वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 381–390

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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वेदार्थपारिजातः ३५१ एवेत्यवोम | नित्यशक्तैः शब्देरेव देशादीनामन्यथात्वेनापि प्रतिपादन सम्भवात् । यथा नियतैनित्यैरेव वर्णैर्विशिष्टपौर्वा पर्यविशिष्टैरनन्तपदभावापन्नंरनन्तपदार्थबोधस्तथैव विचित्रपौर्वापर्यविशिष्टे व क्यिभावापन्नैस्तैरेव विशिष्टाभिप्राय-बोधसम्भवात् । नहि तदर्थं नव्यसम्बन्धकरणमपेक्षितम्, नव्येरेव पदतत्सम्बन्धैव्र्व्यवहृतौ परस्परवार्तानभिज्ञतैव सर्वस्य प्रसज्येत । क्वचिन्नव्यपदतत्सम्बन्धकरणप्रचारणादिभिर्महतानेहसा तथा व्यवहारस्त्वपवाद एव । तथापि सम्बन्धोपदेशार्थ सिद्धसम्बन्धपदानामेव प्रयोगोऽनिवार्योऽन्यथा तदसम्भवात् । यथा लौकिकवाक्यानामनित्यत्वे पौरुषेयत्वे च सत्यपि न तद्दृष्टान्तेन वेदवाक्यानां तथात्वम्, तथैव केषाञ्चित्पदसम्बन्धादीनां पौरुषेयत्वाभ्युपगतावपि न पदसम्बन्धनित्यत्व-पक्षहानिः । अविच्छिन्नपारम्पर्यविशिष्टस्यास्मर्यमाणकर्तृ कत्वस्यापौरुषेयत्वसाधकस्योभयत्र जागरूकत्वात् । ननु ' सम्बन्धिनामनित्यत्वान्न सम्बन्धेऽस्ति नित्यता ' ( प्र ० वा ० ३।२३२ ) इति रीत्या सम्बन्धिनां वाच्यार्थानामनित्यत्वेन तदाश्रितस्य सुतरामनित्यता, यदि जातेनित्याया वाच्यत्वाददोष इति चेत्र, तद्वचने प्रयोजना-भावात्, सवत्र च जातेरसंभवादयोगः । ऐच्छिकेषु व्यक्तिवाचिषु देवदत्तादिशब्देषु च जातेरयोगश्च । सर्वदा जातिचोदने ( जातिवोधके शब्देऽभ्युपगम्यमाने ) विशेषान्तरव्युदासेन प्रवृत्ययोगाच्च न जात्यभिधानं सङ्गच्छते । दृश्यते च गामानयेत्युक्तावन्यस्वामिकगोव्युदासेन गोविशेषस्यानयनं प्रति प्रवृत्तिः । तस्मादन्वयव्यतिरेकिणो भावाभाववतो भाव-स्यैव सम्बन्धो वाच्यः । स च कारणान्वयव्यतिरेकिणो भावाभाववतः कार्यस्य जन्यजनकभाव एव भिन्नानां सम्बन्धः । नहीं करना है, केवल उसका उपदेश करना है, यह बात हम पहले ही कह चुके हैं । नित्य शक्तिसम्पन्न शब्द ही देशादि के भेद के रहने पर भी अर्थ के प्रतिपादन में समर्थ हो सकते हैं । जैसे नियत नित्य वर्ण ही विशिष्ट पौर्वापर्य प्रणाली से अनुस्यूत कर दिये जाने पर अनन्त पदों के रूप में परिवर्तित होकर अनन्त पदार्थों का बोध कराते हैं, उसी तरह से विचित्र पौर्वापर्य से युक्त होकर विशिष्ट वाक्यों के रूप में भी वे ही विशिष्ट अभिप्राय के बोधक हो सकते हैं । इसके लिये नये सम्बन्ध की कल्पना नहीं करनी पड़ती । यदि पदों और उनके सम्बन्धों की परस्पर नवीनता मानी जायगी तो व्यवहार में कोई भी किसी की भी बात समझ न सकेगा । कहीं - कहीं नये पद बनाकर उनके सम्बन्ध की कल्पना कर प्रचार के द्वारा बहुत समय बीतने पर व्यवहार चलाया जाता है, किन्तु ये अपवाद मात्र हैं । इस परिस्थिति में भी संबन्ध के उपदेश के लिये ऐसे ही पदों का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है, जिनका कि सम्बन्ध पहले से सिद्ध है, अन्यथा उनसे उपदेश भी सम्भव नहीं हो सकता । जैसे लौकिक वाक्यों की अनित्यता और पौरुषेयता के दृष्टान्त से after ों की अनित्यता और पौरुषेयता नहीं सिद्ध की जा सकती, उसी तरह से कुछ पदों के सम्बन्धादि की पौरुषेयता की स्थिति में भी पद सम्बन्ध के नित्यत्व पक्ष की कोई हानि नहीं होती, क्योंकि इन दोनों ही स्थलों में अविच्छिन्न परम्परा से विशिष्ट अस्मर्यमाण कर्तृत्व रूप हेतु अपौरुषेयत्व का साधक समान रूप से विद्यमान है । ver है कि ' जब संबन्धी ही अनित्य है तो उसका संबन्ध नित्य कैसे हो सकता है? ' अर्थात् संबन्धी वाण्यार्थ की अनिता के रहते तदाश्रित की अनित्यता अपने आप सिद्ध हो जायगी । यदि नित्य, जाति को वाच्य मान कर इस दोष का परिहार किया जाय तो इसमें हमको कोई तुक नहीं दिखाई देता । सर्वत्र जाति रहती भी नहीं है, अतः सर्वत्र उससे संबन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता । ऐच्छिक व्यक्तिवाची देवदत्त प्रभृति शब्दों में जाति मानी भी नहीं जाती । सर्वदा शब्द की जातिबोधकता मानने पर विशेषान्तर का परिहार कर दिये जाने से व्यक्ति की भिन्नता में शब्द की प्रवृत्ति न हो सकेगी, अतः शब्द की सर्वत्र जातिबोधकता नहीं बन सकती । हम देखते है कि ' गाय लाओ ' ऐसा कहने पर अन्य व्यक्ति की गाय को छोड़ कर उसी विशेष व्यक्ति की गाय लाई जाती है । इसलिये भावाभावस्वरूप अन्वयव्यतिरेकी का भाव से ही सम्बन्ध मानना पड़ेगा और वहाँ पर अन्वयव्यतिरेकी को कारण तथा भावाभाव को कार्य मातकर इनकी परस्पर भिन्नता के कारण जन्यजनकभाव सम्बन्ध मानना पड़ेगा | अर्थ के रहने पर ही शब्द का प्रयोग देखा जाता है, अर्थ के न रहने पर शब्द का प्रयोग भी नहीं होता, अतः इस भावाभाव को लेकर ही उनसे असंपृक्त अर्थ की प्रतीति शब्दार्थ की व्यवहार भावना से पुरुष को होती है, इस प्रकार यह सम्बन्ध पौरुषेय ही रहता है । ' इसका समाधान यह है कि लाघव के कारण जाति की ही वाच्यता स्वीकार करने योग्य है । यह जाति नित्य है, अत: इसके नाश का

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३५२ वेदार्थ पारिजातः अर्थे सति शब्दस्य प्रयोगादसति चाप्रयोगात्तावेव भावाभावावाश्रित्यासंसृष्टावपि शब्दार्थेर्व्यवहार भावनातः पुरुषस्य जात इति पौरुषेय: संश्लेष इति चेन्न, लाघवानुरोधेन जातेरेव वाच्यत्वाभ्युपगमेन तस्याश्च नित्यत्वेनोक्तचोद्यानवकाशात् । न च तदसिद्धि:, अनुगत प्रतीतिविषयत्वेन तत्सिद्धेः । ' अपि प्रवर्तत पुमान् विज्ञायार्थक्रियाक्षमान् । तत्साधनायेत्यर्थेषु संयोज्यन्तेऽभिधायकाः || ' ( प्र ० वा ०३ । ९ ३ ) अर्थक्रियायोग्यत्वाद् जातिप्रत्याख्यानमप्यनवधानमूलम्, प्रमाणसिद्धस्यापलापानर्हत्वात् । यत्तु नहि जातिर्बहिर्दोहादौ क्वचि दपि प्रत्युपस्थितान वा तादृशप्रकरणाभावे लोकव्यवहारेषु प्रयोगः, तदप्यकिञ्चित्करम्, स्वलक्षणस्यापि तद्विषयत्वात् । तदुक्तमेव-- ' शब्दाः सङ्केतितं प्राहुर्व्यवहाराय स स्मृतः । तदा स्वलक्षणं नास्ति सङ्केतस्तेन तत्र न || ' ( प्र ० वा०३।९ २ ) । प्राक् स्वलक्षणे कृतसङ्केतः शब्दः पश्चाद् योज्यत इति न युक्तम्, तस्य व्यक्ते देश कालभेदेष्वनास्कन्दात् । तथा च व्यक्ते रशक्यचोदनत्वाज्जातिरेष्टव्या । न चापोहस्य वाच्यत्वेन निर्वाहः, नीरूपत्वादपोहस्य बाह्यार्थप्रतीतेरसम्भवात् । न च ज्ञानांशे शब्दनिवेशो युक्तोऽनर्थक्रियाकारित्वात् । यद्यर्थक्रियाकारित्वेन प्रतिभासनात्तथात्वम्, तदा त्वनुगतप्रतीति-विषयत्वेन जातेरपि प्रतिभास इति कुतो नाभ्युपेयते । न वा ज्ञानांशस्यापोहस्य स्वलक्षणत्वात् शब्दवाच्यत्वं सम्भवति । अत्राहु: बाह्याभिन्त्रस्तावत् स्वांशो विकल्पे प्रतिभासत एव । न तावदस्य विकल्पग्राह्यत्वात्प्रतिभासः, सर्वात्मना निश्चयप्रसङ्गादनभ्युपगमाच्च । नापि विकल्पेन बाह्यात्मतयाऽध्यवसाय एवास्य ग्रहणम् । यथावस्थितेन स्वरूपेणाग्रहणादग्रहणे च कथं तत्र प्रतिभास:? ज्ञानस्वलक्षणत्वे तु स्वांशस्य संवित्स्वभावत्वात्प्रतिभासो युक्तः, अवसर ही नहीं है । जाति की सिद्धि उसकी अनुगत प्रतीतिविषयता के कारण हो जाती हैं । अर्थात् अनेक भिन्न - भिन्न गो आदि व्यक्तियों में ' गो गो गौ ' ऐसा एक अनुगत शब्द का प्रयोग और वैसा ही ज्ञान बिना एक जाति माने बन नहीं सकता, क्योंकि व्यक्ति free - fee हैं, इसलिये वे एक अनुगल शब्द और ज्ञान के विषय नहीं बन सकते, अतः अनेक भिन्न व्यक्तियों में रहने वाली एक जाति को ही उस एक शब्द और ज्ञान का विषय मानना पड़ेगा । प्रमाणवार्तिक की इस कारिका के आधार पर कि ' अर्थक्रिया में समर्थ शब्दों से ही पुरुष की प्रवृत्ति होती है, इस अर्थ -क्रिया को सामर्थ्य की सिद्धि के लिये ही शब्दों को संकेतों से जोड़ा जाता है, जाति में अर्थक्रिया सामर्थ्य के न रहने से उसका प्रत्याख्यान किया जाता है ' यह उक्ति भी बक्ता की असावधानी की ही सूचक है, क्योंकि प्रमाण से सिद्ध जातिरूप वस्तु का अपलाप नहीं किया जा सकता । ' जाति - वहन क्रिया या दोहन क्रिया आदि में बाहर कहीं दिखाई नहीं देती और बिना प्रकरण के लोक व्यवहार में भी उसका प्रयोग नहीं देखा जाता ' यह कथन भी एक दम व्यर्थ है, क्योंकि आपका स्वलक्षण भी न तो क्रिया में उपस्थित होता है और न व्यवहार में हो । जैसा कि श्लोकवार्तिक में कहा गया है-- ' शब्द संकेतित अर्थ को व्यक्त करते हैं और यह संकेत व्यवहार सम्पादन के लिये किया जाता है । उस समय स्वलक्षण की स्थिति नहीं रहती, अतः स्वलक्षण में संकेत नहीं हो सकता । ' पहले स्वलक्षण में संकेत कर दिया जाता है, बाद में वह व्यवहार से संबद्ध होता है, यह भी ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि देश और काल के भेद में उस संकेत से अर्थ की व्यक्ति संभव नहीं होती । इस प्रकार व्यक्ति के साथ शब्द संकेत को नहीं जोड़ा जा सकता, अतः जाति की मानना आवश्यक हैं । अन्यापोह को शब्द का वाच्य मान कर भी इस व्यवहार की निष्पत्ति नहीं की जा सकती, क्योंकि अपोह नीरूप ( रूप रहित ) है, उससे बाह्यार्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । ज्ञानांश में शब्द का निवेश इसलिये नहीं किया जा सकता कि वह अर्थ-क्रियाकारी नहीं होता । यदि ज्ञान का प्रतिभास आप अर्थक्रियाकारी के रूप में मानते हैं, तो अनुगत प्रतीति के रूप में जाति का प्रतिभास मानने में आपको क्या परेशानी है? आपके मत में यह भी आपत्ति है कि ज्ञानांश अपोह भी तो स्वलक्षण है, वह शब्दवाच्य कैसे हो सकता है? इस पर बौद्धों का कहना है कि विकल्प ( शब्द जन्य ज्ञान ) में बाह्य अर्थ से अभिन्न अपने अंश का भान होता ही है । यह प्रतिभास ( भान ) विकल्प ग्राह्य होने से नहीं होता, क्योंकि ऐसा मानने पर सर्वात्मना मिश्रय हो जायगा और ऐसा माना नहीं गया है | विकल्प से बाह्यार्थ के रूप में निश्चय ही इसका ग्रहण नहीं माना जाता, क्योंकि उसका यथावस्थित रूप से ग्रहण नहीं होता और जब ग्रहण नहीं होता तो उसका प्रतिभास कैसे हो सकता है? ज्ञान की स्वलक्षणता में वो स्त्रांश संवित्स्वभाव है, अतः उसका प्रतिभास हो

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वैवार्थपारिजातः ॐ भू तेनाविद्यारूपस्य स्वॉशस्य विकल्पस्य च यदि ज्ञानस्वलक्षणत्वं नेष्यते तदा प्रतिभास एव न स्यात् । एवमज्ञानरूपे च विकल्पेन कथं स्वांशस्य परिच्छेदोऽस्य ज्ञानधर्मत्वात् । तस्माज्ज्ञानस्वलक्षणत्वादेव स्वाशस्य विकल्पे प्रतिभासः । सबाह्याभिन विकल्पविषयो व्यवस्थाप्यते, तस्य संविदितरूपस्य वाह्याभेदेन विकल्पेनाध्यवसीयमानत्वात् । अत एव विकल्प: सामान्यविषय उच्यते, न स्वलक्षणविषयोऽर्थस्वांशयोरेकस्यापि स्वरूपेणाग्रहणात् । तेन स्वांशस्य ज्ञान-स्वलक्षणस्यापि बाह्यात्मतयाऽध्यस्तस्य सामान्यरूपत्वम् 1 । तदप्युक्तम्- ' ज्ञानरूपतयार्थत्वे सामान्ये चेत्प्रसज्यते । तथेष्टत्वादपोह्यार्थरूपत्वेन समानता || ' ( प्र ० वा ० २।९ ।१० ) इति, तदेतत्सर्वमविचारितरमणीयमेव, ज्ञानस्य निरंशत्वेन तत्रान्तरबाह्यभेदासम्भवात् । तथाहि -- न तावज्ज्ञाने स्वलक्षणे बाह्यभिन्नस्य स्वांशस्य प्रतीतिर्युक्ता, स्वलक्षणस्य बाह्यार्थशून्यत्वेन तत्र बाह्यार्थप्रतीतेविरुद्धत्वात् । यदि विकल्पेन तत्र बाह्यार्याध्यवसाय उच्येत तत्रापि वक्तव्यम्-किमनभिधेयस्य ज्ञानाकारस्य तद्विपरीतबाह्यार्थरूपेणाध्यवसायस्तद्रूपतया निष्पादनम्, अथवा तत्सम्बन्धनमाहो-स्विदारोपणम्? नाद्यः, अन्यस्यान्यरूपेण निष्पादनासम्भवात् । नहि शिल्पि सहस्राण्यपि घटं पटयितुमीशते । ततश्वान्तरं ज्ञानाकारस्य बाह्याकारतया निष्पादनमसम्भवमेव । न द्वितीयः आन्तरस्य वाह्यसम्बन्धनासम्भवात्, बाह्यस्याभावाच्च । तथात्वेऽपि बाह्यमस्तीति व्यवहारो न स्यात्, स्याच्च बाह्यमान्तरेण संयुक्तमिति व्यवहारः । समारोपणमपि गृह्यमाणे बाह्येऽगृह्यमाणे वा? प्रथमेऽपि विकल्पात्मकज्ञानेन गृह्यमाणे तत्क्षणोत्पन्नेन विकल्पज्ञानेन वा गृह्यमाणे? गृह्यमाणमपि स्वलक्षणं सामान्यरूपं वा? न स्वलक्षणं विकल्पग्राह्यं संभवति, अभिलापसंसर्ग-योग्यस्यैव विकल्पग्राह्यत्वात् स्वलक्षणस्य तदसम्भवात् । तदुक्तम् - ' अशक्यसमपोह्यात्मा सुखादीनामनन्यभाक् । सकता है | इसलिये यदि भविचारूप स्वांश और विकल्प की ज्ञानस्वलक्षणता नहीं मानी जाती तो उसका प्रतिभास ही नहीं होगा । इसी तरह से अज्ञानरूप विकल्प से स्वांश का परिच्छेद कैसे हो सकता है, क्योंकि परिच्छेद ( निश्चय ) तो ज्ञान का धर्म है । इसलिये ज्ञान की स्वलक्षणता के कारण ही स्वांश का विकल्प में प्रतिभास होता है । वह बाह्य से अभित और विकल्प का विषय माना जाता है, क्योंकि वह संविदित रूप बाध्य वस्तु से अभिन्न विकल्प के रूप में प्रतीत होता है । इसीलिये विकल्प को सामान्यविषयक कहा जाता है, स्वलक्षणविषयक नहीं, क्योंकि अर्थ और स्वांश इन दोनों में से एक भी अपने स्वरूप में गृहीत नहीं होता । इसलिये स्वांश के ज्ञानस्वलक्षण होने पर भी बाह्यार्थ रूप में अव्यस्ततया प्रतीति होने से सामान्यरूपता आ जाती है । जैसा कि इस कारिका में कहा गया है- ' विकल्प बुद्धि से प्रतिभासित होने वाले केशादि सामान्य में ज्ञानरूपता के कारण यदि स्वलक्षणता मानी जाती है । तो इसी पद्धति से सामान्य की भी स्वलक्षणता दृष्टापत्ति के रूप में मानी जा सकती है । ' किन्तु यह सब अविचारित रमणीय बात है, क्योंकि ज्ञान निरंश ( अंश रहित ) होता है, अतः उसमें ( भान्तर ) और बाध्य भेद नहीं होते । जैसे कि स्वलक्षण ज्ञान में बाह्यासिन स्वांश की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि स्वलक्षण बाह्यार्थ से शून्य है, इसलिये उसमें वाक्यार्थ की प्रतीति होना स्वरूप विरुद्ध है | यदि विकल्प से उसमें बाह्यार्थ का आरोप किया जाता है तो आपको इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा कि क्या अनभिधेय ज्ञानाकार का उसके विपरीत बाह्यार्थ रूप में अध्यवसाय उसकी बाह्यार्थ रूप में निष्पत्ति है या उससे संबन्धित कर देना अथवा उसका आरोप कर देना है? इसमें प्रथम पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि अन्य का अन्य के रूप में निष्पादन संभव नहीं है । हजारों शिल्पी मिलकर भी घट को पट नहीं बना सकते । इसी प्रकार बान्तर ज्ञानाकार को बाह्याकार के रूप में कभी नहीं बनाया जा सकता । द्वितीय पक्ष भी नहीं बनेगा | क्योंकि आम्तर पदार्थ को बाह्य से संबद्ध नहीं किया जा सकता और बाह्य वस्तु आपके मत में कुछ हूँ भी नहीं । ऐसा यदि मान भी लिया जाय तो उसके साथ यह बाह्य है, ऐसा व्यवहार न होकर बाह्य वस्तु अन्तर वस्तु से संबद्ध है, ऐसा व्यवहार होगा । यदि समारोप माना जाय तो यह बताना पड़ेगा कि यह समारोप बाह्य के गृहीत होने से होता है या गृहीत न होने पर भी? प्रथम पक्ष में भी पुनः प्रश्न होगा कि विकल्पात्मक ज्ञान से गृहीत होने पर ऐसा होगा या तत्क्षण उत्पन्न अविकल्पात्मक ज्ञान से गृहीत होने पर? यह गृह्यमाण भी स्वलक्षण है या सामान्यरूप? स्वलक्षण विकल्प ग्राह्य नहीं हो सकता, क्योंकि अभिलाप ( नाम ) के संसर्ग से युक्त वस्तु का ही विकल्प से ग्रहण होता है और स्वलक्षण में यह संभव नहीं है । जैसा कि इस कारिका में कहा गया है --- ' जिसका हुन्छ

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३५४ वेदार्थपारिजातः तेषामतः स्वसंवित्तिर्नाभिजल्पानुषङ्गिणी ॥ ' विकल्पप्रत्ययः संसर्गग्रहयोग्य जातिविशिष्टवस्स्वेव गृह्णाति स्वलक्षण-स्यानन्तत्वान्न तत्र शक्तिग्रहसम्भवः । अत एव सामान्यरूपमपि न ग्रहीतुं शक्यम्, व्यक्तिग्रहमन्तरा तत्सामान्यस्यापि ग्रहणासम्भवात् । यत्तु तत्समयोद्भुतनिर्विकल्पप्रत्ययेन गृह्यमाणे बाह्ये विकल्पप्रत्ययेन स्वाकार आरोप्यते, तदपि न क्षोदक्षमम् । सर्वस्यापोहरूपत्वमपि नोपपन्नम् । नोलत्वस्यानीलत्वव्यावृत्तिरूपत्वेऽपि नीलत्वप्रसिद्धिरपि वक्तव्या, अप्र-सिद्धप्रतियोगिया व्यावृत्तेरसंभवात् । तदसिद्धा तद्व्यावृत्तिरप्यसिद्धैव । तत्सिद्धौ कृतं तदपोहपर्यन्तानुधावनेन, तथा s दर्शनात् । तथाहि नान्यप्रत्ययभासितेऽधिष्ठानेऽन्येनारोप्यते । इदं रजतमिति ज्ञातेन स्वभासित एव पुरोवर्तिनि रजतमारोप्यते नान्यज्ञानेन भासिते । तथैव विकल्पेन स्वभासित एव गृह्यमाणे बाह्ये स्वाकार आरोपयितुं शक्यते, न निर्विकल्प प्रत्ययोद्भासिते । यदि त्वगृह्यमाणत्वेऽपि बाह्यस्य गृह्यमाणस्वलक्षणेनान्तरेण भेदाग्रहात्तत्र प्रवृत्तिः, तदा तु सर्वस्यैव तेन भेदाग्रहात्सर्वत्रव प्रवृत्तिः स्यात् । अतो ज्ञानाकारस्य बाह्यवस्तुरूपेणारोपो न सम्भवत्येव । एवमेव वासनापरिप्रापितकल्पितज्ञानाकारस्य बाह्यरूपेणारोप इत्यपि न समञ्जसम् ज्ञानस्य स्वप्रकाशत्वे बाह्याद् भेदप्रसिद्धेः । यत्तूक्तम् -- स्वांशस्य ज्ञानस्वलक्षणत्वे संवित्स्वभावत्वात्प्रतिभासो युक्तः, तदपि न समीचीनम्, बाह्याकार-ज्ञानस्वलक्षणत्वासम्भवात् । तथात्वे ज्ञानस्वलक्षणस्येव बाह्यस्यापि वस्तुत्वप्रसङ्गात् । तथा च न बाह्यापलापः सम्भ-बति, स्वांशस्य ज्ञानस्वलक्षणत्वेऽविद्यारूपत्वानुपपत्तिश्च । सममोहन किसी प्रकार नहीं किया जा सकता, वह स्वसंवित् सुखादि प्रतीति से पृथक नहीं हो सकती, अत: इस स्वसंवित्ति का कभी भी अभिलाप ( नाम आदि ) से संसर्ग नहीं हो सकता । ' विकल्प प्रत्यय सदा संसर्ग ग्रहण के योग्य जाति से विशिष्ट वस्तु का ही ग्रहण कर सकता है । स्वलक्षण अनन्त हैं, अतः स्वलक्षण में कभी भी शक्तिग्रह नहीं हो सकता । इसीलिये केवल सामान्य रूप का भी ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्ति के ग्रहण के बिना व्यक्तिनिष्ठ जाति का ग्रहण सम्भव नहीं होता । यह कथन भी तर्क की कसौटी पर ठीक नहीं उतरता कि तत्काल उत्पन्न प्रत्यय ( ज्ञान ) से बाह्य वस्तु के गृह्यमाण आकार में विकल्प प्रत्यय ( ज्ञान ) अपने आकार को आरोपित कर देता है, क्योंकि सभी पदार्थों की अपोहरूपता भी सिद्ध नहीं की जा सकती | नीलत्व यद्यपि अनील ra की व्यावृत्ति करता है, किन्तु नीलत्व की भी कोई स्थिति माननी ही पड़ेगी, क्योंकि अप्रसिद्ध प्रतियोगिक व्यावृत्ति नहीं बन सकती । प्रतियोगी की सिद्धि नहीं होती तो उसकी व्यावृत्ति भी कैसे सिद्ध होगी? यदि प्रतियागी सिद्ध हो जाता है तो फिर अपोह तक की दौड़ लगाना व्यर्थ है । ऐसा देखा भी नहीं जाता । जैसे कि अन्य प्रत्ययों से शासित अधिष्ठान में उससे भिन्न प्रत्यय का आरोप नहीं हो सकता । ' यह रजत है ' इस ज्ञान से प्रतिभासित सामने वर्तमान वस्तु में ही रजत का आरोप होता है, इसके लिये अन्य ज्ञान से मासित होने वाले में रजत का आरोप नहीं होता । इसी तरह से विकल्प से अपने से प्रतिभासित पूर्व गृह्यमाण बाह्य वस्तु में ही अपने आकार का आरोप किया जा सकता है, निर्विकल्प प्रत्यय से भाति वस्तु में नहीं | यदि आप बाह्य के गृहीत होने पर भी उसकी गृह्यमाण स्वलक्षण स्वरूप आन्तर ज्ञान से भेद का ज्ञान न होने के कारण उसमें प्रवृत्ति होती है, तब तो सभी पदार्थों से उसका भेद का ज्ञान न होने के कारण सर्वत्र प्रवृत्ति आप मानेंगे? अतः कहीं भी ज्ञानाकार का बाह्य वस्तु के रूप में आरोप नहीं हो सकता । इसी तरह से वासना से परिकल्पित ज्ञानाकार का वाह्य वस्तु के रूप आरोप होता है, यह कथन भी सही नहीं है, क्योंकि ज्ञान स्वप्रकाश है और उसका बाह्य वस्तुओं से भेद स्पष्ट सिद्ध है । यह जो कहा गया है कि स्वांश के ज्ञान स्वलक्षणरूप होने से वह संविस्वभाव स्वरूप है, है, किन्तु यह भी समीचीन नहीं है, क्योंकि बाह्याकार कभी ज्ञान स्वलक्षण स्वरूप नहीं हो सकता । अतः उसका ज्ञान होना ठीक हो यदि ऐसा माना जाय तो ज्ञान-स्वलक्षण की तरह बाह्य पदार्थों को भी आपको वास्तविक मानना पड़ जायगा । किसी भी तरह से बाह्य का अपलाप नहीं किया जा सकता । स्वांश के ज्ञानस्वलक्षण होने पर भी उसकी अविचारूपता भी तो नहीं बन सकेगी ।

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वेदार्थ पारिजातः ३५५ यत्तूक्तम् —— अविद्यारूपस्वांशस्य विकल्पस्य च यदि ज्ञानस्वलक्षणत्वं नेष्यते तदा प्रतिभास एव न स्यादिति, तदप्यस्थाने भ्रमः, बाह्यस्य ज्ञानभिन्नत्वेन ज्ञानविषयतया प्रतिभासोपपत्तेः । विकल्पस्य च साक्षिभास्यत्वात् । एतेन ज्ञानस्वलक्षणत्वादेव स्वांशस्य विकल्पे प्रतिभासः, स बाह्याभिन्नो विकल्पविषयो व्यवस्थाप्यते, इत्यप्यपास्तम्, विकल्पाविषयस्य विकल्पे प्रतिभासासम्भवात् । यदप्युक्तम् - तस्य संविदितरूपस्यैव बाह्याभेदेन विकल्पेनाध्यव-सीयमानत्वादिति, तदपि तुच्छम्, संविदितरूपस्य बाह्येनाभेदासम्भवात् । नहि संविदितरूपस्य प्रमितस्य रजतस्य पुरोवर्तिनाभेदः सम्भवति, अधिष्ठानारोप्ययोः संविदितयोरारोपासम्भवात् । व्यक्तीनामानन्त्यात्तत्र शक्तिग्रहोऽसंभवः । एकस्यां व्यक्तौ शक्तिग्रहे सत्यपि न सर्वत्र तद्ग्रहः । जातौ तु शक्तिग्रहे तद्वतीषु व्यक्तिष्वपि तद्ग्रहः संभवत्येव, लाघवात् । न च शब्दाबोधिते सम्बन्धे सत्यपि कथं व्यक्तिषु प्रवृत्तिः, नहि कश्चिद् दण्डं छिन्धीत्युक्त दण्डिनं छिनत्तीति वाच्यम्, अपोहेऽपि तत्तुल्यत्वात् । नहि नीलत्वोक्त्या नीलत्ववोघेना-नीलत्वव्यावृत्तिर्वोध्यते । तथैवात्रापि जातिबोधेन तदविनाभूताया व्यक्तेरपि बोधः समायात्येव । जातौ वाहदोहादीना -मसम्भवाद् व्यक्तिषु प्रवृत्तिर्भवत्येव । न च तथात्वे वक्तुरसम्बद्धप्रलापित्वमेवेति वाच्यम्, नीलत्वोक्त्यापोहरूपस्य ज्ञानस्यैव बोधेऽप्यसम्बद्धप्रलापित्वापातात् । अत्र तु तात्पर्यानुपपत्त्या लक्षणयापि व्यक्तिबोधसम्भवेन बाधानुपपत्तेः । ननु नार्थान्तरचोदनेऽर्थान्तरं लक्ष्यते J बलीवर्ददोहचोदनावदिति चेन्न, तत्परत्वातत्परत्वभेदेनोभयत्र वैल-क्षण्योपपत्तेः । गामानयेत्युक्त्या जातिमात्रस्य नयनानुपपत्त्या तत्सम्बद्धाया व्यक्तेरानयने तात्पर्यं विज्ञायते । नैवं बलीवर्द शङ्का उठाई जाती है कि अविद्यारूप स्वांश और विकल्प की यदि ज्ञानस्वलक्षणता नहीं मानी जाती तो प्रतिभास ( मान ) की उपपत्ति नहीं हो सकेगी, यह भी अनुचित स्थल में भ्रम की तरह है, क्योंकि बाह्य वस्तु ज्ञान से भिन्न है, अतः ज्ञानविषयतया उसके प्रतिभास की उपपत्ति सम्भव हो सकती है | free साक्षी के द्वारा भासित होता है । इसी समाधान से इस बात का भी उत्तर हो जाता है कि ज्ञान के स्वलक्षण होने से ही स्वांश का विकल्प में प्रतिभास होता है और वह बाह्याभिन विकल्प का विषय बनता हैं, क्योंकि जो विकल्प का विषय नहीं है, उसका विकल्प में प्रतिभास कैसे हो सकता है? यह कथन भी निराधार है कि संविदित रूप आन्तर ज्ञान का ही विकल्प के द्वारा बाह्य वस्तु से अभिन्न रूप में निश्चय होता है, क्योंकि संविदित रूप की बाह्य वस्तु से अभिन्नता नहीं बन सकती । संविदित रूपतया रूप में गृहीत रजत का पुरोबर्ती शुक्ति द्रव्य से अभेद नहीं हो सकता, क्योंकि अधिष्ठान और आरोप्य यदि सही रूप में विदित हो गये हैं तो ऐसी स्थिति में आरोप ( भ्रम आदि ) की संभावना नहीं हो सकती । व्यक्ति अनन्त हैं, अतः उनमें शक्तिग्रह नहीं हो सकता । एक व्यक्ति में शक्तिग्रह हो जाने पर भी सर्वत्र वह सम्भव नहीं है | यदि जाति में शक्तिग्रह मान लिया जाता है तो जाति वाले व्यक्ति में भी उसका ग्रहण सरलता से हो जायगा । यह शंका उठाना भी ठीक नहीं है कि व्यक्ति के साथ सम्बद्ध रहने पर भी शब्द तो जातिवाचक है, अतः वे व्यक्ति का बोध कराते नहीं । फिर व्यक्ति में प्रवृत्ति कैसे होगी? क्योंकि कोई भी व्यक्ति ' लकड़ी को छोलो ' ऐसा कहने पर लकड़ी वाले को नहीं छालने लगता । प्रत्युत लकड़ा को हो छीलता है । इसी तरह जाति में सङ्केत होने पर भी जाति विशिष्ट व्यक्ति में हा प्रवृत्ति होती है । फिर पूर्वोक दोष अन्यापोह को शब्द का वाक्य मानने वाले के यहाँ भी ज्यों का त्यों बना रहता है । हमारे यहाँ तो दण्ड को छोली या काटी इत्यादि व्यवहार से हो भी जाता है, किन्तु उनके यहाँ तो हो हो नहीं सकता । नीलत्व के उच्चारण करने से नीलत्य का बोध होने के साथ ही अनोलत्व से व्यावृत्ति का भी बोध होता है, उसी तरह से यहाँ पर भी जाति का बोध होने पर सदविनाभूत व्यक्ति का भी बोध हो जाता है । जाति में वाहन, दोहन आदि क्रियाएँ नहीं हो सकती, अत: उनकी प्रवृत्ति स्वभावतः व्यक्ति की ओर होती है । ऐसा मानने पर क्या का aaaa प्रतापी माना जायगा? तब तो नीतत्व के उच्चारण करने पर अपोह रूप ज्ञान का बोध मानने वाला भी असम्बद्ध प्रलापी क्यों न माना जायगा? हमारे मत में सो तात्पर्य की अनुपपत्ति होने पर लक्षणा से भी व्यक्ति का बोध होने में कोई बाधा नहीं है । प्रश्न अर्थान्तर ( भिन्न अर्थ = जाति ) के वाचक शब्दों से अर्थान्तर ( व्यक्ति ) कैसे लक्षित हो सकता है? कोई बैल को दुहने की बात करे तो वहाँ लक्षणा से क्या सहायता मिल सकती है? उत्तर है कि तत्परत्व और अतत्परत्व के कारण इन दोनों

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वेदार्थपारिजात: दोग्धीत्युक्त्या स्त्रियां प्रवर्तते, अपि तु वक्तारमसम्बद्धप्रलापिनमेव वेत्ति तत्र तात्पर्यासम्भवात् । न चैवं गङ्गायां घोष इत्यादिवाक्यस्यासंबद्धप्रलापत्वं वक्तुं शक्यम्, लक्षणादिवृत्तीनां शाब्दिकंरम्युपगमात् । नहि दण्डं छिन्धीत्युक्ते austr छेद्यत्वापत्तिः, तत्र यथाश्रुतार्थे वाघाभावात् । अन्यत्र शब्दस्वारस्याभावाच्च । नहि गङ्गायां घोष इत्यत्रेव गङ्गायां मत्स्य इत्यत्रापि तोरे लक्षणा, तत्रान्वयानुपपत्त्यादिलक्षणाबीजस्याभावात् । ननु व्यक्तो शब्दः कथं न योज्यते? किं व्यवधिनेति चेन्न } व्यक्तीनामानन्त्येन शक्तिग्रहासम्भवस्योक्तत्वात् । न चेदं जातिपक्षेऽपि समानम्, कतिचिद्व्यक्तिसम्बन्धेन जाती शक्तिग्रहे जाते तज्जातिद्वारैव सर्वव्यक्तीनां बोधसम्भवात् । इदमेव लक्षणस्यापि प्रयोजनं भवति । व्यक्तिश: पदार्थानां बोधनं न सम्भवति, लक्षणेन तु संभवति । तत एव वैयाकरणानामन्येषाञ्च तेथिकानां लक्षणे प्रवृत्तिः । नहि सर्वेषां लक्ष्याणां निर्देशः सम्भवति, लक्षणनिर्देशेन तु तल्लक्षितानां सर्वेषामपि बोधः सम्भवत्येव । ' अनन्तत्वात्तु लक्ष्याणां नान्तं यान्ति महर्षयः । लक्षणेन तु सर्वेषां पारं यान्ति विपश्चितः ॥ ' यत्त्वतं जातेर्व्यक्तिसहिता सहितावस्थयोरविशेषाद् विशेषेणार्थक्रियाक्षमस्य विशेषस्याक्षेपी निर्मूल इति, तन्न गामानय गां दोग्धीति व्यवहारान्यथानुपपत्त्याऽर्थक्रियाक्षमस्यार्थस्याक्षेपे बाघाभावात् । यदप्युक्तं न जातितद्वतोः कचि रसम्बन्ध इति, तदपि न, समवायसम्बन्धस्याभ्युपगमात् । वेदान्तरीत्या तादात्म्यसम्बन्धस्य च सम्भवात् । न च वेदान्तमते सामान्यानभ्युपगम इति वाच्यम्, भावानवबोधात् । तथाहि - त्वतला दिवेद्यसत्ताद्रव्यत्वादिजातेर्भाव पर्यवसायित्वेन स्थलों में जमीन - आसमान का अन्तर है । ' गाय लाओ ' ऐसा कहने पर जातिमात्र का आनयन नहीं हो सकता, अतः तत्सम्बद्ध व्यक्ति के आनयन में तात्पर्य मान लिया जाता है, किन्तु किसी के यह कहने पर कि ' बैल को दुहो ' व्यक्ति गाय के दुहने में उसका तात्पर्य न जानकर वक्ता को ही असम्बद्ध प्रलापी मान लेता है, क्योंकि उक्त वाक्य का गोदोहन में तात्पर्य नहीं होगा । किन्तु ' गंगा में घोष है ' इस तरह के वाक्य उक्त वाक्य की तरह असम्बद्ध प्रलाप नहीं माने जाते, क्योंकि शाब्दिकों ने लक्षणा प्रभृति वृत्तियों को स्वीकार किया है । ' दण्ड को छीलो ' ऐसा कहने पर दण्डी के छेद की आपत्ति नहीं बन सकती, क्योंकि यथाश्रुत अर्थ में कोई भाषा नहीं उपस्थित होती और इन शब्दों का स्वारस्य किसी अन्य अर्थ के प्रतिपादन में है भी नहीं । ' गंगा में घोष है ' इस वाक्य की तरह ' गंगा में मत्स्य है ' इस वाक्य की भी तीर में लक्षणा नहीं हाती, क्योंकि यहाँ पर अन्वयानुपपत्ति प्रभूति लक्षणा के बीज नहीं है । प्रश्न उठता हैं कि तब शब्द को सीधे व्यक्ति से क्यों नहीं जोड़ा जाता, बीच में जाति का व्यवधान मानने से क्या फायदा है? इसका उत्तर दिया जा चुका है कि व्यक्ति अनन्त हैं, यतः उनमें शक्तिग्रह असंभव है । जाति को मानने पर भी यही दोष उपस्थित होता हो, सो बात नहीं है, क्यों कहीं पर किसी एक व्यक्ति से सम्बद्ध जाति में एक बार शक्ति का ज्ञान हो जाने पर उस जाति के द्वारा ही सभी व्यक्तियों का बोध ( ज्ञान ) संभव हो सकेगा । प्रत्येक वस्तु के लक्षण का भी यही प्रयोजन है । व्यक्तिशः पदार्थों का बोध नहीं होता, किन्तु अपने लक्षण से यह हो सकता है । इसीलिये वैयाकरण एवं अन्य शास्त्रकार लक्षण के लिये प्रवृत्त होते हैं । सभी लक्ष्यों का निर्देश नहीं किया जा सकता, किन्तु लक्षण का निर्देश कर देने पर उस लक्षण से लक्षित सभी लक्ष्यों का बोध सम्भव हो जाता है । निम्न श्लोक में यहीं बात कही गई है-- ' लक्ष्य अनन्त हैं, अतः उनका अन्त महर्षिगण भी नहीं पा सकते । इसी लिये विपश्चिद् गण ( विद्वान् लोग ) लक्षणों के सहारे इनके पार को पाते हैं ' । यह कहना कि जाति की व्यक्ति से युक्त और वियुक्त दोनों अवस्थाएँ समान रूप से विद्यमान रहती है, अतः उससे केवल अर्थक्रिया समर्थ विशेष का ही विशेषेण आक्षेप होगा, ऐसा कथन निर्मूल है | यह शंका इसलिये गलत है कि ' गाय लाको ', ' गाय हो ' आदि व्यवहार अर्थक्रिया में समर्थ व्यक्ति का आक्षेप किये बिना नहीं बन सकेगा । अत: अर्थक्रिया में समर्थव्यक्ति का आक्षेप से ज्ञान होने में कोई बाधा नहीं है । जाति और जातिविशिष्ट व्यक्ति का कोई संबन्ध नहीं है, यह कहना भी गलत है, क्योंकि इन दोनों में ears संबन्ध माना जाता है । वेदान्तमत से इनमें तादात्म्य संबन्ध है । वेदान्त मत में भी सामान्य नहीं माना गया हैं, यह उक्ति उसका तात्पर्य समझ न पाने के कारण है । जैसे कि त्व, तल आदि प्रत्ययों से वेद्य सत्ता द्रव्यत्व आदि जाति भाव-

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३५७ कार्याणां भावस्य चान्वयव्यतिरेकाभ्यां कारणपर्यवसायित्वेन कार्याकारेणावस्थिते कारण एवं कार्यभावस्य पर्यवसानम् । एवञ्च घटत्वस्य घटाकारेणावस्थितायां मृदि पर्यवसानम्, मृत्त्वस्य मृदाकारेणावस्थिते जले, जलत्वस्य जलाकारेण परिणते तेजसि, तेजस्त्वस्य तेजोरूपेणावस्थिते वायो, वायुखस्याकाशे, तस्याहमि, तस्य च महति, तस्याव्यक्ते, तस्य च सति । तदुक्तम् -- ' सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः । तस्यापि भगवान् कृष्णः किमलद्वस्तु रूप्यताम् ॥ ' भवति कार्याकारेण परिणामं प्राप्नुवति, कारण इत्यर्थः । अत एव परापरजातिषु व्याप्यव्यापकभावोऽपि सङ्गच्छते । पर * सामान्यरूपायाः सत्तायाः परत्वेन व्यापकत्वमेव, नापरत्वं व्याप्यत्वं वा तस्याः, सर्वकारणरूपत्वात् । घटादी सत्ताद्रव्यत्व-पृथिवीत्वत्वानां परत्वापरत्वेन व्याप्यव्यापकत्वञ्च स्पष्टमेव । कार्यस्य नानात्वेन कारणस्यैकस्य तत्समवेतत्वमपि सङ्गच्छते । तथा च परापरसामान्यस्य कारणपर्यवसायित्वेन तदनतिरिक्तत्वमेवेत्यत्रेव वेदान्तिनां तात्पर्यम् । अत एव अन्योऽन्यं जन्यजनकत्वेनानुपकारात्ततो लक्षणमप्ययुक्तमित्याद्यनुपपन्नम्, समवायादिसम्बन्धस्य तत्र वक्तुं शक्यत्वात् अपि च, यथा बौद्धमते व्यावृत्तेर्वाच्यत्वेऽपि व्यावृत्तिविशिष्टोऽर्थो बोध्यते तथैव मीमांसकनये जातेर्वाच्यत्वेऽपि जाति-विशिष्टोऽर्थो बोध्यताम् । यथा केवलाया जातेर्नार्थक्रियाकारित्वं तथैव केवलाया व्यावत्तेरपि । तथा च सर्वाण्यपि कुचोयानि तदभिमतव्यावृत्तावपि प्रसरन्त्येव । यदुक्तम्- - जातिमपि ह्यभ्युपगच्छताऽवश्यं वस्तुन्यम्युपगन्तव्यानि तदभावेऽस्या अभावप्रसङ्गात् । भावानां भेदाभावे चानेकार्थसमवेताया जातेरभावाच्च । तदप्यकिञ्चित्करम्, अनुक्तोपालम्भात् । तथाहि —क एवं ब्रूते वस्तुनि पर्यवसायिनी होती है । कार्यों का और भाव का अन्वयव्यतिरेक होने से कारण में पर्यवसान होता है, अतः कार्य के आकार में अवस्थित कार्यभाव का कारण में ही पर्यवसान माना जाता है । इस पद्धति से घटत्व का घटाकारेण अवस्थित मिट्टी में पर्यवसान होता है, मृत्य का मृदाकारेण मवस्थित जल में, जल का जलाकारेण अवस्थित तेज में, तेज का तेजोरूपेण व्यवस्थित वायु में, वायु का आकाश में, आकाश का अहंकार में अहंकार का महत्तत्व में और महत्तत्त्व का अव्यक्त प्रकृति में एवं व्यक्त का सतृ में पर्यवसान होता है । जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है- ' सभी वस्तुओं का भावरूप ' भू ' धातु के अर्थ में विद्यमान रहता है और उस ' भू ' धातु के भावरूप अर्थ at are भी भगवान् श्रीकृष्ण ही है, अतः ऐसी कौन वस्तु हो सकती है, जो कि भगवत्स्वरूप न हो, कोई बताये तो सही? ' यहाँ पर ' भवति ' यह पद सप्तमी का एक वचन हैं, इसका अर्थ है कि ' कार्याकार से परिणाम को प्राप्त होने वाले कारण में ' । इसीलिये पर और अपर जाति में व्याप्यव्यापकभाव बन सकता है । पर सामान्य रूप सत्ता सदा परत्वेन अवस्थित रहती है, अतः यह सदा व्यापक है । वह कभी भी अपरत्व या व्याप्यत्व कोटि में नहीं जा सकती, क्योंकि यह सत्ता सभी को कारणभूत है, किसी का कार्य नहीं । घटादि में तो सत्ता, द्रव्यत्व, पृथिवीत्व, घटत्व आदि का परत्व और अपरत्व प्रयुक्त व्याप्यव्यापकभाव स्पष्ट ही प्रतीत होता है । कार्य नाना हैं, एक कारण में वे समवाय सम्बन्ध से रहते हैं, ऐसा मानना सही है । इस तरह से वेदान्तियों का तात्पर्य इतना ही है कि परस्पर सामान्य का कारण में पर्यवसान होने से वे कारण अतिरिक्त ( भिन्न ) नहीं हैं, किन्तु अभिन्न ही हैं । इसी लिये इनकी अन्योन्य जन्यजनकता के कारण कोई उपकार न हो पाने से इनका लक्षण भी नहीं बन सकता ' यह शंका भी निर्मूल हो जाती है, क्योंकि इनमें समवाय, तादात्म्य आदि सम्बन्ध बताये जा सकते हैं । दूसरी बात यह है कि जैसे बोद्ध मत में व्यावृत्ति की वाच्यता रहने पर भी व्यावृत्ति से विशिष्ट अर्थ बोधित होता है, उसी तरह से मीमांसक के मत में जाति की वाच्यता होने पर भी जातिविशिष्ट अर्थ की बोधकता क्यों नहीं मानी जा सकती? जैसे केवल जाति में अर्थक्रियाकारिता नहीं बन सकती, उसी तरह से केवल व्यावृत्ति में भी यह नहीं बनती । इसी लिये बौद्ध दार्शनिकों के द्वारा उठाये गये सभी कुवोध उनके द्वारा अंगीकृत व्यावृत्ति ( अपोह ) में भी उठ खड़े होते हैं । यह भी कहा गया है कि ' जाति को मानने पर उसके साथ वस्तुओं के अभाव में जाति कहाँ रहेगी? इन वस्तुओं में यदि भेद नहीं वस्तुओं की सत्ता को भी अवश्य मानना पड़ेगा, क्योंकि माना जायगा तो अनेक वस्तुओं में रहने वाली जाति को

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३५८ वेदार्थपारिजातः न सन्ति, तद्भेदा वा न सन्ति । शब्दवाच्यानि वस्तूनि व्यावृत्तयो वा शब्दार्था इत्यभ्युपगमेन निर्वाह इत्येव तु ब्रूमः | नापि नित्यायाः कारणात्मिकाया जातेर्व्यक्तीनामभावेऽभावो व्यक्तीनामभिव्यञ्जकत्वात् । नहि कार्याणामभावेऽपि कारणाभावः । न च वेदान्तिमते जातेर बीकार इति वाच्यम्, परमार्थतो जातेरनङ्गीकारेऽप्यनिर्वचनीयाया जाते-र्व्यावृत्ते रिवाङ्गीकारात् । व्यावृत्तिरपि न प्रमाणसिद्धा । न च सर्वाण्येव वस्तुनि व्यावृत्ताकारेणैवोपलभ्यन्त इति वाच्यम्, तस्या उपलब्धेर्भ्रमरूपत्वात् । तथाहि - घटो व्यावृत्तरूपेणोपलभ्यः । कस्माद् व्यावृत्त इत्यपेक्षायां स्वेतरेभ्यः सर्वेभ्य एव व्यावृत्त इति वक्तव्यम् । तथा च व्यावृत्तिप्रतियोगिसकलवस्तुनां प्रतियोगिविधया ज्ञानमावश्यकम् । न च सकलवस्तुज्ञानमसर्वज्ञस्य संभवति । तथा प्रतियोगिज्ञानं भ्रमात्मकमेव । तस्मिन् ज्ञाने भासमानत्वाद् व्यावृत्ति-स्तदनुयोगी घटश्च भ्रमविषयत्वेनानिर्वचनीय एव । अत एव एकस्माद्भेदस्तदन्येषामभेदस्तद्विशिष्टेषु प्रतिपत्तिरस्तु इत्यपास्तम्, उक्तरीत्या सामान्यप्रतिपत्तेर्जात्यालम्बनतया निष्प्रत्यूहत्वेन कार्याणां तदालम्बनतानुपपत्तेः । व्यावृत्तिरूपे ज्ञानरूपे वा s पोहेऽर्थक्रियानुपपत्तिस्तु स्थवोयस्येव । यदुक्तम् - शब्द प्रयुञ्जानोऽनिष्टपरिहारेण प्रवर्तेतायमित्यभिप्रायेण प्रयुङ्क्ते, तत्र चान्यत्र च प्रवृस्यनु-ज्ञायामभिधानग्रहणवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । अन्यव्यावृत्त्यनभिधाने चेकचोदनादरादवचनमेव स्यात् । तस्मादवश्यं व्यवच्छेदोऽ-ऽभ्युपेयः । स च तदन्येष्वभिन्नश्चेज्जातिधर्मोऽप्यस्ति । तं नियतचोदनं जात्यर्थप्रसाधनं परित्यज्यार्थान्तरकल्पनमनर्थ-निर्बन्ध एव, यथाकल्पनमस्यायोगात् । तदन्यपरिहारेण प्रवर्ततेति च ध्वनिरुच्यते । तेन तेभ्योऽस्याव्यवच्छेदः । कथञ्च स आपत्ति न हो सकेगी । ' यह शंका भी हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकती, क्योंकि यह जो हमने नहीं कहा है, उस पर उपालम्भ है । यह कौन कहता है कि वस्तुएँ नहीं है और उनके भेद नहीं है, हम केवल इतना ही कहते हैं कि शब्दवाच्य वस्तुएँ हैं, अथवा व्यावृत्तियों है, केवल इतना मानने से लोक व्यवहार का निर्वाह नहीं होगा । नित्य कारणात्मक जाति का व्यक्तियों के अभाव के रहने पर अभाव नहीं माना जा सकता, क्योंकि व्यक्तियों उसकी केवल अभिव्यंजक होती है । कार्य के अभाव होने पर कारण का अभाव कहीं नहीं माना जाता । वेदान्ती के मत में जाति को स्वीकार नहीं किया गया है, ऐसा भी नहीं कह सकते, } क्योंकि परमार्थतः यद्यपि वहाँ पर जाति को स्वीकार नहीं किया गया है, तथापि व्यावृत्ति की तरह ही अनिर्वचनीय जाति को तो माना हो गया है । व्यावृत्ति भी प्रमाण सिद्ध नहीं है । सभी वस्तुएं व्यावृत्त आकार में ही उपलब्ध होती है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस तरह की उपलब्धि भ्रमात्मक है । जैसे कि घट को व्यावृत्त रूप में उपलब्ध करना है । वह किससे व्यावृत्त हैं? इस प्रकार के प्रश्न के होने पर अपने से भिन्न सभी पदार्थों से व्यावृत्त है, यही उत्तर देना पड़ेगा । यहाँ पर व्यावृत्ति के प्रतियोगीभृत सकन वस्तुओं का प्रतियोगी के रूप में ज्ञान आवश्यक हैं । इन सकल वस्तुओं का ज्ञान असर्वज्ञ को नहीं हो सकता । यह प्रतियोगी का ज्ञान भी भ्रमात्मक हो है । उस ज्ञान में भासमान व्यावृत्ति और उसका अनुयोगी घट भी भ्रम का ही विषय है, अतः इसकी अनिर्वचनीयता ही मानी जायगी । इसलिये एक से भेद होगा और तदन्य से अभेद होगा और तद्विशिष्ट में प्रतिपत्ति मान ली जायगी, यह कथन भी खंडित हो जाता हैं, क्योंकि उक्त पद्धति से सामान्य की प्रतिपति निर्वाध रूप से जाति का ही अवलम्बन करती है, अत: कार्यों का आलम्बन अपोह नहीं बन सकता । व्यावृतिरूप अथवा ज्ञानरूप अपोह में अर्थक्रिया नहीं बन सकती, यह तो बड़ी मोटी बात है । यह भी कहा गया है कि ' शब्द का प्रयोग करने वाला इस अभिप्राय से उसका प्रयोग करता है कि व्यक्ति अनिष्ट का परिहार करते हुए किसी कार्य में प्रवृत्त हो । } यदि दृष्टानिष्ट सभी स्थलों में प्रवृत्ति की अनुज्ञा दी जाय तो अभिधान का ग्रहण ही व्यर्थ हो जायगा । अन्य की व्यास को यदि अभिहित नहीं करना है तो एक ही उपदेश से काम चल जाने पर वचनान्तर की आवश्यकता हो नहीं रहेगी । इसलिये व्यवच्छेद को अवश्य मानना पड़ेगा । यदि वह तदन्य से अभिन्न है तो वह जाति का धर्म भी होगा । इस प्रकार से नियतबोधकता वाले तात्पर्य प्रसाधक व्यवच्छेद को छोड़कर अर्थान्तर की कल्पना करना व्यर्थ ही है । कल्पना के अनुसार उसका योग होता भी नहीं । तदन्य ( घटभिन्न ) का परिहार करके प्रवृत्त हो, यही ध्वनि अर्थात् अभिप्राय कहलाता है | अतः

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वेदार्थपारिजातः ३५ ९ इति, तन्त्र, शब्दानां प्रातिस्विकस्वार्थबोधनद्वारेव व्यावृत्तिबोधसम्भवात् । नोलत्वादीनि विशेषणानि हि स्वार्थबोधन-द्वारेव तदितरव्यवच्छेदकानि दृष्टानि । तथा च व्यावृत्तिबोधात्प्राक् स्वार्थबोध आवश्यकः । व्यक्तिषु शक्तिग्रहासम्भवेन जातिद्वारेव तद्बोधनमुचितम् । व्यावृत्तिस्त्वार्थिकी । न सा शब्दवाच्या | अनन्यलभ्यस्यंव शब्दार्थत्वात् । अत एव नियताभ्युपगमं नियतचोदनं व्शवत्यर्थसाधनं सामान्यं परित्यज्यान्यार्थकल्पनमेवानर्थनिबन्ध: । जातिनं प्रवृत्तियोग्या चेत्सुतरां व्यावृत्तिरपि न तद्योग्या । व्यावृत्तिविशिष्टोऽर्थो योग्यश्चेज्जातिविशिष्ट ' ऽस्तु सुतरां योग्यः । अभिधालक्षणाभ्यामभिधयैव जातितद्वतोः शब्दार्थत्वेऽभ्युपगम्यमाने न मनागपि दोषः । न च व्यावृत्ति-तद्वतोरेव कुतो न शब्दार्थत्वमिति वाच्यम्, तस्या अवस्तुत्वात् । न च जातिरप्यवस्त्वेवेति वाच्यम्, तस्या अनुगत-शब्दबुद्धिगोचरत्वेन वस्तुत्वसाधनात् । कारणरूपत्वेनापि वस्तुत्वपर्यवसानात् । न चाभावरूपाया व्यावृत्तेः सद्भावः शक्यसमर्थनः, व्याघातात् 1 यदध्युक्तम् - शाब्दप्रत्ययो वस्तुग्राही, स विभ्रमवशादकारकेऽपि कारकाध्यवसायी | तत् ( साध्य ) प्रतिबन्धे सति वस्तुसंवादः स्याद् वस्तुत्पत्त्या, नान्यथा, तदपि कुशकाशावलम्बनम्, वस्तूत्पत्त्यानान्तित्वसिद्धेः । ननु मणि-प्रभायां मणिभ्रान्तिसंवाददर्शनमिवात्रापि स्यादिति चेन्न तस्याः काकतालीयत्वेनातन्त्रत्वात् । यथा प्रातिभज्ञानस्य ादित्वेऽपि न प्रामाण्यकोटौ निवेशस्तथैवेहापि बोध्यम् । अपि च, यदा वित्तथप्रतिभासिनोऽपि शब्दप्रत्ययस्य वौद्धमते व्यवहाराङ्गत्वं तदा जातिबोधकस्य जाति-विशिष्टव्यक्तिबोधकस्य तस्य व्यवहाराङ्गत्वे का बाधा? यदि बौद्धमतेऽत्यन्तासतोऽपि बाह्यार्थस्यार्थक्रियाक्षमत्व उन पदार्थों से इस जाति का जब व्यवच्छेद है तब वह उसके साथ कैसे रह सकती । ' इसका उत्तर इस प्रकार है कि शब्द अपने नियत अर्थ का ज्ञान कराते हुए ही व्यावृत्ति का भी बोध करा सकते हैं, क्योंकि घट के नील आदि विशेषण स्वार्थबोधन द्वारा ही वदितर ( नील नि ) से भिन्न का ज्ञान कराने वाले देखे जाते हैं । इसलिये व्यावृत्ति के बोव से पहले स्वार्थ का बोध आवश्यक है । व्यक्तियों में नहीं हो सकता, अतः जाति के द्वारा ही उनका बोधन उचित है । व्यावृत्ति अर्थतः सिद्ध है, अतः वह शब्द की बाच्य नहीं है, क्योंकि शब्दार्थ अनम्यलभ्य होता है । इसीलिये नियत अभ्युपगम और नियत उपदेश वाले व्यावृत्तिरूपो प्रयोजन के साधन भूत सामान्य जाति को छोड़कर अर्थान्तर की कल्पना करना अनर्थ का ही कारण हो सकता है । जाति यदि प्रवृत्तियोग्य नहीं है तो व्यावृति तो जाति की अपेक्षा भी इसके लिये अधिक अयोग्य है । व्यावृत्ति से विशिष्ट अर्थ योग्य है तो जाति से विशिष्ट अर्थ तो उससे भी अधिक योग्य है । after और लक्षणा से और केवल अभिधा से भी जाति और तद्वान् को शब्दार्थ मानने में लेशमात्र भी दोष नहीं है । व्यावृति और तद्वान् ही शब्द के अर्थ इसलिये नहीं हो सकते कि ये वस्तुभूत नहीं है । जाति को तो अवस्तु नहीं सिद्ध कर सकते, क्योंकि वह अनुगत शब्दजन्य ज्ञान की विषय है, अतः उसमें वस्तुत्य की सिद्धि हो जाती हैं और कारणरूप होने से भी जाति में वस्तुत्व की सिद्धि होती है । व्यावृत्ति तो अभावरूप है, इसका सद्भाव किसी भी कीमत पर समर्थित नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा करने में स्पष्ट व्याघात है । यह भी कहा गया है कि ' शाब्द प्रत्यय ( शब्दजन्य ज्ञान ) वस्तु का ग्रहण करता है | विभ्रम अवस्था में वह अकारक में भो कारक का अध्यवसाय पैदा कर देता है । विभ्रम में प्रतिबन्ध लगने पर ही वस्तु का सही परिज्ञान होने से वस्तु का संवाद हो सकता हैं, अन्यथा नहीं, ' किन्तु यह कथन भी बाढ में कुश - काश का सहारा लेने की तरह है, क्योंकि इस परिस्थिति में वस्तु की बाद में उत्पत्ति होने से नामित की सत्ता सिद्ध हो जाती है | मणिप्रभा में मणि को भ्रान्ति की तरह यहाँ पर संवाद का समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि काकतालीय न्याय से यथाकथंचित् निष्पत वस्तु को प्रमाण नहीं माना जाता । जैसे प्रातिभ ज्ञान का कहीं संवाद हो जाने पर भी उसको प्रमाण कोटि में नहीं क्खा जाता, उसी तरह यहाँ पर भी समझना चाहिये । दूसरी बात यह है कि जब बौद्ध मत में मिथ्या प्रतिभासित होने वाले शाब्द प्रत्यय ( शब्दजन्य ज्ञान ) को व्यवहार का अङ्ग मान सकते हैं, तो जातिनोधक और जातिविशिष्ट व्यक्तिबोधक शब्द प्रत्यय ( शब्द से होने वाले ज्ञान ) को व्यवहार का अंग

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
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३६० वेदार्थपारिजातः aar कारणात्मिकाया जातेस्तद्विशिष्टस्यार्थस्यार्थ क्रियाक्षमत्वं कथं न स्यात्? किञ्च शाब्दप्रत्ययस्य यदि वितथ-प्रतिभासत्वं तहि चाक्षुषादिप्रत्यक्षस्य कुतो न वितथप्रतिभासत्वम्? तदा शान्तिप्रमाभेद एव किंमूलकः? किञ्च, यथानुमितेः परोक्षापरोक्षदेशकालसाधारणवस्तुविषयकत्वं तथैव शाब्दप्रत्ययस्येति कुतः शाब्दप्रत्ययस्यैव विप्रति-भासित्वम्? यदपि सामान्यस्यार्थक्रियायोग्यत्वादप्रवृत्तिस्तस्मिन्नन्यत्रापि प्रवृत्तावतिप्रसङ्गः ( गोशब्दादश्वादी प्रवृत्तिः ) स्यादिति । तदपि पिष्टपेषणम्, लक्षणावृत्त्या सामान्यवाचिशब्दानां व्यक्तिबोधवैशेष्यस्योक्तत्वात् । एतेन स्वलक्षण-स्यानन्त्येनाशक्यसम्बन्धत्वेन सामान्यलक्षणस्यानर्थक्रियाकारित्वेन भिन्नाभासा बुद्धिरर्थक्रियाकारिण्यां व्यक्तौ पर्यवस्यति, श्लिष्टाभासाया भ्रान्ताया बुद्धेः स्वसामान्यलक्षणयोरेकस्याप्यग्रहणात् । भ्रान्ताया बुद्धेः प्रवृत्त्यभ्युपग-मेनापोहवाद एवास्थीयतामिति निरस्तम्, विशिष्टबुद्धेः सर्वस्याऽपि भ्रान्तत्वापत्तेः । नहि विशिष्टबुद्धावेकस्या-ग्रहणेऽपि भ्रान्तत्वमुपैति कश्चिदप्यजङः । अपि च, बाधाभावात्कुतो भ्रान्तत्वं शाब्दप्रत्ययस्याध्यवसातुं शक्यते? भिनास्वपि व्यक्तिषु सामान्यस्यान्वयादेव संवेषेति प्रत्यभिज्ञाप्युपपद्यते । कारणस्यान्वयादेव कार्येषु संवेयं मृदिति प्रत्यभिज्ञा स्पष्टैव । यदुक्तं वस्तुभेदेऽपि सदृशादिक्रियया चक्षुरादिवत्प्रत्यभिज्ञानमुपपद्यत इति, तदपि तुच्छम्, बौद्धमते क्षणिकस्य ग्रहीतुः सादृश्यग्रहणासम्भवात् । न च विभ्रमवशात्सर्वमुपपद्यते, बाधाभावेन तदनुपपत्तेः । अत एव सम्बन्धिविनाशेऽर्थान्तरेऽभावः अर्थानामवाच्यता वा मा भूदिति कृत्वोत्पन्नोत्पन्नोऽर्थः सम्बन्धवान् यद्युत्पद्येत सम्बन्ध उत्पन्नोऽपि न शब्दे स्यात्, तेनासम्बन्धिस्वभावस्य स्वभावविपर्ययमन्तरेण तद्भावायोगादर्थेन सहोत्पन्नस्यान्यतः मानने में क्या बाबा है? यदि बौद्ध मत में अत्यन्त असत् बाह्यार्थ अर्थक्रिया में समर्थ है तो कारणात्मक जाति और जातिविशिष्ट अर्थ की अर्थक्रियाक्षमता क्यों न होगी? किञ्च यदि शाब्द प्रत्यय को मिथ्या प्रतिभास माना जाय तो फिर चाक्षुषादि प्रत्यक्षों की प्रतिभासता क्यों न मानी जायगी? तब भ्रान्ति और प्रमा के भेद में ही क्या मूल रह जायगा? अपि च, जैसे अनुमिति परोक्ष और अपरोक्ष देश और कार्य में स्थित सभी साधारण वस्तुओं को अपना विषय बनाती हैं, उसी तरह का तो शाब्द प्रत्यय भी है तब शाब्द प्रत्यय ( शब्दजन्य ज्ञान ) को ही मिथ्या कैसे कहा जा सकता है? यदि सामान्य ( जाति ) को अर्थक्रिया के साथ जोड़ा नहीं जा सकता । इसलिये प्रवृत्ति नहीं होगी । यदि उससे सामान्य से भिन्न में प्रवृत्ति मानोगे तो भी शब्द से अश्वादि में भी प्रवृत्ति हो जायेगी, किन्तु यह तर्क केवल पिष्टपेषण है, क्योंकि हम यह पहले हो बता चुके हैं कि ऐसे अवसरों पर लक्षणा वृत्ति के द्वारा सामान्यवाची शब्दों से व्यक्तिविशेष का हो बोध होता है । इस उत्तर से इस बात का भी उत्तर हो जाता है कि ' स्वलक्षण की अनन्तता के कारण उसके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता और सामान्य अर्थक्रियाकारी है नहीं । अतः भिन्नाभास बुद्धि ( सम्मिलिताकार का ज्ञान ) अर्थक्रिया-कारिणी व्यक्ति में पर्यवसित हो जाती है । आभास से संश्लिष्ट भ्रान्त बुद्धि स्वलक्षण और सामान्यलक्षण में से किसी को भी नहीं ग्रहण प्रवृत्ति मानने की अपेक्षा यही उचित है कि अपोहवाद का सहारा लिया जाय ', क्योंकि ऐसा भ्रान्त मानना पड़ जायगा । विशिष्ट बुद्धि में किसी एक वस्तु का ग्रहण न होने पर कोई अज्ञ जब बाघ नहीं होता तो उस परिस्थिति में शाब्द प्रत्यय को निश्चित रूप से भ्रान्त कहा भी कर सकती, अतः इस भ्रान्त बुद्धि की मानने पर सभी विशिष्ट बुद्धियों को व्यक्ति भी उसको भ्रान्त नहीं मानता । कैसे जा सकता है? free व्यक्तियों में भी सामान्य अन्वित रहता है, इसीलिये ' यह वही है ' यह प्रत्यभिज्ञा बनती है । कारण का अन्वय होने से ही कार्य में ' यह वही मिट्टी है इस तरह की स्पष्ट प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा प्रतीति के समर्थन के लिये बौद्धों का यह कहना गलत है कि वस्तु के भेद के रहने पर भी सादृश्य के कारण यह चाक्षुष प्रतीति हो है, क्योंकि उनके मत में क्षणिक होता सादृश्य का ग्रहण न कर सकेगा । विश्रम के कारण सब कुछ संभव है, ऐसा भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि बाघ के अभाव में इस प्रतीति की विभ्रमात्मक नहीं माना जा सकता | इसीलिये ' सम्बन्धी के विनष्ट हो जाने पर अर्थान्तर का अभाव अथवा अर्थों की अवाच्यता न हो जाय, इसके लिये उत्पन्न अर्थ को उससे सम्बद्ध अवस्था में ही उत्पन्न माना जाता है, इस तरह से यह उत्पन्न सम्बन्ध शब्द में नहीं होगा और असंबन्धी स्वभाव के शब्द का उससे सम्बन्ध स्वभाव का विपर्यय माने बिना नहीं बन सकता, अतः