वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 401–410

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 401–410

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वेदार्थपारिजातः ३७१ यदप्युक्तम् - नानात्मकस्य शब्दार्थसमयस्य विषयत्वेन तदाश्रयत्वाभावेऽपि सम्वन्धोपपत्तिरिति, तदपि कुशकाशावलम्बनम्, संसर्ग्यनाश्रितस्थापि सम्बन्धस्य संसृष्टत्वप्रयोजकत्वे समूहालम्वन ज्ञानविषयत्वेनासंसंगिणामपि संसृष्टत्वप्रसङ्गात् । यच्चोक्तं नेगिशतिपक्षेऽपि शक्तेरर्थं प्रतिपद्यामह इति प्रतीत्यापत्तिः समैवेति, तदप्ययुक्तम्, वैषम्यात् । यथा बीजादङ्कुरो जायत इत्यस्य शक्ताद् बीजादङ्कुरो जायत इत्येवार्थस्तथैव शब्दादर्थं प्रत्येमीत्यस्यापि शक्ताच्छन्दादर्थं प्रत्येमीत्येवार्थः । अपि च, गृहीतसम्बन्धस्य शब्दस्यार्थ प्रत्यायकत्वमुभयप्रतिपन्नम् । तत्र कृतेति विशेषणं नापेक्षणीयम्, अप्रयोजकत्वाद् गौरवावहत्वाच्च । यदप्युक्तम्-- ' घूमे हि व्याप्तिपूर्वत्वं शब्दे समयपूर्वता । नानयोस्तदपेक्षायां कारणत्वं विहन्यते ॥ ' इति, तदपि मन्दम्, शक्तेः संज्ञासंज्ञिसम्बन्धस्य संकेतस्य समयस्य वाऽभ्युपगमेऽपि तज्ज्ञानमेवापेक्षितम्, न करणमित्युक्तत्वात् । ' यथा व्याप्तिग्रहापेक्षा घूमो वह्नि प्रवोधयेत् । तथा शक्तिग्रहापेक्षः शब्दः स्वार्थं प्रमापयेत् ॥ कृतत्वमकृतत्वं वाप्य-प्रयोजकहेतुना । नापेक्ष्यं गौरवाच्चैव हेतुहेतुत्वतः स्फुटम् ॥ ' यदयुक्तम् —— लौकिको व्यपदेश: समयपक्षसाक्षितां भजते । देवदत्तेनोक्तममुतः शब्दादमुमर्थं प्रतिपद्यस्व । अतश्चैवं देशान्तरे सङ्केतवशेन तत एवार्थान्तरप्रतीतिरपि सङ्गच्छते तदपि न सम्यक् तादृग्व्यपदेशेन सम्बन्धो बोध्यते न क्रियते, न्यायमते सम्बन्धस्य सर्गादावेव कृतत्वात् । देशान्तरेऽथन्तिरप्रतीतेः प्रामाणिकत्वेऽर्थान्तर-सम्बन्धोऽभ्युपेयः, अप्रामाणिकत्वे शक्तिभ्रमेणापि प्रतीतिसम्भवः । ननु शब्दस्वरूपाच्छक्तीनां भेदे भेदेनावभासप्रसङ्गः, अभेदे चेकस्माच्छन्दादनन्यत्वात्परस्परमव्यतिरेक-स्तासां स्यादिति चेन्न शक्तीनां शक्तिमतः शब्दाद् भेदेऽप्यतीन्द्रियत्वेन चक्षुरादीन्द्रियादिवदनवभासोपपत्तेः । न च यह जो कहा गया है कि - ' ज्ञानात्मक शब्दार्थ समय को विषय मानने पर उसके आश्रय के अभाव में सम्बन्ध की उपपत्ति नहीं बन सकती ' यह उक्ति भी कुशकाश के अवलम्बन की तरह है, क्योंकि सम्बन्धियों में न रहने वाले को भी सम्बद्ध कराने वाला मान लेने पर समहालम्बन ज्ञान विषयक होने के कारण असम्बद्ध पदार्थ भी परस्पर संबद्ध होने लगेंगे । यह कहना भी गलत है । कि नैसर्गिक शक्ति मानने वाले के पक्ष में भी शक्ति से अर्थ जानते हैं, ऐसी प्रतीति की आपत्ति समान रूप से होगी, क्योंकि इन दोनों में भिन्नता विद्यमान है । जैसे ' बीज से अंकुर पैदा हुआ ' इस वाक्य का ' समर्थ बीज से अंकुर पैदा हुआ ' यह अर्थ होता है, उसी तरह से शब्द से अर्थ जानता हूँ, इसका भी अर्थ यही होगा कि समर्थ शब्द से अर्थ को जानता हूँ । अपि च गृहीत सम्बन्ध शब्द की अर्थप्रत्याय-कता उभयवादी संमत है, इसमें ' कृत ' विशेषण लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अप्रयोजक भी है और गौरवास्पद भी । यह जो कहा गया है कि -- ' धूम में व्याप्तिपूर्वकता की ओर शब्द में समयपूर्वकता की अपेक्षा रहने पर भी दोनों की कारणता बिगड़ती नहीं । यह कथन भी गलत है, क्योंकि हम बता चुके हैं कि शक्ति का संज्ञासंज्ञी सम्बन्ध, सङ्केत या समय मानने पर भी केवल उसके ज्ञान की ही अपेक्षा है, करणता की नहीं । ' जैसे व्याप्तिग्रह की अपेक्षा रखता हुआ भी घूम बह्नि की प्रतीति कराता है, उसी तरह से शक्तिग्रह की अपेक्षा वाला शब्द अपने अर्थ का बोधक होगा । इसमें कृतकत्व अथवा अकृतकत्व की योजकता नहीं मानी जाती, क्योंकि इनमें हेतुहेतुभाव मानने में स्पष्ट ही गौरव है ' । यह जो कहा गया है कि ' लौकिक पक्ष समय पक्ष को ही बल देता है । देवदत्त कहता है कि तुम इस शब्द से इस अर्थ को जानो, तदनुसार शब्दार्थ जाना जाता है । इस तरह से देशान्तर में दूसरे अर्थ में संकेत रहने से उसी शब्द से अन्तर की प्रतीति सङ्गत होती है । यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरह की उक्तियों से सम्बन्ध का बोध होता है, उत्पत्ति नहीं | न्याय-दर्शन के मत से यह सम्बन्ध ईश्वर के द्वारा सर्ग के प्रारम्भ में ही स्थापित हो चुका है । देशान्तर में अर्थान्तर की प्रतीति यदि प्रामाणिक है तो उसी शब्द का वहां पर अर्थान्तर से सम्बन्ध मानना पड़ेगा और यदि वह अप्रामाणिक है तो उस अवस्था में शक्ति के भ्रम से भी अन्य अर्थ की प्रतीति सम्भव हो सकती है । प्रश्न उठता है कि शब्द के स्वरूप से यदि शक्ति भिन्न है तो उसकी अलग से प्रतीति होनी चाहिये और यदि अभिन्न है तो जो शक्ति एक शब्द में हैं वही दूसरे में भी है, अतः उनका परस्पर अभेद मानना पड़ेगा । उत्तर है कि शक्ति का शक्तिमान् शब्द से भेद

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३७२ वेदार्थपारिजातः तत्सत्त्वे मानाभाव इति वाच्यम्, कार्यानुमेयत्वेन तददोषात् । कार्यभेदेन शक्तिभेदेऽपि बाधाभावात् । न चान्यथानु-पपत्तिः, स्वतः शक्तावसत्यां पुरुषेच्छाधीनसङ्कृतादिभिरुपपादने पुरुषेच्छाया अभ्याहतप्रसरत्वेनातिप्रसङ्गात् । न च सर्वशक्तियोगे सर्वार्थप्रत्ययप्रसङ्ग इति वाच्यम्, व्याकरणकोषाप्तवाक्यव्यवहारादीनां नियामकत्वेन तददोषात् । न चैभिः सम्बन्धः क्रियते, किं तहि नित्यसिद्धस्यैवोपदेशः । शब्दश्रवणे सर्वार्थविषयसन्देहदर्शनात् सर्वत्र तस्य शक्ति: कल्प्यते । ननु स शक्तिकृतः सन्देहः किं गत्वादिवर्णनिबन्धनः? तथा च गत्वादिजातिमतां वर्णानामर्थे वाचकत्व-मवगतम् । अमो तज्जातियोगिनो वर्णाः कस्यार्थस्य वाचकाः स्युरिति सन्देह इति चेत्र, स्वार्थबोधजननानुकूलशक्ति-मस्वस्यैव वाचकत्वेन सन्देहमूलत्वस्य शक्तिपर्यवसानात् । वस्तुतः स एव शब्दस्यार्थो यत्रैनमार्याः प्रयुञ्जते, न म्लेच्छ्जनप्रसिद्ध इति । ननु चात्र शपथमन्तरेण किं प्रमाणम्? म्लेच्छदेशेऽपि तदर्थप्रत्ययो जायत एव । न च स प्रत्ययो बाध्यते, न वा सन्दिग्धो जायते । आर्य-प्रसिद्धिर्वाधिकेति चेदार्यप्रसिद्धेरपि म्लेच्छप्रसिद्धिः कथं न बाधिका । अक्षादिवच्च विकल्पमानार्थोपपत्तेः । व्यवस्थित-विषय एव विकल्पः । पिकनेमतामरसादिशब्दानां च भवद्भिः म्लेच्छप्रयोगादर्थनिश्चय आश्रित एव । अवेष्टयधिकरणे राजशब्द आन्ध्रप्रसिद्धेऽर्थे वर्णित एव मीमांसकैरपि । तथाप्यत्र यवादिशब्दादिष्विव वैदिकवाक्यशेषानुग्रहा-भावाच्छिष्टपरिगृहीतस्मृत्यनुग्रहादान्ध्रप्रयोग एवार्यप्रयोगाद् वलीयानित्युक्तम् । तत्र गुणवचनब्राह्मणादिशब्देभ्यः कर्मणि ष्यञ् इति पाणिनिना गुणवचनेभ्यः शुक्लादिशब्देभ्यो ब्राह्मणादिभ्यश्च ष्यञ्प्रत्ययस्मरणाद्राज्ञः क्षत्रियस्य होते हुए भी उसकी अतीन्द्रियता के कारण ही चक्षुरादि की तरह प्रत्यक्ष बोध नहीं होता । उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा हम नहीं कह सकते, क्योंकि उसकी कार्यानुयेयता मानने से उक्त दोष का परिहार हो जाता है । कार्यभेद से शक्ति का भेद मानने में भी कोई बाधा नहीं है । अन्य पद्धति से उसकी उपपत्ति नहीं हो सकती । शक्ति यदि स्वतः विद्यमान नही है और पुरुष की इच्छा के अधीन संकेत प्रभूति से उसकी उपपत्ति की जाती है तो पुरुष की इच्छा का प्रसार तो अव्याहत है, तदनुसार उसका कहीं भी संकेत हो सकेगा और ऐसी स्थिति में अनियमित अर्थ की प्रतीति होने लगेगी । आपके मत में भी तो सभी शक्तियों से शब्द के संयुक्त रहने से सर्वार्थ प्रतीति की आपत्ति उठती है? उत्तर है कि व्याकरण कोष, बाप्त वाक्य, व्यवहार आदि शब्द से नियमित अर्थज्ञान के नियामक है, अतः हमारे पक्ष में कोई दोष नहीं है । इनसे भी संबन्ध बनाया नहीं जाता है, किन्तु नित्य सिद्ध संबन्ध का केवल उपदेश किया जाता है । शब्द को सुनते ही उसके सभी अर्थों की विषयता का सन्देह उठता है, अत: उसकी सर्वत्र शक्ति है, ऐसा मान ही लिया जाता है । शंका उठती है कि यह शक्तिकृत सन्देह क्या गत्वादि वर्णों के कारण है? क्योंकि बत्वादि जातिमान् वर्णों की वाचकता अर्थ में जानी जाती है । ये उस जाति से संयुक्त वर्ण किस अर्थ के वाचक हैं, क्या यही सन्देह का आधार है? उत्तर है कि अपने अर्थ का ज्ञान कराने के अनुकूल शक्ति वाले वर्णों में ही वाचकता मानी जाती है, अतः अन्ततः सन्देह का मूल शक्ति में ही पर्यवसित होता है । ' वस्तुतः शब्द का अर्थ वही है, जिस अर्थ में कि ययंजन इसका प्रयोग करते हैं । शब्द का अर्थ वह नहीं है, जो कि स्लेच्छ जनों में प्रसिद्ध है । ' प्रश्न है कि आपके इस प्रतिज्ञा वाक्य में अपनी प्रतिज्ञा के सिवाय प्रमाण क्या है? म्लेच्छ देश में उन शब्दों से उन अर्थो का बोध ( ज्ञान ) होता ही है । न तो वह प्रत्यय बाधित होता है और न उसमें कोई संदेह ही रहता है | यदि आप इसमें आर्य प्रसिद्धि को बावक मानें तो हम म्लेच्छ प्रसिद्धि को ही आर्य प्रसिद्धि में बाधक क्यों न मान लें? ' अक्ष ' प्रभूति शब्दों की तरह यहाँ पर विकल्प भी हो सकता है । विकल्प का सहारा दोनों विषयों के व्यवस्थित होने पर ही लिया जाता है । आपने भी पिक, नेम, तामरस आदि शब्दों की म्लेच्छ प्रसिद्धि के अनुसार अर्थावगति मानी है । अवेष्टयधिकरण में मोमांसकों ने आन्ध्र प्रसिद्ध अर्थ में ' राज ' शब्द का प्रयोग किया है । ' किन्तु यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ पर यवादि शब्दों की तरह वैदिक वाक्यशेष का सहारा न होने से केवल शिष्ट परिगृहीत स्मृति की सहायता से आन्ध्र प्रयोग ही आर्य प्रयोग से बलवान् मान लिया गया है । यहाँ पर ' गुण aar ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से गुणवाची शुक्लादि शब्दों से और ब्राह्मणादि शब्दों से ष्यम् प्रत्यय का विधान होने से राजा अर्थात्

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वेदार्थपारिजातः ३७३ कर्म राज्यमिति साधितम् । तेन पाणिनिस्मृत्यनुगृहीतान्ध्रप्रसिद्धा राजशब्दस्य क्षत्रियजातिरर्थोऽवधार्यते, न केवलया-प्रसिद्धा । केवला म्लेच्छप्रसिद्धिस्तु शास्त्रसहितानामार्याणां प्रसिद्धया बाध्यत एव । स्वरवर्णादिन शे प्रत्यवायमनुसन्दधानानामार्याणां प्रसिद्धेराप्तिमूलत्वेन प्राबल्यम् । गतादिविषयेऽपभ्रंशभूतं गाव्यादिशब्द प्रयुञ्जानानां म्लेच्छानां प्रसिद्धेरनाप्तिमूलत्वेन दौर्बल्यमेव । तदुक्तं परिमलकृता - ' राजशब्दस्योभयत्र प्रयोगसाम्येन विनिगमना-विरहादर्थद्वयसत्त्वेऽपि राजसूयवाच्यक्षत्रिय एवार्थी ग्राह्यः । सप्रतियोगिकोपाधिकच मंरूपपालकत्वाद्यपेक्षया निष्प्रति योगिकाखण्डरूपधर्मक्षत्रियजातेर्लघुत्वेनासति बाधके लघुप्रवृत्तिनिमित्तार्थकग्रहणौचित्यात् । वस्तुतस्तु श्रुतिस्मृति-प्रयोगवैयाकरणव्यवहाराणामुभयत्र साम्येऽपि क्षत्रियेष्वेव राजशब्दस्य शक्तिः, तेषु क्षत्रियत्वजातेरिव वालकेष्वनु-गतानुप्रसक्तशक्यतावच्छेदकरूपाभावात् । तथाहि न पालनमात्रं निमित्तं सर्वसाधारण्यप्रसङ्गात् । युक्तदारधनादि-विषयमन्ततः स्वशरोरविषयं पालनमविशेषेण सर्वेषामेव भवति । नापि जनपदपरिपालनं निमित्तम् राज्ञा नियुक्ते तत्तत्पदाधिकारिणि सत्यपि जनपदपालने निमित्ते राजपदप्रयोगादर्शनात् । नापि स्वतन्त्रपालनं निमित्तं सम्राजा देशविशेषे राजभावेनाभिषिक्ते स्वातन्त्र्याभावेऽपि तत्पदप्रयोगात् । मृगराजपक्षिराजादिशब्देषु पालकत्वं विनापि श्रेष्ठ्य-मात्रेण प्रयोगदर्शनाच्च । तस्मादनुगतान तिप्रसक्तजातिनिमित्तकः क्षत्रियार्थं एव राजशब्दः, क्षत्रियेषु प्रायेण पाल-कत्वस्य तत्कृतस्य श्रेष्ठ्यस्य सद्भावात् । क्वचित्पालके क्वचिच्छ्रेष्ठे च राजशब्दस्य निष्ठा लक्षणैव । म्लेच्छप्रसिद्धे-रायप्रसिद्धिबाधकत्वे म्लेच्छधर्मबोधकग्रन्थानामप्यार्यवेदादिग्रन्थबाधकत्वमुपेतव्यम् युक्त्याभासस्योभयत्र समत्वात् । अविच्छिन्न पारम्पर्यस्य वेदादिषु वैशिष्ट्यमिति चेन्न शब्दव्यवहारप्रसिद्धावपि तद्वैशिष्टयस्य सत्त्वात् । क्षत्रिय का कर्म इस व्युत्पत्ति में ' राज्य ' शब्द साधित है । इस तरह से पणिनि की स्मृति से अनुगृहीत आन्ध्र प्रसिद्धि के अनुसार राज शब्द ET अर्थ क्षत्रिय जाति निर्धारित किया जाता है, केवल आन्ध्र प्रसिद्धि से नहीं । केवल म्लेच्छ प्रसिद्धि वो शास्त्रों से और आर्यों की प्रसिद्धि से भी बाधित हो जाती है । स्वर वर्ण आदि के छूट पाने पर भी प्रत्यवाय बताने वाले आर्यों की प्रसिद्धि आप्तिमूलक होने से प्रवन है | ' गो ' के लिये ' गावी ' आदि अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग करने वाले म्लेच्छों की प्रसिद्धि में आप्तमूषकता न होने के कारण योर्बल्य है । जैसा कि परिमलकार ने कहा है- ' राज शब्द का दोनों ही अर्थों में समान रूप से प्रयोग होने पर भी राजसूय वाक्य में ' क्षत्रिय ' ही अर्थ गृहीत होता है, क्योंकि धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करने वाला, इस प्रतियोगिक उपाधि की स्थिति वाले राजा की अपक्षा से निष्प्रयोगिक अखण्ड क्षत्रिय जाति की बोधकता में लाघव होने से और किसी बाधक के अभाव में लाघव में शब्दों की प्रवृत्ति-निमित्त मानने से यहाँ पर ' राज ' पद को क्षत्रिय का हो बोधक मानना उचित है । वस्तुतस्तु श्रुति, स्मृति, प्रयोग और वैयाकरणों के व्यवहार उभय अर्थों में समान रूप से विद्यमान रहने पर भी राज शब्द की शक्ति क्षत्रिय में ही मानी जाती है | क्षत्रियों में ही क्षत्रियत्व जाति अनुगत है, केवल पालक राजा में नियमतः इसकी अनुप्रसक्ति नहीं देखी जाती । केवल पालन मात्र हो उसका निमित्त नहीं हो सकता, क्योंकि इस तरह से सभी में इस शब्द को पालकता के आधार पर प्रवृत्ति होने लगेगी । पुत्र, पत्नी, धन आदि का अन्ततः अपने शरीर के लिये ही उपयोग है, किन्तु पालन समान रूप से सबका किया जाता है । जनपद परिपालन भी इसमें निमित्त नहीं माना जा सकता, क्योंकि राजा के द्वारा नियुक्त उस उस पद के अधिकारियों में भी जनपद पालन रूप निमित्त के रहते भी राज पद का प्रयोग नहीं होता । स्वतन्त्र रूप से पालन करना भी इसमें निमित नहीं हो सकता, क्योंकि सम्राट् द्वारा देश विशेष में राजा के रूप में अभिषिक्त व्यक्ति में स्वतन्त्रता के अभाव में भी राजपद का प्रयोग होता है । मृगराज, पक्षिराज आदि पदों में बिना पालकता के भी श्रेष्ठता मात्र के कारण इस पद का प्रयोग देखा जाता है । इसलिये अनुगत और अतिप्रसक जातिनिमित्तक क्षत्रिय अर्थ ही ' राज ' पद का उचित है | क्षत्रियों में प्राय: पालकत्व और पालकत्व प्रयुक्त श्रेष्ठत्व रहता है । कहीं पालक में और कहीं श्रेष्ठ में इसका प्रयोग अनादि तात्पर्यवती निरूढा लक्षणा के द्वारा ही होता है । जैसे सरसों, नारियल, बादाम आदि से बने हुए स्निग्ध तरल द्रव्य में तैल शब्द का प्रयोग | तात्पर्य यह है कि तेल शब्द का वास्तविक अर्थ तो तिलों से से भिन्न सरसों आदि से निकले हुए स्निग्ध तरल पदार्थों में भी जो तैल शब्द का बाली ि ear लक्षणा से ही होता है । म्लेच्छ प्रसिद्धि को यदि आर्य प्रसिद्धि की निकलने वाला स्निग्ध पदार्थ हो है । किन्तु तिलों प्रयोग होता है, वह अनादि काल से चली आने बाधिका माना जाय तो स्लेच्छ धर्म के प्रतिपादक

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३७४ वैवार्थपारिजातः यदुक्तम्- ' सर्गादी सकृदेव समयकरणम्, अत एव न सर्वशब्दानां यादृच्छिकशब्दतुल्यत्वम् । केषाञ्चिदेव शब्दाना-मस्मदादिभिरद्यत्वे सङ्केतकरणात् । स एव यदुच्छाशब्दा उच्यन्ते । तदत्रोच्यते-- यथा सर्गादिकृतस्य सम्बन्धस्यैवाद्य व्याकरणको वाप्तदाक्य वृद्धव्यवहारादिभिव्युत्पत्तिस्तथैवानादिसम्वन्धपक्षेऽप्युपपत्तिः । अनादिसम्वन्यस्यैव सर्गादो ईश्वरे-णोपदेशसम्भवात् । अयमस्य बालक इति व्युत्पत्तिरपि सम्बन्ध पर्यवसायिनी, वाच्यवाचकभावस्य सम्बन्धमन्तरानुपपत्तेः । ईश्वरेण सर्गादौ सम्बन्धः क्रियत इत्यभ्युपगच्छताऽप्यन्ततः सम्बन्धोऽभ्युपेयत एव । तथा च कथं सम्बन्धमन्तरा वाचकत्वो-पपत्तिः? अत्यन्तासतः करणायोगात्सन्नेव शक्त्यात्मकः सम्बन्ध ईश्वरेण क्रियते, उपदिश्यते वेत्याग्रहस्य निस्तत्त्वत्वात् । किञ्च सम्बन्धं कुर्वता परमेश्वरेणापि केनचिच्छब्देनैव सम्वन्धः कर्तव्यः, निराकारस्याभिनयाद्यसम्भवात्पाकारस्य तत्सम्भवेऽप्यनन्तशब्दार्थसम्बन्धानामभिनयादिभिर्व्यञ्जनासम्भवात् । यदि तस्य शब्दस्य सम्बन्वोऽन्येन शब्देन करिष्यते, तदा तस्याप्यन्येन तस्याप्यन्येनेत्यनवस्थानमेव 1 । तस्मादीश्वरेणापि सम्बन्धं कुर्वता वृद्धव्यवहारसिद्धाः केचिदकृत-सम्बन्धा एवं शब्दा अभ्युपगन्तव्याः । ते च सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन स्मर्तव्याः, सर्वज्ञेनानुभवितव्या वा । तथा च सम्बन्वस्यानादित्वमेव सिद्धयति । यत्रोक्तम्-- ' अस्त्रमायुष्मता ज्ञातं विषयस्तु न लक्षितः । अस्मदादिषु दोषोऽयमीश्वरे तु न युज्यते ॥ नानाकर्म फलस्थानमिच्छ्यैवेदृशं जगत् । स्रष्टुं प्रभवतस्तस्य कौशलं को विकल्पयेत् ॥ ' इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, ईश्वरसृष्टेः सर्वथा लोकसिद्धन्यार्याविरुद्धत्वे तत्सिद्धो घटादिकार्यदृष्टान्तोपादानानुपपत्तेः । सावयवत्वेन पृथिव्यादीनां थों के द्वारा आर्य धर्म के वेदादि ग्रन्थों का भी बाध मानना पड़ जायगा, क्योंकि युक्त्याभास ( गलत तर्क ) दोनों जगह एक सा हो ' है | अविच्छिन्न परम्परा को बेदादि की विशिष्टता नहीं बताया जा सकता, क्योंकि शब्द व्यवहार की प्रसिद्धि में भी तो वही विशेषता विद्यमान है | यह जो कहा गया है कि ' सर्ग के आदि में एक बार ही समय का विधान किया जाता है । इसीलिये सभी शब्दों को हम यादृच्छिक राज्यों की कोटि में नहीं रख सकते | आजकल हम कुछ ही शब्दों का संकेत करते हैं, अतः ऐसे शब्द हो यदृच्छा शब्द कहे जाते हैं । ' इसका समाधान इस प्रकार है कि जैसे सृष्टि के आरम्भ में किये गये संबन्ध की ही आज ब्याकरण, कोष, आप्त-art, वृद्ध व्यवहार आदि से व्युत्पत्ति होती है, उसी तरह से संबन्ध को अनादि मानने पर भी उसकी उपपत्ति होगी, क्योंकि ईश्वर सृष्टि के आरंभ में अनादि संबन्ध का ही उपदेश करता है । ' यह इसका बालक है ' इस वाक्य की व्युत्पत्ति का भी पर्यवसान संबन्ध में ही होता है, क्योंकि वाच्यवाचकभाव बिना संबन्ध के नहीं बन सकता । जो यह मानता है कि ईश्वर सृष्टि के प्रारंभ में संबन्ध की रचना करता है, उसको भी अन्ततः संबन्ध मानना ही पड़ता है । इस तरह से संबन्ध के बिना वाचकत्व की उपपत्ति कैसे हो सकती है? अत्यन्त असत् पदार्थ की रचना नहीं हो सकती, अतः पहले से विद्यमान शक्त्यात्मक संबन्ध की हा ईश्वर रचना करता है, अथवा उपदेश करता है, इस बात पर जोर देने से क्या फायदा है? अपि च, संबन्ध को बनाते समय परमेश्वर किसी शब्द की सहायता से ही ऐसा करेगा । ईश्वर को निराकार मानने पर उसमें अभिनय आदि से समझाने की कल्पना नहीं की जा सकती और यदि साकार मानते हैं, तो भी अनन्त शब्दों, वर्थों और संबन्धों की अभिव्यक्ति अभिनय के सहारे कैसे की जा सकती है? यदि एक शब्द का संबन्ध की अन्य शब्द से किया जाय तो दूसरे शब्द का तीसरे से तीसरे का चौथे से इस प्रकार से अनवस्था दोष होगा । इसलिये ईश्वर को भी शब्दार्थ संबन्ध की रचना करते समय वह वृद्ध व्यवहार से सिद्ध कुछ अकृतक संबन्ध वाले शब्दों का सहारा लेना पड़ेगा | इनका सुप्तप्रतिबुद्ध न्याय से स्मरण अथवा ईश्वर में सर्वज्ञता के आधार पर अनुभव मानना पड़ेगा | इस तरह संबन्ध की अनादिता ही सिद्ध होती है । इसका यह उत्तर दिया जाता है कि- ' आपने वस्त्र की तो शिक्षा प्राप्त कर ली, किन्तु उसका प्रयोग कहाँ पर किस तरह किया जाता है, यह नहीं जान पाये | आपका किया गया दोष हम पर लागू हो सकता है, ईश्वर में यहीं । नाना कर्म, नाना फल, नाना स्थान वाले इस जगत् की स्वेच्छा से रचना करने वाला परमेश्वर है, उसकी सामर्थ्य में क्या शंका उठाई जा सकती है । किन्तु

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वैवार्थपारिजातः * कार्यत्वं प्रसाध्य तद्वदेव तेषामपि ज्ञानेच्छाकृतिमज्जन्यत्वेन तद्वानीश्वरोऽनुमीयते नैयायिकः । तेन लोकसिद्धन्यायसिद्धस्ये-वरस्य तद्विरोधित्वे उपजीव्यविरोध एव । अत एव सावयवमेव पृथिव्यादि परमेश्वरेण क्रियते, न तु निरवयवाः परमाण्वाकाशादयः । अन्यथा परमाण्वादिनिर्माणेऽपि तस्य कौशल को विकल्पयेत् । ' सम्यगस्त्रं प्रयुक्तं हि लक्ष्यं विद्धयत्यसंशयम् | कर्तृत्वे कृतिमत्त्वं चेदीश्वरस्याप्यपेक्षितम् ॥ यदा चेश्वरसंविद्धो लोकन्यायोऽनपोदितः । तदा शब्दार्थसम्वन्धे कुतः शब्दानपेक्षता ॥ उपपत्तिविहीनं चेदपि सिद्धयेन्महेश्वरान् । तदा निरंशखाण्वादेरुत्पत्तिः स्याद् ध्रुवं ततः । ' इति । यदप्युक्तम् -- ' अङ्गल्यग्रेण निर्दिश्य कञ्चिदर्यः पुरः स्थितम् । व्युत्पादयन्तो दृश्यन्ते बालानस्मद्विधा अपि ॥ ' तस्मादीश्वर विरचितसम्बन्धाधिगमोपायभूतवृद्धव्यवहारलब्धतद्व्युत्पत्तिसापेक्ष: शब्दोऽर्थमवगमयतीति तदप्यकिञ्चि त्करम्, सन्निकृष्टविप्रकृष्टस्थूलसूक्ष्मविविधानन्तपदार्थानामीश्वरं प्रत्यपरोक्षत्वेऽपि व्युत्पादनीयानन्तपुरुषान् प्रति अपरोक्षत्वासम्भवेनाङ्गुल्यग्रेण निर्दिश्य सम्बन्धबोधनासम्भवात् । तस्मान्नैसर्गिक सम्बन्धव्युत्पत्तिसापेक्षस्य शब्दस्यार्थ-atraratha | वस्तुभूतसम्बन्धाभावे समयवलेनार्थबोधकत्व हस्तसंज्ञाद्यविशेषत्वापत्तेः । ' शब्दार्थानामनन्तत्वात्संकेतस्थ परिच्छितेः । शब्दाच्चाकृतसंकेतात्संकेतो नोपपद्यते || संकेतापेक्षशब्दाच्च बोधनेऽप्यनवस्थितिः । अङ्गुल्यग्रेण निर्देशो न च संकेतसाधकः । परोक्षखातिगानां चाप्यर्थानामिह सम्भवात् । ' यह उत्तर भी अविचारित रमणीय है, यदि ईश्वर कृत सृष्टि सर्वया लोकसिद्ध न्याय से विरुद्ध होती है, तो उसकी सिद्धि के लिये दि कार्य को दृष्टान्त के रूप में नहीं दिखाया जा सकता । पृथिवी प्रभृति की सावयवता के आधार पर ही कार्यता को सिद्ध करके उनकी भी ज्ञान, इच्छा और कृतिजन्यता को मान कर तैयायिक ईश्वर को सिद्धि करते है । अतः लोकसिद्ध न्याय का यदि ईश्वर में विरोध माना जाय तो यह तो उपजीव्य विरोध ही होगा । इसीलिये ईश्वर सावयव पृथिव्यादि की ही रचना करता है, निरवयव परमाणु, आकाश आदि की नहीं । अन्यथा ईश्वर में परमाणु आदि को निर्माण की कुशलता को भी कौन चुनौती दे सकता है? इसीलिये हमारा कहना है कि --- ' अस्त्र का सही तरीके से अभ्यास करने पर वह अवश्य लक्ष्य का वध करता है | कर्तृत्व के लिये कृतित्व की afe free में अपेक्षा है, तो उस परिस्थिति में ईश्वर की सिद्धि के लिये लौकिक न्याय का ही अनुसरण करना पड़ेगा । फलतः शब्दार्थ के सम्बन्ध के लिये हो वह शब्दानपेक्ष नहीं रह सकता । यदि महेश्वर से हम बिना किसी उपपत्ति के कार्यकारणभाव आदि की परम्परा के बिना ही जगत् की उत्पत्ति मानें तो इस परिस्थिति में निरवयव आकाश, परमाणु आदि की भी उत्पत्ति क्यों न मानी जाय ' । यह भी कहा गया है कि - ' हमारे जैसे लोग भी बच्चों को सामने विद्यमान किसी वस्तु को अंगुली से दिखाकर समझाते हुए देखे जाते हैं, अतः ईश्वर विरचित सम्बन्ध को जानने के लिये सहायक वृद्ध व्यवहार से शब्द की व्युत्पत्ति जानकर उसके अर्थ को शक्ति जान पाता है । यह कथन भी कुछ नहीं हैं, क्योंकि पास के और दूर के, स्थूल और सूक्ष्म विविध प्रकार के अनन्त पदार्थ ईश्वर के लिये भले ही प्रत्यक्ष हों, किन्तु व्युत्पादनीय अनन्त पुरुषों को ये प्रत्यक्ष नहीं हो सकते, अतः इनकी अंगुली के इशारे से ईश्वर नहीं समझा सकता । इसलिये शब्द में सम्बन्ध की व्युत्पत्ति स्वाभाविक ही माननी पड़ेगी । उसी के सहारे शब्द अर्थ का बोध हो सकता है । वस्तुभूत सम्बन्ध को न मानने पर केवल समय के सहारे शब्द की अर्थबोधकता मानने पर हाथ, आँख आदि के sari से इसका कोई अन्तर नहीं रह जायगा । इसी बात को संक्षेप में इस प्रकार कहा गया है - ' शब्द और अर्थों की अनन्तता के कारण सङ्केत की परिच्छित्ति के न हो पाने से शब्द बिना संकेत के ही रह जाते हैं और इस प्रकार के शब्दों से संकेत का बोध नहीं हो सकता । इसके लिये दूसरे सङ्केतसापेक्ष शब्द को बोधकता मानने पर अनवस्था दोष होगा । अंगुली से दिया करके भी संकेत का निर्देश नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहाँ पर अनेक पदार्थ अतीन्द्रिय हैं । जो वस्तु परोक्ष है, उसका अंगुली से निर्देश कैसे हो सकता है ' ।

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३७६ यदप्युक्तम् -- ' वाचको वचनाङ्गेनातद्वान् स्यात्, सन्तोऽपि वर्णा अवाचकाः । तस्मान्न तत्र वाच्यवाचकभाव-सम्बन्धो वर्तते तद्वृती स्वरूपहानिप्रसङ्गात् । ' वर्णा निरर्थकाः सन्तः पदादिपरिकल्पिताः । अवस्तुनि कथं वृत्तिः सम्बन्धस्यास्य वस्तुनः ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२३८ ) इति, तन्त्र, क्रमविशेषेणैकप्रयोक्तृप्रयुक्तानां वर्णानां वाचकत्वे तत्रैव सम्बन्धसत्त्वे दोषाभावात् । तदुक्तम्- ' यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्त तथैवावबोधकाः ॥ तेषान्तु गुणभूतानामर्थप्रत्यायनं प्रति । साहित्यमेककर्त्रादि क्रमश्चापि विवक्षितः ॥ ' एके -'कत्रैकत्वनिमित्ते च क्रमे सति नियामकम् । प्रयुञ्जानस्य यत्पूर्ववृद्धेभ्यः क्रमदर्शनम् ॥ युगपदृष्टसामर्थ्यान्नैिव शक्ताः क्रमे यथा । भावास्तथा क्रमे शक्ता यौगपद्येन शक्नुयुः ॥ अवश्यम्भाविनी नित्यं प्रत्यासत्तिश्च कस्यचित् । न लावता व्यपेतत्वादितरेषामनङ्गता ॥ यथा विसर्जनीयस्य व्यवधाने न शक्तता । तथैव शक्तिरन्येषामानन्तर्ये न विद्यते ॥ न च यत्रैकशोऽशक्ति ( स्तत्र ) सर्वेषामप्य-शक्तता । रथाङ्गानि हि दृश्यन्ते शक्तानि वहनादिषु ॥ ' तस्मात् ' क्रमादिमत्सु वर्णेषु वाचकत्वं व्यवस्थितम् । तेषु सम्बन्धवृत्तौ च न दोषः स्यान्मनागपि ॥ ' नवयुगपदुत्पादरूपस्य क्रमस्यानर्थान्तरत्वेनाभेदकत्वात् तद्रूपस्य क्रमान्तरेऽप्यविशेषात् । न च क्रमोऽयुगप-दुत्पन्नयोरेकस्य धर्मः, एकप्रतीतौ क्रमस्याप्रतीतेः । न चोभयधर्मः, एककालमुभयस्यासत्त्वात् । न चासतो धर्मः सम्भवति । तस्यान्न वर्णातिरिक्तः क्रमः । न च वर्णाः क्रमेणार्थाधिगमनिमित्तं सम्भवन्ति, प्रत्येकमर्थाप्रतिपादकत्वात्, साहित्या-सम्भवात् । नियमक्रमवर्तिनामयोगपद्येन सम्भूयकारित्वानुपपत्तेश्चेति चेन्न प्रत्ययोपाधिकस्य क्रमस्य तत्प्रयुक्तवृद्धव्यव-यह जो कहा गया है कि- ' वाचक वर्ण भी वचन के अङ्ग होने के कारण अवाचक हो जाता है, वर्णों को सत्ता रहते भी वे वाचक नहीं रहते | इसलिये इनमें वाच्य वाचक सम्बन्ध नहीं माना जा सकता । रहने पर उनके स्वरूप की ही हानि हो जायगी । वर्णों की संत्ता मानने पर भी जब वे अपनी अवासकता के कारण निरर्थक हो जाते हैं तो उनको पद - वाक्यादि में परिकल्पित ही मानना पड़ता है । इस तरह से वस्तुभूत सम्बन्ध को वस्तुभूत वर्णों में वृत्ति कैसे मानी जा सकती है ' । इसका उत्तर यह है कि एक विशेष प्रकार के क्रम से प्रयोक्ता द्वारा उच्चारित वर्णों में वाचकता विद्यमान है, अत: वहाँ पर सम्बन्ध की सत्ता में कोई बाधा नहीं रहती ।. जैसा कि कहा गया है – ' जिस अर्थ के प्रतिपादन के लिये जितने और जिस प्रकार के वर्णों की सामर्थ्य ज्ञात है, वे उसी तरह से उन rah rate होते हैं । उन सभी गुणभूत वर्णों का अर्थप्रत्यायन में साहित्य और उच्चारयिता का उचित क्रम भी अपेक्षित माना जाता है । वर्णों की क्रमिक आनुपूर्वी के उच्चारण में उच्चारण के कर्ता की एकता भी आवश्यक मानी जाती है । उस क्रमिक आनुपूर्वी का बोध व्यक्ति को अपने पहले के वृद्धों के व्यवहार से होता है । जिन पदार्थों की एक साथ कार्य करने की सामर्थ्य देखी गई है, वे जैसे क्रमिक रूप से कार्य नहीं कर सकती, उसी तरह से क्रमिक सामर्थ्य वाले पदार्थ भी युगपत् कार्य करने में असमर्थ रहते हैं । किसी न किसी पदार्थ की प्रत्यासत्ति तो सदा ही बनी रहती है. एतावता अप्रत्यासन्न पदार्थ की अनङ्गता नहीं मान ली जाती । जैसे अलग रहने पर विसर्जनीय किसी अर्थ को नहीं बना सकता, उसी तरह से शक्ति भी नियत वर्णों के क्रम में ही रहती है, अन्य में नहीं रहती । इससे यह नहीं मान लिया जाता है कि जहाँ एक में शक्ति नहीं है, वहाँ सब में भी शक्ति नहीं है । रथ के अङ्ग अलग - अलग रहने पर अशक्त रहते हुए भी जब उनको जोड़ दिया जाता है तो वे वाहन के रूप में कार्य करने लगते हैं । अपने शरीर के अङ्गों में भी यही बात है । उनको यदि तोड़कर अलग - अलग कर दिया जाय तो एक - एक में कोई शक्ति नहीं रहेगी । वे ही जब सब क्रमशः जुट जायेंगे तो उनमें सब शक्ति आ जायगी । इसलिये क्रमादि से युक्त वर्णों की बाचकता में किसी प्रकार की बाधा नहीं है और इनमें सम्बन्ध को विद्यमान मानने में दोष का लवलेश भी नहीं दिखाया जा सकता । प्रश्न होता है कि एक साथ उत्पन्न न होना ही तो क्रम कहलाता है, यह कोई दूसरी वस्तु थोड़े ही है जो भेद करा दे । इसलिये एक क्रम दूसरे क्रम से समान ही है । फिर वह free अर्थ का बोध कैसे करायेगा? यह क्रम एक साथ उत्पन्न न होने वाले are में ही रह सकता है, इसलिये एक का धर्म नहीं हो सकता । क्योंकि जब एक की प्रतीति होती है तो उस अवस्था में क्रम की प्रतीति न हो सकेगी । इसको दोनों का धर्म नहीं मान सकते, क्योंकि एक काल में दोनों नहीं रहते । इसको असत् वस्तु का धर्म नहीं

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वेदार्थपारिजातः ३७७ हारस्य चानुभवसिद्धत्वात् । लोके क्रमभाविनामपि समस्तानां कार्यकारिणामनेकशो दर्शनात् । यथा युगपद्भाविनस्त्रयो ग्रावाण एकामुख धारयन्तो दृश्यन्ते, तथा क्रमभाविनोऽपि समस्ता ग्रासा एकां तृप्तिमुत्पादयन्तो दृश्यन्ते । हीयमानेषु कतिपयेष्वपि ग्रासेषु न भवति तादृशी तृप्तिः । एवं गमनक्रियाक्षणानां समस्तानां ग्रामप्राप्तिहेतुत्वं यथा दृष्टं तथैव क्रमभाविनामपि वर्णानामर्थं प्रत्यायकत्वम् । तत्र पूर्वे वर्णा अतीता अप्युपकरिष्यन्ति, चरमवर्णस्तु वर्तमान इतोदृश एव कल्पित क्रियाक्षणसमूहवर्णसमूहोऽर्थप्रत्यायकः । पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनित संस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य प्रत्यायकत्वे बाधाभावात् । पत्वमेव वर्णानामिति चेन्न त एवेति प्रत्यभिज्ञानात् । सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानमिति चेन्न तस्य प्रमाणान्तरेण बाधानुपपत्तेः । किञ्च, प्रत्यभिज्ञानस्य सादृश्यनिबन्धनत्वं बलवद्द्बायकोपनिपाताद्वा क्वचित्शदीप-सरितादिषु व्यभिचारदर्शनाद्वा? नाद्यः, बलवद्द्द्बाधकप्रत्ययाभावात् । न द्वितीयः क्वचिद् व्यभिचारदर्शनेन तदुत्प्रेक्षायां व्यवहारलोपप्रसङ्गात् । तदुक्तम्- ' उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषुः संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥ ' न च प्रत्यभिज्ञानं गत्वादिजातिविषयं न गादिव्यक्तिविषयम् । तासां प्रतिनरं भेदोपलम्भात्, शब्दभेदोपलम्भाच्च वक्तृभेदो s नुमीयत इति वाच्यम्, प्रत्युच्चारणं वर्णव्यक्तीनामेव प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् । अत एव द्विर्गोशब्द उच्चारित इति व्यपदेशो भवति, न द्वौ गोशब्दाविति । न च यद्यपि ' कृतं कान्तस्य तन्वङ्गचा त्रिरपाङ्गविलोकनम् । चतुरालिङ्गनं माना जा सकता । इसलिये वर्ण से अतिरिक्त कोई क्रम नहीं माना जा सकता । स्वयं वर्ण क्रम से अर्थ की अधिगति के निमित्त नहीं हो सकते, क्योंकि वे अलग - अलग रहते हुए व्यक्तिशः अर्थ के प्रतिपादन नहीं होते । उनका साहित्य ( एक साथ होना ) भी नहीं बन सकता और न नियक्रम से उनकी स्थिति के कारण युगपत्संभूय ( परस्पर मिलकर ) कार्य करने की सामर्थ्य ही उनमें विद्यमान है । इसका उत्तर यह है कि ज्ञानरूप उपाधि वाला क्रम और क्रम में होने वाला लोक व्यवहार अनुभव सिद्ध है । लोक में क्रमभावी पदार्थों की भी कार्य करने की पद्धति अनेक प्रकार की देखी जाती है । जैसे एक साथ रहने वाले तीन पत्थर एक बटुली को अपने ऊपर धारण करते हैं, उसी तरह से क्रम से खाये गये समस्त पास भी एक तृप्ति रूप कार्य को पूरा करते हैं । ग्रास कुछ कम हो जाने पर पूरी तृप्ति नहीं होती । इसी तरह से गमन क्रिया का प्रत्येक क्षण जैसे ग्राम प्राप्ति रूप एक फल का कारण होता है, यह सभी का अनुभव है, उसी तरह से क्रमभावी वर्णों को भी अर्थ की प्रतीति की सामर्थ्य मानी जाती है । यहाँ पर पूर्व वर्ण यद्यपि अतीत हो गये हैं, तो भी उनमें पूर्व पदक्रमों की ग्राम प्राप्ति की सहायकता के समान परोक्ष सहायता मानी जायगी, क्योंकि चलते समय जितने कदम चल चुके, वे तो समाप्त हो गये, किन्तु उनके क्रम ही ग्रामप्राप्ति रूप फल को देते हैं । इसी तरह से नष्ट हुए वर्ण भी क्रम के द्वारा अर्थज्ञान रूप फल को दे देते हैं । अन्तिम पदक्रम की प्रापकता के समान अन्तिम वर्ण वर्तमान रूप में इसका प्रत्यक्ष प्रत्यायक होगा । इस तरह से कल्पित क्रिया क्षण का समूह रूप वर्णसमूह अर्थ का प्रत्यायक होगा । पूर्व पूर्व वर्णों के अनुभव से उत्पन्न संस्कार सहित विद्यमान अन्तिम वर्ण को अर्थ का बोधक मानने में कोई बाधा नहीं है । area में वर्णों की उत्पत्ति और नाश भी नहीं माना जा सकता । ये वही वर्ण हैं, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा अनुभवसिद्ध है । इस प्रत्यभिज्ञा में सादृश्य को कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि उस प्रत्यभिज्ञा का किसी अन्य प्रमाण से बाध नहीं होता । प्रत्यभिज्ञा की सादृश्यमूलकता को आप किसी बलवान् बाघक की उपस्थिति के कारण मानते हैं अथवा केश, दीप, सरिता आदि में कहीं व्यभिचार को देखकर? किसी बलवान् बाधक प्रत्यय की उपलब्धि न होने से प्रथम पक्ष नहीं बन पाता । द्वितीय पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि किसी एक जगह व्यभिचार के होने पर सभी जगह दोष की कल्पना कर लेने से तो सारे संसार के व्यवहार का ही लोप हो जायगा । जैसा कि कहा गया है - ' जो व्यक्ति अज्ञानवश दोष की अविद्यमानता में भी उसकी कल्पना कर लेता है, वह व्यक्ति सभी व्यवहारों में अपनी संशयालुता के कारण कहीं का नहीं रहता, नष्ट ही हो जाता है । ' यह कहना भी उचित नहीं है कि ' प्रत्यभिज्ञा - गत्वादि जाति की होती है, ' ग ' आदि वर्णव्यक्तियों की नहीं, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य इनका उच्चारण भिन्न-भिन्न तरीके से करता है । शब्द के उच्चारण को सुनकर ही हम भिन्न - भिन्न व्यक्तियों का अनुमान कर लेते हैं, क्योंकि प्रत्येक उच्चारण में प्रत्यभिज्ञा वर्णव्यक्ति की ही होती है । इसीलिये एक ही ' गो ' शब्द का दो बार उच्चारण किया ऐसा व्यवहार होता है, न कि दो ४८

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३७८ वैवार्थपारिजातः गाढमष्टकृत्वश्च चुम्बनम् ॥ ' इति भेदेऽपि कृत्वसुच्प्रयोगः । ' कविना सदनुप्रासे निबद्धेऽक्षरडम्बरे । गकारा बहवो दृष्टा इति व्यवहरन्ति च ॥ ' शतकृत्वस्तित्तिरीमुपायुङ्क्त देवदत्त इत्यादिषु जात्यभिप्रायेणैवाभ्यास इति वाच्यम्, तत्रापि दशवारं गकारमुच्चारितवानित्येकस्यैव गकारस्योच्चारणेष्वेवावृत्तिप्रतीतेः । एवं वर्णविषये प्रत्यभिज्ञाने निश्चिते संयोगविभागव्यङ्ग्यत्वेन वर्णानामभिव्यञ्जकवैचित्र्यनिमित्तको वर्णविषयो विचित्रः प्रत्ययो न स्वरूप-निमित्त: । अत एव ' गकारव्यक्तयो भिन्ना शाबलेयादिपिण्डवत् । क्व नाम भवता दृष्टा येनासां जातिमिच्छसि ॥ शिशौ पठति वृद्धे वा स्त्रीजने वा शुकेऽपि वा । वक्तृभेदं प्रपद्यन्ते न वर्णव्यक्तिभिन्नताम् ॥ ' तथा देवदत्तः पठति, यज्ञदत्तः पठतीत्युच्चारयितृभेद एव प्रतीयते, न गविशेषं पठतीत्युच्चार्यमाणभेदो भाति, ' एककर्तृप्रयोगेऽपि तस्यैवोच्चारणं पुनः । गङ्गागगनगर्गादो न रूपान्तरदर्शनम् || ' इति । अपि चाभ्युपगतेऽपि गत्वादिसामान्ये तस्य द्रुतादिभेदप्रतिभासे सत्यपि न भिन्नत्वमूकार्यम् । औपाधिक एव तस्मिन् भेदप्रत्ययः समर्थनीयः । सोऽयं गव्यक्तावेव कथं न वर्ण्यते? तस्या एकत्वादेकप्रत्ययः, भेदभ्रमस्तु व्यञ्जकाधीनः । तदुक्तम्- ' तेन यत्प्रार्थ्यते जातेस्तद्वर्णादिव लप्स्यते । व्यक्ति लभ्यं तु नादेभ्य इति गत्वादिधीवृथा || ' इति चेन्न } उदात्तादीनां व्यजकधर्मत्वेन वर्णधर्मत्वायोगात् । ननूदासानुदात्तादिविरुद्धधर्मसंसर्गित्वेन गवाश्वादिवन्नानात्वमेव गकारादीनाम्, व्यञ्जकत्वेनाभिमतानां वायूनामश्रावणत्वेऽपि तद्धर्माणां श्रावणत्वे बाधाभावात् । अत एव गन्धरसशब्दगोचराणां प्राणादीनां पृथिव्याद्यगोचरता यथोपपद्यते, तथैवोदात्तादिगोचरस्य श्रोत्रस्य व्यञ्जकवाय्वगोचरवोपपद्यत एव । यर्थकस्यैव: मुखस्य मणिकृपाण -' गो ' शब्द उच्चारित किये गये, ऐसा प्रश्न उठता है कि ' दबंगो ने अपने प्रिय को तीन बार तिरछी निगाहों से देखा, चार बार गाढ़ आलिंगन किया और आठ बार चुम्बन लिया ' यहाँ पर भेद के रहते भी कृत्वसुच् प्रत्यय का प्रयोग होता है । ' कवि ने अक्षरों के आडम्बर से भरे अनुप्रास की जब रचना की तो उसमें अनेक पकारों का प्रयोग किया, ऐसा व्यवहार देखा है । ' ' देवदत्त ने सौ बार तित्तिरी का उपयोग किया ' इत्यादि स्थलों में जाति के अभिप्राय से ही अभ्यास ( बार - बार प्रयोग ) का विधान देखा जाता है । " इसका उत्तर यह है कि दस बार गकार का उच्चारण किया, इस तरह से एक ही कार की उच्चारण में बार - बार आवृत्ति होती है, ऐसा प्रतीत होता है । इस तरह जब प्रत्यभिज्ञा निश्चय रूप से वर्णविषयक हो होती है, तो उसकी संयोग और विभाग से हुई airat को देखकर अभिव्यंजक के वैचित्र्य के अनुसार वर्णविषयक विचित्र की प्रतीति मानी जा सकती है, इस वैचित्र्य प्रतीति में स्वरूप निमित्त नहीं है । इसीलिये कहा गया है कि 5-- ' जैसे काली, पीली गायें भिन्न - भिन्न देखी जाती हैं, उसी तरह से गकारादि वर्ण व्यक्तियों को आपने कहाँ भित्र देखा है, जिससे कि इनमें आप प्रत्यभिज्ञा को जातिविषयक मान सकें । बच्चा पढ़ता हो या वृद्ध, स्त्रीजन पढ़ता हो या शुक, इसमें वक्ता के भेद को तो प्रतीति होती हैं, किन्तु वर्ण व्यक्तियों के भेद की प्रतीति नहीं होती । ' इसी तरह से देवदत्त पढ़ता है, यज्ञदत्त पढता है, यहाँ पर भी उच्चारमिता के भेद की ही प्रतीति होती है, किन्तु ' ग ' विशेष को पढता है, इस तरह से उच्चामा वर्ण का भेद नहीं प्रतीत होता । ' एक कर्ता के द्वारा किये गये गङ्गा, गगन, गर्ग आदि विभिन्न पदों के उच्चारण में भी एक ही कार का उच्चारण होता है, इनमें उसका भिन्न स्वरूप नहीं देखा जाता । ' गत्वादि सामान्य को यदि मान भी लिया जाय औरत, विलंबित आदि के कारण उसमें भेद प्रतिभास माना भी जाय तो भी इनका भेद नहीं माना जा सकता । यह प्रतीत हो रहा भेद प्रतिभा औपाधिक हो माना जायगा । ग व्यक्ति में ही वह भेद क्यों न माना जाय? ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि ग व्यक्ति की एकता के कारण एक प्रत्यय ( ज्ञान ) हो उचित है । उसमें भेद की भ्रान्त प्रतीति का कारण तो व्यंजक भेद होता है । जैसा कि कहा गया है ' जो बात आप गत्वादि जाति को मानकर सिद्ध करना चाहते हैं, वह वर्ण व्यक्ति से हो प्राप्त हो जायगी । विभिन उच्चारणों में भी एक ही गादि वर्णव्यक्ति का लाभ होता है, अतः गत्वादि जाति बुद्धि व्यर्थ है । ' प्रश्न है कि ' उदात्त, अनुदात्त आदि विरुद्धधर्मं वाले होने से गकारादि व्यक्तियों का गो, अव आदि व्यक्तियों की तरह नानात्व ( भेद ) ही मानना उचित है, इसका उत्तर है कि उदासादि को वर्णों के धर्म न मानकर व्यंजक ध्वनि के धर्म माना जाता है, वायु यद्यपि श्रावण प्रत्यक्ष का विषय नहीं है, किन्तु उनके धर्म उदात्त आदि की प्रत्यक्षता में बाधा नहीं है । इसीलिये जैसे

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वेदार्थ पारिजातः ३७६ दर्पणाद्युपधानवशान्नानादेशपरिमाणसंस्थान भेदविभ्रमः एवमेकस्यापि वर्णस्य व्यञ्जकध्वनिनिबन्धनतो नानाविरुद्ध-धर्मसंसर्गविभ्रमो न स्वाभाविक: । अथवा ध्वनिभेदेन तत्समाधिः । तस्यानुनासिकत्वादिभेदभिन्नस्य गादिव्यक्तिवत् प्रत्यभिज्ञानाभावात् । ध्वनिश्च वर्णात्मकः शब्दः शब्दातिरिक्तो वा श्रावण एव । तदुक्तं भगवत्पूज्यपादैः -- यो दूरादा, कर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति प्रत्यासीदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति स ध्वनिः । तन्निबन्धना एवोदात्तादिभेदाः । अन्यथा प्रत्यभिज्ञायमानानां वर्णानां निर्भेदत्वेन संयोगविभागानामप्रत्यक्षत्वेन तत्कृतविशेषा वर्णेष्वध्वयसातुं न शक्यन्त इति निरालम्बना एवोदासादिप्रत्ययाः स्युः । सर्वथापि प्रत्यभिज्ञाय -मानानां वर्णानामुदात्तादिभेदेनापि न भेदोऽध्यवसातुं शक्यः, अन्यस्य भेदेनाभिद्यमानस्य भेदासम्भवात् । नहि व्यक्तिभेदेन जातिभेदोऽवकल्पते । न च क्रमः खपुष्पवदलीकः, तस्य पदविशेषप्रतिपत्तिहेतुत्वात् । अत एव ' जारा ' ' राजा ' ' पिक ' ' कपि ' इत्यादिषु वर्णानामितरत्र साम्येऽपि यथाक्रमानुरोधिन्यः पिपीलिकाः पङ्क्तिबुद्धावारोहन्ति, एवं क्रमानुरोधिन एव वर्णाः पदबुद्धिमारोहन्ति । यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामथ्र्यस्ति तथैवावबोधकाः ॥ ' क्रमभेद: स्फुटतरं चकास्ति । तथा च नाकमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामविशेषः स्मृतिबुद्धावेकस्यां वर्णानां क्रमप्रयुक्तानाम् । तदप्युक्तम् ' यदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनातिरिक्तत्वस्वरवाक्य-स्वरस्मृतीः ॥ ' यद्यपि नित्यानां विभूनां वर्णानां क्रमो न सम्भवति, तथापि व्यञ्जकध्वनिप्रत्ययाद्युपाधिकः क्रमो नाप-ह्रोतुं शक्यः " तत्तदर्थप्रत्ययहेतुत्वेन क्रमप्रयुक्तपदप्रत्ययस्य बोद्धेरप्यभ्युपगमात् । एकस्यां स्मृती वर्णानां प्रथनपौर्वा गन्ध, रस, शब्द आदि का ज्ञान करानेवाली घ्राणादि इन्द्रियां पृथिवी आदि का ज्ञान नहीं कराती, उसी तरह से उदात्तादि का ज्ञान कराने वाला श्रोत्र उनके व्यंजक वायु का ज्ञान नहीं ही कराता । जैसे एक ही मुख का मणि, तलवार, दर्पण आदि में प्रतिबिम्ब पड़ने पर नाना प्रकार के देश, परिमाण और आकार की मिथ्या प्रतीति होती है, इसी तरह से एक ही वर्ण की व्यजंक स्वनि के कारण नाना प्रकार के विरुद्ध धर्मो के संसर्ग की मिथ्या प्रतीति होती है, वह स्वाभाविक नहीं है । अथवा ध्वनि के भेद को मान करके भी उसका समाधान किया जा सकता है, अर्थात् गकारादि व्यक्तियों भेद की प्रतीति ध्वनिभेदकृत हैं, वस्तुतः व्यक्ति भिन्न नहीं है । क्योंकि अनुनासिक आदि के भेद से भिन्न ध्वनि की गादि व्यक्ति की तरह ' यह वही है ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । ध्वनि st rate शब्द मानें या शब्द से भिन्न मानें हैं वह श्रवणेन्द्रियगोचर हो । जैसा कि भगवत्पाद शंकराचार्य ने कहा है ि उसको कहते हैं, जिसके दूर से सुनाई देने पर वर्षों की स्पष्ट प्रतीति नहीं होने पाती और जैसे - जैसे वह समीप आती जाती है वर्णों में पटुत्व, मृदुत्व आदि धर्मो की भी प्रतीति स्पष्ट होने लगती है । उदात्तादि के भेद इस ध्वनि के कारण ही होते हैं । अन्यथा प्रत्यभिज्ञाय-मान वर्णों में भेद न होने से और संयोग - विभागादि के प्रत्यक्ष न होने से तत्कृत विशेषों का वर्णों में निश्चय न हो पाने से उदात्तादि की प्रतीति निराधार हो जायगी । प्रत्यभिज्ञायमान वर्णों का उदात्तादि के भेद से भी भेद का निश्चय नहीं हो सकता, क्योंकि अन्य के भेद से अभिमान में भेद की प्रतीति कैसे मानी जा सकती है । व्यक्ति के भेद से जाति का भेद नहीं मान लिया जाता । क्रम आकाश कुसुम के समान अलीक नहीं हैं, क्योंकि उससे पद विशेष की प्रतीति होती है । इसीलिये जारा, पिक आदि शब्द से राजा, कपि आदि शब्दों में वर्ण की समानता रहने पर भी जैसे क्रम से चलने वाली चीटियों में ही पंक्ति की बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी तरह से क्रम के अनुरोध से ही वर्णों में विभिन्न पदों की बुद्धि होती है । ' जितने जिस तरह के जो वर्ण जिस अर्थ के प्रतिपादन में समर्थ हैं, वे उसी क्रम से उस अर्थ के बोधक हो सकते हैं, अन्यथा नहीं ' । क्रम के भेद से स्वरूप का भेद स्पष्ट प्रतीत होता है, अतः अक्रम से अथवा विपरीत क्रम से प्रयुक्त वर्णों की एक स्मृति बुद्धि में क्रम प्रयुक्त वर्णों से समानता नहीं मानी जा सकती । जैसा कि कहा गया है-- ' क्रम की न्यूनता - अतिरिक्तता के अनुसार स्वर, वाक्य स्वर आदि की स्मृति को विद्वद्गण वर्ण के भेद के अनुसार भिन्न अर्थ के बोधक के रूप में स्वीकार करते हैं । यद्यपि नित्य और विभु वर्णों में कोई क्रम नहीं हो सकता, तो भी व्यंजक ध्वनि और प्रत्यय आदि के आधार पर औपाधिक क्रम की प्रतीति को

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३८० वेदार्थ पारिजातः पर्यरूपः क्रमः स्फुटतरः । यथा गुणा गुणिभ्यो न भिन्नाः, नाभिन्नाः, न वा भिन्नाभिन्नाः किन्त्वनिर्वाच्याः, एवं क्रमोऽप्यनिर्वाचनो भविष्यति । यथा वा धवखदिर- पलाशादिभ्यो वनस्यानर्थान्तरत्वेऽपि एकप्रत्ययालम्बनतया वादिप्रत्ययालम्वनेभ्यो वैलक्षण्यम्, तथेहापि बोध्यम् । यदुक्तम् - अन्त्यस्य हि वर्णस्य वर्णान्तरसहितस्य वा नार्थप्रतीतिहेतुत्वं सम्भवति । न च ते यदा सन्तस्तदा व्याप्रियन्तेऽर्थप्रतीत प्रत्येकमसमर्थत्वात् नाप्यस्त्यवर्णकालेऽसत्त्वादिति चेन्न, पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहित-स्यान्त्यवर्णस्य प्रत्यायकत्वे बाधकाभावस्योक्तत्वात् । न चेदमनुपपन्नम् इष्टत्वादेव । अत एव नहि प्रवृत्ता पूर्ववर्णो-पलब्धिरन्त्यं वर्णं भेत्तुमर्हति, असत्त्वादित्यप्यपास्तम्; वर्णानां नित्यत्वेनासत्त्वासम्भवात् । वर्णाभिव्यक्तीनामनित्यत्वेऽपि तत्संस्काराणां सत्त्वात् । यदप्युक्तम् रथाङ्गानां विशेषोत्पत्तौ सत्यां साहित्यावस्थायां वहनादौ सामर्थ्यमन्यथा प्रत्येकवत् सामस्त्येऽपि सामर्थ्यं न स्यात्, तदप्यसमीचीनम्, अत्रापि पूर्वपूर्ववर्णानुभवाहितसंस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य पदविशेषभावस्योपपत्तेः । क्रमभाविनामपि गमनादिक्रियाक्षणानां सम्भूयार्थक्रियाकारित्वस्योक्तत्वात् । यदप्युक्तम्-न च परस्परं वर्णानां कार्यकारणभावो येन पूर्वे वर्णाः पारम्पर्येणार्थप्रतीतौ शक्ताः स्युः, नापि पूर्णवर्णजनितसंस्कार-सहितस्यान्त्यस्य वर्णस्यार्थप्रतीतिहेतुत्वात् पूर्ववर्णानां पारम्पर्येण सामर्थ्यम्, वर्णानुभवसंस्कारस्यावर्णेष्वेव स्मृतिहेतुत्वात् । नहि गवाहितसंस्कारोऽावे स्मरणमुपकल्पयति, तदप्यकिञ्चित्करम्, अनुभवविशेषात् । तथाहि -- अर्थप्रत्ययात्पूर्व-अस्वीकार नहीं किया जा सकता । बौद्ध दार्शनिक भी क्रम प्रयुक्त पद प्रोति को उस अर्थ के प्रत्यायक के रूप में मानते हैं । एक स्मृति में वर्णों का ताना - बाना पूर्वापर क्रम से स्पष्ट प्रतीत होता है । जैसे गुण गुणी से भिन्न नहीं है, न अभिन्न ही है और न भिन्नाभिन्न उ earers है, किन्तु अनिर्वाच्य है, उसी तरह से क्रम को भी हम अनिर्वाच्य मान लेंगे । अथवा जैसे धव, खदिर, पलाश आदि से बन के भिन्न न रहने पर भी एक प्रत्यय के आलम्बन चव आदि की प्रतोति से समूहालम्बनात्मक वन प्रतीति को विलक्षण माना जाता है, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । अन्त्य वर्ण की अर्थप्रतीति बोधकता सम्भव नहीं हो सकती । जब उनकी स्थिति रहती यह सामर्थ्य है ही नहीं । अन्तिम वर्ण के समय उनकी सत्ता शङ्का उठती है कि वर्णान्तर सहित है, तब अर्थकता में नियोजित नहीं होते, क्योंकि प्रत्येक वर्ण में के अभाव में नियोजन कैसे सम्भव हो सकता है? किन्तु इस शङ्का का अनुभवों से उत्पन्न संस्कार के साथ अन्तिम वर्ण का सम्पर्क विद्यमान है, समाधान हम पहले ही कर चुके हैं कि पूर्व पूर्व वर्णों के अतः अन्तिम वर्ण अर्थप्रत्ययकता में किसी प्रकार की बाधा नहीं है । ऐसा देखा जाता है, अतः इसमें किसी प्रकार को अनुपपत्ति नहीं मानी जा सकती । इसलिये इस शङ्का का भी समाधान हो जाता है कि ---- पूर्व वर्ण की उपलब्धि चल कर अन्तिम वर्ण तक नहीं पहुँच सकती, क्योंकि तब वह विद्यमान नहीं है । क्योंकि इसमें कारण यह है कि वर्णं नित्य है, अतः उनका कभी अभाव नहीं माना जा सकता । वर्णाभिव्यक्ति के अनित्य रहने पर भी उसके संस्कार तो विद्यमान रहते ही हैं । इस प्रसङ्ग में पहले शङ्का उठाई गयी थी कि --- ' रथ के अवयवों की रथरूपी एक विशेष में सब अङ्ग का साहित्य हो जाने पर ही जैसे उसमें वाहनादि का सामर्थ्य रहता है, प्रत्येक अवयव के अलग - अलग रहने पर या सभी अवयवों के एक साथ एक जगह पड़े रहने पर भी उस विशेष रथरूपी आकार की निष्पत्ति न होने पर यह सामर्थ्य नहीं रहती । इसका समाधान यह है कि यहाँ पर भी पूर्व पूर्व वर्णों के अनुभवों से स्थापित संस्कारों के साथ विद्यमान अन्तिम वर्ण में रथ की तरह पद विशेष की स्थिति मानी जा सकती है । यह पहले ही कहा जा चुका है कि गमन प्रभुति क्रिया क्षणों में क्रममाविता के रहते भी मिलकर के ग्रामादिप्रापकता रूप प्रयोजन की सिद्धि मानी जाती है । यह भी शङ्का उठाई गई थी कि ' वर्णों का परस्पर कार्यकारण भाव नहीं है, जिससे कि पूर्व वर्ण परम्परा से अर्थ की प्रतीति में समर्थ हों । पूर्वं वर्णजनित संस्कार के साथ साथ अन्तिम वर्ण को अर्थ की प्रतीति कारणता मानी गई है, अतः पूर्व वर्णों की परम्परा से भी उसमें सामर्थ्य नहीं मानी जा सकती, क्योंकि वर्णानुभव afta संस्कार raj में ही स्मृति का कारण हो सकता है । गो के लिये स्थापित हुआ संस्कार अश्व की स्मृति नहीं करा सकता ' । यह कथन चित्र है, क्योंकि इसमें स्पष्ट ही अनुभव का विरोध है । क्योंकि अर्थ के ज्ञान के पूर्व इतने वर्ण एक स्मृति में आरूढ