वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 351–360

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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वेदार्थ पारिजात ३२१ ननु प्रत्यक्षाप्रामाण्ये तत्सिद्धस्य व्याप्त्यादेर्बाधिनानुमेयादेस्तत्प्रामाण्यस्य च बाघ, अनुमेयादेत्यादिना अनुमितिप्रामाण्यादिना च समानयोगक्षेमत्वात् । अन्यथा व्यासिकव्याप्त्या दिमता वाष्पाध्यस्तघूमेन तात्त्विको व्यावहारिको वाग्नि, व्यावहारिकव्याप्यादिमता घूमेन तात्त्विकोऽग्निर्व्यावहारिकेण बाधेन विरुद्धवर्माधिकरणत्वेन च विश्वस्य जीवेशभेदस्य च तात्त्विक सत्व सिद्धय दिति चेन्न तावताऽपि व्याप्त्या समानसत्ताकमनुमेयादिक सिद्धयत्वि-स्थापत्ते फालतोऽर्थ । स चास्माकमिष्ट एव । ब्रह्मशिन क्वचिदप्यत्यन्तावाध्य न सिद्धम् । वस्तुतस्तु नानुमेयादे-व्ययादिना समान सत्ताकत्व नियमोऽप्यस्ति । व्यभिचारिणाऽपि लिङ्गेन साध्यनति पक्षेऽनुमितिप्रमादशनात् । ध्वनिधर्महस्वत्वदीर्घत्वादिविशिष्टत्वेन मिथ्याभूतैरपि नित्यविभुभिर्वर्णे सत्या शाब्दप्रमिति क्रियत इति मीमास-रम्युपगमात् गन्धप्रागभावावच्छिन्ने घटे तात्त्विकव्याप्त्यादिमताऽपि पृथिवीत्वेनातात्त्विकगन्धानुमितिदर्शनात्, प्रतिबिम्बेन च बिग्वानुमितिदर्शनात् । एतेन ' शब्देऽपि योग्यतासमसत्ताकेन शब्दार्थेन भाव्यम्, योग्यतावाक्यार्थयो समान सत्ताकत्वनियमादिति ne योग्यता arast वेदान्तवाक्यार्थोऽबाधित स्यात ' इत्यपि परास्तम्, वेदान्तवाक्येऽखण्डार्थरूपवाक्याथबाधरूपाया योग्यताया अप्यबाधात् । न च ज्ञानप्रामाण्यस्य मिथ्यात्वे विषयस्यापि मिथ्यात्व शुक्तिरूप्यज्ञाने दृष्टमिति प्रकृतेऽपि ज्ञानप्रामाण्य मिथ्यात्वे विषयस्यापि मिथ्यात्व स्यादिति वाच्यम्, प्रामाण्य मिथ्यात्वस्य विषयमिथ्यात्वाप्रयोजकत्वात् । अनुमानेनापि प्रत्यक्ष बाध्यते, अत एव नभसो ल्यप्रत्यक्ष नभोनीरूपत्वानुमानापेक्षया दुर्बल बाध्यमेव । न चद प्रत्यक्षस्यानुमानवाध्यत्वे वह्नोष्ण्यप्रत्यक्ष शैत्यानुमानस्य, स्थायित्व प्रत्यभिज्ञान क्षणिकत्वानुमानस्य च बाघक प्रश्न है कि ' यदि प्रत्यक्ष का प्रामाण्य नहीं माना जायगा तो उसके द्वारा सिद्ध व्याप्ति आदि का भी बार हो जाने से अनुमेय अग्नि आदि का और उनके प्रामाण्य का भी बाघ होगा, क्योंकि दोनो जगह अनुमेय अग्नि आदि को व्याप्ति आदि से और अनुमिति के प्रामाण्य आदि से समान ही वाघापाव की स्थिति है । अन्यथा आध्यासिक ( काल्पनिक ) व्यामि वाले बाष्प में मध्यस्त ( कल्पित ) धूम से तात्विक अथवा व्यावहारिक अग्नि का और व्यावहारिक व्याप्ति वाले धूम से नात्विक अग्नि का बाघ न होने से fava an की अधिकरणता के आधार पर विश्व और जीवेश के भेद की भी तास्विक सत्ता सिद्ध हो जायगी ant इस आपत्ति का यदि यह अभियान है कि व्याप्ति आदि के समान सत्ता वाले अनुमेयादि की सिद्धि हो सकेगी, तो यह हमको इष्ट है । ब्रह्मभिन्न कोई भी वस्तु कभी भी अत्यन्त जबाध्य नही सिद्ध की जा सकती । वास्तव में तो अनुमेय आदि का व्याप्ति आदि की समान सत्ता के विधान का भी कोई नियम नहीं है । व्यभिचारी हेतु से भी साध्यवान् पक्ष में अनुमिति प्रभा होती देखी जाती हैं । मीमासक यह मानते है कि safe में रहने वाले ह्रस्व, दीर्घ प्रभूति धर्मों से युक्त होने मे झूठे सरीखे लगने वाले भो वास्तव में नित्य और विभु ( व्यापक ) वर्णों से सत्य शब्द अन्य ज्ञान होता है । इसी तरह से गन्ध के प्रागभाव से विशिष्ट घट में तात्त्विक व्याप्ति वाले पृथिवीत्व से अताविक पन्थ की अनुमिति होती हैं और प्रतिनिम्ब से विम्ब का भी अनुमान होता है । उक्त प्रतिपादन से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि " शब्द में भी योग्यता के समान सत्ता वाले शब्दार्थ को ही मान्यता मिलनी चाहिये, क्योकि योग्यता और वाक्यार्थ की समान सत्ता का नियम है । ऐसी परिस्थिति में योग्यता का बाघ हो जाने पर वेदान्त art यों का अर्थ अबाधित कैसे रह सकता है, क्योंकि वेदान्त वाक्यों में मखण्डाथ रूप वाक्यार्थ के बाधित न होने से तदनुरूप योग्यता का भी बाघ नही होता । ज्ञान के प्रामाण्य के मिथ्या सिद्ध हो जाने पर विषय को भी मिला मान लिया पर विषय जाता है भी, यह बात शुक्तिरजत ज्ञान में देखी गई है । तदनुरूप ही यहाँ पर भी ज्ञान के प्रामाण्य के मिध्यात्व के सिद्ध हो जाने । farar aura arr लिया जायगा? इसका उत्तर यह है कि प्रामाण्य का मिथ्यात्व विषय के मिथ्यात्व में प्रयोजक नहीं माना जाता अनुमान से भी प्रत्यक्ष का बाप होता है । इसीलिये आकाश की नीलिमा का प्रत्यक्ष arata की नोरूपता के साथक अनुमान से ge होने से भाषित हो जाता है । इस पर यह शका नही उठाई जा सकती कि ' यदि इस तरह से प्रत्यक्ष का अनुमान से बाघ ४१

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३२२ वेदार्थपारिजात न स्यात्, प्रत्युतानुमानमेव तयोर्वाधिक स्यादिति वाच्यम, अर्थ क्रियासवादेन श्रुत्यनुग्रहेण च तत्र प्रत्यक्षयो प्राबल्येनानु-मानबाधकत्वात्, अपरीक्षित प्रत्यक्षस्य परीक्षितानुमानापेक्षया दुबलत्वाभ्युपगमात् । नवे पशुत्वेन शशादावपि शृङ्गानुमान स्यात्, लाघवात् । पशुत्वमेव शृङ्गवत्वे तन्त्रम्, न तु तद्विशेष-गोत्वादिकम्, अननुगतत्वेन गौरवात्, तथा चैतत्तकंसध्रीचीनत्वेन प्रत्यक्षापेक्षयाऽनुमानस्य प्राबल्यम् । अनुकूलतकसाचिव्य-मेवानुमाने बलम । सर्वत्र येन केनचित्सामान्यधर्मेण सर्वत्र यत्किञ्चिदनुमेयम्, लाघवतर्कसाचिव्यस्य सत्वात् । तावतैव प्रत्यक्षबाधेन व्यवहारव्यवस्था विलुप्यते । अनुमानेऽत्र प्रत्यक्षबाधातिरिक्तदोषस्यासत्वादिति चेन्न } अयोग्य-शृङ्गादिसाधने प्रत्यक्षबाघस्यासभवेन तत्र व्याप्तिग्राहकतर्केष्वाभासत्वस्य त्वयापि वक्तव्यत्वेन व्यवस्थाया उभय-समाधेयत्वात, तर्काभाससध्रीचीनस्यानुमानस्य प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । यदुक्तम् - शृङ्गस्ष योग्यत्वनियमे तत्र प्रत्यक्षबाधेनैवोपपत्तिर्वर्णनीयेति, तन, शृङ्गत्वेन योग्यत्वनिश्चयासभवात, देवगवि शृङ्गस्य अस्मदादिचक्षरयोग्यस्य सत्त्वात् । अश्वादौ शृङ्गसदेहदशायामयोग्यानुमित्यापत्ति । शशे शृङ्गसाधने प्रत्यक्षबाघासभवेन व्याप्तिग्राहकतर्केषु आभासत्वसमर्थनस्यैवावश्यकत्वात् प्रत्यक्षस्यानुमानबाध्यत्वे काचिदनुपपत्ति । वोद्धेरपि नित्यस्य क्रमाक्रमाभ्यां कार्य्यकारित्वानुपपत्या सत्त्वेन व क्षणिकत्वमनुमीयते । परीक्षित प्रमाणभावेनागमेनापि प्रत्यक्ष वाध्यते । ननु प्रत्यक्ष यदि शब्दबाध्य स्यात् तदा जैमिनिना ' तमाम एवाग्निदिवा ददृशे नाचि ', ' अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षम् ' इत्याद्यर्थवादेषु दृष्टविरोधेनाप्रामाण्ये प्राप्त माना जायगा तो वह्नि को शीत सिद्ध करने वाला अनुमान वह्नि की उष्णता के प्रत्यक्ष से बाधित नही होगा और स्थायित्व की प्रत्यभिज्ञा क्षणिकता के अनुमान का बाघ न कर सकेगी । इसके विपरीत अनुमान ही उनका बाधक हो जायगा, क्योंकि उक्त दोनो स्थलो पर अर्थक्रिया के सवाद के आधार पर और श्रुतिप्रमाण की सहायता से भी प्रत्यक्ष और प्रत्यभिज्ञा का प्राबल्य है, अत उनसे अनुमान का हो बाघ होगा । यह बात सभी वाद - प्रतिवादी मानते है कि अपरीक्षित प्रत्यक्ष परीक्षित अनुमान की अपेक्षा दुबल होता है । प्रश्न उठता है कि ' इस तरह से पशुत्व हेतु से खरगोश में भीग का अनुमान होना चाहिये, क्योकि इसी में लाघव है । पशुत्व ही गवत्त्व का प्रयोजक माना जाना चाहिये, पशु विशेष में स्थित गोत्वादि नहीं, क्योंकि गौरवादि की पशु मात्र में अनुगतता के कारण ऐसा मानने में गौरव होगा । ठीक इसी तरह के तक के सहारे प्रत्यक्ष की अपेक्षा अनुमान का भो प्राबल्य सिद्ध हो जायगा | अनुमान का बल यही है कि उसको अनुकूल तर्क का सहारा मिलता है । सभी जगह जिस किसी सामान्य धर्म के सहारे से ही किसी वस्तु का अनुमान किया जाता है, लाघव और तर्क इसमें सहायक होते हैं । इतने से यदि प्रत्यय का बाघ होता है, तो उससे व्यवहार की व्यवस्था में कोई बाधा नहीं आवेगी । इस अनुमान में प्रत्यक्ष का बाघ करने के अतिरिक्त अन्य कोई दोष है नहीं । पर इसका समाधान यह है कि अयोग्य शृङ्गादि को सिद्ध करने में प्रत्यक्ष का बाध ही नही हो सकता, अत वहाँ पर व्याप्तिग्राहक तर्कों में afare भी कुछ हो सकते हैं, इस बात को आपको भी मानना पड़ेगा । तब उक्त स्थलों में क्या व्यवस्था होगी? इसका उत्तर समान रूप से आपको भी देना पड़ेगा । तर्काभास के सहारे खड़े हुए अनुमान का प्रामाण्य नही स्वीकार किया जा सकता । ' श्रद्ध होने की योग्यता पशु में हो तो होती है और वह योग्यता सभी समय है, जब प्रत्यक्ष का बाघ हो जाये ' यह कहना भी बिलकुल ठीक नहीं, क्योंकि केवल सींग होने से हो पशुत्व की योग्यता का निश्चय नहीं होता । कामधेनु का सीग हमारे चाक्षुष प्रत्यक्ष का विषय नहीं है और सीग को ही पशुत्व की योग्यता के निश्चय में हेतु मानने पर घोडे - गधे आदि में पशुत्व का केवल सन्देह नहीं होगा, अपितु ये पशु नहीं है ऐसा निश्चय ही होने लगेगा । क्योकि खरगोश के सीग को सिद्ध करने में प्रत्यक्ष का बाघ न होने से व्याप्तिग्राहक तर्कों में आभासत्व का समर्थन ही आवश्यक होगा । अत प्रत्यक्ष को अनुमान से बाध्य मानने में कोई अनुपपत्ति नही है । बौद्ध दार्शनिक भी नित्य पदार्थ मानने पर उसकी आनुपूर्वी के अनुसार कार्यकारिता नहीं बन सकती, इसीलिये सभी पदार्थों में सत्व के आधार पर क्षणिकत्व का अनुमान करते है । इसी तरह से जिसका प्रामाण्य परीक्षित है, उस आगम से भी प्रत्यक्ष का are होता है । शका उठती है कि ' यदि प्रत्यक्ष शब्द से बाधित होता है, तो फिर जैमिनि आचार्य ने ' तस्मादम ', ' अदितियों ' इत्यादि अर्थवाद वाक्यो में इस विरोध के

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वेदार्थपारिजात १२३ ' गुणवादस्तु गुणादप्रतिषेध स्यात् ' इत्यादिना गौणार्थता नोच्येत ' यजमान प्रस्तर ' इत्यादेश्च गौणार्थता नोच्येत । वेदान्तिभिश्च प्रत्यक्षाविरोधाय तत्त्वपदयोर्लक्षणाश्रीयते, श्रुतिविरोधे प्रत्यक्षस्यैव प्रामाण्यसभवात् । न च तात्पर्य-लिङ्गादीनामुपक्रमादीनामत्र सस्वान्नाद्वैतश्रुतीनाम मुख्यार्थत्वमिति वाच्यम्, ' यजमान प्रस्तर ' इत्यादावपूर्वत्वाद्येकैक-लिङ्गस्य तात्पर्य्यग्राहकस्य विद्यमानत्वात् । एकैकलिङ्गस्य तात्पर्य्यनिर्णायकत्वे लिङ्गान्तरमनुपपादकमेव । यथाऽद्वैतिम प्रत्यक्षसिद्धभेदे श्रुतिरनुवादिका भवति, लिङ्गबाहुल्यानपेक्षणादिति चेन्न, वाक्यशेषप्रमाणान्तरसवादार्थक्रियादिपरीक्षा-परीक्षितस्य प्रत्यक्षस्य प्राबल्येन व्यवहारदशायामेवैतद्विरुद्धार्थग्राहिणो ' धूम एवाग्निदिवा ददृशे ', ' अदितिद्य ', ' यजमान प्रस्तर, इत्यादेस्तद्विरोधेना मुख्यार्थत्वेऽप्यद्वतागमस्य परीक्षितप्रमाणविरोधाभावेन मुख्यार्थत्वोपपत्ते । प्रत्यक्षादे परीक्षया व्यावहारिकप्रामाण्यमात्र सिद्धयति । तच्च नाद्वैतागमेन बाध्यते । किन्तु तात्त्विक प्रामाण्यमेव वाध्यते । तत्तु परीक्षया न सिद्धमतो न विरोध । ' धूम एवाग्ने ' इत्यादेस्तु मुख्यार्थत्वे प्रत्यक्षादेर्व्यावहारिकमपि प्रामाण्य बाध्यते, अतस्तत्रामुख्याथत्वमेव । यदुक्तम् — प्रत्यक्षाविरोधाय तत्त्वपदयोर्लक्षणाश्रीयत इति, तन्न, षड्विधलिङ्गर्गतिसामान्येन चाखण्ड-haraari विषयीभूताखण्डार्थप्रतीतिनिर्वाहाय लक्षणाङ्गीकरणात् । तात्पर्यविषयीभूतान्वयनिर्वाहाय लक्षणाश्रयणस्य सवत्र दर्शनात् । न च लाक्षणिकस्यार्थस्यामुख्यार्थत्वमेवेति वाच्यम्, विकल्पानुपपत्ते । किममुख्यार्थत्व प्रतीयमानार्थ-परित्यागेनार्थान्तरपरत्वमशक्यार्थत्व वा नाद्य सामानाधिकरण्येन प्रतीयमानस्यैक्यस्यात्यागात् । नान्त्य, जहदजह-आधार पर अप्रामाण्य की शका उठाकर ' गुणवादस्तु ' इत्यादि सूत्र से उनकी गौणार्थता क्यो सिद्ध की? ' यजमान प्रस्तर ' इत्यादि art at aa aur क क्यों माने जाय? वेदान्ती भी प्रत्यक्ष से विरोध न हो, इसलिये ' तत त्व ' पदो में लक्षणा स्वीकार करते हैं । यह तभी उचित है, जबकि श्रुति के विशेष से प्रत्यक्ष का ही प्रामाण्य स्वीकाय हो । उपक्रमादि तात्पय लिंगा की उपस्थिति के कारण यहाँ उचित नहीं है, क्योकि ' यजमान प्रस्तर, इत्यादि स्थलों में भी तो पर अद्वैतश्रीत की गीणायंता नही मानी जावगी, यह कहना भी अपूर्वादि एक न एक तात्पर्य लिंग विद्यमान ही है, तब यहा पर भी गौणार्थता क्यो मानी जाय । एक एक लिंग की तात्पय frofenar shani नता में लिंगान्तर को अनुवादक मात्र माना जाता है । जैसे कि अद्वैतवादी के मत में भेद प्रत्यक्ष सिद्ध है, श्रुति यहाँ पर केवल अनुवादक मानी जाती है । इसमें कारण यही है कि तात्पय के निर्णय में अनेक लिंगो की अपेक्षा नही रहता दशा । इन में ही सबका जब समाधान यह है कि वाक्यशेष, प्रमाणान्तर सवाद, अथ क्रिया प्रभृति से परीक्षित प्रत्यक्ष ही प्रबल होता है । व्यवहार तो उनका इस इस प्रत्यक्ष से frea अर्थ का प्रतिपादन करने वाली ' धूम एवाग्नि ', ' अदितियों ' इस तरह की श्रुतियाँ मिलती है, प्रत्यक्ष से विरोध न हो, इसलिये गोणार्थ कर लेने से उसका विरोध नहीं होता । इसके विपरीत अद्वैत श्रुति की मुख्यार्थता में करती इस लिये है बनी रहती है कि व्यावहारिक दशा में परीक्षित प्रत्यक्ष के प्रामाण्य का वह उसी दशा में विरोध न कर तात्विक दशा इनके परीक्षा के द्वारा प्रत्यक्षादि का व्यावहारिक दशा में ही प्रामाण्य सिद्ध होता है । अद्वैत श्रुति उसका बाध नहीं करती, किन्तु नही तात्त्विक प्रामाण्य का हो बाघ करती है । यह areas प्रामाण्य प्रत्यक्ष द्वारा परीक्षा से सिद्ध नहीं है, इसलिये इसका विरोध होता । ' धूम एव ' इत्यादि वाक्यों को भी मुख्यार्थता मानने पर तो प्रत्यक्षादि को व्यावहारिक प्रामाण्य भी बाधित हो जाता है, ra. इनकी गौणार्थता ही मानी जाती है । arit आपने कहा है कि ' तत् त्व ' इन दोनों पत्रों में श्रुति में लक्षणा इसलिये की जाती है कि इनका प्रत्यक्ष से विरोध न को हो, यह बात गलत है, क्योकि उक्त स्थान पर षविध लिंग और तात्पर्य निर्णय की सामान्य पद्धति के आधार पर विषयभूत अखण्ड अर्थ अर्थ के arcareer करके विषयीभूत अखण्डार्थ की प्रतीति के भी निर्वाह के लिये लक्षणा अङ्गीकार की जाती है । तात्पर्य गौण हो हो साथ सम्बन्ध का निर्वाह करने के लिये सभी जगह इसी तरह से लक्षणा का सहारा लिया जाता है । लाक्षणिक अर्थ अर्थ सदा का परित्याग ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उस दशा में इस विकल्प का कोई उत्तर नहीं बन पावेगा कि क्या मुख्यार्थ में बनेगा प्रतीयमान कि सामानाधिकरण्य से कर अन्दर की कल्पना करनी पडती है या वह अशक्यार्थ कहलाता है? इनमें पहला पक्ष इसलिये नहीं

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३२४ वेदार्थ पारिजात लक्षणाश्रयेण शक्यैकदेशपरित्यागेऽपि सोऽय देवदत्त इत्यादि वाक्य इव शक्यैकदेशस्यान्ययाभ्युपगमात् । विशेषण-बाधेन विशेष्यमात्रान्वयस्यैवात्र लक्षणाशब्देन व्यपदेशात् । तदुक्तमाचार्यै - ' प्रस्तरादिवाक्यमन्यशेषत्वादमुख्यार्थ-मद्वैतवाक्य त्वनन्यशेषत्वान्सुखार्थम् ' इति । यदुक्तमपूर्वत्वाद्येकैक लिङ्गेनापि ' यजमान प्रसार ' इत्यादिवाक्यानामपि स्वार्थपरत्वमिति, तत्र, उपक्रमादिस्वरूपविचारेण तदसभवात् । तथाहि-- उपक्रमोपसहारयोरेकार्थनिष्ठत्वमभ्यासाथवादी चेति त्रय शब्दगतम् । अज्ञातत्वरूपमपूर्वत्व फलवत्त्वमबाधितत्वरूपोपपत्तिश्चेति षट् तात्पय्यग्राहकाणि लिङ्गानि तत्रत्यप्रामाण्य शरीरनिर्वाहकत्वादावश्यकानि । निष्फलार्थे प्रत्यक्षादे प्रामाण्येऽपि श्रुतेस्तदसभवात । लवदर्थज्ञानमुद्दिश्याध्ययन-सस्कृतश्रुतीना विनियोगेन निष्फलार्थे तात्पय्र्याभावनिश्चयात | यद्यपि तात्पय्र्याविषयेऽपि प्राशस्त्या प्राशस्त्यधी-द्वारीभूते वाक्यार्थेऽपि प्रामाण्यम, तेन भूताथवादि ॥ऽर्थवादादे प्रामाण्यमिष्यते, तथापि तादृशप्रमानुद्दिश्योक्तविनि-योगस्तादृशप्रभाया फलवदर्थविषयकत्वनियमात्, अथवादादेश्च प्राशस्त्यादिरूपार्थप्रमामुद्दिश्यैव विनियोगात् तादृशप्रमाकरणत्व फलवत्त्वघटितमेव बोध्यम । आद्यये त्वर्थवादस्य विधेयप्राशस्त्य - निषध्याप्राशस्त्यधीद्वारा विधिनिषेधवाक्ययो प्रमाजनकतायामावश्यकत्वम्, इतरयोस्तु विरुद्धार्थद्वये तात्पर्य्यसशये सति यत्रोपक्रमादिक तत्रैव तात्पर्य्यनिश्चयेन तदुपयोगित्वम् । तथा चापूर्वत्वाद्यैकैकमात्रेण न तात्पय्यनिश्चयसभव | नन्वन्यशेषत्वानन्यशेषत्वे न मुख्यार्थत्वामुख्यार्थत्वयो प्रयोजके, किन्तु मानान्तर विरोवाविरोधादेव । अन्यशेषेऽपि मानान्तरविरोधे ' इय गौ क्रय्या बहुक्षीरा ' इति लोके, ' सोऽरोदीत् ' इति वेदे च प्रस्तरादिवाक्यवद प्रतीयमान ऐक्य का त्याग नहीं किया जा सकता और अन्तिम पक्ष इसलिये नही बनेगा कि यहा पर जहदजहल्लक्षणा ( भागस्याग ) मानी जाती है, अत उसमें शब्दाथ के एकदेश का त्याग कर देने पर भी ' सोऽय देवदत्त ' इस प्रत्यभिज्ञा वाक्य की तरह शब्दाय के एकदेश से अन्य ( सम्बन्ध ) बना ही रहता है । विशेषण का बाधकर केवल विशेष्य के साथ अन्वय ( सम्बन्ध ) रहना ही यहाँ लक्षणा शब्द का अर्थ है । जैसा कि आचार्य ने कहा है-- ' प्रस्तरादि वाक्य अयवाद रूप होने से वे विधि के अङ्ग हो जाते है, अत मुख्यार्थ वाले नही है, किन्तु अद्वैत वाक्य तो किसी अन्य विधि के बङ्ग नही है, अत इनकी मुख्यार्थता ही मानी जायगी " । ' अपूर्व आदि एक - एक लिंग से भी ' यजमान प्रस्तर ' इत्यादि वाक्यों का भी स्वाथ में वात्पय बन सकेगा, यह ara भी गलत है, क्योकि उपक्रम आदि के स्वरूप पर विचार करने से यह असंभव लगता है । जैसे कि उपक्रम और उपहार में एका erer, अभ्यास और अर्थवाद ये तीन शब्दगत धर्म है । अज्ञातस्वरूप अपूर्वता, फलवत्व और अबाधितत्व रूप उपपत्ति, इनको भी मिलाकर मे छ तात्पय के ग्राहक लिंग उनके प्रामाण्य के पोषक हैं, अत इन सबकी आवश्यकता है । निष्फल अर्थ में प्रत्यक्षादि का प्रामाण्य भले ही हो, श्रुति की प्रवृत्ति निष्फल भथ में नहीं हो सकती । अध्ययन संस्कार से संस्कृत श्रुतियो का विनियोग फलवान् अर्थ ज्ञान की उद्देश्य बनाकर ही होता है, अत निष्फल गथ में उनका तात्पर्य निश्चित रूप से नहीं रहता । यद्यपि तात्पर्य के अविषय प्राशस्त्य और अप्राशस्त्य बुद्धि के जनक वाक्यार्थ का भी प्रामाण्य माना जाता है और इस तरह से भूतार्थं के बोधक अर्थवाद आदि चाक्पो का भी प्रामाण्य माना जाता है, तो भी जिस तरह की प्रमा को उद्दिष्ट करके विनियोग होता है, वैसी ही प्रमा फलवदर्थविष fort होती है, ऐसा नियम है । अथवाद नादि वाक्यों का प्राशस्त्य आदि अर्थ को प्रमा के उद्देश्य से हो विनियोग होता है, अत ऐसी प्रमा की करणता फल के आधार पर ही घटित हो सकती है । उक्त प्राथमिक शब्दगत तीन धर्मो में से अर्थवाद की आवश्यकता विधेय की प्रश er और निषेध्य की निन्दा के ज्ञान के द्वारा विधि और निपेध वाक्य की प्रमा की उत्पत्ति के लिये आवश्यक है । एकार्थनिष्ठता और अभ्यास की m वश्यकता उस समय पडती है, जब कि दो विरोधी अर्थों के उपस्थित हो जाने पर वाक्य का तात्पर्य सशयग्रस्त हो जाता हो, तब जहाँ पर उपक्रमादि की स्थिति हो, वहीं पर इनकी सहायता से तात्पर्य का निश्चय किया जाय, यही उनकी उपयोगिता है । इस तरह से केवल एक एक अपूर्वत्व आदि के सहारे से तात्पर्य का निश्चय सभव नहीं । उठता है कि अन्यशेषत्व अन्य से विरोध और अविरोध ही और अनम्यशेषत्व मुख्यार्थत्व और अमुख्यार्थत्व के प्रयोजक कारण नहीं हो सकते, किन्तु इनके प्रयोजक हैं । अन्यशेष वाक्य की भी मानान्तर से विरोध होने पर ' सोऽरोदीत् '

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३२५ मुख्यवृत्तेरनाश्रयणात् । अनन्यशेषेऽपि ' सोमेन यजेत ' इत्यादी वैयधिकरण्येनान्वये विरुद्ध त्रिकद्वयापत्त्या सामानाधि-करण्येनान्वये प्रत्यक्षाविरोधाय मत्वर्थलक्षणाश्रीयते । विचारविधाय के ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इति सूत्रे, ' तद्वि-जिज्ञासस्व ' इति श्रुतौ च मानान्तरविरोधेन विध्यन्वयाय जिज्ञासाशब्देन विचारलक्षणायाः, ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इत्यादी चामुख्यार्थतायाः स्वीकृतत्वात्, सर्वस्यापि वेदान्तवाक्यस्यावाच्ये ब्रह्मणि लक्षणाया इष्टत्वेनामुख्यार्थत्व-निषेधायोगाच्चान्वयानुपपत्तेस्तात्पय्यनुपपत्तेर्वा लक्षणावीजस्य विध्यविधिसाधारणत्वाच्च । तस्मात प्रत्यक्षं शब्दवाच्यमिति चेन्न भावानवबोधात् । तात्पर्य्यविषयीभूतार्थबोधकत्वमेवामुख्यार्थत्वं न लाक्षणिकत्वमात्रम् । ' सोमेन यजेत ' इत्यादिविशिष्टविधेविशेषणे तात्पय्र्याभावान्मत्वर्थ लक्षणायामपि स्वार्थापरित्यागान्नामुख्यार्थत्वम् । जिज्ञासापदेऽपि सत्प्रत्ययस्य विचारे जहल्लक्षणाभ्युपगमेऽपि शक्यार्थ परित्यागेऽपि विधितात्पर्य्यनिर्वाहाना मुख्यार्थ-त्वम् । नहि वाक्यार्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्त्या पदमात्रे लक्षणायामपि वाक्यस्यामुख्यार्थत्वम्, प्रतीतार्थस्यानन्यशेषत्वेन मुख्यत्वात् । यत्र तु प्रतास एवार्थोऽन्यशेषत्वेन कल्प्यते, तत्र वाक्यस्यामुख्यार्थत्वमेव । अन्यद्धि पदतात्पर्यमन्यच्च वाक्यतात्पर्य्यम्, सैन्धवमानय गङ्गायां वसन्तीत्यादी वाक्यतात्पय्यैक्येऽपि पदतात्पर्य्यभेदात् । विषं स्यादौ पदतात्पय्यभिदेऽपि वाक्यतात्पर्य्यभेदात् । विषभोजनमिष्टसाधनमित्येकं वाक्यस्य तात्पर्य्यम् । यदि शनोरन्नं भुज्यते इस वैदिक वाक्य में और ' यजमानः प्रस्तर: ' इस वाक्य में जैसे गौणार्थक वृत्ति मानी जाती है, वैसे ' यह गाय खरीदने लायक है, क्योंकि बहुत दूध देती है ' इस लौकिक वाक्य में गोणार्थ में वृत्ति नहीं मानी जाती । इसी तरह से ' सोमेन यजेत ' इत्यादि अनन्यशेष arter में भी defen रण्येन अन्वय करने पर विरोधी विकद्रय की आपत्ति उठ खड़ी होने से सामानाधिकरण्य से अन्वय किया जाता है और उस समय प्रत्यक्ष का विशेष न हो इसलिये मत्वर्थलक्षणा का सहारा लिया जाता है । विचार के प्रवर्तक ' अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा ' इस वेदान्तसूत्र में और ' उसको जानो ' इस श्रुति में मानान्तर से विरोध होने के कारण विधि के अन्वय के लिये जिज्ञासा पद की विचार में लक्षणा और ' यह सब कुछ ब्रह्म है ' यहाँ पर अमुख्यार्थता स्वीकार की जाती है । समस्त वेदान्त वाक्यों की अवाच्ध ब्रह्म में लक्षणा अभीष्ट है, अतः अमुख्यार्थता का निषेध नहीं किया जा सकता । अन्वयानुपपत्ति अथवा तात्पर्यानुपपत्ति होने पर ही लक्षणा का सहारा लिया जाता है, यह बात विधि वाक्य तथा तदितर वाक्यों के लिये समान रूप से लागू होती है । इसलिये शब्द कभी प्रत्यक्ष रूप से वाच्य नहीं होता । इसका उत्तर इस प्रकार से दिया जाता है कि प्रश्नकर्ता ने हमारे अभिप्राय को ठीक से नहीं समझा है । हमारा कहना यह है कि केवल लाक्षणिक होना ही अमुख्यार्थता नहीं है, किन्तु तात्पर्य का विषय जो न हो ऐसे अर्थ के बोधक arts को ही अमुख्यार्थ कहते हैं । ' सोमेन यजेत ' ( सोम विशिष्ट यज्ञ करो ) इत्यादि विशिष्ट विधियों का विशेषण में तात्पर्य नहीं है, अतः मत्वर्थ में लक्षणा होने पर भी स्वार्थ का परित्याग नहीं करना पड़ता, इसलिये वे मुख्यार्थ ही है, गौणार्थं नहीं । जिज्ञासा पद में सन् प्रत्यय की विचार में जहल्लक्षणा मानने पर भी और शब्दार्थ का परित्याग कर देने पर भी विधि के तात्पर्य का निर्वाह बना रहता है, अतः यहाँ पर भी गौणार्थता नहीं मानी जाती । वाक्यार्थ की अन्यथा प्रतीति न हो, इसके लिये मान में लक्षणा मानने पर भी वाक्य की गौणार्थता नहीं हो जाती, क्योंकि उससे प्रतीत हो रहा अर्थ किसी अन्य वाक्य का शेषभूत नहीं है, अत: यह गौण न होकर मुख्य अर्थ हो होगा । किन्तु जहाँ प्रतीत होने वाला अर्थ अन्य का अंग बन जाता है, वहीं पर वाक्य की अमुख्यार्थता मानी जाती है । पद और वाक्य का तात्पर्य अलग - अलग होता है । ' सैन्धवमानय ' ( सैन्धव = घोड़ा या नमक ), गङ्गायां वसन्ति ' इत्यादि स्थलों में वाक्य के तात्पर्य की एकता में भी पदों का तात्पर्य भिन्न रहता है । तात्पर्य यह है कि ' ter लाव ' इस वाक्य का तात्पर्य तो प्रसङ्ग वक्ष ' घोड़ा लाओ ' या ' नमक लाओ ' ऐसा एक ही होगा, किन्तु सैन्धव पद का तात्पर्य घोड़ा और नमक दोनों में होगा । इसी तरह ' गङ्गा में रहते हैं ' इस वाक्य का तात्पर्य तो गङ्गा के किनारे रहते हैं, यह एक ही होगा । किन्तु ' गङ्गा ' इस पद के तात्पर्य गङ्गा और गङ्गा - तीर ये दो होंगे । इसी तरह से ' विषं भुङ्क्ष्व ' यहाँ पर भी पदों के तात्पर्य के एक रहने पर भी वाक् का तात्पर्य भिन्न होता

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३२६ तर तिषं भुङ्क्ष्वेति वाक्यार्थधीद्वारा शत्रोरन्तभोजनमनिष्टसाधनमित्यपरं तात्पर्य्यम् । इयं गोः कय्या बहुजरे त्याद्यप्यवश्यं तव्येति विधिशेषत्वेन, प्राशस्त्यनक्षणकत्वात् । एवमेव ' सोऽरोदीत् ' इत्यस्यापि ' बर्हिषि रजतं न देयम् ' इति रजतनिन्दाद्वारा हिरण्यं दक्षिणेति तत्प्राशस्त्यनक्षकत्वमेव! ' सर्व खल्विदं ब्रह्म ' इत्यस्यापि शान्त उपासीत ' इति शमविधिशेषत्वेन नासुख्यार्थता । अत एव मानान्तरविरोध एव लक्षपेत्यपास्तमेव इयं गोः कथ्येति प्राशस्त्यलक्षणायां व्यभिचारात् । वस्तुतः परमतात्पर्य्यविषयीभूतार्थप्रतीतिनिर्वाहायैव सर्वार्थवादेषु लक्षणा | एताबस्तु विशेष: - विधिप्राशस्त्ये लक्षणातः प्रागर्थवादवाक्यार्थज्ञानम्, तस्य प्रमाणान्तरविशेषे वाव एव । यथा ' प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत् ' इत्यादी । अत एव तत्र गुणवादमानम् । प्रमाणान्तरप्राप्तौ त्वनुवादमात्रम्, यथा ' अग्निहिपस्य भेषजम् ' । अत एव तदुभयत्राप्यवाधिताज्ञातज्ञापकत्वरूपप्रामाण्यानिर्वाहादप्रामाण्यम् । यत्र तु प्रमाणान्तरप्राप्तिविरोधों न स्तस्तत्र प्रामाण्यशरोरनिर्वाहाद् भूतार्थवादत्वम् । यथा ' इन्द्रो वृत्राय वञ्चमुदयच्छत् ' । सर्वमेतद्देवताधिकरणे स्पष्टम् । नन्नादित्यो ग्रुप इत्यादी वाक्यार्थप्रतीत्यर्यमेव लक्षणाङ्गीकारादमुख्यार्थत्वं न स्यादिति चेन, आदित्य-सदृशो ग्रुप त्यर्थपत्राने तथात्वेऽपि गुणवृत्त्या प्रतीतस्यापि वाक्यार्थस्य ' यूपे पशुं बध्नाति ' इति विधिशेषस्तेन तत्प्राशस्त्यलक्षकत्वमस्त्यैव तेनैवामुख्यत्वम् । प्रतिहर्बुद्गात्रपच्छेदयोस्तु कुत्रचित् प्रतिहपच्छेदस्य सावकाशत्वाद् | वाक्य का एक तात्पर्य यह है कि विष भरा भोजन करने से इष्ट की सिद्धि होगी । इसका दूसरा तात्पर्य यह है कि यदि तुमको शत्रु का अन्न खाना है, इससे अच्छा है कि तुम विष खा लो । यहाँ पर उक्त वाक्य से यह समझाया जाता है कि शत्रु का बन्न खाना विषमय भोजन के समान अनिष्टकारी है । ' यह गाय खरीदने लायक है ' इत्यादि लौकिक वाक्यों का भी तात्पर्य उसके अवश्य खरीद लेने में है, क्योंकि प्राशस्त्यवोधकता के कारण इसकी विधिविशेषता सिद्ध होती है । इसी तरह से ' सोऽरोदीत् ' यहाँ पर भी ' वहि के द्वारा संपाद्य यश में रजत दक्षिणा नहीं देनी चाहिये इस विधि वाक्य के शेष के रूप में रजत की निन्दा सुवर्ण की दक्षिणा की को लक्षित करती है । ' यह सब कुछ ब्रह्म है ' यहाँ पर भी ' शान्त उपासीत ' इस शम प्रतिपादक विधिवाक्य की शेषता के आधार पर मुरुषार्थता नहीं बनती । इसलिये प्रमाणान्तर से विरोध होने पर ही लक्षणा होगी, सिद्धान्ततः इस बात को नहीं स्वीकार किया जाता, क्योंकि " इथं गोः क्रय्या ' इत्यादि स्थलों में मानान्तर का विरोध न होने पर भी उसकी प्रशस्तता को बतलाने के लिये लक्षणा मानी जाती है | अतः आपके मत का व्यभिचार स्पष्ट है । वस्तुतः परम तात्पर्य विषयक अर्थ प्रतीति के निर्वाह के लिये ही सभी अर्थवादों में लक्षणा मानी जाती है । केवल इतना हो अन्तर है --- विधि की प्रशंसा में लक्षणा से पहले अर्थवाक्य वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होता है । इसका प्रमाणान्तर से विरोध होने पर बाघ हो जाता है । जैसे कि ' प्रजापतिरात्मनो ' इस तरह के अर्थवाद वाक्यों में देखा जाता है । इसीलिये यहाँ पर गुणनिधि मात्र मानी जाती है । प्रमाणान्तर से प्राप्ति होने पर केवल अनुवाद माना जाता है, जैसे कि ' अग्नि हिम की दवा है ' यहाँ पर । उक्त दोनों ही स्थलों में अबाधित और अज्ञात को ज्ञापकता वाले प्रामाण्य का निर्वाह न होने से ये वाक्य स्वार्थ में अप्रमाण माने जायेंगे । जहाँ पर प्रमाणान्तर से प्राप्ति अथवा विरोध इन दोनों की स्थिति नहीं है, वहाँ पर प्रामाण्य का निर्वाह बने रहने से भूतार्थवादता मानी जाती है, जैसे कि ' इन्द्र ने वृत्र के मारने के लिये वस्त्र उठाया । ये सारे विषय देवताधिकरण में स्पष्ट है । roar है कि ' आदित्यो यूप: ' इत्यादि स्थलों में वाक्य की प्रतीति के लिये ही लक्षणा मानी जाती है, अतः इनकी गौणार्थता नहीं मानी जानी चाहिये । इसका उत्तर यह है कि ' यूप आदित्य के सदृश चमकीला है ' इस अर्थ में उक्त वाक्य का पर्यवसान होने पर आपकी बात सही हो सकती है, किन्तु गुणवृत्ति से प्रतीत वाक्यार्थ की ' यूप में पशु को बाँधता है ' इस fafe arts के साथ गोगिता के कारण यूप की प्रशस्तता के बोधन में लक्षणा भी साथ में है ही । इसीलिये उसकी गोणार्थता मानी जायगी । प्रतिहर्ता और उद्गाता के अपच्छेदों में कहीं पर प्रतिहर्ता के अपच्छेद की सावकाशता के आधार पर एक प्रयोग में दोनों

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वैवार्थपारिजातः ३२७ एकप्रयोग एवं विरोधवच्च प्रत्यक्षागमयोरपि प्रत्यक्षस्य व्यावहारिकप्रामाण्यसत्त्रकाशत्वस्य तारिककलांगे विरोवस्थ तुल्यत्वानोकन्यायवैषम्यम्, प्रत्यक्षादेव्यवहारिक प्रामाण्यं श्रुतेतात्विकं प्रामाण्यमिति तत्परत्वस्य ि गा धकतचान यदुक्तम् – ' संकेतकाले सङ्केतयितुर्यत्र नियोस्तुमिच्छा तथा यथेष्टं शब्दानां प्रवृत्तिः सिद्धयति । निसर्ग-मिद्वेष्विच्छाशात् प्रतिपादनायोगादर्थका एवं शब्दा: । पुरुषादेव स्ववसः । पुरुषपचेतवशादेव च शब्दानां पौरुषेयता, न पुरुषोत्पत्या तत एवं विप्रलम्भात् । पुरुषादुत्पन्नोऽपि यथाभावं सङ्केतितो न विप्रलम्भको भवति शब्दः । यथा निमेषोन्मेषादिरनर्थकोऽपि यथाभावं पुरुषेण समितो न विप्रलम्भकस्तद्वत् । तस्मादपौरुषेये निवर्तमानः पुरुषः स्वकृतसमयसम्भवामर्थप्रतिभामपि निवर्तयति । तत्कुतः पुरुषनिवृत्त्या सत्यार्थता ' इति, तन्न, प्रसिद्ध सङ्केतेन व्यवहारोपपत्तेः । तथाहि -- नहीदानीन्तनो वक्तृश्रोतृव्यवहारः प्रातिविकसङ्केतमूलकः, तथात्वे परस्परा-नदोषापत्तेः । वक्तृश्रोतृसम्मतसङ्केतेनैव तु शब्दार्थप्रतिपत्तिर्दृश्यते । नहि कृतकेनैव सङ्केतेन शब्दार्थप्रतिपत्तिरिति राजाज्ञाऽस्ति । ज्ञातेन सङ्केतेनार्थप्रतिपत्तिरिति तु दृश्यते । सङ्केतः कृतकोऽकृतको वेत्यनाप्रहोप्रयोजकत्वात् । सङ्केत-ज्ञानमन्तरा त्वानर्थक्यमनुभूयते । न तु तत्कृतकत्वज्ञानमर्थावबोध उपयुज्यतेऽप्रयोजकत्वादेव । अत एव पुरुषो निवर्त मानोऽपि नार्थप्रतिभां निवर्तयति, अनादिप्रसिद्धसङ्केतज्ञानेनैवार्थप्रतिभासम्भवात् । वृद्ध वाक्यैस्तद्व्यवहारेश्च का प्रामाण्य नहीं माना जाता, उसी तरह से प्रत्यक्ष और आगम प्रमाण में भी प्रत्यक्ष के व्यावहारिक प्रामाण्य में सावकाश होने से तास्विक अंश में इसका विरोध उक्त न्याय के समान ही हैं । यहाँ पर प्रत्यक्ष आदि का व्यावहारिक प्रामाण्य और श्रुति का तात्विक श्रामाण्य मानने में तत्परत्व को सिद्धि हो जाती है । शब्दप्रामाण्य पर धर्मकीर्ति के आक्षेपों का खण्डन संकेत काल में बक्ता जिस अर्थ की प्रतीति कराने की इच्छा से शब्द का प्रयोग करता हो, उस अर्थ का ही वह शब्द ate होता है | इससे यह सिद्ध होता है कि शब्दों की प्रवृत्ति यथेष्ट हो जाती है । यदि यह बात स्वभावत: सिद्ध मानी जाय तो उसके इच्छाधीन न रहने से किसी में अर्थ के प्रतिपादन में उनकी उपयुक्तता न होने से वे अनर्थक हो जायेंगे | शब्द पुरुष के संस्कार के कारण ही अर्थवान् होते हैं । पुरुष के संकेत के अधीन होने से ही शब्दों की पोस्पेयता मानो जाती हैं, पुरुष से उनको उत्पत्ति के कारण नहीं, क्योंकि उनमें विलम्भकता तभी भाती है, जब कि वे पुरुष से उत्पन्न हो । पुरुष से उत्पन्न हो कर भी अभिप्राय के अनुसार संकेतित शब्द विलम्भक नहीं होता । जैसे कि निमेष और उन्मेष यद्यपि अनर्थक है, किन्तु जब वे पुरुष के अभिप्राय जुड़ जाते हैं तो उनकी सार्थकता मानी जाती है । इसलिये शब्द की अपौरुषेयता से निवृत्त हुआ पुरुष अपने संकेत से उत्पन्न हो रही प्रतिभा से निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार पुरुष की निवृत्ति हो जाने से शब्द की सत्यार्थता कैसे रह जायगी । किन्तु इस प्रतिपादन में कोई सार नहीं है, क्योंकि प्रसिद्ध संकेत से ही व्यवहार की उपपत्ति हो जाती है । जैसे कि इस समय के बक्का और श्रोता का व्यवहार फगत संकेत पर अवलंबित नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर परस्पर एक दूसरे को अर्थावगति नहीं होने पायेंगी । वका और श्रोता दोनों के द्वारा स्त्रोत संकेत से ही शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है । कृतक संकेत से शब्दार्थ की प्रतीति हो, ऐसी कोई राजाज्ञा नहीं है । परिज्ञात संकेत से अर्थप्रतिप्रति होती है, ऐसा अवश्य देखा गया है । यह संकेत कृतक है या अकृतक, इसमें कोई आग्रह नहीं रहता, क्योंकि इसमें कोई अनुकूल तर्क नहीं है । संकेत ज्ञान के बिना तो आर्थक्य का अनुभव अवश्य होता है । इसकी कृतकता के ज्ञान का उपयोग भी अर्थावबोध में नहीं होता, क्योंकि इसमें भो कोई अनुकूल तर्क नहीं है 1 । इसीलिये पुरुष के संकेत के निवृत्त होने पर भी अर्थज्ञान की निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि अनादि काल से प्रसिद्ध चले आ रहे संकेत ज्ञान से ही अर्थ का ज्ञान हो जाता है । वृद्धों के वाक्यों से और उनके व्यवहारों से संकेत का ज्ञान होता है, क्योंकि संकेत को गति ( ज्ञान ) के वे ही कारण हैं । संकेत कारण भी erraft में प्रयोजक नहीं है, क्योंकि अस्मदादि में ऐसा नहीं देखा जाता । वृद्धों ने अपने पूर्व वृद्धों से सात का उपदेश सुनकर

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३२८ वेदार्थपारिजातः सङ्केतोपदेशः, तस्यैव तदवगतिहेतुत्वात् । न तु सङ्केतकरणमपि तत्प्रयोजकमस्मदादिष्वदर्शनात् । ते च वृद्धाः स्वपूर्ववृद्धेभ्यः सङ्केतोपदेशं श्रुत्वोपदिष्टवन्त इत्यनादिवृद्धव्यवहारेणोत्पत्तिकसङ्केतोपदेशेनोपपत्ती सङ्केतकरण-पूर्वकोपदेशकल्पनाया निष्प्रमाणत्वात् । न च निसर्गसिद्वेष्विच्छावशात् प्रतिपादनायोग इति वाच्यम्, अनिसर्ग-सिद्धेषु सुतरां तदसम्भयात् । यथा मालाकारः स्वानिमितान्येव पुष्पाण्याचित्य स्वेच्छया नानाविधानि पुष्पभूषणानि रचयति, तथैवोत्पत्तिकसङ्केतविशिष्टानि पदान्यादाय स्वेच्छया वाक्यप्रयोगे बाधानापत्तेः । यथेदानीन्तनैस्तत्तदर्थसङ्केत-विशिष्टानि स्वनिर्मितान्येव पदान्यादाय स्वेच्छया वाक्यानि निर्मीयन्ते तथैवान्यदापि स्वेच्छयार्थप्रतिपादने बाधाभावात् । एतेन ' अर्थज्ञापन हेतुहि सङ्केतः पुरुषाश्रयः । गिरामपौरुषेयत्वेऽप्यतो मिथ्यात्वसम्भवः ॥ ' ( प्र ० वा ० ३२२७ ) इति धर्मयुक्तमपास्तम्, सङ्केतस्यापि पुरुषानाश्रयत्वात् । अर्थज्ञापनहेतोहि सङ्केतस्यापि नित्यतः । तद्द्वारा चापि वेदस्य निर्दोषत्वं न भज्यते ॥ वर्णानाञ्च पदानाञ्च शक्तेरोत्पत्तिकत्वतः । नित्यं निर्दोषता वेदे गिरामप्यकृतत्वतः ॥ अत एव किं पौरुषेयतया, यतो हि समयादर्थप्रतिपत्तिः, स च पौरुषेयो वितयोऽपि स्यात्, तेन शीलसाधनं स्वर्गवचनमन्यथासमयेन विपर्यासयेत्, तेनायथार्थ प्रकाशनस्यापि सम्भवादित्यपि परास्तम्, सङ्केतस्यापि पौरुषेय-त्वानभ्युपगमात् । तदुक्तम्- ' शब्दार्थानादितां मुक्त्वा सम्बन्धो नादिकारणम् । अस्ति नान्यदती वेदे सम्बन्धादिर्न विद्यते || ' इति । स च सम्वन्धस्त्रिप्रमाणकः । तथाहि - प्रयोजकवृद्धेन प्रयोज्यवृद्धस्यार्थप्रतिपत्तये गामानयेत्यादि -वाक्ये प्रयुज्यमाने व्युत्पित्सुः पार्श्वस्थं प्रयोक्तारं वाचकं वाच्यं च प्रत्यक्षेण प्रत्येति । प्रयोज्यवृद्धप्रवृत्त्या श्रोतुर्वाच्यार्थ -उपदेश दिया, इस प्रकार वृद्ध - व्यवहार से औत्पत्तिक ( स्वाभाविक = नित्य ) संकेत के उपदेश द्वारा अर्थ का ज्ञान सिद्ध हो जाने से संकेत करणपूर्वक उपदेश की कल्पना निष्प्रमाण हो जायगी । निसर्गसिद्ध संकेत का इच्छानुसार वस्तु के प्रतिपादन में उपयोग नहीं हो सकता, यह कहना गलत है, क्योंकि अस्वाभाविक शब्दों में ऐसा प्रतिपादन सुतरां असंभव हो जायगा | जैसे मालाकार अपने द्वारा अनिर्मित पुष्पों को चुनकर उनसे अपनी इच्छा के अनुसार नाना प्रकार के पुष्पों के आभूषण बनाता है, उसी तरह से औत्पत्तिक ( स्वाभाविक ) संकेत faf शष्ट पदों को लेकर स्वेच्छया नानार्थ प्रतिपादक वाक्यों के प्रयोग में कोई बाधा नहीं जैसे आजकल के लोग अपने से अनिमित उन अर्थी के संकेत से युक्त पदों से हो स्वेच्छया वाक्य बना लेते है, उसी तरह से अन्य समय भी स्वेच्छया वाक्य निर्माण में कोई बाधा उपस्थित नहीं होगी । इसीलिये धर्मकीति ( बौद्ध दार्शनिक ) की यह उक्ति व्यर्थ हो जाती है कि- ' अर्थ के प्रतिपादन में कारणभूत संकेत पुरुषाश्रित हैं, अतः वेद वाक्यों के अपौरुषेय मानने पर वे मिथ्या हो जायगें, क्योंकि यहाँ संकेत पुरुषाश्रित नहीं रहेंगे ' । यही बात निम्न में प्रतिपादित है ---' अर्थ की अवगति में कारणभूत संकेत की पारम्परिक नित्यता के कारण वेद की निर्दोषता में कोई बाधा नहीं उपस्थित होती । वर्णों और पदों में रहने वाली शक्ति की स्वाभाविकता नित्य निर्दुष्ट है, क्योंकि वेदवाणी नित्य है ' । इसीलिये ' अपौरुषेयता से क्या होना - जाना है, क्योंकि अर्थ की प्रतिपत्ति तो संकेत से ही होती है और यह संकेत पौरुषेय g, ra ra मिथ्या भी हो सकता है । इससे शीलसाधन से स्वर्ग की प्राप्ति का प्रतिपादक वचन विपरीत संकेत से विरुद्धार्थक भी हो सकता है, क्योंकि वह यथार्थं अर्थ का भी प्रकाशन कर सकता है ' इस तरह की उक्तियों का भी समाधान हो जाता है, क्योंकि हम संकेत को भी पौरुषेय नहीं मानते । जैसा कि कहा गया है-- ' शब्द और अर्थ की अनादिता को छोड़कर उनके सम्बन्ध का कोई अन्य कारण नहीं है, अतः वेद में सम्बन्ध भी आदि नहीं है, अर्थात् अनादि हैं । इस संबन्धी सिद्ध तीन प्रमाणों से होती है । ये तीन प्रमाण हैं -- प्रत्यक्ष, अनुमान और अर्थापत्ति । जैसे कि प्रयोजक वृद्ध प्रयोज्य वृद्ध को अर्थ की प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) कराने के लिये ' गाय लाभो ' इस तरह के वाक्यों का प्रयोग करता है, तब व्युत्पत्ति की अभि-लाषा वाला ( बालक आदि ) अपने पास में प्रयोक्ता और प्रयोज्य ( गाय लाने की आज्ञा देने वाला और आज्ञा का पालन करने वाला ) तथा aree और araar ( गाय लामो वाक्य और लाना क्रिया ) को प्रत्यक्ष देखता है । प्रयोज्य वृद्ध की प्रवृत्ति से श्रोता के वाच्यार्थ की प्रतीति का

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वेदार्थपारिजातः ३२६ प्रतिपत्तिमनुमिनोति । तदर्थप्रतिपत्स्यन्यथानुपपत्या शब्दार्थाभितां वाच्यवाचकशक्ति पार्थापत्यवगच्छति । तदुक्तम् -'शब्दवृद्धाभिधेयांश्च प्रत्यक्षेणात्र पश्यति । श्रोतुश्च प्रतिपन्नत्वमनुमानेन चेष्टया || अन्यथानुपपत्त्या च बुद्ध च्छति द्वयाश्रिताम् । अर्थापत्त्या च बुद्धचेत सम्बन्धस्त्रिप्रमाणकः || ' इति । अत्राह धर्मकीर्ति सम्बन्धापौरुषेयत्वे स्यात्प्रतीतिरसंविदः ' ( प्र ० वा ० ३१२२८ ) अर्थात् शब्दार्थयोः सम्बन्धस्यापौरुषेयत्वे संकेतसंविद्विधुरस्याप्यर्थप्रतीतिः स्यात् । यदि स्वकृतसम्बन्धा एव शब्दा न तेष्वर्थेषु पुरुषैरन्यथा विपर्यस्यन्ते तर्हि किं सङ्केतेन? स हि सम्बन्धो यतोऽयं प्रतीतिः । ततो निसर्गसिद्धसम्बन्धात् शब्दादथं प्रतिपद्यमानः समयं नापेक्षेत । अपेक्षते च सङ्केतम् । तस्मान्न शब्दानामर्थेन सहापौरुषेयः सम्बन्धो राजचिह्नादिवत् ' इति । अत्रोच्यते-निसर्गसिद्धस्यापि सम्वन्वस्याभिव्यक्त्यै बृद्ध व्यवहारोपदेशाचपेक्षोपपत्तेः । तथाहि विद्यमानोऽपि सम्बन्धो नानभिव्यक्तोऽर्थ-प्रतीतिहेतुरिति वृद्धव्यवहाराद्यभिव्यक्तोऽर्थं प्रत्याययति । न च प्रतीत्यन्यथानुपपत्त्या सम्बन्धकल्पना, प्रतीत्यभावे कथं सम्बन्ध इति वाच्यम्, पूर्वपूर्व प्रयोक्तृतोऽर्थप्रतीतेर्दृ ष्टत्वेन तदभावासिद्धेः । तदुक्तम् --- ' ज्ञापकत्वाद्धि सम्बन्धः स्वात्मज्ञान-मपेक्षते । तेनासी विद्यमानोऽपि नागृहीतः प्रकाशकः ॥ सर्वेषामभिव्यक्तानां पूर्वपूर्वप्रयोक्तृतः । सिद्धः सम्बन्ध इत्येवं सम्बन्धादिर्न विद्यते ॥ ' इति । ननु ' सङ्केतात्तदभिव्यक्तावसमर्थान्यकल्पना । ' इति धर्मकीतिरीत्या सङ्केतेनैवार्थबोधोपपत्ती सम्बन्ध-कल्पना व्यर्थैवेति चेन्न, सम्बन्धोपदेशातिरिक्तस्य सङ्केतस्थानभ्युपगमात् । सम्बन्धोपदेशातिरिक्तस्य सङ्केतस्थार्थप्रतिपत्तौ अनुमान करता है । यह अर्थप्रतिपत्ति बिना शब्दाथ ' को अवगति के नहीं होती, अतः अर्थापत्ति प्रमाण से वह शब्द और अर्थनिष्ठ वाय-वाचक शक्ति को जानता है । जैसा कि कहा गया है - ' क्युल्पित्सु वाचक शब्द, वृद्ध एवं अर्थ इन तीनों को पहले प्रत्यक्ष प्रमाण से जानता है | इसके बाद वह चेष्टामूलक अनुमान से श्रोता की अर्थावगति को जानता है । यह अर्थावगति शब्द और अर्थ के संबन्ध को माने बिना नहीं हो सकती, अतः अर्थापत्ति से वह उनमें संबन्धरूप शक्ति की कल्पना करता है और इस तरह से इन तीन प्रमाणों से यह शब्द, अर्थ और उनके परस्पर संबन्ध को जानने में समर्थ होता है ' । इस बात को पहले टिप्पणी में विस्तार से समझाया जा चुका है । इस पर धर्मकीर्ति का कहना है कि - ' यदि शब्द और अर्थ के संबन्ध को मपौरुषेय माना जायगा, तो संकेत ज्ञान अनभिज्ञ व्यक्ति को भी अर्थ की प्रतीति होने लगेगी । यदि अर्थ के साथ बिना सं nes की स्थापना के भी उन अर्थों से शब्दों का विपरीत प्रयोग मनुष्यों द्वारा संभावित न हो तो संकेत की भी इस परिस्थिति में क्या आवश्यकता है? वह संबन्ध जिससे कि अथ की प्रतीति होती है, अपनी स्वभावसिद्धता के कारण शब्द से अर्थ की प्रतीति कराते समय संकेत की अपेक्षा न रखता हो, ऐसी बात नहीं है | इसलिये राजचिह्न की तरह शब्दों का अर्थ " के साथ अपौरुषेय संबन्ध नहीं माना जा सकता ' । इसका उत्तर यह है कि निसर्गसिद्ध संबन्ध की भी afro यक्ति के लिये वृद्ध - व्यवहार, उपदेश आदि की आवश्यकता मानी जाती है, क्योंकि संबन्ध के विद्यमान रहने पर श्री, जब तक यह अभिव्यक्त नहीं होता, तब तक अर्थ की प्रतीति कराने में समर्थ नहीं हो सकता । अतः इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये वृद्ध - व्यवहार की आवश्यकता है । प्रतीति की अन्यथा उपपत्ति नहीं होगी, अत: प्रतीति की उपपति के लिये संबन्ध की कल्पना करनी पड़ती है । यह प्रतीति ही जब नहीं है, तो फिर संबन्ध कहाँ से आवेगा? इसका उत्तर यह है कि पूर्व - पूर्व के प्रयोक्ता के बाधार पर प्रतीति की अनुभूति परिदृष्ट है, अतः प्रतीति का अभाव किसी प्रकार सिद्ध नहीं होगा । इसी बात को निम्न कारिकाओं में भी कहा गया है --- ' संबन्ध ज्ञापक है, अतः उसको अपने ज्ञान की अपेक्षा रहती है । यद्यपि वह विद्यमान रहता है, तब भी वह संबन्ध जब तक ज्ञात नहीं होता, तब तक यह अर्थ का प्रकाश नहीं करता । सभी अभिव्यक्त अर्थो की प्रतीति पूर्व पूर्व प्रयोक्ता के व्यवहार से होती है और इस प्रकार शब्दार्थ संबन्ध की सिद्धि अनादि काल से चली आती है, अतः इस संबन्ध की सादिता में कोई प्रमाण नहीं है ' । प्रश्न उठता है कि ' यदि संकेत से विद्यमान संबन्ध की अभिव्यक्ति मानी जाती है, तो उस परिस्थिति में संकेत से free संध की कल्पना व्यर्थ है ' धर्मकीर्ति की इस उक्ति के अनुसार संकेत से ही अर्थावगति के हो जाने पर संबन्ध की कल्पना व्यर्थ ४२

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 360 का मूल पृष्ठ
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३३० वेदार्थपारिजातः अनुपयोगाच्च । स चोपदेशो व्यवहारेण, अस्माच्छन्दादयमर्थो वोद्धव्य इति वाक्येन, अन्यथा वेत्यन्यदेतत् । सम्बन्धन रूपरचेत्संकेतः सोऽप्युपदेशाविना विज्ञात एवार्थप्रकाशकः । तदुक्तमषि - ' शक्तिरेव हि सम्बन्धो भेदश्वास्या न दृश्यते । साहि कार्यानुमेयत्वात्तद्वेदमनुवर्तते ॥ ' इति । एतेन नायोग्य समयः समर्थः, योग्यता सम्बन्धश्चेत्तत्कि तया शब्दः सम्बन्धोऽस्तु, समर्थं हि रूपं शब्दस्य योग्यता, कार्यकरणयोग्यतावत् । सा चेदर्थान्तरं किं शब्दस्येति शब्दयोग्यतयोः सम्बन्धो वाच्यः, अन्यथा शब्दस्य योग्यता न सिद्धयेत् । यद्यर्थान्तरभूतायां योग्यतायां शब्दजन्य उपकारो भवतीति शब्दस्य योग्यतेत्युच्यते इति चेन्न, योग्यताया नित्यनिरतिशयत्वात् । तथात्वे वा शब्दकृतस्य उपकारस्य योग्यतया कः सम्बन्ध इत्यपि वाच्यम्? अथ तत्राप्युपकारे योग्यतयाऽन्य उपकारः क्रियते, तदा तत्राप्युपकारे यथोक्तविधिनाऽपरापरस्योपकारस्य कल्पनायामति-प्रसङ्गात्, अनवस्थानाच्च । किश्च व्यतिरिक्तां योग्यतामुपकुर्वाणः शब्दः स्वरूपेणैवोपकरोति पररूपेण वा? पररूपेण चेत्, शब्दस्यानुपकारकत्वप्रसङ्गात्, तदा च प्रतीतिजननयोग्यः शब्दस्वभाव एव किं नेष्यते? किं पारम्यर्येण? तस्मान्न योगता सम्बन्धः । न च सायंप्रतीतिहेतुः समवायादेवार्थप्रतीतेरित्याद्यपास्तम् । वाच्यवाचकसम्बन्धो वा शक्ति संकेतो वा शब्दनिष्ठस्वार्थ बोधयोग्यता वा शब्दान्तरनिर्देशो वा यः को s पि वा शब्दधर्मो s युपेतव्यः, स ज्ञात एव बोधे सहकारी भवतीति तज्ज्ञानस्यैवोपदेशादिरपेक्ष्यते, न तु तत्करणमप्य-होगी । इसका उत्तर यह है कि संबन्ध का उपदेश ही संकेत माना जाता है, इसके अतिरिक्त संकेत की सत्ता नहीं मानी जाती । संध के उपदेश के अतिरिक्त संकेत का अर्थ की प्रतीति में कोई उपयोग भी नहीं है । वह उपदेश व्यवहार से हो या ' इस शब्द यह अर्थ समझना चाहिये इस वाक्य से हो अथवा किसी अन्य मार्ग व्याकरण, कोश आदि से हो, यह दूसरी बात है । यह: संकेत संबन्धस्वरूप हो, तब भी उपदेश आदि से ज्ञात होकर ही अर्थ का प्रकाशक हो सकता है । यही बात इस कारिका में कही गई है-' संबन्ध शब्द की शक्ति ही है और इसमें भेद का दर्शन नहीं होता । यह शब्द की शक्ति कार्य से अनुमित होती है और इस प्रकार कार्यगत भेद की उसमें भी अनुस्यूति हो जाती है ' । उक्त प्रतिपादन से इस बात का खण्डन हो जाता है कि अयोग्य के प्रतिपादन में समय ( संकेत ) समर्थ नहीं हो सकता, यदि योग्यता ही संबन्ध है तो क्या उससे शब्द का संबन्ध होगा? शब्द का समर्थरूप ही योग्यता कहलाता है, जैसे कि कार्य करने की सामर्थ्य होती है । यदि यह अर्थान्तर है तो उसका शब्द के साथ क्या संबन्ध है, यह बताना पड़ेगा | अन्यथा ' शब्द की योग्यता ' यह art संगत न हो सकेगा । यदि यह माना जाय कि अर्थान्तरभूत योग्यता में शब्द से किसी उपकार की उत्पत्ति होती है, अतः यह शब्द की योग्यता मानी जाती है, तो यह गलत होगा, क्योंकि योग्यता नित्य और निरतिशय होती है । यदि आपकी ही बात मान ली जाय तो शब्द के द्वारा किये गये उपकार का योग्यता से क्या संबन्ध है, यह बताना पड़ेगा । यदि यह कहा जाय कि उस उपकार में भी योग्यता से अन्य उपकार की निष्पत्ति होती है, तो उस उपकार में भी उक्त विधि से दूसरे उपकार की स्थिति माननी पड़ेगी और इस प्रकार एक के लिये दूसरे उपकार की कल्पना करने में अतिप्रसंग और अनवस्था भी होगी । यह भी प्रश्न उठ खड़ा होता है कि अपने से व्यतिरिक्त योग्यता का उपकार शब्द अपने स्वरूप से ही करता है, अथवा पररूप से? यदि वह पररूप से उपकार करता है तो इस परिस्थिति में शब्द की उपकारता नहीं बनेगी । ऐसी अवस्था में शब्द के स्वभाव को ही प्रतीतिजनन योग्य क्यों न माना जाय? इसमें परम्परा को क्यों बीच में लाया जाय । इसलिये योग्यता न कोई संबन्ध है और न यह शब्दार्थ " की प्रतीति का हेतु ही है, क्योंकि समवाय संबन्ध से ही अर्थ की प्रतीति बन सकेगी, इत्यादि पूर्वपक्षी का प्रतिपादन निरस्त हो जाता है । arorates संबन्ध, शक्ति, संकेत, शब्दनिष्ठ स्वार्थबोध योग्यता अथवा शब्दान्तर निर्देश इन सब में से किसी एक को शब्द का धर्म मानना ही पड़ेगा, वह ज्ञात होकर हो शाब्दबोध ( शब्द से अर्थ ' का ज्ञान ) में सहायक होता है, इसलिये उसके ज्ञान के लिये