वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 321–330
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 321–330
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वेदार्थ पारिजात २ ९ १ व्यवहाराभावे तदपलापस्याप्यसभवात् । पौरुषेयत्वेन तु पुरुषाश्रितभ्रमप्रमादविप्रलिप्सादिभिरप्रामाण्यमपि शब्दे शङ्क ेत । तदभावात्तु सुतरा तदनाशङ्कनीयम् । स्थालीपुलाकन्यायेन च दृष्टफलाना वाक्यानामिवान्येषामपि बुद्धया-रोहण शक्यमेव, प्रामाण्यस्वतस्त्वाम्युपगमेन प्रामाण्यस्यान्यानायत्तत्वात् । यदुक्त दृष्टविशेषेन तदप्रामाण्यम्, तत्तुच्छम् प्रामाण्यबलाबल विवेकानवधारणात् । तथाहि किं प्रत्यक्ष-मन्येन मानेन न बाध्यते, बाध्यते वा? नाद्य त्वन्मते घटादिस्थायित्व प्रत्यक्षस्य क्षणिकत्वानुमानेन बाधदर्शनात् । शुक्तौ राजतज्ञानस्य च नेद रजतमिति बाधदर्शनात् । चन्द्रसूर्य्यप्रादेशिकत्वस्यानुमानागमाभ्या बाघाच्च । किञ्च, प्रत्यक्षानुमानानवगतार्थबोधने वेदस्य प्रवृत्ति | आगमप्रामाण्यस्य सर्वतो बलवत्वेन दृष्टादिविरोधस्याकिञ्चित्कर-त्वाच्च । अपि च बोद्धादिजातकेषु जडमूर्त्यादिकर्तृका बुद्धप्रणतिरुक्ता । सा च प्रत्यक्षविरुद्वैव । लङ्कावतारसूत्रेषु प्रत्यक्ष-विरुद्धाचमत्कृतयो वर्णिता सन्ति । न चागमबोध्येऽर्थे प्रत्यक्षानुमानप्रवृत्तिरिति भिन्नविषयत्वेन कुतो विरोध । नहि श्रोत्राधिगतस्य शब्दस्य नेत्रानवगतत्व दूषणम्, तथैव वाक्यबोधितस्याग्निहोत्रहो मस्वर्गकार्यकारणभावस्य न प्रत्यक्षादि-विषयत्वम् । न च तदभाव प्रत्यक्षादिना दृश्यते । ' न खलु क्षणभङ्गित्वे भावानामक्षजा मति । न भूमिरनुमानस्य विकल्पनिय स्थिते ॥ स्मरणप्रत्यभिज्ञाने प्रत्युत स्थैर्य्यसाधके । एवञ्च वञ्चनामात्रमा शुनाशित्व देशना ॥ ' इति । यदप्युच्यते - नाश प्रत्यनपेक्षत्वात् क्षणिका पदार्था इति, तदपि यत्किञ्चित् दण्डादिव्यापाराभ्वय-हलवाहे से लेकर सभी लोग समान रूप से जानते हैं । उसका अपलाप ( झुठलाना ) यह कहने के समान है कि मेरे मुँह में जीभ नहीं है । शब्द का प्रयोग किये बिना इस तरह का अपलाप भी नहीं किया जा सकता । शब्द व्यवहार की पौरुषेयता के मानने पर पुरुषाश्रित अम प्रमाद, विप्रलिप्सा आदि दोषो के कारण शब्द में भी अप्रामाण्य दोष आ सकता है । वेद में तो पुरुष के अभाव में दोष भी नहीं उठेंगे । स्थालीला न्याय से दृष्टफल वाक्यों के प्रमाण पर अदृष्ट फल वाक्यों का भी प्रामाण्य सरलता समझा जा सकता है । हम प्रामाण्य का स्वतस्त्व मानते हैं, अत वेद का प्रामाण्य भी पराधीन नहीं हो सकता । दृष्ट विरोध के आधार पर वेद का अप्रामाण्य सिद्ध करना भी व्यर्थ है, क्योंकि ऐसा कहने वाले प्रामाण्य के बलाबल के heat are a far नहीं कर पाते | आप यह बताइये कि प्रत्यक्ष का अन्य प्रमाण से बाघ होता है या नहीं? अन्तिम पक्ष आपके मत में नही बन सकता, क्योकि आप घट आदि की स्थायिता के प्रत्यक्ष का उसकी क्षणिकता को सिद्ध करने वाले अनुमान से बाध मानते हैं । शुक्ति में हुए रजत ज्ञान का ' यह रजत नही है ' इस ज्ञान से बाघ सभी मानते हैं । चन्द्र, सूर्य आदि छोटे आकार वाले है, यह प्रत्यक्ष ज्ञान का बाप अनुमान और आगम दोनो से होता है । वेद की प्रवृत्ति प्रत्यक्ष और अनुमान से अनविगत ( अज्ञात ) वस्तु के बोध के लिये होती है | आगम का प्रामाण्य ही सर्वाधिक बलशाली है, अत उसके सामने दृष्ट आदि के विरोध का कोई मूल्य नहीं है । बौद्ध जातक कथाओं में भी बताया गया है कि जड़ पदार्थ भी भगवान् बुद्ध की प्रगति करते थे । क्या यह बात प्रत्यक्ष विरुद्ध नही है? लङ्कावतार सूत्र में इस तरह के प्रत्यक्ष - विरुद्ध अनेक चमत्कारो का वर्णन मिलता है । आगम से बोषित होने वाले विषय में प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती । इस तरह से इनका विषय भिन्न होने से परस्पर विरोध का प्रसंग ही कहीं उठता है? श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होने वाले शब्द का ज्ञान यदि नेत्रेन्द्रिय से नही होता, तो इसको कोई दूषण नही मानता, उसी तरह से वेदवाक्य से बोधित होने वाली अग्निहोत्र होम की स्वर्गरूप कार्य को कारणता का भी बोध प्रत्यक्षादि प्रमाणो से न हो, इसमें भी कोई दोष नहीं होगा । उसका अभाव प्रत्यक्ष आदि से नही सिद्ध किया जा सकता । जगत् के सभी पदार्थों की क्षणिकता प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर नहीं सिद्ध की जा सकती । अनुमान की प्रवृत्ति निय na fre ल्प विषयो में ही होती है, अस यहाँ पर उसकी भी पहुँच नहीं हो सकती । इसके विपरीत स्मृति और प्रत्यभिज्ञा इन भावों की स्थिरता के सिद्ध करने में ही सहायक होते हैं । इस तरह से पदार्थों को क्षणिकता का उपदेश प्रवचनामात्र है । यह कहना भी गलत है कि नाश के लिए किसी की अपेक्षा न रहने से सभी पदार्थ क्षणिक हैं, क्योंकि यह सिद्ध किया जा सकता है कि घट आदि के अभाव रूप काय का भी दण्ड आदि के प्रहार के साथ अन्वयव्यतिरेकाल्पक सबन्ध है, अर्थात् घटादि का नाश भी
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२६२ वेदाथपारिजात व्यतिरेकानुविधायिनस्तत्कार्य्यस्य घटाद्यभावस्य साधयितु शक्यत्वात । प्रध्वसाभावश्च विनाश | नश्वरानश्वरादि + विकल्पास्तु न साधव -' सामग्रयधीन प्रध्वसो भावानामात्मलाभवत् ' इति । मुद्गरादिसामग्र्या घटस्य किं क्रियते, मृत्पिण्डदण्डसामग्र्या किमस्य क्रियते? आत्मलाभ इति चेदनया यामाह्वान करिष्यते । ननु नश्वरत्वेन तत्कारण मूलमनश्वरत्वे त्वशक्तमिति चेदुत्पत्तावपि भवनस्वभावश्चेद् घट स्वत एव भवति हि दण्डसामग्र्या, अभवनस्वभावस्तु कर्तुमशक्य, सरविषाणवदिति कारकव्यापारे कार्यत्वदर्शनाद-पर्यनुयोग एवेति चेद्विनाशेऽपि सम, उत्पत्तिवद्विनाशस्यापि कारकान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् । तस्मादुत्पन्नमात्रस्य विनाशो नास्ति वस्तुत । अविनाशकसद्भावादवस्थानमिति स्थितम् ॥ यदि लब्धस्वरूपोऽपि न नष्ट प्रथमे क्षणे । हेत्वन्तराद्विनाशोऽस्य न स्वरूपनिबन्धन ॥ ' इति । ननु सापेक्षाणा भावाना नावश्य भाविता भवेदिति घटस्य विनाशहेतुर्नोपनिपतेदपि कदाचिदित्येवममी कि नित्य एव भवतु, यदि घटो नित्यो भवेत्तदा दुष्प्रतरोऽय दोष इति नैष दोष, सावयवस्य साश्रयस्य काव्यस्य नूनमवयवविभागादाश्रयविनाशाद्वा भवितव्यमेव विनाशेनेति न तन्नित्यत्वावसर । अपि चानिमेपदृष्टेरत्रुटितसत्ताक -स्तम्भादिपदार्थग्राहिप्रत्यक्षमुपपद्यते । निरपेक्ष न होकर दण्डा आदि के प्रहार की अपेक्षा रखता है । प्रध्वसाभाव ही विनाश कहलाता है । अनश्वर, नश्वर आदि के विषय में उठाये जाने वाले विकल्प सही नहीं है । ' पदार्थों की सत्ता जैसे सकारणक होती है, उसी तरह से उसका प्रध्वस भी सामग्री की सहायता से ही होता है ' । प्रश्न होता है कि मुद्गर आदि सामग्री से घट का क्या किया जाता है? तो इसके पहले आप यह बताइये कि मिट्टी के पिण्ड, दण्ड प्रभूति से घट का क्या किया जाता है? यदि आप कहें कि ये उसके स्वरूप लाभ में सहायक होते है, तो मुद्गर आदि सामग्री से उसके स्वरूप की हानि होगी । पुन प्रश्न उठता है कि नश्वर पदार्थों के लिए यह कहा जा सकता है, किन्तु अनश्वर पदार्थों में यह हो नहीं सकता, अत उत्पत्ति अवस्था में भी यदि घट का यह स्वरूप ही है, तो वह दण्ड आदि सामग्री से स्वत हो जायगा और यदि अवयव स्वभाव है, तो उस सामग्री की सहायता से भी उसको पैदा नही किया जा सकता । जैसे कि खरगोश के सीग को किसी भी तरह से पैदा नहीं किया जा सकता । इस तरह से कारक व्यापार के अनन्तर कार्यत्व की सिद्धि को देखकर इसमें कोई आक्षेप सभव नही हो सकता, तो इसका उत्तर यह है कि यही बात पदार्थों के विनाश के प्रति भी लागू होती है, क्योकि उत्पत्ति के समान विनाश में भी कारक व्यापार का अन्वयव्यतिरेक विद्यमान है । इसलिए उत्पन्न मात्र सभी पदार्थों का विनाश वस्तुतः नही होता | अनेक अविनाशी पदार्थ देखे जाते हैं, अतः इनकी स्थिति माननी ही पड़ती है । यदि कोई पदार्थ स्वरूप लाभ के बाद प्रथम क्षण में नष्ट नही हुआ, तो बाद में उसके विनाश का कारण किसी अन्य पदार्थ को ही मानना पडेगा,, उसका स्वरूप स्वाभाविक विनाश नही माना जा सकता । प्रश्न है कि ' भावो की सज्ञा हेतु सापेक्ष है, अत यह जरूरी नहीं है कि वे सदा विद्यमान रहें ही, इसी तरह से यह भी हो सकता है कि घटादि के विनाश के कारण मुद्गरादि का कभी उनसे सपर्क हो न हो, सो क्या वह इस स्थिति में नित्य माना जायगा? यदि हम घर को भी नित्य मान लेते है, तो फिर इस संसार से छुटकारा पाना बडा कठिन हो जायगा । पर इसका उत्तर यह है कि कार्य जब सावयव और साथय है, तो उसका अवयवों के विभाग से अथवा आश्रय के विनाश से विनाश अवश्य ही होगा, तब उनकी नित्यता की आपत्ति का कोई अवसर नहीं रह जायगा । दूसरी बात अपलक नेत्रो से देखने वाले व्यक्ति को निरन्तर अत्रुटि सता वाले स्तम्भादि पदार्थों का ज्ञान कराने वाला प्रत्यक्ष होता ही है ।
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वेदार्थपारिजात २ ९ ३ यच्चोक्तमतीतानागतक्षणयोरसन्निहितत्वेन प्रत्यक्षग्राह्यताऽनुपपत्ते वर्तमानक्षणस्य चातिसूक्ष्मत्वात् तत्काल-ग्राहिणा प्रत्यक्षेण क्षणिक्त्व गृहीत भवतीति तदपि नि सारम्, अतीतानागताग्रहणेऽपि वर्तमान एव कियान् कालोऽनिमेषदर्शनस्येति चिन्त्यमाने निमेषकृतस्यापि दर्शन विच्छेदस्यानवकाशात् । यावद् दशन न विच्छिन्न तावद्वर्तमान काल इति तद् ग्रहणे स्थैय्र्यस्यैव ग्रहणेन क्षणभङ्गभङ्गात् । ननु तावानसी काल स क्षणसमुदायो न क्षण । क्षणश्चक एव वर्तमानो भवति । न तत पूर्वापरी क्षणा-तीतानागतौ भवत । तयोश्च न ग्रहणमित्युक्तमिति चेन्न, भावानवबोधात् । तथाहि सिद्ध क्षणिकत्वे एव शक्यते वक्तुम्, न तत्साधनावसरे । कालो ह्येको नित्यो विभुश्चेति सिद्धान्ते न क्षणसमुदायात्मा काल । कालस्य तु भेदाः क्रियोपजन-विनाशाद्युपनिबन्घना कल्पन्ते, तस्मादनिमेषदृष्टेर्देशन विच्छेदानुपनहात्तावानेक काल । स वर्तमान एव । यदुक्त कालो नाम न कश्चित् पारमार्थिक | पदार्थ एव परिदृश्यमानो वर्तमानादिव्यवहारहेतु । स च न चिरमनुभूयत इति क्षणिक उच्यते । तथाप्यनिमेषदृष्टिनाऽऽदृष्टिविच्छेदादविच्छिन्नसत्ताकस्यैव पदार्थस्य दृश्यमानत्वेन क्षणिकत्वासिद्ध । ननु ज्ञान त्वन्मतेऽपि न स्थिरम्, तथा च प्रथमे ज्ञाने क्षीणे केन सोऽर्थो ग्रहीष्यते? ज्ञानान्तरेण चेत् स एवेत्यत्र को निश्चय? तदपि न, धारावाहिकस्थले ज्ञानस्यापि स्थैर्य्याभ्युपगमात् । अथवा नहि विषयप्रतिभासकाले f बौद्ध पक्ष से पुन शका उठाई जाती है कि ' अतीत और अनागत क्षण सन्निहित नही है, मत उनका ग्रहण प्रत्यक्ष प्रमाण से नही होता । वतमान क्षण अत्यन्त सूक्ष्म है, अत उसका उसी क्षण में प्रत्यक्ष क्षणिक रूप में ही हो सकता है ' । किन्तु यह कथन भीतिसार है, क्योकि अतीत और अनागत क्षणो का ज्ञान न होने पर भी निर्निमेष दर्शन का वर्तमान काल हो कितना है? ऐसा विचार करने पर एक निमेष के लिए भी दर्शन के विच्छेद का अवसर नही है । जब तक दर्शन का विच्छेद नही होगा, तब तक वर्तमान काल की ही सत्ता रहेगी और उसके ज्ञान से स्थिरता का ही ज्ञान होगा । अत क्षणभग का सिद्धान्त स्वय ही नष्ट हो जायगा । इस पर बोद्ध पक्ष का कहना है कि ' इतना पूरा काल क्षणसमुदाय कहलाता है, एक क्षण नहीं । एक ही क्षण वर्तमान कहलाता है । उसके पूर्व का क्षण अतीत और अपर क्षण मनागत कहलाता है । इन अतीत और अनागत क्षणो का ग्रहण ( ज्ञान ) नही होगा ' | किन्तु यह पूरा कथन हमारे अभिप्राय को ठीक से न समझ पाने के कारण हैं, क्योंकि क्षणिकता की सिद्धि हो जाने पर ही आप ऐसा कह सकते है, उसकी सिद्धि तो अभी करना है । अत क्षणिकत्व को सिद्ध करते समय आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? काल एक, नित्य और विभु है, इस सिद्धान्त में ' उसको क्षणों का समुदायस्वरूप नही माना जाता । क्रियाओ की उत्पत्ति और विनाश के आधार पर काल के अनेक भेद कल्पित कर लिए जाते हैं । इसलिए अनिमेष दृष्टि वाले व्यक्ति के दर्शन का विच्छेद न होने से उतना काम एक ही माना जायगा और यह वर्तमान काल ही कहा जायगा । atar का कहना है कि काल कोई पारमार्थिक पदार्थ नहीं हैं । पदाथ ही परिदृश्यमान प्रभृति के भेद से वर्तमान आदि के व्यवहार का कारण होता है । इसकी प्रतीति चिरकाल तक नहीं होती, इसलिए यह क्षणिक कहा जाता है । किन्तु यह कथन इसलिए raa है कि अनिमेष दृष्टि वाले व्यक्ति को दृष्टि त्रिछेद पर्यन्त अविच्छिन्न सत्ता वाले एक ही पदार्थ की प्रतीति होती है, व्रत उसको क्षणिक नही कहा जा सकता । ata प्रश्न करता है कि ज्ञान आपके मत में स्थिर नहीं है । जब प्रथम ज्ञान के क्षीण हो जाने पर उसके अर्थ ( विषय ) का ग्रहण कौन करेगा? यदि ज्ञानान्तर से उसका ग्रहण होगा तो कि धारावाहिक ज्ञान स्थल में ज्ञान को भी स्थिर माना जाता है वही विषय है, इसका निश्चय कैसे होगा? इसका उत्तर यह है । अथवा विषय के ज्ञान के समय ज्ञान का तो भान होता नहीं,
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२ ९ ४ वेदार्थपारिजात! ज्ञानमवभासत इत्यर्थ एवाविच्छिन्नसत्ताको गृह्यते, ज्ञान तु वर्तमानकालमप्यतीतानागतकालग्राहि भवति, स्मरणमिव प्रातिभमिव च भूतभविष्यद्वृष्ट्यनुमानमिव च । ननु वेन्द्रियव्यापारोऽपि न क्षणान्तरस्थायीति तस्मिन्नसति कुतोऽस्य विगतकालग्रहणमिति वेन्त्र, विषय-ग्रहणे सन्निकर्षरूपव्यापारस्य स्थिरत्वात् । एव दर्शनादर्शने एव भावाभावावित्यपि न युक्तम्, परिच्छेद्यपरिच्छेदक-भावानुपपत्ते । बाध्यबाधकभावश्च ज्ञानाना क्वचिद्दृष्ट । स च न स्थात्, सर्वथा क्षणिकत्वे पूर्वावगतरजतादिविषय-ग्राहिणो ज्ञानस्य गृहीतमुद्गरदलितघटाभाववद् बाधकत्वानुपपत्ते । पूर्वदृष्टस्य स्मरणम्, स्मृतस्य कस्यचित् प्रत्यभिज्ञानम्, प्रत्यभिज्ञातस्य गृहादेरर्घकृतस्य समापनमित्यादयो व्यवहारा क्षणभङ्गवादे विप्रलुप्येरन् । न च सन्तानमाश्रित्य तच्छक्यसमर्थनम्, सतानिनोऽभिन्नत्वे तस्यापि क्षणिकत्वाविशेषात् भिनत्वेऽपि सत्वे क्षणिकत्वापत्ति, असस्वे व्यवहारानुपपत्ति । अपि च, बौद्धमते बन्धकीवचनमपि सत्यमेव । तथाहि--इदानीमेव सञ्जाता नवीनैव सुरूपिणी । साध्वी पतिव्रता चाह क्षणभङ्गनये सदा ॥ दृष्टा च योत्पथस्था हि सा सद्य प्रलयङ्गता । तयोरेकत्व भ्रान्तिर्हि वचनान्मे व्यपोह्यताम् ॥ तत एव हि बौद्धानां वज्रयानानुयायिनाम् । चित्तरत्नस्य सक्षोभवारणार्थं स्त्रियो वृता ॥ न्यायमञ्जरीकारैरप्युक्तम्-किञ्च नाङ्गीकरोसि त्वमात्मान पारलौकिकम् । उपैषि परलोक च किमिद ते बकव्रतम् || इसलिये अच्छ सत्ता वाले विषय का ही ज्ञान होता है । ज्ञान तो वर्तमान काल में रहता हुआ भी अतीत और अनागत काल का भी ग्राहक होता है, जैसे कि स्मरण, प्रातिभ ज्ञान और भूत - भविष्यद् दृष्टि, अनुमान आदि ज्ञान वर्तमान काल में भी अनागत और मतीत काल को अपना विषय बनाते है । प्रश्न उठता है कि इन्द्रिय व्यापार भी तो क्षणान्तर में नहीं रहता । उसके न रहने पर इससे काल की निरन्तरता का ग्रहण कैसे होगा? उत्तर है कि विषय के ज्ञान के समय सनिकर्ष रूप व्यापार स्थिर माना जाता है । इसी तरह दर्शन और अदर्शन को ही हम भाव और अभाव मानें, यह भी ठीक नही है, क्योंकि इनमें परस्पर परिच्छेद्य परिच्छेदक भाव नहीं बन सकता । ज्ञानो में परस्पर बाध्यबाधक भाव भी देखा जाता है । ज्ञान की क्षणिकता में यह भी नहीं हो सकेगा, क्योकि ज्ञान यदि सर्वा क्षणिक है, तो पूर्वावगत रजतादि विषय के ग्राहक ज्ञान का उत्तर ज्ञान से बाघ न होगा, क्योकि ये दोनो ज्ञान परस्पर भिन है, अतः यहाँ पर घट ज्ञान और मुगदर को हाथ में लेकर घट को फोड देने पर उत्पन्न हुए घटाभाव ज्ञान की तरह बाध्य - arre भाव नही बन पावेगा, अर्थात् घट के रहते घट का ज्ञान हुआ, उस ज्ञान का दण्ड से घट तोडे जाने पर जो घट के भाव का ज्ञान हुआ, इससे are नहीं होता । इसी तरह रजत ज्ञान का भी उसको क्षणिक मानने पर बाध नहीं होगा । पूर्व - दृष्ट पदार्थ का स्मरण होता है, स्मृत पदार्थों में से कुछ की यह वही हैं ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है, प्रत्यभिज्ञात गृहादि यदि अधूरे हैं तो उनको पूरा किया जाता है, इस तरह के सारे व्यवहार क्षणभगवाद को मानने पर विलुप्त हो जायेंगे । क्षणसन्तान को आधार बनाकर भी इनका समर्थन नही किया जा सकता, क्योंकि सन्तानी यदि इस क्षणसन्तान से अभिन्न है तो वह भी तो समान रूप से क्षणिक ही होगा । यदि सम्तानी क्षण-सन्तान से भिन्न है, तो उसका सत्व मानने पर क्षणिकता की आपत्ति उठेगी और असत्त्व मानने पर व्यवहार नही बन सकेगा । इस बौद्ध क्षणिकवाद को मानने पर कुलटा ( व्यभिचारिणी ) का वचन भी सत्य मानना पड़ेगा, क्योकि वह कहेगी कि ' मैं जो आप से बात कर रही हैं, यह तो मेरा नवोन जन्म हैं । मैं सुरूप हूँ, साध्वी हूँ, पतिव्रता है । आपने जिस गलत रास्ते पर जाने arat को देखा था, यह तो उसी समय नष्ट हो गई । इन दोनों को एक समझने की आपकी भ्रान्ति मेरे इस कथन से मिट जाती चाहिये । इसीलिये बयान के अनुयायी बौद्धों ने वित्तरत्न के सक्षोभ की शान्ति के लिये स्त्रियों को स्वीकार किया था । म्यामार भट्टजयन्त ने भी कहा है कि- " आप पारलौकिक आत्मा को तो स्वीकार नहीं करतें, किन्तु परलोक को मानते हैं । आपका यह मत बकत ( बगुला भगती ) के पालन की तरह है । चैत्यवन्दन रूप कर्म का करने वा er सम्तानी तो कोई
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कर्मसन्तानिनाऽन्येन यत्कृत चत्यवन्दनम् । ततोऽद्य फलमन्येन भुज्यतेऽकृतकर्मणा ॥
न वा निवृत्तिरप्येति चैत्यवन्दन कर्मणा । ज्ञानक्षणेन चैकेन किञ्चित कर्म समाप्यते ॥
कार्यकारणभावश्च त्वदुक्त स च दूषित । अन्यत्रैव हि कर्म स्यादन्यत्रैव च तत्फलम् ॥
न च सन्तानभोगाय कश्चित् कर्मानुतिष्ठति । फलमस्मान्ममेव स्यादिति सर्व प्रवर्तते ॥
गर्भादो प्रथम ज्ञान विज्ञानान्तरपूर्वकम् । ज्ञानत्वादित्यय हेतुरप्रयोजक इष्यते || मूर्च्छाद्यनन्तरोद्भूतज्ञानंश्च व्यभिचार्य्ययम् । मूच्छितस्यापि विज्ञानमस्तोत्येतत्तु कौतुकम् ॥ नार्थावगतेरन्यद्रूप ज्ञानस्य किञ्चन । मूर्च्छादिषु कुतस्तत्स्यात्कुतो वा कललादिषु ||
कललादिदशाया वा यदि विज्ञानमिष्यते । मातापितृस्थयोरस्ति शुक्रशोणितयोरपि ॥
ततश्चैकत्र सन्ताने चैतन्यद्वयमापतेत् । चेतनाना बहुत्व वा दम्पत्योर्बहुपुत्रयो ॥
न चैष नियमो लोके सदृशात सदृशोद्भव । वृश्चिकादे समुत्पादो गोमयादपि दृश्यते ॥
शरीरान्तरसचारचातुय्यं च घिया कथम् । ज्वालादिवन्न मूर्तत्व न च व्यापकतात्मवत् ॥
आतिवाहिकदेहेन नीयन्ते चेद्भवान्तरम् । नन्वातिवाहिकेऽप्यासा कथ सचारसभव ॥
प्रदेशान्तरसचारो ज्ञानाना भवतः कथम् । नह्येषा भूतधर्मत्व न स्वतो गतिशक्तिता ॥
न च जात्यादिवद्वृत्तिनं च व्यापकतात्मवत् । एव यदैव निष्क्रान्तो विहारकुहराद्भवान् ॥ तदा कष्टी भवेद्देहो ज्ञानसक्रान्तिसभवात् । ( न्या ० म ०, भा ० २, पृ ० ३७-३८ ) २६५ दूसरा था । वह तो मर गया और आज उसके फल को भोगने वाला कोई दूसरा ही है, जिसने चैत्यवन्दन नही किया । ऐसी अवस्था tearer रूप कर्म से उस सन्तानी को जिसकी कि उसका फल नहीं भोगना है । निर्वाण भी प्राप्त नहीं ही होगा । ज्ञान के एक क्षण से भी क्या कोई कम समाप्त हो सकता है? तब आपके बताये कायकारणभाव की उपपत्ति कैसे हो सकेगी, जिसमें कि हम दोष बता चुके हैं, यदि कर्म कोई दूसरा करेगा और उसका फल किसी दूसरे को मिलेगा, तो इस प्रकार सन्तान के भोग के लिये तो कोई कर्म नही करता । इमका फल मुझे ही मिलेगा, यही सोचकर सब कोई कर्म में प्रवृत्त होते हैं । गर्भ आदि में पहला ज्ञान विज्ञानान्तर से उत्पन्न होता है, क्योंकि वह ज्ञान है, इस अनुमान मे हेतु की प्रयोजकता अर्थात् अनुकूल तकयुक्तता नही मानी जा सकती, क्योकि मूर्छा प्रभृति अवस्था के बाद में उत्पन्न ज्ञान में उक्त हेतु का व्यभिचार स्पष्ट है । मूर्च्छित व्यक्ति में भी ज्ञान रहता है, यह कथन केवल ( a ) का ही विषय हो सकता है । अर्थ का ज्ञान कराने के सिवाय ज्ञान का और कोई रूप नहीं माना जाता । यह स्थिति न तो मूर्छा प्रभूति अवस्थाओं में ही रहती है और न कललादि गर्भावस्था में | यदि माप कललादि दशा में भी ज्ञान मानें तो माता - पिता में farara शुक्र और शोणित में भी उसको मानना पडगा और इस तरह से एक सन्तान में दो वैतन्य माने जायेंगे । अथवा अनेक पुत्रों वाली दम्पती में अनेक चैतन्य माने जायेंगे । सदृश से सदृश को उत्पत्ति का नियम भी लोक में सर्वत्र नही देखा जाता, क्योकि कभी-कभी गोमय ( गोबर ) से भी बिच्छू पैदा होते देखे गये हैं । आप इसका भी उत्तर दीजिये कि एक शरीर में स्थित विज्ञान का शरीरान्तर में सवार कराने की चतुराई ज्ञानो में कहाँ से आई? क्योकि यह ज्ञान न ज्वालादि की तरह मूर्त है और न आत्मादि को तरह व्यापक हो है | जन्मान्तर में यह ज्ञान शरीरान्तर में आतिवाहिक देह के द्वारा ले जाया जाता है, तो इस बात का आप उत्तर दीजिये कि यह ज्ञान आतिवाहिक देह में भी किस प्रकार जा सकता है? आपके मत से ज्ञान का प्रदेशान्तर में सवार भी कैसे होगा? ज्ञान भूत पदार्थों का धर्म नहीं है और न इनमें स्वत गतिशक्ति ही है । इनकी जाति प्रभुति धर्मों की तरह अन्य कहीं वृत्ति भी नहीं सानो और न इनकी आप आत्मादिकी तरह व्यापकता ही मानते हैं । इस तरह से जब आप विज्ञान से बाहर निकलेंगे, तभी बाप मैं ज्ञान की संक्रान्ति होने पर आपका शरीर कष्ट में पड़ जायगा । अर्थात ज्ञान की सक्लान्ति मानने पर आपके शरीर में भूत - प्रेत -आदि भी घुसकर तग करने लगेंगे । 6
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RE दुच्यते-वैवार्थपारिजात-वेदाप्रामाण्याक्षेपनिरास किञ्चानृत व्याघातादिदोषरप्रामाण्यमाशङ्कय समाहित च मीमासान्याय भाष्यादिषु । सक्षेपेण तु किञ्चि-यदुक्त शास्त्रस्य शरीरसभवं रेवानृतव्याघातादिभिर्वेदस्य प्रामाण्य नोपपद्यते । तथाहि - ' चित्रया यजेत पशुकाम ', ' पुत्रकाम पुत्रेष्ट्या यजेत ' इति श्रूयते । न चष्टिसपत्त्यनन्तर पश्वादिफल दृश्यते । यत् काल मदन तत्काल मनसुखमित्यादि समनन्तरफलानि कर्माणि दृष्टानि । पश्वाद्यभावपरितप्तोऽधिकार्य्यपि सद्य फल कामयते । कालान्तरे कर्मेण प्रध्वस्तत्वात् कुत फलम । सति फलानुत्पादकत्वे कुतोऽसतस्तत् । सेवादिरूपे दृष्टे कारणान्तरे सति को नामादृष्ट कारण कल्पयेत I । तेन प्रत्यक्षादिप्रमाणपरिच्छेदयोग्यार्थोपदेशत्वे सत्यपि तत्सवादशून्यत्वाद् विप्रलम्भकवाक्यवद प्रामाण्यमेव चित्रादिचोदनानाम् । तद्वदेव वेदेकदेशत्वादग्निहोत्रादिचोदनानामपि मिध्यात्वमेव । ' पुत्रकाम पुत्रेष्टया यजेत ' इत्यादावपि चित्रादिवदसवादेनाप्रामाण्यमेव । एव प्रमीते यजमाने पात्रचयास्य कर्म परिदृश्यते ' स एष यज्ञायुधी यजमानोऽञ्जसा स्वर्ग लोक याति ' इति प्राह वेद । तत्रैष इति निर्देशो नात्मनि सभवति, तस्य परोक्षत्वात्, स्पयकपाला-दोना तत्सम्बन्धाभावाच्च । कायस्त्वेष इति निर्दिश्यते । स च न स्वर्ग याति तद्भस्मीभावदर्शनात् । एव विसवादेन च वेदस्याप्रामाण्यम् । एव व्याघातोऽपि दृश्यते, उदितानुदितादिहोमविधानतन्निन्दार्थवादेन निषेधा । एवं त्रि वेदाप्रामाण्य के आक्षेपों का निराकरण अनृत व्याघात यादि दोषो की उद्भावना कर वेद में अप्रामाण्य की आशका का समाधान मीमासा दर्शन एव न्यायभाष्य आदि में किया गया है । सोप में उसका यहाँ दिग्दशन कराया जाता है । शास्त्र के स्वरूप में ही अनृत, व्याघात यादि दोष देखने को मिलते है । इनके रहते वेद का प्रामाण्य कैसे माना जा सकता है? जैसे कि ' पशु को कामना वाला व्यक्ति चित्रा नामक यज्ञ करे ', ' पुत्र की कामना वाला व्यक्ति पुत्रेष्टि यज्ञ करें ' ऐसा वेदो में कहा जाता है, किन्तु इनका अनुष्ठान कर लेने पर भी पशु, पुत्र आदि फलो की प्राप्ति नहीं होती । लोक में यह देखा जाता है कि जब तक शरीर पर तेल मालिश की जाती है, तब तक उससे होने वाले सुख की प्रतीति होती है । इस तरह से किसी भी कार्य का फल तुरन्त मिलता है । पशु प्रभूति के अभाव से दुखी व्यक्ति भी इसी तरह से यागादि से तत्काल फल की प्राप्ति चाहता है । कालान्तर में तो कर्म नष्ट हो जायगा, तब उससे फल की क्या आशा की जाय? कम की विद्यमानता में जब उससे फल की प्राप्ति नहीं हुई तो उसके न रहने पर फल की आशा दुराशा मात्र है । ऐसी अवस्था में इनकी प्राप्ति के लिये सेवादि रूप दृष्ट उपायों के रहते क्यो कोई अदृष्ट कारण यागादि में प्रवृत्त होगा? इसलिये प्रत्यक्षादि प्रमाणो से जिनकी प्रतीति हो सकती है, ऐसी बातों का उपदेश करने वाली श्रुति का जब उनसे संवाद ( तालमेल ) नही होता तो ' चित्रा याग ' प्रभूति का उपदेश करने वाली श्रुति किसी के वचनों की तरह ही अप्रमाण क्यो न मानी जायगी? इसी उदाहरण के आधार पर वेद में अन्यत्र उपदिष्ट अग्निहोत्र प्रभृति यामी का उपदेश करने वाले श्रुतिवाक्य भी fre या हो मान लिये जायेंगे | ' पुत्र की कामना वाला व्यक्ति पुत्रेष्टि यज्ञ करें इस तरह के वाक्य भी चित्रादि यागी की तरह ही सवा ( तालमेल वाले ) न होने से अप्रमाण माने जायेंगे । इसी तरह से यजमान के मर जाने पर ' पात्रचयन ' नामक कर्म किया जाता है । ' यह यज्ञ यजमान शीघ्र ही स्वर्गलोक को प्राप्त करता है ' यह वेद का कथन है । यहाँ पर ' एष ' पद से आत्मा का निर्देश नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो परोक्ष है और उसका स्पय, कपाल प्रभृति यज्ञ के पात्रों से भी कोई सम्बन्ध नहीं है । अव ' एष ' पद से शरीर का ही निर्देश माना जायगा । वह शरीर स्वर्ग में नहीं जाता, वह तो यही भस्म हो जाता है । इस तरह की अनेक असंगतियों के कारण वेदों का माय सिद्ध होता है । इसी तरह से वेद के वचनो में परस्पर विरोष भी देखा जाता है । उदित, अनुदित आदि कालों में होम के fears art मिलते हैं और साथ ही इनकी निन्दा करने वाले अर्थवाद वाक्यों से इसके निषेध की भी प्रतीति ( ज्ञान ) होती है । इसी तरह से ' पहली और अन्तिम ऋचा का तीन वार उच्चारण करे ' इत्यादि वाक्यों में पुनरुक्ति दोष भी स्पष्ट है, क्योंकि एक बार के उच्चारण
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वेदार्थ पारिजातः २६७ प्रथमा त्रिरुत्तमामिति पौनरुक्त्य च । तदेतत् ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेम्य ' इति न्यायसूत्रकारैरेव सूचितम् । ' न कर्मकर्तृ साधनवैगुण्यात ' इति समाधान च तैरेव सूचितम् । अत्रानृतत्वेनाप्रामाण्यमुक्तम् । तत्र च हेतु फलादर्शनम् । तच्चानैकान्तिकम् | अन्यथापि फलादर्शनो-पपत्ति । वेदस्यासत्यार्थत्वात् कर्तृत्वादिवैगुण्याद्वा । ननु न कदाचित् समनन्तरमेव फलोपलब्धिरिति तदनृतत्वमेवादर्शन-कारणमिति तन्न, अविगुणाया कारर्थ्या सत्या वृष्टेर्दर्शनात् । न च तत्काकतालीयम् आगमेनान्वयव्यतिरेकाभ्या तत्कारणत्वनिर्णयात् । पुत्रपश्वादिफल तु नभसस्तदानीमेव वृष्टिरिव न निपतितुमर्हति । स्त्रीपुंसयोगादिकारणान्तर-सापेक्षत्वात् । तदुत्तरकाले पुत्रादिप्राप्तिस्तु भवत्येव । ननु दृष्टमेव तत्रापि कारणमस्तु । दृष्टे सत्यप्यदर्शनेन चित्राद्य नन्तर दर्शनात् तत्कारणत्वनिश्चयात् । तदुक्तम्-सेवाध्ययन कृष्यादिसाम्येऽपि फलभेदत | वक्तु न युक्ता तत्प्राप्तिरिष्टिकारणमात्रगा || यत्राविगुणेऽपि कर्मणि प्रयुज्यमाने कालान्तरेऽपि पुत्रपश्वादिफल न दृश्यते, तत्रापि किमपि तीव्र प्रतिबन्धक कल्पनीयम् । किञ्च, चित्रात पशवो भवन्तीत्येतावान् शास्त्रार्थं । आनन्तर्ये न किमपि प्रमाणम् । तदेवमानन्तर्यविषय प्रत्यक्षाविसवाद एव । चित्रादिचोदना त्वनिर्दिष्टकाल विशेषविषया न तेन बाध्यते । तदुक्तम्-आनन्तर्य्याद्यविसवादो नाविशेषप्रवर्तिनीम् । चोदना बाधितु शक्त स्फुटाद्विषयभेदत || से ही जब काम चल जायगा तो फिर उसका तीन बार उच्चारण करने में क्या लाभ है? आज कल के लोग वेद को प्रमाण न मानने के लिए जो तर्क देते हैं, वे सब तक ऊपर की बातो से न्यायसूत्रकार ने ही स्पष्ट कर दिए हैं । साथ ही स्वयं उन्होने ही इन सब ant का समाधान भी निम्न प्रकार से दिया है यहाँ पर अनृत ( मिथ्या ) होने के कारण वेद वाक्यों को अप्रमाण माना है और उनके मिथ्या होने में वैदिक कर्मों से फलो की प्राप्ति न होने को ही कारण बताया है । किन्तु यह कारण व्यभिचारी होने से वेद के अप्रामाण्य की सिद्धि नही कर सकता. क्योकि कर्म से फल के न मिलने में तो अनेक कारण हो सकते हैं । आप ही बताइये कि वेद मिथ्या है, इसलिए फल नही मिलता या कर्म करने में दोषो के रहने से फल नही मिलता? यदि कहें कि कर्म के तुरन्त बाद कभी भी फल नहीं मिलता, इसलिए वेद असत्य ही है, तो यह बहुत ठीक नहीं है, क्योकि विधि - विधान पूर्वक सही रीति से किए गये कारीरी नामक यज्ञ के बाद तुरन्त वर्षा रूपी फल देखा जाता है | इसको काकतालीय ( आकस्मिक ) नही कह सकते क्योकि आगम के आधार पर अन्वय व्यतिरेक के द्वारा इनकी परस्पर कार्य-कारणता सिद्ध होती है । अन्य यागों के अनुष्ठान से उपलब्ध होने वाले पुत्र, पशु आदि फल वृष्टि की तरह तत्काल ही आकाश से नही are सकते | वहां पर स्त्री - पुरुष सयोग प्रभृति कारणान्नरों को भी अपेक्षा रहती हैं । इसके बाद वो पशु - पुत्रादि फल की प्राप्ति प्राप्ति होती ही है । यहाँ पर केवल दृष्ट को ही कारण नही माना जा सकता क्योकि दृष्ट कारण की विधानता में भी पशु पुत्रादि की नही होती और चित्रादि याग के अनन्तर इनकी अधिगति होती है । इसलिए चित्रादि यज्ञ ही पशु पुत्रादि के कारण है, ऐसा करते निश्चय हैं, हो जाना सरल है । जैसा कि कहा गया है— ' अनेक व्यक्ति एक ही पद्धति से सेवा, अध्ययन और कृषि प्रभृति कार्यों को कि किन्तु उनका फल एक दूसरे से विलक्षण मिलता है, कभी मिलता है, कभी नहीं भी मिलता । इससे यह frost ालना पडता है फलो की प्राप्ति केवल दृष्ट कारण से नहीं होती, किन्तु केवल यज्ञादि के अनुष्ठान से ही होती है । ' वहीं जहाँ यज्ञादि कर्म में कोई वैगुण्य गड़बड न होने पर भी कालान्तर में पुत्र, पशु प्रभृति फल की प्राप्ति शास्त्र नहीं का होती मात्र, इतना पर भी कोई प्रतिबन्धक की कल्पना की जानी चाहिये । अपि च, चित्रा याग ( यज्ञ ) से पशु प्राप्त होते का है, अविसवाद ही होता है । at her है | ara ( यज्ञ के तत्काल बाद हो फल हो ) में कोई प्रमाण नहीं है । आनन्तर्य का विषय प्रत्यक्ष होने पर भी उनका बाघ नही चित्रादि याग के प्रतिपादक विधि वाक्य निर्दिष्ट काल विशेष विषयक हैं, इसलिये प्रत्यक्ष तत्काल फल न फल से विसवाद होने पर भी हो ar | जैसा कि कहा गया है -- ' नविशेष रूप से प्रवृत्त होने वाली श्रुति का बाघ बाद में उसका प्रत्यक्ष प्रमाण से नही हो सकता, क्योंकि इन दोनो का विषय परस्पर सर्वथा भिन्न है । ' ३८
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२६६ वेदार्थपारिजात न च चित्रादेरनन्तरफलत्वम्, विधिफलाना क्रियाफनतुल्यत्वानुपपत्ते । विधिफल मन्यत् क्रियाफल चान्यत् । कृप्यादी भूमिप icarfe fr याफलम्, सस्यसपत्तिस्तु विधिफलम् । वार्त्ताविद्याया वृद्धोपदेशे वा कृषिविधिरस्ति । अन्वयव्यतिरेकी वा विधिस्थानोयौ । लोकेऽनि वैतनकाम पचतीत्यादौ पाकक्रियाफलमोदन, विधिफल तु वेतनम् । क्रियान्तरफलभावित्व क्रियाफलानामेव नियम, विविफलाना वेतनादीना नास्ति कालनियम । तथैवेष्टावपि हवि-faarifafari ो भवति, सेवादिफल स्वनियतकालमेव भवति । अत एव - ' ग्रामकामो महीपाल सेवेतेत्येव-मादिषु । लौकिकेषु विधिष्वस्ति न कालनियम फले ॥ ' आयुर्वेदोपदिष्टानामप्योषधिविवीना न क्रियावत्सद्य फल भवति, किन्तु कालापेक्षमेवेति न विधीना फनानन्तर्ये किञ्चित्प्रमाणम् । यदुक्तम्- ' पशुपुत्रादिविरहतप्यमानमानसस्तदधिकारी सद्य फल कामयते ' इति, तत्तु पुरुषेच्छामात्रम् । चित्रादिचोदनात फलस्यैहिकत्व निद्धयति न सद्य फलत्वम् । सन्ति बदिकफलान्यपि कालान्तरसव्यपेक्षाणि - ' ब्रह्मवर्चस-कामस्य कार्य्यं विप्रस्य पञ्चमे ' इति । न चात्र पञ्चमवर्षे उपवीतमात्रस्य ब्रह्मवचस सम्पद्यते । एव वीर्य्यकामस्येत्यादावपि । कालान्तरे तु भवत्येव । तथा च विधिफल मानन्तर्य्याभावान्न तद् विसवादो दोषाय । यत्र कालान्तरेऽपि फलादर्शन तत्र क्रियावैगुण्यकर्मान्तरप्रतिबन्धादिकारण ज्ञातव्यम् । केचित्विह फलाभावे जन्मान्तरे तत्फलमिति । तत्र कारीय्र्यादिक-चित्रादि यज्ञ तात्कालिक फल वाले नहीं है, क्योंकि fafa na ौर क्रिया फल दोनो समान नही हो सकते । विधि का फल भिन्न होता है और क्र का फन भिन्न । कृषि प्रभृति फर्मों में भूमि का ठोक करना क्रियाफल और सस्य सपत्ति विविफल कहलाता है । वार्ता ( वाणिज्य ) विद्या अथवा वृद्धजनो के उपदेश में कृषि विधि मानी जाती है अथवा अन्वय व्यतिरेक को ही यहाँ विधि रूप माना जा सकता है | लोक में भी ' वेतन की कामना वाला रसोई बनाता है ' यहाँ पर पाक क्रिया का फल ओदन है और विधि फल वेतन । क्रिया फल का ही यह नियम है कि क्रिया के बाद फल प्राप्ति अवश्य हो, वेतनादि विधि फल मे समय का नयम नहीं हैं, क्योकि वेतन देरी से भी मिल सकता है । सामान्य रूप से भी एक महीना काम करने के बाद तनखाह मिलती है । इसी तरह से इष्टि मन्त्र में भी हवि के विकार आदि क्रिया रूप फल तो तुरन्त होते हैं, किन्तु विधि रूप फल का पाल नियत नहीं है । इसी तरह से सेवा प्रभृति के फलो का भी काल नियत नहीं रहना । अत एव - - ग्राम को कामना वाला व्यक्ति राजा की सेवा करे ' इस तरह के लौकिक विधि वाक्यों में फल की प्राप्ति में समय का कोई नियम नही बनाया जा सकता | आयुर्वेद में उपविष्ट ओषधियो का भी क्रिया फल की तरह तत्काल कोई फल देखन को नहीं मिलता, किन्तु वह काल सापेक्ष रहता है, इसी तरह से वैदिक विधि वाक्यों के भी तत्काल फल मिलने में कोई प्रमाण नही है । यदि कोई कहे कि ' पशु, पुत्र आदि के अभाव में दुमी अधिकारी व्यक्ति चित्रा प्रभृति यागों के अनुष्ठान के तुरन्त बाद फा चाहता है, तो इसका उत्तर है कि यह केवल उसकी इच्छा हो सकती है, किन्तु चित्रा प्रमृति के प्रतिपादक विधि-क्यों से उनके फल को ऐहिकता मात्र सिद्ध होती है । अर्थात् इस लोक में होने वाले वे फल हैं । वहाँ यह नहीं कहा गया है कि इनका फल तत्काल मिलता है । इस तरह के अन्य अनेक वैदिक फन है, जो कि कालसापेक्ष हैं । ' ब्रह्मवर्चस को कामना वाले वालक का यज्ञोपवीत पाँचवें वर्ष में करे यहाँ पर पाचवें वर्ष में उपनयन कर देने मात्र से बटुक में ब्रह्मतेज का आविर्भाव नहीं हो जाता । इसी तरह से वीय की कामना किये गये क्षत्रिय उपनयन सरकार के विषय में भी समझना चाहिये । कालान्तर में तो इन फलो की उपलब्धि होती ही है । इस तरह से विधि - फन का अथ आनन्तर्य नही है, अतः यदि कहीं पर उसका freere देखा भी जाय तो वह दोषावह नहीं माना जायगा । यदि कालान्तर में भी फल का दर्शन न हो तो वहाँ पर समझना चाहिये कि या तो कार्य में कोई दोष रह गया है अथवा अनुष्ठान का कोई प्रबल प्रतिबन्धक अदृष्ट या प्रारब्ध विद्यमान है । कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे कार्यों का यदि इस जन्म में फल नहीं मिलता तो जन्मान्तर ( दूसरे जम्म ) में वह मित्रता है । इन कमों में भी कारीरी याग प्रभूति ऐहिक फल वाले कार्यों का फल तत्काल मिलता है । क्योंकि ऐसे वाक्य उपलब्ध हैं कि-- ' कारीरी याग करते समय यदि पानी बरसने लगे तो उसी
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वेदार्थपारिजात २६६ मैहिकमासन्नफलम्, यदि वर्षा स्यात् तावत्येवेष्टि समापयेत्, यदि वर्षेच्छ्वोभूते जुहुयात्, ज्योतिष्टोमादिक त्वामुष्मिक फलम् । चित्रादिक त्वनियतफलम्, तत्फलस्येहामुत्र वा सभवात् । यदप्युक्तम् --- कालान्तरे कर्माभावात् कुत फलमिति, तदपि तुच्छम्, अपूर्वसंस्कारादिरूपेण कर्मणा स्थायि त्वाभ्युपगमात् । तच्च मीमासकदृष्ट्यापूर्व, नैयायिकदृष्ट्या तु कमजन्य सस्काराख्यो गुण एव । तदुक्तम्-- ' यथेन्द्रियार्थ • योगादात्मनो बुद्धिसंभव । तथा यागादिकमभ्यस्तस्य सस्कारसभव || बुद्धिस्तु भङ्गुरा तस्य सस्कारस्तु फलावधि । ' यथा तस्य स्मृतिबीजत्व तथैव फलसयोगबीजत्वम् । स यागदान होमादिजन्यो धर्मगिरोच्यते । ब्रह्महत्यादिजन्यस्तु सो s धर्म इति कथ्यते ॥ ' यदुक्तम्- स्वर्गयागान्तरालवर्तिन स्थिरस्य निराधारस्य निष्प्रमाणकत्वमिति, तत्र, स्वर्गकामो यजेतेति वचनस्यैव तत्र प्रमाणत्वात् । यावता विना यनोपपद्यते तस्याक्षेपलभ्यत्वात् । न च निराश्रयत्वम्, यजमानस्यैव तदाश्रयत्वोपपत्ते । स च प्रसिद्धस्मृतिबीजभूतसस्कारादिभिन्नत्वादपूर्वादृष्टादिशब्दव्यपदेश्योऽपि भवत्येव । स्वर्गकामो-ऽग्निहोत्र जुहुयादित्यादि श्रुतस्य साध्यसाधनभावस्यानुपपत्त्या श्रुतार्थापत्त्या तज्जन्यजनकत्वविशिष्टतज्जन्यत्वरूप परिकल्प्यते । यागादेर्धर्मत्वपक्षेऽपि मध्येऽपूर्व कार्यकारणभावनिर्वाहकत्वेनेष्टमेव । स एव यज्ञायुधीत्यत्रापि शरारा-भेदोपचारादात्मैव निर्दिष्ट । तस्य च स्वगगमन भवत्येव । स्वर्गोपभोग एव च यथा शरीरादियोगवियोगो जन्ममरणे, समष्टि ( यज्ञ ) को समाप्त कर दें ' अथवा ' यदि कारीरी याग करते समय पानी बरसने लगे तो बाकी काय को दूसरे दिन पूरा करें ' | ज्योतिष्टोम आदि का फल परलोक में ही मिलता है । विना प्रभृति याग का फल नियत नही होता, उनका फल इसी लोक में मिल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि वह दूसरे जन्म में प्राप्त हो । arit at a गया है कि कालान्तर में तो कम नष्ट हो जाता है, तब उससे फत्र की क्या आशा की जाय $ किन्तु यह बड़ी तुच्छ का है, क्योकि अपूर्व, सरकार आदि के रूप में कर्मों को स्थायिता मानो गई है । इसका मीमासा दशन में अपूर्व और न्याय दर्शन में कर्मजन्य सस्कार नामक गुण कहा जाता है । वह यज्ञादि कम की समाप्ति से लेकर फल की उत्पत्ति पयन्त स्थिर रहता है । जैसा कि कहा गया है-- ' जैसे इन्द्रिय और अथ के समाग से आत्मा ज्ञान नामक गुण का उत्पत्ति होती है, उसी तरह से यागादि कर्मों के करने से आत्मा में सस्कार नामक गुण की उत्पत्ति मानी जाती है । यहाँ पर ज्ञान ता क्षणभंगुर होता है ( नैयायिक ata आदि के मत में ), किन्तु यह सस्कार फल प्राप्ति पयन्त रहता है । जैसे सस्कार स्मृति का कारण होता है, उसी तरह से वह फल के सयोग का भी कारण होता है । यह संस्कार जब यज्ञ, दान, होम आदि से उत्पन्न होता है, तो उसका ' नम ' कहते है और जब इसकी fee ब्रह्महत्या प्रभूति से होती है तो वह ' अघम ' नाम से कहा जाता है । कहा जाता है कि याग और स्वग के बीच में स्थिर एवं निराधार सरकार अथवा अपूर्व की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, किन्तु यह बात गलत है, क्योकि ' स्वगकामो यजेत ' इत्यादि वचन हो उसमे प्रमाण हैं । जिसके बिना जिसको उत्पत्ति न बन सकती हो, उसकी उपपत्ति माक्षेप से होती है । इसका अभिप्राय यह है कि स्वम को उपपत्ति बिना अदृष्ट के नहीं हो सकती, मत अर्थापत्तिप्रमाण अदृष्ट की सिद्धि होगी । यह अदृष्ट निराधार नही रहेगा, क्योकि यजमान उस अदृष्ट का आधार हो सकता है । स्मृति के कारण रूप से प्रसिद्ध सस्कार आदि से भिन्न होने के कारण ही यह अदृष्ट, अपूर्व आदि नामों से कहा जाता है । ' स्वर्ग की areer ater after या करे ' इत्यादि विधि वाक्यो में सुने गये साध्यसाधनभाव की अनुपपत्ति को देख कर श्रुतार्थापत्ति प्रमाण के आधार पर अग्निहोचादि से उत्पन्न होने वाले स्वर्ग का जनक ( पैदा करने वाला ) और अग्निहोत्र आदि से जन्य ( पैदा होने वाला ) अदृष्ट की परिकल्पना की जाती है । यागादि को ही धर्म मानने पर भी कार्यकारणभाव के निर्वाह के लिये बीच में अपूर्व मानना ही पडता है । ' यज्ञायुषी ' इत्यादि श्रुतिवचनों में भी शरीर के साथ अभेद का उपचार कर आत्मा ( जीव ) का ही निर्देश किया गया है । वह स्वर्ग की जाती है । स्वर्ग का उपभोग करते समय ही इसका यथायोग्य शरीरादि से सयोग और वियोग होता है और इसी को जन्ममरण
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३०० दार्थपारिजात न तु व्यापिन परिस्पन्दात्मिका क्रियोपपद्यते । ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नसमवायश्च तस्य कर्तृत्वम् । यज्ञायुधसम्बन्धोऽपि स्वस्वामिभावादिस्तस्यैव व्यापकत्वाविशेषेऽपि व्यवस्थयैवोपपद्यते । उ fenigen हवनविवावपि न व्याघात, तत्रानुष्ठानभेदेन कालत्रितयचोदनात् । ' यो यस्य चोदित कालो लङ्घनीयो न तेन स । ततश्चान्यतम कालमभ्युपेत्यैनमुज्झत ॥ निम्देति न विरोधोऽत्र कश्चिद् विधितिषेधयो । ' पौनरुक्त्यमपि न दोष, सप्रयोजत्वात् । ' इदमह पञ्चदशारेण वज्रेणापबाधे योऽस्मान् द्वेष्टि य च वय द्विष्म ' | एकादश सामिषेन्य ऋच पठ्यन्ते } तत्राभ्यासद्वारा पाश्चदश्य कर्तव्यम् । स चाभ्या सोऽनियमेन प्राप्तो वचनेन नियम्यते - ' त्रि प्रथमा त्रिरुत्तमाम् ' । तस्मात् सप्रयोजनत्वान्न पौनरुक्त्यदोष । तदप्युक्तम्- ' अभ्यासे पौनरुक्त्यश्व कार्य्यार्थत्वाददूषणम् । सम्पाद्य पावदश्य हि सामिधेनीषु चोदितम् ॥ ' इति । अन्येऽपि वेदशास्त्रस्य स्वदेहजा दोषा परिकल्पिता } मुनिभिर्निराकृताश्च । तथाहि - ' सोऽरोदीद्यदरो-दीद्रस्य रुद्रत्व तस्य यदश्रु व्यशीर्यत्तद्रजतम् ', ' प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्तामग्नौ प्रागृह्णात् ततोऽजस्तूपर उदगात् ', ' देवा वै देवयजनमध्यवसाय दिशो न प्राजानन् ' इत्याद्यर्थवादाना यथाश्रुतार्थत्वयुक्तेभ्य. कार्य्यरूपार्थो-पदेशपरिकल्पनमथवा लिङ्गादियुक्तवाक्यान्तरप्रतिपाद्यमानकार्य्यरूपार्थौपयिकत्वमिति सवथा प्रमाद एव । स्वरूपपरत्वे प्रमाणान्तरविरुद्धार्थपरत्वेनाप्रामाण्यमेव, रोदन वपोत्खेदन- दिमोहादेरर्थस्य तथात्वे निश्चयाभावात् । ' स्तेन मनोऽनृत-कहते है । इसके सिवाय व्यापी आत्मा में कोई परिस्पन्दारिसका क्रिया नही बन सकती । इस आत्मा का कतृत्व यही है कि उसमें ज्ञान, Fanta ( कर्म करने की इच्छा ) और प्रयत्न का समवाय हो जाना है । उसका यज्ञायुध से सबन्ध स्वस्वामिभावरूप है, आत्मा के व्यापक होने पर भी इसकी व्यवस्था सभय हो सकती है । उदित, अनूदित आदि कालो में हवन की विधि में भी परस्पर कोई विरोध नहीं हैं, क्योंकि वहाँ पर अनुष्ठान के भेद से तीनो कालो की पृथक् विधिया है । इसलिये - जिसके लिये जिस काल का विधान किया गया है, उसकी उस काल का उल्लघन नही करना चाहिये । अत किसी एक काल को स्वीकार कर बाद में जो उसको छोड़ देता है, उसी की यहाँ निन्दा की गई है । अत यहाँ पर विधि और निषेध का कोई विरोध नहीं है ' । इसी तरह से पुनरुक्ति में भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि उसका भी प्रयोजन वही बनाया गया है 1 । ' जो हमसे द्वेष करता है अथवा जिससे हम द्वेष करते हैं, उसको पन्द्रह अराओ वाले इस वाणी रूपी वज्र से हम मार डालते है ' इस प्रकरण में ग्यारह सामिधेनी ऋचाएँ पढी गई है । इनकी पन्द्रह सख्या कुछ ऋचाओ की आवृत्ति करने से ही हो सकती है । अनियमित रूप से प्राप्त इस अभ्यास ( बार - बार पाठ ) को नियमित कर देने के लिये ही यह कहा गया है कि ' प्रथम और अन्तिम ऋचा का उच्चारण तीन तीन बार करें ' । इस तरह से यहाँ पर ऋचाओ की आवृत्ति का प्रयोजन है । अस यहाँ पर पुनरुक्ति दोष नही माना जायगा । जैसा कि कहा गया है -- ' एक ही मन्त्र की आवृत्ति के द्वारा पुनरुक्ति का प्रयोजन विद्यमान है । अत इसका दूषण की कोटि में समावेश नही होगा । यहाँ पर सामिधेनी ऋचाओ की पन्द्रह सख्या बनानी है । इस लिये प्रथम और अन्तिम मन्त्र की आवृत्ति करने में पुनरुक्ति दोष न हो कर उक्त प्रयाजन की सिद्धि होती है ' । वेद शास्त्र में विद्यमान वाक्यों में अन्य भी स्वरूपगत अनेक दोषों की उद्भावना की गई है और मुनियों ने उनका निराकरण भी किया है । जैसे कि - ' उसने रूदन किया, रुदन करने से उसको रुद्र कहा गया, रुदन करने से उसके जो अश्रु गिरे, उनसे रजत ( चादी ) की उत्पत्ति हुई ', ' प्रजापति ने अपनी वपा ( चर्बी ) उखाड़ ली और उसको अग्नि में are f दया, इससे सुपर | सन्तानोत्पादन की शक्ति से रहित ) अज की उत्पत्ति हुई ', ' देवता देवयजन में दीक्षित होने पर दिशाओं को न जान सके * इत्यादि are area का यथाश्रुत अर्थ के आधार पर विनियोग किया जाय अथवा लिंग प्रभृति से युक्त वाक्यान्तर की सहायता से fafir योग किया जाय? यह प्रश्न उपस्थित होता है । यदि इनका यथाश्रुत अर्थ लिया जाय तो उसका प्रमाणान्तर से विरोध होने से इनमें अप्रामाण्य की आपत्ति होगी, क्योंकि रोदन, वपोत्खेदन, दिङ्मोह आदि अर्थों से क वाक्य के निश्चित सबन्ध का निर्णय होना