वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 41–50
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 41–50
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११ वचोभ्यो निखिलेभ्योऽपि विवक्षैवानुमीयते । प्रत्यक्षानुपलम्भाभ्यां तद्धेतुः सा हि निश्चिता ॥ विवक्षायां हि गम्यायां विस्पष्टेव त्रिरूपता । पुंसि धर्मिणि साध्या या कार्येणैव च सा यतः ॥ पादपार्थविवक्षावान् पुरुषोऽयं प्रतीयते । वृक्षशब्दप्रयोक्तृत्वात् पूर्वावस्थास्वहं यथा ॥ तदप्युक्तम् --- ' यद्यपि ते पदार्थ मिथस्संसर्गवन्तः वाक्यत्वादिति व्यधिकरणम्, पदार्थत्वादिति चानैकान्तिकम्; पदानि स्मारितार्थसंसर्गवन्ति तत्स्मारकत्वादित्यादी साध्याभाव:, तथाप्याकाङ्क्षादिमद्भिः पदैः स्मारितत्वाद् गामभ्या-जेति पदार्थवदिति स्यात् " ( वे ० उ ० पृ ० २२३ ) । पदानि स्मारितार्थविज्ञप्तिपूर्वकाणि योग्यतासत्तिमत्वे सति संसृष्टार्थपदत्वाद गामभ्याजेति पदकदम्बवत् । यद्यपि पूर्ववर्णक्रमोद्भूतसंस्कारसहकारिता, पुरुषापेक्षवृत्तिता, विवक्षानुसृतिक्रमश्चेति वैलक्षण्यं शब्दे समास्ते, तथापि नैतावता तस्य प्रमाणान्तरता, कार्यकारणधर्मादिविशेषस्यानुमानेऽपि सत्त्वात् । उसमें त्रिरूपता अनुमान स्थल की तरह स्पष्ट है, क्योंकि वह विवक्षा पुरुष धर्मी में कार्य के द्वारा साध्य होती है । विवक्षा मे हो शब्द का प्रामाण्य देखा जाता है, अविवक्षा में प्रामाण्य नहीं देखा जाता । यह पूष पेट रूपी अर्थ को कहना चाहता हो, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि वृक्ष शब्द का प्रयोग कर रहा है, जैसा कि पहले मैं करता था । यह भी कहा जाता है कि यद्यपि ये पदार्थ परस्पर संसगं वाले हैं, क्योंकि यह वाक्य हैं, इस अनुमान में व्यधिकरण ' दोष है । इसी अनुमान में ' पदार्थत्व ' हेतु देने पर अनैकान्तिक दोष होगा | पद अपने द्वारा स्मारित अर्थ के साथ संसर्ग वाले हैं, क्योकि ये उनके स्मारक हैं --- इस अनुमान में साध्याभाव दोष होगा, तो भी आकांक्षा योग्यता आदि से युक्त पदों से स्मारित होने से ' गामभ्याज ' इन पदों के अर्थ के समान सभी पद स्मारित अर्थ की विज्ञप्ति पूर्वक होते हैं । यद्यपि शब्द और अनुमान में इतना वैलक्षण है कि शब्द में पूर्व पूर्व वर्ण के क्रम से उत्पन्न संस्कार की हकारिता रहती है, इसकी वृत्ति के लिये पुरुष की अपेक्षा रहती है और क्रम, बन्फा की विवक्षा का अनुसरण करते हैं, तो भी केवल इतने से ही शब्द अनुमान से free प्रमाण नहीं हो जायगा, क्योंकि कार्यकारणल धर्म आदि की विशेषतायें अनुमान में भी हैं । अभास्त विषय में दृष्टान्त की कोई आवश्यकता नहीं रहती, यह कहा जा चुका है । अनभ्यस्त विषय में तो शब्द और अनुमान दोनों ही जगह सम्बन्ध स्मरण सापेक्षता समान रूप से विद्यमान हैं । इसी तरह यथेष्ट Free अर्थात् शब्द में यथेष्ट विनियोज्यता ( अभीष्टार्थ बोधक वाक्य से प्रयुक्त होने की योग्यता ) भी अनुमान से शब्द की मित्रता का कारण नहीं है, क्योंकि हस्त संकेत आदि लिंगों का भी अभिमतार्थबोधन से विनियोग होता ही है । ( चतुष्पथों पर मार्ग व्यवस्थापक व्यक्ति द्वारा व्यवहृत हस्त संकेत से यान चालक यान ले जाते हैं ) जैसे सैन्धव यदि शब्द नरव, लवण आदि अनेक अर्थों के बोधक होते है, वैसे ही अस्पष्ट लिंग वाले अनुमान में अनेक प्रकार की प्रतीतियों की उत्पत्ति देखी गई है । जैसे प्रमाणाभास में हेतु से स्पष्ट अर्थ की प्रतीति नहीं होती है | ऐसी स्थिति में शब्द विशेष से अर्थात् यह ज्ञात होने पर ही कि यह आतोक्त वाक्य है, तभी व्यक्ति किसी १. ' पदार्थ ' रूपी पक्ष में ' वषयत्व ' रूपी हेतु विद्यमान है । अत: व्यधिकरण दोष है अर्थात् हेतु साध्य का सामाना-विकरण नहीं है । अनुमान में हेतु और साध्य का सामानाधिकरण्य अपेक्षित है । ' वामयत्व ' हेतु को हटाकर पदार्थ-वा ' हेतु देने पर अनैकान्तिक अर्थात् व्यभिचार दोष है । प्रत्येक पद के अर्थ में पदार्थत्व है, किन्तु साध्य संसर्गवत्व नहीं है । २. प्रत्येक पद पदार्थस्मारक होता है, किन्तु उसमें स्मारितार्थं संसर्ग नहीं है । स्मारित अर्थो का संसर्ग अर्थों में हो होगा, पद ( आब्बों ) में नहीं । अतः पक्ष ( पदों ) में साध्याभाव ( स्मारित अर्थों के संस का aera ) बाध रूप दोष होता है । बाधित हेतु अपना साथ सिद्ध नहीं कर सकता । अतः यह अनुमान दोषपूर्ण है । ३. अर्थात ' गामस्यान ' ( आप वो ) इत्यादि पर समूह में जैसे योग्यता ( बाब राहित्य ), आसति ( अविलम्बित उपस्थिति ) और पदों द्वारा स्मारित अर्थों का परस्पर सम्बन्ध पव t पस्थिति के क्षण में ही प्रतीत होता है, वैसे ही यह अनुमान होगा कि पद पदस्मारित पदार्थ विज्ञानपूर्वक होते हैं । अनुमान का स्वरूप मूरु में है ।
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१२ वेदार्थपारिजातः अभ्यस्ते दृष्टान्तनिरपेक्षत्वं तुक्तमेव, अनभ्यस्ते तु सम्बन्धस्मृति सापेक्षतोभयोरपि समानैव । एवं यथेष्टविनियोज्यत्वस्य सरवात्, अश्वलवणादिबोधक सैन्धवशब्दवत् । अनेकप्रतीत्युत्पत्तिहेतुत्वमप्यस्पष्टलिङ्गेऽनुमाने भवत्येव । प्रमाणाभासतो यथा लिङ्गेन स्फुटार्थानवभासः, तथैव नानार्थभ्रमकारिणि शब्देऽपि कुत्रचिच्छब्दात्प्रतिभाते आप्तवादत्वलिङ्गेन निश्चिता मतिर्जायते । अत एव शब्दस्याप्याप्तवादाविसंवादसामान्यनुमानतामेव बौद्धवैशेषिकौ मन्येते । तत्राभिधीयते - शब्दोऽनुमानान्नातिरिच्यत इति यदुक्तम्, तन्न, अभिन्नविषयत्वासिद्धेः । अर्थमात्रं शब्दस्य विषयः, साध्यधर्मविशिष्ट धर्मी विषयोऽनुमानस्य । किञ्च, सामान्यमात्रविषयत्वेन विषयाभेदः किं सामान्यमात्रविषयतया तद्वन्मात्र-विषयतया? उत सम्बद्धार्थप्रतिपत्तिहेतुतया वा? नाद्यः, वेदान्तिरीत्या सकलव्यक्त्यनुस्यूतनित्यैकत्वादिधर्मोपेतरूपस्य सामान्यस्यासिद्धेः, अन्यापोहविषयत्वरूपस्य च सामान्यस्य निराकरिष्यमाणत्वात्, नित्यादिस्वभावसामान्यविषयत्वे चानयो-मांसमप्रवेशोऽपि स्यात् । न च सामान्यवदर्थविषयत्वेन विषयाभेदोऽभिप्रेतः, तथात्वे प्रत्यक्षस्याप्यनुमानत्वप्रसङ्गात्, सकलप्रमाणानां सामान्यविशेषात्मकार्थविषयत्वप्रतिपादनात् । अत एव सम्बद्धार्थप्रतिपत्तिहेतुत्वेन शब्दानुमानयोरभेदोऽपि प्रत्याख्यातः प्रत्यक्षस्यापि सम्बद्धार्थावगमहेतुत्वे-नानुमानत्वप्रसङ्गात् । यदि तु सम्बद्धार्थप्रतिपत्तिहेतुत्वेऽपि प्रत्यक्षस्य सामग्रीभेदादनुमानभेदः, तदा तु शब्दस्यापि तद्विशेष-त्वेन भेदः किन्न स्यात्? किञ्च वाक्यरूपशब्दस्य सम्बद्धार्थप्रतिपत्तिहेतुत्वमपि नास्त्येव । पदस्य सम्बद्धार्थबोधकत्वेऽपि वाक्यस्यानवगतसम्बन्धस्यैव वाक्यार्थावगम हेतुत्बोपपत्तेः । अत एवाभिनवविरचितश्लोकश्रवणे सति पदसंस्कृतमतीनां निश्चय पर पहुँचता है इसीलिये बोद्ध और वैशेषिक शब्द का भी अनुमान में अन्तर्भावि मानते हैं, क्योंकि इससे मी प्रवृत्ति विसंवाद रहित आशक्ति का निश्चय होते के अनन्तर ही होती हैं । इस पर हमारा यह कहना है कि शब्द अनुमान से अतिरिक्त नहीं यह कहना गलत है, क्योंकि यह सिद्ध नहीं हो सकता कि इन दोनों का विषय एक है | शब्द का विषय केवल अर्थ है और अनुमान का विषय साध्य रूप धर्म से विशिष्ट धर्मी है | आप यह कह सकते हैं कि शब्द और अनुमान दोनों का ही सामान्य मात्र विषय है । अर्थात् धूम को देखकर जैसे वह्नि विशेष का ज्ञान न होकर वह्नि सामान्य का ही ज्ञात होता है, वैसे ही गवादि शब्द से भी श्वेत - पीत गोविशेष का ज्ञान न होकर गोसामान्य का ही बोध होता है । आप यह बताइये कि शब्द और अनुमान का अभेद सामान्य मात्र गोचर होने से है? अथवा सामान्य से युक्त विशेष गोचर होने से? अथवा सम्बद्धार्थ की प्रतिपत्ति का हेतु होने से दोनों का विषयाभेद है? पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि वेदान्त मत में सकल व्यक्तियों में aata fre यत्व एकत्व आदि धर्मों से युक्त सामान्य मान्य नहीं हैं । अन्यापोह रूप सामान्य का भी निराकरण आगे किया Grant | freeafe स्वभाव सामान्य विषय शब्द विषय है, ऐसा हो तो वैशेषिक बौद्ध दोनों का मीमांसक मत में प्रवेश होगा | सामान्यवान् ( सामान्य युक्त व्यक्ति पदार्थ दोनों का अभिन्न है, इसलिये शब्द और अनुमान का अभेद है, यह भी पक्ष ठीक नहीं है, क्यों ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष का भी अनुमान में अन्तर्भाव हो जायगा, क्योंकि सभी प्रमाणों के सामान्य विशेषात्मक अर्थ ही विषय होते हैं । for सम्बद्ध अर्थ की प्रतिपत्ति में कारण होने से शब्द और अनुमान की afreent भी निरस्त है । यदि ऐसा माना जाता है तो प्रत्यक्ष को भी अनुमान मानना पड़ जायगा; क्योंकि प्रत्यक्ष भी सम्बद्ध अर्थ की अवगति में कारण है । यदि आप कहें fe सम्बद्ध की प्रतिपति में कारण होने पर भी सामग्री के भेद से प्रत्यक्ष अनुमान से भिन्न है, तो फिर सामग्री के मेद के ही कारण शब्द भी अनुमान से मिस क्यों नहीं होगा? एक बात और यह है कि arar रूप शब्द की सम्बद्ध अर्थ की प्रतिपत्ति में हेतुता भी नहीं है | पद सम्बद्ध अर्थ का बोधक होता हुआ भी वाक्य तो बिना सम्बन्ध बोध के ही वाक्य की अति में कारण हो जाता है । इसी-लिये नये बनाये गये श्लोक के सुनने पर पद पदार्थ संपति ग्रह वालों को अर्थ की अगति हो जाती है । इस प्रकार सम्बन्ध के अ fere
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१३ तदर्थावगमः । तेन सम्बन्धाधिगममूलप्रवृत्तिनाऽनुमानेन तदनपेक्षस्य शब्दस्य कथमभेद: शक्यसाध्यः? पदस्य तु सत्यपि सम्बन्धाधिगमसापेक्षत्वे सामग्रीभेदादनुमानाद्भिन्नत्वमेव । किञ्च न परोक्षमात्रविषयत्वं शब्दस्य, त्वं सुखी दशमस्त्वमसीति तत्त्वममीत्यादिवाक्यैर्लोके वेदे चापरोक्षज्ञानजननदर्शनात्, अर्थमात्रं शब्दस्य विषयः साध्यविशिष्टो धर्मी त्वनुमानस्येति चो मेव | यदुक्तं पदान्यपि वाक्यार्थवृत्तीनि सन्ति गोमानौपगवः कुम्भकार इति, तत्सत्यम्; किन्तु गोमान् क इत्याकाङ्क्षाया अनिवृत्तॆनिराकाङ्क्षप्रत्ययोत्पत्त्यसम्भवात् । अपि च लिङ्गात्पर्वतादिविशेष्यावगमपूर्विका वह्न्यादिविशेषणावगतिरुत्पद्यते, पदात्तु विशेषणावगतिपूर्विका विशेष्यावगतिरित्यपि विषयभेदः । यदुक्तं यथानुमाने धर्मविशिष्टो धर्मी साध्यते, एवमिहार्थ-विशिष्टः शब्दः साध्यो भवतु इति, तन्न; शब्दस्य हेतुत्वात् हेतोः पक्ष भिन्नत्वनियमात् । ननु यथा वह्निमानयं धूमः धूमत्वाद् महानसधूमवद् इत्यपि " सदेशस्याग्नियुक्तस्य धूमस्यान्येश्च कल्पिता " इति भट्टपादैरग्निविशिष्टस्य पर्वतस्य धूमं धर्मीकृत्य कैश्चित्तात्त्विकैरनुमेयतेत्युक्तम् एवं गोशब्द एवार्थवत्त्वेन साध्यतां गोशब्द-त्वादिति तत्र हेतुरिति चेत; विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि शब्दस्य धर्मिणोऽर्थविशिष्टत्वं साध्यते, प्रत्यायनशक्तिमत्त्वं वा, अर्थप्रतीतिविशिष्टत्वं वा? नाद्यः, धूमपर्वतयोरिव शब्दार्थयोर्धर्मधर्मिभावाभावात् । यद्यर्थविषत्वेन शब्दस्यार्थविशिष्टत्वमुच्येत, तदपि न तत्प्रतीतिजननमन्तरेण तद्विषयत्वानुपपत्तेः । प्रतीतौ तु सिद्धायां किं तद्विषयत्वद्वारेण तद्धर्मत्वेन? यदि तु तद्विषय-स्वेन तद्धमित्वपूर्विकार्थप्रतीतिः, अर्थप्रतीतिमूलञ्च तद्विषयत्वम्, तदेतरेतराश्रयत्वम् । तदुक्तं भट्टपादैः-Terrana धर्मत्वं धर्मत्वाद समको यदि । स्यादन्योन्याश्रयत्वं हि तस्मान्नेषापि कल्पना ॥ इति । के बाद हो जिसकी प्रवृत्ति हो सकती है, ऐसे अनुमान से सम्बन्धाधिगम से निरपेक्ष शब्द की अभिता कैसे हैं? पद यद्यपि सम्बन्धा-धिगम सापेक्ष हैं, तो भी सामग्री के भेद से इनकी अनुमान से भिन्नता है । इसी तरह शब्द केवल परोक्ष को ही अपना विषय नहीं बनाता, ' तुम सुखी हो ', ' तुम दसवें हो ', ' वह ब्रह्म तुम ही हो ' इत्यादि लीकिक और वैदिक वाक्यों से अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष वस्तु का ज्ञान भी होता है । यह बताया जा चुका है कि शब्द का विषय केवल अर्थ है और अनुमान का विषय साध्यविशिष्ट धर्मो है । यद्यपि यह कहना ठीक है कि गोमान् औपगव, कुम्भकार आदि पद भी वाक्यार्थ वृत्ति हैं, तो भी गोमान् कोन है? इस meter की निवृत्ति न होने से इनसे किसी निराकांक्ष ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती । दूसरी बात यह है कि लिंग से पर्वत आदि विशेष्यावगमन के अनन्तर वह्नि आदि विशेषण की अवगति होती है, किन्तु पक्ष से विशेषण की अवगति के पश्चात् विशेष्य प्रतीत होता है । इस प्रकार इनमें विषय मेद भी स्पष्ट है । यह कथन सही नहीं है कि जैसे अनुमान में धर्मविशिष्ट धर्मी सिद्ध किया जाता है, उसी तरह यहाँ पर अर्थविशिष्ट शब्द को साध्य मान लिया जाय, क्योंकि ऐसी परिस्थिति में शब्द हेतु हो जायगा और यह नियम है कि हेतु को पक्ष से भिन्न होना चाहिये, अर्थात् पक्ष और हेतु एक नहीं होना चाहिये । यहाँ शंका होती है कि ' यह पर्वतस्य धूम वह्निमान् है, घूम होने से, महानसस्य बूम के समान ' इस प्रकार पर्वतस्य धूम से पस्थति का अनुमान करने वाले किन्हीं तत्त्वचिन्तकों के मत का उल्लेख भट्टपाद ने किया है, उसी प्रकार गो शब्द को पक्ष मानकर गोश हेतु से अर्थवत्त्व की अनुमेयता मानी जाय । यह कथन इसलिये ठीक नहीं है कि, मागे दिये गये विकल्प नहीं हो सकेंगे । साध्य के विषय में तीन विकल्प बन सकते हैं क्या धर्मी शब्द को पक्ष मानकर अर्थवैशिष्ट्य को साध्य माना जाय? अथवा उसी पक्ष में अर्थ ater शक्ति को साध्य माना जाय? अथवा अर्थज्ञानवैशिष्ट्य को साध्य माना जाय? इनमें पहला वि reer gefeate नहीं हैं कि धूम और पर्वत के समान शब्द और a ar aafna ( विशेष्यविशेषणभाव ) नहीं है । यह कहना भी ठीक नहीं है कि fear है, मत एव शब्द अर्थविशिष्ट है, क्योकि मर्थप्रतीति के बिना शब्द को अर्थविषयकता नहीं बन सकती ।
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१४ वेदार्थपारिजातः तेन नार्थविशिष्टः शब्दः साध्यः । नाप्यर्थप्रत्यायनशक्तिविशिष्टः साध्यः, तदर्थत्वेन शब्दप्रयोगाभावात् । तदुक्तमेव-न शक्तिसिद्धये शब्द: कथ्यते श्रूयतेऽपि वा । अर्थं गत्यर्थमेवानुं शृण्वन्ति कथयन्ति च ॥ न वा अर्थप्रतीतिविशिष्टः शब्दः साधयितुं शक्यः, विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि - अर्थप्रतीतिः सिद्धा असिद्धा वा? आ तत्सिद्धौ तदनुमानवैयर्थ्यात् । असिद्धया तया कथं पक्षस्य तद्वत्ता साधयितुं शक्या । न चैवं वह्न्यादिसाध्येऽप्येवं विकल्पे सत्यनुमानमात्रोच्छेदप्रसङ्गः, वैषम्यात् । तथाहि न तत्राग्निर्धूमेन जन्यते, अर्थप्रतीतिस्तु शब्देन जन्यत इति तत्रैव सिद्धयसिद्धिविकल्पसम्भवः । किञ्च गवादिशब्दे धर्मिणि गत्वादिसामान्यात्मकस्य हेतार्यहणम्, ततो व्याप्तिस्मरणम्, ततो लिङ्गपरामर्शः, ततोऽर्थप्रतिपत्तिरिति कालद्राघीयस्त्वाद् धर्मी तिरोहितो भवति, तस्योच्चरितप्रध्वंसित्वात् । न च पर्वता-दिवत् शब्दो धर्मी स्थायीत्यनुमानकाले लोकेन नहि शब्दोऽर्थवत्वेन ज्ञायते । किन्तु शब्दात् पृथगेवार्थः प्रतिपद्यते । तस्माद् धर्मविशिष्टस्य साध्यस्येहासम्भवान्न शब्दलिङ्गयोरैक्यम् । यदुक्तमभिन्नसामग्रीसमन्वितत्वेन शब्दानुमानयोरभेद इति, तन्न; पक्षधर्मत्वादीनां शब्देऽसंभवात् । तथाहि -- शब्दस्य पक्षधर्मत्वं न संभवति, धर्मिण एवात्र कस्यचिदभावात् । शब्दोऽर्थी वात्र धर्मेति विचार्यताम्, शब्दस्य धर्मित्वे तस्यैव च हेतुत्वे हेतोः प्रतिज्ञार्थैकदेशत्वप्रसङ्गात् । यदि तु शब्दत्वस्य हेतुत्वेन न प्रतिज्ञार्थैकदेशत्वमिति, तदपि न; शब्दत्वस्य सामान्य-प्रतीति रिद्ध हो जाने पर तो अर्थपिता के द्वारा तद्धत्व को सिद्ध करता व्यर्थ है । यदि अर्थविषयता से शब्द की धर्मिता सिद्ध होकर की प्रतीति होगी और मर्थप्रतीति से शब्द की अर्थविषयता बोगी तो इसमें परस्पराश्रय दोष होगा । जैसा कि भट्ट कुमारिल ने कहा है --- " शब्द अर्थ का गमक ( बोधक ) हो तभी वर्थविशिष्ट धर्मी बनेगा और यदि अर्थविशिष्ट धर्मी बन जाय तभी वह अर्थ का THE हो सकेगा । ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रय दोष होगा, बल: ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । " अत: अर्थविशिष्ट शब्द साध्य नहीं हो सकता । प्रत्यायन शक्ति से विशिष्ट शब्द भी साध्य नहीं हो सकता, क्योंकि इस अभिप्राय से शब्द का प्रयोग नहीं होता । कहा भी गया है --- " शक्ति को सिद्धि के लिये न तो शब्द कहा जाता है और न सुना ही जाता है । अर्थ की गति के लिये ही इसका उच्चारण और श्रवण होता है । " अर्थ को प्रतोति से विशिष्ट शब्द भी साध्य नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ पर भी भागे दिये गये विकल्पों का कोई उत्तर नहीं है । जैसे कि अर्थप्रतीति सिद्ध है या असिद्ध? यदि यह सिद्ध है तो फिर इसको सिद्धि के लिये अनुमान करना व्यर्थ है । यदि वह असिद्ध है तो ऐसी अवस्था में उसमे धर्मता कैसे सिद्ध की जा सकती है? यदि आप कहें कि आदि की साध्य दशा में भी ऐसा विकल्प उठाने पर तो अनुमान मात्र के उच्छेद का प्रसंग उपस्थित हो जायगा, तो ऐसी बाल नहीं है । इन दोनों स्थलों में स्पष्ट अन्तर है । जैसे कि पर्वत में धूम अक्ति को पैदा नहीं करता । इसके विपरीत अर्थप्रतीति शब्द से पैदा होती है । अतः यहीं पर उक्त सिद्धि और सिद्धि वाला विकल्प लागू होता हैं, अनुमान स्थल में नहीं । दूसरी बात यह भी है कि गो शब्द प्रभृति Eft में गत्वादि सामान्यात्मक हेतु का पहले ग्रहण होगा, तब व्यक्ति का स्मरण होगा, उसके बाद लिंग का परामर्श होगा, तब कहीं जाकर अर्थ की प्रतिपत्ति होगी । इस तरह कई क्षण समय बीतने के कारण धर्मो तिरोहित हो जायगा, क्योंकि शब्द का तो उच्चारण के बाद ही नाश हो जाता है | पर्वत आदि की तरह शब्द कोई स्थायी धर्मी नहीं हैं । इसलिये अनुमान करते समय लोक शब्द को अर्थ से युक्त नहीं जान सकते, किन्तु शब्द पृथक ही अर्थ की अवगति होती है | इसलिये धर्मविशिष्ट साध्य के यहाँ उपलब्ध न होने से शब्द और लिंग की एकता नहीं मानी जा सकती । यह जो कहा गया है कि समान सामग्री से युक्त होने से शब्द और अनुमान में अभेद हैं, ठीक नहीं है, क्योंकि शब्द में पक्ष-far आदि नहीं बन सकती । जैसे कि शब्द की पता नहीं बन सकती, क्योंकि यहाँ पर कोई धर्म नहीं है । आप यह विचार कीजिये कि यहाँ पर शब्द धर्मी होगा या अर्थ? यदि शब्द को धमीं माना जाय तो उसी के हेतुता कोटि में भी रहने पर हेतु प्रतिज्ञात अर्थ का हो एक देश हो जायगा । यदि यह कहा जाय कि हेतुता शब्द में न रह कर शब्दत्व में रहती है, अतः हेतु की प्रतिज्ञा के साथ एकता नहीं है तो यह भी संभव नहीं है, क्योंकि बौद्ध मत में सामान्य स्वभाव शब्दत्व की परमार्थ सत्ता नहीं है । कल्पित की सत्ता
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वेदार्थपारिजातः १५ स्वभावस्य बौद्धमते परमार्थसतोऽभावात् । कल्पितस्य सत्त्वेऽपि न गमकत्वम्, अर्थोऽर्थं गमयतीति तदभ्युपगमात् । शब्दस्य पक्षत्वप्रतिक्षेपाच्च तद्धर्मतया गत्वादिसामान्यस्य शब्दत्वस्य वा लिङ्गता, नाप्यर्थस्य धर्मित्वं सिद्धसिद्धिविकल्पानुपपत्तेः । न च तद्धर्मत्वं शब्दस्य, तत्र सद्वृत्यभावात् । प्रतीतिजनकत्वेन तद्धर्मतायां तु पूर्ववदितरेतराश्रयता पक्षधर्मत्वादिबलेन प्रतीतिः प्रतीतौ च सत्यां पक्षधर्मत्वादिलाभात् । किञ्च 1 तत्प्रतीतिहेतुत्वेन शब्दस्यार्थधर्मित्वे चक्षुरादेरपि पक्षधर्मत्वसिद्धा तत्प्रभवायाः प्रतीतेरप्यनुमितित्वप्रसङ्गात् । किञ्च शब्दस्य स्वलक्षणात्मकेनार्थेन सम्बन्धो नाभ्युपेयते बौद्धः । नह्यर्थे शब्दाः सन्ति तदात्मानो वा इति तदभ्युपगमात् । न चार्थेनासम्बद्धोऽपि शब्दस्तद्धर्मः, अतिप्रसङ्गात् । न चाग्निपर्वतयोरिव शब्दार्थयो-धर्मभावः, आश्रितत्वाभावात् । न चार्थः शब्दाश्रितः, विभिन्नदेशत्वात् । यत्राश्रयाश्रयिभावो नास्ति, तत्र धर्मधर्म-भावो न संभवति, सह्यविन्ध्ययोः काशीकाश्मीरयोस्तथाऽदर्शनात् । देशे काले च शब्दार्थयोरननुगमान्तान्वयव्यतिरेकावपि सम्भवतः । नहि यत्र पिण्डखर्जूरादिशब्दस्तत्र पिण्डखर्जूराद्यर्थः संभवति । यथा यत्र धूमस्तत्राग्निः, न तथा देशकृतोऽन्वयः शब्दार्थयोः । नापि कालकृतः रावणादिशब्दानां वर्तमानत्वेऽपि तदर्थानामविद्यमानत्वात् । रावणादिव्यक्तिमन्तरा रावणादिजातेरपि विद्यमानता दुर्निरूपैव । यत्रार्थे शब्दो दृष्ट इतीद्गन्त्र-यादिभिस्तु वाच्यवाचकभावनिर्णय एव । नैतावताऽस्यानुमानत्वम्, तथात्वे प्रत्यक्षस्यापि तदापत्तेः । घटसत्त्वे प्रत्यक्षत्वं तदभावे त्वप्रत्यक्षत्वमित्यन्वयादेस्तत्रापि सत्त्वात् । संबन्धस्मृतिसंशयोपमानादिष्वपि नातिप्रसक्तिः । सम्बद्धार्थप्रतिपत्तिहेतुत्वं तु प्रत्यक्षादावतिव्याप्तम् । मानने पर भी वह किसी का साधक नहीं बन सकता । क्योंकि वर्ष ही अर्थ का गम है, ऐसा बौद्ध दार्शनिकों की मान्यता है । जब शब्द की क्षमता को अपास्त कर दिया गया तो शब्दधर्मतया गत्वादि सामान्य rear care की भी लिगता नहीं बन सकती । अर्थ भी धर्मी नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ पर सिद्धि और असिद्धि के विकल्प का समाधान नहीं बन सकता । अर्थ की धर्मिता सिद्ध है तो are होगा । असिद्ध है तो अर्थ के धर्मी न होने से पक्ष बिना अनुमान की प्रवृति ही न होगी । शब्द अर्थ का धर्म है, ऐसा नहीं कहा अनुमान जा सकता, क्योंकि शब्द को अर्थ में वृत्ति नहीं है, अर्थात् शब्द अर्थ में नहीं रहता । शब्द अर्थ की प्रतीति का जनक है, अतः उसमें अर्थ की घता मानी जायगी तो यहाँ पर इतरेतराश्रय दोष का प्रसंग होगा, क्योंकि पक्षता नादि के बल से प्रतीति होगी और प्रतीति के होने पर पक्षधता आदि का लाभ होगा । दूसरा दोष यह आवेगा कि अर्थ की प्रतीति में कारण होने से शब्द को यदि अर्थ का धर्म माना जाता है तो इसी पद्धति से चक्षुरादि इन्द्रियों की भी पक्षधर्मता बनने लगेगी, फलतः चक्षुरादि इन्द्रियों को सहायता से उत्पन्न प्रतति में भी प्रत्यक्ष न होकर अनुमितित्व मानना पड़ जायगा । अपि च शब्द का स्वलक्षणात्मक अर्थ से संबन्ध बौद्ध दार्शनिक नहीं मानते । उनकी यह मान्यता है कि शब्द न तो अर्थ में रहते हो है और न अर्थात्मक हो हैं । जब शब्द से असंबद्ध है तो उसका धर्म कैसे हो सकता है? ऐसा मानने पर अतिप्रसंग होगा | अग्नि और पर्वत के समान शब्द और अर्थ का धर्मधर्मोसाद वन नहीं सकता, क्योकि शब्द और अर्थ का अग्नि और पर्वत के समान परस्पर आश्रयाश्रयभाव नहीं है । अर्थं शब्द में नहीं रहता, क्योंकि दोनों का स्थान मित्र - भित्र ह । जहाँ पर आश्रयाश्रयीभाव नहीं बनता, वहां पर भाव की भी संभावना नहीं रहती, क्योंकि परस्पर श्रित वह और विन्ध्यपर्वत में त काशी एवं काश्मीर में कोई भी व्यक्ति धर्मभाव नहीं मानता । देश और काल में भी शब्द और अर्थ का अनुगम नहीं होता, अता यहाँ पर अन्वय और व्यतिरेक भी नहीं बन सकते । जहाँ परपिण्डखजूर शब्द रहता है, वहीं पिण्डखजूर रूपी अर्थ भी नहीं रह सकता । जैसे जहां धूम है वहाँ अग्नि है, यहाँ पर घूम और afe का देशकृत संबन्ध है, वैसा देशकृत अन्वय शब्द और अर्थ का नहीं हो सकता । शब्द और अर्थ का कालकृत संबन्ध भी नहीं हो सकता, रावण नादि शब्द तो आज भी वर्तमान है, किन्तु उनका अर्थ विद्यमान नहीं है । रावण प्रभृति व्यक्ति के बिना रावत्व आदि जाति की विद्यमानता मी दुर्निरूप्य है । यह शब्द इस अर्थ में ऐसा देखा जाता है । इस प्रकार के अन्य से वाक्यवाचकभाव का हो निर्णय होता है । इतने से ही शब्द में अनुमानता नहीं आरोपित की जा सकती, क्योंकि ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष में भी यही आपत्ति आवेगी | घट के रहने पर प्रत्यक्ष होगा, न रहने पर नहीं, इस प्रकार के अस्वपतिरेक आदि वहाँ पर भी है ही । संबन्ध, स्मृति,
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१६ वैवार्थपारिजातः शब्दो नानुमानं तद्भिन्नविषयत्वात् तद्भिन्नसामग्रीकत्वाच्च प्रत्यक्षवत् । ऋष्यार्यम्लेच्छादिभिः शब्दस्य यथेष्टं नियुज्यमानस्याप्यर्थप्रतीतिहेतुत्वं दृश्यते, न तथा कृतकत्वं नित्यत्वसाधनाय धूमत्वादिकं वा जलादिसाधनाय नियुज्यमानं तत्प्रतीतिहेतुर्भवति । न्यायसूत्रानुरोधेन विचारः शब्दो नानुमानम्, अनाप्ताप्रणीतत्वेनैवाव्यभिचारिज्ञानजनकत्वात् । कृतकत्वादिहेतोस्तु साध्याव्यभिचारिज्ञानेऽ-विनाभाव एव निमित्तं नानाप्ताप्रणीतत्वादिकम् । अस्मिन्नेव प्रसङ्गे न्यायदर्शने पूर्वपक्ष: -- " शब्दोऽनुमानम्, अर्थस्यानुप-लब्धेरनुमेयत्वात् " ( अ ० २ आ ० ११४ ९ ) इत्यत्रोकं शब्दोऽनुमानम्, न प्रामाणान्तरम् कस्मात्? शब्दार्थस्यानुमेयत्वात् । यथाऽनुपलभ्यमानो लिङ्गी मितेन लिङ्गेन पश्चादनुमीयते तथैव मितेन शब्देन पश्चान्मीयतेऽनुपलभ्यमानोऽर्थ इत्यनुमानं शब्दः । उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वाच्च ( ५० तदेव ) | यथाऽनुमानोपमानयोरन्यथाऽन्यथोपलब्धिद्विप्रवृत्तिः, तथा शब्दानुमानयोद्विप्रकारोप-लब्धिर्भवति । सम्बन्धाच्च ( ११ ) यथा सम्बद्धयोलिङ्गलिङ्गिनोरसम्बन्धप्रतीतौ लिङ्गोपलब्धौ लिङ्गिग्रहणम्, तथैव शब्दार्थयोः सम्बन्धप्रसिद्धौ शब्दोपलब्धेरर्थग्रहणम् । एवं पूर्वपक्षं प्रदर्श्य सिद्धान्ते शब्दस्य स्वतन्त्रप्रामाण्यमुक्तम् । आप्तोपदेश-सामर्थ्याच्छन्दादर्थसंप्रत्यय: ( ५२ ) । स्वर्गः, अप्सरसः, उत्तराः कुरवः, सप्तद्वीपा:, समुद्रः ( क्षीरसमुद्रादिः ), लोकसन्निवेश इत्येवमादेरप्रत्यक्षस्यार्थस्य न शब्दमात्रात् प्रत्ययः, किं तह्यप्तैरयमुक्तः शब्द इत्यतः संप्रत्यय:, हे विपर्ययेण सम्प्रत्ययाभावान्न त्वेवमनुमानं सम्भवति । अत एवोपलब्धिप्रकारभेदोऽपि तयोः सिद्धयत्येव । उपलब्धिभेदसत्त्वादेव न तयोरैक्यम् । सूत्रार्थस्तु -आप्तस्य भ्रमादिशून्यस्य य उपदेश: शब्दस्तत्र यत्सामर्थ्यम्, आकाङ्क्षायोग्यतादिमत्त्वं तत्तोऽर्थसम्प्रत्ययः । तेन व्याप्तिनिर-संशय, उपमान आदि में भी अतिव्याप्सित नहीं है । संबन्ध आदि के ज्ञान का कारणत्व तो प्रत्यक्ष आदि में मो अनुमान मानना पड़ेगा । ' ही, अत: प्रत्यक्ष को मी शब्द अनुमान नहीं है, क्योंकि इसका विषय और इसकी सामग्री प्रत्यक्ष के समान ही भिन्न है । ऋषि हो, आर्य हो अथवा म्लेच्छ हो, किसी के द्वारा स्वेच्छानुसार प्रयुज्यमान शब्द अर्थ के प्रत्यायक होते हैं, इसी तरह से अपनी इच्छा के अनुसार कृतकत्व हेतु को मित्यता की तथा धूमत्वादि को जलाद की सिद्धि के लिये नियुक्त करने पर उनकी प्रतीति नहीं हो सकती । न्यायसूत्र के अनुसार विचार शब्द अनुमान नहीं है, क्योंकि केवल यह मालूम हो जाने पर ही कि यह शब्द अनास प्रणीत नही है, अर्थात् इस शब्द का frefer कोई प्रामाणिक व्यक्ति नहीं है, उससे सही ज्ञान होता है । कृतकत्व नादि हेतु साध्य का अव्यभिचारी है, इसको जानने में afeteria at निमित्त माना जाता है, अनास से अप्रणीत्तत्य आदि उसमें हेतु नहीं हो सकते । अतः शब्द मोर अनुमान में महान अन्तर है । इसी प्रसंग में व्यायदर्शन में पूर्वपक्ष के रूप में ' शब्दोऽनुमानम् ० ' इत्यादि सूत्र में कहा गया है कि शब्द अनुमान से मित्र नहीं है, क्यों शब्द का अर्थ अनुमितिगम्य हैं । जैसे अनुपलभ्यमान मम्ति आदि लिंगी प्रामाणिक घुम आदि लग से बाद में अनुमित होता है, उसी तरह से प्रामाणिक शब्द से बाद में अनुपलभ्यमान अर्थ ज्ञात होता है, अतः शब्द अनुमान ही है । शब्द अनुमान से भिन्न इसलिये भी नहीं है कि यहाँ पर अनुमान और उपमान के समान दो भिन्न - भिन्न उपलब्धियों न होकर एक सी ही उपलब्धि होती है । यह fort fi द्ध लिंग और लिंगी को एक स्थान पर देखकर बाद में जैसे असंबद्ध लिंग की उपलब्धि से लिंग का ग्रह होता है, उसी तरह एक बार शब्द और अर्थ के संबन्ध के ज्ञाते हो जाने पर बाद में शब्द की उपलब्धि होने पर अर्थ का ज्ञान हो जाता है । इस तरह पूर्वपक्ष करके सिद्धान्त में शब्द को स्वतन्त्र प्रमाण माना गया है । ' आप्तोपदेशा ' इत्यादि सूत्र में कहा गया है कि स्वर्ग, अप्सरा, उत्तर कुरु, सात द्वीप, क्षीर सागर आदि समुद्र, सारे संसार का दावा इस तरह के अप्रत्यक्ष पदार्थों का ज्ञान केवल शब्द से नहीं होगा, किन्तु इसलिये होगा कि ये राज्य माप्त अर्थात् प्रामाणिक व्यक्ति के कहे हुए हैं । यदि वक्ता प्रामाणिक नहीं है तो उससे अ का free नहीं होगा । यह स्थिति अनुमान में नहीं हैं । इसीलिये शब्द और अनुमान में भी अनुमान और उपमान के समान प्रतीति
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वेदार्थपारिजातः १७ पेक्षादाकाङ्क्षादिज्ञानादर्थे संप्रत्ययः शाब्दबोधो भवति । शब्दादमुमर्थं प्रत्येमि न त्वनुमिनोमीत्यनुव्यवसायात् । शब्दार्थयोः संकेतरूपसम्बन्धसत्त्वेऽपि न प्राप्तिलक्षणः सम्बन्धः । येनेन्द्रियेण शब्दो गृह्यते, न तेनार्थः । अतीन्द्रियोऽप्यर्थः शब्दस्य विषयो भवति, तयोः प्राप्तिलक्षणे सम्बन्धे गृह्यमाणे शब्दान्तिकेऽर्थः स्यादर्थान्तिके वार्थः स्यादुभयं वोभयं स्यात् । न च शब्देन सहार्थस्य व्याप्तिसम्बन्धः, तथात्वे मोदकाग्न्यसिशब्देर्मुखपूरणमुखदाह मुखपाटनानि स्युः, शब्दस्य व्याप्यस्य सत्त्वेनान्नादेरर्थ-स्यापि सत्त्वात् । ननु शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेध: ( ५४ ) शब्दादर्थप्रत्ययस्य व्यवस्थादर्शनादनुमीयते अस्ति शब्दार्थ-सम्बन्धो व्यवस्थाकारणम्, कश्चिदेकः शब्दः कञ्चिदेवार्थं बोधयति न सर्वः सर्वम् । इत्थं सम्बन्धेऽङ्गीकृते तेन सम्बन्धन व्याप्तिरावश्यकी । स च सम्बन्धो न मुखपूरणादिनियामक इति चेन्न शब्दार्थसम्बन्धस्य साङ्केतिकत्वेन व्याप्त्य-प्रयोजकत्वात् । तदाह ---- सामयिकत्वादर्थस्य ( ५५ ) शक्तिग्रहाधीनत्वात् शक्तिरूपसम्बन्धेन न व्याप्तिः, तस्या वृत्तिनियामक-सम्बन्धाधीनत्वात् । जातिविशेषे चानियमात् ( ५६ ) ऋष्यार्यम्लेच्छानां यथाकामं शब्दविनियागोऽर्थप्रत्यायनाय प्रवर्तते, तेन सामयिकः सम्बन्धो न स्वाभाविकः । यथा तैजसप्रकाशस्य रूपप्रत्यय हेतुत्वं न जातिविशेषे व्यभिचरति, न तथात्र | आर्या ववशब्दाद् दीर्घशूकं प्रतियन्ति, म्लेच्छास्तु कम् । नानाशक्तावपि यस्य यत्र शक्तिग्रहः, तस्य तदर्थोपस्थितिः । तथा च सिद्धान्तेऽप्यर्थव्यवस्थोपपत्तिः । का भेद भी बन जायेगा | इस प्रतीति के भेद के ही कारण शब्द और अनुमान को एकता भी नहीं होगी । सूत्र का अर्थ यह है - माप्त अर्थात् श्रम आदि से शुन्य प्रामाणिक व्यक्ति का जो उपदेश रूप शब्द, उसमें वर्तमान जो आकांक्षा, योग्यतारूप सामर्थ्य, उससे अर्थ का बोध होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि बिना ही व्याप्ति ज्ञान के शब्द से आकांक्षा आदि की सहायता से अर्थ का जो बोध होता है, वही शाब्दबोध कहलाता है । क्योंकि बाद में यहाँ पर प्रतीति यह होती है कि मैं शब्द से अर्थ को जानता है । यह अनुव्यवसाय नहीं होता कि मैं शब्द से अर्थ का अनुमान करता हूँ । शब्द और अर्थ का संबन्ध संकेतरूप है, प्राप्तिरूप नहीं । जिस इन्द्रिय से शब्द गृहीत होता है, उसी इन्द्रिय से अर्थ का भी ग्रहण नहीं होता । भत्तीन्द्रिय अर्थ भी शब्द का विषय होता है । यदि इनका प्रारूप संवन्ध माना जाय तो शब्द के पास अर्थ, अर्थ के पास शब्द अथवा शब्द ही अर्थ बोर अर्थ हो शब्द हो जायगा । शब्द को अर्थ के साथ व्याप्ति नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर मोदक, अग्नि, असि आदि शब्दों के उच्चारण के साथ ही मुँह में मिठास, मुंह का झुलस जाना और मुँह का कट जाना आदि कार्य भी होने लगेगे, क्योंकि व्याप्य शब्द के मुँह से उच्चारण करने पर लड्डू, आग और तलवार रूप अर्थ मी वहाँ उपस्थित हो जाने चाहिये और उनकी उपस्थिति में उक्त कार्यों का होना अनिवार्य हो जायगा । इस पर ' शब्दार्थ ० ' इत्यादि सूत्र से पूर्वपक्षी कहता है किसी निश्चित शब्द से ही निश्चित अर्थ का बोध देखा जाता है, इससे यह मालूम होता है कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध किसी व्यवस्था के आधीन है । कोई एक शब्द किसी एक ही अर्थ को बताता है, सभी शब्द सभी अर्थों का बोध नहीं कराते | इस तरह शब्द और अर्थ का संबन्ध मान लेने पर उनकी व्याप्ति भी माननी पड़ेगी । और ऐसा संबन्ध मुखपाटन पूरण आदि का प्रयाजक नहीं है, यदि शब्द और अर्थ का संयोग, तादात्म्य आदि संबन्ध हो तभी मोदक शब्द से मुख के पुरण और क्षुरशब्द से मुखपाटन का प्रसंग होता है । पूर्वोक्त संबन्ध ऐसा नहीं है, अतः वैसा प्रसंग भी नहीं होगा । इस शंका का उत्तर ' सामयिकत्वादर्थस्य ' इस सूत्र में दिया गया है | शब्द और अर्थ का संबन्ध सांकेतिक है, अतः इसमें व्याप्ति की अपेक्षा नहीं है । संकेत शक्तिग्रह के अधीन होता है, अतः उसकी शक्ति रूप संबन्ध से व्याति नहीं होगी, क्योंकि व्याप्ति वृत्तिनियामक संयोगादि संबन्ध के अधीन होती है बिना शक्ति के संबन्ध after a fores ीं ' है । ' जातिविशेषे ० ' इत्यादि सूत्र में यह बताया गया है कि ऋषि, आर्य और म्लेच्छ इन सबमें अपनी अपनी इच्छा के अनुसार अर्थ बोध के लिये शब्दों की व्यवस्था है, इसलिये यह संबन्ध सामयिक है, स्वाभाविक नहीं | जैसे प्रकाश बिना जाति का भेदनात किये सर्वे के लिये समानरूप से रूपग्रहण में सहायक होता है, वैसा यहाँ पर नहीं है । आर्य यव शब्द से जी का ग्रहण करते हैं और भले मुका । एक ही शब्द के अनेक अर्थ होने पर भी जिस व्यक्ति को जिस अर्थ में शक्ति बोध होता है, उसको उसी अ की अति होती है । इस तरह से सिद्धान्त में अर्थ की व्यवस्था बन जाती है । ३
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वेदार्थपारिजातः लौकिकवैदिकशब्दयोः स्वतन्त्रं प्रामाण्यम् तस्माच्छब्दस्य स्वतन्त्रमेव प्रामाण्यमव्याहतम् । शब्दमन्तरा मातापित्रादिज्ञानस्याप्यसम्भवात् । सर्वत्रैव मनुष्येषु दायविवाहादिप्रथा विद्यने । नाना विधिनिषेधा अपि तत्र तत्र दृश्यन्ते । न च पित्रादिज्ञानमन्तरा तन्निर्वाहः । तेन सर्वत्रैव शब्दप्रामाण्यव्यवस्था दृश्यते । किञ्च पश्वाद्यपेक्षया मनुष्येषु धर्ममूलकमेव वैशिष्ट्यम् । धर्मज्ञानञ्च न शब्दमन्तरेति सर्वत्रैव शास्त्रप्रामाण्यमपि । तदुक्तम्-मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः ॥ इति । तत्रापि प्राकृताद्यपभ्रंशमयशब्दापेक्षया तत्प्रकृतिभूतसाधुसंस्कृतशब्दानां कोऽपि विलक्षणो माहात्म्यातिशयः, येषामधिकारिकर्तृकोच्चारणेनापि पुण्यजनिः, दोष- बाधविधुरस्य शब्दविशेषस्य कोऽपि माहात्म्यविशेष: सुख्यात एव । तदभ्यासे वाचां क्रियाफलाश्रयत्वं सम्पद्यते । लौकिकानां हि साधूनामर्थं वागनुवर्तते । ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ॥ ( उ ० रा ० च ० १।१० ) तेनैव कस्यचित् तपोधनस्य वाचैव नहुषस्य सर्पत्वम्, कस्यचित् सत्यव्रतस्य वाचैव नन्दिनस्तेनैव देहेन देवत्वं सम्पन्नमिति पौराणिका: । ' नास्ति सत्यसमो धर्मः । ' ( म ० भा ० अनु ० प ० ६२१ ९ २ ), ' अश्रमेधसहस्रञ्च सत्यश्च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राच्च सत्यमेव विशिष्यते ॥ ' ( महा ० आ ० प ० ७४ | १०३; शा ० प ० १६२/२६ अनु ० प ० ७५ / २ ९ ) लौकिक और वैदिक शब्द का स्वतन्त्र प्रामाण्य इसलिये शब्द के स्वतन्त्र प्रमाण होने में कोई बाधा नहीं है । शब्द के बिना मनुष्य को माता - पिता का ज्ञान भी न हो सकेगा । संसार में सभी जगह उत्तराधिकार, विवाह आदि की व्यवस्था है । भाँति - भाँति के विधान और निषेध, क्या करणीय है और क्या अकरणीय, सभी देशों के मनुष्य - समाज में प्रचलित हैं । माता - पिता के ज्ञान के बिना इन सब व्यवहारों का निर्वाह नहीं हो सकता है इस तरह सभी जगह शब्द का प्रामाण्य व्यवस्थित रूप से देखा जाता है । एक बात और है, पशु आदि की दृष्टि से मनुष्य में यही विशेषता है कि वह धर्म का आचरण करता है । इस धर्म का ज्ञान बिना शब्द के नहीं हो सकता, अतः सभी जगह शास्त्र का भी प्रामाण्य afrat रूप से मानना पड़ता है । किसी ने कहा है-प्रत्यक्षादि के आश्रित बुद्धि का अनुसरण करने वाले मनुष्य वानर है, अर्थात् वे मनुष्य होते हुए भी पशुतुल्य हैं । वास्तव में मनुष्य के ही है, जो कि शास्त्रों का अनुसरण करते हैं । भी प्राकृतिक, अपभ्रंश आदि भाषाओं के शब्दों की अपेक्षा से माओं को प्रकृति संस्कृत भाषा के शब्दों की कोई reat after है, जिनके कि अधिकारी पुरुष द्वारा किये गये उच्चारण से पुण्य लाभ होता है । कारणदोष और विषयबाध मे रहित शब्द के उच्चारण की महिमा सभी जगह प्रसिद्ध है | ऐसी बाणी क्रियाफल का आश्रम होती है, उस वाणी के अनुसार क्रियाफल सम्पन्न होता है । उत्तररामचरित में भवभूति ने कहा है ----लोक व्यवहार में पड़े हुए साधुओं की वाणी अर्थ का अनुसरण करती है, किन्तु प्राचीन ऋषियों की वाणी का अनुसरण अर्थ करता है | इसका यह अभिप्राय है कि साधारण मनुष्य सिद्ध वस्तु का अनुसरण करते हुए ही तदनुसार शब्दों का प्रयोग करता है । इसके विपरीत ऋषिगण जो कुछ कह देते हैं, तदनुसार ही सब कुछ सम्पन्न हो जाता है । इसीलिए किसी aurat की वाणी से ही नप के सर्प हो जाने की तथा किसी सत्यव्रत की वाणी से नन्दी के इसी देह में देव बन जाने की कथा पुराणों में वर्णित है । " सत्य के समान तप नहीं है । " " तराजू के एक पलड़े पर सत्य और दूसरे पर हजार अमे यज्ञों को रखा गया, किन्तु अकेला सत्य हजार अश्वमेधों से भारी पड़ा । " इन वाक्यों में उसकी महिमा स्पष्ट है । मिथ्यावादी की भी सत्यवाणी का आदर किया जाता है, तो फिर सत्यवादी की उक्तियाँ क्यों न माहत होंगी? सत्यव्रत ऋषियों की तप और सत्य का
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वेदार्थपारिजातः इति तन्माहात्म्योक्तिः सुस्फुटैव । मृषावादिनामपि सत्योतिराद्रियते किमुत सत्यवादिनां तथोक्तयः सत्यव्रता-नामृषीणां सुसिद्धानामृतसत्यनिष्ठानां देवानां देवदेवानामीश्वरस्य चोक्तयो दोषबाध वैधुर्यतारतम्येनोत्तरोत्तरं विशिष्यन्ते । तदपेक्षयापि स्वप्रकाश परब्रह्म निःश्वसितप्रायाणां पुरुषमात्र बुद्धिप्रयत्ननिरपेक्षाणामपास्तसमस्तपुंदोषशङ्काकलङ्कपङ्कानां तदीयनित्यानन्तज्ञानातुविद्धा कृत्रिमनित्यपौरुषेयशब्दराश्यात्मकमन्त्रब्राह्मणात्मकानां वेदानां सर्वातिशायी माहात्म्याति-शयस्तु सर्वत्र जागर्तितमाम् । येषामनुग्रहादेव धर्मब्रह्मादयोऽतीन्द्रिया अपि पदार्थाः करतलगतामलकायन्ते । तत एव स्वात्माय-बोधनाय करुणावरुणालयस्याकारणकरुणस्य सर्वेश्वरस्यैव वेदात्मना विशिष्यावतरणं मन्यन्ते वैदिका: -" वेदो नारायणः साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः || " इत्यादिव्यासोः । वेदलक्षणम् तन्त्रागमपुराणन्यायसांख्ययोगमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गोपबृंहितविविधानवद्यविद्योद्गमस्थानभूतानां वेदानां सर्वार्थविद्योतत्वं निरुपचरितमेव । " वेदशब्देभ्य एवादी पृथक् संस्थाश्च निर्ममे " 1 ( म ० ११२१ ), " शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् " ( वे ० ११३१२८ ), " शास्त्रयोनित्वात् " ( वे ० १ | १ | ३ ) इति रीत्या विश्वस्रष्टृतत्सृष्टिप्रकाशकत्वेन वेदानामनितरसाधारणं माहात्म्यम् । " मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् " इत्यापस्तम्बादिभिस्तत्स्वरूपावबोधकं लक्षणं विहितम् । आचरण करने वाले सिद्धों की देवताओं की, देवाधीशों की और ईश्वर की वाणी में उत्तरोत्तर विशिष्टता इस लिए है कि इनमें क्रमशः दोष और बाघ का तरतमभाव कम होता जाता है । इनकी अपेक्षा से मी स्वप्रकाश परब्रह्म के निःश्वासरूप, पुरुष मात्र की बुद्धि और प्रयत्न से निरपेक्ष होने से जिनमें समस्त पुरुषबुद्धिजन्य दोषों की शंका नहीं हो सकती, परब्रह्म के नित्य, अनन्त ध्यान से अनुविद्ध होने से जो अकृत्रिम, नित्य, अनन्त हैं, ऐसे अपौरुषेय शब्दराशिस्वरूप मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों की महिमा तो सर्वातिप्राय है हो ' । इन्हीं की कृपा से धर्म और ब्रह्म जैसे अतीन्द्रिय पदार्थों की अवति हाथ में रखे आंवले की तरह स्पष्ट हो जाती है । स्वात्म स्वरूप के अवबोध कराने के लिए अकारण करुणा करने वाले करुणा के समुद्र भगवान ही अपने आप को वेद के रूप में विशिष्ट अवतार के रूप में प्रकट करते हैं | व्यास ने कहा है कि ----" साक्षात् नारायण ही स्वयं वेदों के रूप में प्रकट हुए, ऐसा हमने सुना है | वेद ईश्वर स्वरूप ही है, अतः बड़े - बड़े विद्वान् इसके स्वरूप कोने में असमर्थ हो जाते " वेद का लक्षण तन्त्र, आगम, पुराण, न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा, धर्मशास्त्र और षडङ्ग से युक्त विविध अनवध विद्यानों के उद्गम-स्थान वेदों की प्रकाशकता स्वतः सिद्ध है । " प्रारम्भ में ब्रह्मा ने वेद के शब्दों के आधार पर सबके भिन्न - भिन्न नाम, aiser कर्म और जीवन - यापन की व्यवस्था की । " इस मनुस्मृति के वचन के आधार पर " शब्द इति " इत्यादि वेदान्त सूत्रों के आधार पर भी fara को सृष्टि करने और उसको प्रकाशित करने में वेदों का असाधारण माहात्म्य ज्ञात होता है । उसी वेद के स्वरूप को बताने वाला लक्षण आपस्तम्ब प्रभृति ने किया है कि मन्त्र और ब्राह्मणभाग इन दोनों का नाम वेद है । उदयनाचार्य ने वेद का लक्षण यह किया है कि जिसका दूसरा मूल कहीं उपलब्ध नहीं है और महाजनों अर्थात् मस्तिक लोगों ने वेद के रूप में मान्यता दी हो, उन मानुपूर्वी विशिष्ट वाक्यों को वेद कहते हैं । प्राचीन आचार्यों ने उसका लक्षण इस प्रकार किया है - शब्दातिरिक्त एव १. सभी नामों में शब्द का अनुषोष होता है । अतः परमेश्वर के नित्य ज्ञान में शब्दों का अनुवोध अनिवार्य है, ईश्वर के अनादि ज्ञानों में अनुविद्ध कन्दराशि ही वेद है । ' म सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमाहले ( वा ० १० १.११३ ) | वाक्य लक्षण में आने वाले पदों का कार्य पदकृत्य कहलाता है । अर्थात् इस लक्षण में कौन सा पद किस लक्ष्य भिन्न की व्यावृत्ति करने के लिए दिया गया है, इस बात को समझाना पदकृत्य का काम है । तात्पर्य यह है कि लक्षण का प्रत्येक पद सार्थक होना चाहिए, जिससे लक्ष्यभिन्न में लक्षण न चला जाय ।
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वेदार्थपारिजातः “ अनुपलभ्यमानमूलान्तरत्वे सति महाजनपरिगृहीतवाक्यत्वं वेदत्वम् " इत्युदयनाचार्येणापि तल्लक्षितम् । " शब्दातिरिक्तं शब्दोपजीविप्रमाणातिरिक्तं च यत्प्रमाणं तज्जन्यप्रमितिविषयानतिरिक्तार्थको यो यस्तदन्यत्वे सति आमुष्मिक सुखजन-sheartened सति जन्यज्ञानाजन्यो यो प्रमाणशब्दस्तत्वं वेदत्वम् " इति च प्राचीनैस्तल्लक्षणमुक्तम् । अत्र व्यासादिचाक्षुषादिप्रत्यक्षजन्ये दृष्टार्थ के भारतायुर्वेदादिभागेऽतिव्याप्तिवारणाय प्रथमसत्यन्तम् । इत्थं च तदुभयातिरिक्तं प्रमाणं चक्षुरादिरेव तज्जन्यप्रमितिविषयार्थकतया तयोर्नातिव्याप्तिः । न च दृष्टार्थकवेदभागस्यापि लक्ष्यतया कथं तत्र लक्षणसमन्वय इति वाच्यम्, अत्रार्थपदस्य मुख्यतात्पर्यविषयपरत्वाद् मीमांसकनये विध्यर्थं एव मुख्य-तात्पर्यविषयः । न्यायनयेऽपि " स्वार्थद्वारेव तात्पर्यं तस्य स्वर्गादिवद्विधो " इति रीत्या विध्यर्थं एव तेषां मुख्यं तात्पर्यम् । अत एव सत्यन्तेऽनतिरिक्तेति । तथा च तेषां दृष्टार्थकत्वेऽपि नाव्याप्तिः । प्रमित्यविषयार्थकत्वमात्रोक्तावसम्भव इति जन्यान्तं प्रमितिविशेषणम् । शब्दोपजीव्यतिरिक्तेन प्रमाणेन वेदात्मकशब्देन वेदार्थस्य प्रमापणात् शब्दातिरिक्तपदस्य प्रमाणविशेष णतया निवेश: । मन्त्रावयवभूतवाक्येऽतिव्याप्तिवारणाय द्वितीयसत्यन्तम् । एवं स्तोभेऽतिव्याप्तिवारणाय प्रमाणशब्दनिवेशः । शब्दोपजीवी जो प्रमाण ( श्रुतार्थापत्ति आदि ) उससे अतिरिक्त जो प्रमाण चक्षुरादि तज्जन्य प्रमिति का जो विषय उस विषय से अनति-रिक्तार्थक जो प्रमाण उससे भिन्न होकर, पारलौकिक मुखजनक उच्चारणवाला, तथा जन्य ज्ञान से अजन्य जो प्रमाण शब्द है, वहीं वेद है । यदि इतना ही लक्षण किया जाय कि प्रमाण शब्द वेद है, तो यह लक्षण महामारत आयुर्वेद आदि के दृष्टार्थ भाग में भी चला जायगा, अतः यह वेद का लक्षण अतिव्याप्ति दोषग्रस्त होने से दोषयुक्त होगा । जो लक्षण लक्ष्य में घटित होता हुआ अलक्ष्य में भी चला जाय उस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष माना जाता है । जैसे गाय का लक्षण शृङ्गित्व ( सोंगवाला जानवर गाय है ) यदि किया जाय तो यह लक्षण गाय के साथ - माथ महिप ( भैंसा ) में भी चला जायगा । अतः यह लक्षण अतिव्याप्ति दोषग्रस्त होने से गाय का ठीक लक्षण नहीं कहा जा सकता । इस दोष को दूर करने के लिए प्रमाण शब्द रूप वेद के लक्षण में विशेषण दिया गया शब्दातिरिक्त आदि प्रथम अंश | इससे महाभारत के दृष्टार्थ माग ( जो व्यासादि के चाक्षुषादि प्रत्यक्षजन्य हैं उस ) भाग में उक्त लक्षण नहीं गया, कारण वह प्रमाण होते हुए भी रुक्षुरादि जन्य प्रमिति के विषय से अनतिरिक्तार्थक हो है, मित्र नहीं । इसलिए महाभारत अथवा आयुर्वेद के भाग में यह लक्षण नहीं जा सकता । इस पर कहा जा सकता है कि फिर तो अर्थवादादि जो वेद के दृष्टार्थ भाग हैं यहां भी लक्षण नहीं जायगा और वेद का लक्षण अव्याप्ति दोषग्रस्त हो गया, क्योंकि लक्ष्य के एक देश में लक्षण न जाना अव्याप्ति दोष होता है जैसे यदि गाय का लक्षण शुक्लत्व ( अर्थात् जा श्वेत वर्ण की हो वह गाय है ) तो यह लक्षण स्वेत गाय में भले हो जाय, परन्तु तद्भिन्न लाल या काली गाय में नहीं जायगा, अतः अव्याप्तिदोष युक्त होने यह वेद का लक्षण ठीक नहीं, ऐसा कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि लक्षण के प्रथम अंश में कहा गया है ' चक्षुरादिजन्यप्रमिति के विषय से अतिरिक्त अर्थ को प्रकाशित करनेवाला ' इसमें अर्थ शब्द का अर्थ है मुख्य तात्पर्य का विषय | अर्थवाद का तात्पर्य उसके अक्षरार्थ में न होकर विध्यर्थ की प्रशंसा में है, अतः विध्वर्थ हो अर्थवाद का अर्थ है और विध्यर्थं प्रत्यक्षादि का विषय नहीं उससे भिन्न होने से वहाँ भी लक्षण चला जायगा अतः अव्याप्तिदोष न होगा | मुख्य यदि ' चक्षुरादिजन्य प्रमिति के विषय से अनतिरिक्तार्थक से भिन्न ऐसा न कहकर प्रमिति का अविषय ऐसा ही कहा जाय तो यह लक्षण असम्भव दोषग्रस्त हो जायगा । कहीं भी लक्ष्य में जो लक्षण न जाय उसमें असम्भव दोष होता है, जैसे गाय का लक्षण किया एक सुरत्व ( एक खुरवाली ) तो यह लक्षण किसी भी गाय में न जायगा कारण सभी गायों के खुर बीच में फटे होते हैं । इसी तरह नैयायिकों के सिद्धान्त से सभी कुछ प्रमिति का विषय है अविषय कुछ भी नहीं; अतः यह लक्षण कहीं भी नहीं जा सकेगा । प्रथम अंश में यदि शब्दातिरिक्त विशेषण न दें तो शब्दोपजीवी प्रमाण से अतिरिक्त स्वयं वेद शब्द उसकी प्रमिति का विषय ही समस्त aar है, अतः लक्षण कहीं भी नहीं जायगा, अन्ततोगत्वा असम्भव बना ही रहेगा । इसीलिए ' शब्दातिरिक्त ' यह विशेषण प्रमाण का दिया गया । अब लक्षण चला जायगा कारण ' वेदशब्द ' शन्दातिरिक्त प्रमाण नहीं है । शब्दातिरिक्त प्रमाणजन्य प्रमिति विषयानतिरिक्तार्थ से भिन्न है । अत: असम्भव दोष न होगा | इतना होने पर भी मन्त्र के एक देश में ( जो वेद नहीं है ) लक्षण चला जायगा इससे अतिव्याप्त दोष होगा | ( यहाँ यह ज्ञातव्य है कि सम्पूर्ण are et उच्चारण न करके मन्त्र के एक देश का उच्चारण किया जाय तो उसमें वेदत्व नहीं रहता ) अतः दूसरा विशेषण दिया गया पारलौकिक सुखजनक उच्चारण वाला । अब यह लक्षण नहीं गया कारण