वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 331–340
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 331–340
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वेदार्थपारिजात. ३०१ वादिनी वाम ' इत्येवजातीयकाना प्रमाणान्तरविरुद्वाथप्रतिपादकत्वमेव । नहि निसर्गतोऽनृतवादिनी वाक् स्तेन वा मनो भवति । ' धूम एवानेदिवा ददृशे नाचिस्तस्मादचिरेवाग्नेर्नक्त ददृशे न धूम ' इति च प्रत्यक्षविरुद्धम्, नक्तदिन द्वयोरपि प्रत्यक्षेण ग्रहणात । एवम- ' एतन्न विद्मो यदि ब्राह्मणा स्मो प्रब्राह्मणा वा ' इति ब्राह्मणजातेरुपदेश सहकृत-प्रत्यक्ष गम्यत्वाद् विरुद्ध एव । ' को हि तद्वेद यदमुस्मिल्लोके अस्ति वा न वा ' इति शास्त्रविरोधोऽप्यस्ति, शास्त्रे स्वर्गादिफलाना ज्योतिष्टोमादिकर्मणामुपदेशात् । गर्गत्रिरात्रब्राह्मणमधिकृत्य श्रूयते - ' शाभतेऽस्य मुख य एव वेद ' | न च शोभते मुखमिति प्रत्यक्षविरोध | ' पूर्णाहुत्या सर्वान् कामानवाप्नोति, पशुबन्धयाजी सर्वान् लोकान् जयति तरति मृत्यु तरति पाप्मान तरति ब्रह्महत्या योऽश्वमेधेन यजते यश्चैव वेद ' । यदि पूर्णाहुत्यैव सवकामाप्ति, पशुबन्धयागेनैव सर्वलोकजय, अश्वमेघवेदनेनैव तत्फलावाप्ति, किमर्थं कर्मोपदेश? उपदिष्टान्यपि तानि बहुव्ययक्लेशसाध्यानि व्यर्थानि भवेयु, लघुनोपायेन तत्फलप्राप्तिश्रवणात् । ' न पृथिव्यामग्निश्चेतव्यो नान्तरिक्षे न दिवि ' इति वेदे चयननिषेध एव पर्यवस्यति । दिवि चान्तरिक्षे प्राप्तिरेव नास्ति, किं तनिषेधेन । पृथिवीचयननिषेधार्थ यद्वाक्य तदर्थमेव मन्तव्यम्, अपृथिव्यधिकरणस्य चयनस्यानुपपत्ते । ' यजमान प्रस्तर ', ' आदित्यो ग्रुप ' इत्यादिप्रत्यक्षविरुद्धार्थाभिधायिनामर्थ -वादाना कि तात्पर्यम्? न चैवजातीयकेभ्य कार्यपरिकल्पन शक्यम् - रुद्रो रुरोद तेनान्येनापि रोदितव्यमिति । प्रियवियोगात् सर्वो रोदिति न विधिना । प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्, तथैवान्योऽपि वपामुदखिदेदित्यपि न सभवति । तथात्वे मरण-कठिन है । मन चोर है, वाणी झूठ बोलती है ' इस तरह के वाक्य तो स्पष्ट ही प्रमाणान्तर से विरुद्ध अथ का प्रतिपादन करते हैं । स्वभावत मन चौर नही होता, अथवा वाणी झूठ नहीं बोलती । इसी तरह से ' दिन में अग्नि का धुआं ही देखा जाता है लपट नहीं और रात्रि में अग्नि की लपट ही दिखाई देती हैं, धूम नही ' यह वाक्य तो स्पष्ट हो प्रत्यक्ष के विरुद्ध है, क्योकि रात में भी और दिन मे भी वूम और अचि ( ज्वाला ) दोनो प्रत्यक्ष दिखाई देते है । ही तरह से ' यह हम नहीं जानते कि ब्राह्मण है या ब्राह्मण ' यह वचन भी वृद्धोपदेश से जब ब्राह्मण जाति प्रत्यक्षगम्य है, तो उसके विरुद्ध हो पडेगा । ' यह कौन जानता है कि परलोक है या नहीं ' इस वाक्य का शास्त्र से भी विरोध है, क्योंकि शास्त्र में स्वर्गादि फल वाले ज्योतिष्टोमादि कर्मों का उपदेश देखा जाता है । गगनिरात्र ब्राह्मण के अधिकार में वेद कहता है कि - ' जो इसको जानता है, उसका मुख सुशोभित होता है, किन्तु उस समय मुख की शोभा देखने को नहीं मिलता, ara यह are ser क्ष विरुद्ध है । ' पूर्णाहुति से सभी कामनाओं की प्राप्ति होती है, पशुबन्ध का यजन करने arer na atat at ीत लेता है, जो व्यक्ति अश्वमेध यज्ञ करता है अथवा इसकी विधि को जानता है, वह मृत्यु, पाप और ब्रह्म-हत्या से छुटकारा पा जाता है । यहाँ पर प्रश्न उठता है कि यदि पूर्णाहुति से हो सभी कामनाएँ पूरी हो जाती है, पशुबन्ध याग से ft na atat पर विजय प्राप्त हो जाती है और अश्वमेघ का ज्ञान होने मात्र से उसके फल की प्राप्ति हो जाती है, तो फिर अन्य कर्मों के उपदेश का प्रयोजन ही क्या रह जाता है? बहुत सा धन व्यय करने पर अनेक कष्टो को झेलकर किये जाने वाले ऐसे कमी का उपदेश तब व्यथ हो जायगा, जब कि अन्य छोटे उपायों से भी उन फलो की प्राप्ति हो सकती है । ' पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग में आन का चयन नहीं करना चाहिये ' इस वेद वाक्य से अग्निचयन के निषेध का निश्चय होता है । किन्तु अन्तरिक्ष और स्वर्ग में चयन को जब प्राप्ति ही नहीं है, तब उसका निषेध व्यर्थ ही है । इसलिये पृथिवी पर किये जाने वाले चयन or free at an area माना जायगा, क्योंकि पृथिवी से भिन्न स्थल में अग्नि का चयन बनता ही नही । ' यजमान प्रस्तर है, धूप आदित्य है ' इस तरह से प्रत्यक्ष विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक अर्थवादों का नया तात्पर्य हो सकता है? इस तरह के वाक्यों से किसी विधि की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि ' रुद्र रो रहा था, इसलिये दूसरे को भी रोना चाहिये । ' प्रिय का वियोग होने से ही कोई रोता है, विधिवाक्य को देखकर नहीं । ' प्रजापति ने जैसे अपनी वपा ( च ) उखाड जी, उसी तरह से अन्य व्यक्ति को भी अपनी वपा उखाड लेनी चाहिये ' यह भी संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से उसकी मृत्यु
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३०२ दार्थपारिजात सभवात् । कस्य वपाहोमेन समनन्तरमेव अज पशुस्तुपर उदगच्छति । एव देवा दिशो नाज्ञासिषुरित्यादिनापि दिङ्मोहो नोपदेशेन सभावयितु शक्य । न वा वाक्यान्तरविहितकाय्यौपयिकत्वमेषा सभवति, ' दध्ना जुहोति, पयसा जुहाति, अग्नये प्रजापतये साय जुहोति ' इति द्रव्यदेवतादिविधानवत्तदुपयोगिद्रव्यदेवतादिविधानद्वारकत्वासभवात् । न चैभि ' व्रीहीन् प्रोक्षति ' इतिवदितिकर्तव्यता दृष्टा अदृष्टा बोपदिश्यते । न च प्ररोचनार्था एवैते एवकाम इद कुर्यादिति, यो न प्रवतते प्ररोचनयाऽपि किं तस्य? तदेव वेदेकदेशस्यार्थवादस्याप्रमाणत्वेन सर्वस्यापि तथात्वमिति । तदेतत् प्रतिविधीयते । ' विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीना स्यु ' इत्यादिनाचाय्र्यैरेव समाहितत्वात् । विध्यर्थस्तावकत्वेनास्ति तेषा विध्युद्देशेनैकवाक्यता । यद्यपि च द्रव्यदेवतेतिकतव्यताविधानद्वा रकमङ्ग विधिवदर्थं-वादवाक्याना कार्यौपयिकत्व नास्ति, तथापि प्रतोत्यङ्गत्व न निवार्य्यते । अत एव प्रामाण्योपयोगित्वमाचक्षते, न प्रमेयोपयोगित्वम् | केवल विधिपदश्रवणे न तदाद्रियते । तकविधिविभक्ते शक्तिरवसीदति । वामुत्तभ्नात्यर्थ पादजनित-प्राशस्त्यप्रत्यय, ' सवजिता यजेत ' इतिविधो न तथा श्रद्धातिशयो भवति, यथा ' सर्वजिता वै देवा सर्वमयजन् सर्वस्याप्त्यै सर्वस्य जित्यै सर्वमेवैतेन सर्व जयति ' इत्यर्थवादेन । लोकेऽपि गौरिय ऋतव्येत्युक्तो न तथा प्रवृत्तिर्भवति, यथैषा बहुस्निग्धक्षीरा सुशीला सापत्या अमृतप्रजेति प्राशस्त्यवचनेन भवति । अत एव यथा क्वचिदार्थवादिको विधि कल्प्यते, तथैवाश्रुतार्थवादकेऽपि दिधौ तत्कल्पनम् । ही हो जायगी । यह कहाँ देखा गया है कि चपा के होम के बाद ही अज नामक तुपर पशु की उत्पत्ति होती हो । इसी तरह से ' देवताओ को दिशा का ज्ञान नही रहा ' इत्यादि वाक्यों के उपदेश से दिडमाह ( दिशा भ्रम ) की सभावना नहीं पैदा हो सकती । वाक्यान्तर से विहित कार्यो में भी इनकी कोई उपयोगिता नही हो सकती, क्योकि यहाँ पर ' दही ' से हवन करता है, दून से हवन करता है, अग्नि और प्रजापति के लिये सायकाल हवन करता है ' इत्यादि वाक्यो की तरह द्रव्य और देवता आदि के विधान के उपयुक्त कोई बात नही दिखाई पडती । यहाँ पर ' श्रीहि का प्रक्षण करता है ' इत्यादि वाक्यो की तरह दृष्ट अथवा अदृष्ट इनिकसगता ( क्रिया ) का उपदेश नही किया गया है । प्ररोचना ( लुभाना ) के लिये भी इनका कोई उपयोग नहीं है, क्योंकि ' जो ऐसा चाहता है उसको इसका अनुष्ठान करना चाहिये ' इस तरह के विधि वाक्यों से जो प्राप्त नही होता, उसकी प्रवृत्ति प्रशसापरक वाक्यों से कैसे होगी? म तरह से वेद के एकदेशभूत याद वाक्य जब प्रमाण नहीं है, तो पूरे वेदभाग का प्रामाण्य भी किस तरह से सिद्ध किया जा सकेगा । er na aarat का समाधान अब प्रस्तुत किया जाता है । aare जैमिनि ने ' विधिना त्येक ० ' इत्यादि सूत्र में aater है fafafar ar क्यो के द्वारा उपदिष्ट यज्ञादि कर्मों की प्रशंसा करने में इन पूर्वोक्त सब अर्थवाद वाक्यों का तात्पय है, इसलिये ' सब कर्म श्रष्ठ होने के कारण अवश्य करने चाहिये ' इस प्रकार विधि वाक्य के साथ एकवाक्यता हो जायगो, यद्यपि यज्ञ में उपयोगी द्रव्य, इन्द्र, अग्नि आदि देवता और इतिकर्तव्यता ( यज्ञ में होने वाली विधिविधान युक्त सम्पूर्ण क्रियाएँ ) के विधायक अङ्ग fafe वाक्यो की तरह अर्थवाद वाक्यों को काय के प्रति उपयोगिता नहीं है, तो भी इनको प्रतीत्यङ्गता ( यज्ञादि विधि की अवश्य-कर्तव्यता के ज्ञान में उपयोगिता ) का निषेध नहीं किया जा सकता । इसीलिये इनकी प्रामाण्य में ही उपयोगिता मानो जाती है, प्रमेय मै नहीं । केवल fefore के श्रवण से उस पर विचार नहीं जमता विरोधी तर्क विधि वाक्यो की शक्ति की क्षीण कर देता है । अथवाद antar से न होने वाला विधि की श्रेष्ठता का ज्ञान विश्वास पैदा करा है, किन्तु उससे ' सर्वजित् याग का अनुष्ठान करें ' fat में श्रद्धा का आधिक्य नहीं होता, जैसा कि ' इस सबजित् याग का अनुष्ठान देवताओं ने सब कामनाओं की पूर्ति के लिये और अपने सब शत्रुओं को जीत लेने के लिये किया था । जो इसका अनुष्ठान करता है, उसको सब कुछ प्राप्त हो जाता है, उसकी सर्वत्र विजय होती है इस अर्थवाद वाक्य को सुनकर होता है । लोक में भी ' यह गाय खरीदने लायक है ' इस वाक्य से उस तरह की प्रवृत्ति नहीं होती, जैसी कि ' यह बहुत सारा चिकनाई से भरा दूध देती है, बहुत सीधी है और बच्चे वाली है । अभी तक इसका कोई बछडा मरा नही है ' इस प्रशसा से भरे वाक्य को सुनकर होती है । इसी लिये जैसे अथवाद वाक्य के आधार पर विधि वाक्य की कल्पना की जाती है, उसी तरह से जिस विधि से सबद्ध अथवाद वाक्य नहीं मिलता, वहीं पर अथवा वाक्य की भी कल्पना की जाती है ।
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३०३ सोऽरोदीदित्यस्यापि बर्हिषि रजत न देयमिति विध्यङ्गतेव । रुद्ररोदनेन तदश्रुप्रभवस्य रजतस्य दानेन पुरास्य सवत्सराद् गृहे रोदन भवतीति रजतमदत्वा सुवर्णादिकमेव देयमिति निष्कष । एवमेव ' प्राजापत्यमज तूपरमालभेत ' इत्यस्य विषे शेष ' प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत् ' इत्यर्थवादोऽपि वपाहोममाहात्म्यबाघनपरा । एवम् ' आदित्य प्रापणीयश्वरु ' इत्यस्य विवे शेषो ' देवा वै देवयजनमध्यवसाय दिशो न प्राजान् इत्यथवाद । इत्थ व्यामोहानामादित्श्चरुर्नाशयिता, यथा दिड्माहस्यादित्य | एव तत्र तत्राथवादाना विधिशेषत्वम् । यदुक्तम् —'रुद्ररुदिताद् रजतोत्पत्तिर्वपाहोमाच्च तूपरोत्पत्तिरित्य सत्यार्थबोधकत्वेनाप्रामाण्य वेदानाम् ' इति, तन्न, प्रतिपाद्यस्यार्थस्य सत्यत्वात् । नात्र यथाश्रुतोऽर्थं प्रतिपाद्य I वृत्तान्तज्ञानस्याप्रवर्तकत्वेनानुपयोगात् । प्ररोचना-द्वेपयो प्रवृत्तिनिवृत्त्यङ्गत्वेन तयोरेवार्थवादप्रतिपाद्यत्वात । ननु तथापि रुद्रे रोदनवचनमतथाभूते रजतेऽश्रुप्रभवत्वोक्ति-मिथ्येवेति चेन्न, गुणवादमात्रत्वेन तददोषात् । श्वेतवर्णसाम्यादिना रोदनप्रभव रजतमिति निन्दितुमुच्यते । एव पशुयागे पाहो शायै प्रजापतिरात्मनो वनामुदखिददिति वृत्ताख्यान योजनोयम् । प्रजापतिना वपाहोमाय प्राणसकट, मविगणय स्वात्मववोद्धृता । एवमादित्यवरुप्रतायै देवयजनमध्यवसाय विशो न प्राजानन्निति । नयायिकेम्स्वनेक-पुरुषातिशयवादित्वाद्यथाश्रुतेऽप्यर्थे प्रामाण्य स्वीक्रियते । उत्तरमीमासकैरपि प्रमाणान्तरासिद्धे प्रमाणान्तराविरुद्धे वादाना स्वार्थे यथाश्रुतेऽपि प्रामाण्यमुच्यते । ' aisiakto ' इस ar थवाद वाक्य की ' बहिहोम के अवसर पर रजत का दान नही करना चाहिये ' इस निषेधक fafe arte से rearr यता है । रुद्र के रोने से निकले हुए आसुओ से रजत की उत्पत्ति हुई है । उसका दान करने से यजमान के घर में भी सालभर के भीतर ही रोना पड़ जाता है, इसीलिये रजत का दान न कर सुवर्णादि का ही दान करना चाहिये, यह बात उक्त वाक्य से निष्कर्ष के रूप मे फलित होती है । इसी तरह से ' प्राजापत्य ० ' इत्यादि विधि वाक्य का शेषभूत ' प्रजापति ० ' इत्यादि अपवाद वाक्य है । इससे वपा हाम की विशिष्टता का ज्ञान होता है । इसी तरह से ' आदित्य ' इत्यादि far का अगभूत ' देवा जे ० ' इत्यादि अयवाद वाक्य है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे आदित्य के रहते दिशा ज्ञान में अम की कोई संभावना नहीं रहती उसी तरह से आदित्य को उदिष्ट कर किया गया चरु भो दिशाओं के भ्रम का नाशक होता है । इस तरह से सभी स्थलो म afare arari का विधि वाक्यों के साथ अगागभाव सिद्ध होता है । यह भी आक्षेप किया जाता है कि रुद्र के राने से रजत की उत्पत्ति हुई और वपा के होम में सुपर की उत्पत्ति हुई, इस तरह से अस्य बातो का प्रतिपादन करने के कारण वेदो को प्रमाण नहीं माना जा सकता । किन्तु यह कथन भी गलत है, क्योंकि उसका प्रतिपाय अर्थ सत्य ही है | यहाँ पर जैसा सुना जाता है, वह अर्थं प्रतिपाद्य नही है, क्योकि केवल वृत्तान्त के ज्ञान से प्रवृत्ति नही होती, अत इस अथ का कोई उपयोग नही है । प्ररोधना और द्वेष --ये ही प्रवृत्ति और निवृत्ति के अग है, । स्तुति और निन्दा के द्वारा प्रवृत्ति और निवृत्ति कराना अथवाद वाक्यों का प्रतिपाद्य है । प्रश्न है कि इतने पर भी रुद्र के विषय में रोने की बात और खान से उत्पन्न होने वाली रजत की आँसू से उत्पत्ति एक असत्य बात है । इसका उत्तर यह है कि यह वाक्य केवल गोण अथ को बताता है, यथात अर्थ में इसकी प्रवृत्ति न होने से इसमें कोई दोष नहीं है । श्वेत वर्ण आदि की समानता को देखकर उसको निन्दा करने के लिये कहा जाता है कि रजत की उत्पत्ति रोदन से हुई है । इसी तरह से पशुयश में बपा होम की प्रशंसा में ' प्रजापति ने अपनी वा उखाड कर उनको अग्नि में समर्पित कर दिया ' इस कथा का विनियोग समझना चाहिये । प्रजापति ने अपने प्राणों की भी परवाह किये बिना वपा होम के लिये अपनी नपा की ही निकाल लिया । इसी तरह आदित्यनिमित्तक चरु की प्रशंसा के लिये यह ज्ञान नही रहा, इसके लिये उन्होने आदित्य ara a ई गई है कि देवगण जब यज्ञ का अनुष्ठान करने सो तो उनको दिशाओ का ae का हवन किया । ऐसे स्थानो में नैयायिक अनेक पुरुषों में अतिशय की कल्पना करने के पक्ष में हैं, अत उनके मत से यथाश्रुत अर्थ में भी ग्राम स्वीकार किया जाता है । तात्यय यह है कि उनके मत में सामान्य पुरुषो की अपेक्षा विशिष्ट पुरुषो में विलक्षण सामर्थ्य होती है । वे अपने सामथ्र्य से असभव को भी सभव बना सकते है । उत्तर मीमासक तो प्रमाणान्तर से बसिद्ध और प्रमाणान्नर से rfarea a aafar द वाक्यों का स्वार्थ में यथाश्रुत अर्थ में भी प्रामाण्य मानते है ।
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३०४ वेदार्थ पारिजातः ' स्तेन मन ' इत्यादिक तु गौणार्थकमेव । प्रच्छन्नतया स्तेन मन उच्यते । बाहुल्याभिप्रायेणानृतवादिनी वाक् । ' धूम एवाग्नेदिवा ददृशे ' इत्यादिक तु दूरभूयस्त्वाभिप्रायेण होमदेवतास्तुतये प्रोच्यते । एव प्रवरानुमन्त्रण-प्रशसायं ब्राह्मणत्वे सशय इव दर्शित | अब्राह्मणोऽपि यजमान प्रवरानुमन्त्रणेन ब्राह्मण स्यादिति । ' को ह वै तद्वेद ' इत्यादि तु ' दिक्षु अतीकाशान् करोति ' इत्यतीकाशनिर्माणेन धूमादिकष्ट निवारणरूपस्य दृष्टफलस्य प्रशसायं परलोक-सशीति प्रदर्शिता । ' शोभते मुखम् ' इत्यपि विद्याप्रशसा | शिष्यैरुद्वीक्ष्यमाणत्वात् शोभते इत्युक्ति | ' सर्वान् कामानवा-प्नोति ' इत्यपि प्रकृतापेक्षम् । एवमश्वमेधस्तुत्यर्थमश्वमेधाध्ययनस्यापि फलवचनम् । ' हिरण्य निधाय चेतव्यम् ' इति ' स्तुत्यर्थतया दिव्यन्तरिक्षे पृथिव्या चयन निषिद्धम् । अनुपहितहिरण्याया पृथिव्या नाग्निश्चेतव्य इति तु निर्गलितार्थ । ' आदित्यो ग्रुप ' इत्यत्र तेजस्वित्वगुणयोगाद्यूपस्यादित्यरूपता प्रोच्यते । एव तत्काय्र्यकारित्वाद्यजमान प्रस्तर उच्यते, गोण्या वृत्त्या सिंहो देवदत्त इत्यादि लोकेऽपि व्यवहारदर्शनात् । एवमेवैन्द्रया गार्हपत्योपस्थानम् । एवमन्येऽपि यथायथ योज्या | क्वचित्तु - अर्थवादेनैव कश्चिदश पूर्य्यते । ' प्रतितिष्ठन्ति ह वै य एता रात्रीरुपयन्ति ' इत्यत्राश्रूयमाणाधि-कारस्य रात्रित्रस्य विधेयाशोऽर्थवादादेव लभ्यते । प्रतिष्ठाकामा रात्रिसत्रमासीरन्निति वाक्याथ । क्वचिद्विधि-वाक्यार्थसदेहेऽर्थंवादरूपाद्वाक्यशेषान्निश्चीयते । यथा ' अक्ता शर्करा उपदधाति ' इत्यत्राञ्जनद्रव्ये घृततैलवसादिभेदेन सदिह्यमाने ' तेजो वै घृतम् ' इत्यर्थवादाद् घृतेनाक्ता शर्करा उपधेया इति गम्यते । एवमेव ' यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णेोयात् ' स्तेन मन ' इत्यादि वाक्य गोण अथ वाले हैं । चोर जसे बहुत छिप कर रहता है, उसी तरह से मन भी छिपा हुआ रहता है | बाहुल्य के अभिप्राय से यह कहा जाता है कि वाणी अनृतवादिनी होती है । ' दिन में अग्नि का धूम ही दिखाई देता है ' इस तरह के वचनो का अभिप्राय यह है कि दूरी और बहुतायत के आधार पर होमदेवता की स्तुति की जाय । इस तरह से प्रवरा-नुमन्त्रण की प्रथा के लिये ब्राह्मणत्व में सराय सा दिखाया जाता है । यजमान यदि ब्राह्मण नहीं है, तो भी वह प्रवरान्त्रण ( यश की विशेष क्रिया ) से ब्राह्मण जैसा हो जाता है । ' को ह वै तद्वेद' इत्यादि वाक्यों में ' दिक्षु अतो. ' इत्यादि वाक्या के आधार पर aatra ( ar at fara ष क्रिया ) के निर्माण से धूमादि से कष्ट की निवृत्तिरूप दृष्ट फल की प्रशसा के लिये परलोक में सराय दिखाया गया है । ' इसका मुँह शोभित होता है ऐसे स्थलों में भी विद्या की प्रशंसा की जाती है । शिष्य उसके मुँह का तरफ टकटकी लगाय देखते रहते है, अत ' शोभते ' यह उक्ति उचित ही है । ' पूर्णाहुति से सब कामनाओ को पा जाता है ' यहां पर भी प्रकृत में जो उपस्थित है, उसी का ग्रहण होता है । इसी तरह से अश्वमेध याग की स्तुति के लिये अश्वमेत्र याग के प्रकरण के अध्ययन का भी वही फल बताया गया है | सुवर्ण को रख कर चयन करना चाहिये, इस बात को बताने के लिये स्वग, अन्तरिक्ष और पृथिवी में चयन का निषेध किया गया है । इसका स्पष्ट अभिप्राय यह है कि पृथिवी पर सुवर्ण को बिना रखे उस पर अग्नि चयन नहीं करना चाहिये | ' आदित्यो यूप ' इस वाक्य में तेजस्विता गुण के सपर्क के आधार पर यूप को आदित्य कहा गया है । इसी तरह से प्रस्तर का काय करने से यजमान में प्रस्तरत्व का आरोप किया जाता है । गोणी वृत्ति से लोक व्यवहार में भी देवदत्त सिंह है, इस तरह का प्रयाग देखा जाता है । इसी तरह से ऐन्द्री ऋचा से गार्हपत्य अग्नि का उपस्थापन गौणी वृत्ति से ही किया जाता है । देदीप्यमान होने के कारण अग्नि ही नहीं इन्द्र शब्द से कही जाती है । इसी तरह से अन्य वचनो का भी यथायोग्य समाधान सर्वत्र मिल जाता है । कही - कही अर्थवाद वाक्य से ही किसी अश की पूर्ति कर दी जाती है । जैसे कि ' प्रतितिष्ठन्ति ' इत्यादि अपवादों से प्रतिष्ठा के लिये किये जाने वाले राग्युपस्थान ( रात्रिसन ) का अधिकारी और उसका प्रवर्तक वाक्य कौन है, इसका निर्णय होता है । ' प्रतिष्ठा की कामना वाले व्यक्ति रात्रिसत्र का अनुष्ठान करें इस तरह का विधि वाक्य उक्त अर्थवाद वाक्य के सहारे ही कल्पित कर लिया जाता है । कहो पर विधि वाक्य के अर्थ में सदेह हो जाने पर उसका समाधान भी अर्थवाद के सहारे किया जाता है । जैसे कि ' अक्त ( freit ) शर्करा को रखता है यहाँ पर घृत, तेल अथवा चर्बी में से किस द्रव्य से चिकनी करके शकरा ( ककरीद या बालू ) को रखे, ऐसा सदेह उपस्थित होने पर ' तेजो वे घृतम् ' इत्यादि अर्थवाद वाक्यों के सहारे घृत से अक्त शर्करा का उपनिधान विहित
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३०६ तावतो वारुणाश्चतुष्कपालान्निवपेत् ' इत्यत्रापि ' प्रजापतिवरुणायाश्वमनयत् स जलोदरेण गहीतोऽभवत् ' इत्यर्थवादेन यावताश्वान् प्रतिग्राह्येदित्यर्थी निर्णीयते । मन्त्राप्रामाण्यशङ्का maha tet अर्थप्रकाशनद्वारेण विध्यर्थीपयुक्ता उच्चारणमात्रेण वा अविवक्षितार्थत्वे तु मन्त्राणाम-प्रतिपादकत्वलक्षणमप्रामाण्य शक्यते । यद्यर्थप्रकाशनोपकारिणो मन्त्रा भवेयुस्तदा तु सामर्थ्यादेव पुरोडाशप्रथने विनियोगो ज्ञास्यते । तथा ' उरु प्रथस्वेति पुरोडाश प्रथयति ' इति विनियोगो व्यर्थ एव भवेत् । साक्ष पुरुष परेण नीयमानत्वादेवाक्षिम्या न पश्यतीति गम्यते । तेनोच्चारणान्मन्त्राणामदृष्ट भवति । वाक्यक्रम नियमाच्चाविवक्षितार्था मन्त्र इति गम्यते । यद्यर्थप्रतिपादनेनोपकुर्युस्तदा नियतक्रमाश्रयण व्यर्थमेव स्यात् क्रमान्तरेणापि तदर्थावगमसपत्ते । ' चत्वारि शृङ्गास्त्रयो s स्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवोति महोदेवो मर्त्याना-विवेश ॥ ' इत्यस्य मन्त्रस्य निरर्थकतैव चतु शृङ्गादियुक्तसत्त्वस्याप्रसिद्धे । न चैवविध किञ्चिद्यज्ञसाधक भवति । ' ओषधे त्रायस्व ' इति मन्त्रेणाचेतन प्रार्थ्यते, ' शृणोत ग्रावाण ' इति च । ' अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षम् ' इति च विप्रतिषिद्ध-वर्णनम् ' अम्यक् सा त इन्द्र ऋषि, शृण्येव जर्फरी तुर्करीतू, इन्द्र सोमस्य कर्क ' इत्यादिमन्त्राणामर्थ एव न ज्ञायते । तत उच्चारणमात्रेणैव मन्त्रा उपयोगिन । माना जाता है । इसी तरह से ' जितने अश्वो का ग्रहण करे उतने ही व rer ass पालो का निर्वपन भी करे ' इस विधि वाक्य में ' प्रजापति ने वरुण के लिये केवल अश्व को उपस्थित किया तो उसको जलोदर हो गया ' इस व्यथवाद वाक्य के सहारे ' जितने अश्वों को वरुण की भेंट चढ़ावे ' यह अथ किया जाता है । मन्त्री के प्रामाण्य पर आक्षेप इसी तरह से यह प्रश्न भी उठता है कि मन्त्रो का विव्यथ के प्रति उपयोग अथप्रकाशन द्वारा होता है, अथवा केवल उच्चारण मात्र से? यदि उनमें अथ की विवक्षा नही मानी जायगी, तो किसी नये अर्थ को प्रतिपादकता के अभाव में उनका प्रामाण्य कैसे माना जा सकेगा और यदि वे अथ के प्रकाशन द्वारा fasse के लिये उपयोगी है, तो अथ ( द्रव्य - देवता इत्यादि ) सामर्थ्य से ही पुरोडाश के प्रथन में विनियोग के ज्ञात हो जाने पर ' उरु प्रथस्वेति ० ' इस तरह विनियोग को बताने वाले वाक्य व्यर्थ हो जायेंगे । आँख वाले आदमी को यदि कोई दूसरा व्यक्ति हाथ पकड कर ले जा रहा है, वो इससे ज्ञात हो जायगा कि उसको आँखो से दिखाई नही पडता । इसी तरह से यहाँ भी मानना पडेगा कि विनियोजक वाक्यों के आधारभूत मन्त्रो के उच्चारण से ही अदृष्ट होता है, उनका कोई अर्थ नही होता । वेदो में वाक्य का क्रम भी नियत है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि मन्त्रो का अथ faraft नही है । यदि अर्थ के प्रतिपादन द्वारा भी इनमें उपकार माना जाय, तो उस अवस्था में वाक्यविन्यास में एक निश्चित कम का हो उपयोग करना व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि अर्थ का ज्ञान के क्रम को मिलता में भी सभव हो सकता है । ' त्वारि शृङ्गा ' * इत्यादि मन्त्रों का क्या अर्थ हो सकता है । चार सीग, तीन पैर, दो सिर, सात हाथ वाला कोई व्यक्ति केही प्रसिद्ध नहीं है । इस तरह की कोई वस्तु यक्ष को साधक नही हो सकती । ' औषधे त्रायस्व ' ( हे औपधियो, मेरी रक्षा करो ) ' ग्रावाण ' ( पत्थरी सुनो ) इत्यादि स्थलों में अवेतन भोषधी और पत्थर की प्रार्थना की जाती है । ' अदिति ही स्वग और अन्तरिक्ष है ' यह वर्णन परस्पर विरोधी है । ' वृष्येव जरी तुफेरीत ', ' इन्द्र सोमस्य कर्क ' इत्यादि मन्त्रों का के ज्ञान कोई की अर्थ कोई ही नहीं हो सकता | इसलिये यही मानना उचित है कि मन्त्रो का उपयोग केवल उनके उच्चारण में है, उनके अर्थ उपयोगिता नही है । ३ ९
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३०६ date पारिजात अत्रापि ऋषिमि समाहितमेव । तथाहि-- शब्दार्थ मम्बन्वव्युत्पत्तिमस्कृत मतीना ' वहिर्देवमदन दामि ' इति -मन्त्रश्रवणे तदर्थप्रतीतिर्भवत्येव व्युत्पत्तिरपि न नास्ति, य एव लौकिका शब्दास्त एवं वैदिका त एव तेषामर्था इत्यस्युपगमात् । न तथाप्यविवक्षितार्था मन्त्रा ग्रहैकत्ववदिति युक्तम । अविवक्षाहेत्वभावात् तत्र तु वचनान्तर-विज्ञातसख्यत्व त्, सोमावसेक निर्वहणस्य सम्मार्गकाय्र्यस्य सर्वग्रहसाधारणन्वात, ' ग्रह सम्माष्टि ' इत्यत्र विभक्ते कमकारकसमपणमात्रणापि चरितार्थत्वाद् युक्तमेकत्वस्याविवक्षणम | ' वहिर्देवसदन दामि ' इत्यादी तु ऋतूपयोगिद्रव्यादि-प्रकाशनम् । विव्यपेक्षितत्वान्मन्त्रेण स्मृत कर्म करोति । तथा क्रियमाणमभ्युदयकारीति कुतोऽविवक्षितार्थता? ' पावमाती जपेत ' इति जपविधानादेव पवमान मन्त्राणा जपायता । तत्रापि तज्जपस्तदर्थ भावनन्यायेन भावनायामर्थ ज्ञानोपयोग । यदपि तदर्थविनियोगादविवक्षितार्थतोक्तेति तदपि तुच्छम् तथात्वेऽपि मन्त्रात् प्रतीय-मानस्यार्थस्य त्यागायोगात् । श्रुत्यभावे सत्येव लैङ्गिको विनियोग आद्रियते । मन्त्रैरेव द्रव्यदेवते स्मर्तव्ये इति नियमसार्थक्याथञ्च Harafaaf क्षतार्था ' | ' यज्ञपतिमेव तत्प्रथयति तद्यज्ञपति यजमानमेव प्रजया पशुभि प्रथयति ' इति । क्वचित्तु गुणाथ-विधानम । यथा ' ता चतुर्भिरादत्ते ' । एवमेव वेदानामनादित्वान्नियतक्रमातुल्लङ्घनम् । नैयायिकरीत्याऽपि परमेश्वरप्रणीते Maa ara णामन्यथाकरणे सामर्थ्यम् । इन सब काओ का समाधान भी ऋषियों ने किया है । जैसे कि शब्द, अर्थ और उनके सबन्ध की व्युत्पत्ति को जानने वाले व्यक्ति को ' बहिर्देवसदन ' इत्यादि मन्त्रो को सुनने पर उनके अर्थ का ज्ञान हो हो जाना है । व्युत्पत्ति न हो सकती हो, ऐसी बात नहीं है, क्योकि यह माना गया है कि जो लौकिक शब्द है, वे ही वैदिक शब्द भो हैं और वे ही उनके अथ भी है । इस परिस्थिति में ग्रह पात्र के एकत्व की तरह मन्त्रो का अर्थ भी अविवक्षित हैं, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योंकि यहा पर अथ की afar का कोई तु नहीं दिखाई पडता । ग्रहपात्र के प्रकरण में तो वचनान्तर से बहुत्व सख्या प्राप्त है, क्योकि समाजन रूप कार्य सभी ग्रह नामक पात्रो में सामान्यत प्राप्त है । अन ग्रह समष्टि ' यह वाक्य विभक्ति अर्थात् क्रम कारक को बतान मात्र से हा चरिताथ हा सकता है, ऐसे अवस्था में बहा पर एकत्व का अविवमा उचित हो मानो जायगी । बहिर्देवसदन दामि ' इत्यादि स्थलों में यज्ञ के उपयोगा बहि आदि द्रव्यों का प्रकाशन मन्त्र के द्वारा हाता हूँ । विधि के लिए यह है कि उच्चारण * द्वारा वस्तु का स्मरण करके हो किमो कम को पूरा करे | ऐसा करने पर हा वह अभ्युदयकारी होगा | ऐसी स्थिति मे मन्त्रा के अर्थ को अविवक्षा कैसे मान्य हो सकती है? ' पावमानी जपेत ' इस वाक्य से जप का विधान होने से हो पावनानी मन्त्र का जप में विनियोग होता है | यहा पर भो ' मन्त्र के जप के साथ उसके अर्थ की भावना मो की जाये इस योगसूत्र के अनुसार भावना के लिए अज्ञान का उपयोग ठीक ही है । अर्थ के विनियोजक अन्य वाक्यो को देखकर मन्त्रो मे अथ विवक्षित नही है, ऐसा कहना गलत है, क्योकि उस अवस्था में भी मन्त्र से जो अर्थ प्रतीत होता है, उसको छोड़ा नहीं जा सकता । feat rare में ही लिङ्ग रूप प्रभाग से विनियोग माना जाता है | मन्त्रो का अर्थ विवक्षित है, ऐसा मानने पर ही ' यज्ञ में द्रश्य और देवता का मन्त्रो से ही स्मरण करना चाहिये ' यह नियम साथक हागा | ' यज्ञपति प्रथयति ' इस मन्त्र का अथ ब्राह्मण में इस प्रकार किया गया है कि वह यज्ञपति अर्थात यजमान को प्रजा और पशुओं समृद्ध कर देता है । ' ता चतुभिरादत्ते ' इत्यादि स्थलों में गौणाय का भी विधान मिलता है । वेदो की निपल अनुपूर्वी का उल्लघन safare नही किया जाता कि वे अनादि काल से जिस तरह से चले ना रहे हैं, उस आनुपूर्वी की रक्षा करता है । नैयायिकों के मत से भी परमेश्वर प्रणीत वेद में अध्येताओं को उसकी आनुपूर्वी को बदल देने का कोई अधिकार नहीं है ।
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वेदार्थपारिजात sats ' चत्वारि शृङ्गा ' इत्यत्र तु गुणवादेन यज्ञस्य सस्तव । कामान् वर्षतीति वृषभो यज्ञ । स्तोत्रशस्त्रप्रयोग-बाहुल्याद्रोरवीति शब्दायमानो महोदेवो मर्त्यानाविवेश मनुष्यकर्तृकत्वेन यज्ञ स्तूयते स्तुतो भवति । चत्वारो वेदा शृङ्गा, त्रीणि सवनानि त्रय पादा, दम्पती यजमानो द्वे शीर्षे सप्तच्छन्दासि सप्तहस्तास, मन्त्रब्राह्मणकल्पेस्त्रिधा बद्धो वृषभो यज्ञो भवात । ' ओषधे त्रायस्व ' इति स्तुत्यर्थं चेतनावत्प्रयोग | प्रातरनुवाकस्तुतये ' शृणोत ग्रावाण ' इति मन्त्रे इत्थ नामैष प्रातरनुवाक यशस्यो यदचेतना ग्रावाणोऽपि शृणुयु । अदितिद्यौरित्यपि गुणवाद, यथा लोके ' स्वमेव माता च पिता त्वमेव ' इत्यादिकम् । एवमर्थावगमोऽपि प्रमादमूलक एव, नात्र मन्त्रापराध । यद्यपि क्वचिदशे लौकिकवैदिक-शब्दयो सस्कारभेदेन भेदो भवति, तथाप्यैक्य प्रत्यभिज्ञायत एव । लोकप्रसिद्धिविप्रतिषेधे शास्त्रवित्प्रसिद्धिराद्रियते । यथा - यवमयश्चरुवराही उपानही वैतसे कटे प्राजापत्याश्चिनोतीति यव- वराह वेतसशब्दा दीर्घशुक शुकर वञ्जुलकेषु शिष्टप्रसिद्धा नियम्यन्ते न प्रियङ्गु- काक-जम्बूषु । यत्र तु शिष्टप्रसिद्धिर्नास्ति तत्र म्लेच्छप्रसिद्धेरपि शब्दव्युत्पत्तिराश्रीयते । यथा पिक नेम तामरसशब्देषु । यत्र म्लेच्छप्रसिद्धिरपि नास्ति, तत्र निगमनिरुक्तव्याकरणवशेन धातुतोऽयं परिकल्पनीय । तेनाश्विनसूक्तप्रक्रमाज्जरण-मरणनिमित्त ' जर्फ नुरीतू ' शत द्विवचनान्तरूपौ शब्दावश्विनोर्वाचकौ । एवमन्येऽपि मन्त्रा शिष्टेर्व्याख्याता एव । yaha नामधे येणाप्याक्षेप । तथाहि - ' उद्भिदा यजेत ', ' चित्रया यजेत पशुकाम ', ' अग्निहोत्र जुहुयात् स्वर्गकाम ', ' श्येनाभिचरन् यजेत् ', ' वाजपेयेन स्वाराज्यकामो यजेत ' । किमेते गुणविधय, कर्मनामधेयानि वा? ' चत्वारि शृङ्गा ' इस प्रति मे गुणवाद के आधार पर यज्ञ की स्तुति की गई है । यह मनोवाञ्छित कामनाओ की वर्षा करता है, अत यज्ञ को भी यहाँ पर वृषभ शब्द से कहा गया है । इसमें स्तोत्र और शस्त्रो को बार - बार बोला जात है, इसलिये शमान यह महान् देव ( य ) मनुष्यों के द्वारा सस्तुत होता है । अर्थात् वृषभ जैसे खूब जोर - जोर में शब्द करता है, वैसे हो यज्ञ में भी स्तोत्री और स्त्री का शब्द होता रहता है । चार वेद ही इस यक्ष रूपी वृषभ के चार सीग है, तीन सवन ( प्रात, माध्यन्दिन और साथ सन ) इसके तीन पैर है, यजमान दम्पती ( पति - पत्नी ) इसके दो शिर हैं, सात छ द सात हाथ है, यह कामनाज की वर्षा करने वाला यहाँ पर वृपभ यज्ञ मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसून रूपी तीन साधनो से बाबा जाता है, सपन किया जाता है । ' भोषधे त्रायस्त्र ' atest की स्तुति के लिए उसमे चेता का आरोप करके प्रयोग किया गया है । ' शृणोत ग्रावाण ' यहाँ पर प्रातरनुवाद की स्तुति अभिप्रेत है । यह प्रातरनुवाक इतना प्रशस्य है कि अचेतन पत्थर भी इसको सुनते है । ' अदितिद्य ' इत्यादि भी गुणवाद के ही बोधक हैं, जैसे कि लोक में भगवान् के प्रति कहा जाता है कि ' तुम्ही मेरी माता हो तुम्ही मेरे पिता हो ' गीता का यह ate लोक में प्रसिद्ध ह, ऐसे हा अदिति का भी सब कुछ बताना युक्तिमगत ही हैं । किसी को किसी मन्त्र के अर्थ का तो नही होता, ता इसमें उसका प्रमाद ही कारण है, इसमें मन्त्र का कोई अपराध नहीं । यद्यपि कही कही लौकिक व वैदिक शब्दों में संस्कार के भेद के आधार पर भेद होता है, किन्तु उनकी एकता की प्रत्यभिज्ञा ( निश्चय ) भी साथ में हो ही जाती है । ate प्रसिद्धि से विरोध होने पर शास्त्रज्ञो की प्रसिद्धि का आदर किया जाता है । जैसे कि ' थवमय ० ' इत्यादि वाक्य में यव, वराह और वेतस शब्दो का शिष्ट प्रसिद्ध दीर्घशुक शुकर और वज्जुल ( बेंत ) क्रमश इन अर्थों में नियमन होता है, लोक प्रसिद्ध प्रियजु, काक और जम्बू- इन अर्थों में नहीं । जहाँ पर शिष्ट प्रसिद्धि भी नही मिलती, वहाँ पर म्लेच्छ - प्रसिद्धि से भी शब्द व्युत्पति स्वीकार की जाती है । जैसा कि विक, नेम, तामरस प्रभृति शब्दों के विषय में म्लेच्छ प्रसिद्धि के अनुसार ही इनका अर्थ स्वीकार किया गया है । जहाँ पर म्लेच्छ प्रसिद्धि भी नहीं है, ऐसे स्थानों में निगम, निरुक्त, व्याकरण के आधार पर धातु से अर्थ की परिकल्पना की जाती है । इसी पद्धति से विचार करने पर आश्विन सूक्त के प्रसग में आयें मन्त्र में विद्यमान ' अफेरी ( गन्सारी ) तुर्करीतू ( हन्तारौ ) ' ये द्विवचनान्त शब्द भी जरण - मरण के निमित्त देवतायुगल अश्विनीकुमारों के वाचक है । इसी पद्धति से शिष्ट बनो ने अन्य मन्त्रो की भी व्याख्या की है । इसी प्रकार यज्ञो के नाम को लेकर भी आक्षेप किया जाता है । जैसे कि ' उद्भिदा यजेत ' इत्यादि वाक्यों में उद्भिद fear, affair, येन, वाजपेय प्रभृति शब्द गुणविधि के वाचक हैं, या ये किसी कर्म ( यज्ञ ) के नाम है? यहाँ पर सज्ञा और सशी
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३०८ darefoote नात्र सनास जिसम्बन्धी विधीयते । योगेन केनचित् प्रवर्तमान नामधेयमवगम्यते । उद्भेदनमनेन पशुना क्रियते इत्युद्भिदिति । दधिमधुघृतवाना उदक तत्संसृष्ट प्राजापत्यमिति नानाविधविचित्रद्रव्यसाध्यत्वाच्चित्रा । अग्नये होत्रमस्मिन्निति अग्निहोत्रम् । यथैव श्ये॒नो निपत्यावत्ते एवमनेन द्विषन्त भ्रातृव्यमादत्ते ' इत्यर्थवादात् श्येनो याग | वाजमन्न पीयतेऽ-स्मिन्निति वाजपेयो याग । यदप्युच्यते-- काम्यमान स्वर्ग कथ क्रियया सम्बद्धयते? यदि हि चन्दन स्वर्ग षोडशवर्षा अङ्गना वा चन्दनाङ्गनादिद्रव्यसामानाधिकरण्यप्रयोगाद् द्रव्यबोधक स्वर्गशब्द | द्रव्याणा कर्मसम्बन्धे गुणत्वेनाभिसम्बन्ध इति दध्यादिवत् साधनत्वेन स्वर्गं उपकरोति क्रियाम् । कामनापि द्रव्याहरणाङ्गत्वात्तदुपकारिणी । यत्तया द्रव्यमानेतु यतत sa दृष्टोपकारित्वम्, तदपि न ममञ्जनम्, स्वर्गशब्दस्य द्रव्यवावित्वाभावेन प्रीतिवचनत्वात् । तदेव चन्दन शीतातुरेण न स्वर्ग, ग्रीष्मोपहतेन स्वर्ग इति व्यपदिश्यते, सैवाङ्गना सुरतार्थिना स्वग, विरताया तत्तृषि न स्वग उच्यते । तदेवमेष स्वर्गशब्द प्रीति न व्यभिचरति, द्रव्य तु व्यभिचरति । एवमद्रव्यत्वात् स्वगस्य न क्रियाङ्गत्वम्, तथापि निरतिशयसुख-प्रतीत्यन्यथानुपपत्तित परिकल्पित कनकगिरिशिखरादिदेश स्वर्ग । सुतरा तस्य न क्रियासाधनत्वमवकल्प्यते, दध्यादिवद् उपादातुमशक्यत्वात् । ' समुद्र मनो ध्यायेत् ' इत्वदृष्टद्वारापि स्वर्गकामनोपकारिणी, इत्यपि क्लिष्टकल्पनमेव f प्रीतिर्हि निरतिशय स्वर्ग । प्रीतेश्च नान्यार्थत्व युक्तम् । प्रीत्यर्थमन्यन्नान्यार्थी प्रोति । तस्मात्र यागाय स्वर्ग, किन्तु स्वर्गाय के संबन्ध का विधान नहीं हैं । यौगिक व्युत्पत्ति के आधार पर यह ज्ञात होता है कि ये शब्द कम के नाम के बोधक है । उद्भिद याग से पशुओ का उद्भेदन किया जाता है । प्राजापत्य हवि के दनि, मधु, घृत, याता और जल के समिश्रण से तयार होने से नाना प्रकार क द्रव्यो से बनने वाली यह हवि विचित्र है, अब उस हृवि से होन वाले यज्ञ का ' चित्रा ' नाम भी ठीक ही हैं । व्यग्निहोत्र में अग्नि के लिए हवन किया जाता है । ' जैसे वाक पक्षी झपट्टा मारकर अपने शिकार को पकड लेता है, उसी तरह से स्थेन याग की सहायता से यजमान भी अपने विरोधी शत्रु को धर दबोचता है ' इस अर्थवाद area के सहारे ' sur ' यह याग का नाम सिद्ध होता है । याग का नाम वाजपेय इसलिए है कि इसम वाज अथात् अन्न का पान किया जाता है । पुन शका उठाई जाती है कि ' स्वर्ग तो काम्यमान है, इसका क्रिया से संबन्ध कैसे होता है? चन्दन हो स्वर्ग है areer षोडशी रमणी ही स्वर्ग है? चन्दन, अगना प्रभृति द्रव्यों के साथ ही सदा स्वग जुड़ा हुआ है, अत यह व्यवाचक शब्द है । द्रव्यों का कर्म में सबन्ध गुण के आधार पर होता है, अत दही आदि द्रव्यों की तरह क्रियाए भी स्वर्ग के साधन में उपयोगी होंगी । कामना भी द्रव्य के लाने में अग होने के कारण उसकी उपकारक है, क्योंकि कामना से ही द्रव्य लाने का प्रयत्न करता है । इस तरह से स्वर्ग की इष्टोपकारिता हो मानी जायगी, अदृष्टोपकारिता नही । ' किन्तु यह शका भी सही नहीं है । स्वर्ग शब्द द्रव्यवाची न होकर प्रीति का बोधक है । एक ही चन्दन शोतातुर के लिये स्वर्ग नहीं है और जो गर्मी से व्याकुल है, उसके लिये स्वग है । एक ही स्त्री रवि की कामना वाले के लिये स्वर्ग और स्पृहा रहित व्यक्ति के लिये स्वर्ग नहीं है । इस तरह से यह स्वर्ग शब्द प्रीति से कभी व्यभिचरित नही होता, हृन्य से इसका व्यभिचार होता रहता है । द्रव्य न होने से ही स्वर्ग किसी क्रिया का अग नहीं हो सकता, तो भी निरतिशय सुख प्रतीति को अन्यथा उत्पत्ति न होगा, इसलिये सुमेरु पर्वत के शिखर आदि स्थानों में स्वर्ग की कल्पना करते है | इसकी क्रिया साधनता किसी भी तरह से कल्पित नही की जा सकती, क्योंकि दधि प्रभृति द्रव्यों की तरह इसका उपादान ( ग्रहण ) सभव नहीं । ' समुद्र मनो ध्यायेत् ' मन को ही समुद्र समझकर ध्यान करे, इत्यादि स्थलों में स्वग की कामना अदृष्ट के द्वारा उपकारक होगी, यह भी एक क्लिष्ट कल्पना है । निरतिशय प्रीति ही स्वग है । इस प्रीति का अन्य कोई प्रयोजन हो नहीं सकता । प्रीति के लिये ही अन्य सब कुछ है, प्रीति किसी अन्य के लिये नहीं है । इसलिये याग के लिये स्वग नही है, किन्तु स्वग के लिये
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३०६ याग इत्येव युक्तम् । तथा च क्रियासाधनानुपदेशात्र कर्तृसमर्पणेन स्वर्गकामपद समन्वेति । कथ तस्यान्वय अधिकारिवाचित्वेनेति । न च प्रत्यक्ष प्रबलम, किन्तु निश्चितप्रामाण्यमेव तत्तथा । न चागमविरोधे सति प्रामाण्य निश्चितम्, आगमविरोधादनुमानविरोधाच्च भाविवाधाभावानिणयाच्च । नतु प्रत्यक्षमेव प्रवलमनुमानागमबाधकम् । नानुमाना-गीतबाधक । प्रत्यक्षाप्रामाण्ये तद्विरोधाभावेन तयो प्रामाण्य तयो प्रामाण्ये च तद्विरोधात् प्रत्यक्षाप्रामाण्यमित्यन्यो-न्याश्रयात । नहि प्रत्यक्षस्य प्रामाण्येऽप्येवमन्योन्याश्रयस्तस्यानपेक्षत्वादिति चेल, चन्द्रतारकादिपरिमाणप्रत्यक्षे s नुमानागमविरोधेन तम्याप्रामाण्यदर्शनात् । ततश्च प्रत्यक्षेणाऽपि स्वप्रामाण्येतराविरोधस्यापेक्षणीयत्वात् । ततश्चात्रा-प्यन्योन्याश्रयस्तुल्य एव । परस्परविरोधेन प्रामाण्यसन्देहे सत्यनाप्ताप्रणीतत्वादिना प्रमाजनकत्वव्याप्तेर्वेदप्रामाण्य निश्चये जाते ते स्वत सभावितदोषस्य प्रत्यक्षस्य बाधान वैदिकमतेऽन्योन्याश्रय | अन्यथा देहात्मैक्य प्रत्यक्षबुद्धया वाधाद्देह भिन्नत्वमप्यात्मनो नानुमानागमाभ्या सिद्धय ेत् । ननु चानुमानागमापेक्षया प्रत्यक्षस्य जात्यैव प्राबल्यम् । तत एवौष्ण्यप्रत्यक्षेण वह्निशैत्यानुमिति प्रतिबन्ध | न चोपजीव्यत्वनिबन्धन तत्र प्रत्यक्षस्य बाधकत्वम् धर्म्यादिश्चक्षुषैव सिद्धेस्त्वचोऽनुपजीव्यत्वात् । किञ्च अनुमाद्यग होत रेखोपरेखादिग्राहकत्वादनुमाद्यनुवतितदिमोहादिनिवतकत्वाच्च प्रत्यक्षस्यैव प्राबल्यमिति चेन्न, याग है, यही उचित पक्ष है । इस तरह से क्रिया के साधन का उपदेश न होने से कर्ता के समर्पण द्वारा स्वर्गकाम पद का अन्वय नही होता | तब इसका अन्य किस तरह से होगा? इस तरह से होगा कि स्वर्गकाम पद अधिका व्यक्ति का बोधक है । अन्य प्रमाणो की पक्ष सवत्र प्रत्यक्ष प्रबल नहीं है, किन्तु जिस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य निश्चित है, वही दूसरे प्रमाणो कीला प्रबल होता है | आगम प्रमाण से विरोध होने पर ता प्रत्यक्ष का प्रामाण्य निश्चित नही होता, क्योकि आगम और अनुमान दोनों से उसका विशेष पडता है, साथ ही इसका भी कोई निश्चय नही हो पाता कि मागे कोई area प्रमाण नही था उपस्थित होगा | प्रश्न है कि ' प्रत्यक्ष ही प्रबल हैं । इससे अनुमान और आगम का ही बाध होगा । अनुमान और आगम प्रत्यक्ष प्रमाण के ans कभी नहीं हो सकते । प्रत्यक्ष के प्रमाण होने पर उससे विरोधाभाव के कारण अनुमान और आगम का प्रामाण्य होगा और अनुमान तथा आगग के प्रमाण होने पर उनसे विरोध के कारण प्रत्यक्ष अप्रमाण होगा, इस तरह से यहाँ पर अन्योन्याश्रय दोष भी उपस्थित होगा । प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने पर इस अन्योन्याश्रय दोष की प्रसक्ति नहीं होगी, क्योकि प्रत्यक्ष का प्रामाण्य तो दूसरे किसी को अपेक्षा नही रखता । ' इस शका का उत्तर यह है कि चन्द्रमा, तारे आदि का जो परिमाण प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात होता है, वह अनुमान और आगम प्रमाण से ज्ञात उनके परिमाण के विरुद्ध है । ऐसे स्थलों से प्रत्यक्ष का अप्रामाण्य स्पष्ट है । प्रत कोही अपने प्रामाण्य के लिये दूसरे प्रमाणों से अविरोध की अपेक्षा रहती हैं । ऐसी अवस्था में अन्योन्याश्रय दोष की प्रसक्ति यहाँ पर भी होगी । प्रमाण में परस्पर विरोध होने पर उनका प्रामाण्य सदिग्ध हो उठता है । ऐसी अवस्था में वेद के विषय में, अनाप्त व्यक्ति को यह कृति नहीं है, इतने मात्र से उसकी प्रमाजनकता के साथ प्राप्ति बन जाने पर प्रामाण्य का निश्चय हो जाता है । स निश्चय ज्ञान के आधार पर, स्वत जिसमें दोष की उद्भावना होती रहती है, ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रामाण्य का बाघ हो जाने से वैदिक मत में उक्त अन्योन्याश्रय दोष नही रह पाता । अन्यथा प्रत्यक्ष के द्वारा देह और आत्मा की एकता की प्रतीति के आधार पर इनके भेद की प्रतीति के बाथ के कारण अभाव और अनुमान से देह और आत्मा की भिन्नता न सिद्ध हो सकेगी । पुन प्रश्न होता है कि ' अनुमान और आगम की अपेक्षा प्रत्यक्ष का स्वभावत प्राबल्य रहता है । इसलिये उष्णता की प्रत्यक्ष प्रतनि के आधार पर वह्नि की शीतलता का अनुमान बाधित हो जाता है । अन्य प्रमाणो का उपजीव्य होने से प्रत्यक्ष वहाँ aree नही होता, क्योकि धर्मो की सिद्धि जथ चक्षु इन्द्रिय से ही हो जायगी, तब त्वमिन्द्रिय उसकी उपजीव्य नहीं हो सकती । afre, अनुमान नादि से अगृहीत रेखा, उपरेवा प्रादि का ग्राहक होने से और अनुमानादि से न निवृत होने वाले दिमोह प्रभृति st free garera at प्रबल होता है । ' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि त्वाच प्रत्यक्ष ( त्वगिन्द्रिय से होने वाला स्पर्श का
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२१० त्वाच प्रत्यक्षस्याप्युपजीव्यत्वेन शेत्यानुमितिप्रतिबन्धकत्वसभवात् । चक्षुरादिना धर्मग्रहेऽपि त्वच विना साध्यप्रसिद्धे-रसभवात् । तथा च न प्रत्यक्षस्य जात्या प्राबल्ये किमपि मानम् । तदगृहीतग्राहित्वमपि न प्राबल्ये हेतु, प्रत्यक्षाद्य गृहीतधर्मादिग्राहकत्वेन परोक्षप्रमाणस्यैव प्राबल्यापत्ते । न वानुमानाद्यनुवर्तित दिङ्मोहादिनिवत्तकत्वेन प्रावस्यम्, तावता वैधर्म्यमात्रसिद्धे । न च तावतेत रप्रमाणापेक्षया प्राबल्यम् । अन्यथा त्वावप्रत्यक्षानिर्वा तवशोर, भ्रमनिवर्तकत्वाच्चक्षुषोऽपि स्वगपेक्षया प्राबल्य स्यात् । ततश्व चित्रनिम्नोन्नतज्ञानस्य चाक्षुषस्य तद्विरोषित्वज्ञानाद् बाघो न स्यात् । आगमस्य सर्वत प्राबल्ये स्मृतिरपि --' प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम् ' इति । ' तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव । न तल विद्यते व्योम्नि न खद्योतो हुताशन ॥ तस्मात्प्रत्यक्ष दृष्टेऽपि युक्तमर्थे परीक्षितुम् । परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थात धर्मात्परिहीयते ॥ ' इति नारदस्मृतौ प्रत्यक्षदृष्टस्यापि प्रत्यक्षमविश्वस्य प्रमाणोपदेशादिभि परीक्षणीयत्वोक्ते । न च नभसो नॅव्यप्रत्यक्ष नभस शब्दकगुणत्वप्रतिपादकमागममन्तरा प्रत्यक्षेणापवदितु शक्यम् । न च नमसि समीपे नेल्यानुपलम्भाद् दूरे तद्धीर्दूरत्वादिदोष पन्येति निश्चयेन तद्बाध इति वाच्यम् दूरे नैल्यदशनेन समीपे तदनुपलम्भस्तु हिनावगुण्ठनानुपलम्भवत्सामीप्यदोषजन्य इत्यस्यापि सभवात्, अनुभवबलान्नभोनल्यमव्याप्यवृत्तीत्यु-पपत्तेश्च । न च दूरस्थस्य पुसो यत्र भुसन्निहिते वियत्प्रदेशे नैत्यधीस्तत्रैव गतस्य नैल्यबुद्धेर भाव प्रत्यक्षेण बाध इति प्रत्यक्ष ज्ञान ) की भी उपजीव्यता के आधार पर उससे शैत्यानुमिति को प्रतिबन्धकता हो सकती है । चक्षुरादि इन्द्रियो से धर्मों का ग्रहण होने पर भी स्वगिन्द्रिय के बिना उष्णता की सिद्धि नही हो सकती । इस तरह से प्रत्यक्ष की स्वभावत Near में कोई प्रमाण नही है । प्रत्यक्ष की अगृहीतग्राहिता ( अज्ञात ज्ञापकता ) भी उसके प्राबल्य में कारण नही हो सकती, क्योकि प्रत्यक्षादि से श्रगृहीत धर्मादि के ग्राहक होने से परोक्ष ( शास्त्र आदि ) प्रमाण ही इस तरह से प्रबल हो जायगा । अनुमानादि से निवृत्त न होने वाले डिमोहादि की fracea के कारण भी प्रत्यक्ष की प्रबलता नही सिद्ध हो सकती, क्योकि इससे वैधर्म्य ( धमभेद ) मात्र की सिद्धि होती है | केवल इतने से ही इतर प्रमाण की अपेक्षा यह प्रबल नहीं माना जा सकता । अन्यथा त्वाच प्रत्यक्षसे निवृत्त न होने वाले बास दण्ड में उत्पन्न हुए सर्प के भ्रम को दूर कर देने के कारण स्वन्द्रिय की अपेक्षा चक्षुरिन्द्रिय का भी प्राबल्य स्वीकार करना पडेगा । तब चाक्षुष चित्र ज्ञान, निम्नो aa ज्ञान आदि का इनके विरोषा ज्ञानो से बाघ नहीं होगा । आगम सभी प्रमाणो म प्रबल होता है, यह बात स्मृति से भी सिद्ध होतो है - ' प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम इन तीनो मे स्वभावत. आगम हो प्रबल होता है ' | ' आकाश चिपटा मालूम है और जुगन आग की तरह चमकता है । वास्तव में आकाश मे तल की सत्ता नहीं है और न जुगनू ही आग है । इस लिये प्रत्यक्ष हाता अर्थ की भी परीक्षा करनी चाहिये । परीक्षा करके वस्तुओं का स्वरूप निरूपण करने वाला व्यक्ति धर्म से कभी परिच्युत नहीं होता दृष्ट । इस प्रकार नारद स्मृति में प्रत्यक्ष दृष्ट वस्तु के प्रत्यक्ष पर भी विश्वास न कर अन्य प्रमाण, अर्थात् उपदेश प्रभृति से उसकी परीक्षा करने को कहा गया है । आकाश में प्रत्यक्ष प्रमाण से प्रतीत हो रहा नीलिमा का बाघ किसी दूसरे प्रत्यक्ष से नही हो सकता, जब तक कि आगम प्रमाण से यह ज्ञात न हो जाय कि शब्द के सिवाय आकाश में कोई अन्य गुण की सत्ता नहीं है । आकाश के समीप रहने पर उसमें नीलिमा की प्रतीति नहीं होती और दूर होने पर उसकी प्रतीति होती है । अव यह गलत प्रतीति दूरत्व प्रभृति दोषो के कारण होती है, ऐसा निश्चय होने पर उसका बाघ हो जायगा, इप कथन के विरोध में हम यह भी कह सकते हैं कि आकाश में दूर से नीलिमा दिखाई पडती है, वहीं नहीं है । इसके विपरीत पास में नीलिमा इसलिये नही दिखाई पडती कि बर्फ की चादर से वह छिप जाती है | अनुभव के बल से यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि आकाश को नीलिमा, उसका अव्याप्य वृत्ति ( सवत्र न रहने वाला ) गुण है, अत कहीं की उपलब्धि होती है और कहीं नही । दूर देश स्थित पुरुष को जिस भू प्रदेश से सनिहित आकाश में नालिमा की प्रनीति होती है, वहाँ जाने पर नीलिमा के अभाव को देखकर उसका बाघ प्रत्यक्ष प्रमाण से हो जायगा, यह कथन भी गलत है, क्योंकि वहा पर यह भी