वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 311–320

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 311 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेद te पारिजात २८१ लोकेऽपि विद्यमानस्यैव पितापुत्रादिसम्बन्धस्योपदेशेन ज्ञान भवत्येव । नहि निरङ्कुशोत्प्रेक्षामन्तरेणानाश्वासकारण किचिल्लभ्यते-उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधकम् । स सवव्यवहारेषु सशयात्मा क्षय व्रजेत् ॥ यदि सम्प्रदायाविच्छेदावगत वेदतव्याख्यानमिति पक्षे व्याख्यानस्य शब्दात्मकत्वे तुल्य पय्यनुयोगस्तदा पौरुषेयेऽप्यागमे तादवस्थ्य दुर्वारमित्युक्तमेव । यदुक्त पुरुषो हि स्वय समिताना शब्दानामर्थं शृङ्खग्राहिकयाऽपि तावद् बुध बोधयतीत्यस्ति पौरुषेयाणामर्थाव-गतावुपाय, अपौरुषेयस्तु शब्दो नैव करोति, न चास्य कश्चित् कचित् सम्बन्धनियम ज्ञातुमीश इत्यप्रतिपत्तिरेव तदर्थस्येति, तदपि चतिचर्वणमेव तत्राप्युपदेशस्य शब्दात्मकत्वे दोषस्य तादवस्थ्यात् । कस्यचित्तथा बोधनेऽपि सवत्र तदसभवेन लोक-व्यवहारादेव शब्दार्थावगमस्य सुस्थत्वात् । यदप्युक्तम् -- वेदस्तद्व्याख्यान वा पुरुषेणोपदिश्यमानमनष्टसम्प्रदायमेवानुवर्तत इत्यत्रापि समय शरणम्, आगम-शकारिणामाहोपुरुषिकया तत्तद्दर्शनविद्वेषेण वा तत्प्रतिपन्नखलीकरणाय धूर्तव्यसनेनान्यतो वा कुतश्चित् कारणादन्यथा रचनासभवात् । श्रूयते साख्यनाशक माधवेन साख्यसिद्धान्तस्यान्यथा रचन कृतम् महायानविद्विष्टाना महायानप्रतिरूपक सूत्रान्तररचन तत्प्रतिपन्नखलीकरणायेति । तदप्यकिञ्चित्करम्, ' उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधकम् । स सर्वव्यवहारेषु सशयात्मा क्षय व्रजेत् ॥ ' इत्यादिना दत्तोत्तरत्वात् । लोक मै भी पिता - पुत्र आदि के पहले से विद्यमान सम्बन्ध की प्रतीति किसी के कहने से होती है । निरकुरा कल्पना के सिवाय और कोई कारण अविश्वास का नहीं दिखाई पडता । ' जो व्यक्ति मोहवश जबरदस्ती सब जगह बाधक की कल्पना करने लगता है, अपने सशयालु स्वभाव के कारण ही वह सभी व्यवहारो में असफल हो जाता है ' । यदि आप कहे कि सम्प्रदाय की अविच्छिन्नता के आधार पर वेद और उसके व्याख्यान की अवगति होती है, ऐसा मानने पर व्याख्यान भी शब्दात्मक है, अतः यही समस्या समान रूप से वहाँ भी उपस्थित होती है, तो इसका उत्तर यह है कि पौरुषेय आगम मे भी इस आक्षेप की प्रवृत्ति अनिवार्य रूप से उपस्थित होगी । इसका उत्तर दिया जाता है कि पुरुष अपने द्वारा प्रयुक्त प्रत्येक शब्द का अर्थ समझदार व्यक्ति को उसी तरह से समक्षा देगा, जैसे कि हर एक पाय का सीग पकड कर उसका नाम बताया जाता है । इस तरह से पौरुषेय शब्दों का अर्थ समझने के लिये तो उपाय है, किन्तु अपौरुषेय शब्द में यह बात नहीं है । कोई भी व्यक्ति किसी भी अपौरुषेय शब्द का किसी नियत अथ के साथ सम्बन्ध है, ऐसा जानने में समय नहीं हैं, ra इसके अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकेगा । यह उत्तर भी चति चर्वेण मात्र है, क्योकि पौरुषेय वाक्यों में भी उपदेश शब्द के सहारे ही होगा, अत वहाँ पर भी यह दोष विद्यमान ही रहेगा । किसी एक व्यक्ति को ग ग्राहिया समझाया भी जा सकता है, किन्तु सभी के लिये ऐसा कर पाना कठिन है, अतः सर्वत्र लोक व्यवहार से ही शब्दाथ का ज्ञान होता है, यही मानना उचित है । पुन कहा जाता है कि ' वेद और वेद व्याख्यात गुरुपरम्परा से उपदिश्यमान होकर अविच्छिन्न परम्परा को चालू रखता है, इस बात की सिद्धि भी समय ( सकेत ) के सहारे ही हो सकती है । शास्त्रों को नष्ट कर देने मे अभिनिवेश पूर्वक लगे हुए व्यक्तियो के द्वारा अथवा किसी एक दर्शन से द्वेष के कारण उसके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों की हंसी उड़ाने के लिये, धूतता के कारण अथवा किसी अन्य कारण से भी व्यक्ति अन्यथा शास्त्रो की रचना कर सकता है । यह सुना जाता है कि साख्य दशन को नष्ट कर देने पर तुले fe area are fear न् ने साख्य सिद्धान्तो को ही उलट - पलट दिया । महायान सप्रदाय से द्वेष रखने वाले लोगो ने महायान सूत्रों का अनुकरण करने वाले अन्य सूत्र ग्रन्थों की रचना कर दी, इसीलिये कि उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को मलिन कर दिया जाय यह सब see it aff चत्कर है । इसका उत्तर ' उत्प्रेक्षेत ' इत्यादि श्लोक के आधार पर अभी अभी दिया जा चुका है । ३६

पृष्ठ 312

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 312 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८२ date पारिजात दुक्त पुरुषो रागादिभिरुपप्लुतोऽनृतमपि ब्रूयादिति नास्य वचन प्रमाणम्, तदिहापि किन्न प्रत्यवेक्ष्यते । स एवो-पदिशनुपप्लवाद वेद वेदार्थं वाऽन्यथाप्युपदिदेश । श्रूयन्ते हि कैश्चित्पुरुषैरुत्सन्नोद्धृतानि शाखान्तराणि इदानीमपि कानि-चिद् विरलाध्येतृकाणि । ते स्वल्पाध्येतारी न समारोप्योपदिशन्ति इत्यत्र किं प्रमाणम्? तद्वत् प्रचुराध्येतृकाणामपि कस्मिंश्चित् काले कथञ्चित् सहारसभवात्, पुन सभावितपुरुषप्रत्ययात् प्रचुरपोषणसभवाञ्च । तेषाञ्च पुन प्रचारयितॄणा पुरुषाणा कदा-चिदधीतविस्मृताध्ययनानाम् अन्येषा सभावनाभ्रशमयादिनाऽन्यथोपदेशसभवात् तत्प्रत्ययाच्च तद्भक्तानामविचारेण प्रति-पत्ते । बहुष्वप्यध्येतृषु सभावितात् पुरुषाद् बहुल प्रतिपत्तिदर्शनात्, ततोऽपि कथञ्चिद्विप्रलम्भसभवात् । किञ्च, परिमित-व्याख्यातृपुरुषपरम्परा श्रूयते । तत्र कश्चिद् विद्विष्टाज्ञधूर्तानामन्यतम स्यादित्यनाश्वास । तदेतदपि निराधारमेव दोषकल्प नम्, दोषप्रवणचित्तत्वात् । तदुक्तम्-न चात्रातीव कर्तव्य दोषदृष्टिपर मन । दोषो ह्यविद्यमानोऽपि तच्चिताना प्रकाशते || ( मी ० लो ० वा ०, जिज्ञासासूत्र -४ ) चित्तसत्त्व सर्वार्थावभासनशील तम समावृतत्वात्तु परिमित प्रकाशते, जन्मजन्मान्तरेषु धर्मानुष्ठानात्तु प्रकाशा-वरण क्षीयते । ततो ज्ञानापेक्षया ज्ञेयतत्त्वान्येवाल्पानि भवन्ति । धर्मज्ञान चापास्तसमस्तपुदोषेभ्योऽपौरुषेयवेदवाक्येभ्य एव सम्पद्यते, नान्यथाऽन्योन्याश्रयत्वात् । धर्मानुष्ठानेन सार्वश्यम्, सार्वश्येन च धमज्ञानम् । मूलाभावेन पूर्वपूर्वसर्वज्ञोपदिष्ट-कहा जाता है कि ' पुरुष राग द्वेष आदि से भरा हुआ है, वह झूठ भी बोल सकता है, अत: उसका वचन प्रामाणिक नही माना जा सकता । यही बात वेद के उपदेश के विषय में भी क्यो नही हो सकती? वह गुरु ही उपदेश करते समय किमी भी कारण से वेद और वेदार्थ का भी अन्यथा उपदेश कर सकता है । यह सुना जाता है कि किन्ही महानुभावो ने उत्सन्न शाखाओ का पुन उद्धार किया । आज कल भी देखा जाता है कि कुछ शाखाओ का अध्ययन विरल हो गया है । इस तरह की शाखाओ के अध्येतागण कुछ अपनी बात जोकर इनका उपदेश नही करते, इसमे क्या प्रमाण है जिन शाखाओं के अध्येता आजकल प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, किसी समय हो सकता है उनका भी प्रचार लुप्त हो गया हो, क्योंकि यह सभावना की जा सकती है कि किसी प्रख्यात पुरुष की विश्वस्तता के आधार पर उनकी बाद मे पर्याप्त मात्रा मे रक्षा की गई हो । इन शाखाओं के पुन प्रचारक पुरुषो को कदाचित् अधोन विषय का free रण हो गया हो और उन विनष्ट अशो का वे मनमाना उपवेश करके वचना मी कर सकते हो, इस सभावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता | उस व्यक्ति पर विश्वास के कारण ही उसके भक्तगण उम विषय पर बिना विचार किये ही उसको स्वीकार कर सकते हैं । किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के पास जब बहुत से अध्येता हो जाते हैं, तब उनकी योग्यता के अनुसार भी उनमे प्रतिपत्ति का भेद हो जाता है । इससे भी किसी प्रकार सही परम्परा का विच्छेद और वचना की सभावना हो सकती है । वेदार्थ के नाख्यातानों की परम्परा अत्यन्त परिमित सुनी जाती है । इनमें से कोई द्वेषग्रस्त, अज्ञ अथवा घूर्त नहीं होगा, इस पर कैसे विश्वास किया जा सकता है । ' यह सारी दोष कल्पना अत्यन्त निराधार है, यह सब कहने वाले का चित्त केवल दोष को देखने में ही लग गया है । इसीलिये भट्ट कुमारिल ने कहा है कि-व्यक्ति को अपने मन को दोषों को देखने में ही ज्यादा नही लगा देना चाहिये, क्योंकि जब व्यक्ति का मन दूसरे के दोषों को खोजने में लग जाता है, तो उसको जो दोष वहाँ नहीं है, उनका भी प्रतिभास होने लगता है । " सत्त्वगुणविशिष्ट वित्त सभी अर्थों को प्रकाशित करने में समर्थ है । जब यह समोगुण से समावृत हो जाता है तो परिमित वस्तु काही प्रकाश कर सकता है । जन्म - जन्मातरो के धार्मिक अनुष्ठानो से चित्त के इस तमोगुणरूपी भावरण का नाश हो जाता है । उस समय ऐसे योगी के सामने ज्ञान की अपेक्षा ज्ञेय तत्वों को ही कमी रहती है । इस धर्म का ज्ञान समस्त पुरुष दोषों से रहित, अपौरूषेम वेदवाक्यों से ही हो सकता है । अन्यथा अन्योन्याश्रय दोष आवेगा कि धर्म के अनुष्ठान से सर्वज्ञता होगी और सर्वज्ञता के आधार पर धर्म का ज्ञान होगा । मूल के अभाव में पूर्व पूर्व सर्वज्ञ के द्वारा उपदिष्ट धर्म के अनुष्ठान से उत्तरोतर व्यक्ति में सर्वज्ञता मानने में भी अवस्था दोष होगा | बीजाङ्कुरन्याय से इस अनवस्था को व्यवस्थित नहीं किया जा सकता, क्योकि बीजाङ्कुर स्थल में तो उनका कार्यकारण-

पृष्ठ 313

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 313 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वैदाथपारिजात २८३ धर्मानुष्ठानेनोत्तरोत्तरसावज्ञमित्यप्यनवस्यैव । न च बीजाङ्कुरादाविव व्यवस्था, तत्र कार्यकारणभावस्य दृष्टत्वात् । प्रकृते तु एकोऽपि सर्वज्ञो न क्वापि दृश्यते, अपरिमितसवज्ञकथा तु दूरोत्सारिता । वशिष्ठमनुव्यासादिभि सर्वज्ञैर्वेदस्य चेश्वरात्मत्वमनादित्वञ्चोच्यते, ' वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरय, ( श्री ० भा ० म ० पु ० ९९ | ३ | ४३ ), ' वेदो नारायण साक्षात् ' ( श्री ० भा ० भ ० ६ | १ | ४० ), ' अनादिनिधना नित्या बागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ' ( भ ० मा ० शा ० प ० २१०।१ ९ ) इत्यादिवचनेभ्योऽनाद्यविच्छिन्न पारम्पर्येण प्राप्तस्य वेदस्य देवैर्ऋषिभिश्च रक्षण क्रियते । सर्वेश्वरेणापि वेदतत्सम्प्रदायस्य रक्षणार्थं विष्णुशिवरामकृष्णादिरूपेणावतीय्यते-यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मान सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

( श्री ० भ ० गी ० ४।७-८ ) इति भगवदुक्ते । तदेवमनेकेषूपायेषु वेदतत्सम्प्रदायरक्षणार्थं जीवत्सु सम्प्रदायनाशकल्पन निर्मूलमेव । जनसाधारणेष्वेव कदा-चिदुच्छिन्नाध्येतृकाणि विरलाध्येतृकाणि वा भवन्ति शाखान्तराणि, देवेषु महर्षिषु प्रजापतिषु अन्तत परमेश्वरे तत्सम्प्रदाया-विच्छेदस्य सवदेव विद्यमानत्वात् । अत एव तपश्चर्यया याज्ञवल्क्येनादित्यात् शुक्लयजू षि लब्धानीति वायुपुराणादौ प्रसिद्धम् । किच, एव साम्प्रदायिके शिष्टैर्ऋषिभिर्देवैरीश्वरेण च तद्रक्षणजागरूकै सुरक्षितस्यापि वेदस्य यदि सम्प्रदाय-विच्छेदशङ्कापिशाची लब्धप्रसरा, तथा बौद्धार्हतादिग्रन्थाना स्वरूपरक्षण कथ सभाव्यते । लङ्कावतारचचितस्य बुद्धस्य, गौतमबुद्धस्य, जिनस्य त एवोपदेशा अन्ये वा? द्विष्टैरन्यथा वा कृता? अद्यत्वे तद्व्याख्यानान्यन्यथा वा न क्रियन्त इत्यत्र कि प्रमाणम्? तस्माद् वेदतदर्थाध्ययनतदर्थानुष्ठाने बद्धश्रद्धावता मनुष्यदेवर्षि-वराणा परमेश्वरस्य च जागरूकत्वान्मुधा तद्विच्छेदाशङ्का । भाव परिदृष्ट है । प्रकृत स्थल में तो हमको एक भी सर्वज्ञ नही दिखाई पड़ता, अपरिमित सवज्ञो को मानने की बात तो बहुत दूर की है । वसिष्ठ, मनु, व्यास प्रभृति सवश ऋषिगण वेद को ईश्वरस्वरूप और अनादि मानते हैं । ' वेद ईश्वरस्वरूप है, अत एव इसको ठीक तरह से समझ पाने में विद्वान लोग भी गलती कर जाते हैं ', ' वेव साक्षात् नारायणस्वरूप हैं, ' अनादि, अनवर, नित्य यह स्वयम्भू द्वारा उच्चरित वाणी ही वेद है ' इत्यादि वचनों से यह ज्ञात होता है कि अनादि, अविच्छिन्न परम्परा से प्राप्त वेदो को रक्षा देवता एवं ऋषिगण करते हैं । सर्वेश्वर भी वेद और उसके सप्रदाय की रक्षा के लिये विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि के रूप मे अवतार ग्रहण करते हैं । गीता में भगवान् ने कहा है कि - ' जब जब धस की हानि और अधम का अभ्युत्थान होता है, तब मैं अवतार ग्रहण करता हूँ । मैं सज्जनो की रक्षा के लिये, दुष्ट जनो के विनाश के लिये और धर्म की स्थापना करने के लिये प्रत्येक युग में अवतरित होता हूँ । " इस तरह से वेद और उसके संप्रदाय की रक्षा के लिये अनेक उपाय हैं, इस परिस्थिति मे सप्रदाय के नष्ट हो जाने की कल्पना सर्वथा निर्मूल है । जन साधारण मे ही किसी समय किसी शाखा के अध्येताओं का सर्वथा उच्छेद अथवा उनकी विरलता होती है । देवगण, महर्षिगण, प्रजापति और अन्तत परमेश्वर में इस वैदिक संप्रदाय की अविच्छिन्नता सदा विद्यमान रहती है । इसीलिये वायु पुराण आदि ये यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्य ने तपस्या करके बादित्य ( सूर्य ) से शुक्ल यजुर्वेद को प्राप्त किया था । इस तरह से साम्प्रदायिक शिष्टजन, ऋषिगण, देवगण और स्वयं ईश्वर के भी वेद की रक्षा के लिये जागरूक रहने पर भी यदि सम्प्रदाय के विच्छेद होने की शंका रूपी पिशाची को अवसर आप देते हैं, तो बौद्ध, जैन आदि सप्रदायों के ग्रन्थो की स्वरूप - रक्षा की बात ही कैसे मानी जा सकती है? antare afra द्ध, गौतम बुद्ध और जिन के वे ही उपदेश हैं या उनसे मित्र? अथवा विद्वेषियो ने उनको विकृत कर दिया है? area ar की व्याख्या अन्यथा नहीं की जाती, इसमें क्या प्रमाण है? इस लिये वेद और वेदार्थ के अध्ययन और अनुष्ठान मे श्रद्धावान् मनुष्य, देव और ऋषिश्रेष्ठ के और परमेश्वर के भी जागरूक रहते हुए उनके विच्छेद की आशका करना व्यर्थ है ।

पृष्ठ 314

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 314 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

III पौरुषेयापीरुषेयेषु सर्वेष्वेव वाक्येषु प्रसिद्धिमनुसृत्यवार्थनिर्धारणमित्युत्सर्गं । क्वचित्तु श्रुत्यादिवलाद-प्रसिद्धार्थस्यापि ग्रहण भवत्येव । विष भुङ्क्ष्वेति लौकिके वाक्येऽपि तात्पर्यविरोधेन प्रसिद्धाथपरित्याग क्रियते । ' ऐन्द्रथा गाहपत्यमुपतिष्ठते ' ( म ० स ० ३१२१४ ) इत्यत्रापि इन्द्रपरस्यापि मन्त्रस्य गाहपत्यपरत्वमिष्यते । यदुक्तम् - स्वर्गोवश्यादिशब्दाना रूढार्थवाचकाना प्रसिद्धार्थमुत्सृज्य मोमासकोऽप्यन्यथैवार्थं करोति । मनुष्यातिशायि पुरुषनिकेतोऽतिमानव सुखाधिष्ठानो नानोपकरण स्वर्ग, तन्निवासिन्यप्सरा उवशीति लोकप्रवाद | तमनादृत्य मनुष्येष्वेव निरतिशया प्रीति स्वर्ग, उर्वशी चारणि पात्रो वेत्याद्यर्थं क्रियते । पुन कथमग्निहोत्रादि-शब्दान्तरेष्वर्थनिर्णये प्रसिद्धि प्रमाणयेत् । तदप्ययुक्तम्, प्रसिद्धार्थग्रहणे प्रमाणविरोधेऽन्यार्थ ग्रहणस्यौचित्यात् । यदुक्तमतीन्द्रिये स्वर्गादौ प्रत्यक्षानुमानप्रवृत्त्यभावेन विरोधासिद्धि, अग्निहोत्रादिशब्दान्तरेऽप्यविरोधस्य दुरन्वय, अग्निहोत्रात् स्वर्गावाप्तिरपि विरुद्धैव । विरोधाविरोधी च बाधकसाधकप्रमाणवृत्ती । तो चात्यक्षे नाभिमते । तत्कथ तद्वशात् प्रतीतिरिति • तदपि तुच्छम । स्वर्गीर्वेश्यादिशब्दाना यथाप्रसिद्धार्थकत्वेऽपि वह्निशब्दस्य योषिदादा-विद्यार्थान्तरे गौण्या वृत्त्या प्रयोगे बाधाभावात । विरोधाविरोधयो साधकबाधकप्रमाणवृत्तित्वेऽपि न प्रत्यक्षानुमानमात्र-वृत्तित्वम, आगमस्यापि प्रमाणत्वाविशेषात | अत एवाग्निहोत्रस्वर्गावाप्त्यो कार्यकारणभावस्य प्रत्यक्षानुमाना-गम्यत्वेऽपि निरुक्तवचनगम्यत्वेनाविरुद्धत्वात् । पौ e पेय और अपौरुषेय सभी वाक्यों में प्रसिद्धि का अनुसरण करके ही अर्थ का निर्धारण सामान्य किया जाता है । ही कही श्रुति आदि के प्रमाण से अप्रसिद्ध अर्थ का ग्रहण भी होता है । ' विष खाओ ' इस लौकिक वाक्य में वात्पर्य का विरोध होने से प्रसिद्ध अथ का परित्याग किया जाता है । इसी तरह से ' ऐन्द्रधा गाह ० ' यहाँ पर इन्द्रपरक मन्त्र को गार्हपत्य अग्नि को स्तुति में विनियुक्त माना जाता है । कहा जाता है कि स्वर्ग, उर्वशी प्रभृति रूढार्थ वाचक शब्दो के प्रसिद्ध अर्थ को छोड कर मौमासक दूसरा ही अर्थ करते हैं । लोक में यह प्रसिद्ध हैं कि स्वर्ग लोकोत्तर पुरुषो ( देवताओ ) के निवास का स्थान है । यह अतिमानव सुख के उपकरणों से भरा हुआ है और उसमें निवास करने वाली अप्सरा वशी कहलाती है । इस प्रसिद्ध अर्थ का अनादर करके मौमासक बनका अर्थ करते हैं fa narrate में ान निरतिशय सुख को हो स्वर्ग कहते हैं और अरणि ही उर्वशी है, अथवा उर्वशी एक पात्र है । ऐसा प्रसिद्धार्थ के विपरीत अर्थ करने वाला मीमासक अग्निहोत्र प्रभृति अन्य शब्दों के लिये प्रसिद्धि को ही कैसे प्रमाण कह सकता है? किन्तु यह पूरा कथन अयुक्त है, क्योकि जब प्रसिद्ध अर्थ प्रमाण विरुद्ध पडता हो तो उसका दूसरा प्रमाणाविरुद्ध अर्थ ग्रहण किया जाय, यह उचित ही है । यह भी कहा गया है कि अतीन्द्रिय स्वर्गादि में प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति न होने से विरोध की सिद्धि नहीं होगी । अग्निहोत्र प्रभृति शब्दान्तरो में भी अविरोध का अन्य कठिन है । अग्निहोत्र से स्वर्ग की प्राप्ति भी विरुद्ध है । विरोध की बायक प्रमाण में और विरोध की साधक प्रमाण में वृत्ति रहती है । ये बाधक और साधक प्रमाण अतीन्द्रिय नही माने जा सकते | जब affron नही माने जा सकते तो उनसे अतीन्द्रिय विषय की प्रतीति कैसे होगी? यह कथन भी नि सार है, क्योंकि स्वर्ग, उर्वशी प्रभृति शब्दो के यद्यपि यथाप्रसिद्ध अब है, तो भी वह्नि शब्द जैसे गोणी वृति से योषित् ( स्त्री ) के अर्थ में प्रयुक्त होता है, उसी तरह से इनका भी गौणी वृत्ति से अर्थान्तर करने में कोई बाधा नहीं है । विरोध और अविरोध यद्यपि बाधक और सामक प्रमाणों में रहते हैं, किन्तु इनकी वृत्ति केवल प्रत्यक्ष और अनुमान में ही नही रहती, क्योकि आगम भी इन्हीं की तरह एक प्रमाण है । इसीलिये afrate और स्वर्गप्राप्ति का कार्यकारणभाव प्रत्यक्ष और अनुमान से यद्यपि सिद्ध नहीं होता, तो भी आगम वचन से सिद्ध है, अतः यहाँ पर कोई विरोध नहीं हैं ।

पृष्ठ 315

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 315 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वैवार्थपारिजात २८५ केवल स्वगवश्यादिशब्देषु प्रत्यक्षानुमानविरोधेनार्थान्तराश्रयत्वम्, किन्तु शब्दतात्पर्यानुरोधेनापि तत्त्वमस्यादी वाच्यार्थभागत्यागलक्षणश्रयणम् । अन्यत्र यथाप्रसिद्धार्थग्रहणमिष्टमेव । यथा ' अग्निर्वे योषा ' इत्यत्राग्नि-गता हुत्यधिकरणत्वस्याग्रहणेऽपि तदितरत्र प्रसिद्धग्रहणमपीष्टमेव । अपौरुषेय आगमस्तस्य प्रवादादर्थसिद्धिस्तत्र पुनविरोधचिन्तायामनाश्वास श्रागमे स्यात, इत्यपि यत्किञ्चित् विदितशाब्दस्यायस्य तथात्वेऽपि विरोधाभावात् । आनुपूर्व्या निर्माणे पुरुषस्य स्वातन्त्र्याभावेन वेदापौरुषेयत्वम् । शब्दार्थव्यवहारस्य लोकवेदयोरवंशेष्य त्विष्टमेव, पौरुषेयेष्वपि वाक्येषु तादृग्विरोधाविरोधविचारदर्शनात् । विष भुङ्क्ष्वेति पौरुषेयमेव वाक्यम् । तत्रापि प्रसिद्धार्थ-परित्यागेन लक्षणाश्रयणमिष्टमेव । तात्पर्य्यान्यथानुपपत्त्या लोकेऽपि लाक्षणिकस्यार्थस्य ग्रहणदर्शनेन ववचिदप्रसिद्धार्थ-ग्रहणेऽपि न सर्वत्र तथात्वप्रसङ्ग । यदुक्तम्- प्रदेशान्तरेषु तथार्थस्य वचनेऽपि तस्यार्थापरिज्ञानात् प्रदेशान्तरेषु विरुद्धाथकल्पनाया अनिवाय्यै-तेति दु सस्कारमूलकमथकल्पनमिति, तदपि न मन्ये तेनैव सस्कारेण चीनादिप्रदेशेषु बोद्धं श्वमासभक्षण क्रियते । अन्यथा को ह्यनुन्मत्तो ' अग्निहोत्र जुहुयात् ' इत्यस्य श्वमासभक्षणमित्यर्थं विजानीयात् । विशेषतस्तद्व्याख्याया प्रदेशान्तरे विद्यमानायामपि । लौकिकवैदिकशब्दयोरवंशेष्यमुक्तमेव । यदि हि क्वचिद्विदितार्थोऽपौरुषेय शब्दराशि स्यात, ततोऽ-यंप्रतीति स्यात् । ते तु बाहुल्येऽप्यन्धा सव इति यथेष्ट प्रणीयन्ते । तस्मात् ' शब्दान्तरेषु तादृक्षु तादृश्येवास्तु कल्पना ' ( प्र ० वा ० ३।३२२ ) इत्याद्युक्तिरप्यनाघ्रात शाब्दन्यायस्यैव शाभते । ' केवल स्वग, उवशी प्रभृति शब्दों में ही प्रत्यक्ष और अनुमान से विरोध होने से अर्थान्तर का आश्रय नही किया जाता, किन्तु शब्दो के तात्पर्य के अनुरोध से भी ' तत्वमसि ' प्रभूति वाक्यो में वाच्यार्थ के एक भाग का त्याग कर लक्षणा से अर्थ किया जाता है । सामान्य स्थलों में प्रसिद्धि के अनुसार ही अर्थग्रहण अभीष्ट है । जैसे कि योषित् ( स्त्री ) अग्नि है यहाँ पर अग्नि आहुति ht after णता का ग्रहण नही किया जाता । अन्यत्र प्रसिद्धि का ग्रहण भी अभीष्ट है । आगम अपौरुषेय है । परम्परा के अनुसार इसका अथ किया जाता है । यहाँ पर यदि विरोध की उद्भावना की जाय तो आगम में किसी का विश्वास नही रह जायगा ", किन्तु यह पूरा कथन निसार है । शाब्द बोध व्यवस्था के जानकार व्यक्ति के लिये ऐसे स्थलों में कोई विरोध की प्रतीति नहीं होती । वेद की आनुपूर्वी के निर्माण में पुरुष स्वतन्त्र नही है, इस लिये वेद को अपौरुषेय कहा जाता है । यह तो माना ही जाता है कि लोक और वेद में शब्द और अथ का व्यवहार एक सा है । पोरुषेय वाक्यों में भी साधक और बाधक प्रमाणो के आधार पर विरोध और अविरोध प्रतीत होता है । ' far खाओ ' यह वाक्य लौकिक ही है । यहाँ पर भी प्रसिद्ध अर्थ का परित्याग कर लक्षणा का सहारा लेना पडता है । तात्पर्य की अन्यथा उपपत्ति न हो सकेगी, इसके लिये लोक में भी कही कही लक्षणा का सहारा लेना पडता है, अत कही पर अप्रसिद्ध अर्थ का ग्रहण करने पर भी सवत्र ऐसा ही किया जाय, यह जरूरी नही है । पुन शका की जाती है कि ' प्रदेशान्तर में अप्रसिद्ध अर्थ को यदि हम समझाना चाहें, तो भी वहां के व्यक्तियों के लिये उस अर्थ के अज्ञात होने से वहाँ पर उसका विरुद्ध अर्थ अनिवार्य रूप से कल्पित किया जाता है । इस तरह से यहीं की अर्थ कल्पना गलत सरकारों के आधार पर होगी । ' किन्तु यह शका भी ठीक नहीं है | मालूम पडता है इसी तरह के गलत सस्कारों के कारण ate प्रभृति प्रदेशो में बोद्ध कुत्ते का मास भी खाते हैं । अन्यथा ऐसा कौन समझदार व्यक्ति है जो कि ' अग्निहोत्र करे ' इस वाक्य का ' कुत्ते का मास खाय ' यह अर्थ समझेगा, विशेषत उस अवस्था में, जब कि इसकी व्याख्या प्रदेशान्तर में विद्यमान है । लोकिक और वैदिक शब्दों में परस्पर कोई विशेषता नहीं होती, यह कहा जा चुका है । इसी तरह से ' यदि कोई विदित अर्थं वाला अपौरुषेय शब्दराशि हो तो उससे अथ की प्रतीति हो सकती है । यहाँ तो अन्धपरम्परा चालू है । ढेर सारे अन्धे भी मनमाने ढंग से हाँक जा सकते हैं । इसलिये इस तरह के वैदिक शब्दों के अर्थ की कल्पना भी मनमाने ढंग से की जा सकती हैं, इस तरह की उक्तियाँ शाब्दोष व्यवस्था को न जानने वाले के लिये हो शोभा की बात हो सकती है ।

पृष्ठ 316

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 316 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८६ वेदार्थ पारिजात यदुक्तम् ' प्रसिद्धिश्च नृणा वाद प्रमाण स च ने पते । ततश्च भूयोऽथगति किमेतद् द्विष्ठकामितम् ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।३२३ ) । कस्यचिदपि सम्यक् प्रतिपत्तेरभावे बाहुल्यमर्थवद् भवति, पारसीकमातृमिथ्याचारवत् । तेषामेव वचनात् पुन परोक्षार्थप्रतिपत्तिरिति कथ वदेत् । युगपद् द्वेष्य कामितश्च स्यात् । तदेतदपि सिद्धान्ताज्ञानविजृम्भितम्, अप्रामाण्य स्वत प्रामाण्य परत इति प्रामाण्यपरतस्त्ववादिबौद्धस्यैव नये तदापत्ति | प्रामाण्यस्वतस्त्ववादिना मते तु प्रमाणमात्रस्य प्रामाण्य स्वत अप्रामाण्यमेव परत इति पौरुषेयवाक्यानामपि प्रामाण्यस्वतस्त्वमेव । पुरुपाश्रितभ्रम-प्रमादादिभिस्त्वप्रामाण्यशङ्का भवति । आप्तत्वनिर्णये प्रामाण्यस्वतस्त्वमनपनोदितमेव सुस्थ भवति । वस्तुस्थिति-मनुरुध्य आनुपूर्वीनिर्माणे पुरुषस्वातन्त्र्याभावेनैवापौरुषेयत्वमित्यवोचाम । शक्तिग्रहादिक च वृद्धव्यवहारानुरोधेने-त्यप्ययुक्तमेव । अत एव -- ' अर्थे प्रसिद्धिमुल्लड कल्पनेन निबन्धनम् ' ( प्र ० वा ० ३।३२३ ) इति सम्यगेव प्रसिद्धे-प्रमाणवक्ते प्रतिक्षिप्तत्वात् । एतेन प्रसिद्धिमप्रमाणयतस्तन्मुखेन प्रतीतियंत् किश्चन ग्रहणमित्यप्यपास्तम्, प्रसिद्धि-परित्यागे व्यवहारलोपप्रसङ्गात् । यदुक्त प्राप्तिप्रतिषेधात् तुल्या स्वपरविकल्पयोरुभयोरुभयथापि वत्तिरिति क प्रसिद्धावनुरोध. तदपि नि सारम्, प्रसिद्ध शाब्दबोधमूलत्वोक्ते } सति सभवे तत्पालनमनिवार्यमेव । यदुक्त न प्रसिद्धेरेकार्थनिश्चय शब्दानाम्, तत एव शङ्कोत्पत्ते । नानार्था हि शब्दा दृश्यन्ते लोके । लोकवादच प्रतीति । ततो नियमो न युक्त कहा गया है कि मनुष्यों में प्रवाद परम्परा ( जनश्रुति ) भी प्रसिद्ध है, किन्तु उसको प्रमाण नही माना जाता है तब फिर इससे अर्थ का निश्चय कैसे हो सकता है । एक ही वस्तु से द्वेष भी हो और प्रेम भी हो, ऐसा कैसे हो सकता है? " किसी को किसी बात का जब सही ज्ञान नहीं होता तो इस परिस्थिति में पारसीक की माता के मिथ्याचार के समान बाहुल्य के आधार पर अर्थ का निश्चय होता है । उन्ही के कहने से फिर परोक्ष अर्थ की प्रतिपत्ति कैसे होगी? यह तो एक साथ द्वेष और प्रेम करने के समान हुआ । ' किन्तु यह कथन भी सिद्धान्त को ठीक से समझ न पाने के कारण है । इस तरह की आपत्ति बौद्ध मत पर आ सकती है, ruife ata exert य का स्वतस्त्व और प्रामाण्य का परतस्त्व मानते हैं | प्रामाण्य का स्वतस्त्व मानने वालों के मत मे तो प्रमाण मात्र का प्रामाण्य स्वत होता है, अप्रामाण्य में ही परतस्त्व माना जाता है । अत इस मत मे पौरुषेय वाक्यों का प्रमाण स्वतः ही होता है । पुरुषाश्रित श्रम, प्रमाद आदि को देख करके ही अप्रामाण्य की आशका उठती है । वक्ता की आप्तता का निश्चय हो जाने पर प्रामाण्य का स्वतस्त्व बरकरार रहता है । यह हमने बार - बार कहा है कि वस्तु स्थिति को देखकर आनुपूर्वी के निर्माण में जहाँ तक वेद का प्रप्त है, पुरुष स्वतन्त्र नहीं है, इसीलिये वेद की अपौरुषेयता मानी जाती है । शक्तिग्रह भी सहारे होता है, यह बताया जा चुका है । इसीलिये ' प्रसिद्ध अर्थ का उल्लघन करके मनमानी कल्पना में कोई हेतु नहीं व्यवहार है के कथन ठीक ही है, क्योंकि प्रसिद्धि के अप्रामाण्य का परिहार किया जा चुका है । इससे इस बात का खण्डन हो, यह को अप्रामाणिक मानने वाला जो चाहे समझ सकता है, क्योकि प्रसिद्धि का परित्याग कर देने पर सारे व्यवहार जाता है कि प्रसिद्धि के ही लोप का प्रसंग उठ खड़ा होगा । है कहा जाता है कि ' प्रसिद्धि के अनुसार जो अर्थ प्राप्त हैं, उसका प्रतिषेध कर देने पर वादी और प्रतिवादी दोनों के उक्त दोनों विकल्पों की arve अथवा बाधक वृत्ति एक सी रहेगी, तब प्रसिद्धि के प्रति इतना आग्रह ति सार हैं, क्योकि यह कहा जा चुका है कि प्रसिद्धि ही शाब्दबोध का आधार है । इसलिये यथासंभव क्यों है । इसका " किन्तु यह कथन भी पालन अवश्य करना चाहिये । पुन. कहा जाता है कि ' प्रसिद्धि के आधार पर शब्दों का कोई एक अर्थ निश्चित नहीं किया जा सकता में एक शब्द के अनेक अर्थ प्रसिद्ध हैं । ऐसी अवस्था में इस शंका का उठना स्वाभाविक है कि यह शब्द उन प्रसिद्ध, क्योंकि लोक अर्थों में यहाँ

पृष्ठ 317

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 317 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वैवार्थपारिजात उत्पादिता प्रसिद्ध व शङ्का शब्दार्थनिश्चये । यस्मान्नानार्थवृत्तित्व शब्दाना तत्र दृश्यते ॥ ( ० वा ० ३।३२५ ) २८७ इति, तदपि चतिचर्वणमेव, शब्दाना सर्वार्थवाचकत्वेऽपि व्याकरणकोशादिभिर्नियतवृत्तित्वस्योक्तत्वात् । नानार्था -नामपि प्रकरणादिभिरेकार्थ्यनिणयस्योक्तत्वाच्च । यदपि नियामकाभावाद् नानाशक्ते शब्दस्यापि तादर्थ्यादर्थान्तरवृत्तित्वाशङ्काऽवश्यभाविनी, ततश्चा-विदितार्थंविभागेषु शब्देष्वेकमर्थमल्पज्ञसयोग निष्प्रमाणक निश्चित्य व्याचक्षाणो जैमिनिस्तद्व्याजेन स्वमतमेव वक्त, न वेदमतम् । वचनव्यापारशून्ये वेदे वेदार्थप्रकाशन व्यापारसमारोपेण तद्वचनमसगतमेव । एष स्थाणुरय मार्ग इति वक्तीति कश्चन । अन्य स्वयं ब्रवीमीति तयोर्भेद परीक्ष्यताम् ॥ सर्वत्र योग्यस्यैकार्थद्योतने नियम कुत । ( प्र ० वा ० ३२६-३२७ ) वैदिकाना शब्दानामेकार्थनियमाभ्युपगमेऽप्यतोन्द्रिया अर्था केनचिद् ज्ञातुमशक्या एव, अतोन्द्रियदृक-पुरुषानभ्युपगमात् । विवक्षया प्रणीते वचनेऽर्थनियमसभवेऽपि वेदेऽपौरुषेये तदसभवेनार्थनियमसभव एव ।

विवक्षानियमे हेतु सकेतस्तत्प्रकाशन । अपौरुषेये सा नास्ति तस्य संकाथता कुत ॥

स्वभावनियमेऽन्यत्र न योज्येत तथा पुन । यथेष्ट न नियुज्येत सकेतश्च निरर्थक ॥

यत्र स्वातन्त्र्यमिच्छाया नियमो नाम तत्र क । द्योतयेत् तेन सकेतो नेष्टामेवास्य योग्यताम् || ( प्र ० वा ० ३।३२ ९ -३३१ ) पर किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । लोकप्रवाद के अनुसार एक शब्द से अनेक प्रतीति होती हैं । इनको नियमित कैसे किया जा सकता है -- शब्दार्थ के निश्चय के प्रसग में प्रसिद्धि ही शका की उत्पादिका बन जाती है, क्योकि उस प्रसिद्धि के अनुसार शब्दों की नाना अर्थों में वृत्ति सिद्ध होती है । ' किन्तु यह पूरा कथन भी पिष्टपेषण मात्र है । यह कहा जा चुका है कि सभी शब्द यद्यपि सभी म के वाचक हैं, तो भी व्याकरण, कोश प्रभूति से उनकी प्रवृत्ति नियत अर्थ में ही होती है । यह भी कहा जा चुका है कि प्रकरण आदि से नानार्थी शब्दों की भी एकार्थता का निर्णय किया जाता है । यह भी कहा जाता है कि ' नाना अर्थों को प्रकट करने में समय शब्द की शक्ति का जब कोई नियामक नहीं है, तब उसकी दूसरे अर्थों में वृत्ति की शक अवश्य उठ सकती है । ऐसी अवस्था में अविदित मर्थं विभाग वाले शब्दो के एक अर्थ को अप्रचलित होने के आधार पर अप्रमाण मान कर उसकी अपनी व्याख्या उपस्थित करने पर जैमिनि आचार्य इस बहाने से अपने मत का प्रतिपादन करते है, वेद के मत का नही । वचन व्यापार से शून्य वेद में वेदार्थ के प्रकाशन के व्यापार को मारोपित करना असंगत ही है । ' यह स्थाणु है, यह भाग है ऐसा कोई कहता है ' इस कथन में और ' ऐसा मैं कहता हूँ ' इस दोनो में भेद स्पष्ट है । जिस शब्द की सर्वत्र वृत्ति है, यह एक ही अर्थ को प्रकाशित करेगा, ऐसा नियम कैसे बनाया जा सकता है । वैदिक शब्द की एक tear or नियम मान भी लिया जाय, तो भी अतीन्द्रिय अर्थों को कोई कैसे जान सकता है, क्योकि अतीन्द्रिय पदार्थों का द्रष्टा कोई पुरुष स्वीकार नहीं किया जाता | किसी तात्पर्य को अभिव्यक्त करने के लिए उच्चरित वचन में अर्थ का नियमन हो भी सकता है, किन्तु अपौरुषेय वेद में वक्ता के भाव में यह भी नही हो सकता । विवक्षा शब्दार्थ के नियमन में कारण होती ear aha sent प्रकाशित करता है । यह विवक्षा पौरुषेय वेद में नहीं हो सकती, तब उसका एकार्थ में नियमन कैसे हो सकता है? यदि स्वभाव से ही इसका नियमन माना जाय तो फिर इसकी अन्यत्र भित्र अर्थ में प्रोति नहीं होने पायेगी और जब इसकी इच्छा के अनुसार अर्थबोधकता नही रहेगी तो संकेत की उपयोगिता हो क्या रह जायगी? जहाँ इच्छा का स्वातन्त्र्य है, वहाँ पर fare की क्या उपयोगिता है? ऐसी परिस्थिति में सकेत इसकी इष्टयोग्यता को नहीं द्योतित कर सकेगा ।

पृष्ठ 318

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 318 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८८ वार्थपारिजात तदेतत् सर्वमपार्थकमेव, शब्दाना नानाथत्वेऽपि सकेतेन प्रतिनियताथत्वोपपत्ते, सकेतसचिवयोग्यतावशात् तत्प्रतिपादकत्वस्य समर्थितत्वात् । तथात्वेऽपि नेच्छाया निरङ्कुशत्वेनाव्यवस्था, सकेतस्य सहजयोग्यतानिबन्धनत्वात् । धूमावत सासिद्धिकार्यशक्तिव्यतिक्रमे चक्षुरादीनामपि प्रकाश्यप्रकाशक शक्तिव्यतिक्रम स्यात् । शब्दार्थयो स्वाभाविक-सम्बन्धस्य व्यक्तये सकेत समाश्रीयते, देशभेदेनाथभेदस्याप्यन्यत्रोक्तत्वात् । सकेत नियमोऽप्यादिष्ट एवोभयत्र । अत एव न पौरुषेयेऽपि यथेष्ट नियोग, व्यवहारलोपप्रसङ्गात् । प्रयोक्तृप्रतिपत्तिपारम्यर्यप्रसिद्ध एवार्थे व्यवहारिभि प्रयुज्यते शब्द । अन्यथाऽन्योन्यानवबोधप्रसक्तिप्रयुक्तव्यवहृतिव्याहृतिरेव स्यात् । यद्यप्यनधिगता बाधितार्थविषयज्ञानत्वेनैव प्रामाण्य प्रमाणाना भवति, प्रत्यक्षानुमानानधिगताधिगन्तृत्वेनव वेदाना प्रामाण्यमिति ' अग्निहिमस्य भेषजम् ' इत्यादिवाक्यानामनुवादकत्वे नास्मिन्नशेऽप्रामाण्यमेव, तस्मात जैमिनि-मतरूपेण अवितथानि वेदवाक्यानि वेदेकदेशत्वात्, यथाग्निहिमस्य भेषजमित्यादिवाक्यमित्युपस्थापन मसगतमेव, रसवत्तुल्यरूपत्वादेकभाण्डे च पाकवत् । शेषवद् व्यभिचारित्वात् क्षिप्त न्यायविदेदृशम् । ( प्र ० वा ० ३।३३२ ) इत्यादिना । यथा तुल्यरूपतयाऽनास्वादितानामपि फलानामास्वादितफलेन तुल्यरससाधनम्, यथा च एकस्थात्यन्तर्गमात पक्वतण्डुलवददृष्टतण्डुलानामपि पाकसाधनम, तदेतच्छेषवदनुमान प्रमाणसमुच्चये दिङ्नागेन क्षिप्त व्यभिचारमुद्भावयता, तच्चासगतमेव । अग्निहिमस्य भेषजमित्यस्य मीमासकरीत्याऽनुवादकत्वेन स्वार्थे प्रामाण्यासभवात् । किन्तु धर्मकीति का यह पूरा कथन निरर्थक है, क्योकि यद्यपि शब्द नानार्थक हैं, तो भी सकेत के अनुसार इनका अथ प्रतिनियत ( निश्चित ) हो जाता है । सकेत की सहायता से योग्यता के आधार पर ही शब्द को निश्चित अर्थप्रतिपादकता का समर्थन किया जा सकता है । ऐसा होने पर भी इच्छा की स्वतन्त्रता के आधार पर अव्यवस्था नहीं होने पाती, क्योकि सकेत हो सहज योग्यताका कारण होता है । स्वाभाविक अर्थ शक्ति का व्यतिक्रम मानने पर धूम और अग्नि के समान चक्षुरादि की भी प्रकाश्य-shree शक्ति का व्यतिक्रम होने लगेगा | शब्द और अर्थ के स्वाभाविक सबन्ध की भी अभिव्यक्ति के लिए सकेत का सहारा लिया जाता है | देशभेद से भी अथभेद होता है, यह बात अन्यत्र बताई जा चुकी हैं | सकेल का नियम भी वेद और लोक में निश्चित है | इसीलिए पौरुषेय वाक्यो का भी इच्छानुसार स्वतन्त्र मर्थ में विनियोग नही हो सकता, क्योकि इस तरह से तो सारा व्यवहार लुप्त हो सकता है । प्रयोक्ता और प्रतिपता इन दोनो की परम्परा में प्रसिद्ध अर्थ में ही शब्द का प्रयोग व्यवहृत करता है । अन्यथा एक दूसरे के समझ में न आने के कारण सारा शब्द व्यवहार ही गडबडा जायगा । aur aafone, अबाधित अथविषयक ज्ञान होने से ही प्रमाणो का प्रामाण्य माना जाता है और प्रत्यक्ष तथा अनुमान प्रमाण से अनविगत ( नहीं जाना जा सकने वाला ) अर्थ का ज्ञान कराने के कारण ही वेदो का प्रामाण्य है, इसलिए ' अग्नि हिम ( शीत ) की दवा है ' इत्यादि वेदवाक्य तो प्रसिद्ध ( सिद्ध ) अर्थ का अनुवाद मात्र करने वाले होने के कारण अप्रमाण हो होगे । अत. जैमिनि के मत से ही वेद वाक्य मिथ्या है, क्योंकि ' अग्नि हिस की दवा है ' यह वाक्य भी वेद का एक अथ हो तो है । इसी बात को दिमाग में शेषवत् अनुमान से उठाया है । अनुमान का स्वरूप है -- एक फल का स्वाद लेकर उसी रूप वाले दूसरे फलो को बिना स्वाद लिए भी आस्वादित फल के तुल्य रस वाला मान लेता और एक थाली में पड़े हुए पके चावलों को देखकर बिना देखे हुए चावलों को भी पके हुए मान लेना । किन्तु स्वय दिङ्नाग ने ही प्रमाणसमुच्चय में व्यभिचार की उद्भावना करके इस प्रकार के शेषवत् अनुमान का खण्डन भी किया है । वास्तव में प्रमाणवार्तिककार धर्मकीति और दिमाग दोनो का ही कथन असंगत है, क्योंकि मीनासकों के मत ' अग्नि हिमका भेषज ( देवा ) है ' यह वाक्य प्रत्यक्ष सिद्ध अर्थ का अनुवादक होने के कारण स्वार्थ में प्रमाण ही नहीं हो सकत

पृष्ठ 319

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 319 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदापारिजात यच्च स्वाभिमतागमप्रामाण्य बौद्धेरप्युच्यते, तत्रैकदेशाविसवादनमागमलक्षणम्, तच्च नात्यन्तप्रसिद्धेक + विषयमत्यताश्रयमपि तु तदेवागमलक्षणम्, यो s र्वाग्दिर्शनेन प्रमाणत शक्यपरिच्छेद । तदुक्तम्--एकदेशाविसवादिरूपमागमलक्षणम् । ( प्र ० स ० ) नाय पुरुषो s नाश्रित्यागमप्रमाणमासितु समर्थ । ( प्र ० वा ० ) एव शक्यविचारस्य विषयस्य यथास्व प्रमाणेन विधिप्रतिषेधसिद्धौ नान्तरीयकताभावेऽपि पाब्दानामर्थेषु च सशयितस्य प्रवृत्ति, तत्र कदाचिदविसवादसभवात् । न त्वन्यत्र दृष्टप्रमाणोपरोधस्य पुरुषस्य प्रवृत्ति 2 योऽग्निहिमस्य भेषजमिति व शीतप्रतिघातसामर्थ्यस्याभिधान सत्यार्थं प्रदश्ये सर्व सत्यार्थमाह शास्त्रम् । शक्यपरिच्छेदेऽपि विषये प्रमाणविरोधाद् बहुतरमयुक्तमपि । ' नित्यस्य पुस कर्तृत्व नित्यान् भावानतीन्द्रियान् । ऐन्द्रियान् विषम हेतु भावाना विषमा स्थितिम् ॥ निवृत्ति च प्रमाणाभ्यामन्यद्वा व्यस्तगोचरम् । विरुद्धमागमा पेक्षेणानुमानेन वा वदन् ॥ विरोधसमाधाय शास्त्रार्थं च प्रदर्श्य स | सत्यार्थं प्रतिजानानो जयेद्धाष्टर्थेन बन्धकीम् ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।३३३-३३६ ) अच्युतानुत्पन्नपूर्वापररूप पुमान् क्रमेण कर्मणा कर्मफलाना च भोक्ता, समवायिकारणाधिष्ठानभावादित्याह वेद । तच्चायुक्तमेव । नित्यत्वच भावानामक्षणिकत्व च वस्तुधर्मातिक्रमात् । अप्रत्यक्षाण्येव सामान्यादीनि प्रत्यक्षाणि । जन्मस्थितिनिवृत्तिश्च विषया । पदार्थानामनाधेयविशेषस्य प्रागकर्तु परापेक्षया जनकत्वम् । निष्पत्ते-Ratri रूपस्याश्रयवशेन स्थानम्, कारणाच्च विनाश, प्रत्यक्षानुमानाभ्या प्रसिद्धिविपर्ययमागमाश्रयेण चानुमानेन स्वाभिमत आगम का प्रामाण्य हम बौद्ध भी मानते हैं । यहा पर आगम का लक्षण यह है कि वह एक देश में भी विसवादी नहीं होता । अत्यन्त प्रसिद्ध एक विषय की सत्यता इसका आधार नहीं है, किन्तु आगम का लक्षण यह है कि जिसका प्रामाण्य स्थूल बुद्धि वाले की भी समझ में आ जाय । जैसा कि कहा गया है- ' आगम का लक्षण एक देश में अविसवादि होना ही है, ' यह पुरुष आगम - श्रामाण्य का सहारा लिये बिना रह नही सकता । ' इस तरह से जिस विषय का विचार हो सकता है, Best प्रमाण के द्वारा विधि और प्रतिषेध की सिद्धि हो जाने पर नान्तरीयकता के अभाव में भी शब्दों की अर्थों में सशयित प्रवृत्ति हो सकती है इस दशा मे कभी अविसवाद भी समय है । इष्ट प्रमाण से रुकावट हो जाने पर पुरुष की प्रवृत्ति अन्यत्र नही होगी । ऐसी अवस्था में जो व्यक्ति ' अग्नि हिम की दवा है इस वाक्य से वह्नि में शोत को भगा देवे का सामर्थ्य है, इस सत्य उदाहरण के आधार पर सारे शास्त्र को सत्य सिद्ध करना चाहता है, यह उचित नहीं है, क्योंकि जहाँ पर प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से वस्तु का परिच्छेद ( निश्चय ) किया जा सकता है, ऐसे स्थलो मे भी शास्त्रों के प्रमाण विरुद्ध अनेक वचन मिल जाते हैं । ' वेदशास्त्र frer पुरुष ईश्वर को जगत् का कर्ता मानते हैं, दिकू, काल, आकाश आदि अर्थक्रियाहीन भावों की सत्ता मानते हैं, गुण, कर्म, सामान्य आदि प्रत्यक्ष प्रमाणों को अतीन्द्रिय सिद्ध करते हैं, भावो की पहले जनकता नही मानते और निष्पन्न भावों की स्थिति आश्रयाधीन मानते है, स्वत. अनश्वर भावों का विनाश ईश्वराधीन मानते है, अन्य वस्तुओ विषय में भी वहाँ पर ऐसी अनेक बाते हैं, जिनका कि प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण से विरोध पडता है । बागमापेक्षी अर्थात् आगम सिद्ध त्रिरूप fare अनुमान के विरुद्ध after, स्नान आदि की पापनाशकता और पुण्यजनकता मानते हैं । इस तरह की अनेक विरुद्ध बालो का प्रतिपादन करते हुए और प्रामाणिक आक्षेपों का बिना समाधान किये और उस पर बिना शास्त्रचर्चा किये अपनी ही बात को सच ठहराना चाहते है, वे अपनी धृष्टता से फुलदा स्त्री को भी जीत लेते है वेद का कहना है कि समवायी कारणों का अधिष्ठाता होने से ger हो क्रम कर्मे और कर्म के फलो का भोक्ता है । पुरुष का पहला रूप नष्ट नही होता और दूसरा रूप पैदा नहीं होता । वेद का यह कथन गलत ही हैं । भावो की नित्यता और अक्षणिकता वस्तुओं के स्वभाव के विपरीत है । अप्रत्यक्ष भी जाति आदि प्रत्यक्ष ही है । पदार्थों के जन्म, स्थिति और निवृत्ति ये विषय हैं । ईश्वर में किसी विशेषता का आधान नही हो सकता । पहले वह न होते हुए भी अपेक्षा से कर्ता है । निष्पत्ति अकाय रूप है, इसकी स्थिति आश्रय के आधार पर होती है और कारण के ३७

पृष्ठ 320

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 320 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२१० aare पारिजात arran नहोत्रादे पापशोधनसामर्थ्यादिकम् । तस्यैववादिनो वेदस्य साधिशरीरे प्रमाणविरोधमप्रतिसमाधाय सम्बन्धा-नुगुणोपाय पुरुषार्थाभिधानानि च शास्त्रवचनानि प्रदर्श्य अत्यन्तप्रसिद्धविषयसत्याभिधानमात्रेण प्रज्ञाप्रकर्षदुरवगाहगहने निरत्ययता भावयितुकामो बन्धकीमपि विजयते । काचिद् बन्धकी स्वयं स्वामिना विप्रतिपत्तिस्थाने दृष्टोपालब्धा । सा तम्प्रत्युवाच — पश्यत पुरुषस्य वैपरीत्यमपि । धर्मपत्न्या पतिव्रताया प्रत्ययमकृत्वाऽत्मीययोर्नेत्राभिधानयो ( जेल ) बुद्-बुदयो, प्रत्यय करोति । जरत्करणेन ग्राम्यकाष्ठहारकेण प्रार्थिताऽपि न सङ्गता । रूपगुणानुरागेण किल मुख्यमन्त्रिदारक कामयेऽहम् । तथंच वह्ने शीतप्रतीकारवचनेन दृष्टप्रमाण विरोधस्यात्यन्तपरोक्षेऽर्थेऽपि सवादानुमानम् । दृष्टव्यभि-चाया पत्न्या इव दृष्टव्यभिचाराया श्रुते ( वेदस्या ) पि वचन तद्वदेव । सिद्धयेत् प्रमाण यद्येवमप्रमाणमथेह किम् । नहीं तन्नास्ति सत्यार्थं पुरुषे बहुभाषिणि ॥ वस्तुभिर्नागमास्तेन कथञ्चिन्नान्तरीयका । प्रतिपत्तनं सिद्धयन्ति कुतस्तेभ्योऽर्थनिश्चय ' || ( प्र ० वा ० ३।३३६-३४० ) इत्यादिक वचन बौद्धविदुषो धमकीर्तेर्दु साहसमेवाभिव्यनक्ति, चक्षु श्रोत्रादीना रूपशब्दादाविव धर्मब्रह्मा वेदस्य स्वातन्त्र्येण प्रामाण्याभ्युपगमात् । नहि स्वभाव पर्य्यनुयोक्तु शक्य – अग्नि कथमुष्ण, जल व कष शीतम्? शाब्द-व्यवहारश्चाबालगोपालहालिकात् सर्वसम्प्रतिपन्न | तदपलापस्तु मे मुखे जिह्वा नास्तीतिवद् व्याहतमेव, शाब्द-आधार पर विनाश होता है । अग्निहोत्र आदि पाप के शोधन करने में समर्थ है । अनुमान से बाधित होने पर और प्रत्यक्ष तथा अनुमान की प्रसिद्धि के विपरीत होने पर भी शास्त्रो के द्वारा यह बात सिद्ध है । इस तरह की बातो का प्रतिपादन करने वाले वेदो पर जो आपत्ति उठाई जाती हैं, उसकी प्रमाणविरुद्धता का समाधान न करके सबन्ध के मनुगुण उपाय, पुरुषार्थ और अभियान आदि को शास्त्र का धर्म बताकर अत्यन्त प्रसिद्ध विषयों के आधार पर शास्त्र की सत्यता का प्रतिपादन कर, बुद्धि के उत्कर्ष के feet freer Terrant fie ता, ऐसी परिस्थिति में उससे भागने वाला वैदिक मोमासक अपनी धृष्टता से कुलटा स्त्री को भी जीत लेता है । कोई कुलटा स्त्री गलत काम करते हुए अपने पति के द्वारा गे हाथ पकड़ ली जाती है और डाटी जाने पर पति को ही उलटा डाटते हुए कहती है कि इस आदमी को देखिये, इसकी बुद्धि मारी गई है । मेरी जैसी पतिव्रता धर्मपत्नी की बात का विश्वास न कर यह जल के बुलबुलों के समान अस्थिर अपने नेत्रगोलक पर विश्वास करता है । बूढे, खूसट गाँव के लकडहारे के बहुत लुभाने पर भी मैंने उसकी बात नही मानी । खाली मुख्य मन्त्री के लड़के के रूप और गुण पर मुग्ध होकर मैं उसको चाहने लगी हूँ । कुलटा के इस वचन की जो कीमत है, वही बात इस अनुमान पर लागू होती है, जिसके आधार पर कि वह्नि के शीतप्रतीकारक प्रत्यक्ष प्रसिद्ध अर्थ के आधार पर दृष्ट प्रमाणो से अत्यन्त विरुद्ध अर्थों को भी सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है । व्यभिचार में प्रवृत पत्नी के aur की तरह व्यभिचार दोष से ग्रस्त इन श्रुतिवचनो की भी कोई कीमत नही हो सकती । यदि इस तरह के वचन भी प्रामाणिक माने जाने लगेंगे, तो फिर यहाँ अप्रामाणिक रह ही क्या जायगा? सदा असत्य भाषण करने वाले व्यक्ति को कोई एक दो बातें सब भी हो सकती हैं, इसी के आधार पर उसको सत्यवादी नही सिद्ध किया जा सकता । वक्ता में विद्यमान ध्वनि वस्तुओं का स्वभाव अथवा कार्य भी नही हो सकती । वस्तुओं का स्वभाव दूसरे धर्मोंमें नहीं रह सकता, अथवा न कोई कार्य ही अन्य वस्तुओं से हो सकता है । कार्य और स्वभाव से अतिरिक्त भाव की परस्परअव्यभिचारिता नहीं रह सकती । यदि यह माना जाय कि वाचक शब्दों की प्रवृत्ति अभिषेय को देखकर तदनुसार होती है, अत परम्परया उसमें कार्यंवा या जायगी, तो आप यह बताइये कि यह शब्द की प्रवृत्ति एक वस्तु में परस्पर विरोधी अर्थों में कैसे हो सकेगी? अतः वस्तुओं के साथ आगमों का अविनाभाव संबन्ध किसी भी तरह से नहीं सिद्ध किया जा सकता, तब उनसे अर्थ का निश्चय कैसे होगा? ये सारी बातें धर्मकीति के दु साहस को ही प्रकट करती हैं । रूप, शब्द आदि के प्रत्यक्ष में जैसे चक्षु श्रोत्र आदि का स्वतन्त्र प्रामाण्य है, उसी तरह से धर्म, ब्रह्म आदि के विषय में वेद का भी स्वतन्त्र प्रामाण्य माना जाता है । किसी वस्तु के स्वभाव के Free में प्रवन नहीं किया जा सकता कि अति गरम क्यो होती है और जल ठडा क्यों होता है? शब्द व्यवहार को अवोष मानक और