वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 371–380
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 371–380
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पारिजातः ३४१ पौयमपौरुषेयं वा अनर्थज्ञैरपि प्रयुज्यमानं व्युत्पन्नानामर्थबुद्धि जनयत्येव । यथा नेत्रस्यालोकः सहकारी पथैव अयं शब्दोऽस्य संज्ञेति ज्ञानं शब्दस्यापि सहकारि, तेनाव्युत्पन्नानां न वाक्यार्थवोधो भवति । ननु सम्बन्धः पौरुषेय एव अस्येयं संज्ञेति सम्वन्धस्य पुरुषकृतत्वादिति चेन्त्र, संकेतस्योपदेशगम्यत्वेऽपि पुरुष कृतत्वानिर्णयात् । पारम्पर्योपदेश लब्धस्याप्युपदेशसंभवात् । तस्माद् यत्र संकेतस्थ प्रमाणेन पीरुषेयत्वं निर्णीयते तत्र पौरुषेयत्वे s पि यत्र प्रमाणं नोपलभ्यते तनोत्पत्तिकत्वमेव संकेतस्येति मन्तव्यम् । अशक्यश्च सर्वशब्दानां सम्बन्ध-करणम् | यदि कश्चिदपि शब्दः केनाप्यर्थ न स्वतः सम्बद्धो न भवेत्तदा सम्बन्धो न कर्तुं शक्यते । शब्दस्वरूपविचार: ननु कः शब्द इति चेद् वर्णा एवेत्यवेहि । न च नैकाक्षरविज्ञानादर्थबुद्धिरुपपद्यते, क्रमवर्तित्वाच्च साहित्यमपि नोपपद्यत इति वाच्यम्, आग्नेयादोनामिव क्रमवर्तित्वेऽपि संहत्य कार्यकारित्वेन संस्कारद्वारा साहित्योपपत्तेः । यथाग्नेयादोनां शास्त्रेण साहित्यकारित्वावगमात् स्वरूपतस्तदसंभवादपूर्व द्वारं कल्प्यते, तथैव वर्णाना-मेकैकशोऽभिघानादर्शनात् सकलोच्चारणे चावगमात् संहत्यकारित्वे निश्चिते स्वरूपेणासंभवात् संस्कारकल्पनं युक्तम्, तद्वदेव चैककर्तृकत्वं क्रमविशेषश्चाद्रियते विपर्य्ययेणार्थाभिधानादर्शनात् । तदेतत्सर्वं शास्त्रदीपिकादी स्पष्टम् । यतः सम्वन्धं कुर्वता केनचिद्वाक्येनेव स कर्तव्यः सास्नादिमान् गौरित्यादिना । न चाविदितपदपदार्थ-सम्बन्धः संकेतयिताऽर्थप्रतिपादकत्वेनाप्रसिद्धं सास्नादिशब्दं शक्नोत्युच्चारयितुम् । हस्तसंज्ञादयोऽपि न तत्र समर्थाः, व्यक्तियों के द्वारा उच्चरित शब्दों से भी व्युत्पन्न व्यक्तियों को अर्थ का ज्ञान होता ही है । जैसे चक्षुरिन्द्रिय का सहकारी आलोक है, उसी तरह से यह शब्द इसकी संज्ञा है, इस तरह का ज्ञान शब्द का भी सहकारी है, अतः अव्युत्पन्न व्यक्ति ( शब्दार्थ संबन्ध को न जानने वाला ) को वाक्यार्थ का ज्ञान नहीं होता । यह कहना कि संबन्ध तो पौरुपेय ही हो सकता है, क्योंकि ' यह इसकी संज्ञा है ' इस तरह का संबन्ध पुरुषकृत है; इसलिए गलत है कि संत यद्यपि उपदेश से ही जाना जा सकता है, किन्तु यह पुरुषकृत है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यह उपदेश परम्परा से भी प्राप्त हो सकता है । अतः जहाँ प्रमाण के द्वारा संकेत की पोरुपेयता निर्णीत होती है, वहीं उसकी पौरुपेय कह सकते हैं । जहाँ प्रमाण उपलब्ध नहीं है, वहीं संबन्ध को नित्य हो माना जायगा | सभी शब्दों को अर्थ से संबद्ध करना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है । यदि कोई भी शब्द किसी अर्थ से स्वतः संबद्ध नहीं होता, तो उसको किसी अर्थ के साथ संबद्ध किया भी नहीं जा सकता । शब्द के स्वरूप का विचार शब्द क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में आप समझिए कि वर्ण ही शब्द है । आप कह सकते हैं कि एक अक्षर के ज्ञान से अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता और वर्णों की क्रमिकता के कारण उनमें सामूहिक बुद्धि भी उत्पन्न नहीं हो सकती, तो इसका ' उत्तर यह है कि मुख्य कर्म का संपादन जैसे उसके अंगभूत आग्नेयादि यागों को क्रमिकता के कारण ही पूर्ण होता है, उसी तरह वर्णों में भी उसके द्वारा साहित्य संस्कार द्वारा साहित्य हो सकता है । जैसे आग्नेयादि अंग कर्मों की साहित्यकारिता शास्त्र के द्वारा अवगत होती है, किन्तु स्वरूपतः ऐसा असंभव देखकर अर्थापत्ति प्रमाण द्वारा द्वार के रूप में यहाँ पर अपूर्व की कल्पना की जाती है, उसी तरह से एक एक वर्ण से किसी अर्थ को अवगत न देखकर और सभी वर्णों के उच्चरित हो जाने के बाद अर्थात देखकर इनकी सहकारिता की अवगति हो जाने पर जब उसको स्वरूपतः संभावना नहीं रहती तो अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा संस्कार की कल्पना करना उचित ही है | किसी विशेष यागादि कर्म में उसको एककर्तृकता और क्रमविशेष का जैसे आदर किया जाता है, उसी तरह से यहाँ पर भी माना जाता है, क्योंकि इसके विपरीत होने पर वह अर्थ का अभिधान नहीं कर सकता | ये सब बातें शास्त्रका प्रभृति ग्रन्थों में स्पष्टतया प्रतिपादित है । जिसको शब्दार्थ का संबन्ध प्रतिपादित करना है, उसको वह ' सास्नादिमान् गौ है होगा । वह संकेत कर्ता, जिसको कि पद और पदार्थ का संबन्ध विदित नहीं है, अर्थ प्रतिपादन में इस तरह के वाक्यों से ही बताना असमर्थ साना प्रभृति शब्दों का
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३४२ प्रतिपादकत्वासिद्धेः परिमितत्वाच्च । परिमिताश्च हस्तादिचेष्टाः शब्दाश्चापरिमिताः । नस्वेवमप्रसिद्धसम्बन्धस्यो. पदेशोऽपि नोपपद्यते, यद्यपि वक्तुः प्रसिद्धसम्बन्धत्वात् सम्बन्धकथनाय वाक्योच्चारणं संभवति, श्रोतारस्तु अप्रसिद्ध-समस्तपदार्था बालाः कथं वाक्येन सम्बन्धं प्रतिपद्यन्ते । तस्मात् सम्बन्धकरणवदुपदेशोऽपि नोपपद्यत इति चेन्न, कर्तुरिवोपदेष्टुरशक्तेरभावात्, उपायसंभवात् । प्रतिपत्तारस्त्वप्रसिद्धशब्दार्था अपि वृद्धेभ्यः सम्बन्धं प्रतिपद्यमाना दृश्यन्त एव । वृद्धव्यवहारेणापि व्युत्पित्सवो बालाः सम्बन्धं प्रतिपद्यन्ते । यदा गामानयेति प्रयोजकवृद्धोक्त्या प्रयोज्यवृद्धः सास्नादिमन्तमानयति तदा व्युत्पित्सुर्वालो s वगच्छति यदयमेतद्वाक्यश्रवणानन्तरमेतस्मिन्नर्थे प्रवर्तते तस्मादस्मा-द्वाक्यादयमर्थी प्रत्यायितः । पश्चाद् गां वधान, अश्वमानयेत्यावापोद्वापादिभि: पदपदार्थसम्बन्धं प्रत्येति नात्र सम्बद्धुरावश्यकता । यद्यपि पदपदार्थसम्बन्धस्यापीरुषेयत्वाद् वृद्धव्यवहारादेवार्थावगतिः सिद्धयति, तथापि वाक्यार्थरूपे धर्मे संकेतापेक्षत्व ree fr ञ्चन्मूलं संभवतीत्यप्रामाण्यमेव धर्मे चोदनायाः । प्रत्येक पदेभ्यो वाक्यार्थप्रतीतिर्दृश्यते । न च पदानां वाक्यार्थविशेषैः संवन्धग्रहणमस्ति । अनन्तत्वाद्वाक्यार्थानामपि तन्न संभवति । वेदार्थस्य च प्रमाणान्तरा-गोचरत्वात्तेन सम्बन्धग्रहणमपि न संभवति । पदार्थानाञ्च वाक्यार्थसाधारणत्वात् प्रत्येकं न वाक्यार्थप्रतिपादन-पपद्यते । अगृहीतसम्बन्धत्वादेव च पदसंघातवाक्यपदार्थानामपि न प्रत्यायकत्वम् । न चागृहीतसम्वन्धः शब्दोऽर्थं प्रत्याययति बालानामप्रतीतेः । प्रतीतौ व्युत्पत्तिवैयर्थ्याच्च । यद्यपि पदमज्ञातसम्बन्धं न प्रत्यायकं तथापि पदसंघातो वा पूर्वपूर्ववर्णजनितसंस्कारसहितो वाक्यान्त्यवर्णो वा निरवयवो वाक्यस्फोट: सम्बन्धग्रहणानपेक्ष एव वा वाक्यार्थ उच्चारण नहीं कर सकता । हाथ के इशारे आदि भी उसमें समर्थ नहीं हो सकते, क्योंकि एक तो वे भी अर्थ का प्रतिपादन नहीं कर सकते, दुसरे वे परिमित है । हाथ, आँख आदि की चेष्टायें परिमित हैं और शब्द अपरिमित हैं । इस पर शंका उठ सकती है कि संबन्ध के अप्रसिद्ध रहने पर उसका उपदेश भी नहीं हो सकता । यद्यपि वक्ता को संबन्ध की प्रसिद्धि होने पर उस प्रसिद्ध संबन्ध केक के लिए वाक्य के उच्चारण की संभावना रह सकती है, किन्तु उस वाक्य से श्रोतागण बालक हैं, जिनको कि सभी पदार्थ अभी प्रसिद्ध है, वे शब्दार्थ का वाक्य के साथ सम्बन्ध कैसे जोड़ पायेंगे | इसलिए सम्बन्ध के समान उपदेश भी नहीं हो पायेगा | इस शंका का उत्तर यह है कि कर्ता के समान उपदेष्टा में शक्ति का अभाव नहीं माना गया है । शब्दार्थ सम्बन्ध का कर्ता कोई नहीं हो सकता, किन्तु उनका उपदेश अनेक उपायों से किया जा सकता है । यह जिज्ञासु भी जिसको कि शब्दार्थ अप्रसिद्ध हैं. वृद्ध व्यक्तियों से शब्दार्थ संबन्ध की जानकारी प्राप्त करता देखा गया है । वृद्धों के व्यवहार से भी जिज्ञासु बालक शब्दार्थ संबन्ध को जान लेते हैं । जैसे कि जब कोई बड़ा आदमी अपने से छोटे व्यक्ति को कहता है कि गाय ले आओ, तो वह गाय ले आता है । यह देखकर शब्दों के अर्थों की जिज्ञासा में लगा हुआ बालक जान लेता है कि उत्तम वृद्ध व्यक्ति के ' गाय ले आओ ' ऐसा कहने पर मध्यम वृद्ध व्यक्ति गाय ले आया । अतः इस वाक्य से ही उसको इस अर्थ का ज्ञान हुआ | are में यह व्युत्पत्सु बालक जब उत्तम वृद्ध के दूसरे वाक्य को सुनता है कि गाय को बाँध दो और घोड़ा ले आओ, तो वह आवाप और उद्वाप की पद्धति से, अर्थात् किस वाक्य में किस शब्द के रहने पर कौन सी वस्तु लाया और किसको छोड़ दिया गया, इसकी सही जानकारी कर लेने पर गो, अश्व आदि पदों और क्रियाओं का उन उन अर्थी के साथ सही संबन्ध समझ लेता है । इस प्रसंग में पद और पदार्थ के संबन्ध को जोड़ने वाले व्यक्ति की आवश्यकता नहीं रहती । aft पद और पदार्थ के संबन्ध के अपौरुषेय होने से वृद्ध व्यवहार से ही अर्थ का ज्ञान होगा, तो भी वाक्यार्थ रूप धर्म में संत की अपेक्षा रहने से इसके अतिरिक्त अन्य किसी प्रमाण के अभाव में विधि वाक्यों का धर्म के प्रति कोई प्रामाण्य नहीं माना जा सकता । प्रत्येक पक्ष से वाक्यार्थ की प्रतीति देखी जाती है, किन्तु उनका वाक्यविशेषों से संबन्ध गृहीत नहीं होता | वाक्यार्थी की अनन्तता के कारण यह हो भी नहीं सकता । वेदार्थ अन्य प्रमाणों का विषय नहीं है, अतः उसके साथ हो संबन्ध ग्रहण नहीं हो पकता । पदार्थ वाक्यार्थ साधारण है, अतः प्रत्येक वाक्यार्थ का वे प्रतिपादन नहीं कर सकते । संबन्ध के गृहीत न होने के कारण ही पदसंघात रूप वाक्यों और पदार्थों की भी प्रतिपादकता नहीं मानी जा सकती । जब तक संबन्ध का ग्रहण नहीं होता, तब तक शब्द अर्थ का प्रतिपादन नहीं कर सकता । यह वस्तु बालकों में अवश्य देखी जाती है । यदि ज्ञान हो जाय तो जिज्ञासा व्यर्थ हो जायगी । यद्यपि संबन्ध के अज्ञात रहने पर पद प्रत्यायक नहीं हो सकता, तो भी पदसंघात अथवा पूर्व पूर्व वर्णों से उत्पन्न
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वेदार्थपारिजातः III प्रत्याययिष्यतीति चेन्न, अव्युत्पन्नानामपि तत्प्रसङ्गात् । पदार्थवेदनमपि तदङ्गमिति न वाच्यम्, यदि पदेभ्योऽ-र्थान्तरभूतं वाक्यपदार्थव्यतिरिक्तं च वाक्यार्थं साक्षादेव वाचकतया प्रतिपादयति, तदा पदार्थवेदनस्य तत्रानुपयोगात् पदार्थव्युत्पत्तिरप्यनथिकैव । न च पदार्थाद वाक्यार्थावगतिः, असंवन्धात् । मनु पदार्थवाक्यार्थयोः सामान्यविशेषत्वात् सामान्यविशेष्यलक्षणः सम्बन्धोऽस्त्येवेति चेत्, सत्यम्, सामान्यस्य सर्वविशेषसाधारणत्वेन नियतविशेषावगत्यसिद्धेः । तेन गामानयेति पदावगतमानयनसामान्यं विशेष-क्षपोन्मुखमपि न गोरेवानयनमाक्षिपेत् । ततश्च न गोरेवानयनं प्रतीयेत । न चाकाङ्क्षासंनिधियोग्यत्वं नियमः, सत्स्वपि तेष्यदर्शनात् । तत एव प्रत्यक्षेण गामुपलभ्य कस्येयमिति प्रतिपित्समाने न संनिहितमपि स्वामिनमध्य-वस्यति । तस्माद्वावयार्थः सांकेतिक इति निर्मूलमेव । न च वेदे संकेतयिताऽस्ति, कथं तत्प्रामाण्यम् । उदेतन्न विचारचार पदार्थ वाक्यार्था + गतिसंभवात् । दीर्घतमेषु वाक्येषु विस्मृतपूर्वपदानामपि वाक्यार्थावगतिर्हि दृश्यते । धर्मको प्रभृतिषोधनिरासः मीमांसकादिरीत्या जातिवाचकत्वेन शब्दानां सम्बन्धिनां नित्यत्वेन संश्लेषस्य नित्यत्वमव्याहतमेव । 1. व्यक्तीनां लक्षणया वोधेन विशेषान्तरम्युदासोऽपि नानुपपन्नः । ' विषं भुङ्क्ष्व ' इत्यस्य वाच्यार्थात्सर्वथा भिन्नः शत्रु-गृहभोजननिवृत्तिरूपोऽर्थोऽभिप्रेयते । व्यक्तिपर्यवसायिनामपि वैदिकानां शब्दानां जातिवोधकत्वाद्वा तत्र पर्यवसानात् । संस्कार के साथ विद्यमान वाक्यान्तर्गत अन्तिम वर्ण या निरवयव वाक्यस्फोट बिना संबन्ध की अपेक्षा रखे ही वाक्यार्थ का बोध करा सकता है, यह कथन भी संभव कोटि के नहीं आ सकता, क्योंकि तब व्युत्पन्न शब्दार्थ ( संबन्ध को न जानने वाला ) व्यक्ति को श्री यह होने लगेगा | पदार्थ की जानकारी इसके लिये आवश्यक अंग नहीं मानी जा सकती, क्योंकि यदि पक्ष से अथन्तिर भूत वाक्य पदार्थ से अतिरिक्त वाक्यार्थ का साक्षात् वाचक रूप में प्रतिपादित करता है, तो इस अवस्था में पदार्थ ज्ञान की आवश्यकता न होने से पदार्थ की व्युत्पत्ति व्यर्थ मानी जायगी और पदार्थ से वाक्यार्थ की अवमति होती भी नहीं है, क्योंकि उनका परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है । ' पदार्थ और वाक्यार्थ की समानता और विशेषता के आधार पर इनका सामान्य विशेष रूप सम्बन्ध बन सकता है ', यह आपका कहना सही हो सकता है, किन्तु सामान्य सभी विशेषों के लिए समान है, अतः किसी नियत ( निश्चित ) विशेष से ही उसका ज्ञान नहीं हो सकता । अतः ' गाय लाओ ' इस पद से अवगत आनयन सामान्य यद्यपि विशेष का आक्षेप करने में समर्थ है, किन्तु वहाँ केवल ' it ' का ही आक्षेप नहीं कर पावेगा और इस अवस्था में गौ के मानयन की प्रतीति नहीं होगी । आकांक्षा, सनिधि और योग्यता से भी यह सम्भव नहीं होगा, क्योंकि इसके रहते भी नियमतः प्रतीति होती है, ऐसा नहीं देखा जाता । इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण से गाय को जानकर भी यह किसकी है? इसको जानने की जब भाकांक्षा होती है, तब भी पास में ही खड़े उसके स्वामी को हम नहीं जान पाते । अतः वाक्यार्थ सांकेतिक है, यह कथन सर्वथा निराधार है । वेद में तो कोई संकेतयिता है नहीं, तब वह प्रमाण कैसे हो सकता है '? ऊपर का यह सारा कथन विचार करने पर गलत मालूम पड़ता है, क्योंकि पदार्थों से वाक्यार्थ की अवगति हो सकती है । बड़े - बड़े वाक्यों में पूर्व पदों की विस्मृति हो जाने पर भी वाक्यार्थ का ज्ञान होता देखा गया है । शब्द जाति के वाचक है, व्यक्तियों का लक्षण से बोध हो जाने से सर्व मित्र ' शत्रु के घर में भोजन न धर्मकीर्ति प्रभूति के आक्षेपों का निराकरण अत: संबन्धों की नित्यता के कारण उनका संबन्ध भी नित्य ही बिना बाधा के माना जायगा । विशेषान्सर का व्युदास भी संभव हो सकेगा । ' विष खाओ इस वाक्य में वाक्यार्थ से करना ' यह अर्थ अभिप्रेत रहता है | व्यक्ति के बोधक वैदिक शब्द भी a न्ततः जाति की
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३४४ वेदार्थपारिजातः कल्पभेदेन व्यक्तिभेदोपपत्तौ तत्र जात्युपपत्तेश्च । किञ्च प्राड्विवाकादिपदानि यथा न व्यक्तिविशेषवोधकानि, किन्तु स्थानविशेषवोधकानि । यदा ये व्यक्तिविशेषास्तत्र स्थिता भवेयुस्तेऽपि तत्पदैरेव बोध्यन्ते । तत्र व्यक्तीनामति-त्यत्वेऽपि न तत्स्थानानामनित्यत्वम् । एवमेव वशिष्ठादिव्यक्तीनामनित्यत्वेऽपि वशिष्ठत्वजातीनां तत्स्थानानां वा निश्यत्वम् । एवमेवेतिवृत्ताभासान्यपि कानिचिद्वचनानि सुखावबोधार्थाख्यायिकामात्रपर्यवसायीनि न वस्तुवृत्त-सापेक्षाणि तथैव लोके दर्शनात् । अत एव न घटनारूपस्यार्थस्याप्यनित्यत्वेन शब्दानां तत्संश्लेषाणां चाऽनित्यत्वं शक्यशङ्कम्, तत्र शब्दानां स्वारस्यस्याभावात् । विषं भुङ्क्ष्वेतिवत् । अत एवाश्रयविनाशे सम्बन्धविनाशात् स शब्दः पूर्वेण न योज्यतेऽसम्बन्धिनो यतः । तत्रोत्पन्नाश्च भावा अवाच्या: स्युरसम्बन्धिनो यतः । किञ्च यद्यविनाभावेन शब्दादर्थप्रतीतिस्तदा वाचकत्वेनार्थप्रतिपादनं स्यात्, धूमस्येवाग्निप्रतिपादनम् । अत एव तत्र धूमेनाग्निमनुमिनोमीत्यनुव्यवसाय: । शाब्दबोधे तु वाक्याद्वाक्यार्थ प्रत्येमीत्यनुव्यवसाय: ( वे ० परि ० द्र ० ) | यदि च शब्दार्थयोः समयेनाविनाभावाख्यानात् समयः सम्बन्ध उच्यते, तदाग्निधूमयोरपि समयः स्यात् । यत्तक्त-मिममर्थमकृतसमयेनापि शब्देन प्रतिपादयामीत्येवमर्थस्य वाच्यत्वं शब्दस्य वाचकत्वमारोप्यार्थप्रतिपादनाभिप्राये यदा शब्द प्रयुङ्क्त तदा शब्दस्य वाचकत्वोपपत्तिरिति तदपि कुशकाशावलम्बनम्, अवाधितव्यवहारस्यारोपायोगात् । अपि च, अर्थप्रतिपादनाभिप्रायेण वर्णा जन्यन्ते न च वाचका वर्णा इष्यन्त इति वदतो व्याहतिः । यदि वक्तृणां श्रोतॄणां च वर्णेष्वेव वाचकत्वाभिमानाद्वाचकानां वर्णानामुत्पत्तिरुच्यते, तदा वक्तृश्रोत्रभिप्रायेणैव वाच्यवाचकभावोऽ-प्यभ्युपेतव्यः । न च मूढं प्रति तथात्वाम्युपगमेऽपि न सर्वमेव कार्यकारणभावाख्यानं समय:, तेन धूमादौ न सम्बन्ध: arrear में ही पर्यवसित होते हैं । कल्पभेद से व्यक्ति के भेद की उपपत्ति बनती है, अतः वहीं जाति मानी ही जा सकती है । दूसरी ara saare ( aste, जज बादि ) प्रभृति पद जैसे व्यक्तिवाचक नहीं है, किन्तु स्थानविशेष के बोधक हैं | जब कोई व्यक्तिविशेष उन पदों पर आसीन रहता है, तो वह भी उन्हीं पदों से बोधित होता है । यहाँ पर व्यक्ति के अनित्य रहने पर भी वे स्थान अनित्य नहीं है | इसी तरह से वसिष्ठ प्रभृति व्यक्तियों के अनित्य रहने पर भी वसिष्ठत्व जाति अथवा उनका स्थान नित्य ही है । इसी तरह से इतिहास के समान प्रतीत हो रहे कुछ वचन भी सरलता से किसी विषय को समझाने के लिए रची गई कहानी के समान है, अत: araft इतिहास को नहीं बताते, लोकं में ऐसा ही देखा भी गया है । इसीलिए घटना रूप अर्थ की अनित्यता के कारण भी शब्द अथवा उनके संबन्धों की अनित्यता की शंका नहीं की जा सकती । उनमें शब्दों का स्वारस्य उसी प्रकार नहीं है, जैसे कि ' विष खाओ ' इस वाक्य का अपने सीधे अर्थ में तास्पर्य नहीं है । इसीलिए आश्रय के विनाश से संबन्ध के भी विनष्ट हो जाने पर वह शब्द पूर्व पदार्थों से युक्त नहीं होता, क्योंकि तब उनका संबन्ध नहीं रहता । इसी तरह से नये उत्पन्न हुए भावों से भी उसकी aresar नहीं बनेगी, क्योंकि ये भी उससे संबद्ध नहीं हैं । अपि च, यदि शब्द से अविनाभावेन अर्थ की प्रतीति मानी जायगी तो वाचकत्वेन अर्थ का प्रतिपादन मानना पड़ेगा, जैसा कि धूम से after का ज्ञान होता है । इसी लिये वहाँ पर ' धूम से अग्नि का अनुमान करता हूँ ' यह अनुव्यवसाय ( ज्ञानविषयक ज्ञान ) होता है । शाब्दबोध में तो ' वाक्य से वाक्यार्थं को जानता हूँ ' यह अनुव्यवसाय होता है ( वेदान्तपरिभाषा द्रष्टव्य ) । यदि शब्द और अर्थ का समय ( संकेत ) से अविनाभाव बताया जाता है, अतः समय को संबन्ध माना जाता है, तो इस परिस्थिति में अग्नि ओर घूम का भी समय रूप संबन्ध माना जा सकेगा । यह कहा जाता है कि इस अर्थ को बिना समय के शब्द से भी प्रतिपादित करता हैं, इस तरह से अर्थ में वाच्यता और शब्द में वाचकता का आरोप करके अर्थ का प्रतिपादन करने के अभिप्राय से जब शब्द का उच्चारण करता है, तब शब्द की वाचकता उपपन्न हो जाती है । किन्तु यह बात भी नदी की बाद में बहते व्यक्ति के कुछ और काश को पकड़ने के समान है, क्योंकि अबाधित व्यवहार को आरोप नहीं कह सकते । दूसरी बात आप कहते हैं कि अर्थ का प्रतिपादन करने के लिये वर्ण उत्पन्न होते हैं और दूसरी तरफ उनको आप वाचक नहीं मानते | यह आपकी बात परस्पर विरुद्ध है । यदि वक्ता और श्रोता को वर्णों में ही वाचकता के अभिमान के कारण उनकी उत्पत्ति मानी जाती है, तो वक्ता और श्रोता के अभिप्राय के अनुसार ही उनमें वाच्यवाचकभाव भी मानना चाहिये | यह कहना कि मूढमति को बताया गया कार्यकारणभाव ही समय कहलायेगा,
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वेदार्थपारिजातः ३४५ समय इति वाच्यम्, सर्वसम्प्रतिपन्नव्यवहारस्य मोहमूलकत्वानुपपत्तेः । यदि चैकत्र कार्यकारणभावाख्यानं समयस्तदा धूमादी कथं न तत्प्रसक्तिरिति पर्यनुयोगोऽपरिहृत एव । किञ्च, स सम्बन्धः प्रत्येकं भिद्यते न वा? नान्त्यः, तथात्वे सम्बन्धस्यैकत्वेऽकृतकत्वमेव स्यात् । नाद्यः, भेदबुद्धयापातात् । न चेष्टापत्तिः, वक्तृश्रोतृधियो भेदे व्यवहारासम्भवात् । वक्ता पूर्वदृष्टं सम्बन्धं श्रोतुः करोति चेत्तदा न तस्य पूर्वदृष्टत्वम् । तदुक्तम्- ' प्रत्येकं स च सम्बन्धो भिद्येते कोऽथवा भवेत् । एकत्वे कृतको न स्याद्भित-श्वेद्भेदधीर्भवेत् । वक्तृश्रोतॄथियो भेदाद्वयवहारश्च दुष्यति । वक्तुरन्यो हि सम्बन्धो बुद्धौ श्रोतुस्तथापरः ॥ श्रोतुश्च कर्तुं सम्बन्धं वक्ता के प्रतिपद्यते । पूर्वदृष्टो हि यस्तेन तं श्रोतुनं करोत्यसो ॥ यं करोति नवं सोऽपि न दृष्टः प्रतिपादकः ॥। ' यदुक्तम्- ' यद्यपि सङ्केतव्यवहारकालयोः शब्दार्थसम्बन्धस्य भेदस्तथापि सादृश्यादेकत्वाध्यवसायेन लोकस्य प्रवृत्तिः । अत एव यमेव शब्दार्थसम्बन्धं पूर्वप्रतिपन्नं वक्ता प्रतिपादयति, तमेव श्रोता प्रतिपद्यते । न च तेषामनादिता, प्रत्यभिज्ञाया अप्रमाणत्वात् ' इति, तदपि न क्षोदक्षमम्, बौद्धमते क्षणभङ्गुरस्य द्रष्टुः पूर्वापरक्षणवर्तनो स्तदिदमर्थयोर्ग्रहणासम्भवेन तेनेदं सदृशमिति सादृश्यग्रहणासम्भवेन तन्मूलस्यैक्याध्यवसायस्याप्यसम्भवात् । प्रत्यभिज्ञायाश्च बाधाभावेन तदप्रामाण्यस्य वक्तुमशक्यत्वेन प्रत्यभिज्ञासिद्धस्य सम्बन्धैवयस्यापलापासम्भवात् । अत एव वाच्यवाचकसम्बन्धानां भिन्नानामप्येकत्वाध्यवसायेन लोकप्रवृत्तिरित्यपास्तम्, भिन्नानामेकत्वाध्यवसाया-अन्य नहीं । अतः धूमादि का संबन्ध समय नहीं कहलावेगा, तो यह कथन इसलिये अनुचित है कि सभी व्यक्तियों के द्वारा एक रूप में स्वीकृत व्यवहार को मोहमूलक नहीं माना जा सकता । यदि एक जगह कार्यकारण का आख्यान समय कहलावेगा तो धूमादि में भी उसको प्रसक्ति क्यों नहीं होगी, इस शंका का समाधान अभी नहीं हुआ है । यहाँ यह भी शंका उठती है कि वह संबन्ध प्रत्येक के लिये एक ही है या भिभिन्न? अन्तिम पक्ष आपके लिये इसलिये ठीक नहीं होगा कि तब संबन्ध की एकता के कारण वह नित्य माना जायगा । प्रथम पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि उसमें भेद - बुद्धि की आपत्ति उठेगी । यह आपत्ति सिद्धान्त के अनुकूल इसलिये नहीं बैठेगी कि वक्ता और श्रोता की बुद्धि में भेद रहने पर व्यवहार ही नहीं बन पावेगा । वक्ता पूर्व दृष्ट संबन्ध को श्रोता को बताता है तो ये दोनों संबन्ध एक ही हुए और यदि नये संबन्ध को बताता है तो वह पूर्वदृष्ट नहीं हुआ । निम्न कारिकाओं में इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है-- ' वह संबन्ध प्रत्येक में free है या अभिन्न? एक मानने में वह कृतक न हो सकेगा और यदि भिन्न मानते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न - भिन्न बुद्धियों का जन्म होगा । इस प्रकार बक्ता औरत की बुद्धि में भेद रहने से व्यवहार में भी भेद रहने से वह दृष्ट हो जायगा, क्योंकि तब वक्ता को बुद्धि में अन्य संबन्ध रहेगा और श्रोता की बुद्धि में अन्य । श्रोता में शब्द का संबन्ध कराने के लिये वक्ता किस संबन्ध का सहारा लेगा? जो उसने पहले देखा है, Sent in a star को नहीं करा सकता और यदि नये संबन्ध को करता है तो वह उसका दृष्ट नहीं है और जो दृष्ट नहीं है, यह संबन्ध का प्रतिपादन नहीं कर सकता । यह कहा गया है कि - ' यद्यपि संकेतगत व्यवहार और काल की दृष्टि से शब्दार्थ संबन्ध की भिन्नता रहती है, तो भी सादृश्य के कारण उसको एक ही मानकर लोक व्यवहार चलता रहता है । इसीलिये पूर्व प्र free fre शब्दार्थ संबन्ध को वक्ता प्रतिपादित करता है उसी को श्रोता जानता है । यह अनादि नहीं है, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा को प्रमाण नहीं माना जाताः । किन्तु तर्क की कसौटी पर यह कथन भी ठीक नहीं उतरता । बौद्ध मत में व्रष्ट r क्षणभंगुर है, अतः वह पूर्व और पर क्षणों में विद्यमान ' वह ' और ' यह ' इन दो पदार्थों को ग्रहण नहीं कर सकता | तब वह ' यह इसके सदृश है ' इस तरह से सादृश्य का भी ग्रहण नहीं कर पावेगा । इसीलिये सादृश्यमूलक शब्दार्थ संबन्ध की एकता का निश्चय करना भी उसके लिये असंभव है । प्रत्यभिज्ञा बाधित नहीं होती, अतः उसको अप्रमाण नहीं माना जा सकता । प्रत्यभिज्ञा से सिद्ध संबन्ध की एकता का अपलाप भी नहीं हो सकता । इसीलिये वाच्यवाचक संबन्ध की भिनता के रहते हुए भी उनमें एकत्व का निश्चय होने से लोक में प्रवृत्ति होती है, इस उक्ति का भी खण्डन हो जाता है, **
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१४६ वेदार्थपारिजातः सम्भवेनैकत्वाध्यवसायस्य तात्विकत्वेन सम्बन्धस्योत्पत्तिकत्वसिद्वेर्निष्प्रत्यूहत्वात् । तदुक्तं धर्मकीर्तिनापि - ' अस्तु वान्य एव नित्यः सम्बन्धः ' इति । यदपि ' गिरामेकार्थनियमे न स्यादर्थान्तरे गतिः ' ( प्र ० वा ० ३।२२ ९ ) इति । नहि तेन सम्बन्धेनासम्बद्धेऽथ प्रतीतिर्युक्ता तस्य वैकल्यात् । दृष्टश्चेच्छावशात्कृत समयः सर्वः सर्वस्य दीपक: । अनेकार्थाभिसम्बन्धे विरुद्धव्यक्ति-सम्मतः । यदि दृष्टविरोधपरिहाराय सर्वे सर्वस्य वाचका अभ्युपेयन्ते तदाभीष्टाद्विरुद्धार्थव्यक्तिरपि भवेत् । तथात्वे सर्वः सर्वसाधनः स्यात् सङ्करात् न्यायस्य समानत्वात् । कार्यकारणताया: प्रतिनियतत्वात् । प्रतिनियतसाधनेऽभिमते स्वर्गा साधनत्वेनाग्निहोत्रादेरेव बोधनं भवति विपरीतस्यैव वेत्यनिर्णयात । समेषां शब्दानां सर्वसाधारणस्य arranear विशिष्टसाध्यसाधनत्वेनाभिमत एवार्थ व्यक्ति समयकारः करोतीति कुत एतत् । एवमनियतः शब्दः क्वचिदर्थे नियमं पुरुषसङ्केतात् प्रतिपद्यते । स च पुरुषो विरुद्धेऽप्यर्थे सङ्केतं कुर्यात् । न केवलं विरुद्धव्यक्तिसम्भवस्तथा चापौरुषेयत्वकल्पना व्यर्थैव । यतो यादृशाः शब्दाः पौरुषेया अभिमताः पुरुषः क्वचिद्विवक्षितेऽर्थे प्रयुक्ताः सङ्कीर्यन्ते-ऽनिष्टाभिधायकत्वसम्भावनया, तादृशा एवापौरुषेयत्वेनाभिमता अपि शब्दा: सर्वसाधारणाः सन्तः क्वचिदर्थे तैः पुरुषः समयेन यथेष्टं विनियमिताः पुंसां तत्त्वापरिज्ञानात् । तत्राप्यनिष्टेनासङ्कीर्णस्येष्टार्थस्यैव विज्ञानं न सम्भवत्येव । अथ वैदिकाः शब्दाः प्रकृत्यैवं नियता अभिमतेऽर्थे ततो न पुरुषसंस्कारकृतो दोष इति चेत्तथात्वेनोप-क्यों fe free aega में एकत्व का निश्चय कथमपि संभव नहीं हो सकता, अतः एकस्व का अध्यवसाय वास्तविक मानना पड़ेगा । इस प्रकार शब्दार्थ संबन्ध की नित्यता में कोई विघ्न - बाधा नहीं उपस्थित हो सकती । अन्त में धर्मकीति ने भी शब्द और अर्थ का लौकिक समय से भिन्न नित्य संबन्ध ही माना है । यह भी कहा गया है कि --- ' शब्दों की नियमतः नियत अर्थो की वाचकता मानने पर उससे भिन्न अर्थ में उनकी प्रवृत्ति नहीं होगी, तब उससे संबद्ध नये अर्थ में उसको प्रवृत्ति व्यर्थ मानी जायगी, किन्तु यह देखा गया है कि इच्छानुसार संकेत कर व्यक्ति सभी शब्दों से सभी अर्थों को प्रकाशित करता है । अनेक अर्थों से उसका संबन्ध मानने पर परस्पर विरोधी अर्थों को उपस्थिति होने लगेगी । यदि दृष्ट विरोध के परिहार के लिये सभी शब्द सभी अर्थों के वाचक माने जाते हैं तो इस परिस्थिति में इच्छित अर्थ के farta अर्थ की उपस्थिति की आपत्ति कैसे रुक सकेगी । इस परिस्थिति में संकरता के कारण सभी शब्द सभी अर्थों के प्रतिपादक मानने पड़ेंगे, क्योंकि न्याय तो सर्वत्र समान रूप से प्रवृत्त होता है । कार्यकारणभाव निश्चित होता है । अभिमत स्वर्गादि के कुछ निश्चित साधन माने जाते हैं । उक्त प्रतिपादन के अनुसार तो यह सन्देह उपस्थित हो जायगा कि अग्निहोत्रादि स्वर्ग के साधन हैं या नहीं? अथवा यह भी हो सकता है कि अग्निहोत्रादि स्वर्ग के साधन नहीं है । सभी शब्द जब सर्व साधारण के वाचक है तो समय संकेत निश्चित करने वाला व्यक्ति किसी विशिष्ट साध्य - साधन के वाच्यवाचक के रूप में अभिमत अर्थ में यह संकेत करता है, ऐसा कैसे सिद्ध हो सकेगा । इस तरह से अनियत शब्द पुरुष के संकेत के अनुसार किसी अर्थ में नियमतः प्रवृत्त होता है । वह पुरुष विरुद्ध अर्थ में भी संकेत कर सकता है । तब केवल विरोधी अर्थ की हो प्रतीति नहीं होगी, किन्तु साथ में अपौरुषेय कल्पना भी व्यर्थ हो जायगी । क्योंकि जिस तरह के शब्द पौरुषेय माने जाते हैं, उनका यदि कोई पुरुष विवक्षित अर्थ में प्रयोग करता है, वे संकीर्ण हो जाते हैं, क्योंकि वे अनिष्ट अर्थ के eferrer न हों, ऐसी शंका बनी रहती है । इसी तरह से अपौरुषेय रूप में माने गये शब्द भी सर्वसाधारण होकर किसी अर्थ में उन पुरुषों के द्वारा संकेतित होकर यथेष्ट विनियुक्त हो सकते हैं, क्योंकि वे उनका वास्तविक अर्थ तो ठीक से नहीं समझते । वहाँ पर भी अनिष्ट से असंकीर्ण दृष्टार्थ का ज्ञान संभव नहीं हो सकता । अब यदि यह माना जाय कि वैदिक शब्द स्वभावतः अभिमत अर्थ में निय रहते है इसलिये इनमें पुरुष संस्कार के द्वारा आने वाले दोष नहीं रहेंगे तो ऐसी अवस्था में उनके उपदेश की आवश्यकता नहीं रहेगी, किन्तु ऐसा है नहीं, स्वतः अर्थ की प्रतीति उनसे नहीं होगी, अतः वहाँ पर भी उनके उपदेश की अपेक्षा रहती ही है । अन्यथा संकेत के द्वारा वहीं पर अर्थ का प्रकाश नहीं होगा और व्याय्या में विकल्प की भी आपत्ति आवेगी | जब विकल की संभावना रहेगी
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वेदार्थ पारिजातः ** I देशमपेक्षेरन्, अपेक्षन्ते च स्वतस्तेभ्योऽर्थप्रतीतेरभावात् । अन्यथा सङ्केतेन च न प्रकाशयेयुः । व्याख्याविकल्पश्च न स्यात् । शक्यविकल्पे वैदिकवाक्ये व्याख्यातृणामुपदेशस्येच्छा विसंवाददर्शनाद् व्यथैवापौरुषेयतेति । तदप्याकाशमुष्टिह्ननकल्पम्, तात्पर्यानवबोधात् । तथाहि —यथा भूतानां साधारण्येन सर्वभौतिक-कारणत्वेऽपि कार्यकारणता प्रतिनियता, तद्वत्तत्तत्पदघटकतया सर्ववर्णानां सर्वार्थवाचकत्वेऽप्यनादिसिद्धसंकेतवशात्त-तत्पदानां तत्तद्विशिष्टार्थवाचकत्वमपि नियतमेव । ते च सङ्केता उपदेष्टृत्वेन पुरुषापेक्षा अपि न कर्तृत्वेन तदपेक्षा इत्यसकृदावेदितम् । अपौरुषेये वेदे पुरुषस्वातन्त्र्यं निराक्रियते न तु पुरुषसम्बन्धमात्रम्, सम्प्रदायपारम्पर्याश्रयत्वेन तदपेक्षणात् । तदुक्तम्— ' यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता ' । अत एव न सम्बन्धवैकल्पम्, तस्य विशिष्टार्थ -बोधनेन सार्थकत्वात् । यत्तूक्तम् -- ' दृष्टश्चेच्छावशात् कृतसमयः सर्वः शब्द: सर्वस्य दीपकः, नियताश्चेदन्यथासङ्केतेन न प्रकाशयेयुः ' इति, तदप्यज्ञानविजृम्भितम्, तथा सङ्केतस्यापवादत्वेनोत्सर्गेऽतन्त्रत्वात् । यथेन्द्राग्न्यादयः शब्दाः कैश्चिदिच्छा-वशान्मनुष्यादिव्यक्तिविशेषेषु सङ्केतिता अपि वेदार्थनिर्णयावसरे ते न गृह्यन्ते, यथा वा वृद्धिशब्देन पाणिनीयव्याकरण-व्यवहृतावादे चोर्ग्रहणेऽपि नायुर्वेदादिशास्त्रेषु तद्ग्रहणम्, यथा वा सर्वज्ञशब्देन वौद्धग्रन्थेषु तथागतस्य बोधेऽपि नान्यत्र तद्ग्रहणम्, एवमन्यत्रापि बोद्धयम् । व्याख्याविकल्पश्च क्वचित्तात्पर्यभेदमूलकः क्वचित्तदनवबोधमूलकः । यथा बुद्धवाक्येष्वपि व्याख्याभेदेऽपि न तन्मुख्यतात्पर्यपरिहाणिस्तथैवान्यत्रापि । यथा सर्वत्र शासनेषु संविधान-वाक्यानां न्यायवादिकृतव्याख्याभेदेऽपि न्यायाधीशैर्मुख्यतात्पर्यान्वेषणाय यत्यते, तथैव व्याख्याभेदे सत्यपि वेदसम्मत-तो वैदिक वाक्यों में व्याख्याताओं की इच्छा के अनुसार अर्थों की विसंवादिता भी रहेगी और ऐसी अवस्था में उनको अपौरुषेय मानने से क्या लाभ है? यह सारा उपक्रम आकाश में मुष्टिका प्रहार के समान है, क्योंकि आपने पूरे प्रकरण का तात्पर्य ही ठीक से नहीं समझा है । जैसे पंच महाभूत साधारण रूप से सभी भौतिक पदार्थों के कारण हैं, तो भी उनका कार्यकारणभाव निश्चित है, इसी तरह उस उस पद में विद्यमान रहकर सभी वर्ण सभी अर्थों के वाचक रहते हुए भी अनादिसिद्ध संकेत की सहायता से उन उन विशिष्ट अर्थों के ही प्रतिपादक होते हैं, यह भी निश्चित ही है । ये संकेत उपदेष्टा के रूप में यद्यपि पुरुष की अपेक्षा रखते हैं, किन्तु वह पुरुष उनका निर्माता नहीं है, यह हम अनेक बार कह चुके हैं । अपौरुषेय वेद में पुरुष की स्वतन्त्रता का निषेध किया जाता है, पूरी तरह से पुरुष के संबन्ध को अस्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि संप्रदाय की परम्परा के वाहक के रूप में उसको स्वीकार किया जाता है । निम्न श्लोकार्थ में यही बात कही गई है— ' हमारे मत में पुरुष को स्वतन्त्रता का ही प्रयत्नपूर्वक निषेध किया जाता है । ' इसीलिये संबन्ध की निष्फलता नहीं मानी जाती, क्योंकि वह विशिष्ट अर्थ के बोधक के रूप में अपनी सार्थकता सिद्ध करता है । यह आक्षेप किया गया है कि ' इच्छा के अनुसार संकेत करने पर सभी शब्द सभी अर्थों के प्रकाशक देखे जाते हैं, यदि ये नियत हों तो अन्यथा संकेत करने पर उनसे अर्थ का प्रकाश नहीं होना चाहिये । ' यह आक्षेप भी आक्षेप्ता के अज्ञान को ही प्रकाशित करता है । इस तरह का संकेत अपवाद माना जाता है, उसकी सामान्य स्थल में प्रवृत्ति नहीं होती । जैसे इन्द्र, अग्नि प्रसृति अपनी इच्छा के अनुसार मनुष्यादि व्यक्तियों में संकेतित कर देते हैं, किन्तु वेदार्थ का निर्णय करते समय उन शब्दों को कुछ लोग raat aai aata fa या जाता, अथवा जैसे वृद्धि शब्द से पाणिनि व्याकरण में आत् और ऐच के लिये व्यवहार होते हुए भी यही अर्थ युर्वेद आदि शास्त्रों से नहीं गृहीत होता, अथवा जैसे सर्वज्ञ शब्द बौद्ध ग्रन्थों में तथागत का बोधक होते हुए भी अन्यत्र इस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता, इसी तरह अन्यत्र भो मानना चाहिये । व्याख्याओं का विकल्प कहीं पर तात्पर्य के भेद के कारण और कहीं पर उसको ठीक से न समझ पाने के कारण होता है । जैसे बुद्ध के वाक्यों में ही व्याख्या के भेद के रहते हुए भी मुख्य तात्पर्य की कोई हानि नहीं होती, उसी तरह से अन्यत्र भी समझना चाहिये । जैसे सभी शासनों के संविधानों में उनके वाक्यों की न्यायवादी गण विभिन्न व्याख्याएँ उपस्थित करते हैं, किन्तु न्यायाधीश उनका मुख्य तात्पर्य कहाँ हैं, इसको जानने का प्रयत्न करते हैं, उसी तरह
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*** वार्थपारिजातः राषैरुपायैर्वेदतात्पर्यनिर्धारणाय यत्न आस्थीयते, न तु व्याख्याभेदेन तत्स्वरूपापलापो युक्तः । अपि चेच्छावशात्कृत -समयः शब्दः सर्वस्य दीपक इति क्व दृष्टम्? इच्छावशात् सर्वस्य सर्वदीपकत्वे येषां केषाञ्चिच्छन्दानां समूहनेऽपि कश्चिद् प्रन्थनिर्माणे कृती भवेत्, वाग्वैचित्र्यविन्यासस्य विलोपापत्तिश्च स्यात् । प्रातिविकसङ्केतेन वाग्व्याहारेऽन्योन्य-वार्तानभिज्ञ एव सर्वः स्यात् । यत्र संस्कृतभिन्नप्राकृताप भ्रष्टादिपदवाक्यादिषु कश्चन स्थिरो नियमो नास्ति, तत्रापि पदवाक्यशुद्धयशुद्धिक्रियाकारकतत्सङ्केतादिनिर्णयस्तदात्वक समाजायत्तः न प्रातिस्विकेहया, तथात्वे व्यवहारलोप-प्रसङ्गात् । संस्कृतपदवाक्यादोनान्तु शुद्ध शुद्धयादिनिर्णयः पाणिन्याद्यषिसूत्राद्यायत्तः । अत एव परावरदृशामृषीणां लक्ष्यचक्षुष्कत्वेऽपि सर्वसाधारणस्य लक्षणंकचक्षुष्कत्वमेव । अत एव धर्मकीर्यादिबौद्धानामपि संस्कृतव्याकरणनियमा-त्वमेव दृश्यते । न तु स्वेच्छया कृतसङ्केतैः शब्देस्तेऽपि व्यवहरन्ति । तदनभ्युपगन्तॄणामपि परत्येव परो बोधनीय इति तदनुसारित्वम् । ततो न सङ्केते कस्यचित् स्वाच्छन्द्यम् । स च सङ्केतो नैयायिकादिमतरीत्येश्वरकृतत्वा पौरुषेयोऽपि व्यवस्थितः । मीमांसकमतरीत्या अपौरुषेयोऽनादिपारम्पर्येण व्यवस्थितः । अन्यत्र तत्तत्पुरुष कृतोऽपि तादात्विकसमाजायत्तव्यवस्थः । अस्थिरपदवाक्यव्याकरणादिनियमत्वादेव कियच्चिच्छ्तक प्राचीनस्य हिन्दीभाषा-मयस्यापि पृथ्वीराज रासोग्रन्थस्यार्थोऽद्यत्वे दुरूहः । स्थिरनियमत्वादेव संस्कृतभाषामयस्य वाल्मीकीय रामायणस्था ने कलक्षाब्दप्राचीनस्याप्यर्थोऽद्यत्वे सुगमः । सङ्केतस्य कृतकत्वेऽकृतकत्वे वा वृद्धव्यवहारादिभिरेवावगमः, तदुक्तम्- ' शक्तिग्रहं व्याकरणोपमान-कोषाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च । वाक्यस्य शेषाद्विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः ॥ ' से व्याख्याभेद के रहने पर भी वेदसंमत आर्ष उपायों की सहायता से बंद का तात्पर्य निर्धारण करने के लिये यत्न किया ही जाता है, व्याख्या भेद को देखकर उसके स्वरूप का हो अपलाप करना उचित नहीं है । आप यह बताइये कि इच्छा के अनुसार संकेतित शब्द सभी अर्थों का प्रकाश है, यह बात आपने कहाँ देखी है । इच्छा के अधीन सभी शब्दों की सभी अर्थों की प्रकाशकता मान ली जाय तोकुछ शब्दों को समझ करके ही कोई व्यक्ति ग्रभ्य का निर्माण करने में समर्थ हो जायगा और वाणी का विचित्र विन्यास सर्वथा लुप्त हो जायगा । प्रत्येक व्यक्ति के अपने संकेत को मान्यता मिलने पर वाणी के व्यवहार से एक दूसरे की बात समझना भी कठिन हो जायगा | संस्कृत से भिन्न प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं के पद, वाक्य आदि में कोई स्थिर नियम नहीं है, वहाँ पर भी पद और artit it शुद्धि और अशुद्धि तथा क्रिया, कारक आदि के संकेत का निश्चय तदानीन्तन समाज के अधीन रहता है, अपनी मनमानी नहीं चलती, क्योंकि ऐसा मानने पर व्यवहार ही विलुप्त हो जायगा । संस्कृत भाषा के पद, वाक्य afe की शुद्धि - अशुद्धि का निर्णय तो पाणिन प्रभूति ऋषियों के सूत्रादि के अधीन है । इसीलिये परावर द्रष्टा ऋषिगणों की दृष्टि लक्ष्यप्रधान और सर्व साधारण की दृष्टि लक्षणप्रधान मानी जाती है । इसीलिये धर्मकीर्ति प्रभृति बौद्ध दार्शनिक भी संस्कृत व्याकरण के नियमों का पालन करते देखे जाते हैं । वे भी अपना मनमाना संकेत करके शब्दों का व्यवहार नहीं करते । जो इस बात को नहीं मानते, उनको भी दूसरे की पद्धति से ही दूसरे को समझाना पड़ता है, अत: उनको भी इसी नियम का अनुसरण करना पड़ेगा | इसलिये संकेत में कहीं भी स्वच्छता नहीं बरती जा सकती । वह संकेत नैयायिक आदि दार्शनिकों की दृष्टि में ईश्वर कृत होने से पौरुषेय होने पर भी craftra है, किन्तु मीमांसकों के मत से अपौरुषेय होते हुए भी आदि परम्परा से व्यवस्थित है । अन्यत्र तत्तत् पुरुषकृत भी यह माना जाता है, किन्तु उसकी व्यवस्था उस समय के समाज के अधीन है, व्यक्ति के नहीं । पद, वाक्य आदि की रचना के व्याकरण गत नियमों की आस्थरता के कारण ही कुछ ही शताब्दी पहले बनाये गये पृथ्वीराजरासो नामक हिन्दी ग्रन्थ का अर्थ समझ पाना कठिन हो गया है | व्याकरणगत नियमों की स्थिरता के कारण ही अनेकों लाख वर्ष पूर्व बनायी गयी वाल्मीकि रामायण का अर्थ आज भी सरलता से समझा जा सकता है । संकेत की कृतकता और अकृतकता का ज्ञान वृद्ध व्यवहार प्रभृति से ही हो सकता है । जैसा कि कहा गया है- ' शब्दों की शक्ति किस अर्थ में हैं इसका ज्ञान व्याकरण से, उपमान से, कोश से, आप्त जनों के वाक्य से और व्यवहार से होता है । वृद्धों का अर्थ के ज्ञान में वाक्यशेष, व्याख्याएँ और सिद्धपद का साक्षिष्य भी कारण है ' ।
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वेदार्थपारिजातः ** यत्र सैन्धवादिशब्देषु प्रमाणैरनेकेष्वर्थेषु शक्तिग्रहो भवति, तत्र प्रकरणादिभिस्तन्निर्धारणं भवति । ' गिरां नानार्थ सम्वन्वेष्वविरोधो व्यवस्थया । व्याकृतिव्यवहाराभ्यां क्वचित्प्रकरणादितः || ' इति । यदप्युक्तम्- [ -न शब्दार्थयोस्तादात्म्यलक्षणः सम्बन्धः, यतो बाह्या अर्थाः शब्दस्य न रूपं नापि शब्दोऽर्थानाम्, येनाभिना मतया व्यवस्थाभेदेऽपि कृतकानित्यवदविनाभाविता स्यात् । वाच्यश्च हेतुभिन्नानां सम्बन्धस्य व्यवस्थितेः । तदुत्पत्तिलक्षणोऽपि सम्बन्धो न सम्भवति, यतो वेदिका: शब्दा न विवक्षाजन्मानोऽभ्युपेयन्ते, नित्यत्वस्वीकारात् । नाप्यजन्मानः सन्तो विवक्षाव्यङ्ग्याः, नित्यत्वहाने: । नापि बाह्यार्थायत्ताः, नित्यत्वादेव । ततश्च बाह्येऽर्थे तादात्म्य-तदुत्पत्तिम्यां प्रतिनियमासम्भवात् प्रतिनियमसंसाध्यं तदन्वयं ( बाह्यार्थसद्भावं ) शब्दाः कथं साधयेयुः? न चार्या-यत्ततायाः साधकं किमपि । तदुक्तम्- ' असंस्कार्यतया पुंभिः सर्वथा स्यान्निरर्थता | संस्कारोपगमे मुख्यं गजस्तानमिदं ( स्नाननिभं ) भवेत् ॥ ' ( प्र ० वा ० ३१२३१ ) इति, तदपि पिष्टपेषणम्, शब्दादनन्तरमर्थप्रतीतेः " शब्देनार्थस्य वाच्यवाचक-सम्बन्धस्याक्तत्वात्, तादात्म्यतदुत्पत्त्यादिसम्बन्धाभावेऽपि चक्षुरादीनां रूपादिप्रकाशकत्वदर्शनेन तादृक् सम्बन्धस्य तदतन्त्रत्वात्, वैयाकरणमतरोत्या सर्वस्यैव प्रपञ्चस्यानादिनिधन शब्दब्रह्मप्रभवत्वेन तादात्म्य सम्बन्धोपपत्तेश्च । तदुक्तम्- ' अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दरूपं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः 11 ' ( वा ० ० १ ) | वेदान्त-मतरीत्या सर्वस्यैव कार्यस्य विज्ञानपूर्वकत्वेन विज्ञानस्य शब्दानुविद्धत्वेन प्रणाड्या सर्वस्यैव शब्दपूर्वकत्वमिति तदुत्पत्ति-सैन्धवादि शब्दों में जहाँ पर इन प्रमाणों से अनेक अर्थों को अवगति होती है, वहाँ पर प्रकरण के अनुसार अर्थ का निर्धारण किया जाता है । निम्न श्लोक में यही बात कही गई है-- ' शब्दों का जब अनेक अर्थों से सम्बन्ध एक साथ उपस्थित होता है, इस परिस्थिति में उनके विरोध का परिहार करने के लिये व्यवस्था करनी पड़ती है । यह व्यवस्था व्याख्यानों के द्वारा, व्यवहार के द्वारा और कहीं कहीं प्रकरण द्वारा भी संपन्न होती यह भी कहा गया है कि - ' शब्द और अर्थ का तादात्म्य लक्षण सम्बन्ध नहीं हो सकता, क्योंकि अर्थ बाह्य है, उनकी शब्दस्वरूपता नहीं हो सकतो और न शब्द ही अर्थस्वरूप हो सकता है । यदि ये अभिन्न हों तो व्यवस्था के भेद में भी कृतक और अनित्य की तरह इनका भी अविनाभाव माना जा सके । भिन्न वस्तुओं के सम्बन्ध का कारण बताना पड़ेगा । शब्द और अर्थ में उत्पत्ति लक्षण सम्बन्ध भी नहीं हो सकता, क्योंकि वैदिक शब्दों की विवक्षाधीन उत्पत्ति नहीं मानी जाती, वे तो नित्य हैं । उनकी उत्पत्ति न मानकर यदि विवक्षाधीन व्यङ्ग्यता मानी जाय, तो भी नित्यत्व की हानि हो जायगी । नित्य होने से ही ये बाह्य अर्थ के अधीन भी नहीं माने जा सकते । इस प्रकार से बाह्य अर्थ के साथ इनकी सादात्म्य अथवा तदुत्पत्ति से भी प्रतिनियतता न होने से प्रतिनियम से ही सिद्ध होने वाले बाह्य अर्थ के साथ सद्भाव रूप अन्वय को शब्द कैसे सिद्ध कर पायेंगे? शब्द की अर्थात्तता को सिद्ध करने वाले कोई प्रमाण है नहीं । इसी बात को निम्न कारिका में संक्षेप में इस प्रकार कहा गया है- ' यदि शब्दों की संकेत निरपेक्ष स्वतः वाचकता मानी जाती है तो पुरुषों के द्वारा संकेत द्वारा नियम्य न होने के कारण शब्दों की सर्वथा निरर्थकता हो जायगी । यदि इस दोष से छुटकारा पाने के लिये संस्कार ( संकेत ) माना जाता है तो फिर यह गजस्नान के तुल्य हो जायगा । अर्थात् हाथी जैसे स्नान करके अपने कीचड़ को हटाता है और फिर कीचड़ से ही अपने शरीर को सान लेता है, उसी तरह से शब्दार्थ सम्बन्ध fadedren are र भी संकेत के लिये पुरुष की अपेक्षा मानने पर पौरुषेयता आ ही जायगी । यह सब केवल पिष्टपेषण मात्र है, क्योंकि शब्द के उच्चारण के बाद अर्थ की प्रतीति होती है, अत: शब्द और अर्थ का वाच्यवाचक लक्षण सम्बन्ध माना जाता है । तादात्म्य, तदुत्पत्ति आदि सम्बन्धों के न रहने पर भी चक्षुरादि की रूपादि प्रकाशकता देखी जाती है, अतः उक्त सम्बन्धों की आवश्यकता सर्वत्र नहीं मानी जाती । वैयाकरण की पद्धति से यह सारा प्रपञ्च अनादिनिधन शब्दब्रह्म से ही उत्पन्न है, अतः शब्द का अर्थ से तादात्म्य सम्बन्ध उनके मत के अनुसार बन भी सकता है । जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है- ' अनादि अनन्त, अक्षर ( अविकारी ) शब्दरूप ब्रह्म ही अर्थ रूप से विवर्तित होता है और उसी से जगत् को यह सारी प्रक्रिया चलती है ' । वेदान्त मत के अनुसार भी सभी कार्य जगत् विज्ञान का faad है और यह विज्ञान शब्द से ही अनुविद्ध है, अतः इस प्रक्रिया में भी परम्परया सभी कुछ शब्द-
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३५० वेदार्थपारिजातः लक्षणस्यापि सम्बन्धस्योपपत्तिः । स्वप्रकाशचितोऽबाध्यत्वेन सदभिन्नत्वं सतश्च स्वप्रकाशत्वेन चिदभिन्नत्वं शब्दार्थयो. श्चित्सद्विवर्तत्वेन तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वनियमेनाप्युभयोस्तादात्म्यं सम्भवति । अत एव ब्रह्मैवेदं सर्वमिति श्रुत्युद्धोषः । या विकाराणामधिष्ठानसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावेन नाममात्रत्वाभिधानादर्थस्य नामानतिरिक्तत्वसिद्धि-रिति रीत्यापि सम्बन्धग्रहग्रहिलः सन्तोषणीयः । वैदिकानां शब्दानां तत्सङ्केतानाञ्च नित्यत्वेऽपि व्यवहारपारम्पर्यो-पदेशादिभिः संकेतग्रहेण स्वार्थबोधकत्वानपायेन सार्थक्यमेव । नहि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम । वैदिकैः शब्दैर्नास्तिकानामपि भवत्येवार्थवोधस्ततो नरर्थक्योक्तिरपार्थैव । ' असंस्कार्यतयाऽप्यस्य पुंभिः स्यात्सार्थकता किल । नित्यसिद्धेऽपि सम्बन्धे पारम्पर्यप्रकाशतः ॥ ' यदपि जल्पितम् -- ' शब्दार्थसम्बन्धो नित्योऽनित्यो वा? द्वितीयेऽप्याकुञ्चनादिवत्पुरुषेच्छा वृत्तिरङ्कुरादिव -सदवृत्तिर्वा? द्वितीयान्त्यपक्षेऽपुरुषायत्तत्त्वं पुरुषाणां यथाभिप्रायं देशादीनामन्यथात्वेन तेन शब्देन प्रतिपादनं न स्यात् । प्रतिपादनेच्छायां सत्यामप्यनायत्तस्य पर्वतादिवन्नियोक्तुमशक्यत्वात् । न चैतदिष्टमेव देशादिपरावृत्त्या यथाभिप्रायं प्रयोगदर्शनात् । नित्यत्वेऽप्ययमेव दोषः, तस्य स्थिरस्यान्यथाऽयोगादाकाशवत्समं सर्वस्मिन्नवस्थान इष्टे प्रतिनियमा-भावात्ततो विशेषप्रतिपत्तिर्न स्यादिति पूर्ववत्प्रसङ्गः । पुरुषेच्छावृत्तौ च सम्बन्धस्य पौरुषेयत्वापातात् ' इत्यादि, तदपि चर्वितचर्वणम्, शब्दार्थसम्बन्धस्य नित्यत्वे दोषाभावात् । तथाहि नहि सम्बन्धस्य करणमिष्यते, किन्तुपदेश पूर्वक ही सृष्ट है, अतः यहाँ पर भी बाध्य है, अतः सत् से अभिन्न है । हैं, अतः जिस वस्तु का उससे अभिन्न तदुत्पत्ति लक्षण सम्बन्ध की उपपत्ति ( सिद्धि ) हो जाती है । चित् ( ज्ञान ) स्वप्रकाश है । यह सत् भी स्वप्रकाश है, अतः वह चित् से अभिन्न है । शब्द और अर्थ चित् और सत् के ही विवर्त वस्तु के साथ अभेद है तो उस वस्तु के साथ भी अभेद आवश्यक होगा, इस नियम के अनुसार शब्द और अर्थ का तादात्म्य सम्बन्ध भी बन सकेगा । इसीलिये श्रुति का यह उल्लेख है कि सब कुछ ब्रह्म ही है । tear विकारों की सत्ता उनके अधिष्ठानों की सत्ता से अतिरिक्त ( भिन्न ) नहीं होती, अतः अर्थ की सत्ता नाममात्र की है. अर्थात् वे नाम ( शब्द ) से अतिरिक्त नहीं हैं, इस तरह से भी सम्बन्ध ग्रहण पर जोर देने वाले बौद्ध को समझा कर संतुष्ट किया जा सकता है । वैदिक शब्दों की और उनके संकेतों की नित्यता के रहते हुए भी व्यवहार, परम्परा और उपदेश नादि के द्वारा संकेत का ग्रहण होता ही है, इस तरह से उनकी स्वार्थबोधकता के कारण सार्थकता बनी रहती है । कोई वस्तु किसी यथार्थरूप में देखी जाती है तो उसमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं खड़ी की जा सकती । वैदिक शब्दों से नास्तिकों को भी अर्थ का बोध होता ही है । इस परिस्थिति में उनको अनर्थक बताना व्यर्थ की बात है । इसी बात को निम्न कारिका में यों कहकर धर्मकीर्ति की कारिका का उत्तर दिया गया है- ' वैदिक वाक्यों की पुरुषसंकेत निरपेक्षता, असंस्कार्यता के रहने पर भी सार्थकता यों मानी जायगी कि शब्दार्थ-सम्बन्ध के नित्य सिद्ध रहने पर भी उसका व्यवहार की परम्परा से प्रकाश होता ही है ' | यह भी कहा गया है कि-- ' शब्दार्थसम्बन्ध नित्य है या अनित्य? यदि अनित्य है तो आकुंचन प्रभूति के समान वह पुरुष की इच्छा का अनुसरण करता है अथवा अंकुरादि के समान इच्छा के अधीन नहीं है? यदि वह अंकुर के समान इच्छा के atta नहीं है तो उसके पुरुष के अधीन न होने से पुरुष के अभिप्राय के अनुसार देशादि की अन्यथा स्थिति की दशा में उस शब्द से अर्थ का प्रतिपादन न होगा । प्रतिपादन की इच्छा के रहने पर भी जो उसके अधीन नहीं है, उसकी पर्वतादि की भांति नियोजकता नहीं सिद्ध हो सकती । इसमें दृष्टापत्ति नहीं दिखाई जा सकती, क्योंकि देशादि के परिवर्तन के साथ अपने अभिप्राय के अनुसार शब्द का प्रयोग देखा जाता है । शब्दार्थ की नित्यता में भी ये ही दोष रहेंगे । नित्य शब्द स्थिर है, इनका अनित्य अस्थिर सम्बन्ध नहीं हो सकता । आकाश के समान सर्वत्र समान रूप से अवस्थिति मानने पर किसी नियम के अभाव में उससे किसी विशेष अर्थ की प्रतिपत्ति न होने पर पूर्व की आपत्ति बनी रहेगी | यदि उसको पुरुष की इच्छा के अधीन माना जाता है तो उसमें पौरुषेपता की आपत्ति होगी, इत्यादि ' यह सब चति चर्वण मात्र है, क्योंकि शब्दार्थसम्बन्ध की नित्यता में कोई दोष नहीं उठता । यहाँ पर सम्बन्ध को उत्पन्न