वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 411–420
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 411–420
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वेदार्थपारिजातः ३८१ मेतावन्तो वर्णा एकस्मृतिसमारोहिणो विभान्त्येव । तत्प्रथानन्तरञ्च वृद्धस्यार्थधोरपि स्पष्टमुदेति । एकधहेतुत्वेन चैकपदत्वमपि तेषां स्पष्टमाभाति । यदप्युक्तम् --संकेताभावेऽर्थप्रतीतेरभावात्संकेतश्च सामान्यविषयो न वर्णस्वलक्षणविषय इति कथं वर्णाः क्रमविशेषेण वाचकाः, तदप्यसमीचीनम्, पूर्ववर्णाहितसंस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य बोधकत्वदर्शनेन तत्रैव संकेतनिश्चयात् । क्षणभङ्गवादिनां वर्णस्वलक्षणेषु सङ्कतासम्भवेऽपि वर्णनित्यत्ववादिनामन्येषां च तददोषात् । यदप्युक्तम् -- ' केवलस्य वर्णस्याप्रतिपादकत्वे संस्कारसहितस्यापि वन्न स्यात्, विशेषानुपपत्तेः । तत्कथं कश्चित्साक्षादर्थप्रतिपादने समर्थः कश्चित्पारम्पर्येण ' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, संस्कारराहित्यसाहित्याभ्यां विशेषोपपत्तेः । ' इत्थं क्रमगृहीतानां युगपद्या स्थितिः । ततः साकारणं नः स्यान्नित्यमर्थधियं प्रति ॥ क्रमप्रतिपन्नानां वर्णानां नित्यत्वाद् व्यापित्वाच्च । याऽका-शदेशे युगपदवस्थितिः सैवार्थप्रतीति प्रति निमित्तमित्यदोषः । यदुक्तम् -- प्रतीयमानो हि शब्दार्थ प्रतिपादयति न सन्निधिमात्रेण सर्वपदार्थप्रतिपादनप्रसङ्गात् । न चैककर्तृकाणां यौगपद्यं प्रतिभासते, नापि नित्यत्वं व्यापित्वं च युज्यत इति, तदप्यसारम्, एककर्तृकक्रमोपलक्षितानां नित्यानां विभूनां यौगपद्येन स्थितानां वर्णानां बोधकत्वे बाधाभावात् । सर्व क्रमोपलक्षित्वाभावादेव न सर्वार्थप्रतिपादन-प्रसङ्गः । नित्यत्वं व्यापकत्वं वान्यत्र प्रसाधितम् । एवं वर्णविषयं यद्विज्ञानं तदेवार्थप्रतीतिजनकमित्यपि सम्यक् । तदुक्तम्- ' यद्वा प्रत्यक्षतः पूर्वं क्रमाज्ञानेषु यत्परम् । समस्तवर्णविज्ञानं तदर्थज्ञानकारणम् । तत्र ज्ञाने च वर्णानां यौगपद्यं प्रतीयते । नावश्यं यौगपद्येन प्रत्यक्षस्थेन तद्भवेत् ॥ ' इति । यदप्युक्तम्- ' क्रमो हि प्रयोक्तृप्रयुक्तो न यौगपद्यम्, प्रयोक्तृ-होते देखे गये हैं । इनकी स्पष्ट प्रतीति हो जाने पर वृद्ध को भी अर्थ का ज्ञान स्पष्ट रूप से उत्पन्न होता है और इस एक पदार्थ बुद्धि को पैदा करने के कारण ही उसमें एकपदता की प्रतीति भी स्पष्ट होती है । यह शंका भी समीचीन नहीं है कि - ' संकेत के अभाव में अर्थ की प्रतीति नहीं होती । यह संकेत सामान्यविषयक होता है, वर्ण स्वलक्षणविषयक नहीं, तब वर्ण क्रमविशेष के आधार पर वाचक कैसे माने जा सकते हैं क्योंकि, पूर्व वर्ण से आहिल संस्कारों के साथ विद्यमान अन्तिम वर्ण में बोधकता देखी जाती है, अतः उसी में संकेत का निश्चय माना जाता है । वर्णों के स्वलक्षण मैं संकेत क्षणभंगवादी बौद्धों के मत में भले ही संभव न हो, किन्तु वर्णों को नित्य मानने वाले तथा अन्य दार्शनिकों के मत में यह दोष नहीं हो सकता है । यह कथन भी व्यर्थ ही है कि ' केवल वर्ण यदि अर्थ का प्रतिपादक नहीं है तो संस्कारों के साथ भी बह इसमें समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें कोई नई विशेषता नहीं आ जाती है । ऐसी अवस्था में कोई साक्षात् और कोई परस्परा से अर्थ का प्रतिपादक कैसे माना जा सकता है, क्योंकि इसमें संस्कार राहित्य और संस्कार साहित्य इन्हीं के आधार पर परस्पर विशेषता मानी जायगी! ' इस तरह से क्रम से गृहीत वर्णों की जो युगपत् अवस्थिति है, वही हमारे मत से नित्य अर्थबुद्धि के प्रति कारण होती है । ' अर्थात् वर्णों की नित्यता और व्यापिता के आधार पर आकाश देश में युगपत् अवस्थिति के रहते भी जो उनकी क्रम से प्रतीति होती है, वहीं अर्थ की प्रतीति में कारण है, इस प्रकार से इस मत में कोई दोष अवशिष्ट नहीं रह जाता । यह भी कहा गया है कि ' जो स्वयं प्रतीयमान है, वही शब्दार्थ का प्रतिपादन करता है, केवल संनिधिमात्र से ऐसा माना जाय तो सभी पदार्थों के प्रतिपादन का प्रसंग उपस्थित हो जायगा । एककर्तृक कार्यों का न तो यौगपद्य ही होता है और न art free तथा व्यापी ही कहा जा सकता है । ' यह उक्ति भी सारहीन है, क्योंकि एककर्तृक क्रम से उपलक्षित नित्य और विभु ( व्यापक ) तथा एक साथ क्रमशः विद्यमान वर्णों को अर्थ का वो मानने में कोई बाधा नहीं है । सर्वार्थ प्रतिपादन का प्रसंग इसलिये नहीं होगा कि वे सब प्रकार के क्रमों से उपलक्षित नहीं हैं । इनका नित्यत्व और विभुत्व अन्यत्र सिद्ध किया जा चुका है । इसी तरह से यह कथन भी ठीक ही हैं कि ' वर्ण विषयक विज्ञान ही शब्दार्थ ज्ञान के कारण है । जैसा कि कहा गया है-- ' अथवा प्रत्यक्ष से पहले क्रम का ज्ञान न होने पर भो बाद में जो समस्त वर्णविषयक विज्ञान होता है, वही अर्थज्ञान में कारण होता है । उस ज्ञान में वर्ण का यौगपद्य प्रतीत होता है । यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्यक्ष में योगपद्य की विद्यमानता रहने पर ही वह होता हो । ' यह
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३८२ वेदार्थपारिजातः प्रयुक्तावस्थेभ्यश्च वर्णेभ्योऽयं प्रतीतिर्न यौगपद्यादर्थप्रतीतिः स्यात्, सक्रमाणां च वर्णानां यौगपद्येन ग्रहणे भ्रान्तत्व-प्रसङ्गात् । न च तेषां योगपद्यमस्ति नित्यत्वायोगात् ' इति, तत्तुच्छम्, वर्णव्यक्तिक्रमोपलक्षितानां वर्णानां यौगपद्येोपपत्तेः, प्रत्यभिज्ञादिभिर्वर्णनित्यत्वसिद्धेश्च । प्रतिपदन्त्यो वर्णो यया बुद्ध्या गृह्यते सा सन्निहितासन्निहितवर्णविषयत्वेन स्मरणप्रत्यक्षरूपाभ्यामुभय-रूपेति चित्रवर्णां तां केचित्प्राहुः | ' चित्ररूपां च तां बुद्धि सदसद्वर्णगोचराम् । केचिदाहुर्यथा वर्णो गृह्यतेऽन्त्यः पदे पदे ॥ ' ( स्फो ० ११ ) । यदत्रोक्तम् - एकस्य ज्ञानस्य प्रत्यक्षाप्रत्यक्षरूपविरोधादिति, तन्न युक्तम्, न च प्रत्यक्षमेकं सदसद्वर्णविषयम्, अभावविषयत्वविरोधात् । नापि स्मृतिरूपम्, सन्निहितविषयत्वेनानिष्टत्वात् । अत एव पदादिग्राहकज्ञानं कल्पितविषयं स्यादिति, तदपि तुच्छम्, सोऽयं देवदत्त इति प्रत्यभिज्ञाज्ञानवत्पदज्ञानस्यापि सन्निहिता सन्निहित विषयकत्वे बाधाभावात् । अन्यत्तु अनभ्युपगमपराहतम् । एवम् - ' अन्त्यवर्णे हि विज्ञाने सर्वसंस्कारकारितम् । स्मरणं योगपद्येन सर्वेष्वन्ये प्रचक्षते ॥ ' कथं क्रमेणानुभूतानां युगपत्स्मरणमिति चेत्, आह- ' सर्वेषु चैवमर्थेषु मानसं सर्ववादिनाम् । इष्टं समुच्चयज्ञानं ऋज्ञानेषु सत्स्वपि ॥ तेन श्रोत्रमनोभ्यां च क्रमाद्वर्णेषु यद्यपि । पूर्वज्ञानं परस्तात्तु युगपत्स्मरणं भवेत् || ' ( स्फो ० १ ९ ३७ ) । ' तथा रूढास्ततो वर्णा न दूरेऽर्थावबोधनात् । शब्दादर्थमतिस्तेन लौकिकैरभिधीयते ॥ ' इत्यपि सम्यगेव । यदप्युक्तम् -- एककर्तृप्रयुक्तानामेवार्थप्रतिपादकत्वेनायुगपद्वर्तिना मेवार्थप्रतिपादकत्वम्, न च स्मरणविषयाणां वर्णान्तरयोगपद्य मध्यवसीयते, नियतक्रमाणामेव स्मर्यमाणत्वात् । नापि प्रत्यक्षवत्स्मृत्या वर्णस्वलक्षणग्रहणम्, स्पष्टप्रति-भी कहा जाता है कि ' क्रम तो प्रयोक्ता के द्वारा प्रयुक्त होता है, किन्तु यौगपद्य नहीं । प्रयोक्ता के द्वारा प्रयुक्त अवस्था वाले व सेही अर्थ की प्रतीति होती है, वर्णों के यौगपद्य से नहीं । क्रम सहित वर्णों का योगपथ ( एक साथ ) ग्रहण भ्रान्त ही माना जायगा | sant true हो भी नहीं सकता, क्योंकि वे नित्य नहीं है ', किन्तु यह कथन भी निर्बल है, क्योंकि वर्ण व्यक्ति के क्रम से उपलक्षित वर्णों का यौगपद्य माना हो जा सकता है और प्रत्यभिज्ञा प्रभूति से उनकी नित्यता में भी कोई बाधा नहीं है । प्रत्येक पद का अन्तिम वर्णं जिस बुद्धि से गृहीत होता है, वह संनिहित वोर असंनिहित वर्णविषयक होने से स्मृति और प्रत्यक्ष दोनों रूपों वाली है, अतः ऐसी बुद्धि को कुछ दार्शनिक चित्र वर्ण वाली कहते हैं, जैसा कि इस कारिका में प्रतिपादित है - ' उस सदसत् वर्णविषयिणी बुद्धि को कुछ आचार्य चित्ररूपा बताते हैं, क्योंकि यहाँ पर प्रत्येक पद में अन्तिम वर्ण ही प्रत्यक्षत: गृहीत होता है । यहाँ पर भी शंका उठाई गई थी कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परस्पर विरोधी हैं, अत: इनकी एक ज्ञान में स्थिति नहीं रह सकती । एक ही प्रत्यक्ष सत् और असत् दोनों तरह के वर्णों को अपना विषय नहीं बना सकेगा, क्योंकि भाव और अभाव दोनों का परस्पर विरोष है । यह स्मृति रूप भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि संनिहितविषयक ज्ञान को स्मृति मानने पर अनिष्ट होगा | अतः पदादि का ग्राहक ज्ञान कल्पित विषय का हो मानना पड़ेगा । " इसका समाधान यह है- ' यह वह देवदत्त है ' इस प्रत्यभिज्ञा ज्ञान का विषय जैसे संनिहित और असंनिहित दोनों के मेल से बनता है, उसी तरह से पद ज्ञान के विषय में भी उसके संनिहित और असंनिहित रहने पर क्या आपत्ति उठ सकती हैं? इससे भिन्न स्वरूप को हम मानते नहीं । इसी तरह से ' अन्त्य वर्णविषयक विज्ञान में सभी वर्णों के संस्कारों के आधार पर सभी में योगपद्येन स्मरण की बात कुछ दार्शनिक मानते है । ' क्रम से अनुभूत का योगपद्येन ( एक साथ ) स्मरण कैसे होता है? इसके उत्तर में वे कहते हैं कि- ' इस तरह के अर्थो में सभी वादियों के मत के अनुसार मानसिक समुच्चय ( सामूहिक ) ज्ञान इष्ट है, यद्यपि वहाँ पर क्रम ज्ञान की भी स्थिति रहती है | अतः श्रोत्रेन्द्रिय और मन के द्वारा पहले यद्यपि अनुभूति क्रम से होती है, किन्तु बाद में उसका समूहालम्बनात्मक स्मरण माना जाता है ', ' फिर वर्ण स्मृति में आरूढ़ हो जाते हैं । इसलिये वे अर्थज्ञान से दूर नहीं रहते । शब्द से अर्थ के ज्ञान की यही प्रक्रिया लोगों को अभीष्ट है ' यह कथन भी सही ही है । यहाँ पर शंका उठाई जाती है कि ' एक कर्ता के द्वारा प्रयुक्त वर्णों की ही अर्थप्रतिपादकता मानी जाती है, अतः अयुगपत् विद्यमान वर्णों की ही अर्थप्रतिपादकता जानी जायगी । स्मरणविषयक वर्णों में यौगपद्य का निश्चय नहीं हो सकता, क्योंकि
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वैदार्थपारिजातः ३८३ भासाभावात्, एकस्य स्पष्टास्पष्टानेकाकारायोगाच्च । तस्मात् केवलस्मरणे नापष्टस्वभावानां वर्णानां स्वाकारख्यागां बाह्यवर्णाभेदेनाध्यवसायाद् बाह्यवर्णानां वाचकत्वमुच्यते । अवाह्येषु वर्णेषु वाह्यवर्णाध्यवसायेन पदादि परिकल्पितमित्य-स्माभिबोरियत इति, तदप्यवचारितरमणीयम्, गमनक्रियाक्षणानामिव ग्रामप्राप्तौ ग्रासानामिव तृप्ती वर्णानामर्थ-बोधजनकत्वे बाधाभावस्योक्तत्वात् । मोपलब्धेष्वपि वर्णेषु मानसमनुव्यवसायरूपमखिलवर्णविषयं सङ्कलनाज्ञानं जायत इत्यप्युक्तमेव । दृश्यते च विनश्वरेष्वपि क्रमानुभूतेषु युगपदनुव्यवसायो मानसः । शतमाम्राणि भक्षितवानहम् । न चायं प्रत्ययो नास्ति, सन्दिग्धो वा, बाध्यते वा । अनभ्युपगम्यमाने चदृशे समुच्चयज्ञाने तन्निबन्धना भूयो व्यवहारा उत्सीदेयुः । स चायं संकलनाप्रत्ययः स्मर्यमाणानुभूयमानप्राक्तनान्त्यवर्णविषयतया सदसद्वर्णगोचरश्चित्ररूपोऽभ्युपेयते । अथवाऽन्त्यवर्णेऽपि तिरोहिते भवन्नसदगोचर एव वा सोऽप्यर्थप्रतीतिहेतुरेक एव । ननु सङ्कलनाप्रत्ययेऽपि ते वर्णा यदि क्रमेणावभासन्ते तदासावपि पूर्वोत्पन्ने बुद्धिनिर्विशेष एव स्यादिति तदुपारूढा अपि वर्णा नार्थप्रतीतिहेतवो भवेयुः, यदि त्वेकसुमनस्तवकाकारावभासी स प्रत्ययः, तदा तस्मिन् मागमाद्विपरीतकमा अपि वर्णा अर्थप्रतीतिकारिणो भवेयुरिति चेदत्रोच्यते, विशिष्टानुपूर्वीकवर्णसमूहानुभव-समनन्तरभावी सङ्कलनाप्रत्ययोऽयं प्रतीतिहेतुनं स्तबकाकारपरिच्छेदो न वा विपरीतक्रमाशङ्कनम्, यदनन्तरजन्मायं समुच्चयप्रत्ययः । ताश्च तद्विशिष्टकमावभासिन्य एवं पूर्वभाविन्यो वर्णबुद्धय इति कुतो वैपरीत्यविकल्पः । तस्मात्प्रथमावगमनियतानुपूर्वीकास्ते तदनन्तरभाविसमस्ताव भासिसङ्कलनाप्रत्ययोपारूढा वर्णा अर्थप्रतीतिकारिण इति fara म से ही उनका स्मरण होता है । प्रत्यक्ष के समान स्मृति से वर्णों के स्वलक्षण का ग्रहण भी नहीं होता, क्योंकि स्मृति में स्पष्ट प्रतिभास नहीं रहता । ' एक ही में स्पष्ट, अस्पष्ट आदि अनेक आकार नहीं माने जा सकते । इसीलिये केवल स्मरण के सहारे अस्पष्ट स्वभाव वाले वर्णों का स्वाकाररूप बाह्य वर्णों से अभेद प्रतीत होता है, अतः बाह्य वर्णों की ही वाचकता हम मानते हैं । अाह्य वर्णों में बाह्य वर्णों का अव्यवसाय होने से ही पदादि की परिकल्पना होती है, यही हमारी बौद्ध दार्शनिकों की मान्यता है । ' किन्तु यह बात अविचारित रमणीय है, क्योकि गमन क्रिया के सभी क्षण ग्राम प्राप्ति रूप फल में सहायक हैं, भोजन का प्रत्येक ग्रास तृप्ति में कारण है, उसी तरह से प्रत्येक वर्ण की मा अर्थबोधकता में कोई बाधा नहीं है, यह बात कही जा चुकी है । क्रम से उपलब्ध हुए वर्णों में भी मानस अनुव्यवसाय रूप अखिल वर्णविषयक संकलनात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है, यह भी कहा जा चुका है । क्रमानुभूत विनश्वर पदार्थों में भी एक साथ मानस अनुव्यवसाय देखा जाता है कि क्रमशः एक - एक करके सो आम खाने वाला भी कहता है कि मैंने एक साथ सो आम खा लिये । लोगों को यह भी कहते देखा हो गया है कि मैंने एक साथ सो लड्डू खा लिये | ऐसा अनुभव न होता हो, ऐसी बात नहीं है । न उसको संदिग्ध ही कहा जा सकता है और न उसका बाघ ही होता है | इस तरह के समुच्चय ज्ञान को न मानने पर इनके आधार पर होने वाले अनेकों व्यवहार समाप्त हो जायेंगे । यह संकलनात्मक ज्ञान क्रमशः स्मर्यमाण और अनुभूयमान प्राक्तन और अन्त्य वर्णविषयक है । इस तरह से विद्यमान और अविद्यमान विषयक होने से चित्ररूप कहलाता हैं । अथवा अन्त्य वर्ण के भी तिरोहित हो जाने पर केवल असद् विषयक होते ए भी वह अकेला ही अर्थप्रतीति का कारण होता है । प्रश्न है कि संकलनात्मक ( सामूहिक ) ज्ञान में भी वर्ण यदि क्रम से भासित होते हैं तो वह संकलनात्मक ज्ञान भी पूर्वो एक - एक वर्ण की बुद्धि से पृथक् प्रकार का न होकर उसके समान ही होगा । इस प्रकार उस संकलनात्मक ज्ञान में सभी वर्णों का समावेश हो जाने पर भी वे अर्थप्रतीति के कारण नहीं होंगे । यदि इनका एक पुष्प के गुच्छे के समान एकाकार अवभास माना जाता है तो उसमें क्रम को अवगति न होने से उनका विपरीत क्रम से उच्चारण होने पर अर्थप्रीति की कारणता की आपत्ति उठेगी? इस प्रश्न का समाधान यह है कि विशिष्ट आनुपूर्वी वाले वर्ण समूह के अनुभव के बाद होने वाला संकलनात्मक ज्ञान अर्थ प्रतीति का कारण माना जाता है, अतः यहाँ पर न तो स्तबकाकार ( पुष्पों का गुच्छा ) प्रत्यय हो होता है और न विपरीत क्रम आशंकाही उठ सकती है । यह समुच्चय प्रत्यय जिनके बाद पैदा होता है, वे वर्ण बुद्धियाँ पहले पैदा होते समय एक विशिष्ट क्रम का अवभास कराती है, ऐसी अवस्था में उनके विपरीत क्रम की कल्पना का अवसर ही कहां है । इसलिये जिन वर्णों की पहले से नियत
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३८४ aare पारिजात: न दोषः । यदप्युक्तम् -- ' संस्कारस्य नार्थप्रतीतिजनकत्वम्, दृष्टपूर्वस्मृतावेव तस्य व्यापारः, तदप्यकिञ्चित्करम्: अप्रयोजनकत्वात् । संस्कारेण स्मृतिरेव कर्तव्येति नहि राजाज्ञाऽस्ति । ननु पट्वम्यासादरप्रत्ययगृहीतेष्वर्थेषु यदात्मनः स्मरणकारणं संस्कारः, सा च स्मृत्यैव कार्येण कल्प्यमाना शक्तिः । न च शक्तिरूपस्य संस्कारस्य शक्त्यन्तरमर्थ-प्रतीतिजन्मनि सम्भवति, येनैव कार्येण स कल्प्यते शक्तिस्तदपहाय कि कार्यान्तरं कुर्यात्? स्मरणहेतव संस्कारस्य प्रसवकारणमनुभवः । अनुभवहेतोश्चास्य नूतनचरितस्य संस्कारस्य जन्मनिमित्तमेव नोत्पश्यामः । तस्मान्नासावर्थ-प्रतीतिहेतुर्भवतीति चेन्न वर्णानुभव संस्कृतमतेरर्थप्रतीतिदर्शनात् । नहि स्मरणशक्ति: संस्कारः किन्त्वन्तःकरणगुणो वासनाख्यः । स च स्मृतिमिव अर्थप्रतीतिमपि जनयितुं शक्नोत्येव । सर्वत्र दर्शनमेव प्रमाणं स्मरणजननदर्शनेन यथा तज्ज-ar कौशलं कल्प्यते, तथैवानुभवजननदर्शनेन तदपि कल्प्यताम् । दृश्यन्ते च वर्णाश्च तदनुभवाश्च व्यतीताः । अन्यत्स्फो-टादिकं शब्दतत्त्वं नानुभूयते, अस्ति चार्थप्रतीतिर्नासो निष्करणिका, करणव्यतिरेकेणानुद्भवन्ती करणमाक्षिपति । यदस्याः करणं संस्कार इति स्मृतिरिवार्थप्रतीतिरपि तत्कार्यत्वात्तदनुमापिका भवत्येव । कुतः स उदेतीत्यचोद्यमेतत् । अनुभवकारणस्य तस्य प्रसिद्धत्वात् । अथवा संस्कारेण स्मृतिरेव भवतु, संस्कारात्पूर्ववर्णेषु स्मरणमन्त्यवर्णे च श्रन्द्रियानुभव इति स्मर्यमाणानुभूयमानवणं करणकोऽर्थप्रत्ययः । नम्वनुभवक्रमा हितसंस्कारसामर्थ्येन स्मृतयोऽपि क्रमभाविन्यो भवेयुरिति चेन्न, नानावर्ण विषयः क्रमभाविभि-रनुभवैः क्रमोपचयात्मा पुटपाकैरिव कार्तस्वरस्यैक एवात्मनः संस्कारस्तादृगुपधीयते, येन सर्वानेव वर्णानसौ सकृत् आनुपूर्वी जानी गई, वे ही उसके बाद सामूहिक रूप से भासित होने वाले ज्ञान में आरूढ़ होकर अर्थ का ज्ञान कराते हैं, इसलिये कोई दोष नहीं दिया जा सकता । कहा गया है कि- ' संस्कार की अर्थप्रतीतिजनकता नहीं मानी जा सकती, उसका व्यापार केवल पहले देखे गये पदार्थ की स्मृति तक ही सीमित है । ' किन्तु यह कथन किसी बात को सिद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि संस्कार से केवल स्मृति ही होगी, ऐसी कोई राजाज्ञा नहीं है । इस पर शंका उठाई जाती है कि ' आदरपूर्वक, मनोयोग पूर्वक भलीभांति किये गये अभ्यास से उत्पन्न प्रत्यय के द्वारा गृहीत अर्थों में जो उनके स्मरण का कारण होता है, उसको संस्कार कहते हैं । यह एक प्रकार की स्मृति रूप कार्य से ही कल्पित की गई शक्ति है । स्वयं शक्ति रूप संस्कार में अर्थप्रतोति की जनक दूसरी शक्ति नहीं मानी जा सकती । जिस कार्य से उस संस्कार रूप शक्ति को कल्पना की जाती है, उसको छोड़कर वह दूसरे कार्य को कैसे करेगी? इस स्मरण के कारण संस्कार को पैदा करने वाला अनुभव है । इस अनुभव के कारण आपके कहे अनोखे स्वभाव वाले संस्कार का जन्म कैसे होता है, यह हम नहीं जान पाते | इसलिये यह अर्थप्रतीति में कारण नहीं हो सकता । ' इसका समाधान इस तरह से हैं कि वर्णों के अनुभव से जिसकी बुद्धि संस्कृत हो गई है, उसी को अर्थ का ज्ञान होते देखा गया है । स्मरण शक्ति को संस्कार नहीं कहा जाता, किन्तु अन्तःकरण के वासना नामक गुण को संस्कार कहते हैं । यह स्मृति की तरह अर्थप्रतीति को भी पैदा कर ही सकता है । सर्वत्र प्रत्यक्ष दर्शन को ही प्रमाण माना जाता है । उसमें स्मरण की जनकता देखकर जैसे स्मरण को पैदा करने का कौशल माना जाता है, उसी तरह से अनुभव को arear को देखकर उसमें अनुभव के जनन का कौशल भी आप मानिये । यह देखा जाता है कि वर्ण और उनके अनुभव व्यतीत हो जाते हैं और कोई नया स्फोट जैसा शब्दतत्व अनुभूत नहीं होता । इतने पर भी अर्थ की प्रतीति तो होती है, वह बिना कारण के नहीं हो सकती | जब बिना कारण के नहीं हो सकती तो वह कारण का आक्षेप करती है और यह कारण संस्कार ही हो सकता है । इस तरह से स्मृति के समान अर्थप्रतीति भी उस संस्कार का ही कार्य है, अतः उसके अनुमान में यह भी सहायक है । यह संस्कार कहाँ से उत्पन्न होता है, यह पूछना व्यर्थ है । क्योंकि अनुभव के कार्य के रूप में वह प्रसिद्ध ही है । अथवा संस्कार से भले ही केवल स्मृति की ही उत्पत्ति मानी जाय, तो भी संस्कार से पूर्व वर्णों में स्मरण और अन्तिम वर्ण का श्रोत्रेन्द्रिय से अनुभव, इस तरह से स्वर्यमाण और अनुभूयमान वर्णों के सहारे अर्थ की प्रतीति होती है । इस पर शङ्का उठाई जाती है कि इस तरह से तो अनुभव के क्रम से स्थापित संस्कार के से होनी चाहिये । उत्तर है कि जैसे पुटपाक से सुवर्ण का गुणोपचय रूप संस्कार होता है, उसी तरह से सहारे स्मृति भी उसी क्रम नाना वर्णविषयक क्रमशः
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वेदार्थपारिजातः ३८५ स्मरतीत्यभ्युपगमेन दोषाभावात् । यदुक्तम्- ' संस्कारात्संस्कारान्तरोत्पत्तिरसिद्धेति चेन्न, स्वाध्यायाध्ययने सिद्धत्वात् । उच्चारणक्रियायाः क्षणिकत्वात् तदाहिते संस्कारान्तरकारिणि संस्कारेऽनिष्यमाणेऽन्त्यमुच्चारणं प्रथमोच्चारणान विशिष्येत, ततः पुरुषायुषेणापि नानुवाक एक आमुखीक्रियेत । यदयुक्तम् -'न वर्णव्यतिरेकेण पदमन्यद्धि विद्यते । वाक्यं वर्णपदाभ्यां च व्यतिरिक्तं न विद्यते । ' तदप्यपास्तम्, पूर्वोक्तयुक्त्या वर्णसमूहात्मकस्य पदस्य पदसमूहात्मकस्य वाक्यस्य च सिद्धेः । यदपि वैयाकरणमत निराकरण प्रसङ्गेनोक्तम्- पदादिकं न किञ्चित् व्यतिरेकाव्यतिरेकयो विरोधात् । व्यतिरेके भेदेनोपलम्भः स्याद् दृश्यस्यादृश्यत्वेऽप्यवाचकत्वमगृहीतस्य वाचकत्वायोगात् । अव्यतिरेके वर्णवदेवावाचकत्व-। तस्मादिन्द्रियविज्ञानविशेषानुबन्धिसभागवासनोपादानविकल्पप्रतिभासविभ्रमं पदमेकावभासि मिथ्यैव, प्रसङ्गः एकानेकत्वयोरयोगात् । अनेकया बुद्धया क्रमेण ग्रहणायोगात् । न तदेकया, ग्राह्यवर्णानुक्रमेण ग्रहणात् । वर्णक्रमानुभव-पृष्ठभावि मनोविज्ञानं तान् वर्णान् पदादिरूपतर्यकस्वभावानध्यवस्यति, तस्मात् पदादिपरिकल्पितं मिथ्यैव । ननु भिन्नानामेव वर्णानामनुभवात् कथमेकपदाद्यवभासो विकल्प उत्पद्येत उत्पद्यते च । तस्माद्वर्णेष्वेकपदाद्यनुभवेन भाव्यमिति चेन्न, अन्यथाप्युपपत्तेः । तथाहि - प्रतिपादको हि सङ्कतकाले वर्णक्रममेकपदादिरूपतया प्रतिपन्नमेव परं प्रत्येकमिदं पदादीति सङ्कतयति । तदा च परस्यापि तत्र वर्णक्रमे एकपदाध्यारोपिका बुद्धिरुत्पद्यते । तस्य चैकपदाद्यारोपितका-होने वाले अनुभवों से भी आत्मा में क्रमोपचयरूप ऐसा संस्कार स्थापित होता है, जिससे कि वह सभी वर्णों को एक साथ स्मरण कराता है । ऐसा मानने से उक्त दोष का परिहार हो जाता है । हम ऐसा नहीं कह सकते कि एक संस्कार से दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि वेदाध्ययन में यह सिद्ध है । उच्चारण क्रिया क्षणिक होती है, अत: प्रत्येक उच्चारण क्रिया से स्थापित संस्कार में यदि संस्कारान्तर की उत्पत्ति न मानें तो यहाँ पर अन्तिम उच्चारण और प्रथम उच्चारण में कोई अन्तर नहीं रह जायगा और इस तरह से तो पुरुष की पूरी आयु बीत जाने पर भी वेद का एक अनुवाक भी कण्ठस्थ न हो सकेगा । उक्त प्रतिपादन से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि ' वर्ण के अतिरिक्त पद की कोई स्थिति नहीं है और arre भी वर्ण और पद के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त उक्तियों के आधार पर वर्णसमूहात्मक पद और पदसमूहात्मक वाक्य की सिद्धि हो जाती है । वैयाकरणों के मत के खण्डन के अवसर पर कहा गया है कि पदादि कुछ नहीं है, क्योंकि इनको वर्णों से भिन्न tear अभिन भी उपलब्धि मानने पर विशेष उपस्थित हो जाता है । यदि ये वर्णों से भिन्न हैं तो उनकी अलग से प्रतीति होना चाहिये । दृश्य होते हुए भी इस प्रतोति को अदृश्य मानने पर उसमें वाचकता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि दृश्य का ज्ञान नहीं होगा और बिना ज्ञान के उसे वाचक कैसे माना जा सकता है? यदि इनको वर्ष से अभिन्न मानते हैं तो वर्ण के समान ही ये भी अवाचक माने जायेंगे | इसलिये ऐन्द्रियक ( इन्द्रिय सम्बन्धी ) विज्ञान विशेष से सम्बद्ध सभाग बासनोपादानक विकल्प से प्रतिभासित हो रहे face पद की एकरूपता का बोध मिथ्या है, क्योंकि पद के साथ एकत्व और अनेकत्व दोनों का ही योग नहीं बन सकता । अनेक बुद्धि मानने पर उनसे क्रम से ग्रहण नहीं हो सकता । ग्राह्य वर्णों का क्रम से ग्रहण होता है, अतः यह एक बुद्धि का भी विषय नहीं हो सकता । वर्णों के क्रम का अनुभव होने पर पैदा होने वाला मनोविज्ञान उन वर्णों को पदादि के रूप में एकस्वभावतया परिकल्पित करता है, अतः ये परिकल्पित पदवाक्यादि मिथ्या ही माने जायेंगे । प्रश्न उठता है कि यदि भिन्न - भिन्न वर्णों का ही अनुभव होता है तो एक पद - वाक्यादि का अवभासक विकल्प कैसे उत्पन्न होता है? यह उत्पन्न होता है, ऐसा देखा गया है, अत: यह मानना पड़ेगा कि वर्णों में एक पद, एक वाक्य आदि का अनुभव होता है । इसका उत्तर है कि इसकी उपपत्ति दूसरे रूप से भी हो सकती है । जैसे कि प्रतिपादक व्यक्ति संकेत काल में एक पदादि के रूप प्रतिपन्न वर्णक्रम को ही अलग - अलग यह एक पद है, इस तरह से संकेतित करता है । इससे दूसरे व्यक्ति को भी उस वर्णक्रम में एक पद की अध्यारोपित बुद्धि उत्पन्न हो जाती है । इस एक पद की आरोपित ४ ९
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३८६ वेदार्थपारिजातः कारानुभवाहित संस्कारस्य पुंसो व्यवहारकालेऽपि वर्णक्रमश्रवणादेकमिदं पदं वाक्यं वेत्येकाकारस्य विकल्पस्योत्पत्ति-भवति । एवं पूर्वपूर्वश्रोतॄणां पूर्वपूर्ववक्तृभ्यो वर्णक्रमेष्वेवारोपेण प्रतीतिर्भवतीत्यनादित्वं पदादिव्यवहारस्य । अत एवोच्यते - अनादिभागवासनो विकल्पप्रतिभासविभ्रमः । पदं वाक्यं चैकावभासि मिथ्यैव । मिथ्यात्वं च feari वर्णानाम्, एकपदादिरूपतया स्मरणज्ञाने प्रतिभासनात्, तावतश्चैकानेकत्वयोरविरोधेनायोगात् । ननु गौरित्येकं पदमिति प्रत्यक्षग्राह्यमेवैकपदादोति कथं मिथ्येति, तदयुक्तम्, अनेकया वर्णक्रमग्राहिण्या बुद्धया क्रमेण ग्रहणायोगात् । एकत्वे ह्येकयैव सकृद् गृह्येत । एकवर्णग्रहणेऽप्यने कबुद्धिव्यतिक्रमात् क्षणिकत्वाद् बुद्धीनाम् । क्षणस्य च परमाण्वतिक्रमकालत्वादाधिक्ये शक्यविभागस्य क्षणस्य कालपर्यं वसानायोगात् । तेनैकस्य निष्कृष्टस्य वर्णस्यानेकक्षणेन निष्पत्तिः । स्मृतिरपि तत्कालेव यथानुभवं स्मरणात् । अनुभवस्मरणानुक्रमयोविशेषानुपलक्षणाद् नैकं पदादि । अत एव - ' अल्पीयसापि यत्नेन शब्दमुच्चरितं मतिः । यदि वा नैव गृह्णाति वर्णं वा सकलं स्फुटम् ॥ पृथक् च नोपलभ्यन्ते वर्णस्यावयवाः क्वचित् | ' इत्यप्यपास्तम्, यथोक्तेन न्यायेन वर्णस्य सावयवत्वात् । न चेकया बुद्ध्या क्रमवतां वर्णभागानां ग्रहणम्, क्षणिकत्वाद् बुद्धीनाम् । नाप्यनेकमेव पदादि, अभेदप्रतिभासत्वाद् बुद्धेः । पदे वाक्ये चोच्चारित एकमिदं पदं वाक्यमिति लोकमतिर्भवति । तेन ' शेध्यादल्पान्तरत्वाच्च गोशब्दे सा भवेदपि । देवदत्तादि-शब्देषु स्फुटो भेदः प्रतीयते ॥ ' तदप्यपास्तम्, वर्णानुभवोत्तरकालमेकपदाध्यारोपिकाया बुद्धरुपपत्तः । पदाद्यनेकत्वस्य निषेत्स्यमानत्वात् तन्न वस्तु, एकानेकत्वायोगात् । वस्तु च सम्बन्धः स कथं तदाश्रयः स्यात् । आकार वाली बुद्धि से स्थापित संस्कार वाले पुरुष में भी व्यवहार करते समय वर्णों को क्रम से सुनने पर यह पद है, यह वाक्य हैं, इस तरह के एकाकार विकल्प की उत्पत्ति होती है । इस तरह से पूर्व पूर्व काल के श्रोताओं को उनके पूर्व पूर्व काल के वक्ताओं से वर्णक्रम में आरोपित पदादि की प्रतीति होती है, फलतः पदादि व्यवहार की अनादिता मानी जाती है । इसीलिये कहा जाता है कि यह सारा free प रूप से प्रतिभासित हो रहा विश्रम अनादि वासना से उत्पन्न होता है । पद और वाक्य का एकाकार प्रत्यय भी मिथ्या ही है । यह प्रतीति मिथ्या इसलिये हैं कि स्मरण ज्ञान में भिन्न - भिन्न वर्णं एक पद वाक्यादि के रूप प्रतीत होते हैं । अनेक वर्ण और एक पद की, एक साथ अनेकत्व और एकत्व की अविरोध से एक स्थल पर स्थिति कैसे रह सकती है? प्रश्न है कि ' गो ' यह एक पद है, यहाँ पर एक पद की प्रतीति प्रत्यक्ष प्रमाण से होती है, इसको मिथ्या कैसे कह सकते हैं? उत्तर है कि यह प्रश्न ही गलत है, वर्ण के क्रम को ग्रहण करने वाली अनेक बुद्धि क्रम से उनका ग्रहण नहीं कर सकती । यदि वह एक है तो उसका एक बुद्धि से एक बार में ही ग्रहण ( ज्ञान ) होना चाहिये । बुद्धि क्षणिक मानी गई है, अतः एक वर्ण के ग्रहण में भी अनेक बुद्धियाँ बीत जाती हैं । क्षण तो परमाणु की तरह अत्यन्त सूक्ष्म है । इसको यदि इससे अधिक बड़े विभाग के रूप में माना जाय तो काल का कहीं पर्यवसान नहीं माना जा सकेगा । इसलिये एक निष्कृष्ट वर्ण की अनेक क्षण में निष्पत्ति माननी पड़ेगी । स्मृति का भी वही काल मानना पड़ेगा, क्योंकि अनुभव के अनुसार हो स्मृति मानी जाती है । अनुभव और स्मरण के इस अनुक्रम किसी विशेष की प्रतीति न होने से पदादि की एकता नहीं मानी जा सकती । इसीलिये ' बहुत थोड़े से प्रयत्न में धीरे से उच्चरित शब्द को यदि बुद्धि ठीक से नहीं पकड़ पाती या सम्पूर्ण वर्णों को वह स्पष्ट नहीं सुन पाती तो उसको वर्णों के अवयव स्पष्ट प्रतीत नहीं हो पाते ' इस कथन का खण्डन हो जाता है, क्योंकि ऊपर बताईं पद्धति से वर्णों की सावयत्रता सिद्ध है । एक बुद्धि से क्रमवान् वर्ण के भागों का ग्रहण संभव नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धियाँ क्षणिक हैं । पदादि की अनेकता भी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि पद आदि का एक रूप से ज्ञान होता है । पद अथवा वाक्य के उच्चारण करने पर यह एक पद है, यह एक वाक्य है, इस तरह से उनमें एकत्व की प्रतीति होती है । इसीलिये --- ' गो शब्द की लघुता के कारण उसका शीघ्र उच्चारण हो जाने से और दो वर्णों के उच्चारण में अधिक विलम्ब न लगने से उसमें एकत्व बुद्धि किसी प्रकार हो भी जाय, किन्तु देवदत्त प्रभृति बड़े शब्दों में इसका भेद स्पष्ट प्रतीत होता है ' इस कथन का भी खण्डन हो जाता है, क्योंकि वर्णों के अनुभव ( ज्ञान ) के बाद के काल में एक पद का आरोप करने वाली बुद्धि ( ज्ञान ) हो सकती है । पदादि की अनेकता का निषेध किया जाता है, अतः ये वस्तुभूत नहीं हो सकते । इनका एकत्व और अनेकत्व से सम्बन्ध न भी नहीं सकता | सम्बन्ध तो वास्तविक होता है । वह अवास्तविक वस्तु में कैसे रह सकता है?
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वेदार्थपारिजातः ३८७ अत्रोच्यते -- मीमांसकनैयायिकादिमतरीत्या समाहितमेतत् पङ्क्तिर्वनं सेना शतं सहस्रमित्यादिष्वनेक-स्याप्येकबुद्धिविषयत्वात् । अत एव बहुष्वेव वर्णेष्वेकार्थावच्छेदनिबन्धनौपचारिकी वनसेनादिबुद्धिवदेवैकत्वबुद्धिः । तदुक्तमेव भामतीकृता - ' प्रत्येकवर्णानुभवजनितभावनानिचयलब्धजन्मनि निखिलवर्णावगाहिनि स्मृतिज्ञान एकस्मिन्नेव नासमानानां वर्णानां तदेकविज्ञानविषयतया नैकार्थधीहेतुतया वौपचारिकत्वमवगन्तव्यम् ' इति । वैयाकरणमतरीत्यापि एकैकवर्णप्रत्याहितसंस्कारबीजेऽन्त्यवर्णप्रत्ययजनितपरिपाके प्रत्ययिन्येकविषयतया झटित्यवभासत इति रीत्या एकं वाक्यमेकं पदमिति प्रत्ययविषयतयाऽर्थावबोधकस्य स्फोटस्य सिद्धिः । arragene अत्र नागेशभट्ट: - ' भिद्यमानात् पराद् बिन्दोरव्यक्तात्मा रवोऽभवत् । शब्दब्रह्मेति तं प्राहुः सर्वागम-विशारदाः || ' तदेव नाभिपर्यन्तमागच्छता तेन वायुनाऽभिव्यक्तं मनोविषयः पश्यन्तीत्युच्यते । हृदयपर्यन्तमागच्छता हृदयदेशेऽभिव्यक्तं तत्तदर्थविशेषतत्तच्छब्दविशेषोल्लेखिन्या बुद्ध्या विषयीकृता परागम्या मध्यमेत्युच्यते । तदेवास्य-पर्यन्तमागच्छता वायुना कण्ठदेशमागत्य मूर्धानमाहत्य परावृत्य तत्तत्स्थानेषु व्यक्तं वैखरी वागुच्यते । ' सबै परात्मकं पूर्व ज्ञप्तिमात्रमिदं जगत् । ज्ञप्तिर्बभूव पश्यन्ती मध्यमा वाक् ततः परम् ॥ वक्त्रे विशुद्ध चकाख्ये वैखरी सा मता ततः । ' तत्र मध्यमायां यो नादाशस्तस्यैव स्फोटात्मनो वाचकत्वम्, तस्य चेतनाचेतनमिश्रत्वात् । विमृश्यांशस्य वाच्यत्वं विमर्शकस्य ज्ञानस्य स्फोटत्वम् । तस्यैकैकवर्णव्यङ्ग्यत्वेऽप्यन्त्यवर्णव्यङ्गयस्य बोधकत्वम् । व्यञ्जकरूपप्रतिविम्बनात् इस पूरे प्रकरण का समाधान इस तरह से है - मीमांसक, नैयायिक आदि के मत से इसका समाधान दिया जा चुका है कि पंक्ति, वन, सेना, शत, सहस्र आदि वस्तुओं का ज्ञान अनेक वस्तुविषयक होने पर भी एक पंक्ति ( लाइन ), एक वन, एक सेना इत्यादि रूप से एकाकार बुद्धि का विषय बनता है । इसी तरह वर्णों के अनेक होने पर भी एक अर्थ के निश्चायक होने के कारण उन्हें एक पद और एक वाक्य गौण रूप से कहा जाता है । जैसे -- पंक्ति, वन, सेना, आदि में अनेक तत्त्वों के रहते हुए भी उन्हें एक - एक रूप से कहा जाता है । यही भामतीकार ने भी कहा है— ' प्रत्येक वर्ण के अनुभव से पैदा हुए संस्कार समूह से उत्पन्न, अत एव निखिल वर्णों का अवगाहन करने वाले एक ही स्मृति ज्ञान में भासमान वर्णों की एक विज्ञानविषयता के कारण, अथवा अर्थ के ज्ञान के हेतु होने के कारण औपचारिक ( लाक्षणिक = गौण ) एकत्व जानना चाहिये । वैयाकरणों के मत से भी एक - एक वर्णप्रत्यय ( ज्ञान ) से उत्पन्न संस्कार रूपी बीज में अन्त्य वर्णप्रत्यय के परिपाक हो जाने पर उसकी एक प्रत्ययविषयतया एकाएक प्रतीति होने लगती है । इस तरह से यह एक वाक्य है, एक पद है, इस तरह के प्रत्यय के रूप में अर्थबोधक स्फोट की सिद्धि होती है । स्फोट सम्बन्धी नागेश भट्ट का मत स्फोट के सम्बन्ध में नागेश भट्ट का कहना है कि ' भिद्यमान पर बिन्दु से अव्यक्त रूप नाद पैदा होता है | आगमों के विशारद विद्वान् इसको शब्दब्रह्म के नाम से जानते है ' । वही नाद नाभि तक आते आते वायु के सम्पर्क से जब प्रकट होकर मन का विषय होता है तो उसको पश्यन्ती कहते हैं । हृदय देश तक आकर जब यहाँ पर यह अभिव्यक्त होकर उस उस अर्थविशेष और शब्दविशेष का उल्लेख करने वाली बुद्धि का विषय बनता है तो इसको मध्यमा कहते हैं । वही नाद जब मुँह तक आकर वहाँ पर सम्पति होता है तो कण्ठ देश में आकर शिर की तरफ जाकर वहाँ से पुनः लोट आता है और उन उन कण्ठ, तालु आदि स्थानों में अभिव्यक्त होकर वैखरी वाणी के नाम से जाना जाता है । ' यह सारा जगत् पहले परावस्था में ज्ञानमात्र के रूप में विद्यमान रहता है । उसी को योगी जन पर वाणी कहते हैं । यह ज्ञान पहले पश्यन्ती और बाद में मध्यमा वाणी के रूप में परिणत होता है और जब मुँह में विशुद्धि चक्र में प्रवेश करता है तो उसको वैखरी वाणी कहते हैं । यहाँ पर मध्यमा में जो नाद का अंश है, वही स्फोट रूप वाचक शब्द है । वह वेतन और अचेतन अंश से मिला हुआ होता है । इनमें विमृश्य अंश वाव्य और विमर्शक ज्ञान स्फोट कहलाता है । यह एक - एक वर्ण से व्यंग्य है, तो भी अन्तिम वर्ण ही व्यंग्य अर्थ का बोधक माना जाता है । व्यंजक का रूप इसमें प्रतिबिम्बित रहता
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३८८ वेदार्थपारिजातः तद्रूपरूषितैव तदभिव्यक्तिः । सहस्रदीपाभिव्यक्तपदस्येवानेक जपाकुसुमाभिव्यक्तस्फटिकस्येव नानात्वाभाव इवोपाधि नानात्वेऽपि स्फोटस्यानानात्वम् । शब्दस्य क्षणिकत्वं क्षणस्थायित्वमित्यादी क्षणशब्देन शब्दाधारः काल एव विवक्षितः, मुख्यक्षणस्या-प्रत्यक्षत्वात् तदवच्छिन्नवर्णस्यापि अप्रत्यक्षत्वापाताच्च । तदेवेदमिन्द्रपदमिति प्रत्यभिज्ञया पदानामपि स्थायित्वनित्य-त्वादिकम् । वर्णपदोत्पत्त्यादिप्रतोतिस्तु तदभिव्यञ्जकनाद वायुत्पत्त्यादिनिबन्धनोपाधिकी भ्रान्तिरेव । न च प्रत्यभिज्ञान तदेकजातीयबुद्धिविषयत्वेनैकबुद्धिविषयत्वेन वोपपद्यते, तज्जातीयमिदमित्यादिप्रतीत्यापत्तेः । नापि त एबेमे केशा इतिवत् तत्, एकेकबुद्धिविषयेरवयवरेकः पट इति प्रतीत्युपपत्ती तदतिरिक्तस्यावयविनोऽसिद्ध्यापत्तेः । भिन्नेषु शक्ति-ग्रहासम्भवः, गृहीतशक्तिकस्यैव बोधकत्वमिति नियमस्य सार्वभौमत्वात् । प्रविलीन सर्वजगत्क मायाविशिष्टात् परमेश्वराद् मायापुरुषयोराविर्भावः । न च मायापुरुषयोरनादित्वमेवेति वाच्यम्, ' अव्यक्तं निष्कले ब्रह्मन् ब्रह्मणि प्रविलीयते । तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम ॥ इत्यादिभिस्तदुत्पत्तिप्रलयस्मरणात् । तद्द्द्वारंव तदुपाधिकस्य पुरुषस्यापि तदुपपत्तेः । तदुक्तं सूतसंहितायाम् -- ' ब्रह्मरूपात्मनस्तस्मादेतस्मात् शक्तिमिश्रितात् ' इत्यादि । ब्रह्मणि मायाया लयेऽपि न सर्वथाऽभानम् । प्रतिमासमात्रशरीरस्य मिथ्यावस्तुनोऽनवभासे तदभावस्यैवा-पत्तेः; किन्तु सुप्तेव तिष्ठति, कार्यप्रवृत्त्यभावात् । परमेश्वरस्यात्यन्तनिर्विकल्पकतया तद्वलाद् भासमानापि अभासमानप्रायैव । कालवशात् प्राप्तपरिपाकैः कर्मभिः स्वफलदानाय भगवतोऽबुद्धिपूर्विका मायापुरुष सृष्टिर्भवति । ततः परमेश्वरस्य सिसृक्षात्मिका मायावृत्तिर्जायते । तस्या मायावृत्तेस्त्रिगुणं बिन्दुस्वरूपमव्यक्तं जायते । इदमेव है । अत: व्यंजक के रूप से सम्बन्धित होकर ही वह प्रकट होता है । हजारों दीपकों से अभिव्यक्त ( प्रकट ) पट ( वस्त्र ) जैसे एक ही है, अनेक जपाकुसुमों में अभिव्यक्त स्फटिक जैसे एक ही हैं, वैसे ही अनेक वर्णों से अभिव्यक्त होकर भी यह एक ही है । इसमें जो भेद की प्रतीति होती है, वह उपाधि के भेद के होने के कारण होती है, अतः स्फोट में किसी प्रकार का भेद नहीं है । शब्द क्षणिक है, क्षण स्थायी है, इत्यादि स्थलों में क्षण शब्द से शब्द का आधार काल ही विवक्षित है, क्योंकि ऐसा न मानने पर मुख्य क्षण का प्रत्यय ( ज्ञान ) न होने से उसके क्षण से संबद्ध वर्ण का भी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होगा । यह वही इन्द्र पद है, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा के आधार पर पदों का भी स्थायित्व और नित्यत्व मान्य है । वर्ण, पद मादि की उत्पत्ति तो उसके अभिव्यंजक नादवा की उत्पत्ति के कारण औपाधिक भ्रान्तिमात्र है । तदेकजातीय बुद्धि का विषय होने से अथवा एक बुद्धि का विषय होने से प्रत्यभिज्ञा प्रत्यय ( ज्ञान ) की उपपत्ति नहीं बताई जा सकती, क्योंकि उस परिस्थिति में यह तज्जातीय है, इस प्रकार की प्रतीति माननी पड़ेगी । ये वही केश है, इस तरह की प्रतोति भी यह नहीं मानी जा सकती, क्योंकि ऐसी अवस्था में एक एक बुद्धि के विषय अवयवों से यह एक पद है, इस तरह की प्रतीति की उपपत्ति हो जाने पर तदतिरिक्त अवयवी ही सिद्ध हो जायगा । यह सार्वभौम नियम है कि विभिन्न पदों में शक्तिग्रह नहीं होता और जब तक शक्तिग्रह नहीं होता, तब तक उनमें बोधकता नहीं मानी जा सकती । जिसमें सारा जगत् छिपा हुआ है, ऐसी माया से विशिष्ट परमेश्वर से ही माया और पुरुष का आविर्भाव होता है । माया और पुरुष ( जीव ) की अनादिता नहीं मानी जाती, क्योंकि - ' हे ब्रह्मन्, अव्यक्त निष्कल ब्रह्म में विलीन हो जाता है । है द्विजसत्तम, उससे त्रिगुणात्मक अव्यक्त उत्पन्न होता है ' इत्यादि स्थलों में उनकी उत्पत्ति और प्रलय का वर्णन किया गया है । अव्यक्त के माध्यम से ही तदुपाधिक पुरुष की भी ऐसी ही स्थिति माननी पड़ेगी । जैसा कि सूतसंहिता में कहा गया है-- ' शक्ति से मिश्रित ब्रह्मस्वरूप इस आत्मा से अव्यक्त जीव आदि का प्राकट्य हुआ 1 ' ब्रह्म में माया का लय हो जाने पर भी उसका ज्ञान न होता हो सो बात नहीं है, क्योंकि प्रतिभासमात्र स्वभाव वाली मिथ्या वस्तु का यदि अवभास भी न हो तो उसका अभाव ही मानना पड़ जायगा । किन्तु यह माया उस स्थिति में सोयी हुई सी रहती है, क्योंकि उस समय वह कार्य में व्यापूत नहीं रहती । परमेश्वर तो अत्यन्त निर्विकल्पक है, अतः उसकी सहायता से इसका आभास होना न होने के बराबर है । काल के कारण कमों का परिपाक होने पर उनके फल देने के लिये भगवान् की अबुद्धिपूर्वक माया पुरुष की सृष्टि में प्रवृत्ति होती हैं । इसके बाद परमेश्वर की सिसृक्षात्मिका ( सृष्टि को उत्पन्न करने की इच्छा स्वरूपा ) माया
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वेदार्थपारिजातः ३८६ शक्तितत्वम् । तस्य बिन्दोरचिदंशो बीजम्, चिदचिन्मिश्रो नादः, चिर्दशो बिन्दुः । अचिच्छन्देनाभिधानाभिधेय संस्कार-रूपाऽविद्या । तस्माद् बिन्दोः शब्दब्रह्मरूपं वर्णादिविशेषरहितं ज्ञानप्रधानं सृष्ट्य् पयोग्यवस्थाविशेषरूपं चेतनमिश्र नादमात्रमुत्पद्यते । एतदुपादानमेव परादिशब्देर्व्यवह्रियते । तदुक्तम् —'बिन्दोस्तस्माद्भिद्यमानाद्रवोऽव्यक्तात्मको-ऽभवत् । स एव श्रुतिसम्पन्नः शब्दब्रह्मेति गीयते ॥ ' इति, ' वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे ' इति श्रुतेः । सर्वगतमप्येतत् प्राणिनां मूलाधारे संस्कृतपवनेनाभिव्यज्यते । ज्ञातार्थविवक्षया पुंसः प्रयत्नेन मूलाधारस्थ-पवनसंस्कारः । तदभिव्यक्तं शब्दब्रह्म स्वप्रतिष्ठितया निःस्पन्दं परा वागित्युच्यते । ' अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ ' ( वा ० प ० १1१ ) | ' सच्चिदानन्दविभवात् सकलात् परमेश्वरात् । आसीच्छत्तिस्ततो नादो नादाद्द्द्विन्दुसमुद्भवः । परशक्तिमयः साक्षात् त्रिवासी भिद्यते पुनः । बिन्दुर्नादो बीजमिति तस्य भेदाः समीरिताः ॥ बिन्दुः शिवात्मको बीजं शक्तिर्नादस्तयोमिथः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदेः ॥ रौद्री बिन्दोस्ततो नादात् ज्येष्ठा बीजादजायत । बामा ताभ्यः समुत्पन्ना रुद्रब्रह्मस्माभिधाः । सज्ञानेच्छाक्रियात्मानो वह्नीन्द्रर्कस्वरूपिणः ' । येन क्रमेण चित्ते संस्कारस्तेनैव क्रमेण व्यञ्जकरूपरूषितता तस्येति स्वीकारात् ' सर ' ' रस ' इति नानयोरविशेषः । तदुत्तरत्वग्रहश्चित्तभित्तौ देशिक एव । अयं चानन्तरत्वात् श्रोत्रग्राह्यवैखरीसंस्कृतान्तःकरणग्राह्यन व्यञ्जकरूपरूषितस्य तस्यैवार्थे सङ्केतग्रहः । अत एव घटकलशादिपर्यायाभिव्यक्ते स्फोटे गृहोतशक्तिकस्यापि पुंसोऽप्र-सिद्धपदश्रवणे नार्थबोध: । वाय्वादिपरिणामरूपा कण्ठतालवाद्यभिघातजन्या वैखरी । की वृत्ति उत्पन्न होती हैं । उस माया की वृत्ति से त्रिगुणात्मक सत्व, रज, तमोरूप बिन्दुस्वरूप अव्यक्त उत्पन्न होता है । इसी को शक्ति तत्व कहते हैं । उस शक्ति तत्व का अवित् ( अचैतन्य, जड़ ) अंश बीज, चिदचिम्मिश्रित ( चैतन्य और अचैतन्य ) अंश नाद और चिदंश ( चैतन्य अंश ) बिन्दु कहलाता है । अचित् शब्द से अभिधान ( वाचक ) और मभिधेय ( वाच्य ) के संस्कार वाली अविद्या कही जाती है । उस बिन्दु से शब्दब्रह्म स्वरूप वर्णादि विशेष रहित ज्ञानप्रधान सृष्टि के लिये उपयोगी अवस्था से ' युक्त चेतनमिश्रित नाद मात्र की उत्पत्ति होती है । कारण रूप यह नाद ही परा वाणी प्रभृति शब्दों से अभिहित होता है ( कहा जाता है ) । जैसा कि कहा गया है - ' उस भिद्यमान बिन्दु से अव्यक्त स्वभाव का रव अर्थात् नाद उत्पन्न होता है । इसी को वेद के विद्वान् शब्दब्रह्म के नाम से जानते हैं ' । ' यह वाणी ही सारे भुवनों की सृष्टि करती है ' यह श्रुति भी है । यह शब्द सर्वत्र व्याप्त है, तो भी प्राणियों के मूलाधार में संस्कार विशिष्ट पवन के द्वारा अभिव्यक्त ( प्रकट ) होता है । पुरुष जब अपने जाने हुए अर्थ को कहना चाहता है तो उस समय उसके प्रयत्न से मूलाधार स्थित पवन का संस्कार होता है | इससे अभिव्यक्त शब्दब्रह्म अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहने से निस्पन्द रहता है, इसी को परा वाक् कहते हैं । ' अनादि और अनिधन ( अनन्त ) अक्षर ( अविकारी ) ब्रह्म शब्दतत्वात्मक है, यह जब अर्थ ( वस्तु ) रूप से विवर्त को प्राप्त होता है तो जगत् की यह सारी प्रक्रिया इसी से चल पड़ती है । ' ' सत्, चित् आनन्द स्वरूप सकल परमेश्वर से पहले शक्ति, बाद में नाद और उससे बिन्दु की उत्पत्ति हुई । यह परा शक्तिस्वरूप साक्षात् भगवान् पुनः तीन तरह से विभक्त होता है । उसके ये भेद बिन्दु, नाद और बीज कहलाते हैं । इनमें बिन्दु francer, बीज शक्तिस्वरूप और नाद इनका परस्पर समवाय ( संबन्ध ) कहलाता है । यह मत सभी आगमों ( तन्त्रशास्त्र ) के विशारों का है । बिन्दु से रोद्री, नाद से व्येष्ठा और बीज से वामा ये तीन शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं । और इन्हीं से रुद्र, ब्रह्मा, रमा स्वरूप ज्ञान, इच्छा और क्रिया शक्तियाँ उत्पन्न होती है, जो कि क्रमशः वह्नि, इन्दु ( चन्द्र ) और अर्क ( सूर्य ) स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है ' । जिस क्रम से वित्त में संस्कार उत्पन्न होता है, उसी क्रम से वह व्यंजक के रूप से संवलित होता है, ऐसा मानने से सर और रस शब्द की परस्पर समानता नहीं मानी जाती, क्योंकि सर और रस शब्दों में वर्ण एक होते हुए भी उनका कम free है । चित्तभूमि में इस क्रम का ज्ञान उपदेश द्वारा हो होता है । उपदेश की अवस्था के तुरन्त बाद श्रोत्रप्राह्य वैखरी वाणी से अन्तःकरण के संस्कृत होने पर उससे गृहीत ( ज्ञात ) हो रहे व्यंजक के रूप से संचलित होकर यह संकेत ग्रहण में समर्थ हो जाता है । इसीलिये घट कलश आदि पर्यायवाची शब्दों से अभिव्यक्त स्फोट में पुरुष के शक्तिग्रह हो जाने पर भी अप्रसिद्ध शब्द को सुनने पर उसके अर्थ का
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३६० दार्थ पारिजातः ' अथायमान्तरो ज्ञाता सूक्ष्मो वागात्मनि स्थितः । व्यक्तये स्वस्वरूपस्य शब्दत्वेन विवर्तते ॥ ' अनया रीत्या साधिष्ठानं सचिदाभासमन्तःकरणमेव मनोवाय्वादिद्वारा शब्दत्वेन विवर्तते । पातञ्जले व्यासभाष्ये तु वागिन्द्रियं asara | श्रोत्रं च ध्वनिपरिणाममात्रविषयम् । ध्वनिर्नाम वागिन्द्रियादावुदानवायोरभिघाताज्जायमान उदान-वायोराकाशस्य परमाणूनां वा परिणामभेद: । स च वर्णरूपोऽप्यवाचकत्वाद् ध्वनिरिति तद्व्याख्यातारः । यथा ज्वालारूपे ज्योतिरविच्छेदेनोत्पद्यमानं सन्ततं तथोपाध्यायज्ञानानि भिन्नशब्दरूपतामापन्नानि संततानीति स्पष्टम् । तदुक्तमेव - ' वायोरणूनां ज्ञानस्य शब्दत्वापत्तिरिष्यते । वायोः प्राणवायोः, परमाणूनां शब्दतन्मात्रारूपाणामित्यर्थः । ' अभ्राणीव प्रचीयन्ते शब्दाख्याः परमाणवः ' इति हरि: । ' लब्धक्रियः प्रयत्नेन वक्तुरिच्छानुवर्तिना । स्थानेष्वभिहतो वायुः शब्दत्वं प्रतिपद्यते ॥ ' इत्यपि स एव । छायातपतमांस्यपि शब्दवत्परमाणुपरिणामभूतानि । तदप्युक्तम् -'अणवः सर्वशक्तित्वात् भेदसंसर्गवृत्तयः । छायातपतमः शब्दभावेन परिणामिनः ॥ ' परमाणूनां विलक्षणसम्बन्धाद् भिन्नभिन्न-erraf रत्यर्थ: । ' आत्मा बुद्धचा समेत्यार्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥ सदीर्णो मूभितो वक्त्रमापद्य मारुतः । वर्णान् जनयते * RDR16 ॥ ' ( पा ० शि ० ६।९ ) । पराख्यमन्तः स्थितं शब्द वर्णत्वेनाभिव्यनक्तीति भावः । अन्तःकरणपरिणामरूपा परा वृत्तिः । साभासमन्तःकरणं मनः प्रेरयति तद्देहस्थमग्निम् । ज्ञान नहीं होता! यहाँ चर्चित वैखरी वाणी वायु प्रभृति के परिणाम स्वरूप जो कण्ठ, तालु आदि स्थानों का अभिघात ( धक्का ) होता है, उससे उत्पन्न होती है । ' यह आन्तर ज्ञाता ही सूक्ष्म परा वाक् के रूप में अवस्थित रहता है । यह अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति ( प्राकट्य ) के लिये शब्द का रूप ले लेता है ' इस श्लोक में बताई पद्धति से साधिष्ठान ( अधिष्ठान सहित ) सचिदाभास ( चेतन प्रतिबिम्ब सहित ) अन्तःकरण हो मम, वायु आदि की सहायता से शब्द का रूप ' लेता है | पातंजल योगसूत्र के व्यास भाष्य में बताया गया है कि वर्णों में ही वागिन्द्रिय ( वाणी ) की प्रवृत्ति होती है और श्रोत्र केवल ध्वनि के परिणामों को अपना विषय बनाता है । वागिन्द्रिय आदि में उदानवायु के अभिघात ( धक्के ) से उत्पन्न हुआ उदान वायु का, आकाश का अथवा परमाणुओं का परिणाम विशेष ही ' ध्वनि ' कहलाता है | व्यास भाष्य के व्यायाकारों का कहना है कि यह ध्वनि वर्णरूप होते हुए भी वाचक न होने से इस नाम से अभिहित होता है । जैसे ज्वाला के रूप में ज्योति के निरन्तर उत्पन्न होने से उसकी सन्तति ( लो ) कहलाती है, उसी तरह से उपाध्याय के ज्ञान से विभिन्न शब्दों को निरन्तर सृष्टि होते रहने से शब्द की भी सन्तति मानी जाती है । जैसा कि कहा गया है- ' वायु, परमाणु और ज्ञान ही शब्द का रूप धारण कर लेते हैं । यहाँ पर वायु शब्द से प्राण वायु का और परमाणु शब्द से शब्द तन्मात्रा का ग्रहण किया जाता है । वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का कहना है कि - शब्दरूपी परमाणु उसी तरह से बढ़ते चले जाते हैं, जैसे नभोमण्डल में मेघों का संचय होता है ' । उनका यह भी कहना है की इच्छा के कारण उसके प्रयत्न से क्रियाशील होकर वायु विभिन्न स्थानों में टकराकर शब्द के रूप को धारण कर लेता है ' । छाया, आतप, अन्धकार भी शब्द की तरह ही परमाणुओं के परिणाम है । जैसा कि भर्तृहरि ने कहा है-- ' इन परमाणुओं मैं सभी तरह की शक्ति निहित है, अतः इनका भिन्न - भिन्न स्वभाववालो वृत्तियों से सम्पर्क होने पर छाया, आतप, तम आदि शब्दों के रूप में भी परिणाम होता रहता है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि परमाणुओं के विलक्षण सम्बन्ध के कारण भिन्न भिन्न स्वभाव के कार्यों की उत्पत्ति होती है । पाणिनि शिक्षा में भी बताया गया है कि - ' आत्मा जब बुद्धि के सम्पर्क में आता है तो वह अर्थी का प्रतिपादन करने की इच्छा से मन को प्रेरित करता है । मन शरीर स्थित अग्नि को झकझोरता है और इससे शरीर स्थित प्राण वायु प्रेरित होता है । वह ऊपर की तरफ उठता है और वहाँ पर शिर से टकराकर लौटता हुआ मुँह के पास पहुंचता है । यहाँ पर उसके विभिन्न स्थानों टकराने के कारण वर्णों की उत्पत्ति होती है । इसका अभिप्राय यह है कि परा वाणी के रूप में अन्तः स्थित शब्द को वह प्राण वायु वर्णों के रूप में अभिव्यक्त ( प्रकट ) करता है । परा वाणी की ही अन्तःकरण के परिमाण रूप वृप्ति होती है । उस वृत्ति में प्रतिबिम्बित चेतन सहित अन्तःकरण मन को प्रेरित करता है । वह शरीर स्थित अग्नि को और यह अग्नि वायु को ऊपर जाकर मुखादि में sof न के रूप में अभिव्यक्त कर देता है । जैसा कि इस श्लोक में प्रतिपादित है --- ' कर्ता पहले सभी प्रकार की