणसिद्धत्वात् । अत एव न जैमिन्यादेरतिशयः साध्यते येन तद्दृष्टान्तेन सर्वज्ञसिद्धिः स्यात् । सर्वज्ञानां मतभेदानुपपत्त्या अर्थापत्यापि सर्वज्ञाभावसिद्धिः । जीवानां सावयवत्वसर्वप्रमाणविप्रतिसिद्धानेकान्तप्रतिपादकस्त्र-मपि सर्वज्ञस्य नोपपद्यत इति तेनापि तदसर्वज्ञता सिद्धयति । तदुक्तं धर्मकीर्तिना-एतेनैव यदीकाः किमप्यश्लीलमाकुलम् । प्रलपन्ति प्रतिक्षिप्तं तदप्येकान्तसंभवात् ॥ सर्वस्योभयरूपत्वे
तद्विशेषनिराकृतेः । चोदितो दधि खादेति किमुष्ट्रं नाभिधावति ॥
अथास्त्यतिशय: कश्चिद्येन भेदेन वर्तते । स एव दधि सोऽन्यत्र नास्तीत्यनुभयं परम् ॥ इति । ( प्र. वा. ३।१८१-१८४ ) एवमेव स्यात्सर्वज्ञः 1 स्यादसर्वज्ञः स्यादनेकान्तवादी दुष्टः स्याददुष्ट इत्यादिसंभवात् । यदप्युक्तम्- ' सुगतोऽपि मृगो जातो मृगोऽपि सुगतस्तथा । तथापि सुगतो बन्द्यो मृगः खाद्यो यथेष्यते ॥ तथा वस्तुबलादेव भेदाभेदव्यवस्थितेः । चोदितो दधि खादेति किमुष्ट्रमभिधावति ॥ ” इति तदपि असत्, " यदि वस्तुबलादेव भेदा-इसी तरह से ' सर्वज्ञाभाव तत्वज्ञ के अभाव को सिद्ध करने में यदि मीमांसक अनुपलम्स को प्रमाण नहीं मानता तो वह सर्वज्ञ वेदकर्ता के अभाव को सिद्ध करने में उसको कैसे प्रमाण रूप से उद्धृत कर सकता है '? इस प्रश्न का भी उत्तर हो जाता है, क्योंकि दोनों में भिन्नता है, सर्वज्ञ और वेदकर्ता प्रमाण से सिद्ध नहीं है और उनके बाधक प्रमाण भी उपलब्ध हैं । यही स्थिति सर्वज्ञाभाव के तत्व की और वेदार्थज्ञ की नहीं है, क्योंकि ये प्रमाण से सिद्ध हैं । इसलिये हमारे मत में जैमिनि प्रभृति से कोई अतिशय की सिद्धि नहीं की जाती, जिससे कि उनके उदाहरण से सर्वज्ञ की सिद्धि हो सके । सर्वज्ञों में मतभेद नहीं हो सकता, इस प्रकार अर्थापत्ति प्रमाण से भी सर्वज्ञ का अभाव हो सिद्ध होता है । जीवों की आत्मा की सावयवता और सभी प्रमाणों से प्रतिषिद्ध अनेकान्तता का प्रतिपादन सर्वज्ञ कभी नहीं कर सकते, अतः ऐसी बातों के कहने से भी उनकी सर्वज्ञता ही सिद्ध होती है । इसीलिये धर्मकीर्ति ने कहा है ---" इस प्रकार सांख्य मत के निराकरण से ही दिगम्बर का अनेकान्त बाद भी निराकृत हो जाता है, क्योंकि प्रमाणों से एकान्त सिद्धि संभव है | यहाँ पर दिगम्बरों को निर्लज्ज इसलिये कहा गया है कि वे वस्त्र नहीं पहनते । " उनकी उक्ति को अश्लील और प्रलाप इसलिये कहा गया है कि वे अनेकान्तवाद के सहारे यह सिद्ध करते हैं कि ऊँट और दही में कोई अन्तर इसलिये नहीं है कि दोनों वस्तु हैं और अन्तर हो भी सकता है, क्योंकि दोनों की अपनी - अपनी विशेषता है । इस पर धर्मकीर्ति द्वितीय श्लोक में आप करते हैं कि " यदि सब वस्तुओं की उभयरूपता, स्वपररूपता मान की जाय और वही दही ही है, उष्ट्र नहीं और उष्ट्र उष्ट्र ही है, दही नहीं, इस विशेषता का निराकरण कर दिया जाय तो ' दही खाओ ऐसा कहने पर वह ऊंट को खाने के लिये क्यों नहीं दोड़ पड़ता! " यदि आप यह मानें कि इन दोनों पदार्थों में ऐसी विशेषता है कि जिससे इन दोनों में परस्पर भेद व्यवहार होता है कि दही में हो दही की प्रतीति होती हैं उष्ट्र में नहीं, तो इस प्रकार से तो वस्तु उभय स्वरूप होकर एक दूसरे से भिन्न ही सिद्ध होगी । इसी तरह से अनेकान्तवाद को मानने पर सर्वज्ञ होगा भी, वहीं भी होगा, अनेकान्तवाद सदोष हैं और नहीं भी है; इस प्रकार की आपत्तियां भी स्वयं उसके विरुद्ध ही पड़ेगी । उक्त आक्षेप का दिगम्बरों ने यह उत्तर दिया है कि - ' सुगत बुद्ध ने भी मृगयोनि में जन्म दिया है और यह मृग पुनः सुगत हो गया है, ऐसा होने पर भी जैसे वन्द्य सुगत ही है, मृग तो खाद्य है; उसी तरह से वस्तु के स्वभाव के अनुसार ही व्यवस्था होने से ' aft ra ' ऐसा कहने पर वह ऊंट की तरफ क्यों दोड़ेगा ", पर यह उत्तर मी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि वस्तु के स्वभाव के अनुसार हो भेद
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वेदार्थपारिजात: १५३ भेदव्यवस्थितिः । कुताऽनेकान्तता सिद्धिर्यतो कान्ततागता || मृगदेहो न सुगतः सुगतो न मृगस्तथा । देहयोरेव खाद्यत्व-पूज्यत्वे नात्मनस्तु ते ॥ ” इति । एतेन - ' नरान् दृष्ट्वा त्वसर्वज्ञान् सर्वानेवाधुनातनान् । तत्सादृश्योपमानेन शेषासर्वज्ञसाधनम् || ' इत्युपमानमपि सर्वज्ञाभावसाधनम् । नोपमानार्थमशेषपुरुषदर्शनमपेक्षितम्, सर्वगोगवयदर्शनाभावेऽपि कतिचिद्गवादिव्यक्तिग्रहणे गोसदृशो गवय इति ज्ञानसंभवात् । अन्यथाऽसर्वज्ञस्योपमानव्यवहारलोपप्रसङ्गः । किञ्चाशेषज्ञस्य शरीरसंस्थानमशेषप्रमातृशरीर संस्थान-साधारणं तद्विलक्षणं वेति विकल्पोऽपि निरर्थकः, जीविनरोपमेयत्वस्यैव विवक्षितत्वेन तददोषात् । जीवत्वेनापि सादृश्याद् अस्मदादिवत् सर्वस्यासर्वज्ञत्वं साधयितुं शक्यते । प्रत्यक्षादिभिरनुभूयमानजीवानां सादृश्यं विज्ञायते । न चैवं सर्वपुरु-षाणामवेदार्थज्ञत्वं मूर्खत्वादिकं चापि तद्वदेवोपमीयेतेति वाच्यम्, बहुषु पुरुषेषु वेदार्थज्ञत्व विद्वत्त्वादिदर्शनेन नरत्वादिना सर्वत्र तदसिद्धेः । न चैवं सर्वज्ञत्वादिकं क्वचिद् दृश्यते । पौरुषेया अपौरुषेयाश्चागमा अपि धर्मब्रह्मणोर्वेदैकसमधिगम्यत्व-बोधनेन जीवानामसार्वश्यं बोधयन्ति । न च कार्य्यपरत्वमेव वेदानाम्, फलवनिश्चितार्थावबोधकत्वेन तेषां प्रामाण्याभ्युपगमेन बाधाभावात् । बौद्धानां रीत्या सर्वज्ञबुद्धप्रणीतागमेन महावीरस्यासावंश्यम्, आर्हतानां रीत्या बुद्धस्याप्यसर्वज्ञत्वसिद्धिः । योग्यानुपलब्ध्याऽपि सर्वज्ञत्वाभावसिद्धिः । न चानुपलब्धेरप्रामाण्यम्, श्लोकवार्त्तिकादौ तत्प्रामाण्यस्य समर्थनात् । प्रसज्यप्रतिक धोऽपि न तुच्छस्वभाव:, ' इह भूतले घटाभाव: ' इति प्रतीत्या देशकालसम्बन्धावगमात् । न च सर्वज्ञोऽयोग्यः अस्मदादि-वत्तस्यापि योग्यत्वात् । न चातीत्वेनायोग्यः प्रमीयमाणत्वाभावेनातीतत्वकल्पनाया निराधारत्वात् । तेनैव चान्योपलम्भोऽपि न शक्यसमर्थनः । और aahe की व्यवस्था होती है, तो उस अवस्था में अनेकान्त की सिद्धि कैसे होगी, क्योंकि इस पद्धति से तो एकान्तता आगई । जैसे मृगदेह सुक्त नहीं हैं और सुगत मुगदेह नहीं है, उसी तरह से वायस्व और पूज्यत्य बुद्धि देहात होती है, वास्मगल नहीं | " सी तरह से " भावकल के सभी मनुष्यों की अज्ञ देख कर उन्हीं के सादृश्य के आधार पर उपमान प्रमाण से भी घोष सभी पुरुषों की सर्वेक्षता सिद्ध की जा सकती है । " उपमान के लिये सभी पुरुषों का दर्शन अपेक्षित नहीं है, सभी गो और गयय के न देखने पर भी को देख लेने पर भी गाय गाय के सहरा है, इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है । अन्यथा असर्वेश के लिये उपमान प्रमाण के द्वारा व्यवहार चलाना असंभव हो जायगा । इसी तरह से सर्वज्ञ का शरीर संस्थान बाको के जीवों की तरह ही है या उससे भिन्न? इस प्रकार का विकल भी निरर्थक है, क्योंकि यहाँ पर जीवित मनुष्य को उपमेयता के ही विक्षित होने से कोई दोष नहीं है । जंवत् के साहर से भी हमारी ही तरह से सनकी सर्वज्ञता सिद्ध की जा सकता है, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनुभूयमान जीवों में सादृश्य प्रतीत होता है | यदि आप यह कहें कि इस तरह से तो सभी पुरुषों की यवेदार्थकता और मूर्खता की भी उपमिति हो सकती है, तो यह बात गलत है, क्योंकि वेदार्थकता और विद्वत्ता अनेक पुरुषों में देखी गई है, अतः नरत्व सादृश्य से सर्वत्र आपकी बात सिद्ध नहीं हो सकती । इस तरह से सर्वज्ञता तो कहीं देखी नहीं जाती । पौरुषेय और अपौरुषेय भागम ( शास्त्र ) भी धर्म और ब्रह्म की एकमात्र dear को ही बताते हैं, अतः इससे भी जीवों की असर्वज्ञता की ही प्रतीति होती है | वेद केवल विधिपरक ही नहीं है, फलयुक्त निश्चित अर्थ के वोधक के रूप में भी उनका प्रामाण्य माना गया है । बौद्धों के मत से सर्वज्ञ बुद्ध प्रणीत आगम महावीर की अस-daar और जैनों के मत से बुद्ध को असर्वज्ञता सिद्ध होती है । योग्यानुपलब्धि ( मिलने योग्य होने पर भी न मिलना ) से भी सर्व का arrant fes होता है । अनुपलब्धि को अप्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि लोकातिक प्रभृति ग्रन्थों द्वारा उसके प्रामाण्य का मन किया जा चुका है । प्रसज्यप्रतिषेध भी व्यर्थं नहीं माना जाता, क्योंकि ' यही घट नहीं हैं । इस प्रतीति से देश और काल का सम्बन्ध भी ज्ञात होता है । सर्वज्ञ अयोग्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि हमारी तरह वह भी प्रत्यक्ष योग्य है ही । अतीत होने से मह अयोग्य नहीं हो जायगा, क्योंकि जब तक उसकी प्रमिति ( प्रमाण से सिद्धि ) नहीं होती, तब तक ऐसी वस्तु की अतीसता की कल्पना भी निराधार है, इसी से अन्य सर्वज्ञ की उपलब्धि का समर्थन भी नहीं किया जा सकता । २०
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१५४ वेदार्थपारिजातः यदप्युक्तम् -- ' अतीतकालादिपरिगतं वस्तु स्वेन स्वेन रूपेणैव भासते । अवर्तमानतया प्रतिभासमानस्यापि नाप्रत्यक्षता युक्ता, परिस्फुटतयाऽर्थप्रतिभासस्यैव प्रत्यक्षत्वात् ' इति तन्न, स्फुटप्रतिभासस्य प्रयोजकानिरूपणात् । लोके प्रकाशरूपस्य प्रकाशसंसृष्टस्य वा स्फुटप्रतिभास: प्रसिद्धः, अतीतानागतानामिदानीमसत्वेन तत्सम्बन्धासम्भवात् कुतः स्फुटप्रतिभासः? यदुक्तम्- ' सन्निहितदेशकालतयाऽर्थप्रतिभासस्य प्रत्यक्षत्वे स्वोत्सङ्गस्थबालकशरीरे व्यवहारादिलिङ्गतो जीव-सद्भावाभासस्यापि प्रत्यक्षतापत्तिः स्यात् ' इति, तत्तुच्छम् सन्निहितदेशकालस्थस्यापि तस्येन्द्रियसम्बन्धाभावेनान्तः-करणासम्बन्धात् प्रमातृचैतन्यसंसर्गासम्पत्तेः । प्रमातृचैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावस्यैव विषय प्रत्यक्षत्वाभ्युपगमात् । स्वोत्सङ्गस्थबालकस्येन्द्रियसंसृष्टत्वेऽपि तदन्तर्गतस्य जीवस्येन्द्रिय संसर्गासम्भवाद् जीवात्मनः स्वमनोग्राह्यत्वेऽप्यन्यमनसो-वेद्यत्वान्न प्रत्यक्षता । तथा च कथमतीतादेः स्फुटप्रतिभासोऽपि । अत एव यथा इन्द्रियप्रभवप्रत्यक्षस्य देशविप्रकृष्टार्थग्रहणेऽपि परिस्फुटप्रतिभासत्वं न विरुध्यते, तथातीतप्रत्यक्षस्य कालविप्रकृष्टार्थग्रहणेऽपि ' इत्यपि निरस्तम् । सर्वत्रेन्द्रियप्रत्यक्षे इन्द्रियप्रणालिकयाऽन्तःकरणविषयोः संसर्गेणोपाधिद्वयस्यैकत्र स्थित्योपहितद्वयाभेदेन प्रमातृचैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावेन विषयप्रत्यक्षता, वृत्त्यवच्छिन्नविषयावच्छिन्नचैतन्ययोरभेदेन ज्ञानस्य प्रत्यक्षतेति नियम स्याव्यभिचारात् । अतीतस्य त्वसत्त्वात् कि केन संसृज्येतेति वैषम्यात् । विप्रकृष्टदेशस्थस्य ग्रहणेऽपि विप्रकृष्टकालस्थस्य कुतो न ग्रहणमिति तदर्थमिन्द्रियस्वभावः पर्यनुयुज्यताम् । दूरदेशस्थस्य चक्षुरादीन्द्रियप्रणालिकया यह कहा गया है कि ' अतीतादि काल की वस्तु का मान अतीतादि रूप में ही होता है, उनकी अतीतादि रूप में प्रतीत अप्रत्यक्ष नहीं कही जा सकती, क्योंकि परिस्फुट रूप में अर्थ का प्रतिभास ही प्रत्यक्ष कहलाता है ', किन्तु यह उक्ति इसलिये गलत है कि यहाँ पर स्फुट प्रतिमास का प्रयोजक क्या है, इसको नहीं बताया गया | लोक में प्रकाश स्वरूप अथवा प्रकाश से संसृष्ट वस्तु का ही स्फुट प्रतिभा प्रसिद्ध है । अतीत, अनागत वस्तु की तो अभी सत्ता नहीं है, ऐसी परिस्थिति में उसका प्रकाश से संबन्ध न होने से स्फुट प्रतिभास कैसे होगा? इस पर यह आपत्ति की गयी थी कि " देश और काल के सांनिध्य में ही अर्थ की प्रतिभाहता ( ज्ञान ) को यदि प्रत्यक्ष माना जायगा तो गोदी में बैठे बालक के शरीर में व्यवहारादि हेतु को देखकर आत्मा के सद्भाव के आभास को भी, जो अनुमान का विषय है । प्रत्यक्ष मानना पड़ जायगा ", किन्तु यह आपत्ति भी तुच्छ है, क्योंकि देश और काल की संनिधि के रहते भी जीव के साथ इन्द्रिय सम्बन्ध न होने से अन्तःकरण से भी उसका सम्बन्ध नहीं होगा और इस प्रकार प्रमातृचैतन्य से उसका संसर्ग नही होते पावेगा । विषय का प्रत्यक्ष तभी माना जाता है, जब कि प्रमातृचैतन्य की सत्ता से अतिरिक्त यस्य सत्ता का अभाव हो । अपनी गोद में बैठे बालक के शरीर के साथ यद्यपि इन्द्रिय का संसर्ग है, तो भी बालक के शरीर के भीतर विद्यमान जीव के साथ इन्द्रियों का संपर्क न होने से, जीवात्मा के स्वग्रा होने पर भी बालशरीयत मन की अवेद्यता के कारण, प्रत्यक्षता नहीं होती । इस परिस्थिति में अतीतादि का स्फुट प्रतिभास कैसे माना जा सकता है? इससे इस बातकर भी खण्डन हो जाता है कि " जैसे इन्द्रियों से उत्पन्न प्रत्यक्ष दूर देश स्थित वस्तु के स्पष्ट ग्रहण में समर्थ है, उसी तरह से वह अतीतादि काल की दृष्टि से विष्ट वस्तु के ग्रहण में क्यों नहीं समर्थ होगा? ", क्योंकि इन्द्र प्रत्यक्ष में सर्वत्र इन्द्रिय प्रणाली से अन्तःकरण और विषय का सं ( संबंध ) होता है । इस प्रकार दोनों उपाधियों की una स्थिति होने से इनके अभेद बोध के कारण प्रमातृचैतन्य की सत्ता के अतिरिक्त अन्य सत्ता के अभाव हो जाने पर विषय की प्रत्यक्षता मानी जाती है और वृत्य-afore तथा विषयावच्छिन चैतन्य के अभेद से ज्ञान की प्रत्यक्षता होती हैं । यह नियम प्रत्यक्ष स्थल में सर्वत्र मान्य हैं । अतीत वस्तु की तो वर्तमान में सत्ता है नहीं, तब उसके साथ किसका संसर्ग होगा? प्रश्न होता है कि विप्रकृष्ट देश में स्थित वस्तु के ग्रहण ( ज्ञान ) की आप मान्य करते हैं तो विप्रकृष्ट काल में स्थित वस्तु का ग्रहण ( ज्ञान ) क्यों नहीं मानते । इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इसके लिये उलाहना बाप इन्द्रियों के स्वभाव को दीजिये कि दूर देश में स्थित वस्तु का चक्षुरादि इन्द्रिय प्रणाली द्वारा संबन्ध
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वैदार्थपारिजातः १५५ सम्बन्धः सम्भवति, न विप्रकृष्टकालस्थस्य । रूपादिषु रूपस्यैव ग्राहकत्वेन तेजसत्वाच्चक्षुषस्तेजसो दूरगमनदर्शनेन दूरस्थस्य ग्रहणमिति पूर्वमुक्तमेव । एवमेव सर्वस्य युगपत् प्रत्यक्षतायां सत्तावत् तत्प्राक्प्रध्वंसाभावयोः प्रतिभानं तन्मूलक युगपद्वस्तुजन्य-प्रागभावप्रध्वंसाभावव्यपदेशश्चापरिहार्यः । यदुक्तम्- ' इन्द्रियप्रत्यक्षे यद्देशविशिष्टं वस्तु नीलरूपमनीलरूपं वा भावरूपमभावरूपं वा तत्तद्देशविशिष्टतयैव प्रतिभासते, तद्वत् सर्वज्ञज्ञानेऽपि भासते ' इत्यादि, तदप्यसङ्गतम्, सर्वज्ञज्ञानस्येन्द्रियप्रभवप्रत्यक्षानुसारित्वे तद्वदेव वर्तमान-मात्र ग्राहकत्वमेव कुतो न स्यात्? तदननुसारित्वे तु युगपज्जन्ममरणव्यपदेशः । अंशेन तदनुसरणमननुसरणं चांशान्तरेणार्ध-जरतीयमनुहरति । वस्तुतस्तु योगजादिसामर्थ्येनापि न वस्तुधर्मातिक्रमणं भवति । तदुक्तम्- ' यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलङ्घनात् । दूरमूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोतवृत्तिता । ' ( चो. सू. वा. ११४ ) । दृष्टस्वभावातिक्रमेऽतिप्रसङ्गात् । अत एवातीतादिकालस्य वस्तुस्वभावस्य परोक्षतया वर्तमानवस्तुस्वभावतया प्रतीतेरनोचित्येन नि तदापरोक्ष्यम् । अन्यथा युगपज्जन्ममरणादिव्यपदेश प्रसङ्गः प्रतिनियतार्थस्वरूपा प्रतीतिश्च स्यातामेव । ततश्चानैकान्तवादिनां सर्वस्यानैकान्तिकत्वे तत्सर्वज्ञस्य तदागमतत्प्रतिपादित सिद्धान्तानां चानैकान्तिकत्वमेव स्यात् । एवं यथा जिनबुद्धादीनां सर्वज्ञत्वातीन्द्रियदर्शित्व सिद्धिदुर्घटा, तथैवार्षत्वेनैश्वरत्वेन वा वेदस्यापौरुषेयत्वं मन्य-मानानामपि सिद्धान्ते ऋषीणामनीन्द्रियदर्शित्व सर्वज्ञत्वादिकं न घटत इत्यप्युक्तमेव । क्यों होता है, विष्ट काल में स्थित वस्तु का सम्बन्ध क्यों नहीं होता । वह पहले ही कहा गया है कि चक्षु तेजस इन्द्रिय है और वही रूपादि की ग्राहक है । तेज जैसे दूर तक चला जाता है, उसी तरह से चक्षुरिन्द्रिय मी दूर तक जाकर वहाँ स्थित वस्तु का ग्रहण कर सकती है । इसी तरह से सबकी युगपत् प्रत्यक्षता मानने में संज्ञा के समान उसके प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की प्रतीति और तन्मूलक एक साथ वस्तु का जन्म तथा उनका प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव के नाम से सम्बन्ध भी अपरिहार्य हो जायगा | यह जो कहा गया है कि ' इन्द्रिय प्रत्यक्ष में जिस देश से विशिष्ट वस्तु नीलरूप अथवा अनीलरूप में, भावरूप अथवा अभावरूप में प्रतीत होती है, उसके साथ देश का सम्बन्ध रहता है, उसी तरह से गर्वश के ज्ञान में भी इसका भान होता है । " किन्तु यह भी असंगत है, क्योंकि सर्वंश का ज्ञान यदि इन्द्रिय अन्य प्रत्यक्ष का अनुसरण करता है, तो वह उसकी तरह केवल वर्तमान का ही ग्राहक क्यों नहीं होगा? अब यदि वह उसका अमरण नहीं करता तो एक साथ जन्म और मृत्यु का व्यवहार होने लगेगा | एक अंश में उसका अनुसरण और दूसरे अंश में बननुसरण में अर्धजरतीय न्याय वाली आपत्ति होगी । योग सामर्थ्य भी वस्तु के स्वभाव का अतिक्रमण नहीं कर सकता । भर्तृहरि ने कहा भी है कि -- " जहां कहीं भी अतिशय देखा जाता है, उसमें स्वार्थ का उल्लंघन कहीं भी नहीं होता । चक्षु मैं दूर स्थित वस्तु को अथवा सुक्ष्म वस्तु को देखने का सामर्थ्य है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह रूप को छोड़कर कान के विषय श्रवण में प्रवृत्त हो जायगी । " हृष्ट स्वभाव का अतिक्रम मानने में अतिव्याप्ति दोष हो जायगा । इसीलिये अतीतादि काल में स्थित वस्तु के स्वभाव की परोक्षता के कारण उसकी प्रतीति वर्तमान वस्तु की तरह नहीं मानी जा सकती, अतः उसकी प्रत्यक्षता नहीं सिद्ध होगी । अन्यथा एक साथ जन्म और मरण के व्यवहार की प्रक्ति कौर प्रतिनियत स्वभाव वाले अर्थ की प्रतीति मी होगी ही । इस तरह से अनेकान्तवादी के मत में सबकी अनेकान्तता के कारण उनके द्वारा प्रसाधित सर्वज्ञ तथा उसके द्वारा उपदिष्ट आगमों की और उनके सिद्धान्तों को भी अनेकान्तता माननी पड़ेगी । इसी तरह से जैसे जिन, बुद्ध प्रभूति की सर्वज्ञता, अतीन्द्रियदशिता आदि की सिद्धि नहीं हो सकती, वैसे ही आर्ष होने के ater arear furt ष्ट होने के कारण जो वेद को अपौरुषेय मानते हैं, इनके मत में भी ऋषियों की अतीन्द्रियदर्शिता, सर्वक्षता आदि की सिद्धि नहीं होगी, यह हम कह चुके हैं ।
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१५६ वदार्थपारिजातः यदप्युक्तमीश्वरप्रसादादृषीणां सार्वज्ञ्यादिकं सिद्ध्यतीति तदप्ययुक्तम्, ईश्वरतत्प्रसादतत्प्राप्तिसाधनज्ञानाथ वेदप्रामाण्यस्याङ्गीकरणीयत्वात् । अङ्गीकृते तस्मिन्न स्वातन्त्र्येण वेदप्रामाण्यार्थ मतीन्द्रियार्थदशित्वादिकल्पनमावश्यकम् । स्वातन्त्र्येणापौरुषेयवेदप्रामाण्याभ्युपगमे वेदतदाश्रितयुक्तिभिः सार्वश्यादिसिद्धिस्तु न वार्य्यते । सर्वार्थप्रतिपादकवेदनिर्मातृत्वेन वेदकारस्य सर्वज्ञत्वे जिनादीनामपि सर्वज्ञत्वं सिद्धयत्येव तदनुयायिभिस्तन्निमितागमानामपि सर्वार्थप्रतिपादकत्वाभ्युपगमात् । न चानुमानेनेश्वरसाधनम्, तत एव तत्प्रसादादिसिद्धिरिति वक्तुं शक्यते, तर्काणामप्रतिष्ठानात् । परमेश्वरसिद्धौ सन्त्यनुमानप्रयोगाः --- ' क्षित्यङ्करादिकं बुद्धिमत्कर्तृकं कर्मत्वाद्धटवत् ', ' भूतभौतिकानि स्वोपादानादि-गोचरापरोक्षज्ञानवज्जन्यानि कार्यत्वे सति विलक्षणत्वात् शय्याप्रासादादिवत् ', ' महद्भूतचतुष्टयमुपलब्धिपूर्वकं सावयवत्वात् कार्यत्वात् ', ' शरीरानपेक्षोत्पत्तिकं बुद्धिमत्पूर्वकं कारणवत्त्वात् ', प्रधानपरमाणुकर्माणि प्राक्प्रवृत्तेर्बुद्धिमत्कारणाधिष्ठि-तानि प्रवर्तन्ते, अचेतनत्वाद वास्यादिवत् ', ' धर्माधर्मौ बुद्धिमत्कारणाधिष्ठितो, कारणत्वात्, वास्यादिवत् ' । न चासिद्धो हेतु:, सावयवत्वेन क्षित्यादेः कार्यत्वप्रसिद्धेः । ' पृथिव्यादिकं कार्यं सावयवत्वाद्धटवत् ' । नापि विरुद्ध हेतुः घटादौ प्रसिद्धत्वात् । न व्यभिचारी, निश्चितसाध्याभाववद्र्थ आत्मादिभ्यो व्यावर्तमानत्वात् । न वा बाधः, प्रत्यक्षागमाभ्यामबाधितत्वात् । नापि प्रकरणसमः, प्रकरणचिन्ताप्रकर्षस्य हेत्वन्तरस्यासंभवात् । तदनेन जगन्निर्माणसमर्थः सर्वज्ञत्वादिविशिष्टः परमेश्वरः सिद्ध्यति । न च सर्वज्ञः सर्वकर्ता नित्यज्ञानेच्छा प्रयत्नवानशरीरो साध्यश्चेद् दृष्टान्तः साध्यविकलः, दृष्टान्तदृष्टधर्मवैपरीत्यसाधने तु विरुद्ध हेतुः स्यादिति वाच्यम्, आनन्त्याद् व्यभिचाराच्च साध्यसाधनयोविशेषेण व्याप्त्यसंभवेनानुमानोच्छेदापत्त्या सामान्ये-यह कहना " ईश्वर की कृपा से ऋषियों को सर्वज्ञता आदि की प्राप्ति हो जाती है " इसलिये गलत है कि ईश्वर, उसकी कृपा, उसकी प्राप्ति के साधनों की जानकारी के लिये वेद का प्रामाण्य मानना पड़ेगा । ईश्वर को मान लेने पर वेद का स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं बन पावेगा, अतः ईश्वर में अतीन्द्रियार्थदशित्व, सर्वशत्व आदि की कल्पना आवश्यक हो जायगी । यदि अपौरुषेय वेद का स्वतन्त्र प्रामाण्य माना जाता है, तो वेद और वेदाश्रित युक्तियों से सर्वज्ञता की सिद्धि हो सकती है । सर्वार्थप्रतिपादक वेद का निर्माण करने के कारण वेदकार की यदि सर्वज्ञता मानी जाती है, तो बिन प्रभूति की भी सर्वज्ञता सिद्ध हो ही जायगी । क्योंकि जिन प्रभूति के अनुयायी इनके द्वारा निर्मित आगमों को सर्वार्थिप्रतिपादक मानते ही हैं | अनुमान से भी ईश्वर और उसके प्रसाद आदि की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योकि तर्क अप्रतिष्ठित होता है । परमेश्वर की सिद्धि में ये अनुमान है - ' ' पर्वत, नदी, पृथ्वी, अंकुर प्रभूति पदार्थ किसी बुद्धिमान् के रचे हुए हैं, क्योंकि इनकी रचना पट प्रभृति के समान हुई है; भूत और भौतिक पदार्थों की रचना इनके उपादान का साक्षात् ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के द्वारा रचे गये हैं, क्योंकि यह सब शय्या, प्रासाद आदि की तरह विलक्षण कार्य हैं; महान भूतचतुष्टय की उपलब्धि किसी को है, क्योंकि वे साव कार्य है; शरीरपेक्ष उत्पत्ति वाला यह जगत् किसी बुद्धिमान व्यक्ति का बनाया हुआ है, क्योंकि यह सकारणक है । प्रभात, परमाणु और कर्म आदि अपनी प्रवृत्ति से पहले किसी बुद्धिमान् कारण से मधिष्ठित रहते हैं, क्योंकि ये कुल्हाड़ी आदि की तरह अचेतन है; धर्म और अधर्म बुद्धिमान् कारण से अधिष्ठित है, क्योंकि ये कुल्हाड़ी सरीखे अचेतन हैं " इत्यादि । यहाँ पर हेतु असिद्ध नहीं माना जा सकता, क्योंकि पृथ्वी बादि में सावयवता के कारण कार्यदेव प्रसिद्ध है, जैसे कि पृथिवी आदि कार्य है, क्योंकि यह भी बट की तरह सावयव है | हेतु में विरुद्ध दोष भी नहीं है, क्योंकि घटादि में सावयवत्व प्रसिद्ध है । हेतु व्यभिचारी भी नहीं है, क्योंकि निश्चित साध्याभाव-मात् आगमादि में यह नहीं रहता । हेतु का बाघ भी नहीं होता, क्योंकि प्रत्यक्ष और आगम से यह बाधित नहीं है । प्रकरण नामक हेत्वाभास भी यह नहीं होगा, क्योंकि प्रकरणचिन्ता के प्रकर्ष को बनाने वाले दूसरे हेतु को यहां संभावना नहीं है । इस प्रकार इन अनुमानों से जगत् के निर्माण में समर्थ सर्वज्ञादि गुणों युक्त ईश्वर की सिद्धि हो जायगी । यदि यह कहा जाय कि सर्वेश, सर्वकर्ता, frer ज्ञान, इच्छा, प्रयत्नवान् अशरीरीवर को साल मानने पर दृष्टान्त साध्यविकल रहेगा और दृष्टान्तदृष्ट धर्म की fartner के साधन में हेतु विरुद्ध लाभास हो जायगा ", तो इसा उतर यह है कि अन्त्य और व्यभिचार के कारण साध्य और साधन की विशेष रूप से व्याति न बनने के कारण अनुमान का ही उच्छेद न हो जाय, इसके लिये व्याति का निश्चय सामान्य रूप से ही किया जाता
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नेदार्थपारिजातः १५७ नैन व्याप्तिनिश्चयात् । ततश्च बुद्धिमत्कर्तृत्वमात्रेण कार्यत्वस्य व्याप्तिग्रहो न शरीरित्वादिना, शरीरस्य कर्तृत्वसामय्या-मप्रवेशात्, तद्व्यतिरेकेणापि ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नवत्वेन स्वशरीरप्रेरणे कर्तृत्वोपलम्भात् । वह्निपैङ्गल्यस्यैव शरीरसाहचर्येऽपि तदकारणत्वात् । अत एव शरीरस्य सत्त्वेऽपि ज्ञानादीनामभावे कुलालादेः कारणत्वाभावः । अखिलकार्यव्रातः कर्तृत्वादेवास्य सिद्धयति । उपादाननिमित्तसम्प्रदानाद्यनभिज्ञस्य कर्तृत्वासंभवात् । तदोयज्ञानादयो नित्याश्च कुलालादिज्ञानविलक्षणत्वात् । नहि साध्यदृष्टान्तधर्मिणोः सर्वथा साम्यमावश्यकम् सकलानुमानोच्छेदप्रसङ्गात् । अनेककर्तृ णामप्येकाधिष्ठातृनियमितानां प्रवृत्तिदर्शनात् क्षित्यादिकर्तुरेकत्वं च सिद्धयति । न चैवमीश्वरस्य ज्ञानेच्छादीनाञ्चैकरूपत्वे नित्यत्वे च सति कार्याणां कादाचित्कत्वं वैचित्र्यञ्च नोपपद्यत इति वाच्यम्, कादाचित्कविचित्रसहकारिलाभेन तद्विरोधाभावात् । नन्वेवं बुद्धिमत्कर्तृकत्वे क्षित्यादेर्जीर्णकूपप्रासादादिवत् कृत-बुद्धिरुपजायेत, न च जायते । तेन दृष्टान्तदृष्टस्य हेतोर्धर्मिण्यभावादसिद्धत्वमिति चेन्न प्रामाणिकानां कृतबुद्धेरुत्पद्यमान-त्वादेव कार्यत्वस्य बुद्धिमत्कर्तृकत्वेन प्रतिपन्नाविनाभावस्य क्षित्यादी प्रसिद्धेः । खातप्रपूरितायां भुवि अक्रियादशिनः कृत-बुद्धेरुदयाभावाच्च । न च तथाप्यकृष्टप्रभवैः स्थावरादिभिर्व्यभिचारः कर्तारमनपेक्ष्य स्वसामग्रीतस्तेषामुत्पत्तिदर्शनादिति वाच्यम्, तेषां पक्षकुक्षिप्रवेशात् । न चानुपलब्धेः कर्त्रभाव इति वाच्यम्, योग्यानुपलब्धेरेवाभावसाधकत्वात् । क्षित्यादिकर्तुर-दृश्यत्वेनायोग्यत्वादनुपलब्धेरभावासाधकत्वात् । न च शरीराजन्यत्वेन कर्त्रजन्यत्वं सिद्धयति, हेतोरप्रयोजकत्वात् । असिद्धि-वारकस्यापि व्यभिचारावारकत्वेन हेतोर्व्यर्थविशेषणत्वाच्च । न च कारुणिकस्य वैषम्यनैर्धृष्यापत्त्या दुःखबहुलरचनायां है | अतः बुद्धिमत्कर्तृत्व मात्र से कार्यत्व की व्याप्ति गृहीत हो जाती हैं, उसके साथ शरीरित्य गृहीत नहीं होता, क्योंकि की सामग्री में शरीर की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि बिना शरीर के भी ज्ञान, चिकीर्षा, और प्रयत्न से कार्य की उपलब्धि हो जाती है । f fire वर्ण उसके शरीर के साथ रहते हुए भी दाहकता में कारण नहीं होता । इसीलिये शरीर के रहते हुए सी ज्ञानादि के अभाव में कुलालादि की कारणता नहीं बनती । यह सारा जगत् ईश्वर की कर्तृता के कारण ही सिद्ध होता है । उपादान, निमित्त, सम्प्रदान आदि की जिसको जानकारी नहीं है, वह कर्ता नहीं हो सका । ईश्वर के ज्ञान प्रभूति नित्य होते हैं, क्योंकि इसका ज्ञान कुलाल ( कुम्हार ) बादि से विलक्षण होता है । साध्य और दृष्टाधर्मी का सर्वथा साम्य आवश्यक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर तो कोई भी अनुमान नहीं बन पायेगा । एक अधिष्ठाता की देख रेख में अनेक व्यक्तियों की प्रवृत्ति देखी गई हैं, अतः क्षिति प्रभृति का एक ही eaf है, यह सिद्ध हो जाता है । ईश्वर और उसके ज्ञान, इच्छा प्रभूति गुण यदि एकरूप और नित्य है तो कार्यों का कदाचित् होना और विचित्र रूप धारण करना कैसे संभव हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि किसी - किसी समय विचित्र - विचित्र सहकारी आदि कारण की प्राप्ति के कारण ऐसा हो सकता है । पुनः प्रश्न उठता है कि यदि क्षित्यादि की बुद्धिमस्कर्तृकता मानी जाती है तो उसमें भी जीर्णकूप और प्रासाद की तरह कृतकता वृद्धि होनी चाहिये, किन्तु ऐसा होता नहीं । इसलिये दृष्टान्त में दृष्ट हेतु की धर्मी में सत्ता न रहने से यह असिद्ध नामक हेत्वाभास होगा? तो इसका भी उत्तर यह है कि प्रामाणिकों को उसमें कृतकता बुद्धि होती ही है, इसीलिये बुद्धि कर्तृकता से frent af वनाभाव ज्ञान है, ऐसा कार्यश्व पृथिवी आदि में भी प्रसिद्ध है ही । खोद कर पुनः भर दी गई जमीन में जिसको इसका ज्ञान नहीं है, उसको कृतक बुद्धि उदित नहीं होती । यदि यह पूछा जाय कि बिना बोये पैदा हुए वृक्षादि से इस हेतु का व्यभिचार होगा, क्योंकि वहां पर बिना कर्ता के हो अपनी बीजादि सामग्री से उनकी उत्पत्ति होती है, तो इसका यह उत्तर है कि यह सत्र क्षित्यादि पक्ष के रूपमें अभिप्रेत हैं, उसी में संनिविष्ट है । केवल अनुपलब्धि से कर्ता का अभाव सिद्ध नहीं होता, किन्तु वह योग्यानुपलब्धि के कारण माना जाता है । क्षित्यादि का कर्ना जो अदृश्य है, अतः अयोग्य होने से अनुपलब्धि यहाँ पर अभाव की साधक नहीं हो सकती । शरीरा-जन्यत्व हेतु से भी कजन्यत्व नहीं सिद्ध होगा, क्योंकि यह हेतु प्रयोजक नहीं होगा और असिद्धि का वारक होने पर भी व्यभिचार का वारक न होने से इसे हेतु का विशेषण देना व्यर्थ होगा । कारुणिक परमात्मा पर वैषम्य और मैर्घुण्य ( निर्दयता ) की आपत्ति जाने से यह दुखबद्दल जगत् की रचना में क्यों प्रवृत्त होगा? इस आपत्ति का निवारण इस प्रकार हो जाता है कि ईश्वर faaf र्माण में धर्म
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१५८ वेवार्थपारिजातः प्रवृत्त्यनुपपत्तिरिति वाच्यम्, धर्माधर्मसव्यपेक्षस्य विश्वनिर्मातृत्वे तदनुपपत्तेः । प्राणिमोक्षार्थं भगवतः प्रवृत्तिः, धर्माधर्म-प्रक्षयाच्च मुक्तिरिति भोगापवर्गार्थं विश्वनिर्माणोपपत्तिः । न च धर्माधर्माभ्यामेव कार्योत्पत्तिरस्तु तयोश्चेतनानधिष्ठितयोः कार्योत्पादकत्वानुपपत्तेः । न च जीवाधिष्ठितयो-स्तदुपपत्तिः, तस्याल्पज्ञत्वेनादृष्टपरमाण्वादिज्ञानाभावात् । अत्र आता बौद्धाश्च प्रत्यवतिष्ठन्ते । न च कार्यस्वादिभिर्हेतुभिः सर्वज्ञो विश्वकर्ता सिद्धयति, कार्यत्वानिरूपणात् । किं तत्सावयवत्वम् प्रागसतः स्वकारणसत्ता समवायः कृतमिति प्रत्ययविषयत्वम्, विकारित्वं वा? सावयवत्वमपि किसव-यवेषु वर्तमानत्वम्, तैरारभ्यमाणत्वम्, प्रदेशवत्त्वम्, सावयव इति बुद्धिविषयत्वं वा? न प्रथमः, अवयव सामान्येऽतिव्याप्तेः । तस्य नित्यत्वे सत्यवयवेषु वर्तमानत्वात् । द्वितीयं तु साध्याविशिष्टम्, क्षित्यादेः कार्यत्वस्यैवावयवारभ्यमाणत्वस्याप्यसिद्धेः । प्रदेशवत्त्वमप्याकाशेऽतिव्याप्तम् । चतुर्थमपि तत्रैवातिव्याप्तम् । न च सावयवघटादिसंयोगाद्धटाकाशः पटाकाश इत्यादी औपचारिकमेव तद्भानमिति वाच्यम्, निरययवत्वे व्यापित्वविरोधात् परमाणुवत् । न प्रथमद्वितीयः, तत्सम्बन्धस्य समाख्यस्य नित्यत्वे कार्यलक्षणत्वायोगात् । तल्लक्षणत्वे कार्यस्यापि क्षित्यादेनित्यत्वानुषङ्गात् । तथा च न बुद्धि-मद्धेतुकत्वसिद्धिः । कृतमिति प्रत्ययविषयत्वमपि न कार्यत्वम्, खननादिना कृतमाकाशमित्याकाशेऽपि तत्संभवात् । विका-रित्वस्य कार्यत्वे परमेश्वरस्यापि तत्प्रसङ्गः, सतो वस्तुनोऽन्यथाभावित्वस्यैव विकारित्वात् । free, लोके कादाचित्कं वस्तु कार्यत्वेन प्रसिद्धम्, जगतस्तु वियदादिवत्सदैव सत्त्वमिति कुतः कार्यत्वम्? यदि तदन्तर्गततरुतृणादीनां कार्यत्वेन तस्यापि कार्यत्वं भवेत्तदा तु महेश्वराकाशाद्यन्तर्गतानां बुद्धधादीनां परमाण्वन्तर्गतानां और की अपेक्षा रखकर प्रवृत्त होता है । ईश्वर की प्रवृत्ति प्रत्येक प्राणी की मुक्ति के लिये होती है, धर्म और अधर्म के क्षय से ही मुक्ति प्राप्त होती है, अतः भोग और मोक्ष के लिये विश्वनिर्माण का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है | केवल धर्म और aafa किसी कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि यदि वेतन से प्रेरित न हो तो इनमें कार्यों की उत्पत्ति की सामर्थ्य नहीं आती । जीव से प्रेरित होकर के भी ये कार्य को नहीं पैदा कर सकते, क्योंकि ज te aesa है, उसको अदृष्ट, परमाणु इत्यादि का ज्ञान नहीं हो सकता । इस पर जैन और बौद्ध दार्शनिकों का कहना है कि कार्य प्रभृति हेतुयों से स a free at fafa नहीं हो सकती, क्योंकि कार्य क्या है? इस प्रश्न का ही अभी समाधान नहीं हुआ है । कार्यत्व १ - सावयवत्व को कहते हैं? या २ - पहले अविद्यमानस्तु . के अपने कारण की सत्ता में समवाय को कहते हैं? अथवा है- ' बनाया गया ' इस ज्ञान के विषय को कहते है? अथवा ४ -- विकारित्व को कहते हैं? सामयवत्थ का अर्थ भी क्या १ - अवयवों में है? २ - वयवों से आरम्यमाणता है? -प्रदेशवत्ता है? था -सावयव-बुद्धिविषयता है? प्रथम पक्ष में अवयव सामान्य में अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि वह नित्य भी है और अवयवों में वर्तमान भी है । द्वितीय पा में साध्यविशिष्ट दोष होगा, क्योंकि क्षित्यादि में कार्य के समान अवयवारम्यमाणता भी सिद्ध नहीं है । तृतीय पक्ष प्रदेशवत्ता आकार में अतिव्याप्त है । चतुर्थ पक्ष भी आकाश में ही प्रतिव्यास है । यदि आप यह कहें कि सावयत्र घटादि के संयोग से घटाकाश, पटाकाश safe में fearfts बान होता है, तो ऐसा मानने पर निरवयवता के कारण परमाणु के समान आकाश में व्यापित्व धर्म का अभाव मानना पड़ जायगा | यह तो हुआ प्रथम विकल्प के चार पक्षों का खण्डन, प्रथम विकल्प का द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि लम बाप की free ता के कारण उसमें कार्य के लक्षण की संगति नहीं बैठेगी | यदि उसका लक्षण मान लिया जाता है, तो क्षित्यादि को कार्यता भी free माननी पड़ेगी । कुल प्रत्य a at farmar ( किये गये ज्ञान का विषय होता ) वाला कार्यत्व का तृतीय पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि ऐसा मानने पर खननादि क्रिया से आकाश में भी कृतकता बुद्धि होने लगेगी । अब यदि चतुर्थ पक्ष विका free stara माना जाय तो परमेश्वर में भी हा प्रसंग होने लगेगा, क्योंकि सत् वस्तु का अन्यथाभाव हो तो विकार कहलाता है । कदाचित् देखी जाने वाली वस्तु को हो लोक में कार्य कहते हैं, जगत् की तो आदि को aff त सदा सत्ता है, बतः यह कार्य कैसे हो सकता है? यदि तदन्तःपाती तक तृण आदि की कार्यता के कारण जगत् को भी कार्य माना जाय तो महेश्वर के अन्तर्गत
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वेदार्थपारिजातः १५६ पाकजरूपादीनां कार्यत्वेन महेश्वरादेरपि कार्यत्वापत्तिः स्यात् । तथा चास्यापि बुद्धिमद्धेतुकत्वम् । तथा चानवस्था अपल सिद्धान्तश्चस्याताम् safar कार्यसद्धापि कार्यमात्रस्य हेतुत्वे तस्य कारणमात्रेणाविनाभावसिद्धेस्तन्मात्रस्यैवानु-मानम्, न बुद्धिमतः । तथा च सिद्धसाधनादिकम् । ननु यथाग्निमात्रस्य धूममात्रादनुमानं तथैव कार्यमात्राद् बुद्धिमत्कारणमात्रस्यानुमानम्, कथमत्र विरुद्धत्वादिकमिति चेन्न, कार्यमात्रस्य कारणमात्रेणैव प्रतिबन्धस्य प्रतिपन्नत्वेन तदवीनत्वादनुमानस्य बुद्धिमत्कर्तुरनुमानासंभवात् । वस्तुतस्तु धूममात्रमपि नाग्निमात्रस्य गमकम्, अपनीतवह्न्थपवरकधूमेन व्यभिचारात् । किन्त्वच्छिन्नमूलोर्ध्वलेखाद्याकारविशिष्ट एव । तथैव कार्यमपि कृतबुद्धयुत्पादकमेव बुद्धिमतो गमकं न सर्वम्. सारूप्यमात्रेण गमकत्वे बाष्पादेरप्यग्निगमकत्वप्रसङ्गात् । महेश्वरं प्रत्यात्मत्वादेः संसारित्वाल्पज्ञत्वजगदकर्तृत्वानुमापकत्वाच्च वस्तुत्वादेः परमाणुवज्जगदबुद्धिमत्पूर्वकत्वप्रयोजकत्व -प्रसङ्गश्च स्यात् । ततो बाष्पधूमसंस्थानयोः कथञ्चित्साम्येऽपि तथा कश्विद्विशेषोभ्युपेयः, येन धूमोऽग्नि गमयति न वाष्यादिः तथा क्षित्यादी तरकार्यत्वसंस्थानयोरपि । यदि तु कार्यत्वविशेषो ( कार्यत्वे सति विलक्षणत्वादिकम् ) हेतु:, यश्च बुद्धिमत्कर्त्रन्वय-व्यतिरेकानुविधायित्त्वेनावसितस्य क्षित्यादावभावादसिद्धिरेव ' भावे वा जीर्णकूपादिवदक्रियादशिनोऽपि क्षित्यादी कृतबुद्धयु-दयप्रसङ्गः । समारोपानेति चेत्सोऽप्युभयत्राविशेषात् किन्न स्यात्, कर्तुरुभयत्रातीन्द्रियत्वाविशेषात् । विद्यमान बुद्धयादि की तथा परमाणु के अन्तर्गत पाकज रूपादि की कार्यता के कारण महेश्वर, परमाणु आदि की भी कार्यता सिद्ध होने लोगी । इस प्रकार महेश्वर और परनाशु की भी बुद्धिसत्कर्तृकला माननी पड़ जायगी । इससे अनवस्था तो होगी ही बोर यह बात सिद्धान्त विरुद्ध भी होगी । किसी प्रकार कार्य की सिद्धि यदि हो भी जाय तो कार्यमात्र की हेतुता के कारण उसका केवल कारणमात्र से अवि-सिद्ध होगा, फलतः कारणतापात्र का अनुमान हो सकता है, बुद्धिमत्कारणता का नहीं । इस प्रकार सिद्धसाधन आदि दोषो की उद्भावना भी होगी । प्रश्न उठता है कि जैसे अमित्र का धूममात्र से अनुमान होता है, उसी तरह से कार्यमात्र से बुद्धिमत्कारणमात्र का अनुमान हो जाया तो यहाँ पर विरुद्धत्वादि दोषों को प्रसक्ति क्यों होगी? इसका उत्तर यह है कि कार्यमात्र का कारणमात्र से ही प्रतिबन्ध स्वीकृत हैं, अतः अनुमान से केवल कारण की हो सिद्धि हो सकती है, बुद्धिमत्कर्तृकता को नहीं । वास्तव में तो धूममात्र भी अनिमा का शापक नहीं हो सकता, क्योंकि किसी कमरे से अँगीठी यादि में सुलगती हुई नम को हटा देने पर भी यहाँ पर घूत्र मरा रहता है, उस धूम से अग्नि का अनुमान करने पर स्पष्ट ही व्यभिचार है । जिस धूम की मूल उत्पत्ति स्थान से लेकर ऊपर तक एक अविच्ि रेखा अनुयूत दिखाई पड़ती है, ऐसे ही घूम से बह्नि का सही अनुमान होता है, उसी तरह से कार्य हेतु भी कृत बुद्धि की उस के साथ ही बुद्ध पत्कर्तृकता को सिद्ध करता है । सारूप्य मात्र में शापकता आनने पर वाप आप ) प्रभृति से भी अग्नि का अनुमान मानना पड़ जायगा । इसी तरह से महेश्वर के प्रति आत्मत्व आदि हेतु मे संसारित्व, अल्पत्व, जगदकर्तृत्व आदि का भी अनुमान मानना पड़ेगा और वस्तुत्व यादि हेतु से परमाणु के समान जगत् को भी अबुद्धिमत्पूर्वकता की प्रयोजकता की प्रति हो जायगी । अतः वान और धूमसंस्थान में किसी तरह की समानता रहने पर भी उनमें कुछ वैशिष्ट्य भी माना जाता है, जिससे कि धूम से अग्नि का अनुमान होता है, बाष्प से नहीं, उसी तरह से क्षित्यादि का इतर कार्यसंस्थान से वैशिष्ट्य माना जायगा । यदि कार्य r व विशेष अर्थात् कार्यस्व का वैलक्षण्य इसमें हेतु माना जाय तो यदि वह बुद्धिकर्तृकता के साथ अन्वयव्यतिरेक से अनुस्यूत है, प्रसिद्धि होगी और यदि है तो जीणं कूप आदि के समान उनकी रचना को न देखने वाला भी जैसे तो उसके क्षित्यादि में न रहने से कृतकता का अनुमान कर लेता है, उसी तरह से क्षित्यादि में कृत ऐसा नहीं होगा, तो कर्ता तो दोनों ही जगह नहीं दिखाई देता, समान रूप से क्यों न मान लिया जाय । बुद्धि का उदय हो जायगा! यदि आप कहें कि समारोप के कारण फिर दोनों ही जगह साम्य रहने पर यह समारोप दोनों ही जगह
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१६० वेदार्थपारिजातः यदुक्तमस्त्येव प्रामाणिकस्य कृतबुद्धिरिति तन्न, प्रमातुरनेनैव प्रमाणेन प्रामाणिकत्वेऽन्योन्याश्रयः । तथाहि - सिद्ध-विशेषणाद्धेतोरस्योत्थानं तदुत्थाने विशेषणसिद्धिः । अनुमानान्तरेण तत्त्वे तु तस्यापि सविशेषणादेव हेतोरुत्थानम् । तत्रा-प्यनुमानान्तराद्विशेषणासिद्धावनवस्था । प्रमानुमानात्तत्सिद्धावन्योन्याश्रयः । अनुग्राहिकाया युक्तेरभावादागमोऽपि प्रामा-णिकत्वं न साधयति । तदननुगृहीतस्यापि तस्य साधकत्वेऽतिप्रसङ्गः । उक्तयुक्तेश्चावर्तने चक्रकप्रसङ्गः । अक्रियादशिनोऽपि कृतबुद्धयुत्पादकत्वलक्षणकार्यत्वानुमानस्य सिद्धी तेनागमस्यानुग्रहः, तदनुग्रहाच्च प्रमातुः प्रामाणिकत्वसिद्धि:, तत्सिद्धौ च कृतबुद्धयुत्पादकस्वलक्षणकार्यत्वानुमानसिद्धिः । नापि केनचित् स्रष्ट्रा जगत् सृष्टमिति लोकप्रतीत्या प्रामाणिकत्वसिद्धिः " अस्या निर्मूलत्वात् । ' न कदाचिदनीदृशं जगत् ' इति प्रतीतिवद् वेदे मीमांसकस्याकृत्रिमत्वप्रसिद्धिवच्च नेदमनुमानमस्या मूलमन्यो-न्याश्रयात् । नाप्यागमो s स्या मूलम्, प्रमाणभूतागममूलत्वसिद्ध हास्याः प्रामाण्यम्, प्रामाण्ये चास्याः प्रमातुः प्रामाणिकत्वम्, तेन च कृतबुद्धयुत्पादककार्यत्वानुमानात् सातिशयपुरुषसिद्धया तन्निमित्तत्वेनागमस्य प्रामाण्यम् इत्यन्योन्याश्रयः । तथा चक्षित्यादेः कृत्रिमत्वप्रसिद्धिर्लोकप्रवादपरम्परायाता न प्रमाणबलप्रभवा । ननु कृतकस्य न कृतबुद्धयुत्पादक नियमः । खात्तप्रपूरितायां भूमौ कृत्रिममणिमुक्ताफलादावक्रियादर्शिनस्तदभावा-दिति चेन्न तत्राकृत्रिम भूभागादिसंस्थानसारूप्यस्य कृतबुद्धयनुत्पादकस्य हेतो: सद्भावेन तदुपपत्तावपि क्षित्यादौ तदनुपपत्तेः । न च पृथिव्यादावप्यकृत्रिम संस्थानसारूप्यं सम्भवति, अकृत्रिम संस्थानस्य भवताऽनभ्युपगमात् अभ्युपगमे चापसिद्धान्तः । जीर्णकूपादौ दृष्टः कर्तृककूपादिलजातीयत्वलक्षणो विशेषो भवताऽप्यभ्युपगम्य इति कथं नासिद्धो हेतुः? सिद्धावपि विरुद्धो यह कहना भी ठीक नहीं है कि ' प्रामाणिक को दोनों ही जगह कृतक बुद्धि होती है, क्योंकि प्रमाता यदि इसी प्रमाण से प्रामाणिक है तो अन्योन्याश्रय दोष होगा । जैसे कि सिद्ध विशेषण हेतु से इसका उदथान होगा और उसके उत्थान होने पर विशेषण की सिद्धि होगी । अनुमानान्तर से ऐसा मानने पर तो उसका भी विशेषण हेतु से हो उत्थान होना । वहाँ पर भी अनुमानान्तर से विशेषण की सिद्धि मानने पर अनवस्था होगी और प्रथम अनुमान से उसकी सिद्धि मानने पर अन्योन्याय होगा | सहायक युक्ति के अभाव में आगम भी प्रामाणिकता को सिद्ध नहीं कर सकता । बिना मुक्ति की सहायता के आगम को साधक मानने में अतिप्रपक्ति होगी । उक्त युक्ति को आवृत्ति करने पर चक्रक दोष होगा । जैसे कि क्रिया को न देखने वाले व्यक्ति में भी ' कृत ' बुद्धि की उत्पादकता को बताने वाले कार्यत्वानुमान की सिद्धि होने पर उससे आगम का अनुग्रह, उस अनुग्रह से माता की प्रामाणिकता की सिद्धि और इस प्रामाणिकता की सिद्धि से फिर कृत बुद्धि की उत्पादकता लक्षण कार्यस्थानुमान की सिद्धि | किसी स्रष्टा ने जगत् को बनाया है, इस तरह की लोकप्रतीति से भी इसमें प्रामाणिकता नहीं सिद्ध हो सकती, क्योंकि ऐसी प्रतीति निर्मुल है । ' यह जगत् कभी भी जैसा माज हैं, इसके विपरीत नहीं था ' इस प्रतीति की तरह और वेद के विषय में मीमांसक की कृत्रिमता की प्रसिद्धि की तरह, यही अनुमान इसका eras नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें अन्योन्याश्रय दोष होगा | ar गम से भी यह प्रतीति सिद्ध नहीं होगी, raife rurner a गम की सिद्धि होने पर इस प्रतीति का प्रामाण्य होगा और इसके प्रामाण्य के सिद्ध हो जाने पर प्रमाण को प्रामाणिकता सिद्ध होगी और उससे कृत बुद्धि के उत्पादक कार्यत्व के अनुमान से सातिशय पुरुष की सिद्धि होने पर तन्निर्मित आगम का प्रामाण्य माना जायगा, इस तरह से यह सब चक्र या अन्योन्याश्रय दोष से दूषित होंगे । सिस्यादि के कार्यत्व की प्रसिद्धि लोक प्रवाद से ही सिद्ध हो पाती है, इसमें काई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं हो पाता । प्रश्न उठता है कि " कृतकत्व हेतु में भी कृतक बुद्धि के उत्पादन की सामर्थ्य नियमित रूप से नहीं मिलती, क्योंकि बोद कर पुनः भर दी गई भूमि में और कृत्रिम मणि, सुक्ता प्रभृति में कृतक बुद्धि नहीं होती ", इसका उत्तर यह है कि इन स्थलों में अकृत्रिम भूभाग आदि का साय कृतक बुद्धि का बाधक होता है, किन्तु सित्यादि में जहां कि ऐसी स्थिति नहीं है, कृतकत्व हेतु से उनका कार्य सिद्ध हो हो जाता है । पृथिव्यादि में भी अकृत्रिम संस्थान का सह संभव नहीं है, क्योंकि अकृत्रिम संस्थान को आप मानते नहीं, यदि आप माने तो उसमें आपको गलत सिद्धान्त स्वीकार करना पड़ेगा? जीर्ण कूप प्रभृति में दृष्ट कृत कूप आदि के सह वै free आपको मानना पड़ेगा, इस प्रकार हेतु असिद्ध क्यों न होगा? किसी प्रकार यह सिद्ध हो भी जाय तो हेतु विरुद्ध होगा,