वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 391–400

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 391–400

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वेदार्थपारिजातः ३६१ सिद्धस्यानुपकारिणि शब्देऽसमाश्रयत्वाच्चेत्याद्यपास्तम्, शब्दस्यार्थेनोत्पत्तिकसम्बन्धस्योक्तत्वेनोक्त विकल्पानवकाशात् । शब्दस्य तद्वाच्याया जातेच नित्यत्वाभ्युपगमात्, व्यक्तं चाक्षेपलभ्यत्वेन वाच्यत्वानभ्युपगमाच्च । अत एव तस्यापि ( शब्दस्यापि ) तदुत्पत्तिसहकारित्वे समर्थस्य नित्योत्पादनप्रसङ्गः । अनपेक्षत्वान्नित्यस्य शब्दस्य सहकारिभिरनुपकारात् । अथ स्वतः सामर्थ्यम्, सहकारिभिरपि सामथ्यं नोपजायते, इत्याद्यपास्तम्, नित्यसमर्थस्यापि शब्दस्यालोकसापेक्षस्य चक्षुष इव सङ्केतज्ञानसापेक्षस्य प्रत्यायकत्वे बाधाभावात् । न च नित्यस्यानुपकाररूपप्रकाशकत्वम्, चक्षुषो नित्यस्यापि आलोकोपकारदर्शनात् । यदप्युक्तम् - भावश्लेषापेक्षी पुरुषभावनाप्रतिभासी तदपेक्षालक्षण: सम्बन्धः । तत्र पुरुषो नित्यानामपि स्वभावमपरावर्तयन् कुतश्चित्स्वयमुत्प्रेक्ष्य घटयेदिति । न च तावता ते च्यवनधर्माण:, तदप्यकिञ्चित्करम्, सम्बन्धस्य नित्यत्वेन दत्तोत्तरत्वात् । वस्तुतद्धर्माणां समानसत्ताकत्वेन सम्बन्धस्य पुरुषभावनाप्रतिभासित्वानुपपत्तेः । परमार्थ-सद्ब्रह्मापेक्षया वस्तुनोऽपि तथात्वेन तत्समानयोगक्षेमत्वात्, क्षणभङ्गवादिनये वस्तुनित्यत्वासम्भवाच्च । यदप्युक्तम्- ' नित्यत्वादाश्रयापायेऽप्यनाशो यदि सम्मतः । नित्येष्वाश्रयसामर्थ्यं किं येनेष्टः स आश्रयः ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२३४ ) | यदि जातिहि नित्या तहि कृतस्य करणाभावात् कारकानपेक्षत्वात्किमाश्रयत्वेनाभिमतानां व्यक्तीनां कृत्यमिति, तत्तुच्छम् जातितत्सम्बन्धव्यञ्जकत्वेनाश्रयस्य कारकत्वानपायात् । यदप्युक्तम् -- ' ज्ञानोत्पादन-हेतूनां सहकारिणां सम्बन्धात् तदुत्पादनयोग्यत्वेन घटादिज्ञानोत्पत्तिरेव घटाभिव्यक्तिः, अन्यथाऽनपेक्ष्य तदुपकारं अर्थ के साथ उत्पन्न अन्यतः सिद्ध सम्बन्ध की उसके अनुपकारक शब्द में स्थिति नहीं मानी जा सकती ' इस कथन का भी खण्डन हो जाता है, क्योंकि हमारे मत में शब्द का अर्थ के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध अङ्गीकृत है, अतः उक्त आपत्ति हमारे मत में उठ ही नहीं सकती । शब्द और तद्वाच्य जाति हमारे मत में नित्य है । व्यक्ति आक्षेप से बोधित होती हैं, अतः इसमें वाच्यता नहीं मानी जाती । इसीलिये ' शब्द को भी यदि अर्थ की सम्बद्धता में सहकारी की अपेक्षा नहीं है, ऐसा मानें तो समर्थ का नित्य उत्पादन मानना पड़ जायगा, क्योंकि ' अनपेक्ष ' पद के अर्थ नित्य शब्द को सहकारी की अपेक्षा नहीं है, यही हो सकता है । इसके विपरीत यदि उसको स्वतः समर्थ मानें तो सहकारी के कारण उसमें किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त हो सकेगी ' इस आक्षेप का भी समाधान हो जाता है, क्योंकि शब्द यद्यपि नित्य एवं समर्थ है, तो भी चक्षु को जैसे आलोक की अपेक्षा रहती है, उसी तरह से शब्द को भी सङ्केत ज्ञान की सहायता से प्रत्यायक ( अर्थबोधक ) मानने में कोई बाधा नहीं है । नित्य वस्तु सदा बिना किसी की सहायता के ही प्रकाशित होती हो, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह देखा गया है कि चक्षुरिन्द्रिय नित्य है, तब भी उसको आलोक की सहायता की अपेक्षा रहती है । यह श्री ' कहा गया है कि ' सम्बन्ध भाव के संश्लेष की अपेक्षा रखता है, पुरुष की भावना के अनुसार उसका प्रतिभास होता है, अतः उसको पुरुष की अपेक्षा है । वह पुरुष नित्य स्वभाव में भी बिना कोई परिवर्तन किये अपनी उत्प्रेक्षा के अनुसार उनको कहीं जोड़ देगा | इतने से वे नित्य शब्द च्यवनधर्मा अनित्य स्वभाव नहीं हो जायेंगे ' । किन्तु यह कथन भी अकिचिकर है, इसका उत्तर सम्बन्ध की नित्यता के आधार पर दिया जा चुका है । वस्तु और उसके धर्म दोनों समान सत्ता वाले हैं, अतः सम्बन्ध का पुरुष भावना के अनुसार प्रतिभास सम्भव नहीं हो सकता । परमार्थ सब्र की अपेक्षा से वस्तु की भी परमार्थता होने से इनका योगक्षेम समान है और क्षणभंगवाद के मत में वस्तु की नित्यता संभव नहीं । यह भी कहा गया है कि - ' संबन्ध के नित्य होने से आश्रय अर्थात् वाच्य के न रहने पर भी यदि जाति के समान उसका अनाश माना जाता है, तो नित्य जाति, सम्बन्ध आदि में आश्रय ( वाच्य वाचक ) आदि का क्या सामर्थ्य अर्थात् उपकारक धर्म माना जायगा, जिसके कारण कि उनको आश्रय माना जाता है । यदि जाति नित्य है, तब बनी हुई वस्तु को बनाया नहीं जाता । अतः कारक ( साधन ) की बावश्यकता नहीं है तो आश्रय रूप से अभिमत व्यक्तियों का कार्य क्या रह जायगा? " किन्तु यह अति साधारण शंका है, क्योंकि जाति और उसके संबन्ध की अभिव्यंजकता के कारण आश्रय की कारकता में कोई बाधा नहीं जाती । आगे यह भी कहा गया है कि ज्ञान के उत्पादक कारणों की सहायता से तदुत्पादन योग्य घटादि ज्ञान की उत्पत्ति हो तो घटाभिव्यक्ति ४६

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३५२ वेदार्थपारिजातः ज्ञानजननप्रसङ्गात् । नित्यानां जात्यादीनां त्वविकारित्वेन व्यञ्जकैर्नोत्पत्तिः संभाव्यत इति कुतस्तदभिव्यक्तिकल्पनापि । प्रागसमर्थस्य व्यङ्ग्यस्य सामर्थ्यकारिणः प्रदीपादेर्जनकत्वमेव, सामर्थ्यस्य व्यङ्गघाभिन्नत्वेन तदात्मकत्वात् । अर्थान्तरत्वेऽनुपकारकत्वमेव । प्रदोपादिकृतादर्थान्तरभूतात्सामर्थ्याज्ज्ञानोत्पत्तौ सामर्थ्यमेव गृह्येत । घटादीनां स्वविषय-ज्ञानाजनकानां नित्यमग्रहणप्रसङ्गः स्यात् । इष्यते च घटादीनां ग्रहणम् । आलोकानेपक्षघटादिग्रहणप्रसङ्गश्व स्थात् । प्रदीपादिभिर्व्यतिरिक्तस्य सामर्थ्यस्य करणाद् घटादीनां न कश्चिदुपकारो जायते । अनुपकारकत्वादालोकानपेक्षा स्पष्टैव । तस्माद् व्यङ्गयाः स्वविषयज्ञानजनने परमपेक्षमाणाः स्वभावातिशयं स्वीकुर्वन्ति । तेन ते जन्या एव, ज्ञेयरूपा-सादनात् । ज्ञानवशेन कार्यातिशयवाचिना शब्देन विशेषख्यात्यर्थव्यङ्गचा इत्युच्यन्ते । जातिसम्बन्धादयस्तु नित्यत्वातो-पकार्यन्ते । अतोऽनुपकारिणा नैव व्यङ्गधा इति वक्तुं शक्यन्ते, तदपि न साधु, प्रदीपादिजनितव्यक्तिविषयत्वेनैव रूपादीनां व्यङ्ग्यत्वोपपपत्तौ व्यक्तेः प्राक् प्रसिद्धरूपादीनां प्रदीपादिकार्यत्वानुपपत्तेः । न च तावतानुपकारकत्वं प्रदीपादेः, रूपाद्यनुपकारकत्वेऽपि तत्प्रकाशोपकारकत्वे बाधाभावात् । काष्ठावादीनामग्निविद्युदादिव्यञ्जकत्वस्य सर्वसम्मतत्वेऽपि तत्कार्यत्वासम्प्र सम्प्रतिपत्तेः । रेडियो यन्त्रस्य दूरस्थशब्दव्यञ्जकत्वेऽपि न तत्कारणत्वाभ्युपगतिः । शुक्रशोणिततत्परिणाममस्तिष्कादीनां चैतन्यव्यञ्जकत्वेऽपि न तेषां तत्कारणत्वं न वा चैतन्यस्य तत्कार्यत्वं बौद्धरप्यभ्यु-पेयते । अन्यथा वौद्धानामपि जडवादित्वापत्तिः स्यात् । तथैव व्यक्तीनां जातिव्यक्तौ हेतुत्वेऽपि जातेस्तत्कार्यत्वानुप-पत्तिः । स्वविषयज्ञानजननं प्रति व्यङ्गयाः परमपेक्षमाणा अपि तज्जनितं प्रकाशमूरीकुर्वाणा अपि न स्वरूपनिष्पत्ती कहलाती है । अन्यथा बिना उनकी उपकारकता के ही ज्ञान की उत्पत्ति होने लगेगी । जाति प्रभूति नित्य पदार्थों की अधिकारिता के कारण व्यंजकों से भी उनकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, तब सम्बन्ध को अभिव्यक्ति की कल्पना कैसे की जा सकती है? पहले असमर्थ sive में साम का धान करने वाले प्रदीपादि की जनकता ही मानी जाती है, क्योंकि सामर्थ्य व्यंग्य से अभिन्न है, अतः तत्स्वरूप ही हैं । यदि वह अर्थान्तर ( भिन्न वस्तु ) है तो उसकी उपकारकता नहीं बनेगी । प्रदीपादि कृत अर्थान्तरभूत सामर्थ्य से ज्ञान की उत्पत्ति होने पर सामर्थ्य का ही ग्रहण होगा । घटादि पदार्थों का, जो कि स्वविषयक ज्ञान के जनक हैं, उस अवस्था में नियमतः अग्रहण होने लगेगा | घटादि का ग्रहण तो हमको इष्ट है । उस परिस्थिति में बिना ही आलोक की अपेक्षा के घटादि के ग्रहण का प्रसंग आ उपस्थित होगा । प्रदीपादि से एक अतिरिक्त सामर्थ्य की उत्पत्ति होने से घटादि का कोई उपकार न हो सकेगा । अनुपकारक होने से ही आ ite की अपेक्षा भी नहीं है, यह स्पष्ट है । इसलिये व्यय स्वविषयक ज्ञान की उत्पत्ति में दूसरे की अपेक्षा रखने के कारण स्वभाव की अतिशयिता को स्वीकार करते हैं । इसलिये वे जन्य हो हैं, क्योंकि वे ज्ञेय को रूप देते हैं । ज्ञान के कारण कार्यातिशय के बाचक शब्द विशेष ख्याति स्वरूप अर्थ व्यंग्य माने जाने जाते हैं । जाति, सम्बन्ध आदि की नित्यता के कारण ये किसी से उपकृत नहीं होते, इसलिये अनुपकारिता के कारण ये व्यंग्य है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । ' यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रदीपादि से होने वाली अभिव्यक्ति की विषयता के कारण ही रूपादि की व्यंग्यता मानी जाती है, अतः इस अभिव्यक्ति से पहले ही प्रसिद्ध रूपादि को प्रदीपादि का कार्य नहीं माना जा सकता । इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदीपादि उपकारक नहीं है । ये रूपादि के उपकारक न होते हुए भी उनके प्रकाशन में तो सहायक ( उपकारक ) हैं ही, इसमें कोई बाधा नहीं है । काष्ठ, जल आदि अग्नि, विद्युत् आदि के सर्वसम्मति से अभिव्यंजक है, किन्तु ये उनके कार्य नहीं है । रेडियों यन्त्र दूर स्थित शब्द का अभिव्यंजक होते हुए भी उसका कारण नहीं माना जाता | शुक्र और शोणित के परिणाम भूत मस्तिष्क आदि के चैतन्याभिव्यंजक होने पर भी ये उसके कारण नहीं होते । बौद्ध भी चैतन्य को उनका कार्य नहीं मानते । अन्यथा बौद्ध भी जड़वादी हो जायेंगे । इसी तरह से व्यक्तियाँ जाति की अभिव्यक्ति में हेतु होते हुए भी वे जाति की कारण नहीं है । स्वविषयक ज्ञान की उत्पत्ति के प्रति व्यंग्य होने के लिये दूसरे की अपेक्षा रखते हुए भी और तज्जनित प्रकाश को स्वीकार करते हुए भी पदार्थ अपने स्वरूप की निष्पत्ति में किसी दूसरे को अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि उनकी स्थिति प्रकाश से पूर्व भी विद्यमान रहती है । स्वरूप में और स्वरूप के प्रकाश में अभेद नहीं माना जा सकता, ऐसा मानने पर उनका विषय - विषयीभाव सम्बन्ध न बन सकेगा और प्रकाश से पहले स्वरूप का अभाव भी मान लेना पड़ेगा ।

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वेदार्थपारिजातः ३६३ परमपेक्षते, प्रकाशात्पूर्वमेव तन्निष्पत्तेः । न वा स्वरूपप्रकाशयोरभेदः, तथात्वे विषयविषयित्वानुपपत्तेः । प्रकाशात् प्राक् स्वरूपाभावप्रसङ्गाच्च । अत एव कार्यत्वव्यङ्ग्यत्वशब्दभेदोऽप्युपपद्यते । मुख्यवृत्तेरुपपत्तौ उपचाराश्रयणस्यान्याय्य-त्वात् । ' ज्ञानोत्पादनहेतुनां ज्ञापकत्वमिहाक्षतम् । न तेन ज्ञेयहेतुत्वं ज्ञापकानां प्रसिद्धितः । तथात्वे भूतवादित्वं ध्रुवं बौद्धस्य चापतेत् । कार्यव्यङ्ग्यत्वयोरेक्ये चितः स्याद् भूतकार्यता ॥ ' ननु सम्बन्धो यदि वस्तुभूतस्तदा नियमेन शब्दार्थाभ्यां भेदाभेदौ नातिवर्तते, सम्बन्धिभ्यां सम्बन्धस्य भिन्नत्वे शब्दार्थसम्बन्धत्रितयावलम्बनत्वेन चित्रबुद्धिता स्यात् । न च भेदाभेदपक्षव्यतिरिक्तः पक्षः सम्भवति, अतद्भूतस्य रूपस्यान्यत्वाव्यतिक्रमात् । तस्य च सम्बन्धस्य चक्षुर्ग्राह्यत्वे सति स्वबुद्धी सम्बन्धि विवेकेनार्थान्तरेण रूपेणाप्रतिभासमानत्वात् कथं सत्वम्? यद्यतो भेदेन नोपलभ्यते तत्ततो नान्यत् । यद्यद् दृश्यं सन्नोपलभ्यते तन्नास्त्येवेति । यदि चाविवेके सत्यदर्शने च विवेकः सत्ता च परिकल्प्येते, तदा विवेकाभावयोर्व्यवस्थिते रभावप्रसङ्गः । ननु चेन्द्रियादिवद-वीन्द्रियत्वेन सम्वन्धस्य विवेकः सत्ता च न प्रतिभासेते, इति चेन्न, ततोऽप्रतिभासप्रसङ्गात् । अप्रसिद्धस्याज्ञापकत्वात् । येन यस्य सम्बन्धो न गृह्यते न तद्द्वारेण तत्प्रतीतिः । सन्निधिमात्रेण ज्ञापनेऽव्युत्पन्नानामपि स्यात् । नानुमानात्प्रतिपत्तिः, लिङ्गाभावात् । नार्थप्रतीतिलिङ्गम्, दृष्टान्तासिद्धेः । अर्थप्रतीतेः सम्बन्धकार्यतायाः क्वचिदसम्प्रतिपत्तेः । तत्रापि दृष्टान्तत्वेनोपनीते सम्बन्धस्यातीन्द्रियत्वेन कारणेन साधनानपेक्षणात् । न चास्ति साधनम्, तत्रापि दृष्टान्तासिद्धेः । न चेन्द्रियादिषु तुल्यम्, तेषामन्यथानुमानात् । ज्ञानं कार्यभूतं प्रत्यक्ष केषुचिदालोकादिषु सत्स्वभ्वयवत्, निमीलिताद्यव-स्थासु व्यतिरेकवत्, उन्मीलिताद्यवस्थासु समन्वयवच्च । तदेवंभूतं कार्यं येषु सत्सु अभवद् दृष्टं तन्मात्रादसंभवं तद्व्यतिरेका-इसीलिये कार्यत्व और व्यय इन दो भिन्न शब्दों का प्रयोग भी युक्तियुक्त हो सकता है । सकती हो उस परिस्थिति में उपचार, लक्षणा वृत्ति का सहारा लेना उचित नहीं माना जाता । प्रकार प्रतिपादित है- ' ज्ञान के उत्पादक हेतुओं की की ज्ञेय पदार्थों की कारणता प्रसिद्धि के अनुसार नहीं कार्यत्व और व्यङ्ग्यत्व की एकता में चैतन्य को पंच जब तक मुख्य वृत्ति की उत्पत्ति हो यही बात निम्न कारिकाओं में इस ज्ञापकता बिना किसी विघ्न - बाधा के उपपन्न होती है, वितु इससे ज्ञापक पदार्थो मानी जा सकती । ऐसा मानने पर निश्चय ही बौद्ध जडवादी हो जायगा, क्योंकि महाभूतों का कार्य मानना पड़ जायगा । ' प्रश्न उठता है कि यदि सम्बन्ध वस्तुभूत है तो उसका नियमतः शब्द और अर्थ से भेद और अभेद विद्यमान हो रहेगा । सम्बन्धी यदि सम्बन्ध से सर्वथा भिन्न है तो उसके शब्द, अर्थ और सम्बन्ध ये तीन वस्तु आलम्बन होने के कारण वह चित्र ज्ञान रूप ही होगा | भेदाभेद से अतिरिक्त और कोई पक्ष वन ही नहीं पाता, क्योंकि अतभूत रूप अन्य रूप को कभी छोड़ ही नहीं सकता । इस सम्बन्ध को यदि चक्षुर्ग्राह्य माना जाय तो अपनी बुद्धि में सम्बन्धी से अतिरिक्त अर्थान्तर के रूप में प्रतिभासित होने से उसकी सत्ता कैसे मानी जा सकती है? जो जिससे भिन्न रूप में प्रतीत नहीं होता, वह उससे भिन्न नहीं हो सकता । जो दृश्य होते हुए भी उपलब्ध नहीं होता, वह नहीं ही है । यदि अविवेक ( भेदज्ञान का अभाव ) और अदर्शन के रहते भो विवेक ( भेद ) और सत्ता मान ली जाय तो विवेक और अभाव की कोई व्यवस्था ही न सकेगी । ' इन्द्रियादि की तरह उसके अतीन्द्रिय होने से सम्बन्ध का विवेक और उसकी सत्ता नहीं प्रतिभासित होती ' यह कहना इसलिये गलत है कि इस परिस्थिति में उनका प्रतिभास ही नहीं बन पावेगा, क्योंकि अप्रसिद्ध वस्तु it arre ता नहीं मानी जाती । जिसके कारण जिस पदार्थ का सम्बन्ध गृहीत नहीं होता, उसी की सहायता से उसकी प्रतीति नहीं हो सकती है । सन्निधि मात्र से ज्ञापकता मानने पर अव्युत्पन्न व्यक्ति में भी ज्ञापकता माननी पड़ जायगी । लिङ्ग के अभाव में अनुमान से भी प्रतीति नहीं हो सकती । दृष्टान्त न मिलने के कारण अर्थ प्रतीति को भी लिंग ( हेतु ) नहीं बनाया जा सकता | अर्थ-प्रतीति सम्बन्ध का कार्य हैं, ऐसा कहीं भी माना नहीं जाता । यहाँ पर भी दृष्टान्त को ले आने पर सम्बन्ध की अतीन्द्रियता के कारण उसमें साधन की अपेक्षा नहीं रहेगी । साधन कोई है भी नहीं, क्योंकि यहाँ पर भी कोई दृष्टान्त सिद्ध नहीं है । इन्द्रिय प्रभृति में यह दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उनकी प्रतीति अनुमान द्वारा अन्य पद्धति से हो जाती है । कार्यभूत प्रत्यक्षादि ज्ञान कुछ आलोकादि सहायक पदार्थों के रहते होता है, चक्षु की निमोलन अवस्था में यह नहीं होता, चक्षु के उन्मीलन करने पर यह पुनः होने लगता है, इस

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३६४ वेदार्थपारिजातः पेक्षां चात्मनः साधयति । ततः कार्यद्वारेणेन्द्रियसिद्धिः । कारणान्तरवैकल्यासम्भविनश्चाङ्कुरादयोऽत्र दृष्टान्ताः । नै सम्बन्धस्य, सम्बन्धासिद्धी तत्कार्यस्यैव ज्ञानाभावात् । नहि शब्दरूपमर्थो वा लिङ्गम् । तयोः सर्वस्य शब्दस्य सर्वस्मिन्नर्थे वाचकत्वेन सर्वस्यार्थस्य सर्वस्मिन् शब्दे वाच्यत्वेन च योग्यत्वात् । अर्थविशेषप्रतीतिसमाश्रयस्य सम्बन्धस्यानियत शब्दार्थाम्यामप्रत्यायनात् । शब्दार्थानां सम्बन्धेन संबन्धविशेषस्यासिद्धो सम्बन्धविशेषप्रतीतिरयुक्तैव । न सम्बन्धविशेषमन्तरेण शब्दात् सम्बन्धविशेषप्रतीतिरिति सम्बन्धप्रतीतावनिमित्तायां सम्बन्धविशेषप्रतीतिप्रतिनियमवदर्थप्रतिपादनमपि शब्दानामनिमित्तं किन्नेष्यते? ततश्चाविशेषेण शब्दः सर्वसम्बन्धं गमयेत्, तदा चाविशेषेण सर्वस्य व्युत्पन्नस्याव्युत्पन्नस्य चार्थप्रतीतिः स्यात् । यथोक्तरीत्या सम्बन्धसिद्धचार्थप्रतीतेः कश्चित्सम्प्रदायं नापेक्षेत । सम्प्रदायसहितस्यैव लिङ्गत्व-मिति चेत्, तर्हि कि सम्वन्धेन? केवलः शब्दः सम्प्रदायापेक्षोऽर्थज्ञापन किन्न कुर्यात्? स च यदभिप्रायः प्रयुज्यमानो दृष्टोऽन्यथा न दृष्ट: । दर्शनादर्शनाभ्यां धूमादिवत्प्रतीति जनयतीत्यविनाभावाख्यः सम्बन्धः । न चात्रान्यस्य वस्तुभूतस्य सम्बन्धस्य सामर्थ्यं पश्यामः । सम्बन्धिस्यामभेदे तावेव न सम्बन्धो नाम कश्चित् । नापि तत्त्वान्यत्वरहितः कश्वित्पक्षः । भेदाभेदी मुक्त्वा वस्तुतो नान्या गतिः । " भिन्नत्वाद्वस्तुरूपस्य सम्बन्धः कल्पनाकृत: ' ( प्रा ० वा ० ३।२३८ ) । नहि श्लेषलक्षणः सम्बन्धिनोः सम्बन्धोऽश्लिष्टेषु सम्भवति । यदि सम्बन्धिभिन्नमर्थान्तरं तत् साह कथं पराधीनं भवेत्? सम्बन्धस्य द्विष्ठत्वेनेष्यत एव तत्परायत्तता । अनपेक्षत्वेन स्वतन्त्रश्चेत्र सम्बन्ध: स्यात्, तथात्वे पदार्थान्तरमेव प्रकार का यह कार्य उन पदार्थों के रहते भी यदि नहीं होता तो इतने से इसकी असंभावना और अपनी व्यतिरेक की अपेक्षा को सिद्ध करता है । अतः कार्य के द्वारा इन्द्रिय की सिद्धि हो जाती है । कारणान्तर का अभाव होने पर असंभव उत्पत्ति वाले अंकुरादि यहाँ पर दृष्टान्त रूप में रखे जा सकते हैं । इस तरह की स्थिति सम्बन्ध की नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध की सिद्धि न होने पर उसके कार्य का ही ज्ञान नहीं होगा । इसमें शब्द के स्वरूप अथवा अर्थ को लिंग नहीं माना जा सकता, क्योंकि शब्दरूप और अर्थ सभी शब्दों के सभी a में वाचक रूप से विद्यमान है, अतः सभी अर्थ सभी शब्दों में वाव्यरूप से ही रहने योग्य हा सकते हैं | अर्थ विशेष की प्रतीति कराने वाले सम्बन्ध की प्रतीति अनियत शब्द और अर्थ द्वारा नहीं कराई जा सकती । ' शब्दार्थी के सामान्य सम्बन्ध से सम्बन्ध - विशेष को सिद्धि न होने पर सम्बन्ध - विशेष को प्रतीति मानना गलत है । सम्बन्ध - विशेष के बिना शब्द से सम्बन्ध - विशेष की प्रतीति नहीं हो सकती, अतः वह सम्बन्ध की प्रतीति में भो निमित्त नहीं होती, इतने पर भी यदि आप सम्बन्ध - विशेष की प्रतीति में कोई नियम मानते हैं फिर शब्दों की अर्थप्रतिपादकता को भी अनिमित्त ( निष्कारण ) क्यों नहीं मान लेते? इस तरह से बिना विशेषता के शब्द सभी सम्बन्धों का गमक हो जायगा और इस अवस्था में व्युत्पन्न और अव्युत्पन्न सभी को समान रूप से अर्थप्रतीति होने लगेगी । उक्त रीति से सम्बन्ध की सिद्धि मानने पर अर्थप्रतीति के लिये कोई भी किसी भी परम्परा की अपेक्षा न रखेगा । यदि सम्प्रदाय ( परम्परा ) सहित शब्द को ही सिद्धता मानी जाती है तो बीच में सम्बन्ध मानने की क्या आवश्यकता है? केवल शब्द ही परम्परा के सहारे अर्थ का ज्ञापन क्यों न करे? उसका प्रयोग अभिप्राय के अनुसार ही होता है, अन्यथा नहीं | धूम जैसे दर्शन और अदर्शन से अग्नि की प्रतीति और अप्रतीति कराता है, उसी तरह की स्थिति यहाँ पर भी होने से उसका अविनाभाव सम्बन्ध बनता है । यहाँ पर वस्तुभूत अन्य सम्बन्ध की सामर्थ्य नहीं दिखाई पड़ती | दो सम्बन्धी यदि afra है तो इनके बीच में सम्बन्ध की कोई सत्ता नहीं हो सकती । तस्व और अन्यत्व के सिवाय और कोई पक्ष होता नहीं । भेद और अभेद को छोड़कर वस्तुतः अन्य कोई गति नहीं है । वस्तुरूप दो सम्बन्धियों के भिन्न होने से उनका सम्बन्ध कल्पता कृत हो माना जाता है, वास्तविक नहीं । संश्लेष लक्षण सम्बन्ध दो सम्बन्धियों के अक्लिष्ट ( असंयुक्त ) रहने पर नहीं हो सकता । यदि इन सम्बन्धियों से free यह अर्थान्तर ( दूसरी वस्तु ) है तो यह पराधीन कैसे हो सकता है? सम्बन्ध के दो वस्तुओं में रहने के कारण उसमें परायसता मानी हो जाती है । यदि अनपेक्षत्वेन वह स्वतन्त्र माना जाय तो यह सम्बन्ध ही नहीं होगा । ऐसी स्थिति में वह

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वेदार्थपारिजातः ३६५ तत्स्यात् । नह्यश्लिष्टेन पदार्थान्तरेण सम्बन्धेन सम्बन्धिनो: श्लेषः । श्लिष्टेन श्लिष्टी स्यातामिति चेत्तदपि न, तस्यैव ताभ्यां श्लेषासिद्धेः । यद्यर्थान्तरेण तयोः श्लेषस्तदातिप्रसङ्गो विशेषणाभावादिति चेन्न शक्तिरूपस्यातीन्द्रिय-स्याप्तोपदेश वृद्धव्यवहारगम्यस्य सम्बन्धस्याम्युपगमे बाधाभावात् । अत एव नाप्रसिद्धस्य ज्ञापकत्वप्रसङ्गः, वृद्धव्यव-हारादिना तत्प्रसिद्धेः सत्त्वात् । न च तत्सत्वे मानाभावः शब्दादर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तेरेव तत्र मानत्वात् । न च सम्बन्धरहितस्य सम्प्रदायसापेक्षस्य शब्दस्यैव बोधकत्वमस्त्विति वाच्यम्, उपदेशसम्प्रदायस्य सम्बन्धविषयकत्वेन तदुपेक्षणासम्भवात् । एतेन नहि शब्दार्थयोः कुण्डबदरयोरिव संयोगस्वभावस्तस्तुपदयोरिव समवायात्मा वा सम्बन्धः प्रत्यक्षमुपलभ्यते । तन्मूलत्वात् सम्बन्धान्तराण्यपि न सम्भवन्ति । मुखे शब्दोपलब्धिर्भूमावर्थोपलब्धिश्च । नापि शब्दस्या-न सम्बन्धमातुं शक्यते, क्षुरमोदकशब्दोच्चारणे मुखपाटनपूरणानुपलम्भाच्छन्ददेशेऽर्थासम्भवात् । न चार्थदेशेऽपि शब्दः सम्भवति । स्थानकरणप्रयत्नानां शब्दहेतुनां घटाद्यर्थदेशेऽनुपलम्भादित्याद्यपास्तम्, अनभ्युपगमपराहतत्वात् । नहि संयोगादिसंश्लेषलक्षणः सम्बन्धोऽभ्युपेयते, शक्तिरूपसम्बन्धाभ्युपगमे चोक्तदोषानवकाशात् । ' अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ ' ( वा ० प ० १११ ) इति रीत्या कैश्चित्तु कार्यकारणभाव-लक्षणस्तन्मूलकस्तादात्म्यलक्षणो वा शब्दार्थयोः सम्बन्धोऽभ्युपेयते । तत्र ब्रह्मण इव कारणस्य शब्दस्य सौम्यातिशयेन taraf ही होगा । अश्लिष्ट पदार्थान्तर के सम्बन्ध से दूसरे सम्बन्धियों का संश्लेष नहीं हो सकता । इन दो पदार्थों के लिष्ट होने पर ही संश्लेष हो सकेगा । यह बात भी इसलिये नहीं कही जा सकती कि उन दो सम्बन्धियों से हो उस सम्बन्ध का संश्लेष नहीं बन पावेगा । यदि अर्थान्तर से सम्बन्धियों का संश्लेष होता है तो इसमें अतिप्रसङ्ग हो जायगा, क्योंकि यह उनका विशेषण नहीं है ' । बौद्ध कृत ऊपर का यह पूरा प्रतिपादन गलत है, क्योंकि शक्तिस्वरूप अतीन्द्रिय है । आप्त उपदेश अथवा वृद्ध व्यवहार आदि से जानने योग्य सम्बन्ध के मानने में कोई बाधा नहीं है । वृद्ध व्यवहार आदि से इसकी प्रसिद्धि रहती है, अत: यहाँ पर अप्रसिद्ध की ज्ञापकता की आपत्ति भी नहीं उठ सकती । इसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि सम्बन्ध के बिना शब्द से अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिये यहाँ पर अर्थापत्ति हो प्रमाण है । सम्बन्ध रहित सम्प्रदाय सापेक्ष शब्द को ही अर्थ का atr क नहीं माना जा सकता, क्योंकि उपदेशात्मक सम्प्रदाय को भी सम्बन्ध की अपेक्षा रहती है, अतः उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती । इस कथन से हो-- ' शब्द और अर्थ का कुण्ड और बदर की तरह का संयोग, अथवा तन्तु और पट का समवाय लक्षण संबन्ध प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता । अन्य सम्बन्ध भो संयोग और समवाय के आधार पर ही स्थापित होते हैं, अतः इनके अभाव में वे सुतरां नहीं होंगे । शब्द की उपलब्धि मुख में और अर्थ की उपलब्धि भूमि में होती है, अतः इनका कोई सम्बन्ध हो भी नहीं सकता | शब्द का अर्थ के साथ सम्बन्ध अनुमान द्वारा भी नहीं सिद्ध किया जा सकता | छुरा और लड्डू शब्द के उच्चारण से मुखपाटन अथवा पूरण नहीं होता, अतः सिद्ध है कि शब्द के प्रदेश में अर्थ की स्थिति नहीं है । अर्थ के प्रदेश में भी शब्द की स्थिति नहीं सिद्ध की जा सकती, क्योंकि शब्दों के हेतु स्थान, करण, प्रयत्न आदि की स्थिति घटादि प्रदेश में उपलब्ध नहीं होती ' । इस प्रतिपादन का भी खण्डन हो जाता है, क्योंकि शब्दार्थ स्थल में हम आपके बताये सम्बन्धों को मानते ही नहीं । हम यहाँ पर संयोगादि संश्लेषलक्षण सम्बन्ध को नहीं मानते । हमारे द्वारा अम्युपगत शक्तिलक्षण सम्बन्ध में उक्त आपत्तियों को प्रवृत्ति ही नहीं होती । कुछ लोग शब्द और अर्थ का कार्यकारण-भाव लक्षण अथवा तन्मूलक तादात्म्य लक्षण सम्बन्ध मानते हैं, क्योंकि वाक्यपदीय से इस श्लोक में शब्द और अर्थ का कार्यकारण भाव इस प्रकार पतिपादित हैं- ' यह जो अनादि निधन ब्रह्मलक्षण अक्षर शब्द तत्त्व है, वही अर्थ के रूप में विवर्तित होता है, जिससे कि इस जगत् की सारी प्रक्रिया चलती है ' । इस पक्ष में ब्रह्म की तरह ही जगत् के कारणभूत शब्द की अत्यन्त सूक्ष्मता के कारण क्षुर, मोदक शब्दों के अर्थभूत कार्य पाटन, पूरणादि की उपलब्धि का परिहार संभव नहीं हो सकता, अर्थात् जब शब्द से ही अर्थ की उत्पत्ति मानी जाती है तो क्षुर, मोदक आदि शब्दों के मुख से उच्चारण करने पर यहाँ पर उक्त अर्थों की भी उपस्थिति रहने से पाटन, पूरण आदि कार्य मुँह में होते ही चाहिये । इस दोष का परिहार इस पक्ष में भी इस तरह से किया जा सकता है कि जैसे कारणभूत तन्तु में अङ्गको ढकना, शीत को दूर करना आदि की क्षमता न रहने पर भी उनके कार्य पद में यह क्षमता उपलब्ध होती है, अतः

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वेदार्थ पारिजातः क्षुरमोदकाद्यर्थं कार्यपाटनपूरणाद्यनुपलम्भो नोपपद्यते तन्त्वादिष्वङ्गप्रावरणशीतापनयनादिकार्यक्षमत्वाभावेऽपि पटे तदुपलम्भेन कार्यकारणयोरनिर्वचनीय वैलक्षण्याभ्युपगमे दोषासत्त्वात् । यदप्युक्तम्- भेदाभेदों मुक्त्वा वस्तुनो नान्या गतिः सम्भवति, तदप्यकिञ्चित्करम्, सदसद्भेदाभेद-विलक्षणस्य कार्यजातस्यैवानिर्वचनीयत्वसिद्धेः । तथाहि - स्थिरो भावः क्रमवत्सहकारिसमवधानात् क्रमेण कार्याणि करोति । सहकारिभिराधीयमानोऽस्योपकारो न भिन्नो नाभिन्नः, किन्त्वनिर्वाच्य एव । अनिर्वाच्याच्च तस्मादनिर्वाच्यमेव कार्यं जायते । न च ' वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नचर्मण्येव तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः || ' इत्युक्तदिशा खतुल्यस्य कूटस्थस्याकारणत्वमेवेति वाच्यम् भुजङ्गस्य रज्ज्वा इव कूटस्थस्यापि कार्योपादानत्वे बाधाभावात् । बौद्धैरनिच्छद्भिरपि चैषा गतिरुपाश्रयणीया । तथाहि तैः सर्वतो विलक्षणानि वस्तुन्यास्थीयन्ते । तन्मते वीजजातीयेभ्योऽङ्कुरजातीयान्येव कार्याणि न क्रमेलकजातीयानि । किमत्र व्यक्त्योः कार्यकारणभाव: सामान्ययोः सामान्योपहितयोर्वा? न प्रथमोऽतिप्रसङ्गात् । व्यक्तित्वे वैलक्षण्ये चाविशेषे कुतो बीजादङ्कुरस्यैवोत्पत्तिः, न क्रमेल-कस्य? न द्वितीय:, बीजाङ्कुरत्वयोर्वस्तुसत्तत्त्वेऽपराद्धान्तापत्तेः । नहि बौद्धैः सामान्यं वस्तु सदभ्युपेयते । अवस्तुनोरपि सामान्ययोः कार्यकारणभावाभ्युपगमेऽर्थक्रियाकारित्वेन सत्त्वापातादपरोऽप्यपराद्धान्तः । यदि त्ववस्तुसामान्योपहितानां व्यक्तीनां कार्यकारणभावोऽभ्युपेपते, तहि तद्वदेवावस्तुभूतोपका रोपहितात्स्थिरात् कार्योत्पत्तिः कुतो नोपेयते । न चोपधानमन्तरेण व्यक्तीनां कार्यकारणभावः सम्भवति, कार्यहेतुकानुमानोच्छेदप्रसङ्गात् । न च सामान्योपाधिमन्त राप्यनुमानं प्रवर्तते, व्यक्तीनामानन्त्येन व्याप्तिग्रहायोगात् । तथाविधस्योपकारस्य सदसद्भेदाभेदविलक्षणत्वेनानिर्वाण्य-कार्य और कारण में कुछ अनिर्वचनीय विलक्षणता माननी ही पड़ती है । इसलिये आपके बताये किसी दोष की इस पक्ष में प्रवृत्ति हो नहीं हो सकती । यह जो कहा गया है कि- ' भेद और अभेद को छोड़कर वस्तु की दूसरी कोई गति नहीं हो सकती ', वह भी गलत है, क्योंकि सदसत् भेदाभेद आदि से विलक्षण सम्पूर्ण कार्यों की अनिर्वचनीयता सिद्ध की जाती है । जैसे कि स्थिर मात्र ( वस्तु ) क्रमयुक्त सहकारी के समवधान ( सहयोग ) से क्रम से कार्य करता है । सहकारी कारणों के द्वारा किया जाने वाला इसका उपकार न तो इससे free है और न अभिन्न ह्री, किन्तु वह अनिर्वाच्य होता है । उस अनिर्वाच्य कारण से कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है । यहाँ शङ्का उठती है कि ' वर्षा और आतप से आकाश का क्या बनने - बिगड़ने वाला है, इसका प्रभाव तो चमड़े पर ही पड़ता है | यदि ब्रह्म को भी चर्म के समान माना जायगा तो वह अनित्य हो जायगा और आकाश के तुल्य मानने पर उससे कुछ फल मिलने वाला नहीं है ' इस कारिका के अनुसार नाकाशतुल्य कूटस्थ ब्रह्म किसी का कारण नहीं हो सकता । यह कथन भी बिलकुल बेतुका है, क्योंकि रज्जु से सर्प की तरह कूटस्थ से भी कार्य की उत्पत्ति में, रज्जु और कूटस्थ की उपादानता में कोई बाधा नहीं है । बौद्धों को न चाहते हुए भी इस बात को मानना पड़ेगा, क्योंकि वे वस्तुओं का स्वरूप सब दार्शनिकों से अत्यन्त विलक्षण मानते हैं । उनके मत में बीजजातीय वस्तु से अंकुरादिजातीय कार्य ही पैदा होते हैं, क्रमेलक ( ऊट ) जातीय नहीं । यहाँ पर दो व्यक्तियों का कार्यकारणभाव सामान्य का है या सामान्य से उपहित का है? पहले पक्ष में अतिप्रसङ्ग दोष होगा, क्योंकि व्यक्तित्व और वैलक्षण्य की समानता रहने पर बीज से अंकुर की हो उत्पत्ति क्यों होगी, उष्ट्र की उत्पत्ति क्यों न होगी? इसमें कोई गमक नहीं है । द्वितीय पक्ष भी नहीं बनेगा, क्यों क बीज और अंकुर की वस्तुसत्ता मानने पर बौद्ध सिद्धान्त गलत हो जायगा । बोद्ध सामान्य को वस्तुसत् नहीं मानते । अवस्तुभूत दो सामान्य का कार्यकारणभाव मानने पर अर्थक्रियाकारिता कारण इनमें भी सत्त्व की स्थिति रहने से बौद्ध की यह दूसरी भी बात ( अपने सिद्धान्त से विरुद्ध ) माननी पड़ जायगी । यदि अवस्तुभूत सामान्य से उपहित व्यक्तियों का कार्यकारणभाव माना जाता है तो उसी तरह से अवस्तुभूत उपकार से उपहित स्थिर वस्तु से भी कार्य की उत्पत्ति क्यों न मान ली जाय? उपधान के बिना तो व्यक्तियों का कार्यकारणभाव नहीं बन सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर कार्यहेतुक अनुमान सच्छित हो जायगा । सामान्य जाति के बिना अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि व्यक्ति तो अनन्त है, उनके साथ व्याप्तिग्रह नहीं हो सकता । इस प्रकार का उपकार सदसत्

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वेदार्थपारिजातः ३६७ त्वमेव । न च तर्हि धूमादिवत्प्रत्ययनियमहेतुत्वेन शब्दार्थयोरविनाभावसम्बन्धोऽस्तु तथात्वे शब्दस्यानुमानत्वापातात् । न चाभिधानाभिधेयनियम नियोगसमय एव सम्बन्धोऽस्तु तस्य पुरुष सङ्केतरूपस्याव्याहतप्रसरत्वेन तदयोगात् । वस्तुनियमस्य पुरुषेच्छाधीनत्वात् पुरुषेच्छयार्थस्यापि वाचकत्वप्रसङ्गात् । नहि दहनमनिच्छन्नपि पुरुषः धूमादग्नि न प्रत्येति, जलं वा तत इच्छन्नपि प्रत्येति । तस्माच्छक्त्यात्मक एव शब्दार्थयोर्नेस गिक: सम्बन्धः । तत्र यथा धूमाग्न्यो-रविनाभावस्य नैसर्गिकत्वेऽपि ज्ञप्तये भूयोदर्शनादिनिमित्तमिष्यते, तथैव तद्व्युत्पत्तये वृद्धव्यवहारप्रसिद्धिसमाश्रयणम् । नन्वेवं सम्बन्धस्योत्पत्तिकत्वे दीपादिवद् व्युत्पत्त्यनपेक्षैवोचितेति चेन्न J शब्दस्य ज्ञापकत्वात् । यथा धूमादेः सम्बन्ध -ग्रहणसापेक्षस्यैव स्वज्ञाप्यत्वम्, तथैव व्युत्पत्तिसापेक्षस्यैव शब्दस्यापि स्वज्ञापकत्वम् | योग्यतादयस्तु प्रत्यक्षाद्यन्तर्गताः । अभिधानाभिधेय नियम नियोगरूपः समयोऽपि ज्ञानरूप एवं नार्थान्तरम् । ज्ञानं चात्मन्येव भवति न शब्दार्थयोरिति न तयोः सम्बन्धः । किञ्च, समयः क्रियमाणः प्रत्युच्चारणं वा क्रियते प्रतिपुरुषं वा? सर्गादौ सकृदीश्वरेण वा प्रत्युच्चारणं प्रागिव क्रियते नूतनो वा? नवस्य क्रियमाणस्य कथमर्थप्रत्यायनसामर्थ्यम्, तदवगतौ वा किं तत्करणेन? पुरुषेच्छं हि नियामिकेति चेन्न, प्रतिपुरुषमिच्छाया भिन्नत्वात् । पूर्वकृतसंकेतादर्थप्रत्यायनं चेत्, तदा कृतत्वादेव कृतस्य करणमनुपपन्नम् । एकस्य वस्तुनो ज्ञप्तिरेवासकृदावर्तते नोत्पत्तिः । प्रतिपुरुषमपि सम्बन्धो भिन्नोऽभिन्नो वा क्रियते? भेदपक्षे कथमेकार्थसंज्ञानं सास्नानादिमान् गोशब्दस्यार्थः? अभेदे कृतस्य करणाज्ज्ञानमेव सम्बन्धस्य, न करणम् शब्दार्थसम्बन्धरहितकालस्यासम्भवादेव सर्गादावपि तत्करणमसङ्गतम् । तस्मान्नित्यस्यैव सम्बन्धस्य लोकतो व्युत्पत्तिः, भेदाभेद आदि से विलक्षण है, अतः वह अनिर्वाच्य ही हो सकता है । ' धूम जैसे अग्नि का ज्ञान कराता है, वैसे ही शब्द अर्थ का ज्ञान कराता है । इसलिये उनका अविनाभाव सम्बन्ध हो क्यों न मान लिया जाय ' यह कहना इसलिये ठीक नहीं है कि फिर तो शब्द प्रमाण की अनुमान से अभिन्नता हो जायगी । अभिधान- अभिधेय के नियम का उपदेश ही सम्बन्ध नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह तो पुरुष सङ्केत रूप है, अतः उसकी सर्वत्र अध्याहृत प्रवृत्ति होती है, उसको नियोग में ही सीमित नहीं रख सकते । वस्तु का नियम पुरुष की इच्छा का अनुवर्तन नहीं करता, पुरुष की इच्छा होने पर क्या अर्थ को भी बाचक बनाया जा सकता है? अन को न चाहता हुआ भी व्यक्तिधूम को जान ही लेता है और चाहते हुए भो धूम से जल को नहीं जान पाता । इसलिये शब्द और अर्थ का स्वाभाविक सम्बन्ध शक्त्यात्मक ही हैं । धूम और अग्नि का अविनाभाव स्वाभाविक है, तो भी उनकी ज्ञप्ति के लिये भूयोर्शन ( बार - बार देखना ) प्रभृति निमित्त माने जाते हैं, उसी तरह से वाक्त्यात्मक स्वाभाविक सम्बन्ध की व्युत्पत्ति के लिये भी वृद्ध - व्यवहार, प्रसिद्धि आदि का सहारा लिया जाता है । सम्बन्ध यदि स्वाभाविक है तो दीपादि की तरह उसको भी व्युत्पत्ति आदि की अपेक्षा नहीं रहनी चाहिये, यह बात हम नहीं कह सकते, क्योंकि शब्द केवल ज्ञापक होते हैं । जैसे धूमादि से व्याप्तिरूपी सम्बन्ध का ग्रहण होने पर ही अग्नि प्रभृति का ज्ञान होता है, उसी तरह से व्युत्पतिसापेक्ष शब्द की ही अपने अर्थ में ज्ञापकता मानी जाती है | इसके सहायक योग्यता प्रभृति का तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । ' erferent for म नियोग रूप समय भी ज्ञानरूप ही है, इससे भिन्न नहीं । ज्ञान आत्मा में ही होता है, शब्द और अर्थ में नहीं, अतः यह ज्ञान शब्द और अर्थ का संबन्ध नहीं हो सकता । अपि च, समय प्रति उच्चारण किया जाता है या प्रति पुरुष? अथवा सर्ग के आदि में ईश्वर एक ही बार प्रति उच्चारण पूर्ववत् संकेत करता है या नवीन? यदि नवीन करना है तो उससे referfar कैसे हो सकती है और यदि अर्थावगति किसी प्रकार होती है तो उसमें क्या पुरुष की इच्छा ही नियामिका है? " इस पर हमारा उत्तर है कि प्रति पुरुष इच्छा भिन्न होती है, अतः इच्छा इसमें नियामिका नहीं हो सकती । पूर्व कृत संकेत से अर्थप्रतीति मानने पर भी आपत्ति यह है कि यह तो कृत वस्तु से ही कृत का करण हुआ, जो कि अनुचित है । एक वस्तु की ज्ञप्ति की ही पुनः पुनः आवृत्ति होती है, उत्पत्ति की नहीं । प्रति पुरुष भो संबन्ध भिन्न रहता है या अभिन्न? भेद पक्ष में एक अर्थ का ज्ञान कैसे होता है कि यह सास्नादिमान् गो शब्द का अर्थ है? अभेद पक्ष में कृत का ही करण हुआ, इसमें संबन्ध का ज्ञान ही होगा, शब्दार्थ संबन्ध से रहित काल की संभाव्यता के कारण सर्गादिकाल में भी उसकी करणता नहीं बन सकती । इसलिये नित्य सिद्ध संबन्ध का ही

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३६८ वेदार्थपारिजातः न करणम् । व्युत्पतिपक्षे नेते दोषाः सम्भवन्ति, प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । वृद्धानां स्वार्थे व्यवहरमाणानामुपशृण्वन्तो बालास्ततस्ततः शब्दात्तं तमर्थं प्रतियन्ति । ते वृद्धा अपि स्ववृद्धेभ्यस्तथैव प्रतियन्तीति प्रत्यक्षमेव । पूर्वमीमांसकनये संसारस्यानादित्वान्न प्राथम्यं कस्यचित् । वेदान्तिनये सृष्टिप्रलयाङ्गीकारेऽपि बीजाङ्कुरन्यायेन सृष्टिप्रलयपरम्पराया अपि अनादित्वमेव । सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन सर्गादौ ब्रह्मप्रजापत्यादीनां पूर्वसृष्टिशब्दार्थसम्बन्धानां स्मरणमुपपद्यत एब । नैसर्गिकशक्तिशून्यसमयमात्रशरणः शब्दश्च नाक्षि निकोचहस्तसंज्ञादिम्यो भिद्यते । तथा च स कशाङ्कुश-प्रतोदाभिघातस्थानीय एव भविष्यति । तथा च शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे, लौकिकोऽयं व्यपदेशो बाधित एव भवि-ष्यति । किञ्च समयपक्षे यदृच्छाशब्दतुल्यत्वमेव सर्वशब्दानां भविष्यति, तेन गवाश्वादिशब्दानां नियतविषयत्वं च न स्यात् । यदप्युक्तम्- क्वचिद्देशान्तरप्रसिद्धमर्थमुत्सृज्य ततोऽर्थान्तरे प्रयुज्यते । यथा तस्करवचनश्चौरशब्दः क्वचि दोदने प्रयुज्यते । तदेष समयपक्ष एव युज्यते, नित्ये सम्बन्धे तदर्थव्यभिचारो न युक्तः, तदपि मन्दम्, सर्वशब्दानां सर्वार्थ-प्रत्यायनशक्तियुक्तत्वात् । क्वचिद्देशे केनचिदर्थेन व्यवहारः । अत एव चानवगतसम्बन्धे श्रुते सति सन्देहोऽपि भवति कोऽर्थोऽस्य शब्दस्येति । आर्षदेशप्रसिद्ध एवं शब्दानामर्थो युक्तः, तत्राविच्छिन्नपारम्पर्यस्य सत्त्वात् । तस्मादकृत्रिम एव शब्दार्थ सम्वन्धः । लोकव्यवहार से ज्ञान होता है । वह किया नहीं जाता, अतः किये जाने के पक्ष में उठाई गई सारी शंकाएँ व्यर्थ हैं । व्युत्पत्ति ( ज्ञान मात्र ) मानने में उक्त दोषों का प्रसार नहीं होता, क्योंकि यह प्रत्यक्ष सिद्ध है । वृद्ध जन जब अपने व्यवहार में लगे रहते हैं तो उनकी बातें सुनकर बालक उस उस शब्द से उस उस अर्थ को जान लेते हैं । बे वृद्ध भी अपने पूर्ववर्ती वृद्धों से इसको जानते हैं, यह प्रत्यक्ष सिद्ध है । पूर्व मीमांसक के मत में संसार अनादि है, अतः इसमें किसी की प्राथमिकता नहीं मानी जाती । वेदान्ती के मत में सृष्टि और प्रलय को यपि स्वीकार किया गया है, किन्तु बीजांकुर न्याय से सृष्टि और प्रलय की परम्परा भी अनादि है । सुप्त-प्रतिबुद्ध न्याय से सर्गादि काल में ब्रह्मा, प्रजापति आदि को पूर्व सृष्टि में स्थित शब्दार्थ संबन्ध का स्मरण होता है । इसलिये यहो पक्ष युक्तियुक्त है । ' नैसर्गिक शक्ति से शून्य, केवल समय ( संकेत ) के सहारे जीने वाला यह शब्द आंख और हाथ के इशारे से अधिक भिन नहीं है, उसको अंकुश और चाबुक के आघात के समान ही समझना चाहिये, अर्थात् जैसे चाबुक आदि से घोड़े, हाथी और बैल को प्रेरित किया जाता है, उसी तरह से ये शब्द भी अर्थों को प्रेरित करने वाले माने जायेंगे । ' किन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर ' मैं शब्द से अर्थ को जानता हूँ ' यह लौकिक व्यपदेश बाधित हो जायगा । आपके कहे हुए केवल समय को मानने पर यह भी दोष आ उपस्थित होगा कि सभी शब्द यदूच्छा शब्दों के तुल्य हो जायेंगे, इस परिस्थिति में गो, अश्त्र प्रभृति शब्द नियत विषय के हो बोधक नहीं रह जायेंगे । यह भी कहा गया है कि ' कहीं पर देशान्तर में प्रसिद्ध अर्थ को छोड़कर उससे भिन्न अर्थ में शब्द का प्रयोग किया जाता है । जैसे कि तस्करवाची चौर शब्द से कहीं पर ओदन ( भात ) का बोध होता है । यह बात समय को मानने पर ही संभव हो सकती है । नित्य संबन्ध को मानने पर उसका अर्थ से व्यभिचार नहीं होना चाहिये । ' किन्तु यह कथन भी बड़ा कमजोर हैं, क्योंकि सभी शब्द भी अर्थी को बताने में समर्थ हैं । किसी देश में किसी एक अर्थ से व्यवहार होता है और दूसरे में दूसरे अर्थ से । इसीलिये अवगत ( अज्ञात ) संबन्ध वाले शब्द को सुनने पर संदेह हो जाता है कि इस शब्द का अर्थ क्या है? शब्दों का आर्ष देश में प्रसिद्ध अर्थ हो उचित माना जाता है, क्योंकि वहीं पर इसकी अविच्छिन्न परम्परा वर्तमान है । इसलिये शब्दार्थ का संबन्ध अकृत्रिम ( स्वाभाविक ) ही माना जाता है ।

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वेदाथपारिजातः ३६६ यदुक्तम् - शब्दवदर्थबच्च तृतीयस्य सम्वन्धस्य न प्रतीतिरिति, शक्तिरूपस्य सम्वन्धस्य साधितत्वात् । न च स्वरूपसहकारिष्यतिरिक्तात्मा शक्तिर्नास्त्येवेति वाच्यम्, शक्तेः कार्यगम्यत्वेनापलापानर्हत्वात् । ' परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते ' इति श्रुते । नतु शक्तिकल्पनेऽपि समयोऽपरिहार्यः, समयमन्तरेणार्थप्रतिपत्तेरसिद्धेः । सिद्धे च समये तत एवार्थ-सिद्धेः किं नित्यसम्बन्धाश्रयणेनेति चेन्न, नैसगिकशक्तिव्युत्पत्तिव्यतिरेकेण समयानपेक्षणात्, समयस्यासङ्गतत्वाच्च । यदयुक्तम् - शक्त्यभावेऽपि शब्दस्यैव वाचकत्वे योग्यतेति न पुरुषेच्छाया अव्याहतप्रसरत्वेन वाच्यवाचकयो-र्व्यत्यय इति तदपि मन्दम्, शक्त्यतिरिक्ताया योग्यताया असिद्धेः । न च यथा द्रव्यत्वाद्यविशेषेऽपि वीरणत्वादि-सामान्यवतां पदनिष्पत्ती न शक्तिस्तथैव क्रमविशेषोपकृतस्य गत्वौत्वादिसामान्ययोगस्य वाचकत्वे इतरस्य तु वाच्यत्वे योग्यतेति वाच्यम्, योग्यतायाः पुरुषेच्छाधीनत्वेन वैषम्यात् । वस्तुगत वैशेष्यमन्तरा तन्तुपदमृद्घटादीनामपि कार्यकारणभावानुपपत्तेश्च । वस्तुगतयोग्यताङ्गीकारे वस्तुशक्तिरभ्युपगतैव । बीजेऽङ्कुरोत्पादनयोग्यतेव बीजगताङ्कुरी-त्पादिनी शक्तिरभ्युपेयते । यदुक्तम् -- न तयोरविनाभावे घूमाग्न्योरिव सम्वन्धः । तत्र सम्बन्धः धूमोऽग्नि विना न भवतीति प्रतीयमान एव प्रतीयते । इह पुनरयमस्मात्प्रतीयत इत्येतावदेव व्युत्पत्तिपर्यवसानम् । अत एवावगतिपूर्विकै वावगतिरित्यनुमानाच्छ-उदस्य भेदः । प्रकाशकत्वमपि शब्दस्य समयप्रसादादेवोपनतं न स्वाभाविकमित्यादि, तदपि तुच्छम्, तथात्वेऽप्यक्षिनिकोच-हस्तसंज्ञादिभ्यः शब्दस्य विशेषानवगमात् । शब्दशक्त्यनभ्युपगमे शब्दादर्थं प्रतिपद्यामह इति प्रतीतेरनुपपत्तेश्च, समयादर्थं यह कहना भी गलत है कि ' शब्द और अर्थ की तरह तृतीय पदार्थ के रूप में हमको संबन्ध की प्रतीति नहीं होती ', क्योंकि यह संबन्ध शक्तिरूप है, इसको सिद्ध किया जा चुका है । स्वरूप और सहकारी के अतिरिक्त शक्ति कोई पदार्थ नहीं है, ऐसा आप नहीं कह सकते, क्योंकि शक्ति का ज्ञान उससे होने वाले कार्यों से होता है, इसलिये उसका अपलाप किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता । ' इस परमात्मा की परा शक्ति नाना रूपों में सुनी जाती है ' यह श्रुति वचन भी इसमें प्रमाण है । प्रश्न है कि शक्ति की कल्पना कर लेने पर भी समय को तो मानना ही पड़ेगा, क्योंकि बिना समय के अर्थ की प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) नहीं हो सकती | समय के सिद्ध हो जाने पर उसी से जन अर्थ की सिद्धि हो सकती है तो नित्य संबन्ध को मानने की क्या आवश्यकता? उत्तर है कि नैसर्गिक शक्ति और व्युत्पत्ति के अतिरिक्त समय नाम की कोई वस्तु नहीं है । समय एक असंगत कल्पनामात्र है । यह भी कहा गया है कि ' शक्ति को न मानने पर भी शब्द में ही वाचकत्व को योग्यता है, अतः पुरुष की अपनी मनमानी इच्छा के अनुसार बाच्यवाचक भाव में परिवर्तन नहीं होगा ', किन्तु यह भी बड़ी कमजोर उक्ति है, क्योंकि शक्ति से भिन्न कोई योग्यता ' fia नहीं की जा सकती । जैसे समान रूप से द्रव्यत्व रहने पर वीरणत्व ( तृणत्व ) सामान्य वाले द्रव्यों से पट की निष्पत्ति नहीं होती, उसी तरह से क्रम विशेष से उपकृत गत्व, अत्व आदि सामान्य योग के बावकत्व में और अर्थ के वाध्यत्व में योग्यता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि योग्यता पुरुष की इच्छा के अधीन नहीं है, इतना ही यहाँ अन्तर है । वस्तुगत वैशिष्ट्य के बिना तस्तु - पट, मिट्टी - घट आदि का भी कार्यकारणभाव नहीं बन सकता, इस परिस्थिति में वस्तुगत योग्यता को स्वीकार करने पर वस्तु की शक्ति मान ही ली जाती है । बीज में अंकुर के उत्पादन की योग्यता ही तो बीजगत अंकुरोत्पादन शक्ति मानी जाती है । यह भी कहा गया है कि- ' शब्द और अर्थ का अविनाभाव माने बिना धूम और अग्नि की तरह उनका संबन्ध ही नहीं बनेगा | धूम अग्नि के बिना नहीं होता, अतः यहाँ पर संबन्ध पहले से ही प्रतीयमान है । शब्दार्थ स्थल में यह अर्थ इस शब्द से प्रतीत होता है, इतने में ही व्युत्पत्ति का पर्यवसान हो जाता है । इसीलिये यहाँ पर अवगतिपूर्विका अवगति ( ज्ञानपूर्वक ज्ञान ) होने से इसका अनुमान से भेद हो जाता है । शब्द की प्रकाशकता भी समय के प्रसाद से ही आती है, वह स्वाभाविक नहीं है ' यह भी बड़ी गलत बात है, क्योंकि इतना मान लेने पर भी शब्द की अक्षिनिकोच ( आँख का इशारा ) और हाथ के इशारे से अधिक कोई विशेषता नहीं शात होती | शब्दशक्ति न मानने पर शब्द से अर्थ को जानते हैं, इस तरह की प्रतीति के स्थान पर समय से अर्थ को जानते हैं, इस तरह ४७

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३७० वेदार्थपारिजातः प्रतिपद्यामह इति प्रतीत्यापत्तेश्च । अवगतिपूर्वकत्वस्य लिङ्गपरामर्शजन्यानुमितेरिव सङ्केतग्रहपूर्वके शाब्दबोधेऽप्यन पायादिति न तेन शब्दानुमानयोर्भेदसिद्धिः । सिद्धान्ते शाब्दबोध आकाङ्क्षायोग्यता स त्तितात्पर्यज्ञानानामपि कारणस्वनानु-मानाद् व्यवच्छेदः । तात्पर्यज्ञानस्यानुमिती सर्वथानुपयोगः । तस्यानुमितित्वावच्छेदेनाहेतुत्वम् । व्याप्तिज्ञानाभावेऽपि सत्स्वाकाङ्क्षादिषु संसर्गज्ञानस्यानुभवसिद्धत्वान्नानुमानरूपता शब्दस्य | आलोकादिसापेक्षस्य चक्षुषो रूपप्रकाशकत्वमिव व्युत्पत्तिसापेक्षस्य शब्दस्य स्वार्थप्रकाशकत्वमपि स्वाभाविकमेव । अत एव सांसिद्धिके हि तथात्वे भ्रमित्वादिप्रयुक्ता-दन्यतो वा यतः कुतश्चिदभिनवापि दीपादिना शब्दादर्थप्रतीतिः स्यादित्याद्यपास्तम्, स्वभावस्य फलबलकल्प्यत्वात् । नहि दीपस्यापि सर्वथा निरपेक्षत्वम्, चक्षुरादिसापेक्षत्वात् । उक्तं च धूमादेर्व्याप्तिग्रहसापेक्षस्येव शब्दस्यापि सम्बन्ध-ग्रहसापेक्षस्यैव प्रत्यायकत्वम् । यदप्युक्तम्- ' धूमादेः प्रत्यायकत्वं न स्वाभाविकम्, धूमध्वजाविनाभावित्वं तु तस्य निजं बलम् । तस्मिन्न-गृहीते प्रतीतिरेव न जायत इति युक्तं तद्ग्रहणं प्रतीत्यर्थम्, इह तु प्रतीतिशक्तिरेव स्वाभाविकी मोमांस कैरभ्युपेयत इति वैषम्यम् | स्वाभाविकी शक्तिश्चेत्कि व्युत्पत्त्यपेक्षणेनेति, तदसङ्गतम्, उभयोः प्रत्यायकत्वाविशेषात् । यथा चक्षुषो रूपप्रकाशशक्त स्वाभाविक्यां सत्यामप्यालोकाद्यपेक्षा, दीपस्य च चक्षुराद्यपेक्षा, तथैव शब्दस्य स्वार्थ-बोधिन्यां शक्तो नैसर्गिक्यामपि व्युत्पत्त्यपेक्षा । यावत्कृत्वः श्रुतेनेयं संज्ञाऽयं संज्ञीत्यवगम्यते } तावत्कृतः श्रुतादर्थावगम इति न संज्ञासंज्ञिसम्बन्धः क्रियते, किन्तु सिद्ध एवोपदिश्यते । ज्ञानस्यैवावृत्तिर्न वस्तुत्पत्तिरित्युक्तमेव । की प्रतीति को आपत्ति होगी । लिङ्ग के परामर्श से उत्पन्न अनुमिति के समान संकेत ग्रहण पूर्वक होने वाले शाब्दबोध में भी अवगति पूर्वकत्व के नियमतः रहने से शब्द और अनुमान में कोई भेद नहीं रह जायगा । हमारे मत में तो शाब्दबो में आकांक्षा, योग्यता, आसति और तात्पर्य ज्ञान की भी कारणता होने से इसकी अनुमान से भिन्नता हो जाती है । तात्पर्य ज्ञान का अनुमिति में कोई उपयोग नहीं है । वह तो अनुमान मात्र में हेतु भी नहीं है । व्याप्ति ज्ञान के न रहने पर भी आकांक्षा प्रभृति के रहने पर संसर्ग ज्ञान हो जाता है, यह बात अनुभव सिद्ध है, इसलिये शब्द अनुमान रूप नहीं है । आलोकादि सापेक्ष चक्षु की रूपप्रकाशकता के समान व्युत्पत्ति सापेक्ष शब्द की स्वार्थप्रकाशकता भी स्वाभाविक है । इसीसे इस शङ्का का भी समाधान हो जाता है कि ' दीपक जैसे बिना किसी की सहायता के वस्तु को प्रकाशित करता है, उसी तरह से शब्दार्थ सम्बन्ध की स्वाभाविकता में भ्रमत्वादि से प्रयुक्त अथवा जिस किसी नये शब्द से भी अर्थ की प्रतीति होनी ही चाहिये, क्योंकि किसी भी वस्तु के स्वभाव की कल्पना फल के आधार पर ही की जाती है । दीपक भी सर्वथा निरपेक्ष वस्तु का प्रकाशक न होकर चक्षुरादि की अपेक्षा रखता ही है । यह हम पहले ही कह आये हैं कि व्याप्ति ग्रहण सापेक्ष धूम जैसे अग्नि का प्रत्यायक है, उसी तरह से शब्द भी सम्बन्ध ग्रहण सापेक्ष ही अर्थ का प्रत्यायक है । यह भी कहा गया है कि - ' धूमादि की प्रत्यायकता स्वाभाविक नहीं है, किन्तु उनकी धूमध्वज ( अग्नि ) की अविना-भविता तो निजी बल है, उस निज बल रूप अविनाभाव के ज्ञान के बिना धूम से अग्नि की प्रतीति ही नहीं होगी, इसलिये अग्नि की प्रीति के लिये उस नाभाव का ज्ञान आवश्यक है, किन्तु यहाँ पर तो मीमांसक प्रतीति ( शक्ति ) को स्वाभाविक मानते हैं, यह दोनों स्थलों में विषमता है । यदि शक्ति स्वाभाविक है तो फिर व्युत्पत्ति की क्या आवश्यकता है ' यह भी उस है क्योंकि प्रत्यायकता ( arveer ) दोनों में समान है । जैसे चक्षु में रूप को प्रकाशित करने की शक्ति स्वाभाविक है, तो भी उसको आलोकादि की अपेक्षा रहती है और mert ो भी चक्षुरादि की अपेक्षा है, उसी तरह से शब्द की स्वार्थबोधक शक्ति के स्वाभाविक होने पर भी व्युत्पत्ति की अपेक्षा रहती है । जितनी बार सुनने के बाद यह संज्ञा है, यह संज्ञी है, इसका ज्ञान होता है, उतनी ही बार सुने गये शब्द से अर्थ की अवगति ( ज्ञान ) होती है । इस तरह से संज्ञा और संज्ञी का सम्बन्व बनाया नहीं जाता, किन्तु सिद्ध सम्बन्ध का उपदेश भर किया जाता है | ज्ञान की ही बार - बार आवृत्ति हो सकती है, वस्तु की उत्पत्ति वार - बार नहीं होती, यह बात पहले कही जा चुकी है |