वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40

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वेदार्थपारिजातः भूमिकाभाग: - १ श्रीः वेदार्थपारिजातः

ॐ स्वस्ति श्रीगणेशाय नमः । ॐ सरस्त्रायै नमः । ॐ देवपुरुषाय नमः ।

गजाननमहर्निशम् । अनेकदं तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे ॥ १ ॥

सच्चिदानन्दरामाय प्रत्यगानन्दरूपिणे । नमो वेदान्ततात्पर्यगोचराय परात्मने ॥ २ ॥

नमरिशवाय शान्ताय त्रिपुरालिङ्गिताय च । प्रत्यवचैतन्यरूपाय महते परमात्मने ॥ ३ ॥

अनादिनिधनः शब्दराशिर्वेदपदाभिधः । सता परम्पराप्राप्तो द्योतते विश्ववन्दितः ॥ ४ ॥

आर्याणां बहुमानत्वादत्र कर्तृ स्मृति विना । नित्यत्वा पौरुषयत्वे सन्तिष्ठेते ध्रुवात्मनः ॥ ५ ॥

षडङ्गस्मृतिरत्नानामितिहासपुराणयोः 1 दर्शनप्रातिशाख्यानामुपयोगोऽर्थनिर्णये || ६ || वेदवाक्यार्थनिर्णीतिर्मीमांसाया विशेषतः । न्यायैः परिष्कृता न्याय्या रीतिरेषाश्रिता बुधैः ॥ ७ ॥

काले काले ग्रहीतॄणां बुद्धिस्मृत्यादिदोषतः । कर्मश्रेयसि मूढानामनुग्रहपरायणैः ॥ ८ ॥

साङ्गोपाङ्गास्तथा वेदा भाष्यकृद्भिश्च टीकिताः } । निबन्धृभिर्निबन्धानां बहूनां रचनाः कृताः ॥ ९ ॥

श्रीः श्रीमहात्रिपुरसुन्दर्यै नमः श्रीगुरुभ्यो नमः अगा अर्थात् भगवती पार्वती के गुरु रूपी कमल को प्रफुल्लित कर देने के लिए जो सूर्य के समान हैं, ऐसे गजानन गणेश का हम स्मरण करते हैं, जो कि भक्तों को अनेक अनीष्ट वस्तुएं देने वाले हैं, तो भी स्वयं एकदन्त अर्थात् एक दाँत वाले हैं ॥ १ ॥

सत्, चित् मानन्द स्वरूप, रमणीय, प्रत्यक् अर्थात् पारमार्थिक आन्तर आत्म - स्वरूप, सभी वेदान्तों के तात्पर्यभूत परमात्मा को हम प्रणाम करते हैं ॥ २ ॥

कल्याणमय, शान्तस्वरूप, भगवती से बालगित प्रत्यग् चैतन्य स्वरूप महान् परमात्मा भगवान् शिव को हम प्रणाम करते हैं ॥ ३ ॥

frent aft are नहीं है, ऐसा शब्द - राशि वेद के नाम से कहा जाता है । यह वेद इस भारतवर्ष में अनादि परम्परा से af द्वानों को प्राप्त है और अब तो सारे जगत् में इसकी प्रतिष्ठा फैल गई है । इस वेदराशि को आर्य प्रजा बड़े सम्मान के साथ पूजती है । ऐसी कोई यादगार नहीं है कि जिसके आधार पर इसका कोई कर्ता माना जाय, अतः वेद का नित्यत्व और अपौरुषेयस्व सदा प्रकाशित है ॥ ४-५ ॥ इसके अर्थ के ि a के लिए व्याकरण प्रभृति छ: वेदांग, ऋषि प्रणीत स्मृतियाँ, इतिहास, पुराण, दर्शनशास्त्र और प्राति-शाख्यप्रभृति ग्रन्थों की सहायता ली जाती है ॥ ६ ॥

के संशयग्रस्त र्थों के निर्णय के लिए मीनांगा के परिष्कृत स्यायों की विशेष रूप से सहायता ली जाय इस पद्धति को विगण मानते है || ७ ११ अध्येताओं की बुद्धि और स्मृति - शक्ति का क्रमश: ह्रास होता देखकर और क्या उचित है, क्या अनुचित इस संदेह के कारण कल्याण मार्ग का निश्वय करने में प्रजा को fendorfene देखकर अनुग्रहशील आचार्यों ने समय - समय पर अंग और उपांग सहित वेदों पर माध्य और टोकाएँ लिखीं और को विद्वानों ने इन्हीं विषयों पर अनेक निबन्ध ग्रन्थों की रचना की || ८ - ९ ॥

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वेदार्थपारिजातः

माध्यन्दिनीयशाखायां तवोटमहोधरौ । संहिताया विशेषेण चक्रतुर्भाष्यमुत्तमम् ॥ १० ॥

वितेने मायणस्सर्ववेदानां सारगर्भितम् । अल्पाक्षरमसन्दिग्धं भाष्यं मानसमन्वितम् ॥ ११ ॥

वेदभाष्यविधाता ये केचिदधुनातनाः । सर्वेषां सायणं भाष्यमुपजीव्यमभिष्टुतम् ॥ १२ ॥

प्रामाणिकानि सर्वाणि भाष्याणीमानि सूरिभिः । शास्त्रार्थतत्त्वचिन्तकमानसैः स्वीकृतानि च ॥ १३ ॥

यानि वाद्योपलभ्यन्ते देवाद्भाग्यप्रकर्षतः । तानि चेन्नोपलभ्येरन् वेदार्थाधिगमे भृशम् । जाड्यान्धकारमग्नस्स्यात्कृत्स्नो लोको निरायति ॥ १४ ॥

वेदमार्ग खिलीकर्तुं प्रवृत्तास्सौगतादयः । ते कृता विफलास्सर्वे मीमांसानयकोविदैः ॥ १५ ॥

गते बहुतिथे काले दयानन्दाभिधो जनः । दूषयामास सर्वां तां पद्धतिय सदातनी ॥ १६ ॥

लोकायतिकमार्गस्थ आस्तिक्यमिव दर्शयन् । ख्यातिसम्मानपूजार्थं लोकवचनहेतवे ॥ १७ ॥

इतस्ततस्समानीय सारहीनमुदक्षरम् । प्रादुश्चक्रे भाष्यनाम्ना न लघीयो न विस्तृतम् ॥ १८ ॥

मानं स्वप्रतिभैवात्र भाष्याभासेऽवलम्बिता । किं पूर्व कि परचेति सन्दर्भों नैव वीक्षितः ॥ १ ९ ॥ एवं प्रवर्तितो ग्रन्थ वेदवाक्यार्थबोधकः । वशीकर्तुं यथाजातान् वञ्चनाकुशलेन वै ॥ २० ॥

पाश्चात्याश्च तथा तेषां दीक्षया दीक्षिताः पुनः । तांस्तान्दुस्तर्कहतकान् नैकान् प्रादुरभावयन् ॥ २१ ॥

तैस्सर्वैश्च मम्भूय वेदार्थो मलिनीकृतः । वेदमार्गावसादाय यत्नस्तैः क्रियतेऽधुना ॥ २२ ॥

इनमें से उबर और महीधर ने आचार्य सायण ने सभी वेदों पर

करने वाले प्रामाणिक भाष्यों की रचना की ।

जाता है ॥ ११-१२ ॥

माध्यन्दिन संहिता पर अपने विशिष्ट भाष्यों की रचना की है ॥ १० ॥

प्राचीन भाष्यों का सार - संग्रह करते हुए घोड़े शब्दों में अर्थ को असंदिग्ध रूप से स्पष्ट आजकल जितने भो वेद भाष्यकार हैं, सायण भाष्य उन सबका उपजीव्य है, ऐसा साता शास्त्रों में प्रतिपादित अर्थ की चिन्ता में निमग्न सभी विद्वान् इन भाष्यों को प्रामाणिक ग्रन्थों के रूप में स्वीकार करते हैं । हमारे लिए यह सौभाग्य की बात है कि ये भाष्य आज भी उपलब्ध होते हैं । यदि ये माध्य न उपलब्ध होते, तो वेद के अर्थ का ठीक से ज्ञान न होने के कारण यह सारा जगत् जड़ता के अन्धकार में डूब जाता, इसका कोई भविष्य नहीं रह जाता ॥ १३-१४ ॥ पूर्वकाल में वेद मार्ग को नष्ट - भ्रष्ट करने के लिए बोद्ध प्रभृति नास्तिक जन प्रवृत्त रहे हैं । उन सब प्रयत्नों को पूर्व और उत्तरमीमांसा के विद्वानों ने अपने तर्कों के सहारे विफल कर दिया था ॥ १५ ॥

बहुत समय बीत जाने के बाद फिर स्वामी दयानन्द ने इस सनातन पद्धति में अनेक दोषों की उद्भावना की । यद्यपि इनके aaran जैसे नास्तिक दर्शन का अनुसरण करते हैं, किन्तु इन्होंने अपने को वैदिक धर्मावलम्बी आस्तिक बताकर यह सब किया है । प्रसिद्धि और लोक - सम्मान अर्जित करने के लिए, अपनी पूजा कराने तथा अबोध जनता का हलका मनोरंजन करने के लिए इधर - उधर से जोड़ - तोड़ मिलाकर बिना प्रमाण के सारहीन वेद - बाह्य ग्रन्थ की रचना भाष्य के नाम से की है, जो कि न तो बहुत संक्षिप्त ही है और न अति विस्तृत ही ॥ १६-१८ ॥ मध्य का काम पैदा करने वाले इस ग्रन्थ में अपनी प्रतिभा को ही प्रमाण माना गया है । पूर्व और पर भाग में स्थित सन्दर्भों का भी यहाँ कोई विचार नहीं किया गया है । इस प्रकार वेद के वाक्यों के स्वामीष्ट अर्थ का ज्ञान कराने के लिए इस narare की चना की गई थी । इसको बनाने का मुख्य प्रयोजन अशजों को प्रवचनाय तर्कों के सहारे अपने वश में कर लेना मात्र रहा है || १ ९ -२० ॥ आज के पाश्चात्य विद्रान् और इन्हीं के मत का अनुसरण करने वाले कुछ भारतीय पंडित भी वेदार्थ के सम्बन्ध में अनेक तों को उद्भावना करते हैं ॥ २१ ॥

पृष्ठ 33

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वेदार्थपारिजातः प्रमाणविपरीतोऽपि नूतनो यदि कश्चन । मुह्यन्ति विषये तस्मिन्निति रीतिः श्रिता जनैः ॥ २३ ॥

सामाजिकव्यवस्थायां सक्ता ये देशवासिनः । नास्तिक्यमोहयुक्तास्ते लक्ष्यन्ते परिपन्थिनः ॥ २४ ॥

धर्ममार्गे निरालम्बे आस्तिकाः कान्दिशीकताम् । भजमाना विलोक्यन्ते तेषां धैर्यं कथं भवेत् ॥ २५ ॥

सर्वतः प्रसृतं वीक्ष्य वेदमार्गावसादनम् । सुधीभिस्तन्निरासाय प्रार्थिता वयमद्य वै ॥ २६ ॥

प्राचामाचार्यवर्याणां निकषेषु परीक्षितान् । मीमांसागूढसिद्धान्तसिद्धानर्थान् विचक्ष्महे ॥ २७ ॥

अद्य यावदुपेतानां महतीनां दृढात्मनाम् । शङ्कानामितरासां वा समीक्षा विदध्महे ॥ २८ ॥

वेदाविरोधिनीयुक्तीरशास्त्रश्च समुदाहृताः । आश्रित्य वेदतत्त्वार्थबोधने व्याप्रियामहे ॥ २ ९ ॥ रूपग्रामाभहस्तेषु व्यतीतेषु च विक्रमात् । प्रभवे वह्निदैवत्ये वत्सरे समुपस्थिते ॥ ३० ॥

वसन्ते माधवे शुक्ले तृतीयागुरुवासरे ॥ ३१ ॥

येषां पितृपितामहादिपुरुषा आसन सदा वैदिका ये स्वान्ते परिशीलयन्ति सततं वेदान् सदर्थान्वितान् । वेदद्विभिरुदीरितानभिनवानर्थानुदीक्ष्य स्वयं ये: क्लिश्यन्ति महत्तदर्थमखिली ह्यस्माकमेष श्रमः ॥ ३२ ॥

परम्पराप्रवृत्तस्य न्यायोपेतस्य सर्वशः । प्रीयतामीश्वरोऽर्थस्य तादृशस्य समर्थनात् ॥ ३३ ॥

३ इन सबने मिलकर वेदों के अर्थ को दूधित कर दिया है । आजकल ये लोग वैदिक मार्ग को नष्ट कर देते पर तुले हुए हैं ॥ २२ ॥

आज जनता की यह स्थिति है कि उसके सामने कोई भी नई बात आती है तो यह प्रामाणिक है कि नहीं, इसकी बिना परीक्षा किये उस पर लट्टू हो जाती है ॥ २३ ॥

देश में जो व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था में लगे हुए हैं, वे भी नास्तिकता के मोहपाश में फँसे हुए वेदमार्ग के विरोधी ही प्रतीत होते हैं ॥ २४ ॥

इस प्रकार धर्म का मार्ग निश्चलब्ध हो गया है । आस्तिक जन भय से व्याकुल दिखाई देते हैं । उन्हें कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है । उनको किस प्रकार बंधाया जाय, ऐसा विचार कर आधुनिक समय में वैदिक परम्परा में आये अवसाद का निराकरण करने के लिये विद्वानों की प्रार्थना को स्वीकार कर हम ऊपर वर्णित प्राचीन महनीय आचायों के द्वारा निर्धारित कसौटी पर भली - भाँति पर पद, वाक्य और प्रमाण शास्त्र की व्याख्या का उल्लंघन न करने वाले मीमांसा भाष्य के गम्भीर नियमों से भली - मांति परीक्षित सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले नवीन भाष्य की रचना करना चाहते हैं ॥ २५-२७ ॥ इसमें हम आज तक उठाई गई बड़ी - बड़ी हद शंकाओं और आक्षेपों का सिंहावलोकन करते हुए और भाग्रही जनों के द्वारा उठाई गई व्यर्थ की बातों की समीक्षा करते हुए वेद एवं अन्य शास्त्रों से अविरुद्ध युक्तियों के सहारे वेदों के वास्तविक तस्व को प्रकाशित करना चाहते हैं ॥ २८-२९ ॥ विक्रम के समय से २०३१ वर्ष बीतने पर प्रभव नामक संवत्सर के, जिसके कि देवता वह्नि हैं, उपस्थित होने पर बसन्त ऋतु में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया गुरुवार के दिन यह वेदभाष्य प्रकाशित किया जा रहा है ॥ ३०-३१ ॥ जिनके पिता पितामह प्रभृति पूर्वपुरुष सदा वैदिक धर्म के अनुयायी रहे हैं, जिनके मन में सदा वैदिक सद्विचारों का अनुशीलन चलता रहा है, ऐसे सज्जन व्यक्ति वेद - शास्त्र के साथ द्वेषमान रखने वाले व्यक्तियों के द्वारा भाष्य विरुद्ध अर्थ को सुनकर दुःखी हो जाते हैं । उनके इस क्लेश को दूर करने के लिए ही हमने यह श्रम किया है ॥ ३२ ॥

परम्परा से प्राप्त, सब तरह से न्याय और युक्तियों से परिपूर्ण इस प्रकार के अर्थ का समर्थन करने के इस शुभ कार्य से ईश्वर का प्रसाद प्राप्त हो, यही हमारी प्रार्थना है ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 34

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है वेदार्थपारिजातः अस्माभिर्ग्रथितस्यास्य देववाणीमयस्य वै । लोकानामुपकाराय भवेद् हिन्दीमयोऽपि च ॥ ३४ ॥

कार्येऽस्मिन्विनियुक्ताश्च द्विवेदो व्रजवल्लभः । मार्कण्डेयो ब्रह्मचारी मुसलगांवगजाननः ॥ ३५ ॥

पट्टाभिरामशास्त्री च कार्यस्य परिसाधने । चत्वारस्सुधियरिशष्यास्सता ग्रन्थप्रकाशने || ३६ || आशास्महे शमेतेषां मेधावित्वं पुनर्नवम् । दीर्घमायुर्बलं पुष्टं वैदुष्यच विलक्षणम् || ३७ || निर्विघ्नं साधयन्त्वेते पुण्यं कार्यमिदं महत् । तदर्थं कुर्महे दिव्यां स्मृति नारायणस्य वै ॥ ३८ ॥

प्रमा - प्रमाणलक्षणादिकम् safe विशेषतोऽवधारणीयं यदैहिकामुष्मिकः सर्वोऽपि साध्यसाधनभावः प्रमाणमूलक एव प्रसिद्धयति । प्रमाणञ्च प्रमाकरणमेव । प्रमात्वञ्चानधिगताबाधितविषयज्ञानत्वमेव । वेदान्तरीत्या प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वेऽपि संसारदशायाम-बाधितत्वस्याव्याहतत्वात् । प्रत्यक्षप्रमा चात्र चैतन्यमेव, तस्यैव स्वतोऽपरोक्षत्वात् । यद्यपि तस्यानादित्वेन न तत्करणत्वं चक्षुरादेः सङ्घटते, तथापि तदभिव्यञ्जिकाया अन्तःकरणवृत्तेश्चक्षुरादिजन्यत्वसम्भवेन वृत्तिविशिष्ट चैतन्यस्य सादित्वोपपत्त्या चक्षुरादीनां तत्करणत्वे बाधाभावात् । मनसः सावयवत्वेन मध्यमपरिमाणस्य चक्षुरादिसन्निकर्षद्वारावर के तमस्यपनीते तडागोदकस्य कुल्यात्मना केदारान् प्रविश्य तत्तदाकारवच्चक्षुरादिप्रणालिकया घटादिविषयदेशमुपगतस्य तत्तदाकारतापत्तिः । घटमठयोरिव विभाजकयोरुपाध्योरेकदेशस्थत्वेन विभेदाजनकत्वादुपहितयोरभेद एव । तथा च वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यस्य विषया-बच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वमेव घटांशे घटज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्, विषयस्य तु प्रमातृचैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावत्वमेव प्रत्यक्षत्वम् । घटादेः स्वावच्छिन्न चैतन्येऽध्यस्ततया विषयचैतन्यसत्तैव घटादिसत्ता, अधिष्ठानसत्तातिरिक्ताया आरोपित-सत्ताया अनङ्गीकारात् । हमारे द्वारा संस्कृत भाषा मे रचे गये इस भाग्य का हिन्दी भाषा में भी अनुवाद हो जाय, जिससे कि जनसाधारण का भी उपकार हो सके, इस कार्य में हमने शिष्य कोटि में प्रविष्ट, भली - भाँति परीक्षित सर्वश्री पट्टाभिराम शास्त्री, व्रजवल्लभ द्विवेदी, मार्कण्डेय ब्रह्मचारी एवं गजानन मुसलगांवकर इन चार विद्वानों को लगाया है । हम इनका कल्याण चाहते हैं और चाहते हैं कि इनमें नूतन सेवा -शक्ति का प्रादुर्भाव हो । ये लोग इस कार्य को निर्विघ्न पूरा कर सके, इसके लिए हम भगवान् नारायण को स्मरण करते हैं ॥ ३४-२८ ॥ प्रमा और प्रमाण का लक्षण विशेष रूप से यह समझने का विषय है कि सभी साध्यसाधनभाव चाहे वह ऐहिक या आमुष्मिक हों, वे प्रमाण मूलक ही सिद्ध होते हैं । प्रभा का करण ही प्रमाण है । प्रमा वह ज्ञान है जो कि अज्ञात और अबाधित विषय को ग्रहण करता है | अद्वैत सिद्धान्त I वस्तुतः प्रपंच मिथ्या है, किन्तु व्यावहारिक दशा में वह बाधित नहीं है । इस मत में प्रत्यक्ष प्रमा चैतन्य है, उसी का अपरोक्ष ज्ञान होता है और यह अनादि है । अत: इसका कोई कारण नहीं है । यद्यपि प्रत्यक्ष में चक्षु आदि इन्द्रियाँ कारण होती हैं, तथापि वै करण नहीं है, चैतन्य की अभिव्यक्ष अन्तःकरण वृत्तियों की करण होने से वृत्तिविशिष्ट चैतन्य की करण कहलाती हैं । जैसा कि तालाब का जल कुषा द्वारा खेतों में प्रवेश कर तत्तदाकार को प्राप्त करता है, उसी प्रकार तालाब स्थानीय अन्तःकरण से इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न रूप वुशियाँ निकल कर विषय देश ( जो कि खेतों के स्थानापन्न ) को प्राप्त कर विषयाकार बन जाती है । जैसा कि घट, म १. मीमांसक मत में ' यजेत ' ' जुहुयात् ' इत्यादि स्थलों में दिवाच्य शाब्दो भावना मित्य होते हुए भी उसका करण लिङ्गादिज्ञान माना जाता है । लिङ्गादिज्ञान गान्दी भावना का उत्पादक नहीं है, किन्तु शादी भावना को भाय प्रवृत्ति अर्थात् are meet का उत्पादक होकर शाब्दी भावना का करण कहलाता है । उसी प्रकार इन्द्रियों f नत्य चैतन्य को उत्पादक नहीं हैं, किन्तु चैतन्य से सम्बद्ध अन्तःकरण की वृत्तियों को aaree होकर वृतिविशिष्ट चैतन्य की करण कहलाती हैं ।

पृष्ठ 35

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वैवार्थपारिजातः यथा प्रकाशः स्वतः प्रकाशते तदन्यत्तु तत्संसर्गेण चैतन्यस्यासङ्गत्वेन तस्याध्यासिकसंसर्गमन्तरा नान्यः संसर्गः सम्भवतीति विषयस्य विषयावच्छिन्न चैतन्ये नाध्यासिकसम्बन्धसत्वेऽपि न प्रमातृचैतन्येन तत्सम्बन्ध इति तत्संसर्गसाधनायैव चक्षुरादिव्यापारः । अन्तःकरणघटयोरेकदेशस्थत्वेनान्तःकरणावच्छिशचैतन्यरूपप्रमातृ चेतन्येन विषयावच्छिन्नचैतन्यरूप-प्रमेयचैतन्यस्यैक्यं भवति । तथा च विषयावच्छिन्नचैतन्याध्यस्तमपि घटादिकं प्रमातृचैतन्याध्यस्तं भवति । तावतैव विषयस्य प्रमातृचैतन्येनाध्यासिकसंसर्गत्वात् चैतन्येन घटादिविषयप्रकाशः सम्पद्यते । अनुमित्यादिस्थले तु चक्षुराद्यसंसर्गेणान्तःकरणस्य वह्न्यादिदेशगमनाभावेन विषयान्तःकरणाभेदाभावेन न प्रत्यक्षत्वम्, किन्तु व्याप्तिज्ञानादिजन्या परोक्षवृत्तिरेव जायते । सुखाद्यवच्छिन्न चैतन्यस्य तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य च नियमेनैकत्र-स्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वान्नियमेनाहं सुखीत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वमेव । धर्मान्तःकरणनिष्ठत्वेऽप्ययोग्यत्वादेव शब्दादिना तदाकारवृत्ती जातायामपि न वृत्तितदवच्छिन्न चैतन्ययो-रभेदः, योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणात् । योग्यत्वायोग्यत्वयोस्तु फलबल कल्प्यस्वभात्वस्यैव शरणत्वात् । वर्तमानदशायां त्वं सुखीति वाक्यजन्यस्यापि ज्ञानस्य प्रत्यक्षतेव । अत एव ' दशमस्त्वमसि ' इतिवत् ' तत्वमसि ' इति महावाक्यजन्यस्याप्यहं ब्रह्मेति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वमेव । ' रूपी घट: ' इत्यत्र रूपाकारवृत्तिदशायां तत्र परिमाणसत्त्वेऽपि परिमाणाद्याकारवृत्त्यभावेन परिमाणाद्याकारवृत्त्यु-पहितप्रमातृचैतन्याभेदाभावेन न तत्प्रत्यक्षता | रूपी विभिन्न उपाधियों एक अधिष्ठान ( आकाश ) में रहने से तदुपहित का अभेद सिद्ध है, उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियों से उत्पन्न अत: करण वृत्तियाँ और घट, मठ नादि विभिन्न विषयों से उपहित वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य और विषयावच्छिन्न चैतन्य अभिन्न हैं, यही प्रत्यक्ष है | अतः वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य और विषयावच्छिन्न चैतन्य का अभेद ही घट - ज्ञान का प्रत्यक्ष है । घटादि विष और उसका प्रत्यक्ष प्रमातृ चेतन्य मत्ता में अतिरिक्त सता का अभावात्मक है, क्योकि अधिष्ठान सत्ता से अतिरिक्त मारोपित सत्ता नहीं मानी जाती । जैसा कि स्वयंप्रकाशमान है, उससे भिन्न घट, मठ आदि पदार्थ प्रकाश के संबन्ध से प्रकाशमान है, उसी प्रकार प्रकाशस्वरूप चैतन्य स्वयं प्रकाश है, उसके संसर्ग ने अन्य वस्तु भासमान है | इतना अन्तर है कि सूर्य प्रकाश का संसर्ग घट आदि के साथ क्तृप्त है, चैतन्य अङ्गहै ( अर्थात् किसी अन्य पदार्थ से संसर्ग नहीं रखने वाला ), अत: उसका संसर्ग असिद्ध होने से आध्यामिक संसर्ग कल्प्य है । father for सर्व नहीं बनता । घट आदि का यह संसर्ग विषयावच्छिन्न चेतन्य के साथ संभव होते हुए भी प्रमातृ वैतथ्य के साथ संभव नहीं है । इसकी सिद्धि में ही चक्षु आदि इन्द्रियों का व्यापार है । इससे अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यरूपी प्रमातृ चैतन्य एवं विषयान् चैतन्यरूपी प्रमेव चैतन्य का ऐक्य सिद्ध होता है तो विपयावच्छिन्न चैतन्य में अध्यस्त घटादिक प्रमातृ चेतन्य में अध्यस्त हो जाता हूं । अतः घट आदि विषय के साथ चेतन्य का संबन्ध और घट आदि का प्रकाश सिद्ध हुआ । अनुमिति स्थल में ह्नि का प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि चक्षुःसंयोग वह्नि के साथ अविद्यमान हैं । अतः अन्तःकरण वह्नि देश तक नहीं जा सका । किन्तु व्याप्तिज्ञान परामर्श आदि से उत्पन्न परोक्ष वृत्ति ही है । ' अहं सुखो ' इत्यादि स्थलों में ज्ञान प्रत्यक्ष है, क्योंकि सुखादि विषयावच्छिन्न चैतन्य और तद्वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य की स्थिति एक देश में विद्यमान है । धर्म और अधर्म अन्तःकरण में रहने वाले हैं, अर्थात् अतीन्द्रिय हैं । अत एव शब्द के द्वारा अन्तःकरण की तदाकारावृत्ति हो कर भी योग्यता न होने से वृत्ति विषयावच्छिन चैतन्य का अभेद नहीं है । घट, मठ आदि ऐन्द्रियक हैं, अत एव वे योग्यता वाले हैं, धर्म और अधर्म अतीन्द्रिय है, अतः उनमें योग्यता नहीं है । योग्यता भी विषय का विशेषण है । फल बल से योग्यता और अयोग्यता का निर्णय करना पड़ता है । उस प्रकार का स्वभाव ही इसमें दारण है । ' ल्वं सुखी ' वाक्य से वर्तमान काल में उत्पन्न ज्ञान भी प्रत्यक्ष है | अतः ' तत्वमसि ' महावाक्य से उत्पन्न ' अहं ब्रह्म ' इत्याकारक ज्ञान भी ' दशमस्त्वमसि ' के समान प्रत्यक्ष ही है । ' रूपी घट: ' में अन्तःकरणवृति रूपाकारा है । रूपाधिकरण घट में परिमाण विद्यमान होने पर भी परिमाणाकार अन्तःकरण वृत्ति न होने से परिमाणाकार बन्तःकरणवृत्त्युपहित प्रमातृ चैतन्य का अभेद सिद्ध नहीं है । अत: परिमाण प्रत्यक्ष नहीं है ।

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६ वेदार्थपारिजातः सांख्यादिदृष्ट्या प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणमिति व्युत्पत्त्या प्रमां प्रति करणत्वमेव प्रमाणलक्षणम् । असन्दिग्धाविपरी-तानधिगतविषया चित्तवृत्तिः प्रमाणम् । बोधश्च पौरुषेयः फलं प्रमा । एतेन संशयविपर्यस्मृतिसाधनेषु नातिव्याप्तिः । चैतन्य-प्रतिबिम्बविशिष्टबुद्धिवृत्तिः, वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यं वा फलपदार्थः । स एव मुख्यप्रमापदवाच्यः । तत्करणत्वेन वृत्तेः प्रमाण-त्वम् । वृत्तिकरणत्वेनेन्द्रियादीन्यपि प्रमाणपदवाच्यानि भवन्ति । प्रत्यक्षप्रमाणविचार: नैयायिकादिरीत्या विन्द्रियत्वेन रूपेणेन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । अनुमितौ व्याप्ति ज्ञानस्य, शाब्दे पदज्ञानस्य स्मृतावनुभवस्य कारणत्वात् तत्र नाव्याप्तिः । इदञ्चेश्वरज्ञानसाधारणं लक्षणम् । पूर्व तद्व्यावृत्त-मेव । आलोके सति महत्त्वे सति उद्भूतरूपवत्त्वं चाक्षुषद्रव्यप्रत्यक्षत्वे कारणम् । द्रव्यसमवेतरूपप्रत्यक्षे तु स्वाश्रयसमवाय-सम्बन्धेन, द्रव्यसमवेतसमवेतरूपत्वादेः प्रत्यक्षं तु स्वाश्रयसमवेतसमवायसम्बन्धेनेति । एवं गन्धप्रत्यक्षे घ्राणसंयुक्तसमवायः, गन्धसमवेतस्य प्रत्यक्ष घ्राणसंयुक्तसमवेतसमवायः कारणम् । शब्दप्रत्यक्षे श्रोत्रावच्छिन्नसमवायः कारणम् । शब्दसमवेत-श्रावणप्रत्यक्ष श्रोत्रावच्छिन्नसमवेतसमवायः कारणम् । वेदान्तरीत्या वृत्तिजननेऽप्येतेषां सम्वन्धानामुपयोगः । सांख्यदृष्ट्या प्रतिविषयाव्यवसायः प्रत्यक्षलक्षणम् । श्रीमद्भागवते त्वेकादशवृत्तयोऽङ्गीकृताः-एकादशासत् मनसो हि वृत्तय आकूतयः पञ्च धियोऽभिमानः । मात्राणि कर्माणि पुरच तासां वदन्ति हैकादश वीर भूमी: ॥ ( ५११११२ ) सांख्य ' प्रमीयतेऽनेन ' इस व्युत्पत्ति से प्रसाकरण को प्रमाण मानते हैं । प्रमाकरणत्व ही प्रमाण का लक्षण है । असन्दिग्ध, विपरीत और अनधिगत पदार्थ को विषय करने वाली चित्तवृत्ति प्रमाण है । अत: संशय - विपर्यय - स्मृतियों में लक्षण की अतिव्यासि दोष नहीं है । बोध पौरुषेय और प्रभा फल है । चैतन्य प्रतिविम्ब विशिष्ट बुद्धिवृत्ति अथवा बुद्धिवृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य फलपदार्थ है । मुख्य प्रभा यही है, इसका कारण बुद्धिबुति है, बुद्धिवृत्ति की कारण हैं - इन्द्रियां । अतः बुद्धिवृत्ति और इन्द्रियां भी प्रमाण कहलाती हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण विचार ¿ नैयायिकों ने इन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष माना है, परन्तु यह जीवों के प्रत्यक्ष ज्ञान का लक्षण है । ईश्वर प्रत्यक्ष में यह लक्षण नहीं घटता, अतः अव्याप्ति दोषग्रस्त होने से प्रत्यक्ष ज्ञान का दूसरा लक्षण है कि-- जिसका ज्ञान करण नहीं है, वह ज्ञान प्रत्यक्ष है । अनुमिति में व्याप्तिज्ञान, शाब्द बोध में पदज्ञान, स्मृति में अनुभवज्ञान करण हैं । अतः इन स्थलों में प्रत्यक्ष लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है | यह द्वितीय लक्षण ईश्वरज्ञान साधारण है, प्रथम लक्षण ईश्वर ज्ञान व्यवृत्त है | ( क्योंकि प्रथम लक्षण में ' इन्द्रियत्वेन रूपेण ' उनसे उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष माना है । ईश्वर अशरीरी हैं; उनके इन्द्रियाँ नहीं हैं । अतः प्रथम लक्षण तव्यावृत्त है ) द्रव्य चाक्षुष प्रत्यक्ष में आलोक ( प्रकाश ) एवं महत्त्वसहकृत उद्भुतरूप कारण है । द्रव्य गत रूप प्रत्यक्ष में स्वाश्रयसमवाय सम्बन्ध से, ( एवं रूप, तदाश्रय द्रव्य तत्समवेत रूप ) द्रव्यसमवेत पदार्थ में समवाय संबन्ध से विद्यमान रूपत्व के प्रत्यक्ष में स्वाश्रयसमवाय सम्बन्ध से, ( स्वरूप, उसका आश्रय द्रव्य, तत्समवेत रूप, रूप में समवेत रूपत्व ) कारण है । इसी प्रकार गन्धादि प्रत्यक्षों में भी पूर्वोक्त संबन्ध लागू होंगे । एवं शब्द प्रत्यक्ष में श्रभावच्छिन्न समवाय, शब्दसमवेत शब्दत्व के प्रत्यक्ष में श्रोत्र समवेत समवाय कारण है । तियों के मत में इन ज्ञानों की उत्पत्ति वृत्तियों द्वारा होती है, उन वृत्तियो के जनन में पूर्वोक्त संबन्धों का उपयोग है । सांख्य दर्शनकारों ने प्रतिविषय निश्चय को प्रत्यक्ष का लक्षण कहा है । श्रीमद्भागवत में प्रत्यक्ष के प्रति यारह वृत्तियाँ प्रतिपादित हैं --- ' एकादशासन मनसों हि वृत्तयः । पाँच ज्ञानेंद्रिय पाँच कर्मेन्द्रिय और मत | इस प्रकार ग्यारह इन्द्रियाँ और इनके द्वारा रूपादि ग्रहण में वर्तमान प्रमाता के लिए ग्यारह वृत्तियों का उपयोग है । इनमें आकृति क्रियाकारा वृत्तियाँ पत्र, ज्ञानाकारा वृत्तियाँ पाँच, अभिमान - सन, शब्द रसादि ज्ञानेन्द्रियों के विषय विसर्गादि कर्म और इ rer अधिष्ठान पुरन्वशरीर, ये सब इन एकादश वृत्तियों के विषय है । वीर पद संबोधन है ।

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वेदार्थपारिजातः श्रोत्रादीनि दा, एकच स्वयं मन इत्येकादशेन्द्रियाणि तैरिन्द्रियैर्बही रूपादिषु प्रवर्तमानस्यैकादशवृत्तयो भवन्ति । तदुकम् एकादशेन्द्रियद्वारा स्युरेकादा वृत्तयः । नत्राकूतयः क्रियाकाराः पञ्च धियो ज्ञानाकाराः पञ्च अभिमानश्च मात्राणि शब्दादयो विषयाः, विसर्गादीनि कमणि पुरं शरीरम्, तासां वृत्तीनां भूमीविषयान् वदन्ति । वीरेति सम्बोधनम् । अन्यत्र च श्रीमद्भागवते जायदादयोऽवस्था अपि बुद्धिवृत्तिरूपा एवांता: -जाग्रत्स्वप्नः सुपुवि गुणतो बुद्धिवृत्तयः । तासां विलक्षणो जीवः साक्षित्वेन विनिश्चितः ॥ ( श्री ० भा ० ११ १३/२७ ) मत्त्वोद्रेके प्रारूपा वृत्तयो भवन्ति । रजसा दोपेश्व संशयविपर्ययौ भवतः । तमसा निद्रारूपा वृत्तिर्जायते । दैवस्य फलाभिमुखस्य प्राक्तनकर्मणो देवस्य देवसमूहस्य परमेश्वरस्य देहादेश्व सर्वकार्येष्विवात्रापि हेतुत्वम्, अधिष्ठानं तथा कर्ता करणश्च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक् चेष्टा देवश्चैवात्र पञ्चमम् ॥ ( १८।१४ ) इति श्रीमद्भगवद्गीतावचनात् । अनुमानप्रमाणविचारः ननु प्रत्यक्षेणैव सर्वव्यवहारोपपत्तौ तदतिरिक्तानुमानादिप्रमाणोपगमो व्यर्थ एव न च देहातिरिक्तात्मपरमात्म-स्वर्गमोक्षादिसिद्ध्यर्थं तदुपगम इति वाच्यम्, तत्सिद्धेरेवासिद्धेः । न चानुमानादिसमुत्पत्ति संभवः, यतो व्याप्तिपक्षधर्मताशालि लिङ्गमनुमितिकारणमित्यनुमानप्रामाण्यवादिभिरुपेयते । व्याप्तिश्वोपाधिविधुरः सम्बन्ध एव । म च न चक्षुरादिवत्सत्तया हेतुत्वमुपगच्छति, किन्तु ज्ञाततयैव । न च तत्र प्रत्यक्षप्रसरः, तस्य वर्तमानगोचरत्वेन भूतभविष्यतोस्तदसम्भवात् । नाप्यनुमानं व्याप्तिज्ञानोपायः तत्राप्येवमित्यनवस्थानात् । नापि शब्दस्तत्साधनम् तस्यापि वृद्धव्यवहाररूपलिङ्गावगतिसापेक्षतया पूर्वोन्नदूषणग्नासात् । न च वचनमात्रविश्वासेन धूमवयोरविनाभावनिश्चयः । न वा विविधदेशकालवर्तिधूमवह्निव्यक्तिज्ञान-श्रीमद्भागवत में ही बुद्धि वृत्ति रूप से जाग्रवादि अवस्थायें प्रतिपादित हैं । सत्व, रज और तम के भेद से जागत् स्वप्न और सुपुति ये तीन वृतियाँ हैं । जीव इनके कार्यों में साक्षी होकर रहता है ।, सव के आधिक्य से प्रमा रूपी, रज और दोषों से संशय एवं विपर्यय रूपी, तम से निद्रारूपी वृत्तियाँ होती है । सभी कार्यो atr और देहादिक कारण हैं । देव तीन प्रकार का है -- फलाभिमुख देव, प्राक्तन कर्म रूपी देव एवं देवसमूह परमेश्वर रूपी देव | यहू श्रीमद्भगवद्गीता के इस वचन से सिद्ध है- ' अधिष्ठान अर्थात् शरीर, कर्ता जीवात्मा, भिन्न भिन्न व्यापार वाली इन्द्रियाँ और नाना प्रकार की प्राण वायु की चेष्टानों के साथ पाच कारण देव ये सभी मिलकर ही किसी कार्य को पूरा करने में सहायक होते हैं । " अनुमान प्रमाण विचार यहाँ प्रश्न होता है कि केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सभी प्रकार के लोक व्यवहार की निष्पत्ति हो जाती है तो इससे भिन्न अनुमान आदि प्रमाणों को मानना व्यर्थ है लिये भी अनुमान की आवश्यकता नहीं है ।शरीर से भिन्न आत्मा - परमात्मा, स्वर्ग - मोक्ष आदि तो हैं ही नहीं, अतः इनकी सिद्धि के । अनुमान आदि की उत्पत्ति भी नहीं हो सकती, क्योंकि अनुमान को प्रमाण मानने वाले व्याप्ति और पक्षता से युक्त हेतु की हो अनुमिति में कारण सानते हैं । के frents सम्बन्ध को व्याति कहा जाता है । वह चक्षुरादि के समान केवल अपनी सत्तामात्र से हेतु नहीं होती, किन्तु उसका ज्ञान भी आवश्यक है । इस उपाधिरहित सम्बन्ध का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष वर्तमान का ही होता है, भूत और भविष्य का ज्ञान उससे नहीं होता । व्याति का ज्ञान अनुमान से भी नहीं होगा, ऐसा मानने पर अनवस्था हो जायगी । शब्द प्रमाण से भी इसका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द प्रमाण भी वृद्ध - व्यवहार रूप लिङ्ग ज्ञान की अपेक्षा रखता है, इस प्रकार यहाँ पर मी पूर्ववत् अवस्था दोष आवेगा । किसी की बात पर विश्वास कर लेने मात्र से घूम और बह्नि का अविनाभाव नहीं ज्ञात हो जायगा | fafar देश और काल में विद्य

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वेदार्थपारिजात: सम्भवः, तदभावे च कुतो व्याप्तिग्रहः । उपाध्यभावोऽपि दुर्बोधः । उपाधीनां प्रत्यक्षत्वनियमासम्भवेन प्रत्यक्षाणामुपाधीनाम-भावस्य प्रत्यक्षत्वेऽप्यप्रत्यक्षाणामुपाधीनामभावस्याप्रत्यक्षतयाऽनुमानाद्यपेक्षायामुक्तदूषणानतिवृत्तेः । किञ्च साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वमुपाधिलक्षणमास्थीयते । तत्रोपाधिज्ञानार्थमपि साध्यव्यापकत्वज्ञानमपेक्षितम्, तदपि च व्याप्तिज्ञाना-atra कुतो नान्योन्याश्रयतेति चेन्न, तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामविनाभावस्य सुज्ञानत्वात् 1 । तदुक्तम्—

कार्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न न दर्शनात् ॥

कार्यकारणभावेऽपि व्यभिचारशङ्का भवत्येवेति वाच्यम्, कारणं कार्यव्यभिचारि स्यात् चेत्, तर्हि कारण विना कार्यमुत्पद्येत । न च कारणमन्तरा कार्यमुत्पद्यते दृष्टविरोधादिति व्यभिचारशङ्कानिवर्तकस्य तर्कस्य सत्त्वात् । तदेवाशङ्क्यं यस्मिन्नाशङ्कयमाने व्याघातादयो न भवेयुः । अत्र तु भवत्येव व्याघातः । कार्यस्य कारणोत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः, कारणोपलम्भे सति कार्योपलम्भः कारणानुपलम्भादनुपलम्भश्चेति धूमवह्नयोः कार्यकारणभावोपलम्भः । मान धूम और वह्नि की व्याप्ति का ज्ञान सम्भव भी नहीं है, उसके बिना व्याप्ति का ग्रहण कैसे हो सकता है? यहाँ कोई उपाधि नहीं हैं, यह जान पाना भी कठिन है | सभी उपधियों प्रत्यक्ष ही हों, यह कोई जरूरी नहीं है । ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष उपाधियों का भले ही ज्ञान हो जाय, किन्तु जो उपाधियों प्रत्यक्ष नहीं हैं, उनके अभाव का बोध प्रत्यक्ष से नहीं हो सकता, अनुमान आदि प्रमाणों का सहारा लेने पर पूर्ववतु मनवस्था दोष यहाँ भी पिण्ड नहीं छोड़ेगा । अपि च, उपाधि उसको कहा जाता जो साध्य का व्यापक होकर साधन का व्यापक हो । ' इस प्रकार उपाधि को समझने के लिये भी साध्य से उसकी व्यापकता को समझना जरूरी है और यह व्याप्ति ज्ञान के हो जाने पर ही सम्भव है । यहाँ पुनः अन्योन्याश्रय दोष उपस्थित होता है । इस पूरे पूर्वपक्ष का निराकरण इस प्रकार हो जाता है कि अविनाभाव सम्बन्ध का ज्ञान तादात्म्य और तदुत्पत्ति के द्वारा सरलता से हो जाता है । निम्न श्लोक में यही बात कही गई हैं-afarna सम्बन्ध का ज्ञान दर्शन और अदर्शन के आधार पर न होकर कार्यकारणभाव अथवा स्वभाव को नियामकता के आधार पर होता है । अर्थात् किसी वस्तु के स्वभाव को देखकर उसी स्वभाव की वस्तु के साथ उसका अविद्याभावज्ञान होता है और इसी प्रकार कार्यकारणभाव के आधार पर मा किसी पदार्थ की किसी से उत्पत्ति देखकर उसके साथ उसका अविनाभाव सम्बन्ध जाना जाता है । कार्यकारण सम्बन्ध की उपस्थिति में भी यह शंका उठ सकती है कि कार्य और कारण का व्यभिचार हो सकता है, अर्थात् एक दूसरे के बिना भी इनकी स्थिति रह सकती है, किन्तु इसका समाधान इस तरह से हो जाता है कि यदि कारण का कार्य से व्यभिचार होता, तो बिना कारण के भी कार्य हो सकता था, किन्तु ऐसा देखा नहीं गया कि बिना कारण के भी कोई कार्य हुआ हो | इस तर्क के सहारे उक्त व्यभिचार की शंका दूर हो जाती है । आशंका वही उचित कही जा सकती है, जिसके कि उठते पर उसमें आगे व्याघात आदि दोष न आवे | यहाँ पर तो उठाई गई शंका का बाद में उपस्थित तर्क के द्वारा व्याघात बाब ) हो जाता है । कारण की सत्ता के पहले कार्य की उपलब्धि नहीं होती । कारण की उपलब्धि के बाद ही कार्य की उपलब्धि होती है और कारण के उपलब्ध न होने पर कार्य की भी उपलब्धि नहीं होती । इसी प्रकार धूम और वह्नि का भी कार्यकारणभाव ज्ञात हो जाता है । १. पर्वतो धूमवान् बद्ध, इस अनुमान में ' आम्बनसंयोग ' उपाधि दिया जाता है । यहाँ साध्य धूम है । उसका व्यापक है आन्धन-संयोग, क्योंकि जहाँ जहाँ घूम है, वहाँ वहाँ आर्द्रेन्धनसंयोग अवश्य है । अत: साध्य घूम का आशनसंयोग व्यापक हुआ, एवं यहाँ साधन यहि है, उसका यह आईन्यमसंयोग अव्यापक हैं । जहाँ जहाँ वह्नि है वहाँ वहाँ मान्नसंयोग नहीं है, अगोलक में ह्नि है, किन्तु आनसंयोग नहीं है । अत: साधन वह्नि का आन्धनसंयोग अव्यापक है । यही नपाधिका स्वरूप है ।

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वेदार्थपारिजातः एवमेव यदि निम्बो वृक्षत्वमतिपतेत्, तर्हि स्वात्मानमेव जह्यादिति विपक्षे बाधकप्रवृत्तेः । निम्बवृक्षयोस्तादात्म्य-निश्चयस्तु निम्बो वृक्ष इति सामानाधिकरण्यबलात् । नह्यत्यन्ताभेदे तत्सम्भवति, पर्यायत्वेन यौगपद्येन तयोः प्रयोगा-सम्भवात् । नाप्यत्यन्तभेदे, गवाश्वयोरनुपलम्भात् । नैयायिकरीत्या तु सामान्यलक्षणप्रत्यासत्त्या धूमत्वेन सन्निकर्षेण धूम इत्येवं सकलधूमविषयकं ज्ञानं जायते । त्वेन सन्निकर्षेण वह्नय इति सकलवह्निविषयकं ज्ञानं भवति, तेन व्याप्तिज्ञानं नासम्भवमिति । अपि चानुमानं न प्रमाणमित्यत्र किमपि प्रमाणमस्ति न वा? नान्त्यः, प्रतिज्ञामात्रेण तदसिद्धेः । अनुमानप्रामाण्यं तु न वक्तुं शक्यते त्वया तदनभ्युपगमात् । किञ्च नानुमानं प्रमाणमिति वदता चार्वाकेण कथमन्यगता विप्रतिपत्तिः, प्रतिपित्सा, संशीतिर्विपरीतावगतिरनवगतिश्च प्रत्यक्षेणावगन्तुं शक्या? अनुमानन्तु तेन नाभ्युपगम्यते । अनवधृताज्ञानसंशय-विपर्ययस्तु यं कञ्चनप्रति प्रतिपादयितुं प्रवर्तमानः प्रमत्त एव स्यात् । मुखाकृत्या, व्यवहारेण, वचनेन वा तदनुमानेऽनुमान-प्रामाण्याभ्युपगम एव बलाच्छिरसि निपतितः । एवमेव शब्दप्रामाण्याभ्युपगमोऽप्यावश्यकः । शब्दप्रमाणविचार: बौद्ध वैशेषिकश्चानुमानव्यतिरेकेण शब्दस्य प्रामाण्यं नाभ्युपगच्छतः । तथाहि-- शब्दोऽनुमानान्नातिरिच्यते, तादात्म्य स्थल में आने वाली आशंका का परिहार भी इसी तरह की ---- नींब वृक्षपने को यदि छोड़ दे तो उसका स्वरूप ही नष्ट हो जायगा, विपक्ष में इस तर्क की प्रवृत्ति बाधक होगी । नींब और वृक्ष इन दोनों में तादात्म्य का निश्चय ' निम्बो वृक्ष: ' ( निम्ब वृक्ष है ) इस सामानाधिकरण्य के सहारे होता है । अत्यन्त अभेद में तादात्म्य नहीं होता, क्योंकि दोनों शब्द पर्यायवाची हो जायेंगे, तब इनका एक काल में प्रयोग सम्भव नहीं होगा । अत्यन्त भेद होने की अवस्था में भी तादात्म्य नहीं हो सकता, जैसे कि गो और अश्व शब्द का तादात्म्य नहीं होता । ों के मत से तो सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति के सहारे घूमत्व जाति के संनिकर्ष से सामान्य धूम के रूप में सफल वृम का और वह्निव जाति के संनिकर्ष से ( देश और काल के प्रतिबन्ध से रहित ) सामान्य वह्नि का ज्ञान हो जाता है । अत: ( इनके मत में भी ) व्याति का ज्ञान असम्भव नहीं है । आप जो कहते हैं कि अनुमान प्रमाण नहीं है, इसमें कोई प्रमाण है या नहीं? यदि कोई प्रमाण नहीं हैं, तो केवल आपके कह देने मात्र से वह बात नहीं मानी जायगी । यदि है तो क्या? अनुमान प्रमाण माप दे नहीं सकते, क्योंकि आपने अनुमान को प्रमाण नहीं माना है, दूसरी बात ऐसी है कि चार्वाक यदि अनुमान को प्रमाण नहीं मानता तो वह दूसरे की असहमति, सहमति, संशय, विपरीत ज्ञान और अज्ञान को केवल प्रत्यक्ष के सहारे कैसे समझेगा, अनुमान को तो वह मानता नहीं । जब तक यह ज्ञान न हो जाय कि दूसरे को किस प्रकार का अज्ञान, संशय अथवा विपरीत ज्ञान है, दूसरे का अज्ञान, संशय अथवा विपरीत ज्ञान बिना जाने कुछ कहने वाले व्यक्ति पागल ही हो सकते हैं । मुँह की आकृति, व्यवहार और वाणी से दूसरे के मनोभावों को अनुमान के द्वारा समझा जा सकता है । इस प्रकार न चाहते हुए भी आपके सिर पर अनुमान को प्रमाण मानने का बोझ आ जाता है, क्योंकि यह सब अनुमान के हो प्रकार हैं । शब्द प्रमाण विचार इसी तरह शब्द का भी प्रामाण्य अनिवार्य रूप से मानना पड़ता है । बौद्ध और वैशेषिक शब्द का अनुमान प्रमाण में ही अन्तर्भाव करते हैं । वे अनुमान से अतिरिक्त शब्द को स्वतन्त्र प्रमाण नहीं मानते | यह बात इस अनुमान से सिद्ध होती है कि शब्द अनुमान से अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि दोनों का विषय एक ही है और २

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१० तदभिन्नविषयत्वात् तदभिन्नसामग्रीसमन्वितत्वाच्च यदेवं तत्तथा यथा कुतश्चिदनुमानादनुमानान्तरम् । न च शव्दस्य तदभिन्नविषयत्वमसिद्धम्, शब्दानुमानयोरविशेषेण सामान्यगोचरचारित्वात् । सदुक्तम्-परोक्षविषयत्वं हि तुल्यं तावद् द्वयोरपि । सामान्यविषयत्वञ्च सम्बन्धापेक्षणाद् द्वयोः || अगृहीतेऽपि सम्बन्धे नैकस्यापि प्रवर्तनम् । सम्बन्धश्च विशेषाणामानन्त्यादतिदुर्गमः ॥ यथा प्रत्यक्षतो धूमं दृष्ट्वाऽग्निरनुमीयते । तथैव शब्दमाकर्ण्य तदर्थोऽप्यवगम्यते ॥ ( न्या. मं. १५२ ) ज्ञानहेतुत्वाच्च, अतथात्वे अतिप्रसङ्गात् । सम्बद्धमर्थं प्रतिपादयन् शब्दो न लिङ्गतामतिवर्तते, धूमादिवत् । शब्दस्यार्थप्रतीतो सम्बन्धस्मृत्यपेक्षत्वात्तत्सामग्रीसमन्वितत्वमपि सिद्धमेव । यो हि शब्दो लोके यत्रार्थे दृश्यते स तत्रैव प्रयुज्यते, यत्र न दृश्यते तत्र न प्रयुज्यते । तदेवमन्वयव्यतिरेकौ च । अयं धूमान् धूमत्वात् पूर्वोपलब्धधूमवद् इतिवद विवक्षितशब्दोऽर्थवान् शब्दत्वात् पूर्वोपलब्धशब्दवद् इति पक्षधर्मता च । धूमं दृष्ट्वा प्रत्येति तथा शब्दं श्रुत्वा तदर्थं प्रत्येति । अभ्यस्तविषये दृष्टान्तनिरपेक्षत्वञ्चो भयोरविशिष्टम् । यथा प्रसिद्धाविनाभावस्य लिङ्गदर्शन प्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यामतीन्द्रियेऽर्थेऽनुमानं भवति, ज्ञातेऽव्यभिचारिसम्बन्धे शब्दादर्थोऽव-गम्यते । तेन धूम इव लिङ्गमेव शब्दः । free शब्दो विवक्षायामेव प्रमाणं न बाह्य, व्यभिचारात्, अत एवाङ्गुल्यग्रे करिणां शतमिति प्रतीतिविरोधान्न प्रमाणम् । तदप्युक्तम् ---दोनों की सामग्री भी एक ही है, जो ऐसा होता है वह उससे भिन्न नहीं होता, जैसे कि एक अनुमान से दूसरा अनुमान | समान रूप से शब्द और अनुमान सामान्य विषय को ग्रहण करते हैं, अतः इन st afra विषयता असिद्ध नहीं है । इसीलिये न्यायमञ्जरीकार जयन्त सट्ट ने कहा है कि सम्बन्ध को बिना जाने किसी की प्रवृत्ति नहीं हो सकती । विशेष अनन्त हैं, अतः उनका सम्बन्ध जान पाना बड़ा कठिन है, अतः सामान्य का ही सम्बन्ध गृहीत होता है । जैसे प्रत्यक्ष रूप से सामान्य धूम को देखकर सामान्य अग्नि का अनुमान होता है, उसी तरह शब्द सामान्य को सुनकर उसके अर्थ का अवगम होता है । अनुमान और शब्द दोनों ही पक्ष अर्थ से सम्बद्ध हैं, इसी तरह समान रूप से दोनों सामान्य से सम्बद्ध हैं और परोक्ष अर्थ में हानि में कारण है, यदि ऐसा नहीं होगा तो अतिव्याप्ति दोष पड़ेगा । शब्द अपने से सम्बद्ध अर्थ का ही प्रतिपादन करता है, अतः धूम आदि के समान शब्द को भी लिंग हो मानना पड़ेगा । अर्थ की प्रतीति में शब्द सम्बन्ध स्मृति को भी अपेक्षा रखता है, इस प्रकार अनुमान स्थल में स्थित सारी सामग्री यहाँ सिद्ध है । लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में व्यवहृत होता है, वहीं उसका प्रयोग होता है । जहाँ नहीं दिखाई देता वहीं उसका प्रयोग नहीं होता । इस तरह से अन्वय और व्यतिरेक भी धूम हे समान, इस अनुमान की ही तरह विवक्षित शब्द पक्षधर्मता भी यहाँ बनती है । यहां वर्तमान हैं । यह धूम वह्निमान् है, अर्थवान है, शब्द होने से, पूर्वकाल में वूम होने से पूर्वकाल में उपलब्ध उपलब्ध शब्द के समान, इस तरह जैसे प्रमाता चूम को देखकर वह्नि को जान लेता है, उसी तरह शब्द को सुनकर उसके अर्थ को समझ जाता है । बार - बार hara fare में शब्द और अनुमान दोनों ही स्थलों में इष्टान्त की अपेक्षा नहीं रहती । जैसे प्रसिद्ध अविनाभाव वाले लिंग के दर्शन और प्रसिद्धि के अनुस्मरण में अतीन्द्रिय अर्थ का अनुमान होता है, उसी तरह अव्यभिचरित सम्न् के ज्ञात हो जाने पर शब्द से अर्थ का अवगम हो जाता है । इसलिये धूम की तरह शब्द भी लिंग ही है । शब्द विवक्षा ( वक्तुमिच्छा विवक्षा ) ही प्रमाण होता है, तदतिरिक्त में नहीं, इसीलिये अंगुली के पोर पर सैकड़ों हाथी हैं, यह विषय प्रतीतिविरुद्ध होने से प्रमाण नहीं है । निम्न श्लोकों में यही बात कही गई है - " सारे वाक्यों से facer का हो अनुमान होता है । प्रत्यक्ष दर्शन और अदर्शन से विवक्षा में हो शब्द का प्रमाण निश्चित होता है | faraar शब्दगम्य होने में