वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 191–200

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 191–200

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देवार्थपारिजातः १६१ हेतु:, घटादिवत् सशरीरस्यैव बुद्धिमतः प्रसाधनात् । न चैवं सकलानुमानोच्छेदः, सर्वत्र विरुद्धत्वोपपत्तेरिति वाच्यम्, धूमादिना Tere माने महानसे तरसाधारणस्याग्न्यादेः प्रतिपत्तिसम्भवात् । अत्राप्येवं बुद्धिमत्सामान्यप्रसिद्धेर्न विरुद्धत्वमित्य-व्ययुक्तम्, दृश्यविशेषाधारस्यैव तत्सामान्यस्यातः प्रसिद्धेः । नादृश्यविशेषाधारस्य प्रसिद्धिः, तस्य स्वप्नेऽप्यप्रतीतेः, खरविषाणा-धारतत्सामान्यव्यत् । हेतुव्यापकत्वेनाप्रतिपन्नस्य गम्यत्वे च अभासुररूपोष्णस्पर्शवतोऽप्यग्नेः धूमात् प्रतीतिः स्यात् । ततः कार्यकारणभा ा यादृशात् कारणाद्यादृशं कार्यमुपलब्धं तादृशादेव तादृशमनुमातव्यम् । यथा यावद्धर्मकार्यावद्धर्म-कस्य धूमस्योत्पत्तिः सुदृढप्रमाणात् प्रतिपन्ना तादृशादेव धूमात्तादृशस्यैवाग्नेरनुमानम् । न च प्रासादादिकार्यवत् क्षित्यादि-कार्येष्वप्यतिशयतारतम्यप्रतीतेस्तत्कर्तुरतिशयत्वासिद्धिः स्यात्, तद्वदस्मादृशस्यैव कर्तुरतिशयवतः सिद्धिप्रसङ्गात् । क्षित्यादि-निर्माण तस्यासामर्थ्यादन्यादृशोऽसौ सिद्ध्यतीत्यप्ययुक्तम्, तत्र कर्त्रभावस्यैव प्रसङ्गात् । अन्यादृशस्य कर्तुर्हेतुव्यापकत्वेन कदाचिदप्यप्रसिद्धेः । अव्यापकस्य गम्यत्वे व्यापकमगम्यमव्यापकं तु गम्यमित्यापत्तेश्च । ननु परिशेषात् कार्यस्वव्यापकत्वेनोपादानादिनिखिलकारकसामर्थ्यज्ञानाद्यतिशयवान् कर्तृविशेष: साध्यते, तदन-भिज्ञस्य कर्तृत्वासम्भवात्, अन्यथा सर्वस्य सर्वकर्तृत्वप्रसङ्गः स्यात् । न चास्मदादेः क्षित्याद्यशेषकारकसामर्थ्यावगमोऽस्ति, परमाण्वादेरतीन्द्रियत्वात् । ततोऽशेषकारकप्रयोक्तृत्वलक्षणं कर्तृत्वं तस्य सिद्धयत् तच्छत्तिपरिज्ञानाद्यतिशयपूर्वकत्वमेव सिद्धय-तीति चेन्न प्रयोक्तृत्वस्य शक्तिपरिज्ञानाविनाभावासिद्धेः, सुप्तप्रमत्ताद्यवस्थायां वागादिहेतुनां ताल्वादीनाञ्च शक्तिपरिज्ञाना-भावेऽपि प्रयोक्तृत्वोपलम्भात् । सत्यपि सदविनाभावे न समस्तकारशक्तिविज्ञानं सिद्धयति सूत्रधारादीनां धर्माद्यपरिज्ञानेऽपि क्योंकि घटादि कर्ता के समान इस हेतु से शरीर वाले बुद्धिमान् की हो सिद्धि होगी । इस तरह से तो सारे अनुमानों का उच्छेन हो जायगा, क्योंकि सर्वत्र विरुद्ध हेत्वाभास की उपपत्ति की जा सकती है? इसका उत्तर यह हैं कि धूपादि से वह्नि प्रभृति का अनुमान करने में महानस से भित्र साधारण वह्नि की प्रतिपत्ति संभव है, इसलिये सकल अनुमान के उच्छेद का प्रसंग नहीं उठेगा । अन्य स्थलों में भी इसी तरह से बुद्धिमत्सामान्य की प्रसिद्धि होने से विरुद्ध हेत्वाभास नहीं होगा, यह कम भी गलत है, क्योंकि इससे दृश्यविशेष के आधारभूत बुद्धिमत्सामान्य की हो सिद्धि हो सकेगी । अहश्यविशेष बाधार की सिद्धि स्वप्न में भी नहीं हो सकती, जैसे कि खर की सीम के आधारभूत सामान्य की सिद्धि नहीं होती । हेतु की व्यापकता बिना जाने यदि उसको ज्ञापक माना जाय तो अभासुर रूप और उष्ण स्पर्श बाली अग्नि की भी धूम से प्रतीति होने लगेगी । इसलिये कार्य - कारणभाव के विवेक वाले व्यक्ति को जिस प्रकार के कारण से जिस तरह के कार्य की प्रतीति होती है, उसी तरह के कारण से उस कार्य का अनुमान करना चाहिये । जैसे कि जिस तरह के चिह्न वाले वह्नि से जिस तरह के धूम को उत्पत्ति प्रमाण से ज्ञात हो, उसी तरह के घूम से उसी तरह की वृद्धि का अनुमान होगा । इसी तरह से प्रासादादि कार्य के समान सित्यादि में कार्यता का अतिशय तारतम्य तो है नहीं, जिससे कि दि के कर्ता को बतिशयता सिद्ध हो, क्योंकि इससे तो हमारे जैसा ही कोई कर्ता क्षित्यादि का भी सिद्ध होगा । ' बमा का क्षित्यादि के निर्माण में सामर्थ्य न होने से वह अभ्वाहा सिद्ध होगा ', यह कथन भी गलत है, क्योंकि इस परिस्थिति में तो कर्ता का अभाव ही सिद्ध होगा, क्योंकि अन्याहश कर्ता को हेतु से व्यापकता कदापि सिद्ध न हो सकेगी । अव्यापक की गम्यता मानने पर व्यापक अगम्य और अव्यापक गय्य होने लगेगा । पुनः शंका उठती है कि " परिशेष अनुमान से कार्यत्व के व्यापक उपादानादि निखिल कारक सामर्थ्य के ज्ञान से युक्त सातिशय कर्ता सिद्ध हो जायगा, क्योंकि जो इनको नहीं जानता, वह कर्ता नहीं हो सकता | अन्यथा सभी व्यक्ति सभी कार्यो के कर्ता बन सकते हैं | हम लोगों को क्षित्यादि के सारे कारक सामर्थ्य का तो ज्ञान होता नहीं, क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं । इसलिये अवशेष कारक के प्रयोक्ता के रूप में जब वार्तृत्व सिद्ध होगा तो वह अपने साथ उनको सामर्थ्य की अवगति रूप अतिशयता से युक्त ही सिद्ध होगा " । इस शंका का उत्तर यह है कि प्रयोक्तृत्व का और शक्तिपरिज्ञान ar aferrera fea नहीं हैं, क्योंकि सुप्त अथवा प्रमत्त व्यक्ति में वागादि के कारण कण्ठ तालु आदि का व्यापार शक्ति के परिज्ञान के बिना भी देखा गया है । इनका अविनाभाव सिद्ध हो भी जाय aa भी समस्त कारक शक्ति का विज्ञान नहीं सिद्ध हो पाता, क्योंकि धर्मादि के परिज्ञान के बिना भी सूत्रधार प्रभृति की प्रासादादि २१

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१६२ वेदार्थपारिजातः प्रासादादौ कारकप्रयोत्कृत्वोपलम्भात् । यथा च प्रारब्धकार्यानिष्पत्तेः सूत्रधारादीनां धर्माद्यशेषकारकापरिज्ञानम्, तथेश्वर-स्यापि तदस्तु प्रारब्धाङ्कुरादिकार्यानिष्पत्तेस्तत्राप्यविशेषात् । तत्परिज्ञानेऽप्युपभोक्तुरदृष्टवशात्तया तद्विधानं सूत्रधारादा-वयस्तु | प्रतीतिविरोधोऽप्युभयत्राविशिष्टः । एकस्याखिलकारकाधिष्ठातृत्वानुपपत्तिश्च, अनेकस्याप्यनेककारकाभिष्ठातृत्वदर्शनात् । नहि सर्वमेकेनैव कर्तव्यमेकनिय-मितैरनेकैर्वेति नियमो ऽस्ति, अनेकधा कार्यकर्तृत्वोपलम्भात् । क्वचिदेकेन कुविन्देनैकं वस्त्रादिकं क्रियते क्वचिदेकेन कुम्भकारे-णानेकं घटशरावादिकं क्रियते, अनेकानेकेन घटपटमुकुटशकटादि कुलालादिना क्वचिदनेकेनाप्येकं यथा उद्देहिकाभिर्वल्मी-कम् । न च तासां कश्चिदेकोऽधिष्ठाता । न च प्रासादादिकार्येऽपि स्थपत्यादीनामेकसूत्रधाराधिष्ठितानामेव प्रवृत्तिः, प्रतिनियताभिप्रायाणामेकसूत्रधारानधिष्ठितानामपि प्रवृत्त्यविरोधात् । यद्येकसूत्रधाराधिष्ठितानां स्थपत्यादीनां प्रवृत्त्युपलम्भेन महेश्वरैकाधिष्ठातृत्वं कल्प्यते, तदाऽनेकोद्देहिकानामेकेनाधिष्ठितानां प्रवृत्त्युपलम्भात् तेनानधिष्ठितस्यापि कारणकल्पस्य प्रवृत्तिः किन्न स्यात्, उभयप्रतीत्योः प्रामाण्याविशेषात् । अकृष्टप्रभवैस्तरुतृणादिभिर्व्यभिचारी चायं हेतुः तत्र घटादीनां बुद्धिमत्पूर्वकत्वेऽप्यकृष्टप्रभवतस्तृणादीनां तत्पूर्व-कत्वस्यादर्शनेन तथैवाभ्युपगन्तव्यत्वात् । उभयोरपि प्रतीत्योः प्रामाणिकत्वाविशेषात् । तेषां पक्षीकरणादव्यभिचारे ' स श्यामः, तत्पुत्रत्वादितरपुत्रवत् ' इत्यादेरपि गमकत्वप्रसङ्गान्न कश्चिद् व्यभिचारी हेतुः स्यात् । व्यभिचारविषयस्य सर्वत्रापि पक्षी -कर्तुं शक्यत्वात् । ईश्वरबुद्ध्यादिभिश्च व्यभिचार:, तेषां कार्यत्वे सत्यपि समवायिकारणादीश्वराद्विभिन्नबुद्धिमत्कर्तृपूर्वकत्वा-के निर्माण में प्रवृत्ति देखी जाती है । जैसे प्रारम्भ किये गये कार्य को पूरा न होने पर सूत्रधार बादि को धर्मादि शेष कारक चक्र का परिज्ञान नहीं होता, उसी तरह से ईश्वर में भी यह माना जा सकता है । प्रारब्ध अंकुरादि से कार्य की अनिष्पत्ति यहाँ भी देखी हो जाती है । अशेष कारक चक्र का परिज्ञान मानने पर भी उपभोक्ता के अदृष्ट के कारण सूत्रधार ( मिस्तरी ) आदि में भी उसका विधान माना जा सकता है । प्रतीति का विरोध तो दोनों स्थलों में समान है । एक की अखिल कारक की अधिष्ठातृता भी सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि अनेक व्यक्ति भी अनेक कारण चक्र के अधिष्ठाता होते हैं । सब कुछ एक व्यक्ति ही करेगा अथवा एक व्यक्ति के द्वारा नियन्त्रित होकर ही अनेक व्यक्ति करेंगे, ऐसा कोई नियम नहीं है । कार्य की निष्पत्ति के अनेक प्रकार हैं । कहीं एक ही जुलाहा वस्त्र बुनता है, यहीं एक ही कुम्हार घट - शराव आदि में से किसी एक वस्तु की और कहीं वनेक व्यक्ति मिलकर घट, पट, मुकुट, राकट वादि बनेक कार्यो की निष्पत्ति करते हैं । कहीं अनेक दीमक मिलकर एक बनी बनाते हैं । इनका कोई एक अधिष्ठाता नहीं होता । प्रासाद आदि के निर्माण में भी एक सुत्रधार के अधीन ही सब स्थपति ( fort ) काम करते हों, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रासाद आदि की पूरी रूप - रेखा को ध्यान में बैठा लेने के बाद बिना सूत्रधार की सहायता के भी प्रत्येक स्थपति अपने अपने कार्य में लग जायगा । यदि एक सूत्रकार से अधिष्ठित स्थपतियों की प्रवृत्ति के अनुसार एक ईश्वर की वाप कल्पना करना चाहते हैं, तो फिर बिना किसी एक after ी को बनाने में लगी हुई के उदाहरण से आप एक से अधिष्ठित कारणकलाप की प्रवृत्ति की कल्पना भी क्यों नहीं करते, क्योंकि उक्त दोनों ही प्रकार के अनुभव प्रामाणिक हैं । उक्त हेतु का बिना खेत जोते, बिना बोये अपने आप पैदा होने वाले वृक्ष, तृण बादि में व्यभिचार भी होगा, यहाँ पर घटादि की बुद्धिमत्पूर्वकता के रहते भी दिना उगाये लगे हुए वृक्ष - लताषि में बुद्धिसत्पूर्वकता के न रहने से कार्य की बुद्धिमत्पूर्वकता भी माननी पड़ेगी, क्योंकि दोनों ही अनुभव प्रामाणिक हैं । दोनों अनुभवों को पत्र बनाकर यदि व्यभिचार का लक्षण किया जाता है तो ' वह श्याम है, क्योंकि इतर के पुत्र के समान वह भी उसका पुत्र है ' इत्यादि अनुमानों को भी साध्य के साधक मानना पड़ेगा | फिर तो व्यभिचारी हेतु कोई होगा ही नहीं, क्योंकि सर्वत्र व्यभिचार के विषय को पक्ष anter जा सकता है । ईश्वर को बुद्धि आदि में भी हेतु व्यभिचरित होगा, क्योंकि ईश्वर की बुद्धि आदि भी कार्य हैं, किन्तु अपने समवायीकारण ( जिसमें वह रहती है ) share afra कोई बुद्धिमान् कर्ता उसका नहीं है, किन्तु घटादि दृष्टान्त में बुद्धिमत्पूर्वकता के साथ समवायिकारण से भिन्न

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वेदापारिजातः १ दिन भावात् दृष्टान्ते घटादी बुद्धिमत्कर्तृपूर्वकत्ववत् समवायिकारणाद्वयतिरिक्त बुद्धिमत्कर्तृपूर्वकत्वेनापि व्याप्तिः कार्यत्वस्य प्रतिपन्ना, तदभ्युपगमे चानवस्था । न चैकस्यैव समवायिनिमित्तकारणत्वं युक्तम्, घटादौ तथानुपलम्भात् । तत्रानुपलब्ध-स्यापि कल्पने क्षित्यादेरबुद्धिमद्धेतुकत्वं किन्न कल्प्येत, अविशेषात् । fe, वन्यतृणादौ कर्त्र भावस्य प्रत्यक्षेणैवोपलम्भादग्नेरनुष्णत्वे साध्ये द्रव्यत्ववद् बाधितश्चायं हेतुः । न च दृश्य-स्यैवानुपलम्भेनाभावः सिद्धयति नान्यस्य, अन्यथाऽऽकाशादेरप्यभावः स्यात् । न चार्य दृश्य इत्यनुपलम्भेऽपि न तदभावः सिद्धयतीति वाच्यम्, कुतश्चित्प्रमाणात् सद्भावे सिद्धेऽदृश्यत्वेनानुपलम्भस्तत्सद्भावश्चास्मादेवानुमानादन्यतो वा? प्रथमे चक्रकम्, अतः सद्भावे सिद्धेऽदृश्यत्वेनानुपलम्भ:, तत्सिद्धौ च बाधाभाव:, ततश्चास्मात् तत्सद्भावसिद्धिः । न द्वितीयः, तत्वद्भावावेदकप्रमाणान्तरस्याभावात् । तत्सद्भावेऽपि किमदृश्यत्वे देहाभावः कारणम्, विद्यादिप्रभावो जातिविशेषो वा? न शरीराभावोऽशरीरस्य कार्यकर्तृत्वानुपपत्तेः । तथाहि -- नेश्वरः क्षित्यादिकर्ता अशरीरत्वात् मुक्तात्मवत् । ननु शरीरं न कर्तृशरीरे प्रविशति, तदभावेऽपि ज्ञानेच्छा प्रयत्नाश्रयत्वमात्रेण स्वशरीरप्रेरणे कर्तृत्वोपलम्भादिति, तदसत्, शरीरसम्बन्धेनैव तत्प्रेरणोपलम्भात् । तत्सम्बन्धी हि आत्मनः सशरीरत्वम्, तस्मिन् सत्येव स्वशरीरेऽन्यत्र वा कार्य-कर्तृत्वोपलब्धेः । शरीराभावे मुक्तात्मवज्ज्ञानाश्रयत्वमप्यसम्भाव्यम्, तदुत्पत्ती देहस्य निमित्तकारणत्वात् । तदभावेऽपि तदुत्पत्ती सुक्तात्मनोऽपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गः । बुद्धिमन्निमित्ताभावेऽपि क्षित्याद्युत्पत्तिप्रसङ्गः स्यात् । नित्यत्वात्तेषामदोषोऽय-मित्यपि न युक्तम्, ज्ञानादीनां नित्यत्वेन कदाचिदप्यप्रतीतेः । ' ईश्वरज्ञानादयो न नित्याः, ज्ञानादित्वात्, अस्मदादिज्ञानवत् ' बुद्धिमान् कर्ता घटादि कार्य का देखा गया है । यदि ईश्वर वृद्धि में भी इसको माना जाय तो अनवस्था दोष होगा । एक ही वस्तु समवायी और निमित्त दोनों नहीं हो सकते । घटादि में ऐसा नहीं देखा जाता । यदि अनुपलब्ध की भी पता करनी है तो सित्यादि की बुद्धिमता हो आप क्यों नहीं मान लेते, क्योंकि इन दोनों में कोई फरक तो है नहीं । बन्य तृणादि में कर्ता का अभाव प्रत्यक्ष सिद्ध है, तः यह हेतु उसी तरह से बाधित माना जायगा, जैसा कि अग्नि की अनुष्णता सिद्ध करने के लिये दिया गया द्रव्यत्व हेतु । यदि कहो कि ' दृश्य वस्तु का ही अनुपलम्भ से अभाव सिद्ध किया जा सकता हैं, aera का नहीं, क्योंकि ऐसा न मानने पर बाकाशादि का सी अभाव सिद्ध हो जायगा । ईश्वर दृश्य तो है नहीं, अतः उसके मनुपलम्भ भाव से भाव सिद्ध नहीं हो सकता ' | किन्तु इस पर हम पूछते हैं कि किसी प्रमाण पे वस्तु का सद्भाव सिद्ध हो जाने पर उसकी अश्यता को देखकर अनुपलब्धि और दृश्य होने पर सज्ञान इसी अनुमान से सिद्ध होगा या इससे भिन्न से? प्रथम पक्ष में चक्र दोष होगा, क्योंकि इसके सन्द्राय सिद्ध होने पर दृश्य होने के कारण अनुपलम्य, उसकी सिद्धि होने पर बाध का अभाव और तब इससे उसके सद्भाव की सिद्धि । द्वितीय पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि उसके सद्भाव को बताने वाला दूसरा कोई प्रमाण नहीं है । दूसरा प्रमाण मान भी लिया जाय तो अवश्यत्व में देहभाव कारण है, विद्यादि का प्रभाव, अथवा जाति-विशेष? शरीराभाव कारण नहीं होगा, क्योंकि शरीर व्यक्ति किसी कार्य को नहीं कर सकता | जैसे कि ईश्वर सित्यादि का कर्ता नहीं हो सकता, क्योंकि मुक्तात्मा की तरह वह भी शरीर से रहित है । ' कर्ता के साथ शरीर को नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि शरीर के बिना भी ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न आदि के बाश्रयमात्र से अपने शरीर की प्रेरणा करने पर कर्तृत्व का उपलम्भ होता है । किन्तु यह कथन इसलिये गलत है कि शरीर का सम्बन्ध होने पर ही ज्ञान, इच्छा आदि की प्रेरणा होती है । इनका सम्बन्ध हो आत्मा की सशरीरता को सिद्ध करता है । इनके रहते हो अपने शरीर में अथवा अन्यत्र कार्य कर्तृत्व की उपलब्धि होती है । शरीर के अभाव में मुक्तात्मा की तरह ज्ञानाश्रयता भी नहीं सिद्ध होगी, क्योंकि ज्ञान की उत्पत्ति में देह निमित्तकारण है । शरीर के भाव में भी ज्ञान की उत्पत्ति मानने पर मुक्तात्मा में भी ज्ञान की उत्पत्ति क्यों नहीं मानी जायगी? इसी तरह से बुद्धिमान् निमित के अभाव में भी मित्यादि की उत्पत्ति माननी पड़ जायगी । ' ईश्वरगत ज्ञानादि की नित्यता के कारण उनमें यह दोष नहीं वे यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि इनको नित्य मान लिया जायगा तो इनकी प्रतीति कभी नहीं होगी । ईश्वर के ज्ञानादि गुण नित्य नहीं है, क्योंकि वे हमारे ज्ञानादि के

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१६४ वेदार्थपारिजातः इत्यनुमानविरोधाच्च । तेषां दृष्टस्वभावातिक्रमे भूरुहादीनामपि स स्यात्, अविशेषात् । ततो ज्ञानादीनां शरीरसम्पाद्यत्व-वाभ्युपगन्तव्यम् । तत्कथमकिञ्चित्करं शरीरम्? यदुक्तम्- ' सहचारमात्रेण कारणत्वे वह्रिङ्गल्यस्यापि धूमं प्रति कारणता प्रसज्येतेति तन्त्र, पेङ्गल्यमात्रस्य धूमकारणत्वानुक्तः, हरितालादौ तत्सद्भावेऽपि धूमानुत्पत्तेः । वह्निविशेषितस्य तद्धेतुत्वे तु न किञ्चिद्विरोधः । यथैवेन्धन-सम्बद्धो वह्निर्धूमोत्पादकः, नान्यः, तथैव वह्निविशेषितं पैङ्गल्यं तन्निबन्धनं नान्यत् । विद्यादिप्रभावस्य चादृश्यत्वहेतुत्वे कदाचिदसौ दृश्येतापि, विद्याभूतां तन्त्रादिमताश्च शाश्वतिकादृश्यत्वाभावात् । इतरविद्याभृद्भ्यो वैलक्षणै स्वभावातिक्रमेष्टी aadishta कार्यवैलक्षण्येन तदतिक्रमेष्टिः किन्न स्यात्? पिशाचादिवज्जातिविशेषोऽदृश्यत्वे हेतुरित्यपि न युक्तम्, एकस्य जातिविशेषाभावात्, अनेकनिष्ठत्वात्तस्याः । किञ्च, सत्तामात्रेण, ज्ञानवस्वेन, ज्ञानेच्छावत्त्वेन, तत्पूर्वकव्यापारेण, ऐश्वर्येण वा क्षित्यादेः कारणं स्यात्? नाद्यः, कुलालादेरपि तत्प्रसङ्गात्, सत्तामात्रस्य तत्राप्यविशेषात् । द्वितीये योगिनामपि तत्प्रसङ्गः न च योगिनां तथाभूतमशेषार्थज्ञानं नास्ति, तेनायमदोष इति वाच्यम्, कुत एतदित्यसिद्धेः " सर्वकर्तृत्वाच्चेदन्योन्याश्रयः । सर्वज्ञत्वसिद्धौ सर्वकर्तृत्वसिद्धिः, सर्वकर्तृत्वाच्च सर्वज्ञत्यसिद्धिः । तृतीयपक्षोऽप्यसङ्गतः, अशरीरस्य ज्ञानेच्छाप्रयत्नवत्त्वप्रतिषेधात् । व्यापारवत्त्वमपि अशरीरस्यासंभाव्यम् । व्यापारोऽपि कायकृतः वाक्कृतो वा? तदुभयमपि नाशरीरे संभवति । न चैवं कस्यचित् प्रतीतिर्भवति ः कायेन वा s श्वरप्रेरितः । व्यापारश्च क्रिया । सा चास्य दुर्घटा । तथाहि-- निर्व्यापार ईश्वरः, सर्वगतत्वात्, सदृश ही हैं, इस अनुमान से विरोध भी होगा । यदि इनमें इष्ट स्वभाव का अतिक्रम माना जाय तो वह वृक्षादि में क्यों न माना जायगा? क्योंकि दोनों हो समान है । इसलिये ज्ञानादि की शरीर - संपाद्यता ही माननी पड़ेगी । अतः पारीर को अनित्कर कैसे कहा जा सकता है? यह जो कहा गया है कि ' सहचार मात्र से कारणता मानने पर अति का पीलापन भी धूम के प्रति कारण होने लगेगा ', इसलिये गलत है कि केबल पीलापन मात्र की धूम के प्रति कारणता नहीं बन सकती, क्योंकि हरताल बादि में पीलेपन के रहते भी धूम उत्पन्न नहीं होता । वह्नि विशेषित पैंगल्य ( पीलापन ) को धूम का कारण मानने में कोई विरोध नहीं है । जैसे इन्धन से सम्बद्ध वह्नि धूम का उत्पादक है, अन्य नहीं, इसी तरह से वह्नि से विशेषित पैंगल्य धूम का कारण होगा, अन्य नहीं । विद्यादि के प्रभाव को यदि मद्दश्यता का कारण माना जाय तो कदाचित् वह दृश्य भी हो सकता है, क्योंकि विद्यानों को धारण करने वाले और शास्त्रज्ञ व्यक्तियों की शाश्वत अदृश्यता नहीं रहती । इतर विद्याधारियों से वैलक्षण में यदि स्वभाव का अतिक्रम माना जाता है, तो जगत् की मी इतर कार्यों से विलक्षणता के कारण कार्यत्व से अतिक्रम क्यों न माना जायगा? पिसाचादि की तरह जातिविशेष को यदि अदृश्यता में कारण माना जाता है तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक व्यक्ति में जाति नहीं रहती । जाति तो अनेक में ही रहती हैं । फिर आप यह बताये कि ईश्वर क्षित्यादि का कारण केवल सत्तामात्र से होता है, ज्ञानवत्ता से, ज्ञानेच्छावत्ता से, ज्ञानेच्छा-पूर्व व्यापार से, अथवा ऐश्वर्य से? पहला पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि सत्तामात्र से तो कुलालादि भी सित्यादि के कारण हो सकते हैं, क्योंकि उनमें भी समान रूप से विद्यमान हैं हो । ज्ञानवता को कारण मानने पर योगियों में भी क्षित्यादिकर्तृकता होगी । ' योगियों इस तरह का शेषार्थ का ज्ञान नहीं है ' ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस बात को सिद्ध करने वाला कोई सिद्ध हेतु नहीं है । यदि इस हेतु में दें तो अन्योन्याश्रय दोष होगा, क्योंकि सर्वज्ञत्य की सिद्धि होने पर सर्वकर्तृत्व की और सर्वकर्तृत्व की सिद्धि होने पर सर्वेशत्व की सिद्धि होगी । तृतीय पक्ष भी असंगत है, क्योंकि अशरीर के ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न आदि का खण्डन किया जा चुका है । चतुर्थ हेतु व्यापारवत्व ' भी बशरीर में नहीं बनता । व्यापार भी शरीरकृत है या वाणीकृत? ये दोनों ही बशरीर ( शरीर रहित ) नहीं बनते | इस तरह or feit at an it नहीं होता कि ' मैं वचन से अथवा शरीर से ईश्वर के द्वारा प्रेरित हूँ ' । क्रिया का ही नाम व्यापार है और वह अशरीर में बन सकती नहीं । इन अनुमानों से भी यही सिद्ध होता है कि ईश्वर निर्व्यापार है, क्योंकि वह आकाश की भाँति सर्वगत है, यदि इसको सक्रिय माना जाय तो इसकी अवस्था में परिवर्तन होने से इसमें अनित्यत्व आ जायगा, क्योंकि जो अवस्था से विचलित नहीं होता,

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वेदार्थपारिजातः १६५ आकाशवत् । सक्रियत्वे चास्यास्तादवस्थ्यादनित्यतापत्तिः, स्वावस्थातोऽविचरद्रूपस्यैवार्थनित्यैकरूपत्वोपपत्तेः । न च परमाणुभि-र्व्यभिचारः तेषामपि परिणामानित्यत्वस्येष्ठेः । ईश्वरस्यापि तद्वत्तदिष्टौ अपरबुद्धिमद्धेतुकत्वानुषङ्गादनवस्था | अन्यथा तेनैव कार्यत्वादेर्व्यभिचारः । प्रतिकार्य चास्य एकदेशेन सर्वात्मना वा व्यापारः? एकदेशेन चेद्यावन्ति कार्याणि तावद्भिरेव ईश्वरावयवेर्भाव्यमिति निरंशप्रतिज्ञा भज्येत । सर्वात्मना व्यापारे यावन्ति कार्य्याणि तावद्वा ईश्वरस्य भेदप्रसङ्गः । किञ्चासौ येनैकेन स्वभावेनैकं कार्यं करोति तेनैव तत्स्थित्यादिकमपि काय्र्यान्तरञ्च, स्वभावान्तरेण वा? यदि तेनैव तदा स्थित्युत्पत्त्यादीनां कार्यान्तराणाञ्च क्रमः वैचित्र्यश्व न स्यात्, स्वभावभेदे वाऽनित्यत्वम् । ऐश्वर्यमपि ज्ञातृत्वं कर्तृत्वमन्यद्वा स्यात्? प्रथमेऽपि ज्ञातृत्वमात्रं सर्वज्ञातृत्वं वा? आये ज्ञातैवासी नेश्वरः, ज्ञात्व-स्येश्वरत्वाप्रयोजकत्वात् । द्वितीयेऽपि सर्वज्ञत्वमेव नैश्वर्यम्, सुगतादिवत् । यदि कर्तृत्वं तहिं कुलालादीनामपि तत्प्रसङ्गः स्यात् । नाध्यन्यत्, इच्छाप्रयत्नव्यतिरेकेणान्यस्यैश्वर्यनिबन्धनस्येश्वरेऽभावात् । अथ तयोरेव तन्निबन्धनत्वमिष्यते? नन्वत्रापि ताभ्यां कोडीकृतं सर्वं किञ्चिद् वा? सर्वस्य क्रोडीकारे युगपत् सर्वमुत्पद्येत । किश्चिचचेत्तर्हि इच्छा प्रयत्नविषयस्य क्रमिकत्वे कथमेकरूपत्वं तयोः स्यात्? किञ्चेष्यमाणार्थावच्छेदेन इच्छोत्पद्यते, न चोत्तरकालभाव्यात्ममन: संयोगजज्ञान-विषयाकारं विना तत्र नियत विषयमात्मानमप्यसौ स्वीकर्तुं समर्थः । किञ्चास्य सिसृक्षासंजिहीर्षे युगपद्भवतः क्रमेण वा? युगपद्भावे सृष्टिसंहारयोर्योगपद्यप्रसङ्गः । क्रमेण तद्भावे कारणं वाच्यम् । कारणापेक्षायां नित्यत्वक्षतिः । अथ नित्यमप्यिच्छाप्रयत्नादिकं विचित्रसहकारिसन्निधानात् कार्यवैचित्र्यं उसी को नित्य कहा जा सकता है । इस हेतु का परमाणु में व्यभिचार नहीं होगा, क्योंकि परमाणु में परिणामानित्यता ही मानी जाती है । ईश्वर में भी परिणामानित्यता मानने पर अपर बुद्धिमद्धेतुकता के साथ उसका सम्बन्ध होने से अनवस्था होने लगेगी । अन्यथा इससे कार्यव आदि का व्यभिचार होगा । आप यह भी बताइये कि ' प्रत्येक कार्य के साथ इसका व्यापार एक देश से होगा या सर्वात से? ' यदि एक देश से व्यापार होता है तो जितने कार्य हो, उतने ही ईश्वर के अंग होने चाहिये और ऐसा होने पर ईश्वर की निरंता भंग हो जायगी । सर्वांश से व्यापार मानने पर जितने कार्य हैं, तदनुसार ही ईश्वर भी अनेक मानते पड़ेंगे । फिर यह भी बताइये कि ईश्वर जिस एक स्वभाव से एक कार्य करता है, उसीसे स्थित्यादि कार्यान्तर भी करता है या कार्यान्तर के लिये स्वभावान्तर की आवश्यकता पड़ती हैं? यदि एक ही स्वभाव से करता है तो स्थिति, उत्पत्ति आदि की कार्यान्तरता, उनका क्रम और वैचित्र्य नहीं बन पावेगा । यदि स्वभाव का भेद माना जाता है, तो ईश्वर में अनित्यता आ जायगी । Free का ऐश्वर्य भी क्या ज्ञातृत्व है, कर्तृत्व है या और कुछ? ज्ञातृत्व ( ज्ञाता होना ) भी केवल ज्ञातृता है या सर्वज्ञातृत्व? प्रथम पक्ष में यह ज्ञाता ही होगा, ईश्वर नहीं, क्योंकि ज्ञातृत्व ईश्वरत्व का साधक नहीं है । द्वितीय पक्ष में भी सुगतादि की तरह सर्वज्ञत्व ही सिद्ध होगा, ईश्वरत्व नहीं । यदि कर्तृत्व ( कर्ता होना ) ही ऐश्वर्य माना जाता है तो कुलाल आदि में भी इसकी आपत्ति होगी । इससे भिन्न ऐश्वर्य का निमित्त नहीं होगा, क्योंकि इच्छा, प्रयत्न आदि से भिन्न अन्य कोई ( कारण ) ईश्वर में ऐश्वर्य का कारण नहीं बन सकता | अब यदि इन्हीं को इसका कारण माना जाता है यह बताइये कि इनसे सब कुछ सिद्ध हो जाता है या कुछ ही? यदि सब कुछ हो सकता है, तो सबकी उत्पत्ति एक साथ होने लगेगी । यदि सब कुछ को ही सिद्धि होती है तो इच्छा प्रयत्न आदि को क्रमिकता के कारण उनमें एकरूपता कैसे रहेगी? ऐसा भी देखा गया है कि दिखायी देने वाले विषय के अनुरोध से इच्छा उत्पन्न होती है, किन्तु उत्तर काल में होने वाले वात्मा और मन के संयोग से उत्पन्न ज्ञान के विषय के आकार के बिना वहीं नियतविषयक आत्मा को भी स्वीकार करने में समर्थ नहीं होता । यह भी बताइये कि इसकी सिसृक्षा ( पैदा करने की इच्छा ) और संजिहीर्षा ( संहार की इच्छा ) एक साथ होती है या क्रम से? एक साथ मानने पर सृष्टि और संहार एक साथ होने लगेंगे । क्रम से होने में कारण बताना पड़ेगा । कारक की अपेक्षा मानने पर ईश्वर की नित्यता नष्ट हो जायगी । अब यदि यह कहा जाय कि नित्य होते हुए भी इच्छा, प्रयत्न आदि विचित्र सहकारी कारणों के संधान के कारण कार्य में वैचित्र्य होता है तो इस पर भी यह पूँछा जा सकता है कि ये सहकारी उसके अधीन हैं या नहीं? यदि वे

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१६ * देवार्थपारिजात: विदधात, अथापि ते सहकारिणोऽतदायत्तास्तदायत्ता वा? प्रथमे तैरेव कार्यत्वादेर्व्यभिचारः । तदायत्तत्वे तदेव ते कुतो न स्युः? तद्धेतूनामभावादिति चेत्तेऽपि तदायत्तास्तद्विपरीता वा? इत्यादिदूषणमेव । ते सहकारिण उपकारका न वा? अनुपकारकत्वे कथं सहकारिणः, अतिप्रसङ्गात् । उपकारकत्वेऽस्य परिणामित्वम्, तत्कृतोपकारस्याऽनर्थान्तरत्वात् । अर्थान्ति-रत्वे तस्येति व्यपदेशो न स्यात् । तेनाप्युपकारान्तरकरणेऽनवस्था । किञ्चेश्वरस्य जगन्निर्माणे यथारुचि प्रवृत्तिः, कर्मपारतन्त्र्येण, करुणया, धर्मादिप्रयोजनोद्देशेन, कीडया, निग्रहानु-ग्रविधानार्थं वा, स्वभावतो वा? प्रथमे कदाचिदन्यादृश्यपि सृष्टिः स्यात् । कर्मपारतन्त्र्ये स्वातन्त्र्यहानिः । यदि करुणया, तह सर्वानप्यभ्युदयेन युञ्ज्यात्, न च कञ्चिदुःखी स्यात् । यच्चाभ्युदयकामनयैव तानि तानि कर्माण्यनुभावयतीति, तदपि प्रक्षालिताशुचिमोदकत्यागन्यामनुहरति । यदपि पूर्वाजितैः कर्मभिरेव वशीकृता जीवा दुःखितो भवन्ति, तहि तस्य कः पुरुषकार:? कर्मणामुपभोगेनेव प्रक्षयोपपत्तेः । अदृष्टापेक्षस्य कर्तृत्वे किं तत्कल्पनया? कल्पितोऽपि तदधीनश्चेद् जगदेव तदधीनमस्तु किमन्तर्गडुना तेन? अथ धर्मादिप्रयोजनमुद्दिश्यायं प्रवर्तते, कथमसौ कृतकृत्य:? क्रीडासद्भावे कथं वीतरागता? परपुरुषश्वेश्वरो बालग्रहिलवत् क्रीडतीति चित्रम्? निग्रहानुग्रहप्रदत्वेऽपि कथं वीतरागद्वेषता? अथ स्वभावतोऽसी प्रवर्तते, यथा आदित्यः प्रकाशस्वभावत्वात् प्रकाशयति, तर्हि चैतन्यस्य सतोऽप्यकिचित्करत्वाज्जगतोऽचेतनस्यापि स्वभावतः प्रवत्ति-अधीन नहीं है तो इसीसे कार्यत्व आदि हेतु व्यभिचरित हो जायेंगे । यदि वे ईश्वर के अधीन हैं तो उसी समय वे क्यों नहीं हो जाते । यदि यह कहा जाय कि उस समय उनके हेतु की अविद्यमानता के कारण ऐसा नहीं होता, तो फिर यह बताइये कि वे हेतु भी ईश्वर के atta हैं या नहीं? दोनों ही पक्षों में उक्त दोष ही पुनः उपस्थित होंगे । ये सहकारी भी कोई आकार वाले हैं या नहीं? यदि आकारी नहीं है, तो भी उनको सहकारी मानने पर अतिप्रसंग होगा । उपकारक मानने पर उसमें परिणामिता माननी पड़ेगी, क्योंकि उनके द्वारा कृत उपकार भी उससे भिन्न अर्थ तो है नहीं । यदि उसको भिन्न विषयक माना जाता है तो उसका अभिन्न रूप से व्यपदेश कैसे होगा? यदि यह कहा जाय कि वह भी दूसरे उपकार को करेगा तो इसमें अनवस्था दोष होगा । यह भी प्रश्न उठता है कि ईश्वर को जग के f र्माण में प्रवृत्ति अपनी रुचि के अनुसार होती है? कर्म की परतन्त्रता के कारण होती है? करुणा से? धर्मादि प्रयोजनों के उद्देश्य से? क्रोडा से? निग्रह और अनुग्रह करने के लिये होती है? या स्वभाव से ही होती है? रुचि के अनुसार सृष्टि मानने पर कभी भिन्न प्रकार की भी सृष्टि होनी चाहिये । कर्म की परतन्त्रता के कारण ईश्वर की सृष्टि में प्रवृत्ति मानने पर ईश्वर में स्वातन्त्र्य की हानि होगी । यदि करुणा से प्रेरित होकर ईश्वर सृष्टि करता है तो वह Fast anger से ही संयुक्त करेगा, तब कोई दुःखी नहीं रहेगा | यह कहना कि अभ्युदय की कामना से ही यह जीव को सब तरह के कर्मों का अनुभव कराता है, तो यह कथन अपवित्र मोदक को पहले धोना और बाद में उसके स्वागने के समान है । यदि पूर्वाजित कर्मो के अनुसार जीव दुःखी होते हैं, ऐसा माना जाय, तो फिर इसमें ईश्वर का क्या पुरुषार्थ हुआ? कि कर्मों का क्षय उपभोग से ही होना है । -जीवों के दुष्ट की अपेक्षा रखकर ही यदि ईश्वर में कर्तृत्व है तो फिर ईश्वर की कल्पना से क्या लाभ? ईश्वर की कल्पना के बाद भी यदि वह use के t ही है तो फिर यह जगत् अदृष्ट के अधीन ही क्यों न पैदा हुआ मान लिया जाय? बीच में निरर्थक ईश्वर को स्वीकार करने से क्या लाभ? अब यदि यह कहा जाय कि ' धर्मादि प्रयोजन के उद्देश्य से ईश्वर जगत् की सृष्टि में प्रवृत्त होता है, तो फिर Test ear कैसे कहा जा सकता है? यदि वह क्रीडा करना चाहता है तो वीतराग कैसे कहलाया? परम पुरुष ईश्वर बालक की तरह क्रीडा में माग्रह रखता है, यह भी एक विचित्र ही कलना है । यदि निग्रह और अनुग्रह के लिये वह सृष्टि करता है, तो उसको राम और द्वेष से रहित कैसे कहा जा सकता है? यदि यह कहा जाय कि ' सृष्टि करना उसका स्वभाव है, जैसे सूर्य का यह स्वभाव है कि वह सब वस्तुओं को प्रकाशित करता है, तो ईश्वर में चैतन्य की सत्ता के रहते भी जब उसका कोई उपयोग नहीं है, तो इस स्थिति में अन जगत् की ही स्वभावतः प्रवृत्ति क्यों न मान ली जाय? उसके अधिष्ठाता की कल्पना से क्या लाभ? ' अचेतन की स्वभावतः प्रवृत्ति मानने पर देश, काल आदि का नियम कैसे बनेगा और कार्य के fr ष्पन्न हो जाने के बाद भी उसकी प्रवृत्ति क्यों नहीं होगी? ' इस

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वेदार्थपारिजात: १६७ r स्तु किमधिष्ठातृकल्पनया? कथमचेतनस्य देशादिनियमः? कथञ्च निष्पत्रेऽपि वा कार्ये प्रवृत्तिर्न स्यादित्यन्यत्रापि समानम्, नित्यादिस्वभावस्येश्वरस्यापि तद्दोषप्रतिपादनात् । बुद्धिमत्त्वञ्चास्य अनित्यया बुद्धया नित्यया वा? न नित्यया, तस्था अनुमाने वाघप्रतिपादनात् । नानित्यया, तस्याः कारणानिरूपणात् । तथाहि-- इन्द्रियार्थसन्निकर्षात् समाधिविशेषात्, तदुत्यधर्मं माहात्म्यात्, अनुध्यानमात्राद्वा? तत्राद्यः पक्षोऽयुक्तः, अशरीरस्यान्तःकरणाद्यभावात्, मुक्तात्मवत् । उत्पत्तौ च न सर्वज्ञता, तज्ञ्जनितज्ञानस्य नियतविषय-स्वात् । अचेतनाश्चक्षुरादयः केनचिदधिष्ठितास्तज्ज्ञानं जनयन्ति, अनधिष्ठिता वा? यदि प्रथमस्तदा जगदप्यनधिष्ठिताः परमाणवो जनयन्तु किमधिष्ठातृकल्पनया? अथाधिष्ठितास्तदापि तेनैवाधिष्ठात्रन्तरेण वा? अधिष्ठात्रन्तरेण चेत्, अनवस्था | तेनैव चेत्, चक्रकम् । तथाहि ज्ञाताः सन्तस्ते प्रेय्र्य्यन्ते, प्रेरिताश्च ज्ञानं जनयन्ति, जनितज्ञाना ज्ञाता भवन्ति । समाधिविशेषोऽ-नुध्यानश्च ज्ञानविशेष एव तस्याद्याप्यसिद्धेः । कथं स्वस्मादेव स्वस्योत्पत्तिः? अत एव तदुत्थधर्मस्यापि न सिद्धिः, अशरीरस्य मुक्तात्मवत् समाधिविशेषादिकं न सम्भवति । अथ नित्यानित्यबुद्धिविशेषानपेक्ष्यवृद्धिसामान्येन तत्र तद्वत्ता, तदप्यसारम्, द्वितीयविशेषस्यासम्भवात् अनित्यस्यैव ज्ञानस्य दर्शनात् । कथञ्चिबुद्धिमत्त्वेऽपि शास्त्राणां प्रमाणेतरव्यवस्थाविलोपः । सर्व शास्त्रं प्रमाणमेव स्यात् ईश्वरप्रणीतलात्, तत्प्रणीतप्रसिद्धशास्त्रवत् । प्रतिवाद्यादिव्यवस्थालोपश्च सर्वेषामीश्वरादेशविधायित्वात् । आदेशविधायिनाश्च प्रतिलोमाचरण-विरोधात् । संसारविलोपम्ध । ईश्वरव्यापारात् पूर्वं तनुकरणाद्यभावतः सकलात्मगुणानां बुद्धयादीनामप्यभावाद मुक्तैत्र तरह की आपत्तियां समान रूप से दोनों ही जगह उठ सकती है, क्योंकि नित्यादि स्वभाव परमेश्वर में भी ये हो दोष समान रूप से प्रति-पादित किये जा सकते हैं । ईश्वर का बुद्धिमल्ब भी अनित्य बुद्धि के कारण होगा या नित्य बुद्धि के कारण? नित्य बुद्धि से नहीं हो सकता, क्योंकि अनु-मात्र के द्वारा नित्य बुद्धि का बाध सिद्ध किया जा चुका है । अनित्य बुद्धि मे भी बुद्धिमत्व ईश्वर में सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि उसका कोई कारण नहीं बताया गया है । जैसे कि यह अनित्य बुद्धि ईश्वर में इन्द्रिय और अर्थ के संनिकर्ष से होगी, समाधि विशेष से, ईश्वर से उत्पन्न धर्म विशेष में, अथवा केवल ईश्वर के अनुध्यान मात्र के? इनमें पहला पक्ष इसलिये अयुक्त है कि अवरीरकर में मुक्कामा के समान की अन्त: करण का ही अभाव है? फिर बुद्धि कहाँ से आयेगी । उत्पत्ति मानने पर ईश्वर में सर्वज्ञता नहीं बन पायेगी, क्योंकि उत्पन्न ज्ञान का विषय तो है । आप यह भी बताइये कि सचेतन चक्षुरादि इन्द्रियों किसी से अधिष्ठित होकर ज्ञान को उत्पन्न करती हैं, त? यदि अनविष्ठित होकर ही ज्ञान को उत्पन्न करती है, तो अनधिष्ठित परमाणु ही जगत् की सृष्टि क्यों नहीं कर देते । फिर वहाँ भी अधिष्ठाता की कल्पना से क्या लाभ? यदि अधिष्ठित होकर इन्द्रिय ज्ञान को उत्पन्न करती है तो वह अधि छाता ईश्वर ही है, या उससे मित्र? इससे भिन्न अधिष्ठाता मानने पर अवस्था होगी । उसी को अधिष्ठाता मानने पर चक्रक दोष होगा । जैसे कि ज्ञात होने पर वे प्रेरित होते हैं, प्रेरित होकर ज्ञान को पैदा करते हैं, ज्ञान के उत्पन्न होने पर वे ज्ञात होते हैं और ज्ञात होने पर वे प्रेरित होते हैं । समाधि विशेष और वानुध्यान भी ज्ञान का एक प्रकार ही है और उस ज्ञान हो को तो अभी सिद्ध करना है | अपने से ही अपनी उत्पत्ति भी कैसे होगी? इसीलिये ईश्वर से उत्पन्न धर्म की भी सिद्धि नहीं होगी । अशरीर ईश्वर में मुक्तात्मा के समान ही समाधि आदि अवस्थाओं की उत्पत्ति संभव नहीं है । अब यदि यह माना जाय कि नित्य और अनित्य बुद्धिविशेष की अपेक्षा के बिना ही सामान्य बुद्धि से ईश्वर में बुद्धिमत्व माना जायगा, तो यह भी सारहीन बात है, क्योंकि बुद्धि में नित्यता रूप वैशिष्ट्य की संभावना ही नहीं है, वह तो सदा अनित्य ही रहती है । fit प्रकार में बुद्धिमत्व मान भी लिया जाय तो शास्त्रों को प्रामाण्य और अामान्य व्यवस्था का लोप हो जायगा । उस अवस्था में सभी शास्त्रों को प्रमाण मानना ही पड़ेगा, क्योंकि ये सभी वर - प्रणीत हैं, जैसे कि वेदादि प्रसिद्ध शास्त्र ईश्वर के द्वारा प्रणीत हैं । ऐसा मानने पर प्रतिवादी शास्त्र कोई नहीं रह जायगा, क्योंकि सभी ईश्वर के आदेश का अनुसरण करते हैं । जो ईश्वर के आदेश का अनुसरण करते हैं, वे विपरीत आचरण कैसे कर सकते हैं? ऐसा मानने से संसार के हो लोप की आपत्ति भी उठेगी, क्योंकि

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१ ९ ६८ वेदार्थपारिजातः सर्वेषाम् । संसारविधाने प्रवृत्तोऽसौ तदभावं विदधातीति महती प्रेक्षापूर्वकारिता! ततो योगोपकल्पितस्येश्वरस्य जगज्जन-कत्वासम्भवान्नातः सर्वजतासिद्धिः । अत्र नैयायिकादयो नैतत्क्षमन्ते । तथाहि क्षित्यादिकार्यं तदुत्पत्तिप्रकार प्रयोजनाद्यभिज्ञकर्तृपूर्वक, कार्यत्वात्, घटादिवदिति सामान्यतोदृष्टमनुमानं प्रभवत्येव सर्वज्ञपरमेश्वरसाधने । ननु कार्यत्वमसिद्धमित्युक्तमिति चेन्न, सन्निवेशविशि-ट्रस्य कार्यत्वे बाधाभावात् । प्रागभावप्रतियोगित्वं कार्यत्वम् । पृथिव्यैकदेशस्य पर्वतादेः प्रागभावदर्शनेन पृथिव्यादेरपि प्राग-भावो निश्चेतुं शक्यते । अवस्थावत्त्वं विकारित्वञ्च कार्यत्वं सम्भवति । न चेश्वरे तदतिव्याप्तम्, कूटस्थस्य तस्य सर्वावस्था-सर्वविकारातीतत्वात् । न च कर्तृत्वमपि विकार एवेति वाच्यम्, नित्यज्ञानात्मसङ्कल्पमात्रेणैव तत्कर्तृत्वस्य प्रतिपादयिष्यमाण-त्वात् । अयस्कान्तादीनां निर्विकारत्वेऽपि लौहप्रवर्तकत्वादिदर्शनेन परमेश्वरेऽपि तथात्वकल्पने बाधाभावात् । विनश्वरत्वमपि कार्यत्वलक्षणम् । न च क्षित्यादौ तदसिद्धम्, तदेकदेशस्य विनाशदर्शनेन क्षित्यादीनामपि तदनुमानसम्भवात् । अपि च न चार्वाकः क्षित्यादीनां कार्यत्वासिद्धि वक्तुं शक्नोति । यो वेदरचनाया इतररचनाविलक्षणाया अपि कार्यत्वमुपगच्छति, स क्षित्यादीनां कार्यत्वं कथमपह्नोतुं शक्नोति । मीमांसकोऽपि नैवं वक्तुं शक्नोति यतः सोऽप्येवमाह् - ' येषामप्यनवगतोत्पत्तीनां रूपमुपलभ्यते तन्तुव्यतिषक्त-जनितोऽयं पदः, तद्वयतिसङ्गविमोचनात् तन्तुविनाशाद्वा निनङ्क्ष्यतीति कल्प्येत, एवमवयवसंयोग निर्वर्त्यमानवपुषः क्षिति-ईश्वर के व्यापार से पहले शरीर, इन्द्रिय आदि के अभाव में सभी बुद्धि आदि आत्मगुणों की भी सत्ता न रहने से सारा जगत् मुक्त हो माना जायगा | इस प्रकार संसार की रचना में प्रवृत्त हुआ ईश्वर उसके अभाव में हो कारण बनता है, यह ईश्वर की अच्छी बुद्धि-मत्ता प्रेक्षापूर्वकरिता सिद्ध हुई । इसलिये योगशास्त्र के द्वारा उपकल्पित ईश्वर जगत् का कारण नहीं सिद्ध हो सकता, फलतः उसमें सर्वशता भी सिद्ध न होगी । किन्तु उक्त प्रतिपादन से नैयायिक आदि दार्शनिक सहमत नहीं है । उनका कहना है कि पृथिवी नादि कार्य, उनकी उत्पत्ति के प्रकार, प्रयोजन बादि से अभिज्ञ कर्ता के द्वारा ही निष्पन्न हुआ है, क्योंकि यह भी घटादि के सम्मान ही कार्य है ' यह सामान्यतोदृष्ट अनुमान सर्वज्ञ परमेश्वर की सिद्धि में समर्थ है । पहले यह जो कहा गया है कि ' कार्यत्व हेतु मसिद्ध है ', वह इसलिये गलत है कि संनिवेशविशिष्ट की कार्यता में कोई बाधक हेतु नहीं है । प्रागभाव का प्रतियोगी कार्य कहलाता है । प्रविधी के एकदेश पर्वतादि के प्रागभाव को देखकर पृथिव्यादि के प्रागभाव का भी निश्चय किया जा सकता है | अवयव और विकारवकार्य में रहते हैं । कार्य के ये लक्षण ईश्वर में नहीं है, क्योंकि ईश्वर तो कूटस्थ है, वह सभी व q स्थानों और विकारों से अतीत है । कर्तृत्व को भी विकार नहीं माना जा सकता, क्योंकि नित्यज्ञानात्मक संकल्पमात्र से ईश्वर की कर्तृता का प्रतिपादन किया जाने वाला है । लौह के आकर्षण करने में अयस्कान्त ( चुम्बक ) मणि में जैसे कोई विकार नहीं होता, उसी तरह से परमेश्वर में भी कर्तृत्व anure के रहते भी क्यों कोई विकार होगा? विनश्वरता भी कार्य का लक्षण है । यह लक्षण क्षित्यादि में असिद्ध नहीं है, क्योंकि ( भूकम्प आदि से ) क्षित्यादि के एक देश के विनाश को देखकर पूरी पृथ्वी के दिनाश का भी अनुमान किया जा सकता है । दूसरी बात यह भी है कि चार्वाक प्रभृति चानिक यह नहीं सिद्ध कर सकते कि क्षित्यादि में कार्यता की सिद्धि feat प्रकार से नहीं हो सकती । जन्य रचनाओं से विलक्षण वेद की रचना को जब वह कार्य मानता है, तो वह शित्यादि को कार्य मानने से कैसे कर सकता है? arties भी इस बात को सिद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि उनका कहना है कि क्षित्यादि की उत्पत्ति यद्यपि अवगत नहीं है, तो भी उनके स्वरूप की अवगति हमको है ही । इस परिस्थिति में यह पद तन्तुओं के ताने - बाने से बना है, इस ताने - बाने को तोड़ देने से अथवा तन्तु के विनाश से जैसे पद का विनाश हो जाता है, उसी तरह से अवयवसंयोग के अलग होने पर क्षित्यादि के

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वेदार्थपारिजातः १६६ धरादेरपि नाशसंप्रत्ययः सम्भवत्येव । दृश्यते च क्वचिद्विनाशप्रतीतिः । प्रावृषेण्यजलधारासारनिलुंठित एव पर्वतैकदेशे पर्वत-खण्ड: पतित इति । वस्तुगतयोश्च कार्यत्वविनाशित्वयोः समव्याप्तिकता वार्त्तिककृताऽप्युक्तव-तेन यत्राप्युभौ धर्मों व्याप्यव्यापकसम्मतो । तत्रापि व्याप्यतैव स्थावङ्गं न व्यापिता मितौ ॥ ' ( श्लो ० वा ० अनु ० ९ ) तस्माद्विनाशित्वेनापि कार्यत्वानुमानात्तन्मतेऽपि न कार्यत्वमसिद्धम् । नापि बौद्धस्तदसिद्धि वक्तुं शक्नोति यतस्तन्मते नित्यो नाम पदार्थः प्रणयकेलिष्वपि न विषह्यते । नाप्यार्हत-स्तन्मतेऽपि कूटस्थनित्यतानभ्युपगमात् । अत एव स आत्मनोऽपि परिणामित्वमभ्युपैति । परिणामिनित्यत्वस्य कार्यत्वाविरो-धात् सन्निवेशविशिष्टत्वस्य प्रत्यक्षेणोपलभ्यमानत्वान्न रात्र विप्रतिपत्तिः । यदुक्तं कादाचित्कं वस्तु लोके कार्यत्वेन प्रसिद्धमित्यादि, तदपि न सङ्गतम्, जगदेकदेशस्य सृष्टिप्रलयादिदर्शनेन जगतोऽपि तदनुमानेन तस्यापि कादाचित्कत्वानपायात् । महेश्वरान्तर्गतवुद्धचादीनां कार्यत्वेन महेश्वरस्य कार्यत्वानुमानं तु दूरापास्तम्, तद्बुद्ध्यादीनामपि नित्यत्वाभ्युपगमात् । न च पाकजरूपादीनां परमाण्वेकदेशत्वम्, परमाणूनां प्रदेशदत्त्वान-भ्युपगमात् । ईश्वरसिद्धौ नैयायिकादिरीत्याऽनुमानानि वीश्वरे न बहिः प्रत्यक्ष प्रमाणम्, तस्य रूपादिशून्यत्वेनातीन्द्रियत्वात् । न वान्तरं प्रत्यक्षम्, मनसो बहिरस्वात-न्त्र्यात् । न चेश्वरस्थात्मत्वान्मनसा स्वात्मप्रत्यक्षवदेव तात्यक्षं भवत्विति वाच्यम्, आत्ममानसप्रत्यक्षं प्रति परात्मकवृत्ति-श्री विनाश का अनुमान हम कर हो सकते है । इस विनाश की प्रतीति कभी कभी हमको होती भी है । वर्षा की बाढ़ के थपेड़ों से पर्वत के किसी एक देश के टुक्क पड़ने पर कहा जाता है कि यह पवत चण्ड लुक पड़ा । यह बात वार्तिककार में भी स्वीकार की ह कि सभी वस्तुओं में नार्यत्व और विनाशित्व समान रूप से रहते है-- " इसलिये जहाँ पर दानों धर्म व्याप्य वीर व्यापक रूप में अंगीकृत है, वहाँ पर भी अंत्र की व्याप्यता हो सिद्ध होगी, अनुतिित की व्यापकता नहीं । इस प्रकार विनाशित्व हेतु से भी फार्यस्य का अनुमान हो सकता है, अतः भोसांक के कक्ष में भी अर्थव प्रसिद्ध नहीं ह बौद्ध भी डायल को बद्धि नहीं कह वक्ता, या सकता । जन सो कार्यल की असिद्ध नहीं काम आत्मा की भी परिणामी नावते । पानी कार्य प्रत्यक्ष सिद्ध है, अतः यहाँ यह कहा गया है किन्तु यह अत की ठीक नई के भी सृष्टि और न गयाकि उनक मरु में तो प्रणय - केकि में भी कोई नित्य पदार्थ यही सहन किया को कूटस्थता को स्वीकार करते ही नहीं । इसीलिये जैन दार्शनिक फाल से कोई रोग नहीं है और फित्यादि का सनिदेश, arre संस्थान में स्थापित हो सकती है । मेचित् प्रोिती है, उसी दस्तु की आर्यता मानी जाती है इत्यादि । एक में सृउि, प्रख्यादि की सब प्रति होती है तो उसी अनुमान से जमत् के श्रीवि । व्हावर में रहने वाली वुद्धि की कार्यता के ही जसे नाद कारण महेकार को कार्यता की सुपान कर मान्य है । गाफष रूप आदि की पराणुगत नहीं करते | बहुत दूर की यारा है, चोफ महेश्वर के बुद्धि आदि गुणों की मी नित्यता हो एकदेशा भी मान्य नहीं है, क्योंकि परमाणुओं की प्रदेशपता को हम स्वीफार ईश्वर की सिद्धि में नैयायिकों के अनुमान fter ferrer का बारम्भ इस प्रकार होता है कि ईश्वर में ' बाह्य अर्थात् इन्द्रियों के प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर रूप आदि से रहित होने के कारण वतीन्द्रिय है । उसमें आन्तर प्रत्यक्ष भी प्रमाण नहीं हो सकता, अर्थात् मन से भी ईश्वर का १ २२ रूपवान् वस्तु का ज्ञान ही नेत्रों से हो सकता है । स्पर्धा अथवा स्पर्शवान् वस्तु का ज्ञान स्वगिन्द्रिय से हो सकता है । रस और रसवान् वस्तु का ज्ञान रसनेन्द्रिय से हो सकता है | गन्ध का ज्ञान ही नासिका से हो सकता है । शब्द का

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वेदार्थपारिजातः १६ ९ धरादेरपि नाशसंप्रत्ययः सम्भवत्येव । दृश्यते च क्वचिद्विनाशप्रतीतिः । प्रावृषेण्यजलधारासारनिर्लुठित एवं पर्वतैकदेशे पर्वत खण्ड: पतित इति । वस्तुगतयोश्च कार्यत्वविनाशित्वयोः समव्याप्तिकता वात्तिककृताऽप्युक्तैव-तेन यत्राप्युभौ धर्मो व्याप्यव्यापकसम्मतौ । तत्रापि व्याप्यतैव स्यादङ्गं न व्यापिता मितौ ॥ ' ( श्लो ० वा ० अनु ० ९ ) तस्माद्विनाशित्वेनापि कार्यत्वानुमानात्तन्मतेऽपि न कार्यत्वमसिद्धम् । नापि बोद्धस्तदसिद्धि वक्तुं शक्नोति यतस्तन्मते नित्यो नाम पदार्थ: प्रणयकेलिष्वपि न विषह्यते । नाप्यार्हत-स्तन्मतेऽपि, कूटस्थनित्यतानभ्युपगमात् । अत एव स आत्मनोऽपि परिणामित्वमभ्युपैति । परिणामिनित्यत्वस्य कार्यत्वाविरो-धात् सन्निवेशविशिष्टत्वस्य प्रत्यक्षेणोपलभ्यमानत्वान्न तत्र विप्रतिपत्तिः । यदुक्तं कादाचित्कं वस्तु लोके कार्यत्वेन प्रसिद्धमित्यादि, तदपि न सङ्गतम्, जगदेकदेशस्य सृष्टिप्रलयादिदर्शनेन जगतोऽपि तदनुमानेन तस्यापि कादाचित्कत्यानपायात् । महेश्वरान्तर्गतबुद्धयादीनां कार्यत्वेन महेश्वरस्य कार्यत्वानुमानं तु दूरापास्तम्, तद्वृद्ध्यादीनामपि नित्यत्वाभ्युपगमात् । न च पाकजरूपादीनां परमाण्वेकदेशत्वम् परमाणूनां प्रदेशदत्त्वान -भ्युपगमात् । ईश्वर सिद्धी नैयायिकादिरीत्यानुसानानि वीश्वरे न बहिः प्रत्यक्षं प्रमाणम्, तस्य रूपादिशून्यत्वेनातीन्द्रियत्वात् । न वान्तरं प्रत्यक्षम्, मनसो बहिरस्वात-त्र्यात् । न चेश्वरस्थात्मत्वान्मनसा स्वात्मप्रत्यक्षवदेव तत्प्रत्यक्षं भवत्विति वाच्यम्, आत्ममानसप्रत्यक्षं प्रति परात्मकवृत्ति -भी विनाश का अनुमान हम कर हो सकते हैं । इस विनाश की प्रतीति कभी कभी हमी होती भी है । वर्षा की बाढ़ के थपेड़ों से पर्वत के किसी एक देश के लुढक पड़ने पर कहा जाता है कि यह पवत खण्ड लुढक्ष पड़ा । यह बात वार्तिककार में भी स्वीकार की है कि सभी वस्तुओं में कार्य और विनाशित्व समान रूप से रहते है- " इसलिये जहां पर दानों धर्मं व्याप्य और व्यापक रूप में अंगीकृत है, वहीं पर की अंग की व्याप्या हो समिति की आक्कत नहीं । इस प्रकार विनाशित्व हेतु से भी कार्यत्य का सकता है अतः भीमा केस में भी जान सिद्ध नहीं है । अनुमान बौद्ध भी पायल को बडि नहीं कह सकता, क्यशि उनके मत में सो प्रणय - केलि में भी कोई नित्य पदार्थ यही सहन किया या सफता । प्रेम भी कार्य को याद नहीं कक्षा को लोफार करते ही नहीं । इसीलिये जेव दार्शनिक बाला को भी परिणामी जानते है । परसों से कोई रोक नहीं है और जित्यादि का संविदे, वनयन संस्थाम प्रत्यक्ष सिद्ध है, अतः यहाँ पर झाको कार्यक्षम में गया विपांच हसती है? यह कहा गया है कि हमें लिखकचित् असि छोती है, उसी स्तु की भर्यता मानी जाती है ' इत्यादि । में सृष्टि, मष वादि की पक्ष प्रति होती है तो उहाँ अनुमान से जगत् के किन्तु यह एस भी ठीक नह के क्योकि तुम भी सृष्टि और वन के विद्धही से बाद में भी प्रमोचित शिक्षकनहर में न बाकी दुद्धिको कार्यता के कारण महेश्वर का कार्य चनुमान मापा बहुत दूर की बात है, क्योंकि महेश्वर के बुद्धिसाद गुणों को को नियता ही मान्य है । गाफज दर वादि की परमाणुगत एकता भी मान्य नहीं है, क्योंकि परमाणुओं को प्रदेशवा को हष स्वीफार नहीं करते । ईश्वर की सिद्धि में नैयायिकों के अनुमान free for पूर्वपक्ष का आरम्भ इस प्रकार होता है कि ईश्वर में ' बाह्य अर्थात् इन्द्रियों के प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर रूप आदि से रहित होने के कारण अतीन्द्रिय है । उसमें आन्तर प्रत्यक्ष भी प्रमाण नहीं हो सकता, अर्थात् मन से भी ईश्वर का रूपवान् वस्तु का ज्ञान ही नेत्रों से हो सकता है । स्पर्श अथवा स्पर्शवान् वस्तु का शान स्वगिन्द्रिय से हो सकता है । रस और रसवान् वस्तु का ज्ञान रसनेन्द्रिय से हो सकता है । अन्य का ज्ञान हो नासिका से हो सकता है । शब्द का २२