वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 341–350
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 341–350
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वेदार्थपारिजात ३११ वाच्यम्, उपरिस्थितस्यैन नेत्यस्था नक्षत्रादेरिव दूरत्वदोषाद्भूमनिधानावभास इत्यस्याप्युपपत्ते । पृथिव्यादिसकीणतया प्रतीयमानाना गन्धादीनाम् ' उपलभ्याप्सु चेद् गन्ध केचिद ब्रूयुरनेपुणा । पृथिव्यामेव तद्विद्यादपो वायुश्च सश्रितम ॥ ' इत्यादिभिरागमैरेव व्यवस्थाया वक्तव्यत्वेन प्रत्यक्षादागमप्राबल्यस्य निर्विशङ्कत्वात् । सूतसहितायामपि - अतीन्द्रियार्थविज्ञाने मान न श्रुतिरेव हि । श्रुत्यगम्ये सूक्ष्मार्थे स तर्क किं करिष्यति || श्रुति सनातनी शभोरभिव्यक्ता न सशय । शकरेण प्रणीतेयमित्याहुरपरे जना । अभिव्यक्तिमपेक्ष्यैव प्रणीतेत्युच्यते शिव ॥ ' इति । वस्तुतो मानान्तराविषयत्वेन मानान्तरस्यागमबाध्यत्व न युक्तम्, किन्तु यत्र हि द्वयोर्मानियो प्रसक्त तत्र तयोर्बाध्यबाधकभाव । अत एव ' क्वचित्प्रत्यक्षत प्राप्तमनुमानागमबाधितम् ' इत्यपरीक्षितप्रामाण्यप्रत्यक्षविषयम् । स्वविषयशूराणि प्रमाणानि । एतद्धि मनुष्येषु सत्य निहित यच्चक्षुस्तस्मादाचक्षाणमाहुरद्रागिति । स यद्यदर्शमित्याह तस्मा एव श्रवति ' इत्यंतरेयके, ' द्वौ विवदमानावेवेयातामहमदर्श महमश्रीषमिति । य एव ब्रूयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्धधति ' इति च वाजसनेयके चक्षुरादीना बलवत्वमुक्तम्, तदपि परीक्षितप्रामाण्यकचक्षुरादीना मानान्तरादपरीक्षित-प्रामाण्यकाद बलवत्त्वमिति ज्ञातव्यम् । यदप्युक्तम् - प्रत्यक्षस्यासञ्जातविरोधित्वादुपक्रमन्यायेन प्राबल्यम् । यथा ' अग्नेॠग्वेदो वायोर्यजुर्वेद आदित्यात्सामवेदस्तस्मादित्युपक्रमस्य ऋग्वेदादिपदानुसारेण ' उच्चैर्ऋचा क्रियते, उपाशु यजुषा, उच्चे साम्नेति ' माना जा सकता है कि वास्तव में आकाश की नीलिमा भी मैच, नक्षत्र आदि की तरह ऊपर ही रहती हैं, किन्तु दूरस्व दोष के कारण वह पृथ्वी से लगी हुई सी प्रतीत होती है । पृथिवी प्रभृति पदार्थों में सकीणनया प्रतीयमान गन्धादि गुणों के विषय में --- ' जल में गन्ध की उपलब्धि होने पर कोई नाममश व्यक्ति यह समझे कि पृथिवी की तरह वह जन और वायु में भी रहता है ' इत्यादि प्रतिपादन द्वारा आगम हो स विषय को व्यवस्थित कर सकते है, अत प्रत्यक्ष से आगम प्रभाग की प्रबलता में कोई सन्देह अथवा शका नहीं रह जाती । सूतहिता मे भी प्रतिपादित किया गया है कि ' अतीन्द्रिय पदार्थों को जानने में एकमात्र श्रुति ( वेद ) ही प्रमाण है । सूक्ष्म पदार्थों का ज्ञान एकमात्र श्रुति के सहारे ही हो सकता | इसमें तर्क क्या सहायता कर सकता है? यह सनातन श्रुति शिव से आवसूत हुई है, इसमें कोई संदेह नहीं । इसका शकर ने प्रणयन किया ऐसा कुछ लोगो का कथन है | यहाँ पर शिव से जो शास्त्र का प्राकट्य हुआ को शिव ने प्रणीत किया, ऐसा कह दिया जाता है । ' वस्तु T. अन्य प्रमाण का विषय न होने से ही अन्य प्रमाणो का वेद शास्त्र से बाघ होता है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं, किन्तु कहना यह चाहिये कि जहाँ एक ही विषय में दो प्रमाणो का प्रसंग प्राप्त हैं, वही पर उनका बाध्यबाधक भाव भी माना जा सकता है । अत एव | ही कही प्रत्यक्ष में अनुमान और बागम के बाघ का पसग होता है, किन्तु यह बार भी प्रत्यक्ष के प्रमाण की परीक्षा न होने के कारण है । प्रत्येक प्रमाण अपने विषय में प्रबल होता है । ' मनुष्यो मे सत्य को प्रतिष्ठा चक्षु के रूप में होती है । इसी लिये बात को बचाई के लिये कहा जाता है कि इसने स्वयं देखा है । जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि मैंने स्वयं देखा है, तभी उसकी बात कास किया जाता है यह बात ऐतरेय ब्राह्मण में कही गई है । वाजसनेय ब्राह्मण में भी दो व्यक्ति विवाद करते हुए उपस्थित होते है कि मैंने इस चोज को देना है, मैंने इस चीज को सुना है । इनमें से जो व्यक्ति कहता है कि मैंने देखा है, उसी की बात को माना जाता है इस तरह से चक्षुरादि को बनवत्ता का प्रतिपादन किया गया है । यहाँ पर भी जिनका प्रामाण्य अन्य प्रमाणों से परीक्षित है, ऐसे ही चाक्षुष ज्ञान की उनसे ननवमा प्रतिपादित है, जिनका कि प्रामाण्य अन्य प्रमाणों से परीक्षित नहीं है । भी कहा गया है कि ' प्रत्यक्ष प्रमाण का विरोधी प्रमाण अभी उपस्थित नहीं हुआ है, अत उपक्रम न्याय से उसका प्राबल्य होगा | जैसे के ' अप्ति से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और आदित्य से सामवेद प्रकट हुए ' इस तरह से उपक्रम ( प्रारम्भिक ) वाक्य में feere de आदि के पदों के अनुसार संपूण ऋग्वेद में आये हुए पदों का उच्च स्वर से $ सम्पूर्ण यजुर्वेद में आये हुए पदों का चुपचाप
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११२ aateeftain faftaran स्था ft ऋगादिमन्त्रवचनान्यपि पदानि ऋग्वेदादिपराणि स्वीक्रियन्ते । यथा वा ' प्रजापतिर्वरुणायाश्व-मनयत् ' इत्युपक्रमानुरोधेन ' यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात् ' इत्यस्य प्रतिग्राहयेदित्यर्थं क्रियते । तदुक्तम् - ' असञ्जात-विरोधित्वादर्थवादी यथा श्रुत | आस्थेयस्तद्विरुद्धस्य विध्युद्देशस्य लक्षण ॥ ' इति, तन्न, तत्रैकवाक्यस्य परस्परसापेक्ष-पदत्वेनोभयो साम्ये सत्युपक्रमस्थ वेदपदानुरोधेनोपसहारस्थर्गादिपदाना मन्त्रमात्रवाचिना कृत्स्नवेदपरत्वे निर्णीतेऽपि प्रकृते उभयो साम्याभावेन तन्न्यायानवतारात् गृहीतप्रमाणभावश्रुत्यपेक्षया भ्रमविलक्षणत्वेना निश्चितस्य प्रत्यक्षस्य न्यूनबलत्वात । अन्यथा ' इद रजतम् ' इति भ्रमेऽपि ' इय शुक्ति ' इत्याप्तोपदेशापेक्षया प्राबल्य स्यात् । नापि लिङ्गाच्छते रिव शीघ्रमन्थरगामित्वेन प्रत्यक्षस्य प्राबल्यम् । तदुक्तम्- प्रत्यक्षे चानुमाने च यथा लोके बलाबलम् । शीघ्रमन्थर गामित्वात्तथैव श्रुतिलिङ्गयो । ' इति, परीक्षितस्य मन्थरगामिनोऽपि प्राबल्यात् । नच ' यदाहवनीये जुहोति ' इत्यस्मात् ' अश्वस्य पदे जुहोति ' इत्यस्य विशेषविषयत्वेन प्राबल्यवत् ' नेह नानास्ति किञ्चन ' इति द्वैतनिषेधक श्रुत्यपेक्षया घटादिसत्वग्राहिण प्रत्यक्षस्य प्राबल्य स्यादिति वाच्यम्, सामान्यविशेषन्यायस्य निश्चित प्रमाणाभावोभयविषयत्वात् । अन्यथाऽय गौरश्व इत्यस्यापि गोरश्वो न भवतीत्यादित प्राबल्य भवेत् । न चैव निरवकाशेन प्रत्यक्षेण वृत्यन्तरेणानेकार्थत्वेन वा विषयान्तरपरत्वेन सावकाशस्यागमस्य सकोच स्यादिति वाच्यम्, तात्पय्र्यलिङ्गेरुपक्रमादिभि प्रपञ्चनिषेधपरत्वेऽवधूते श्रुतेरपि निरवकाशत्वात् । प्रत्यक्षस्य व्यावहारिकद्वत-और सम्पूर्ण सामवेद मे आये पदो का उच्च स्वर से उच्चारण किया जाये ' इस विधि वाक्य में स्थित पदो का तात्पर्य ऋग्वेद आदि पदो में रहने से सम्पूर्ण ऋग्वेद आदि का प्रत्यायक होता है । अथवा ' प्रजापति वारुण अश्व को लाये यहाँ पर उपक्रम ( प्रारम्भ ) के अनुरोष से ' जितने अन्धो का ग्रहण करे इस वाक्य का अथ ' ग्रहण करावे ' यह किया जाता है । जैसा कि कहा गया है -- ' जब तक उसका विरोध नहीं पैदा होता, तब तक अर्थवाद वाक्य का अथ जैसे का तैसा मानना चाहिए और उसकी विराधी विधि के उद्देश्य के स्वरूप की कल्पना करनी चाहिए ' । यह पूरा कथन भी गलत है, क्योकि उक्त वेद वाक्यों में एक वाक्य में विद्यमान पदो की परस्पर सापेक्षता के करण साम्य रहने से उपक्रम वाक्य में स्थित वेद पद के अनुरोध से उपहार में विद्यमान ऋगादि मन्त्रवाची पदो की भी सपूर्ण वेदबोधकता निर्णीत होती है, किन्तु प्रकृत स्थल में उपक्रम - उपसंहार में समानता के न होने से उक्त न्याय की प्रवृत्ति नही होगा । जिसके प्रामाण्य को प्रतीति हो चुकी है, ऐसे श्रुतिवाक्य की अपेक्षा, जिसकी भ्रम ज्ञान से विलक्षणता अभी निश्चित नही हुई है, ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण का बल सदा न्यून ही रहेगा । अन्यथा ' यह रजत है ' यह भ्रमात्मक प्रत्यक्ष ज्ञान भी ' यह शुक्ति है ' इस आप्त वचन की अपेक्षा प्रबल हो जायगा । शीघ्रगामी श्रुति ( दूसरे की सहायता के बिना स्वत उसी तरह से शीघ्रगामी प्रत्यक्ष मन्थर गति वाले प्रत्यक्ष और अनुमान के कारण का विचार उनकी प्रवृत्त शब्द आदि प्रमाण ) मन्थर गति वाले लिंग अनुमानादि की अपेक्षा प्रबल होगा । जैसा कि शीघ्र और मन्थर गति के आधार पर होता है, भी गलत है, क्योंकि जिसका प्रामाण्य परीक्षित है, प्रमाण से जैसे प्रबल होती है, कहा गया है- ' जैसे लोक मे उसी तरह से श्रुति और लिंग के विषय में भी जानना चाहिए । किन्तु यह कथन ऐसे प्रमाण की गति मन्थर होने पर भी प्रबलता मानी हो जाती है । पुन प्रश्न होता है कि ' जैसे बाहवनीय अग्नि में हवन करता है ' इस वाक्य की अपेक्षा ' अश्व के पद ( स्थान घुडसाल ) में हवन करता है इस विशेषविषयक वाक्य का प्राबल्य है, उसी तरह से ' यहाँ पर अनेकता की कुछ भी स्थिति नहीं है इस देव का निषेध करने वाली श्रुति की अपेक्षा घटादि की सत्ता को ग्रहण करने वाला प्रत्यक्ष अधिक प्रबल माना जायगा | किन्तु यह कथन भी गलत है, क्योकि सामान्य विशेष न्याय की प्रवृत्ति वही होती है, जहाँ पर कि उभय वस्तुओ का प्रामाण्य समान रूप से निश्चित हो । अन्यथा यह ' गाय घोडा है ' इस ज्ञान का ' गाय घोड़ा नहीं हो सकती ' इस यथाथ ज्ञान से प्राबल्य मानना पड जायगा । इस तरह के निरवकाश प्रत्यक्ष प्रमाण से अथवा अनेकार्थक वृत्यन्तर से विषयान्तर की बोधकता के आधार पर सावकाश आगम को संकोच मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि उपक्रम प्रभुति तात्पर्यबोधक लिङ्गों के आधार पर श्रुति की अपच निषेधपरकता के निश्चित हो जाने पर श्रुति निरवकाश सिद्ध हो जायगी, क्योंकि प्रत्यक्ष व्यावहारिक द्वैतविषयक होने के कारण सावकाश ही है ।
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वेदार्थपारिजातः ३१३ विषयतया सावकाशत्वात् । किञ्च यथा ' अह मनुष्य ' इति प्रत्यक्षस्य, ' आकाशवत् सर्वगतश्च नित्य ' इति श्रुतेश्च तात्त्विकप्रामाण्यानुपपत्त्या कस्यचिद्वयावहारिक कस्यचित्तात्त्विक प्रामाण्यमभ्युपेयम्, अत्यन्ताप्रामाण्यस्यान्याय्यत्वात् । तत्राद्वैतश्रुते व्यविहारिकप्रामाण्यासभवेन तात्त्विक प्रामाण्य प्रत्यक्षादेस्तु व्यावहारिक प्रामाण्यमुपेयम् । अत एवारम्भणशब्दादिभ्य प्रत्यक्षादिविषयस्य प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वावबोधेन नाद्वैतश्रुते प्रत्यक्षादि-विरोध । न च घट सन्निति प्रत्यक्षविरोधान्न श्रुतियुक्तिभि प्रपञ्च मिथ्यात्वबोध सभवतीति वाच्यम्, अधिष्ठानवें घटाद्यनुगतस्य सन्मात्रस्यैव ग्राह्यत्वे प्रत्यक्षस्य श्रुत्यनुगुणत्वात् । न चैव सत् सदित्येव प्रत्यक्ष स्यात्, न तु घट सत्रित्येव प्रत्यक्षमिन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधायीति वाच्यम्, भ्रमेष्वधिष्ठानाशरूपस्येदमशस्येव प्रत्यक्षेण सद्रूपस्यैव ग्रहणेनेन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोरपि तत्रैवोपक्षीणतया रजतादिप्रतीतिवद् घटादिप्रतीतेर्भ्रान्तिरूपत्वाभ्युपगमात् । न च तद्वदिह बाधाभावात्तथाभ्युपगमो निर्मूल इति वाच्यम्, बाधादर्शनेऽपि देशकालव्यवहितवस्तुवद्घटादिभेददस्तुन. प्रतिभासायोग्यत्वस्यव तत्र मूलत्वात् । तथाहि-- इन्द्रियव्यापारानन्तर घटादि सवतो व्यावृत्तत्वेनैव प्रतीयते, तत्र घटादिभेदे सशय विपर्य्ययादर्शनात् । यत्रापि स्थाण्वादी पुरुषत्वादिसशयस्तत्रापि तद्व्यतिरिक्तेभ्यो भेदाऽसदिग्ध विपर्यस्त-स्वात् प्रकाशत एव । भेदस्य च प्रतियोगिसहोपलम्भनियमवतो न प्रत्यक्षेण ग्रहण सभवति, देशकालव्यवधानेना-सन्निकृष्टानामपि प्रतियोगिना सभवात् । भेदज्ञान प्रतियोग्य सस्कारापेक्षणात् स्मृतिरूपमस्तु, प्रत्यभिज्ञानमिव तत्ताश इति चेन्न तत्रापि अपि समान सर्वव्यापी और नित्य है ' इस श्रुति का दोनो का तास्विक च, ' मैं मनुष्य हूँ ' इस प्रत्यक्ष ज्ञान का और ' मारमा आकाश के प्रामाण्य नही माना जा सकता, फलत किसी का व्यावहारिक और किसी का तात्विक प्रामाण्य मानना ही पडेगा, इनमें से किसी को एकदम अप्रमाण मान लेना गलत होगा । यहाँ पर अद्वैत श्रुति का व्यावहारिक प्रामाण्य समय नहीं, अतः उसका तात्विक प्रामाण्य और प्रत्यक्षादि प्रमाण का व्यावहारिक प्रामाण्य माना जाना चाहिये । इसीलिये वेदान्तसूत्र में श्रुति प्रतिपादित आरम्भण प्रभृति शब्दो से प्रत्यक्षादि प्रमाणो से प्रतीत हो रहे जगत् के मिथ्यात्व का बोध करा देने से अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियो का प्रत्यक्षादि प्रमाणो से किसी तरह का विरोध नहीं होता । आप यह नहीं E and for ' re fr द्यमान है ' इस तरह की प्रत्यक्ष प्रतीति से विरुद्ध होने से श्रुति और युक्तियों से प्रपच का मिथ्यात्व नही सिद्ध किया जा सकता, क्योकि अधिष्ठान ब्रह्म में विद्यमान सत्ता ही घटादि में भी अनुगत रहती है, अत प्रत्यक्ष यहाँ पर श्रुति प्रतिपादित अर्थ का ही प्रतिपादन करता है । प्रश्न उठता है कि तब तो केवल ' सत् सत् ' इस तरह की प्रतीति होनी चाहिये, ' घट सत् है इस तरह की नहीं, जिसका कि इन्द्रिया के साथ अन्वय और व्यतिरेक विद्यमान है? इसका उत्तर ह है कि भ्रम स्थल में जैसे अधिष्ठान के एक अश के हृदमात्मक रूप को ही प्रतीति होती है, उसी तरह से प्रत्यक्ष से भी अधिष्ठान के सद्रूप की ही sita होती है । इस प्रकार वहां पर प्रतीयमान अन्वय व्यतिरेक का व्यापार भी सद्रूप के ग्रहण में ही उपक्षीण हो जाता है, तो भी उक्त क्रम स्थल में रजतादि प्रतीति की तरह यहाँ पर घटादि प्रीति भी भ्रान्त ही मानी जाती है । पुन प्रश्न होता है कि रजत. प्रतीति का तो बाद में बाघ देखा जाता है, उस तरह का बाघ घटादि स्थल में कहाँ है? उसके अभाव में घटादि प्रतीति की भ्रमात्मक मानना निराधार है । इसका उत्तर यह है कि बाघ प्रतीति न होने पर भी इसका मूल कारण यह है कि देश, काल प्रभूति से व्यवह वस्तु की तरह घटादि भेद वस्तु का प्रतिभास भी नहीं स्वीकार किया जाता । जैसे कि इन्द्रियो के व्यापार के बाद घटादि की प्रतीति अन्य पदार्थो की प्रतीति से विलक्षण ही होती है । अन्य पदार्थों से घटादि की मिलता में कोई संदेह या विपरीत ज्ञान नहीं होता । जहां पर स्थाणु प्रभृति में पुरुष प्रभृति पदार्थों का समय होता है, वहीं पर भी उनसे free पदार्थों से उसके भेद की प्रतीति में कोई संदेह या विपर्यय नहीं उठता । मेद की प्रतीति सदा प्रतियोगी की प्रतीति के साथ ही होती है, इस नियम के अनुसार उसकी प्रतीति प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं होती, क्योकि देश, काल यादि के व्यवधान के कारण असनिकृष्ट प्रतियोगी की भी सत्ता हो सकती हैं । प्रश्न उठता है कि ' भेद ज्ञान प्रतियोगीरूप अश की प्रतीति में सस्कार की अपेक्षा रखता है, अतः इसको स्मृति रूप मान लिया जाय, जैसे कि प्रत्यभिज्ञान ( यह वही है, ऐसा ज्ञान ) में तत्तांश को स्मृतिरूप ही माना जाता है । उत्तर है कि ऐसा होने पर va
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३१४ भेदगत प्रतियोगिवैशिष्ट पाशे तदभावात् । न चानुमित्याऽपि तत्मभव, भेदज्ञान विनाऽनुमित्यस भवेनान्योन्याश्रयापत्ते । अस्तु तर्हि भेदाश इव प्रतियोगिवैशिष्ट्याशेऽपि प्रत्यक्षत्वमिति चेन्न प्रतियोगिनोऽप्रत्यक्षत्वं तद्वैशिष्ट्य प्रत्यक्षायोगात् । सम्वन्धि प्रत्यक्ष विना सबन्धप्रत्यक्षासभवात् । तस्मात प्रत्यक्षायोग्यस्य प्रतियोगितो श्रान्तिरूप एव प्रतिभास इति तदेकवृत्तिवेद्यत्वनियतस्य भेदस्य तद्विशिष्टस्य घटादेश्च श्रमं कविषयत्वात् प्रत्यक्ष निर्विशेषब्रह्मसिद्यनुकूलमेव । घटादेरेन्द्रियकत्वेऽपि सन घट इत्यधिष्ठान सत्तानुवेध इति न विरोध । न च तहि नीलो घट इत्यप्य-धिष्ठाननेल्यानुवेधोऽस्त्विति वाच्यम्, श्रुत्या सद्रूपस्य ब्रह्मणो जगदुपादानत्वमुक्तमिति तदनुवेधेन घट सन्निति प्रतीत्यु -पपत्ती तद्भिनघटादिसत्ताकल्पने गौरवात, तस्य च रूपादिहीनत्वेन नेल्यादिक घटादावेव कल्प्यत इति वैषम्यात् । केषाञ्चिन्मतरीत्या तु प्रत्यक्षस्य घटादिसत्वग्राहित्वेऽपि पराग्विषयस्य प्रत्यक्षादेस्तत्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्याभावेन तस्याद्वैतश्रुतेरबाधकत्वात । अनधिगतगन्तृत्व हि प्रमाणाना प्रामाण्यम् । न च घटादेरज्ञातत्वम, जडे आवरणकृत्या-भावेनाज्ञानविषयत्वास भवात् । Farare ब्रह्म ज्ञानविषय, तत्रावरणमन्तरा नास्ति न भातीत्यावरणानुपपत्ते । तत्रैवाज्ञानविषयत्व तत्त्वावेदकत्वलक्षण श्रुते प्रामाण्यच । श्रुतिरपि तस्यैव द्रष्टव्यत्व वक्ति- ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्य ' इति । नात्र दर्शन विहितम्, प्रमाणपरतन्त्रस्य विध्यगोचरत्वात् । किन्तु दर्शनार्ह आत्मा इस्वार्थ । तस्यैवाज्ञात-त्वात् प्रमेयत्व नान्यस्येति नियम्यते । भी भेद ज्ञान के प्रतियोगी के विशिष्टा की प्रतीति में स्मृति नही मानी जा सकती । अनुमिति से भी इसका ज्ञान नही हो सकता, क्योकि भेदज्ञान के बिना अनुमिति नही हो सकती, अत अनुमिति से भेद ज्ञान की प्रतीति मानने पर अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होगा । अच्छा तब भेदाश की तरह प्रतियागी विशिष्ट अश को प्रीति को भी प्रत्यक्ष ही क्यो न मान लिया जाय? इसका उत्तर है कि प्रतियोगी hot as प्रत्यक्ष नही होगा तो प्रतियोगी के विशिष्ट अश का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है? जब तक दोनो सबन्धियो की प्रतीति नहीं होगी, तब तक उन दोनो में विद्यमान सबन्ध की प्रतीति कैसे हो सकती है? इसलिये प्रतियोगी के प्रत्यक्ष के अयोग्य रहने से उसका प्रतीयमान प्रतिभास भ्रान्ति रूप ही माना जायगा, अत केवल प्रतियोगी में रहने पर ही जिसका बोध हो सकता है, ऐसे भेद की और उस भेद से fav ष्ट घटादि की प्रतीति भ्रमात्मक ही मानी जा सकती है । इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाण भी निर्विशेष ब्रह्म की सिद्धि में ही after अनुकूल हैं । aerfar पदार्थों का ज्ञान यद्यपि इन्द्रियों से ही होता है, तो भी $ ' सन् घट ' इस प्रतीति मे अधिष्ठान ब्रह्म की ही सत्ता अनुकूल है । इस तरह से यहाँ पर कोई विरोध नहीं है । शका की जाती है कि तब तो इसी तरह से ' नीलो घट ' इरु प्रतीति में भी after स्थित नीलवर्ण की अनुस्यूतता माननी पडेगी । इसका उत्तर यह है कि श्रुति के द्वारा सद्रूप ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण माना गया है, अतः ब्रह्मगत सद्रूपता की अनुवृत्ति होने से ही ' घट सन् ' इस ज्ञान की उपपत्ति हो जाने पर उस ब्रह्म से भिन नई घटादि की सत्ता की कल्पना करने में केवल गौरव ही होगा । इससे भिन्न नील वर्ण की कल्पना तो केवल घटादि में हो की जा सकती है, क्योकि ब्रह्म तो रूपादि गुणो से रहित है । किन्ही के मत से प्रत्यक्ष प्रमाण के बटादि की सत्ता के ग्राहक होने पर भी art वस्तुओं का ग्राहक होने से तात्विक पदार्थों को ग्रहण करने की सामर्थ्य के अभाव में यह अद्वैत श्रुति का area fear भी प्रकार से नही हो सकता । प्रमाणो का प्रामाण्य यही है कि वे अनधिगत ( अज्ञात ) वस्तु का ज्ञान कराते हैं । घटादि पदार्थ अज्ञात नही है । जड पदाथ में आवरण का कृत्य न होने से वे अज्ञान के विषय नहीं हो सकते । स्वय प्रकाश ब्रह्म ही ज्ञान का विषय है । इसमें क्षावरण माने बिना ' नही है, नही प्रतीत होता है ' इस तरह की आवरण की प्रतीति नहीं हो सकती । यही पर श्रुति को अज्ञात-ज्ञापकता के आधार पर तात्त्विक पदार्थ का ज्ञान होने से प्रामाण्य माना जाता है । श्रुति भी ' आत्मा वा भरे ' इत्यादि वाक्यों से उस ब्रह्म की द्रष्टव्यता का प्रतिपादन करती है । यहाँ पर ब्रह्मदर्शन की विधि नहीं है, क्योकि प्रमाणपरतन्त्र वस्तु विधि का विषय नही होती । किन्तु वक्त श्रुति से यही ज्ञात होता है कि यह आत्मा दर्शन के योग्य है । वही अज्ञात होने से प्रमेय है, अन्य नही । suter ] नियमन उक्त वाक्य का मुख्य प्रयोजन है ।
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date पारिजात ३१५ कैश्चित्तु घटादिसत्त्वग्राहिण प्रत्यक्षस्य प्रामाण्ये ब्रह्मप्रमाणतुल्यत्वावगमेऽपि तद्ग्राह्य सत्त्व सत्ता जाति-रूप वा? इहेदानी घट इति प्रतीतेस्तत्तद्देशकाल सम्बन्धरूप वा । तच्च मिथ्यात्वेन न विरुद्धयते । मिथ्यात्ववादिनाऽपि घटादे स्वरूप देशकालसम्बन्धो जात्यादिकञ्च नापलप्यते, तेषामबाध्यत्वात् । न चाबाध्यत्वेन प्रत्यक्षग्राह्यस्य सत्यत्वमेवास्तु, तथात्वेऽपि प्रत्यक्षेण त्रिकालाबाध्यत्वासिद्धे । कैश्चित्तु राजराजादिशब्दवत ' सत्यस्य सत्यम् ' इति श्रुत्या सर्वथाऽबाध्यत्व किञ्चित् कालमबाध्यत्व-मिति रीत्या सत्यत्वे तारतम्यमुपेयते । ततश्च प्रत्यक्षग्राह्य घटादिसत्यत्व यावद् ब्रह्मज्ञानमवाध्यत्वेनेति न द्वैतमिथ्यात्व -श्रुतिविरोध | कश्चित्तु श्रुतिप्रत्यक्षयो प्रपञ्चसत्यत्वमिथ्यात्वग्राहिणोविरोधेऽपि दोषशङ्काकलङ्कितात् प्रथमप्रवृत्तात् प्रत्यक्षान्निर्दोषत्वादपच्छेदन्यायेन परत्वाच्च श्रुते प्राबल्यमुच्यते । नन्वागमस्य प्रत्यक्षाद् बलीयस्त्वे ' यजमान प्रस्तर ' इत्यादी प्रत्यक्षाविरोधाय कुतो गौणी वृत्तिरास्थीयत इति चेन्न तात्पर्यवत्या श्रुतेरेव प्रत्यक्षाद् वलवत्त्वाभ्युपगमात, मन्त्रार्थवादानाञ्च स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे वाक्यार्थद्वारभूते पदार्थ इव तात्पर्य्याभावात् । परमतात्पर्य्याभावेऽप्यवान्त रतापय्र्थ्य व स्वेनैव प्रमाणान्तराविरुद्ध देवताविग्रहादिक तेभ्य कुछ लोगो के मत के अनुसार घटादि की सत्ता के ग्राहक प्रत्यक्ष का प्रामाण्य ब्रह्म के ग्राहक श्रुति के तुल्य ही हैं । इससे गृहीत होने वाला सत्त्व सत्ता जाति के रूप में हो या ' इस समय यहीं पर घट है ' इस तरह से देश काल के सम्बन्ध के रूप से हो, किन्तु उसका मिथ्यात्व से कोई विराध नही पडता, क्योकि मिथ्यात्ववादी भी घटादि के स्वरूप, उसके देश काल से सबन्ध ओर उसमें रहने वाली जाति प्रभुति का अपलाप ( निषेध ) नही करता, क्योकि उनका बाघ नही होता । जब इनका बाघ नही होता तो ग्राहक वस्तु की भी सत्यता ही क्यो न मानी जाय? यह इसलिए नहीं मानी जाती कि ऐसा मानन पर प्रत्यक्ष प्रमाण से वस्तु की तोनो कालो में अबाध्यता की सिद्धि नहीं होती । कुछ लोग ' राजराज ' ( राजाओ का राजा ) आदि शब्दों की तरह ' सत्य का सत्य ' इस श्रुति के आधार पर ' सर्वथा अबाध्य ' तथा ' किंचित् काल के लिए अबाष्य ' इस तरह से वस्तु की सत्यता में भी तारतम्य मानते है । अर्थात् ब्रह्म सवदा अबाध्य है और घटादि कुछ काल तक अबाध्य है । इस मत के अनुसार भी प्रत्यक्ष प्रमाण से गृहीत ( ज्ञात ) हो रही घटादि की सत्यता ब्रह्म-ज्ञान होने तक बाषित नहीं होती, इस तरह से द्वैत को मिथ्या कहने वाली श्रुति से इसका कोई विरोध नहीं होगा । अन्य विद्वानो का कहना है कि श्रुति और प्रत्यक्ष से क्रमश यद्यपि प्रपच के मिध्यात्व और सत्यता का ज्ञान होता है और इस तरह से इन दोनो में परस्पर विरोध भी है, तो भी प्रथम प्रवृत्त होने पर भी दोष की शका से ग्रस्त प्रत्यक्ष प्रमाण की अपेक्षा निर्दोष होने से श्रुति का ही प्राबल्य अपच्छेद न्याय से सिद्ध होता है । tant उती है कि यदि आगम प्रत्यक्ष से बलवान् है तो फिर ' यजमान प्रस्तर ' इत्यादि स्थानों में प्रत्यक्ष से अवरोध की स्थापना के लिए गौणी वृत्ति का सहारा क्यो लिया जाता है? इसका उत्तर यह है कि तात्पर्यवती श्रुति हा प्रत्यक्ष से बलवती मानी जाती है । मन्त्रो और अर्थवाद वाक्यों का तात्पय स्तुतिद्वारभूत अथ में नहीं होता, जैसा कि वाक्याथद्वारभूत मे पद का तात्पर्य नही होता | इसका अभिप्राय यह है कि वाक्यार्थ का ज्ञान पदार्थ के ज्ञान के द्वारा होता है, किन्तु पदार्थ के ज्ञान में वाक्य का ar त्पर्य नही होता, क्योंकि पदार्थ में भी वाक्य का तात्पय मानने पर ' घडा नही है ' इस वाक्य का तात्पय घडे में भी मानना पड़ेगा | पर इस वाक्य का तात्पर्य घ के नही होने में हो माना जाता है, घड़े मे नही । इसी तरह से वेद में आये हुए मन्त्रो और अर्थवादो का तात्पर्य केवल विधि या निषेध की स्तुति अथवा निन्दा में ही माना जाता है, न कि मन्त्र और अर्थवाद मे आये हुए यजमान, Here आदि पदार्थों में, जिनके द्वारा कि स्तुति और निन्दा का ज्ञान होता है । परम तात्पर्य के न होने पर भी अवान्तर areer होने से दूसरे प्रमाणो से अविरुद्ध देवताओ के शरीर आदि की सिद्धि उन मन्नो और अथवादो से होती है । जिन वाक्यों का. तात्पर्य स्वार्थ में नहीं, ऐसे आगम वाक्यों में तो प्रत्यक्ष हो प्रबल होता है, अत उस प्रत्यक्ष प्रमाण से अविशेष का निवारण करने
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३१६ वेदार्थपारिजात सिद्धयत्येव । अतत्परेभ्यस्त्वागमवाक्येभ्य प्रत्यक्षस्यैव प्राबल्यमिति तदविशेवाय गौणी वृत्तिराश्रीयते । अद्वैतश्रुतिस्तूप-* मादिभिस्तात्पर्य्यवतीति प्राबल्यमेव तस्या | veg निर्दोषत्वात परत्वाच्च श्रुतिमात्रस्यैव प्रत्यक्षात् प्राबल्यमित्युत्सग । श्रुतिवाधितस्यापि प्रत्यक्षस्य निर्विषयत्वायोगात् तत्त्वावेदनात् प्रच्याव्यार्थ क्रियासमर्थ व्यावहारिकविषयसमर्पणेन समर्थन सभवति । अत एव नेद रजतमिति बाधितमपि शुक्तिरजतप्रत्यक्ष पुरो देशेऽनिर्वचनोयरजताभ्युपगमेन समर्थ्यते । श्रत एव यजमान - प्रस्तर-भेदग्राहिण प्रत्यक्षस्य प्रातिभासिक विषयत्वाभ्युपगमेनोपपादनायोगात् ' यजमान प्रस्तर ' इति श्रतिबाध्यत्वे सर्वथा निर्विषयत्वस्यादिति तत्परिहारायोत्सर्गमपोद्य श्रुतावेव गौणी वृत्तिराश्रीयते । अद्वैतश्रुतिप्रत्यक्षयोस्तु तात्त्विकव्यावहारिकविषयोपगमेनोपपादन सभवति । न तथेहसभव, ब्रह्मातिरिक्तस्य सकलप्रपञ्चस्य मिध्यात्वेन तात्त्विकत्वासभवात् । एवमल्पज्ञत्वादिविशिष्टत्व पदार्थस्य सर्वज्ञत्वाभोक्तृत्वविशिष्टब्रह्मा-भेदबोधनेऽसर्वज्ञत्व भोक्तृत्वादिप्रत्यक्ष निरालम्बन स्यादिति तत्परिहाराय भागत्यागलक्षणयाऽहङ्कारशबलितस्याल्पज्ञत्व-भोक्तृत्वादि परित्यज्य तन्निष्कृष्टस्य शुद्धस्योदासीनब्रह्मरूपत्व बोध्यते । ' कृष्णल ' श्रपयेत् ' इत्यादावपि प्रत्यक्षस्य निर्विषयत्वपरिहारायोष्णीकरणे लक्षणा । अथवा ' कृष्णल श्रपयेत् ' इत्यत्र न प्रत्यक्षानुरोधेन लक्षणा, किन्त्वनुष्ठाना-शक्तधा, रूपरसविपरिवृत्तिलक्षणस्य मुख्यत्रपणस्य कर्तुमशक्यत्वात् । एवमेव सोमकरणकयाग इव तदभिन्नो यागो नानुष्ठातु शक्यत इति ' सोमेन यजेत ' इत्यत्रापि सोमवता यागेनेति मत्वर्थलक्षणा । न चानुष्ठेयत्वाभिमतस्य प्रत्यक्षा-के लिए श्रुति वाक्य में गोणी वृत्ति का सहारा लिया जाता है, अर्थात् गौण अर्थ किए जाते है | अद्वैत श्रुति का उपक्रम प्रभृति लिङ्गो से स्वार्थ में वात्पयज्ञात हैं, अथ वह प्रत्यक्ष आदि अन्य सब प्रमाणो की अपेक्षा प्रबल है । कुछ विचारको के मत से निर्दोष होने के कारण और बाद में प्रवृत्त होने से भी केवल श्रुति वाक्य का ही प्रत्यक्ष से प्राबल्य माना जाता है, यह सामान्य नियम है, किन्तु श्रुति से वाषित प्रत्यक्ष भी निर्विषय नही हो सकता, अत उसको तत्वावेदक प्रमाण की कोटि से नीचे उतार कर अर्थक्रियासमर्थ व्यावहारिक विषय का प्रत्यायक मानकर उसके प्रामाण्य का भी समर्थन किया जा सकता है । इसीलिए यह रजत नही है, इस ज्ञान से बाधित होने वाले शुक्तिरजत के प्रत्यक्ष स्थल मे सामने दिखाई पड़ रहे प्रदेश में afreeity रजत की सत्ता मानकर उसका समर्थन किया जाता है । इसीलिए यजमान और प्रस्नर का भेद देखने वाले प्रत्यक्ष को प्रातिभासिक विषय का ग्राहक मानने पर उसकी उपपत्ति नही बन सकती और ' यजमान प्रस्तर इस श्रुति से उसका बान मान लेने पर वह सर्वदा निर्विषय हो जायगा । इसलिए उसकी निर्विषयता के परिहार के लिए उक्त सामान्य नियम को न मानकर श्रुति में ही गोणी वृत्ति का सहारा लिया जाता है । age श्रुति और प्रत्यक्ष प्रमाण की तात्त्विक और व्यावहारिक विषय की प्रतिपादकता के आधार पर दोनो का प्रामाण्य सिद्ध किया जा सकता है । यजमान प्रस्तर स्थल में यह सभव नहीं हो सकता, क्योकि ब्रह्म से अतिरिक्त सकल प्रपन्च के मिथ्यात्व के कारण इसकी भी तात्विकता का प्रतिपादन नही किया जा सकता । इसी तरह से अल्पज्ञत्वपदार्थ ( जीव ) का सर्वज्ञ arter ब्रह्म के साथ अभेद मानने पर असवज, भोक्ता आदि का ज्ञान कराने वाला प्रत्यक्ष निराधार हो जायगा, अतः इस दोष के परिहार के लिये भागत्यागलक्षणा से अहकार से सराबोर जीव की अल्पज्ञता, भोक्ता को छोडकर उसके वास्तविक शुद्ध स्वरूप में उदासीन ब्रह्मरूपता का बोध होता है । ' कृष्णन श्रपयेत् ' ( सोने के चावलों को पकावे ) जैसे श्रुति वाक्यों में भी प्रत्यक्ष की निर्विषयता का परिहार करने के लिये अपण की तपाने में लक्षणा की जाती है, क्योंकि सोने के चावलों को पकाया तो नहीं जा सकता, गरम किया जा सकता है । अथवा उक्त वाक्य में प्रत्यक्ष के अनुरोध पर लक्षणा न कर अधिष्ठान की अशक्ति के कारण यह की जाती है, क्योकि मुख्य अपण में तो रूप - रस का परिवर्तन होता है, वह कृष्णल में सभव नहीं है, अस अप ( पकाना ) को पाने में लक्षणा उचित है । इसी तरह से सोमरूप मोषधी या नता यज्ञ का साधन तो हो सकती है, किन्तु वह स्वयं यहाँ स्वरूप धाकर कर अनुष्ठान में वो नही जा सकती । इसलिये ' सोमेत यजेत ' इस वाक्य में सोमपद को सोमवान् में लक्षणा की जाती है । यदि कहें कि अनुष्ठेयत्वेन
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३१७ विरोध एवानुष्ठानाशक्तिरिति शब्दान्तरेण व्यवहियत इति वाच्यम्, शशिमण्डल कान्तिमत् कुर्यादिति प्रत्यक्षाविरोधे-ऽप्यनुष्ठानाशक्तिदर्शनेन तस्यास्ततो भिन्नत्वात् । न च स्वरूपेण निषेधे कथ प्रपञ्चस्यात्मलाभ? निषेधस्य प्रतियोग्य प्रतिक्षेपरूपत्वे व्याघातादिति वाच्यम, शुक्तापीद रजतम् नेद रजतमिति प्रतीतिद्वयानुरोधेनाधिष्ठानगताध्यस्ताभावस्य बाघपर्यन्तानुवृत्तिकासद्विलक्षण प्रतियोगिस्वरूप सहिष्णुत्वाभ्युपगमात् । एतेन प्रपश्वस्य स्वरूपण निषेधे शशशृङ्गसमत्वमेवेत्यपि निरस्तम्, ब्रह्मज्ञान-निवर्त्यरवरूपाङ्गीकारेण वैषम्यात् । न चाध्यस्तस्याधिष्ठाने स्वरूपेण निषेधेऽन्यत्र तस्य स्वरूपेण निषेध वत सिद्ध इति तस्य सर्वदेशकालसम्बन्धनिषेधप्रतियोगित्वापत्त्याऽसत्त्व दुर्वारम्, तदेव च शशशृङ्गसाधारणमसत्त्वमिति वाच्यम्, असत सवदेशकालनिषेधप्रतियोगित्वमुपगच्छतस्तस्य तथात्वे प्रत्यक्षस्य सर्वदेशकालयो प्रत्यक्षीकरणायोगेन आगम स्यापि तादृशस्यानुपलम्भेन प्रमाणयितुमशक्यत्वात् । तत्रानुमान प्रमाणयितव्यम् । तत्र च सद्व्यावृत्त लिङ्ग वाच्यम्, तथा च प्रथमप्रतीतस्य तस्यवासत्त्वनिर्वचनोपपत्ते । अन्यैस्तु ' नेह नानास्ति किचन ' इति श्रुते सत्यत्वेन प्रपश्वनिषेधे एव तात्पर्य्यं न स्वरूपेण, निषेधस्य स्वरूपाप्रतिक्षेपकत्वे तस्य तनिषेघायोगात्, तत्प्रतिक्षेपकत्वे प्रत्यक्षविरोधात् । न च सत्यत्वस्यापि सन् घट इत्यादिप्रत्यक्षसिद्धत्वात तेनापि रूपेण निषेधो युक्त इति वाच्यम्, प्रत्यक्षस्य श्रुत्यविरोधाय सत्यत्वाभासरूप-व्यावहारिक सत्यत्वविषयत्वोपपत्ते । न च पारमार्थिक सत्यत्वस्य ब्रह्मगतस्य प्रपञ्चे प्रसक्त्यभावेन प्रपञ्च निषेधानुपपत्ति, ऐसा नही कहा जा सकता, क्योंकि अभिमत का प्रत्यक्ष विरोध ही ' अनुष्ठान की अशक्ति ' इस शब्दान्तर से कहा जाता है । किन्तु जाती है, ' शशिमण्डल को कान्तिमान् बनावे ' इस वाक्य का प्रत्यक्ष से विरोध न होने पर भी वहाँ पर अनुष्ठान की अशक्ति देखी अत अनुष्ठान की अशक्ति और प्रत्यक्ष विरोध ये दोनो वस्तुए परस्पर भिन्न ही है । स्वरूप पश्च का निषेध हो जाने पर प्रपत्र का स्वरूप हो कैसे बनेगा? क्योंकि निषेध यदि प्रतियोगी का निषेध इसका उत्तर यह है कि शुक्ति में यह रजन है, यह रजत नही है, इन दोनो प्रतीतियो न करें तो उसका स्वरूप ही व्याहत हो जायगा । रजत आदि के अभाव को बाघ पयन्त अनुवृत्ति मानी जाती है, जो कि असत् के अनुरोध से अधिष्ठान शुक्ति आदि म अध्यस्त पर उसकी से विलक्षण प्रतियोगी के स्वरूप को सहन करने वाली होती है । इस तरह से ' प्रपत्र का स्वरूप से में निषेध और प्रपत्र मानने के निषेध में शशशृग से समानता हो जायगी ' इस आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, क्योकि शशश्टग । प्रश्न है कि अन्तर यह है कि प्रपच के स्वरूप की निवृत्ति ब्रह्मज्ञान से होती है, जब कि शशशृग का कोई स्वरूप ही नहीं स्वत होता निवृत्त हो गई, जब अध्यस्त जगत् की अपने अधिष्ठान ( ब्रह्म ) में ही स्वरूपत ' सत्ता नही है, तब अन्यत्र उसकी निवारण स्वरूप कैसे से स्थिति किया जा सकता है? और इसलिये सभी देशो और कालों से उसके सबन्ध के निषिद्ध हो जाने से उसकी असत्ता का जो व्यक्ति असत्ता को समस्त देश - काल निपेध यह असत्ता शशग की असत्ता के सदृश हो तो हैं? इस प्रश्न का समाधान यह है कि के पदार्थों को प्रत्यक्ष कराने वाला की प्रतियोगिनी मानता है, उसके मत को यदि मान लिया जाय तो प्रत्यक्ष तो समस्त देश काल ही इस बात कोई मिलता नहीं और वैसा कोई शास्त्रवचन भी नहीं मिलता, अत इन दोनो प्रमाणो के न होने से तरह अनुमान से प्रथम के द्वारा प्रतीत लिंग की को प्रमाणित करना होगा । इस अनुमान में दो आवृत्ति वाले हेतु को प्रदर्शित करना पडेगा । इस सत्ता को उपपति बन सकेगी । ही है, उसके स्वरूप अन्य विचारकों के अनुसार ' नेह नानास्ति ' इस श्रुति का तात्पर्यं प्रपंच की सत्यता के निषेध मिषेधक में नहीं हो सकता । का भी free यहाँ नही किया गया है । स्वरूप का निषेध स्वरूप की प्रतिक्षेपकता के अभाव तब में तो उसका सत्यत्व की सिद्धि भी ' सन घट. ' यदि उसको स्वरूप का प्रतिक्षेपक माना जाय तो प्रत्यक्ष से विरोध होगा । प्रश्न होता है कि यह है प्रत्यक्ष का श्रुति से अविरोध इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण से होती है, उसका भी स्वरूपेण प्रतिषेध ठीक नही है, तो इसका ही उत्तर पडेगा । ब्रह्मगत पारमार्थिक सत्यता की सिद्ध करने के लिये सत्यत्वाभास रूप व्यावहारिक सत्यता को प्रत्यक्ष का विषय मानना
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३१८ वेदार्थपारिजात यथा हि शुक्तौ रजताभासप्रतीतिरेव सत्यरजतप्रपक्तिरिति तन्निषेध । अत एव नेद रजत किन्तु तत्, नेय मदीया गौ किन्तु संव, नात्र चैत्र किन्तु गृहे इति निषिद्धयमानस्यान्यत्र सत्त्वमवगम्यते । एव सत्यत्वाभासप्रतीतिरेव सत्यस्व प्रसक्तिरिति तन्निषेषोपपत्ति । अत एव वर्णस्वरूपपदयोग्यतादिस्वरूपोपमदंशङ्काभावान्नोपजीव्यविरोध | अन्यैश्च सत्तात्रैविध्यमनुपगम्याधिष्ठान ब्रह्मगतपारमार्थिकसत्तानुवेधादेव घटादिसत्त्वाभिमानोपपत्त्या सत्त्वाभासकल्पन निष्प्रमाणकमुच्यते । एवश्व प्रपञ्चे सत्यत्वप्रतीत्यभावेन तत्तादात्म्यापन्ने ब्रह्मणि तत्प्रतीतेरेवाविवेकेन प्रपञ्चे तत्प्रसक्त्युपपत्तेश्च सत्यत्वेन प्रपवनिषेधे नोपजीव्यविरोध, न वाऽप्रसक्तनिषेधता । न च ब्रह्मगतपारमार्थिकसत्तातिरिक्तप्रपञ्च सत्त्वाऽनुपगमे व्यवहितसत्यरजतातिरेकेण शुक्तौ रजताभासोत्पत्ति किमथमुपेयत इति वाच्यम्, व्यवहितासन्निकृष्टस्यापरोक्ष्यासभवात्, तन्निर्वाहाय तदुपगमात | न च द्वैतग्राहिप्रत्यक्षतदुपजीव्यनुमानक मंकाण्ड सगुणोपासनावाक्यादिरूपबहु प्रमाणाबाधायाद्वैतवाक्यस्य प्रतीतार्थं किं न स्यात? बहुप्रमाणविरोधे चैकस्याप्रामाण्य दृष्ट शुक्तिरजतादिज्ञाने इति वाच्यम्, देहात्मैक्ये प्रत्यक्षानुमानशब्दाभासादिसत्त्वेऽपि देहात्मभेदबोधकस्यानन्यपरत्वेन प्राबल्यवदत्राप्यनन्यपरत्वेनाद्वतश्रुते प्राबल्यात् विद्याविद्याभेदेन विरोधाभावाच्च । अपच में प्रसक्ति न होने से प्रपच का निषेध नही हो सकता, ऐसी बात नही है, क्योंकि जैसे शुक्ति में रजताभास की प्रतीति ही सत्य रजत के रूप में ज्ञात होने लगती है, अत उसका निषेध हो जाता है इसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । इसीलिये यह रजत नही है, किन्तु वह है, यह मेरी गाय नही है, किन्तु वह है, चैत्र यहा नहीं है, किन्तु घर में है, इत्यादि स्थलों में निषिध्यमान वस्तु की अन्यत्र सत्ता मानी जाती है । इस तरह से सत्यत्वाभास की प्रतीति मे ही सत्यत्व की प्रसक्ति होने से उसका निषेध हो सकता है । इसीलिये वर्ण स्वरूप, पद, योग्यता आदि के स्वरूप के उपमर्द की शका न होने से उपजोष्य का विरोध नहीं होगा, अर्थात् वेदान्तियो के मत से वण स्वरूप, पद, योग्यता आदि का सवथा अभाव नहीं माना जाता, किन्तु इन सबकी व्यावहारिक सत्यता मानी जाती सकते कि जिन उपनिषदों के वाक्यो से जगत् के मिथ्यात्व का ज्ञान होता है, उन वाक्यों के वण, पद है | इसलिये ऐसा नही कह आदि है हो नही, तो ज्ञान कैसे होगा? अन्य विद्वान् कहते है कि त्रिविध सत्ता को न मानकर अधिष्ठान ब्रह्मगत पारमार्थिक सत्ता हो घटादि में आ गई, ऐसा लगता है । इसी से घटादि की सत्ता के अभिमान की उपपत्ति हो जायगी । अत प्रातिभासिक या व्यावहारिक पृथक सत्ता की कल्पना में कोई प्रमाण नही है । इस पक्ष में प्रपच में सत्यत्व की प्रतीति के अभाव में प्रपच से तादात्म्य प्राप्त ब्रह्म की प्रतीति का ही अज्ञान के कारण प्रपच में आरोप हो जाने से सत्यश्व के रूप में प्रपच का निषेध करने पर भी न तो उपजीव्य का विरोध हो होता है और न असक्त का निषेध हो । प्रश्न उठता है कि ब्रह्मगत पारमार्थिक सत्ता के अलावा प्रपत्र को भी सत्ता न मानने पर व्यवहित सत्य रजत अतिरिक्त शुक्ति में रजताभास की उत्पत्ति किस लिये मानी जाती है? इसका उत्तर यह है कि व्यवहित और अनिष्ट वस्तु का प्रत्यक्ष सभव नही है, अत उसके निर्वाह के लिये रजताभास की उत्पत्ति मानी जाती है । पुन प्रश्न होता है कि द्वैत के ग्राहक प्रत्यक्ष, प्रत्यक्षोपजीवी अनुमान, कर्मकाण्ड, सगुणोपासना आदि के प्रतिपादक प्रतीत होने वाले अर्थ का ही बाघ क्यों न मान लिया जाय? जैसा कि शुक्तिरजत ज्ञान में । इसका समाधान यह है कि देह शास्त्र इन अनेक प्रमाणी से विरोध न हो, इसके लिये अद्वैत श्रुति से अनेक प्रमाणों से विरोध होने पर एक का अप्रामाण्य अभिप्रेत रहता है, और आत्मा की एकता में प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्दाभास आदि प्रमाणों के रहते हुए भी देह और आत्मा के भेद के बोधक शास् वाक्य अनन्यपरक होने से प्रबल होते हैं, उसी तरह से यहाँ पर भी अनेक विरोधी प्रमाणों के रहते हुए भी अनन्यपरक अद्वैत श्रुति ही प्रचल होती है । इन प्रमाणों में विद्या और नविद्या के भेद से अन्तत परस्पर कोई विरोध नही रह जाता ।
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वेदार्थपारिजात ३१ ९ ननु तथाप्युपजीव्यत्वेन प्रत्यक्षस्य प्रावल्यम । उपजीव्यत्ववानुमानागमापेक्षिताशेषायग्राहकतया ववचित साक्षात् क्वचित्परम्परया । अपेक्षितैकदेशग्राहिगामप्युपीव्यत्व दृष्ट तद्विरुद्धग्रहणेन तेन बावश्च । यथा घटविभु-त्वानुमाने पाग्राहिणाक्ष्णा, नरशिर शुचित्वातुमारे साभ्यग्राहकेणागमेन, मनोवैभवानुमाने ज्ञानसमवाय्यावारत्व-हनुमानेन किं पुनवक्तव्यमपेक्षिताशेषग्राहिणा प्रत्यक्षेण स्वविरुद्ध ग्राहकस्य वाघविपये वक्षुरादे शब्दतज्जन्य ज्ञानप्रामाण्याद्यग्राहित्वेऽपि तद्ग्राहिश्रोत्र साक्ष्यादिस जातीयत्वेनोपजीव्यत्वम् । दृष्ट च नरशिर कपालाशुचिल बोध-कागमस्य तच्छुचित्वानुमानोपजीव्यशुचित्वागमस जातीयत्वेन तदनुमानाप्रावल्यम । न चेन्द्रियमपि स्वज्ञानाथमनुमान-मुपजीवतोति सम एवोपजीव्यापजावकभाव, अज्ञातकरणतया ज्ञानजननाथमनुमानानपेक्षणात । अनुमानागमादिभिस्तु ज्ञानजननार्थमेव तदपेक्षणादिति विशेषादिति चेन्न उपजाव्याविरोधात् । तथाहि -- पत्स्वरूपमुपजीव्यते तत्र वाध्यते, बाध्यत चेत्विकत्वाकार, स च नोपजाव्यते, कारणत्वे तस्याप्रवेशात् । ' पूर्वसम्बन्धनियमे हेतुत्वे तुल्य एवं नो । हेतु-तत्त्वबहिर्भूत सत्त्वासत्वकथा वथा ॥ यद्यपेक्षितग्राहित्यमात्रेणोपजीव्यत्वस् तेन च बाधकत्व तदापेक्षित प्रतियोगिग्राहकत्वेन इद रजतमिति भ्रमस्य बाधोपजीव्यत्वात् कथं तद्विरुद्धा नेद रजतमिति बाधबुद्धिरुदिप्रात् यदि च निषेध्यार्थसमर्थ -कत्वे प्रतियोगिज्ञानत्वेन तस्योपजीव्यत्वेऽपि तत्प्रामाण्य नोपजीव्यम्, प्रतियोगिप्रमात्वेनाभावज्ञानजनकता गौरवात, प्रतियोगिभ्रमादप्यभावज्ञानदर्शनात्, किन्तु तज्ज्ञानत्वेनैव, लाघवात् । अतस्तद्विरुद्धज्ञान भवत्येवेति । तर्हि प्रकृतेऽपि तुल्यमिदम -- पक्षज्ञानत्वादिना कारणता न तत्प्रमात्वादिना । प्रश्न उठता है कि ' इस अवस्था में भी उपजीव्य होने से प्रत्यक्ष को ही प्रबल माना जायगा । प्रत्यक्ष उपजीव्य इसलिये है कि वही अनुमान और आगम के लिये अपेक्षित समग्र सामग्री को समर्पित करता है । यह सामग्री कही साक्षात और कही परम्परा से सहायक होती है । अपेक्षित वस्तु के एकदेश को ग्रहण करने वाले प्रमाण की उसका बाघ देखा जाता है । जैसे कि घट के विभुत्व के अनुमान का चक्षुरिन्द्रिय से भी उपजीव्यता और उसके विरुद्ध प्रतीत होने पर मनुष्य के शिर के कपाल की पवित्रता के विषय मैं से, मन की विभुता को सिद्ध करने वाले अनुमान का ज्ञान की समवायिकारणता के आधार के ग्राहक अनुमान से अधिक क्या कहा जाय अपेक्षित समस्त वस्तुओं के ग्राहक प्रत्यक्ष से अपने विरोधी अर्थ के ग्राहक प्रमाण के विषय का बाघ होता है । इन समस्त उदाहरणो म चक्षुरादि से शब्द और शब्दजन्य ज्ञान के प्रामाण्य के ग्राहक न होने पर भी इनके ग्राहक श्रोत्र के साक्षी और चक्ष के साक्षी की सजातीयता के आधार पर उपजीव्यता मानी जाती है । यह देखा गया है कि मनुष्य के शिर के कपाल की अशुचिता के बोधक आगम का उसके शुचिव को सिद्ध करने वाले अनुमान को उपजीव्य मान कर प्रवृत्त शास्त्र की सजातीयता के आधार पर उस अनुमान ET Trace नहीं होता | ' इन्द्रिय भी अपने ज्ञान के लिये अनुमान का सहारा लेती है, इस तरह से इनका उपजीव्य उपजीवक भाव समान है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योकि इनका ज्ञान न होने पर भी जब इनसे ज्ञान होता है, उस समय इनको अनुमान की सहायता की जरूरत नहीं पडती । इक विपरीत अनुमान, आगम प्रभूति को ज्ञान को उत्पत्ति में भो प्रत्यक्ष को सहायता लेनी पडती हैं । किन्तु इन सब प्रश्नों का उत्तर यह है कि यहाँ पर उपजीव्य के विरोध का कोई प्रश्न ही नहीं है । प्रत्यक्ष के जिस स्वरूप का सहारा लिया जाता है, उसका बाघ नहीं होता । किन्तु प्रत्यक्ष के तात्त्विक स्वरूप का ही बाघ होता है, जो कि उपजीव्य नही है, अर्थात् प्रत्यक्ष से केवल घट आदि का ज्ञान होता है, घटादि को तात्विकता का ज्ञान नहीं होता । अद्वैत श्रुतियाँ केवल तात्विकता का ही निषेध करती हैं, क्योकि arfarar का शब्दजन्य ज्ञान की कारणता कोटि में प्रवेश नहीं होता । ' पूर्व सम्बन्ध का नियम हो हेतु है | यह बात आप हम दोनो को समान रूप से मान्य है । इस प्रसग में हेतुत्व के निर्णय में व्यसहायक सत्य और अस्को चर्चा उठाना व्यर्थ है । यदि अपेक्षितग्राहित्य मात्र से उपजीव्यता मानी जाती है और उसी के आधार पर इतर प्रमाण की बाधकता मानी जाती है, ता इस परिस्थिति में अपेक्षित प्रतियोगी के ग्राहक के रूप में बाघ के लिये उपजोन्ध ' यह रजत है ' इस भ्रमात्मक ज्ञान a fire ' यह मत नहीं है ' इस बाघ बुद्धि का लक्ष्य कैसे होगा? यदि आप कहें कि ' निषेध्य अर्थ के समर्थक के रूप में प्रयोग ज्ञान की उपजीव्यता के रहते हुए भी उसके प्रामाण्य की उपजीव्यता अपेक्षित नहीं है, क्योकि प्रतियोगा प्रमा के रूप में अभाव ज्ञान की preet मानने में गौरव होगा । प्रतियोगी के भ्रम से भी भाव का ज्ञान होता है, किन्तु यहाँ पर प्रतियोगी के ज्ञानमात्र में ही लाव
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३२० वेदार्थपारिजात ननु यत्प्रामाण्य स्वरूपसिद्धयर्थमपवादनिरासार्थं यत्प्रामाण्यमुपजीवति, तत्तस्योपजीव्यम् । यथा स्मृते-रनुभव । न च रजतामस्तथेति चेतहि व्याप्तिधियोऽपि नानुमित्युपजीव्यत्वम्, लिङ्गाभासादपि वह्निमति वह्नि-प्रमादर्शनात् । ननु च येन विना यस्योत्थान नास्ति तत्तस्योपजीव्यम् । तथा च रजतभ्रमस्योपजीव्यत्वमस्त्येव न तु प्राबल्यम् । नह्यपजीव्यत्वमात्रेण प्राबल्यम, किन्तु परीक्षिततया । परीक्षा च सजातीयज्ञानान्तरविजातीयप्रवृत्तिसवाद-विसवादाभावरूपा । न च तो रजतभ्रमे स्त । प्रकृते चाक्षस्य परीक्षितत्वेन प्राबल्यम् । अस्ति हि सन् घट इति विशेषदर्शनजन्यज्ञानानन्तर घटार्थक्रियाप्रत्यक्षे क्लृप्तदूरादिदोषाभावाच्च विवादाभाव । एवमेव जीवेशाभेद-श्रुतौ निषेध्यार्थक भेदश्रुति साक्षिप्रत्यक्ष चादोषत्वात् परीक्षितमिति तदपि न बाध्यम् । दोषाभावादिज्ञानरूप-परीक्षायामप्यनाश्वासे वेदे पौरुषेयत्वाभावज्ञाने त्वदुक्तानुमाने च योग्यानुपलब्ध्यादिना हेत्वाभासादिराहित्यज्ञाने च ब्रह्ममीमासाया प्रत्यधिकरण सिद्धान्त्यभिमतार्थे उपक्रमाद्यानुगुण्यज्ञाने चानाश्वास स्यादिति, प्रमाणतदाभास-व्यवस्था च न स्यादिति चेन्न, परीक्षा हि प्रवृत्तिसवादविसवादाभावदोषाभावादिरूपा । तथा च स्वसमानदेशकालीन-farararara प्रामाण्यस्त्र व्यवस्थाप्यते, घूमेन स्वसमानदेशकालीनवह्निरिव । तथा च व्यवहारदशामात्रावाध्यत्व देहात्मक्यसाधारण परीक्षितप्रमाणे व्यवस्थितमिति कथमत्यन्ताबाध्यत्वाभावग्राहकानुमानागमयो प्रवृत्तिर्न स्यात? तस्माद्विश्वासप्रमाणतदाभासव्यवस्था जीवेशभेदादिक च व्यावहारिकमुपपन्नमेव । तथा च नेह नानास्ति किञ्चनेति सर्वजगन्मिथ्यात्वबो वकस्यागमस्याबाध एव । है | इससे विरोधी ज्ञान के होने में कोई बाधा नही है । इस पर हमारा कहना है कि प्रकृत में भी तो यही परिस्थिति है घटत्वादि के अनुमान में चक्षु प्रभूति की पक्ष ज्ञान मात्र से कारणता मानी जाती है, उनका प्रमात्व का ज्ञान अपेक्षित नहीं है | प्रश्न है कि ' जिसका प्रामाण्य अपने स्वरूप की सिद्धि के लिये और अपवाद के निगस के लिए जिसके प्रामाण्य का सहारा लेता है, वह उसका उपजीव्य माना जाता है । जैसे कि स्मृति का उपजीव्य अनुभव है । रजत भ्रम को यह स्थिति नही है । इसका उत्तर यह है कि ऐसा मानने पर व्याप्ति ज्ञान भी अनुमिति का उपजीव्य न रहेगा, क्योंकि लिंगाभास से भी मान स्थल मैं प्रिमा का उदय हो सकता है । ' जिसके बिना जिसका उत्थान नहीं हो सकता, वही उसका उपजीव्य है ' इस परिभाषा के अनुसार रजत श्रम की उपजीव्यता तो है, किन्तु उसका प्राबल्य नहीं । केवल उपजीव्य होने से ही प्रबल नहीं हो जाता, किन्तु विसवाद के आधार पर होती है । अत यह प्रबल है । ६८ विद्यमान इसके लिए परीक्षा अपेक्षित है । परीक्षा सजातीय ज्ञानान्तर से सवाद और विजातीय प्रवृत्ति से रजतश्रम स्थल में ये दोनो स्थितियां नहीं है । प्रकृत स्थल में इन्द्रिय का प्रामाण्य परीक्षित है, हैं ' इस विशेष दर्शन से उत्पन्न ज्ञान के अनन्तर घट से जलाहरणादि अर्थक्रिया संपन्न होती देखी जाती है । प्रत्यक्ष के बापक दोष दूरत्व, विप्रकृष्टत्व आदि के अभाव में यहाँ पर अर्थक्रिया का विस्वाद भी देखने को नहीं मिलता । इसी तरह से जीव और ईश्वर का अभेद बताने वाली श्रुति में अभेद का निषेध करने वाली भेद श्रुति और साक्षी का प्रत्यक्ष इन दोनों की अदोषता परीक्षित है, aa saar भी बाघ नही हो सकता । दोषाभाव के ज्ञान की परीक्षा में भी यदि विश्वास न किया जाय तो वेद में पौरुषेयत्व के अभाव के ज्ञान में आपके कहे गये अनुमान में योग्यानुपलब्धि प्रभृति से हेत्वाभास प्रभृति के अभाव के ज्ञान में और ब्रह्ममीमासा के प्रत्येक अधिकरण में सिद्धान्ती के अभिमत अर्थ में उपक्रम आदि से अनुगुणता के ज्ञान में भी विश्वास नहीं होता । इस परिस्थिति में क्या प्रमाण है और क्या प्रमाणाभास इसकी व्यवस्था न । पावेगी ' | किन्तु यह पूरा प्रतिपादन गलत है, क्योंकि परीक्षा प्रवृत्ति का सवाद fears का अभाव और दोषाभाव रूप है । इससे अपने समान देश और काल के विषय से बाधित न होने पर ज्ञान का प्रामाण्य माना जाता है, जैसे कि धूम की सहायता से स्वसमान देश और काल में वह्नि को सिद्धि की जाती है । ऐसी अवस्था में derrier ft aane दशा मात्र में अबाध्यता सभी तरह से प्रमाण द्वारा परीक्षित है, तो इससे अत्यन्त अबाध्यता के अभाव को ग्रहण करने के लिये अनुमान और आगम की प्रवृत्ति क्यो न होगी? इसलिये विश्वास, प्रमाण, प्रमाणाभास की व्यवस्था और जीव तथा परमात्मा के भेद की व्यावहारिता को उपपत्ति में कोई बाधा नहीं है । इसी तरह से ' नेह नानास्ति ' इस श्रुति के आधार पर सारे जगत् के मिध्यात्व के बोधक आगम का भी बोध नहीं होगा ।