वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 361–370

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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dar पारिजातः ३३१ पेक्षितमित्यपौरुषेयत्वमेव तस्य । न च तत्र धर्ममभावातिरिक्तः सम्बन्धोऽन्वेष्टव्यो निष्प्रयोजनत्वात् । अतो नानवस्थानादिकमपि । अन्यथा वौद्धपक्षेऽपि तथैव पर्यनुयोगस्य सम्भवात् । यत्तूक्तम् —'अस्यार्थस्यायं शब्दो वाचक इत्यर्थकथनमेव बौद्धमते संकेतः । स च पुरुषवृत्तिर्न शब्दार्थवृत्तिः, raat aata पुरुषधर्मस्य शब्दार्थयोरनुपपत्तेः ' इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, संकेतस्य शब्दार्थसम्पृक्तत्वेन तदनुप कारकत्वापातात् । उपकारकत्वे वाऽसम्वद्वत्वाविशेषादतिप्रसङ्गाच्च । यत्तूक्तम् -- भिन्नानां सिद्धानां भावानां नोपश्लेष: ( अत्र प्रमाणवातिके मूले टीकायाञ्च रूपश्लेष इति पाठस्तु प्रामादिक एब ), सम्बन्धेऽभेदप्रसङ्गात् । न वा पारतन्त्र्यलक्षणः सम्बन्धः सिद्धे पारतन्त्र्यायोगात् । न वा परस्परापेक्षालक्षणः सम्बन्ध:, सिद्धस्य सर्वनिरपेक्षत्वात् ' इति, तन्न, बोद्धमते कस्यापि भावस्य स्वतः सिद्धत्वनिरपेक्षत्वयो-रसिद्धेः । कार्याणां भिन्नत्वसिद्धत्वयोः सतोरपि कारणाधीन स्थितिगतिप्रवृत्तिमत्त्वेन निरपेक्षत्वादर्शनात् । परस्परभिन्नयोः सिद्धयोरपि रज्जुघटयोरुपश्लेषलक्षणे सम्बन्धे सत्यप्यभेदादर्शनात् । शब्दार्थयोः सम्बन्धाभावे कथञ्च शब्दादर्थ-प्रतीतिः? कथव शाब्दज्ञानस्यानुमानेऽ न्तर्भावोपपादनम्? समयश्वापि तदा कि प्रयोजनः? यदपि च तदाख्यानं समयस्ततः प्रत्यायकत्वसिद्धि: सम्बन्धाख्यानात्, न तु सम्बन्धस्तदप्यस्थाने, सम्बन्धस्यात्यन्तासत्त्वे तदाख्यानवैयर्थ्यात् । यदप्युक्तम् - अर्थविशेषसमीहा प्रेरिता वाक्, अत इदम् ( प्रतिपादनाभिप्रायादिदं वचनमागतमिति ) विदुषः स्वनिदानावभासितमर्थं सूचयति । तेनाभिप्रायलक्षणाया बुद्धेर्वाग्विज्ञप्तेश्च जन्यजनकलक्षणः सम्बन्धस्ततः ही उपदेश आदि की अपेक्षा रहती है । इसमें उसके कारण ( उत्पादन ) की अपेक्षा नहीं रहती, यत्तः शब्द का यह धर्म अपौरुषेय ( अनादि ) माना जा सकता है | यहाँ पर धर्मवर्माभाव के अतिरिक्त अन्य किसी संबन्ध का अन्वेषण नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसा करने से कोई प्रयोजन नहीं सिद्ध होने वाला है । इसीलिये अनवस्था आदि दोष भी नहीं उठेंगे । अन्यथा बौद्ध पक्ष में भी इसी तरह की आपत्तियाँ उठाई जा सकती है । यह कहा जाता है कि ' बौद्ध मत में इस अर्थ का यह शब्द वाचक है, इस तरह से अर्थ का कथन ही संकेत माना जाता है । यह पुरुष में रहता है, शब्द और अर्थ में नहीं । जैसे अश्व का धर्म गाय में नहीं रहता, उसी तरह से पुरुष का धर्म शब्द और अर्थ में कैसे रह सकता है '? यह कथन भी जब तक इस पर विचार नहीं किया जाता है सभी तक सुन्दर प्रतीत होता है, क्योंकि यदि संकेत का शब्दार्थ से कोई संबन्ध नहीं, तो उससे उनका कुछ उपकार कैसे होगा । अब यदि उपकारक मानते हैं तो बिना संपर्क के ही उपकारिता की स्थिति में अतिप्रसक्ति दोष आवेगा । यह भी कहा जाता है कि ' विभिन्न सिद्ध भावों में परस्पर उपश्लेष लक्षण, ( यही प्रमाणवार्त्तिक मूल एवं टीका में ' रूपश्लेष ' यह पाठ दिया गया है, वह प्रामादिक है ) संबन्ध नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें अभेद की आपत्ति उठेगी । पारतन्त्र्य लक्षण संबन्ध भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि सिद्ध वस्तु में पारतन्त्र्य नहीं माना जा सकता । परस्पर अपेक्षा लक्षण संबन्ध भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि सिद्ध वस्तु सर्वनिरपेक्ष होती है । यह कथन भी इसलिये गलत है कि बौद्ध मत में किसी भी भाव की स्वतः सिद्धता और निरपेक्षता ही सिद्ध नहीं की जा सकती । कार्यों की भिन्नता और सिद्धता को मानने पर भी उनकी स्थिति, गति और प्रवृत्ति कारण के अधीन रहती है, अतः उनमें निरपेक्षता नहीं देखी जाती । परस्पर free एवं सिद्ध रज्जु औौर घट इन दो वस्तुओं में उपश्लेष ( संयोग ) लक्षण संबन्ध के रहते हुए भी अभेद नहीं देखा जाता । शब्द और अर्थ में यदि कोई संबन्ध नहीं है तो शब्द से अर्थ की प्रतीति ( ज्ञान ) कैसे होती है? शाब्द ज्ञान का अनुमान अन्तर्भावि भी कैसे हो सकेगा, क्योंकि अनुमान तो संबन्धमूलक है और समय ( संकेत ) को मानने का भी क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? यह कहना कि अर्थ के आख्यान को ही समय कहा जाता है और संबन्ध के आख्यान से ही शब्द में प्रत्यायकत्व की सिद्धि होगी । इस प्रकार यहाँ पर संबन्ध की कोई आवश्यकता नहीं है । यह सब भी बिना प्रसंग की ही उक्ति मानी जायगी, क्योंकि जब संबन्ध का अत्यन्त अभाव है तो उसके आख्यान का प्रयोजन ही क्या? यह भी कहा जाता है कि ' अर्थविशेष को बताने की इच्छा से प्रेरित वाणी इस शब्द से इस अभिप्राय की अभिव्यक्ति होती है ( प्रतिपादन के अभिप्राय से यह वचन आया हैं ), ऐसा जानने वाले व्यक्ति को अपने कारण अभिव्यक्त हो रहे अर्थ की प्रतीक्षि

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३३२ वेवार्थपारिजातः शब्दादर्थप्रतिपत्तिरविनाभ नाभावादिति, तदपि निरर्गलम् यस्य कस्यापि सम्बन्धस्य गले पतितत्वात् । तदिदं घट्टकुटी -प्रभातायितम्, शब्दादनन्तरमर्थप्रतीतेः । शब्दार्थयोर्वाच्यवाचकत्वलक्षणस्यैव सम्वन्धस्य लाघवेन स्वीकार्यत्वात् । एतेन पदादर्थप्रतीतिर्यद्यप्यनुमानम्, वाक्यात्वर्थप्रतीतिः प्रमाणान्तरम्, सम्बन्धाग्रहान्नात्राविनाभाव उपयोगीत्यपि सम्यगेव । यत्तु नाविनाभावमन्तरेण वाच्यवाचकभावसम्भव इति, तदप्यकिञ्चित्करम् वाक्यवाक्यार्थयोर्वाच्य वाचकभावानम्युपगमात् पदजन्यपदार्थवोधस्यैव वाक्यार्थबोधजनकत्वात् । इदं पदमेतदर्थ समीहया प्रयुज्यत इति पदपदार्थयोः सम्बन्धग्रहेऽपि पदसन्दर्भात्मकस्य वाक्यस्यापूर्वत्वान्न तस्यार्थेन ततः पूर्वं सम्बन्धग्रह इति कथं तेन वाक्यार्थानुमानम्? यत्तक्तम् उपचारेण समयस्य सम्बन्धाख्यानात् सम्बन्धव्यपदेशः, न तु पुनः स एव मुख्यः सम्बन्ध इति, तदपि निरालम्बनम्, सम्बन्धस्योपचारिकत्वे तेनार्थबोधस्याप्योपचारिकत्वापातात् । एतेन समयः प्रतिसत्यं प्रत्युच्चारणं वा सृष्ट्यादो केनचित् पृथक् सकृदेव वा कृत इत्यपि वक्तव्यम् । नाद्यः, तथाऽदर्शनात्, गौरवाच्च । नान्त्यः, सृष्टिकर्तुरीश्वरस्य वौद्धमतेऽनङ्गीकारात् अन्यस्य सर्वपदतदर्थविदः सर्वोपदेश-क्षमस्याप्यनभ्युपगमात् प्रमाणानुपलम्भाच्च, पदतदर्थं सम्बन्धज्ञानविधुराणां परैः सम्बन्धोपदेशासम्भवाच्च । नाप्यभिनयैस्तत्सम्भवः, अनन्तानामर्थानां सुखनेत्रनिकोच हस्तविक्षेपादिलक्षणैरभिनयैरपि तदसम्भवाच्च । कराती है । इससे यह प्रतीत होता है कि अभिप्रायलक्षण बुद्धि और वाणी की विज्ञप्ति में जन्यजनकभाव लक्षण संबन्ध है । इससे aferred or at प्रतीति हो जाती है ' यह कथन भी अनर्गल है, क्योंकि इस तरह से तो कोई न कोई संबन्ध जरूर गले पड़ ही जायगा | इस प्रकार यह प्रतिपादन ' घट्टकुटीप्रभात न्याय का उदाहरण बन जायगा । शब्द के उच्चारण के बाद ही अर्थ की प्रतीति होती है, अतः शब्द और अर्थ का वाध्यवाचक लक्षण संबन्ध ही स्वीकार किया जाय, इसी में लाघव है । इसीलिये ' पद तप अनुमान के अन्तर्गत आ जाती है, किन्तु वाक्य से अर्थ की प्रतीति को प्रमाणान्तर ही मानना पड़ेगा, यहाँ पर संबन्ध का ग्रहण नहीं हो पाता, अतः अविनाभाव का यहाँ उपयोग नहीं हो सकता ' यह कथन ठीक ही है । विनाभाव के बिना वाच्यवाचकभाव नहीं बन सकता, यह कथन इसलिये गलत है कि वाक्य और वाक्यार्थ का वाच्यवाचकभाव माना ही नहीं जाता । किन्तु पद से होने वाला पदार्थ ' का ज्ञान ही वाच्यार्थ के ज्ञान का कारण होता है । यह पर इस अर्थ को बोधित करने की इच्छा से प्रयुक्त हुआ है, यह तरह से पद ओर पदार्थ का संबन्ध गृहीत हो जाने पर भी पदसमूह रूप वाक्य की अपूर्वता के कारण वाक्य के साथ इससे पहले संबन्ध का ग्रहण नहीं होगा तो उससे वाक्यार्थ का अनुमान कैसे हो सकता है? इसलिए शब्द प्रमाण का अनुमान प्रमाण में अन्तर्भाव नहीं कर सकते । उपचार ( लक्षणा ) से समय को संबन्ध कह दिया जाता है, वस्तुतः वह मुख्य संबन्ध नहीं होता ' यह कथन भी निराधार है, क्योंकि यदि संबन्ध को औपचारिक माना जायगा तो उससे हुए अर्थबोध की भी औपचारिता ही मानी जायगी । समय को मानने वाले को यह भी बताना पड़ेगा कि प्रत्येक मनुष्य के प्रत्येक उच्चारण के लिए समय का विधान पृथक - पृथक किया गया या सृष्टि के आदि में किसी ने एक बार ही इसका विधान कर दिया? इसमें पहला पक्ष इसलिए नहीं बनेगा कि ऐसा देखा नहीं गया है, ऐसा मानने में गोरव भी है । अन्तिम पक्ष इसलिए नहीं बनेगा कि बौद्ध मत में सृष्टि कर्ता ईश्वर को माना नहीं गया है । ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति भी ऐसा नहीं माना गया है कि जिसको सभी पदों और उनके अर्थों का ज्ञान हो और जो सभी प्राणियों को इनका उपदेश करने में समर्थ हो । इस तरह के व्यक्ति की सत्ता में कोई प्रमाण भी नहीं है । पद और पदार्थ के संबन्ध में ज्ञान से शून्य व्यक्ति पदों से संबन्ध का उपदेश कर भी नहीं सकते । अभिनय से भी ऐसा संभव नहीं हो सकता, क्योंकि अनन्त अर्थो का प्रतिपादन मुख और नेत्र के संकोच अथवा हाथ की विभिन्न क्रियाओं के अभिनय से कभी संभव नहीं होगा । १. टोल टैक्स बचाने के लिये कोई व्यक्ति दिन भर स्टेशन अथवा मोटर स्टैण्ड पर ही पड़ा रहा । रात में वह इसलिये निकला कि अब कोई देखेगा नहीं, टैक्स नहीं देना पड़ेगा । किन्तु रात्रि के अन्धेरे के कारण वह रास्ता भूल गया और रात भर भटकते - भटकते सबेरा होने पर वह ठीक चौकी चुंगी पर ही पहुँच गया । इसी तरह संबन्ध से पिण्ड छुड़ाने के लिये आपने इतनी उखाड़ पछाड़ की, किन्तु संबन्ध गले पड़ ही गया । घट्टकुटी = चौकी चुंगी ।

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वेदार्थपारिजातः ३३३ यत्तु तत्र धर्मकीर्ति: - ~~ सर्वेषां सविपक्षत्वान्निर्ह्रासातिशयाश्रिताः । सात्मीभावात्तदभ्यासाद्धोयेरन्नाश्रवा: क्वचित् || ( प्र ० वा ० ३१२२१ ) यद्यपि प्रणाश्रो दुर्ज्ञानः, दोषा हि निर्ह्रासातिशयधर्माणो विपक्षाभिभवोत्कर्षापकर्ष साधयन्ति, ज्वालादिवत् । ते हि विकल्पप्रभवाः, सत्यप्युपादाने कस्यचिन्मनागुणस्याभ्यासादपकर्षिणः, तत्पाटये निरन्वयविनाशधर्माणिः स्युः, ज्वाला-दिवदेव । यथा ज्वालादयः प्रतिपक्षस्योदकादेरुत्कर्षे सत्यत्यन्तविनाशधर्माणस्तद्वत् । ये यदुपधानादपकर्षणस्ते तदत्यन्तवृद्धौ तदभिभवान्निरन्वयविनाशधर्माणः । तद्यथा ज्वालादयः सलिलाभिवृद्धी | नैरात्म्यदर्शनोपधानाच्चापकर्ष-धर्माणी दोषा इति स्वभावहेतुः । ततो निर्दोषोऽपि भवत्येव कश्चित् पुरुषधोरेयः । न च दोषविपक्षसात्मत्वेन प्रज्वलित-वह्निसात्कलमाङ्कुरवन्निर्दोषताया अवस्थानमप्यसंभवोति कार्यक्षमत्वं तु दूरापेतमिति वाच्यम्, अदोषात् । तत्रेदमुत्तरम् -निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्य्ययः । न बाधो यत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपाततः । ( प्र ० वा ० ३१२२२ ) अयमर्थ: - निरुपद्रवभूतार्थविषयस्य विपर्य्ययैः सोपद्रवा नार्थस्वभावदोषैर्न बाधनम्, सात्मीभूतमपि मार्गमभिभूय न दोषाणामुत्पत्तिः संभवति, दोषप्रतिपक्षभूते गुणवति नेरात्म्यमार्गे बुद्धेः पक्षपाततो मानातिशयात् प्रतिपक्ष एव यत्नाधानात् । अहं ममेति पश्यत आत्मीयत्वेनाभीष्टविषये स्नेहः, ततो द्वेषादिः, आत्मात्मीयानुपरोधिन्युपरोधप्रतिघातिनि तददर्शनात् । तस्मात् समानजातीयाभ्यासजमात्मदर्शनमात्मोयग्रहं प्रसूते, तौ च तत्स्नेहम् स द्वेषादीनि । तदुक्तम्— इस पर धर्मकीति कहते हैं कि --- ' सभी राग आदि वास्रव ( धर्माधर्म ) प्रति पक्ष को सत्ता के कारण अतिशय उपचयोन्मुख तथा अपचयोन्मुख होते रहते हैं । प्रतिपक्ष के सभ्य अभ्यास से किसी चित्तसन्तान में ये आसन सर्वथा समाप्त भी हो सकते हैं ' । इस तरह के प्रहीण आस्रव वाले व्यक्ति को पहचानना कठिन है, क्योंकि दोप अति - ह्रास धर्मा जब होते हैं, अर्थात् कभी वे कम हो जाते हैं, और कभी बढ़ जाते हैं, तो वे अग्नि की ज्वाला के समान विपक्ष के अभिभव के उत्कर्ष और अपकर्ष के ही साधक होते हैं । क्योंकि ये दोष विकल्पों से पैदा होते हैं । उपादान के रहते हुए भी किसी विशेष मन में गुणों के अभ्यास से ये दोष क को प्राप्त करते हैं और अभ्यास में पटुत्व मा जाने के कारण इनका निरन्वय विनाश भी हो जाता है । जैसे कि अग्नि की ज्वाला अपने प्रतिपक्षी जल आदि पदार्थों की अधिकता होने पर अत्यन्त शान्त हो जाती है । जो वस्तु जिस वस्तु की संनिधि पाकर अपकर्षं की ओर बढ़ती है, वह उसकी अत्यन्त वृद्धि हो जाने पर अभिभूत होकर निरम्य विनाश को प्राप्त करती हैं, जैसे कि सलिल की अभिवृद्धि होने पर ज्वाला का निरन्वय विनाश हो जाता है | नैरात्म्य दर्शन के अभ्यास से इसी तरह स्वाभाविक रूप से दोष भी निरन्वय विनाश को प्राप्त करते हैं, अतः ऐसा कोई पुरुषश्रेष्ठ भी हो सकता है, जिसमें कि दोषों का सर्वथा प्रक्षय ( अभाव ) हो गया है । यदि उक्त प्रतिपादन में यह आपत्ति उठाई जाय कि दोषों का विपक्ष से सात्मभाव हो जाने पर प्रज्वलित वह्नि से भस्म हुए कमांकुर ( धान के पौधे ) की तरह निर्दोषता की कहीं स्थिति ही नहीं होगी, उसका कार्यक्षय होना तो बहुत दूर की बात है, तो यह आपत्ति दोषावह नहीं हैं । इसका उत्तर ऊपर कारिका में दिया गया है । इस कारिका का अभिप्राय यह है कि दोषों से अस्पृष्ट सिद्ध वस्तु विषयक ज्ञान का दोष सहित असिद्ध स्वभाव वाले विपर्ययों से बाघ नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि निरुपद्रव भूतार्थविषयक ज्ञान का ही पक्षपात करती है । एक बार जिसको रज्जु में सर्प के भ्रम की निवृत्ति हो गई, वह पुनः उस भ्रम में नहीं पड़ता । इसी तरह से दोषों से अनुपद्भुत स्वाभाविक मार्ग के एक बार खुल जाने पर पुनः दोषों की उत्पत्ति और उससे सात्मीभाव का अभिभव नहीं हो सकता, क्योंकि दोषों के प्रतिपक्षी गुणवान् नैरात्म्य मार्ग की तरफ बुद्धि का पक्षपात रहता है, अर्थात् बुद्धि इस मार्ग का अधिक संमान करती है, इस स्वाभाविक मार्ग की ओर ही झुकती है, वह दोषों के परिहाण ( नाश ) की ओर ही अधिक प्रयत्नशील रहती है । यह मैं हूँ, यह मेरा है, इस तरह का विचार करने वाले व्यक्ति को आत्मीय रूप से अभिमत वस्तु में स्नेह और अनभीष्ट वस्तु में द्वेष बुद्धि उत्पन्न होती है और जिसको यह आत्मा और आत्मीय दृष्टि बाधित नहीं करती, उसमें ये राग - द्वेष भी नहीं रहते । इसलिए समानजातीय अभ्यास से उत्पन्न आत्मदर्शन आत्मीय आग्रह को उत्पन्न करता है और इनसे स्नेहन्द्वेष आदि की सृष्टि

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३३४ वेदार्थपारिजातः सर्वासां दोषजातीनां जाति: सत्कायदर्शनात् । साऽविद्या तत्र तत् स्नेहस्तस्माद् द्वेषादिसंभव: । ( प्र ० वा ० ३।२२३ ) एवं सत्कायदर्शनजन्मनां दोषाणां तत्प्रतिपक्षनैरात्म्यदर्शनाभ्यासात् प्रहाणं भवति । प्रक्षोण-दोषस्य तथागतस्य लोकदुःखकातरस्योपदेश एवागम इति, तत्र, नैरात्म्यदर्शनाभ्यासस्य दोपक्षयहेतुत्वज्ञानेन नैरात्म्यदर्शनाभ्यासे प्रवृत्तिः नैरात्म्यदर्शनाभ्यासपरिपाके च दोषक्षयात्तज्ज्ञानोपपत्तिरित्यन्योन्याश्रयात् । अर्थात् धर्मानुष्ठानेन दोषक्षयात् सार्वश्यलाभः सार्वश्यलाभे च धर्मज्ञानमिति स्फुटोऽन्योन्याश्रयः । तथागतस्य मार्गलाभात् पूर्वमेव दोषक्षयोऽपेक्षित इति तद्धेतुत्वेनान्यस्यैव कस्यचिद्धर्मस्याभ्युपेतव्यत्वेनानादेर्वेदिकस्यैव धर्मस्य तद्धेतुत्वमभ्यु-पेतव्यम् । तथा च तदुपजीव्यस्य सार्वश्यस्य न तद्विरोधिमार्गभासकत्वं संभवत्युपजीव्यविरोधादेव | अपि च, आत्मा आत्मीयश्च कश्चन न विद्यते, सर्व क्षणिकं सर्व शून्यमित्यादिदर्शनमेव नैरात्म्यदर्शनम् । तच्च न दोषापनोदकम्, आत्मोच्छेदवादिनामपि तथात्वप्रसङ्गात् । विपरीतमेव तु दृश्यते । प्रवदन्ति खलु चार्वाका: --यावज्जीवेत्सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः । इदानीन्तनास्तु हत्वा हृत्वा सुरां पिबेदित्यपि वदन्ति । नित्यस्यैवात्मनः स्वर्गनरकादिसम्बन्धः सम्भाव्यते, तत एव स्वर्गादिजनके धर्मे प्रीतिः, नरकादिजनकेऽधमें विरतिः सम्भाव्यते । स्वाभाविको विषयेष्वभिष्वङ्ग आत्मपुरुषार्थप्रतिबन्धकत्वेन | तन्निरसनाय प्रयत्यते । नास्ति चेदात्मा कस्य पुरुषार्थोऽभिप्रेतः? दुःखनिवृत्तिरपि कस्याभिप्रेता? क्षणिकस्य किमुद्दिश्य विषयसुखतदभिष्वङ्गनिरसने प्रवृत्तिः स्यात्? होती है । जैसा कि इस कारिका में कहा गया है- ' सभी प्रकार के दोषों का जन्म सत्कायदर्शन अर्थात् आत्मा आत्मीय अभिनिवेश से होता है | यह सत्कायदर्शन हो अविद्या कहलाती है | इससे आत्मीय में स्नेह तथा विपरीत में द्वेष बुद्धि उत्पन्न होती है ' । इस सत्कायदर्शन से उत्पन्न हुए दोषों का नाश सत्कायदर्शन के प्रतिपक्षभूत नैरात्म्यदर्शन के अभ्यास से होता है । इस तरह से प्रक्षीण दोष वाले लोगों के दुःख से कातर भगवान् तथागत के उपदेश ही आगम है । धर्मकीर्ति का उपर्युक्त पूरा प्रतिपादन गलत है, क्योंकि नैरात्म्य-दर्शन के अभ्यास से दोषों का क्षय होता है, ऐसा ज्ञान होने पर तैरात्म्यदर्शन के अभ्यास में प्रवृत्ति होगी और नैरात्म्यदर्शन के अभ्यास के परिपक्व हो जाने पर दोषों का ज्ञान हो जाने पर उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होगी, इस प्रकार यहाँ पर परस्पराश्रय दोष उपस्थित है । अर्थात् धर्मानुष्ठान से दोषों के क्षीण होने पर सर्वज्ञता का लाभ होगा और सर्वज्ञता का लाभ होने पर धर्म का ज्ञान होगा, यहाँ स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय दोष है । तथागत बुद्ध के मार्गलाभ से पहले ही दोषों का क्षय अपेक्षित है, अतः इस दोषक्षय के कारण के रूप में उक्त धर्म से भिन्न किसी अन्य धर्म को ही कारण मानना पड़ेगा और यह अनादिसिद्ध वैदिक धर्म ही हो सकता है । इस तरह वैदिक धर्म को अपना आश्रय मानने वाली तथागत में वर्तमान सर्वज्ञता वेदविरोधी मार्ग की प्रकाशक कभी नहीं बन सकतो, क्योंकि इसमें उपजीव्य विरोध की आपत्ति उठ खड़ी होगी । उक्त सिद्धान्त को मानने में एक दूसरी आपत्ति भी है । सब कुछ क्षणिक है, सब कुछ शून्य है, इस तरह की दृष्टि ही नैरात्म्यदर्शन कही जाती है । इसके अनुसार आत्मा और आत्मीय यह कुछ भी नहीं है । तब यह दोषों के परिहारक कैसे हो सकते हैं । यदि ऐसा मान लिया जाय तो आत्मा का सर्वथा उच्छेद ( अभाव ) मानने वाले चार्वाकों में भी नैरात्म्यदर्शन के आधार पर दोषों का प्राण मानना चाहिए, किन्तु चार्वाक की दृष्टि इसके विपरीत हो देखने को मिलती हैं । उनका कहना है कि ' जब तक जीना है सुखपूर्वक जीना चाहिए, भले हो ॠण करके भी घी पीने को मिले । देह जब भस्म हो जायगा तो फिर उसको लौटकर थोड़े ही माना है । आजकल के नये चावकों का तो कहना है कि किसी को मारकर और लूट करके भी शराब पीनी चाहिए | are free rear को मानने पर ही उसका स्वर्ग, नरक आदि से संबन्ध संभव हो सकता है और ऐसा मानने पर ही स्वर्ग आदि के जनक धर्म में प्रीति एवं नरक आदि के जनक अधर्म से विरति ( वैराग्य = निवृत्ति ) हो सकती है नाना प्रकार के विषय में मन का लगाव स्वाभाविक है और यह आत्मा को पुरुषार्थ की प्राप्ति से रोकता है । मन की इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए ही प्रयत्न अपेक्षित रहता है । यदि आत्मा ही नहीं है तो यह पुरुषार्थं किसके लिए किया जाता है और किसकी दुःखनिवृत्ति अपेक्षित है? यदि इसको क्षणिक माना जाय तो किस उद्देश्य से विषय सुखों से इसके लगाव को रोकने की प्रवृत्ति होगी? क्योंकि यह तो स्वयं ही क्षणिक होने से अपने आप नष्ट हो जायगा ।

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वेदार्थपारिजातः ३३५ अपि च, कस्यचित्सर्वज्ञत्वसंभवेऽपि विशेषानिर्णय एव । तत्तदनुयायिसंमत सर्वज्ञत्वं तु समेव संप्रदाय-प्रवर्तकानाम् । सर्वसंमतं तु न कस्यचिदपि । समेषां सार्वये विप्रतिपत्तयो न भवेयुः । दृश्यन्ते च तास्तेषु । किञ्च, निरुपद्रवभूतार्थस्वभावत्वं ज्ञानस्य सत्तत्त्ववादिनां स्यादपि, सर्व क्षणिक सर्व शून्यमिति नैरात्म्य-वादिनां तु नैरात्म्यस्याभावपर्यवसायिनः कुतो भूतत्वं कुतस्तरां ज्ञानस्य भूतार्थस्वभावत्वं कुतस्तमां निरुपद्रवभूतार्थ-स्वभावत्वम् । तस्मादपौरुषेयत्वेन मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यैव प्रामाण्यमिति मन्तव्यम् । तत्र यथार्थप्रतिपादकत्वं शब्दस्य निसर्गसिद्धः स्वभावः । अयथार्थप्रतिपादकत्वं स्व t पाधिकम् | यथाऽऽलोकादिसहकारिसहकृतस्य चक्षुषो रूपाद्यवभासकत्वम्, तथैव विदितपदतदर्थथान्दन्याय सतत्त्वपुरुषापेक्षस्य शब्दस्यापि स्वार्थाववोधकत्वम् । तत्र पौरुषेयेषु शब्देषु वक्त्रधीनदोषोद्भवसंभवेऽपि तदभावादपौरुषेयेषु स्वत एय प्रामाण्यम् । तत एव बाघकारणदोषज्ञानाभावान्नाप्रामाण्यशङ्कापि । वेदादर्थावगतेरेव नानुत्पत्तिलक्षणमप्रामाण्यमपि शक्यशङ्कम्, संशयाप्रतिभासनात् । नापि संशयलक्षणस्याप्रामाण्यस्य संभावना । तदुक्तम्-तत्रापवादनिर्मुक्तिर्वक्त्रभावाल्लघीयसी । वेदे तेनाप्रमाणत्वं नाश कामपि गच्छति ॥ यत्सूक्तं प्रमाणान्तरसंवादाभावात वेदप्रामाण्यम्, तन्त्र, तस्यालङ्कारत्वेनादोषात् । अनधिगतगन्तृत्वेन खलु प्रमाणानां प्रमाणत्वम्, अन्यथाऽनुवादकत्वेनाप्रामाण्यापातात् । तथापि नान्यप्रमाणैर्वेदार्थस्याग्रहेणाप्रामाण्यम्, दूसरी बात यह है कि कोई एक सर्वज्ञ हो भी सकता है, किन्तु व्यक्तिविशेष की सर्वज्ञता का निर्णय होना कठिन है । सभी सम्प्रदायों के प्रवर्तक महापुरुषों को उनके अनुयायी सर्वज्ञ मानते हैं । सर्वसंमत सर्वज्ञता किसी में नहीं है । यदि सभी सर्वज्ञ ' माने जायें तो इनसे परस्पर विरुद्ध बातें नहीं होनी चाहिए, किन्तु सभी सर्वज्ञ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत बातों का उपदेश देते देखे गये हैं । अपि च तत्तत्त्ववादी दार्शनिकों के मत में ज्ञान की मिरुप वास्तविक स्वभावता मानी जा सकती है | सब कुछ क्षणिक है, सब कुछ शून्य है, इस तरह के नैरात्म्यवाद को मानने वाले बौद्ध दार्शनिकों के मत में वास्तविकता, ज्ञान को वास्तविक वस्तुस्वभावता और free वास्तविक स्वभावता का प्रसंग ही कहाँ उठ सकता है, क्योंकि नैरात्म्यदर्शन का अभाव में हो तो पर्यवसाय होता है । अतः ब्राह्मणात्मक अरुषेय वेद को ही प्रमाण माना जा सकता है । प्रभृति सहकारी कारणों से शब्द की यथार्थ प्रतिपादकता उसका निसर्गसिद्ध स्वभाव है । उसकी अयथार्थ प्रतिपादकता औपाधिक है । जैसे प्रकाश संयुक्त चक्षु रूप आदि का अवभासक ( ज्ञान कराने वाला ) हाता है, उसी तरह से शब्द भी अपने अर्थ को जब कि पुरुष को पद पदार्थ, शाब्दन्याय आदि का भली भांति ज्ञान हो । अर्थात् अर्थ के प्रकाशन सहायक होते हैं, जैसे कि रूप आदि के प्रकाशन में प्रकाश चक्षु का सहायक होता है । पौरुषेय शब्दों में जाने की संभावना रहती है, अपौरुषेय वेद में इनका सर्वथा अभाव है, अतः वेद का स्वतः प्रामाण्य प्रकाशित करने में समर्थ है, में ये शब्द के उसी प्रकार से afr ष्ठ दोषों के उन्न हो सिद्ध हो जाता है | इसलिए वेद में बाघ के कारण दोषज्ञान के सर्वथा अभाव रहने से अप्रामाण्य को आशंका भी नहीं उठेगी । वेद से a का ज्ञान हो जायगा, इसीलिए अनुत्पत्ति रूप अप्रामाण्य की भी वहीं प्रसक्ति नहीं होगी, क्योंकि वहाँ संशय उत्पन्न हो नहीं होगा, अतः संशयप्रयुक्त अप्रामाण्य की भी संभावना नहीं करेगी । यही बात इस कारिका में कही गई है ---' वेद में सभी प्रकार के अपवादों, आक्षेपों का परिहार बड़ी सरलता से इसलिए हो जायगा कि इसका कोई वक्ता नहीं है । aar के अभाव के कारण हो इसमें वक्तुनिष्ठ दोषों का परिहार स्वतः हो जाता है । इसी कारण से वेद में अप्रामाण्य की कोई आशंका

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३३६ रसस्य रसनैकग्राह्यस्येव तदुपपत्तेः । तदुक्तम् — बदार्थपारिजातः न चान्यैरग्रहेऽर्थस्य स्यादभावो रसादिवत् । तद्धियैवार्थबोध श्वेत्तादृग्वर्मे भविष्यति || ममासिद्धमितीयं चेद्वेदाज्ज्ञातेऽवबोधने । वक्तुं न द्वेषमात्रेण युज्यते सत्यवादिना || इति । अत्र धर्मकीर्तिः-fri सत्यत्वहेतुनां गुणानां पुरुषाश्रयाद् । अपौरुषेयं मिथ्यार्थं किन्नेत्यन्ये प्रचक्षते || ( प्र ० वा ० ३।२२६ ) गिरां सत्यत्वहेतूनां गुणानां पुरुषाश्रयत्वेनापौरुषेयेषु वाक्येषु पुरुषनिवृत्त्या गुणनिवृत्तेस्तत्काय्र्यस्य सस्यत्वस्यापि निवृत्तिरिति तदभिमानः । अथवा पुरुषनिवृत्त्या सत्यार्थत्वमिथ्यार्थत्वयोनिवृत्त्याऽऽनर्थक्यादनुत्पत्ति-लक्षणमेवाप्रामाण्यम् । यथा रागादिमान् मृषावादी दृष्टस्तथा दयाधर्मादिमान् सत्यवाक् । तेन यथा वचनस्य पुरुषाश्रयान्मिथ्यार्थता तथा सत्यार्थतापि । नहि शब्दाः स्वतोऽर्थवन्तः, समयसापेक्षत्वात् । समये तदिच्छाप्रणयनात्, निसर्गसिद्धेविच्छा-वशात् प्रतिपादनात् तेन पुरुषसंस्कारादर्थवन्तः स्युः । संस्कार्य्यतॆव चैषां पौरुषेयता, नोत्पत्तिः । तत एवार्थविप्रलम्भात् । उत्पन्नोऽप्यन्यथा समितो नोपरोधी । यथा शब्दादन्यः पुरुषधर्म उन्मेषनिमेषादिः स्वतोऽनर्थकोऽपि यथाभावं पुरुषेण समितो न विप्रलम्भकस्तद्वत् । नहीं उठ सकती ' | यह कहना भी गलत है कि किसी अन्य प्रमाण से वेद प्रतिपादित सिद्धान्तों की पुष्टि न हो पाने से वे अप्रमाण है, क्योंकि यही तो वेद का वैशिष्टय है । वेद के लिए यह दूषण न होकर भूषण है कि वेद प्रतिपादित सिद्धान्तों तक अन्य प्रमाण पहुँच हो नहीं पाते । प्रमाणों की प्रमाणता इसी में हैं कि वे सर्वथा नवीन, पूर्वकाल में अन्य किसी प्रमाण से अनधिगत ( अज्ञात ) वस्तु की अधिगति ( ज्ञान ) करावें । ऐसा न होने पर वे अनुवादकमात्र, अत एव अप्रमाण मान लिए जायेंगे | अतः अन्य प्रमाणों से वेदार्थ " के अधिगत न होने पर भी उनमें अप्रमाणता नहीं आयेगी । रस जैसे केवल रसनेन्द्रिय से गृहीत होता है, उसी तरह से वेदार्थ भी केवल वेद से ही अधिगत होता है, इसमें क्या आपत्ति हो सकती है । यही बात निम्न कारिकाओं में भी कही गई हैं--' ater प्रमाणों से वेदार्थ की प्रतिपत्ति नहीं है तो इससे उसका अभाव नहीं मान लिया जायगा । इसकी उपपत्ति उसी प्रकार की जा सकती हैं, जैसे कि रस की अन्य प्रमाणों से प्रतिपत्ति न होने पर भी केवल रसनेन्द्रिय से भी उसकी उपपत्ति मानी जाती हैं । वेद से ही शब्दार्थ की उपपत्ति मान लेने से धर्म - अधर्म आदि का ज्ञान भी उसी से हो सकेगा । यदि आप कहें कि हम इसको नहीं मानते तो आपका यह कथन केवल द्वेष प्रयुक्त है, क्योंकि वेद से जब आपको भी शब्दार्थ का ज्ञान होता है तो आपकी इस तरह की उक्ति सही नहीं मानी जा सकती ' । इस पर धर्मकीर्ति का कहना है कि ' वाणी की सत्यता के कारण पुरुषाश्रित दया, धर्म आदि गुण है, अतः अपौरुषेय aran में इनका अभाव होने से वेदवाक्य मिथ्या वस्तु का प्रतिपादन करते है, ऐसा बौद्धों का कहना है ' । वाणी की सत्यता के कारणभूत गुण पुरुष में रहते हैं । अपौरुषेय वाक्यों में पुरुष की निवृत्ति के साथ गुण भी जब निरस्त हो जाते हैं तो उनके कार्य सत्यता की भी निवृत्त हो ही जायगी, ऐसा बौद्धों का कहना है । अथवा पुरुष की निवृत्ति के साथ ही सत्यार्थत्व और मिध्यार्थत्व दोनों की निवृत्ति हो जाने से अब कोई प्रयोजन नहीं बचता, अतः अपौरुषेय वाक्यों को अनर्थकता के कारण अनुत्पत्ति लक्षण अप्रामाण्य वेद में माना जायगा । जैसे राग आदि से युक्त व्यक्ति मिथ्यावादी देखा जाता है, उसी तरह से दया, धर्म आदि से युक्त व्यक्ति सत्यवादी देखा जाता है | अतः वाणी की मिथ्यार्थता की तरह सत्यार्थता भी देखी गई है और वह पुरुषाश्रित ही है । शब्द स्वयं अर्थ वाले नहीं होते, क्योंकि उनको समय ( संकेत ) की अपेक्षा रहती है । समय में पुरुष की इच्छा का अनुसरण करना पड़ता है, अर्थात् स्वभावसिद्ध शब्दों का पुरुष की इच्छा के अधीन प्रयोग होता है, अतः पुरुष के संस्कार से ही शब्द अर्थवान होते हैं । शब्दों की यह संस्कार्यता ही पौरुषेयता कहलाती है, उत्पत्ति नहीं । शब्दों की उत्पत्ति मानने से ही उनमें विप्रलम्भकता या सकती हैं । उत्पन्न होने पर भी यदि वह अन्य प्रमाण से सिद्ध हैं तो वह शब्द विप्रलम्भक नहीं होगा | जैसे शब्द से भिन्न उन्मेष, निमेष आदि पुरुष धर्म स्वतः अनर्थक होते हुए भी पुरुष के अभिप्राय से संयुक्त होकर विलम्भक नहीं होते, उसी तरह से यहां भी समझना चाहिये ।

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वेदार्थपारिजातः ३३७ तदेतदपेशलम्, पौरुषेयापौरुषेयसाधारणस्य वाक्यस्यार्थबोधकत्वोपपत्तौ तत्र पौरुषेयत्वस्य अप्रयोजक-त्वात्, गौरवाच्च । नहि वाक्यं पौरुषेयत्वज्ञानसापेक्षमर्थावबोधकं तद्धीनानामप्यर्थाविवोधदर्शनात् । यदप्युक्तं न शब्दाः प्रकृत्यार्थवन्तः, समयात् ततोऽर्थख्यातेरिति, तदप्यकिञ्चित्करम्, प्रकाशसापेक्षस्येन्द्रियस्येव संकेतसापेक्षस्य तस्य atres पि तत्प्रामाण्यानपायात् । यत्तूक्तम् — प्रदीपेन्द्रयोः प्रत्येकमभावेऽप्यर्थप्रकाशकत्वाभावात् तत्रान्योऽन्यापेक्षत्वं युक्तम्, नैवं शब्द-संकेतयोस्तत्र संकेतमात्रेणैवार्थप्रतीतेरुत्पत्तेरिति तदप्यविचारितरमणीयम्, निराश्रयस्य संकेतस्य बोधकत्वानुपपत्तेः । अस्माच्छन्दादयमर्थो बोधव्य इति सङ्केतस्य शब्दनिष्ठत्वात् । अभिप्रायविशेषस्यापि तस्य निर्विशेषत्वानुपपत्त्या शब्दसापेक्षत्वानपायात् । यदपि च वर्णानामवाचकरूपत्वं प्रत्येकं समस्तानाश्चावाचकत्वात् । वर्णरूपश्च वेद इति कथमतोऽर्थज्ञान-मिति, तत्तुच्छस्, पूर्वपूर्व वर्णाहित संस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य प्रत्यायकत्वे बाधाभावेन वर्णात्मकस्यापि वेदस्य प्रत्याय-कत्वोपपत्तेः । तस्माद्यथा चक्षुरादीनां स्वभावतः स्वविषयप्रत्यायकत्वम्, तथैव शब्दस्याऽपि तदव्याहृतम् । सहकारिसापेक्षता तुभयत्र समानैव । अत एवाग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम इत्यादिवाक्येष्वग्निहोत्रादेः स्वर्गादिसाधनत्वं प्रतीयत एवेत्यनु-त्यत्तिलक्षणमप्रामाण्यमित्यसंगतमेव । यत्तूक्तम् - केवलं प्रतीतिप्रतीतेर्बाधिका, न तु मिथ्यात्वस्य, तस्यापि प्रतीतेः । तेन किमेभिर्वाक्यैरग्निहोत्रादिः स्वर्गसाधनानुपाय एवोपायतया प्रदर्श्यतेऽथोपाय एवेति मिथ्यात्वाशङ्का न निवर्तते, बाधकप्रमाणाभावात्, पौरुषेयत्वस्य क्योंकि वाक्य पौरुषेय हो या अपौरुषेय उससे अर्थ का बोध जब हो सकता है, तो उसमें ऐसा मानने में गौरव भी है । वाक्य को अर्थ का बोध कराते समय पौरुषेयत्व ज्ञान की उससे अर्थ का बोध हो जाता है | यह कहना कि शब्द स्वभावतः अर्थवान् नहीं होते, प्रतीति होती है, इसलिए व्यर्थ है कि जैसे इन्द्रिय प्रकाश की सहायता से अर्थ का उसी तरह से शब्द संकेत की सहायता से अर्थ का प्रकाश करते हुए भी अप्रमाण यह पूरा कथन ठीक नहीं है, पौरुषेयत्व को प्रयोजक नहीं माना जा सकता, अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि उसके बिना भी किन्तु समय ( संकेत ) के अनुसार उनसे अर्थ की प्रकाश करते हुए भी अप्रमाण नहीं मानी जाती, नहीं माना जायगा | यह कहा गया है कि प्रदीप और इन्द्रिय में से किसी एक की अनुपस्थिति में अर्थ का प्रकाश नहीं होता, अतः यहाँ पर एक को दूसरे की अपेक्षा उचित है । इस तरह की स्थिति शब्द और संकेत की नहीं है, क्योंकि वहाँ पर केवल संकेत से ही अर्थ की प्रतीति हो सकेगी । यह कहना भी इसलिए अविचारित रमणीय है कि शब्दरूप आश्रय से रहित संकेत को बोधकता किसी प्रकार से भी नहीं बन सकती । इस शब्द से इस अर्थ को जानना चाहिए, इस तरह का संकेल शब्दों में हो तो रहता है । पुरुष में रहने वाले इस अभिप्राय विशेष को संकेत मानने पर भी वह निर्विशेष नहीं माना जा सकता, अतः इसकी शब्द सापेक्षता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । यह भी कहा गया है कि वर्णों की वाचकता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि वर्ण प्रत्येक या समस्त किसी भी रूप में aras नहीं हो सकते । वेद भी वर्णरूप ही है, इसलिए उससे अर्थज्ञान कैसे होगा? यह प्रश्न भी बहुत ही निम्न कोटि का है, क्योंकि पूर्व पूर्व वर्णों के द्वारा स्थापित संस्कारों के साथ विद्यमान अन्तिम वर्ण अर्थ का प्रत्यायक निराबाध रूप से होता है, are after वेद की अर्थप्रत्ययकता में कोई बाधा नहीं है । इसलिए जैसे चक्षुरादि इन्द्रियाँ स्वभावतः अपने विषय का ज्ञान कराती है, उसी तरह से शब्द को भी अर्थबोधकता में कोई बाधा नहीं है । सहकारी की अपेक्षा दोनों हो स्थलों में समान रूप से विद्यमान है । इसलिए ' स्वर्ग की कामना वाला अग्निहोत्र करे ' इत्यादि वाक्यों से अग्निहोत्र की स्वर्गसाधनता प्रतीत होती है, अतः यहाँ पर अनुत्पत्ति लक्षण अप्रामाण्य की आपत्ति उठाना असंगत ही है । यह कहना कि ' केवल प्रतीति अप्रतीति की ही बाधक हो सकती है, यह मिथ्यात्व का बाघ नहीं कर सकती, क्योंकि मिथ्यात्व भी एक प्रकार की प्रतीति ही है । अतः वेद वाक्यों से अग्निहोत्र आदि कर्म स्वर्ग आदि के उपाय न होते हुए भी प्रतिपादित ४३

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३३८ daruttare: मिथ्यार्थत्वे विरोधाभावाच्चेति, तदप्युपहासास्पदम्, कारणदोषवाधकज्ञानाभावेन प्रतीते प्रामाण्यशङ्कानुदयेनान-पोदितस्य स्वतः प्रामाण्यस्यावस्थानात् । मिथ्यार्थत्वशङ्का बाधकप्रमाणसद्भावात् कारणदोषज्ञानाद्वा वक्तव्या । बाधकप्रमाणसद्भावश्चेत् स एव प्रदश्यताम् । अतीन्द्रियेऽर्थे न स दर्शयितुं शक्यः । कारणदोषास्तु पौरुषय एव सम्भवन्ति, अपौरुषेये तु कारणाभावादेव निराश्रया दोषा कथं स्युः । अत एव विरोधाभावोक्तिरप्यसमञ्जसा । प्रमाणानां प्रामाण्य-स्वतस्त्वाभ्युपगमेनानपेक्षमेव वेदानां प्रामाण्यमिति तद्विरुद्धमिध्यार्थत्वशङ्कायाः कुतो न निवृत्तिः? यच्चोक्तमपौरुषेयाणां ज्योत्स्नादीनां शुक्लवस्त्रादौ पोतज्ञानहेतुत्वदर्शनेना पौरुषेयाणां वितथज्ञानहेतुत्वं दृष्टमेवेति तत्र तत्र ज्योत्स्नादित्वेनैव ज्योत्स्नादीनां शुक्लवस्त्रादौ पीत भ्रमहेतुत्वं नापौरुषेयत्वंन, तस्थातन्त्रत्वात् । अन्यथाकाशस्यापि तद्धेतुत्वं स्यात् । नापि ज्योत्स्नादीनामपौरुषेयत्वम्, ज्योत्स्नादीनामपि परमेशनिर्मितत्वेन पौरुषेय-त्वानपायात् । न चैवं वेदेऽपि तदिति शङ्कनीयम्, तस्य नित्यत्वात् । क्वचिदोश्वरकतृ कत्वस्मरणं तु प्रतिकल्पं सम्प्रदाय-प्रवर्तकत्वमात्रेण तदुपक्षीणत्वात् । ' अनादिनिधना नित्या ', ' बाचा विरूपनित्यया ' इति श्रुतिस्मृत्यादीनां जागरूकत्वात् । datta पौरुषेयत्वेन प्रामाण्यम्, प्रामाण्यस्वतस्त्वाम्युपगमात् । तत्र कारणदोषशङ्काया निराकरण एवापौरुषेयत्व-स्योपयोगात् । ज्योत्स्नादीनां तु प्रामाण्यमपि नास्ति, कुतस्तरां तत्स्वतस्त्वसंभावनापि । कल्पादावीश्वरेणापि सूक्ष्म-रूपेणावस्थितानां तेषां संप्रदायः प्रवर्त्यते पूर्वोच्चारणापेक्षोच्चरितत्वानपायात्, स्वतन्त्रोच्चरितत्वे प्रमाणान्तरेणार्थ-मुपलभ्य विरचितत्वे वा मानाभावात् । हो रहे हैं, अथवा वस्तुतः ये स्वर्गादि के उपाय हैं, इस प्रकार की उनमें मिथ्यात्व की आशंका होने पर उसकी निवृत्ति नहीं हो पाती, क्योंकि इस तरह की आशंका के बाधक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं | पौरुषेयत्व और मिथ्यात्व में कोई विरोध भी नहीं हैं ' | किन्तु यह कथन भी इसलिए उपहासास्पद है कि कारण दोष और बाधक ज्ञान के अभाव में प्रतीति के अप्रामाण्य की आशंका की उत्पत्ति ही नहीं होती, अतः उक्त वेब वाक्यों का स्वाभाविक स्वतः प्रामाण्य कोई हटा नहीं सकता, प्रत्युत वह ज्यों का त्यों बना रहता है । मिध्यार्थस्व की आर्यका तभी रह सकती है, जब कि बाधक प्रमाण उपस्थित हो, अथवा कारण में किसी दोष की प्रतीति होती हो । यदि आपके पास कोई बाधक प्रमाण हो तो उसको बताइये! अतीन्द्रिय अर्थ में आप दोष दिखा हो नहीं सकते, क्योंकि उसमें आपके प्रत्यक्ष वादि प्रमाण प्रवृत नहीं हो सकते | कारण दोष शब्द को पौरुपेय मानने में ही उठ सकते हैं, अपौरुषेय शब्द का जब कोई कारण ही नहीं हैं, तब कारणनिष्ठ दोष बिना आधार के कहाँ रहेंगे? इसीलिये पौरुषेयत्व और मिध्यात्व में विरोधाभाव बताना भी असमंजस है । प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध माना गया है, अतः वेदों का प्रामाण्य किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखता, ऐसी परिस्थिति में प्रामाण्य के विपरीत मिध्यार्थस्त्र की आशंका की निवृत्ति क्यों नहीं मानी जायगी? यह भी कहा गया है कि अपौरुषेय ज्योत्स्ना ( चांदनी ) प्रभूति पदार्थ शुक्ल वस्त्र में पीत ज्ञानरूप भ्रमात्मक ज्ञान के कारण बनते देखे जाते हैं, अतः अपौरुषेय पदार्थ भी मिथ्याज्ञान के हेतु हो सकते हैं । यह कथन भी इसलिए गलत है कि ज्योत्स्ना प्रभृति पदार्थ अपने स्वरूप ' ही शुक्ल वस्त्र में पीत वस्त्र के भ्रमात्मक ज्ञान के निमित्त बनते हैं, उसमें अपोरुषेयत्न की प्रयोजकता ( कारणता ) नहीं मानी जा सकती । अन्यथा आकाश को भी उस भ्रमात्मक ज्ञान का हेतु मानना पड़ जायगा । दूसरी बात ज्योत्स्ना प्रभृति पदार्थ अपौरुषेय है भी नहीं, क्योंकि ये ईश्वर के द्वारा निर्मित हैं, अतः पौरुषेय ही हैं । इसी उदाहरण से वेद को भी पौरुषेय नहीं सिद्ध कर सकते, क्योंकि वेद नित्य है । कहीं - कहीं ऐसा सुना जाता है कि वेद ईश्वर के द्वारा निर्मित है, किन्तु उसका यही अभिप्राय है कि प्रत्येक कल्प में ईश्वर पूर्वकल्प के वेदों का स्मरण कर इस कल्प में भी वैदिक सम्प्रदाय की प्रवृत्तिमात्र कराता है । ' यह वेदवाणी अनादि, अनन्त और नित्य है ', ' अनादि वेदवाणी से स्तुति करो ' इत्यादि श्रुति और स्मृतिवचन इसी बात का प्रतिपादन करते हैं । सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः माना गया है, अतः वेदों का प्रामाण्य उसकी अपौरुषेयता के कारण ही है । यहाँ पर अपरुषेयता का उपयोग इतना ही है कि इससे कारणगत दोष की आशंका निराकृत हो सके । ज्योत्स्ना प्रभृति पदार्थों का तो प्रामाण्य भी नहीं है, तब प्रामाण्य स्वतस्त्व की बात ही कहाँ उठती हैं । कल्प के प्रारम्भ में ईश्वर भी सूक्ष्म रूप से अवस्थित वेदों के सम्प्रदाय को ही प्रवृत्त कराते हैं, क्योंकि पूर्व कल्प के उच्चारण में और इस कल्प के उच्चारण में रंचमात्र भी अन्तर नहीं रहता । ईश्वर

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वैवार्थपारिजातः ३३६ यदप्युक्तम् - रसादिज्ञानानां तृप्त्यादिकार्य्याविसंवादादेव प्रथमं प्रामाण्यनिश्वयः, अभ्यदा त्वभ्यासादिना स्वत एव प्रामाण्यनिश्चयो युक्त इति न मिथ्यात्वशङ्का । वेदे तु नैव कदाचिदप्यविसंवादः प्रतिपन्न इति कथमन्यदापि स्वतः प्रामाण्यनिश्चयः । तेन सत्यपि विज्ञाने प्रतिभादेरिव हि स्वातन्त्र्यान्न प्रमाणत्वमिति, तदतीव तुच्छम् तृप्त्यादिकार्यस्य रसगन्धादिमद्द्रव्यसाधारण्यप्रयुक्तत्वेन रसज्ञानप्रामाण्यं प्रत्यप्रयोजकत्वात् । सर्पदष्टस्य निम्बादिमाधुर्य्यभ्रमेणापि तृप्तिः संभवति । इदानीन्तनतत्तद्रव्यसारमयसूक्ष्मगुटिकादिभी रसादिनंरपेक्ष्येणैत्र तृप्तिर्भवत्येवेति न तृप्तिकार्येण रसज्ञानस्य प्रामाण्यनिश्चयः । रसज्ञानस्याभ्यासादिना प्रामाण्यं चेदत्रापि तस्य तुल्यत्वात् । वेदवाक्यैर्वेदार्थज्ञानस्याभ्यासस्तु सुलभ एव । स्वतः प्रामाण्यभावानां रसज्ञानानां बाघकारणदोषज्ञानाभावादेव चाप्रामाण्यशङ्कापवादः । यदि सर्वमेव ज्ञानं स्वविषयतथात्वावधारणाय स्पष्टमसमर्थं ज्ञानान्तरमपेक्षेत, ततः कारणसंवादक्रियाज्ञानान्यपि स्वविषयभूतगुणावधारणे परमपेक्षेरन् । अपरमपि तथेति न कश्चिदर्थो जन्मसहस्रेणाप्यध्यवसीयेतेति प्रामाण्यमेवोत्सीदेत् । नन्वर्थीक्रयाज्ञानं स्वतः प्रमाणमिति चेन्न विशेषाभावात् । न चाव्यभिचारो विशेषस्वप्नावस्थायामसत्य-प्युदाहरणेऽर्थक्रिया विज्ञानदर्शनात् । न च सुखज्ञानमेवार्थक्रिया, तच्चाव्यभिचाय्यैव, नासति सुखे सुखज्ञानं भवति, तथापि न तेन पूर्वज्ञानस्य प्रामाण्यनिर्णयः, अप्रामाणेनापि प्रियासंगमविज्ञानेन स्वप्नावस्थायां सुखदर्शनात्, रेतश्च्यु-त्यादिकार्यकरत्वदर्शनाच्च तस्मात् स्वत एव प्रामाण्यं ज्ञानानाम् । अर्थान्यथात्वकारणदोषाभ्यां तदपोद्यते । इस कल्प में स्वतन्त्र रूप से, पूर्व कल्प के उच्चारण को बिना अपेक्षा किये वेदों की रचना करता है, अथवा प्रमाणान्तर से वेदार्थ को जानकर तब वेद की रचना करता है, इस बात में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है । यह भी कहा जाता है कि रस आदि ज्ञान पहले तभी प्रमाण माने जाते हैं, जब कि उनसे तृप्ति आदि कार्य का विसंवाद न हो, अर्थात् रस आदि ज्ञान के बाद नियमतः तृप्ति आदि प्रयोजनों की सिद्धि होती हो । बाद में अभ्यास नादि से स्वतः प्रामाण्य का नि हो सकता है, तब मिथ्यात्व की शंका उसमें नहीं रहेगी । वेद में तो अविसंवाद कभी भी प्रतीत नहीं हो सकता, तब वहाँ पर बाद में स्वतः श्रामाण्य का निश्चय कैसे हो सकता है । विज्ञान माने जाने पर भी जैसे प्रतिभा प्रभृति को स्वतन्त्र रूप से प्रमाण नहीं माना जाता, उसी तरह देव को भी स्वतन्त्र प्रमाण नहीं मान सकते ' । किन्तु यह कथन भी तुच्छ हैं, क्योंकि तृप्ति आदि कार्य रस गन्धादि से युक्त द्रव्यों द्वारा समान रूप से प्रयुक्त है, अतः वह रस ज्ञान के प्रामाण्य के प्रयोजक नहीं हैं । सर्पदष्ट व्यक्ति को निम्बादि वृक्ष में भी माधुर्य श्रम से तृप्ति होती है । आजकल उनन्दन थ्यों के सार तत्व को लेकर बनाई गई छोटी - छोटी गोलियों से बिना रस के भी तृप्ति होती देखी गई है, अतः तृप्ति कार्य से रस ज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय नहीं हो सकता | रस ज्ञान का प्रामाण्य अभ्यास आदि से होगा, तो वही स्थिति यहाँ पर भी मान ली जायगी । वैदिक वाक्यों से वेदार्थ का ज्ञान और उसका अभ्यास सुलभ है । स्वतः श्रामाण्य रूप में अंगीकृत रसादि ज्ञानों का बाघ के कारणभूत दोष ज्ञान का अभाव रहने पर ही अप्रामाण्य शंका का निवारण हो सकता है । यदि सभी ज्ञान अपने विषय को यथार्थता के वधारण के लिए स्वयं असमर्थ होकर ज्ञानान्तर की अपेक्षा रखे तो कारण संवाद क्रियाज्ञान भी अपने विषयभूत गुणों के अवधारण के लिए दूसरे की अपेक्षा रक्खेंगे, उनको भी दूसरे की अपेक्षा रहेगी, इस तरह से सैकड़ों जन्मों में भी कोई अर्थ सिद्ध न हो सकेगा और इस तरह से प्रामाण्य हो उत्सन्न हो जायगा । अर्थक्रिया ज्ञान को भी स्वतः प्रमाण नहीं मान सकते, क्योंकि उसमें ऐसी कोई विशेषता दृष्टिगोचर नहीं होती । यह विशेषता अर्थक्रिया का अव्यभिचार नहीं मानी जा सकती, क्योंकि स्वप्नावस्था में जलाहरण क्रिया के बिना भी तृप्ति रूप प्रयोजन की सिद्धि देखी जाती है । वहाँ पर मुख्य ज्ञान को हो अर्थक्रिया मानेंगे, वह वहाँ अव्यभिचरित रूप से विद्यमान है, सुख के न रहने पर भी सुखज्ञान नहीं हो सकता, यह आप कह सकते हैं, किन्तु इससे भी पूर्वज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय नहीं होगा, क्योंकि स्वप्ना-वस्था में अप्रामाणिक प्रयासंगम के विज्ञान से भी सुखलाभ होता है और वीर्यक्षरण आदि अर्थक्रिया भी देखी जाती है । इसलिए ज्ञानों का प्रामाण्य स्वतः ही मानना पड़ेगा | अर्थ की अन्यथा स्थिति होने पर अथवा किसी कारणगत दोष के द्वारा ही वह प्रामाण्य अपनोदित ( ट ) हो सकता है ।

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३४० वेदार्थपारिजातः यदप्युक्तम् P - चोदनार्थज्ञानस्याविद्यमानोपलम्भवरूपत्वाद् मिथ्यात्वम्, कार्यार्थे वेदस्य प्रामाण्यमिष्यते, स चानुष्ठेय एवेति भावित्वेनाविद्यमानत्वास चोदनाकालभावी । तस्मादविद्यमानोपलम्भनत्वान्मिथ्यात्वमिति, तदव्यज्ञान-विजृम्भितम्, अतीतानागतज्ञानानामविद्यमानविषयकत्वेऽपि यथा प्रामाण्यमव्याहतं तथैव चोवनार्थज्ञानस्याविद्यमान-विषयकत्वेऽपि प्रामाण्यानपायात् । अपरोक्षज्ञानस्यैव वर्तमानविषयत्वनियमात् । वस्तुतस्तु फलवनिश्चितार्थावबोधक-For कार्थस्यैव सिद्धार्थकस्यापि वेदस्य प्रामाण्याभ्युपगमेन तददोषात् । यदप्युक्तम् — लोकवेदयोर्वर्णा: पदानि चाभिन्नान्येव, वाक्यभेदस्तु केवल मिष्यते, लोके च पदानामर्थ: संकेत-वशाद् गृह्यते, तेन वैदिकपदानामपि पौरुषेय एवार्थः । एवं लौकिकपदार्थद्वारेण वैदिकवाक्यार्थावगम इति पौरुषेय एवा-सौ लोकिक वाक्यवत् । लोके च पदान्यनेकार्यानीति वैदिकवाक्यस्याप्यनेकार्थत्वसंभवाद् विपरीतार्थाशङ्का न निवर्तते, तदप्यकिञ्चित्करम्, वर्णानां पदानाञ्च नित्यत्वेन पदपदार्थ सम्बन्धस्य चौत्पत्तिकत्वाभ्युपगमेन पदपदार्थसम्बन्धस्याप्य-पौरुषेयत्वेन तददोषात् । त्रेधा हि पुरुषानुप्रवेश: संभवति -- पदपदार्थसम्बन्धद्वारेण, वाक्यवाक्यार्थसम्बन्धद्वारेण, ग्रन्थैस्यव वा भारतादिवत् पौरुषेयत्वेन । वेदे न तत्त्रयमप्यस्ति 1 । पदपदार्थ सम्बन्धस्य नित्यत्वमेव मीमांसायामीत्पत्तिकशब्देनोक्तम् । शब्दादनन्तरमर्थप्रतीतेः प्रत्याय्यप्रत्यायकत्वलक्षणः संज्ञासंज्ञिलक्षणो वा सम्वन्धः शब्दार्थयोरीत्पत्ति एव । न चात्र शब्दादभिप्रायानुमानम्, अभिप्रायशून्यैरपि स्वापाद्यवस्थायां परवशप्रयुक्तैरपि शब्देरर्थप्रतिदर्शनात् । अत एव यह भी कहा गया है कि ' विधि वाक्य के द्वारा अविद्यमान अर्थ के ज्ञान की उपलब्धि होती है, अतः यह मिथ्या है | कार्यार्थ में ही वेद का प्रामाण्य माना जाता है । उसका अभी अनुष्ठान करना है, अतः यह भावी है, अभी विद्यमान नहीं है । इसलिए वह fafararas रूप उपदेश काल में नहीं रह सकता । इस प्रकार अविद्यमान का उपलम्भक वैदिक विधिवाक्य सिया है ' | किन्तु यह कथन भी वक्ता के अज्ञान को हो उजागर करता है । अतीत और अनागत विषयक विज्ञान जैसे विषय की अविद्यमानता में भी अव्याहत रूप से प्रमाण माना जाता है, उसी तरह से विधिवाक्य प्रतिपादित अर्थज्ञान का प्रामाण्य भी विषय को अविद्यमानता में व्याहत नहीं होगा । विषय की वर्तमानता का नियम केवल प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए ही है । वस्तुतः फलयुक्त निश्चित अर्थ के अवबोधक होने के कारण कार्यार्थिक वेद वाक्यों की तरह सिद्धार्थक वेद वाक्यों का भी प्रामाण्य स्वीकृत है और इस तरह से आपके उठाये दोष की वहाँ प्रसक्ति ही नहीं होगी । यह भी कहा गया है कि ' लोक और वेद में वर्ण और पद एक ही है, केवल वाक्यों का भेद माना जा सकता है । लोक में पदों का अर्थ संकेत से गृहीत ( ज्ञात ) होता है । इससे वैदिक पदों का भी अर्थ पौरुपेय हो माना जायगा । इसी तरह से लौकिक पदार्थ के द्वारा ही वैदिक वाक्यों को भी अर्थ का ज्ञान होने से लौकिक वाक्य की तरह वैदिक वाक्य भी पौरुषेय ही मानें जायेंगे । लोक में पदों के अनेक अर्थ होते हैं, उसी न्याय से जब वैदिक पदों के भी अनेक अर्थ होंगे तो इस परिस्थिति में विपरीत अर्थ की भी संभावना बनी रहेगी ' । किन्तु इस कथन में भी कुछ दम नहीं है, क्योंकि वर्णों और पदों की नित्यता मानी जाती है । और पद एवं पदार्थों का संबन्ध औत्पत्तिक ( स्वाभाविक ) माना जाता है, इस परिस्थिति में पद एवं पदार्थ का संबन्ध भी अपौरुषेय होगा, फलतः आपकी दी हुई आपत्तियों का यहाँ प्रसंग ही नहीं है । इस प्रसंग में ¿ तीन तरह से पुरुष का प्रवेश ( संबन्ध ) हो सकता है - पद और पदार्थ के संबन्ध के द्वारा, वाक्य और वाक्यार्थ के संबन्ध के द्वारा अथवा महाभारत प्रभूति ग्रन्थों की तरह ग्रन्थ निर्माण के द्वारा । वेद में इन तीनों में से कोई भी प्रकार लागू नहीं होगा | पद और पदार्थ की नित्यता को ही मीमांसा में ' औत्पत्तिक ' शब्द से कहा गया है । शब्द के उच्चारण के बाद अर्थ की प्रतीति होती है, अतः प्रत्याय्यप्रत्याचक स्वरूप अथवा संज्ञा - संज्ञी लक्षण संबन्ध शब्द और अर्थ में नित्य ही माना जायगा । यहाँ पर शब्द से अभिप्राय का अनुमान नहीं माना जा सकता, क्योंकि अभिप्राय से शून्य स्वप्नावस्था प्रभृति में परवशता में प्रयुक्त शब्दों से भी अर्थ की प्रतिपत्ति देखो जाती है । इसीलिए पौरुषेय हो या अपरुषेय अर्थानभिज्ञ