वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 421–430
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 421–430
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३६१ स वायुरूध्वं गच्छन् मुखादिषु ध्वनि जनयति । तदुक्तम् – ' बुद्धी कृत्वा सर्वाश्चेष्टाः कर्ता धीरस्तन्वन्नीतिः । शब्देनान् वाच्यान् दृष्ट्वा बुद्धौ कुर्यात् पौर्वापर्यम् ॥ ' ( म ० भा ० ११४ / १० ९ ) इति । बुद्धिविषयमेव शब्दानां पौर्वापर्यमित्यर्थः । अस्मिन्नर्थेऽयं शब्दः प्रयोक्तव्यः अस्मि शब्देऽयं तावद् वर्णः । ततोऽयं तताऽयमिति प्रेक्षापूर्वकारी पश्यति । महाभाष्य-कृता स्वाभिप्रायोऽप्युक्तः । तद्यथा कश्चित् कञ्चिदुपदिशति प्राचीनं ग्रामादाम्रा इति । तस्य सर्वनामबुद्धिः प्रसक्ता । पश्चादाह - ये क्षीरिणोऽवरोहह्वन्तः पृथुपर्णास्ते न्यग्रोवाः । स तत्राम्रबुद्ध्या न्यग्रोधबुद्धि प्रतिपद्यते । स ततः पश्यति बुद्धया आम्रांश्चापकृष्यमाणान् न्यग्रोधांश्चापधीयमानान् । नित्या एव स्वस्मिन् विषये आम्रा नित्याश्च न्यग्रोधाः । बुद्धिस्तस्य विपरिणम्यते । अयं च शब्दस्तत्तत्प्राणिहृदयदेशस्थ: सर्वसमष्टेविराहृदयरूपबाह्याकाश देशस्थः । स च लाघवादेको विभुः । यथकत्र श्वेतद्रव्ये रूपं व्यापकं तथा शब्दस्याप्याकाशव्यापकत्वम् । अत एव मीमांसामते मन्त्रातिरिक्ताया देवताया अनभ्युपगमात् । शाब्दिकमतेऽपि शब्दार्थयोरभेदी मन्त्रस्य देवतारूपत्वात् । इन्द्रशब्द एव देवता । स चेन्द्रशब्दः क्रतुशते प्रादुर्भूतो युगपत्सर्वयागेष्वङ्गं भवति । कत्वादिनाभिव्यक्तः श्रोत्रग्राह्यः पदादिरूपेण बुद्धिग्राह्यः श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्यः प्रयोगेणाभिज्वलित आकाशदेश: शब्द इति महाभाष्यात् । न्यायन्ये तु कदम्बमुकुल-वीचीत रङ्गादिन्यायेनानन्त शब्दजशब्दानां तत्प्रागभावप्रध्वंसानां च प्रत्यक्षानुपपत्त्या तत्कल्पने गौरवमेव । तन्मते यथा किञ्चिद् दूरदेशपर्यन्तमेव तदुत्पत्तिस्तथैव वैयाकरणादिमते तावद् दूरदेशपर्यन्तमेव तदभिव्यक्तिः । स्फटिकादीना-arathi अपनी बुद्धि में नापता - तोलता है, बाद में वह धैर्यपूर्वक उनका विस्तार करता है । शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है, ऐसा देखकर वह अपनी बुद्धि में उनके पूर्वापर क्रम को स्थापित कर लेता है ' इससे यह स्पष्ट होता है कि शब्दों का पौर्वापर्य क्रम बुद्धि का हा विषय है । इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग करना चाहिये और इस शब्द में इस वर्ण का प्रयोग होना चाहिये, तथा इनका क्रम हम इस तरह से रहना चाहिये, यह सब बात सावधानी से कार्य करने वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि से ही सोचता है । महाभाष्यकार ने यहाँ पर अपना अभिप्राय इस तरह से बतलाया है --- ' जैसे कोई किसी को बताता है कि ग्राम की पश्चिम दिशा में आम्रवृक्ष विद्यमान हैं तो सुनने वाले को पश्चिम दिशा के सभी वृक्षों में आम्र बुद्धि होने लगता है । बाद में जब कहता है कि जिनमें से दूध निकलता है, तनों से जटाएं नीचे की ओर झुकी हुई हैं और जिनके पत्ते बड़े- बड़े होते हैं, वे वृक्ष न्यग्रोध ( वट = बरगद ) कहलाते हैं, तो ऐसे वृक्षों बुद्धि को हटा कर न्यग्रोध बुद्धि रखता है । इसके बाद वह स्वयं ही अपकृष्यमाण आम्रों को और अपधीयमान न्यग्रोधों को पहचान लेता है । वस्तुतः अपने विषय में आम्र और न्यग्रोध शब्द तो नित्य वर्तमान है, किन्तु मनुष्य की बुद्धि उपदेश के अनुसार बदलती रहती है । यह शब्द उस - उस प्राणी के हृदय देश में स्थित रहता है और सर्व प्राणियों की समष्टि स्वरूप विराट् के हृदय भूत बाह्य आकाश में रहता है । लाघव के कारण इसको एक और व्यापक माना जाता है । जैसे एक श्वेत द्रव्य में सफेद रूप गुण व्यापक रूप से रहता है, उसी तरह से शब्द भी आकाशस्वरूप द्रव्य शब्द रूप गुण में व्यापक रूप से रहता है । इसीलिये मोमांसकों के मत में मन्त्र से अतिरिक्त भिन्न कोई देवताओं का रूप या आकार नहीं माना जाता | शाब्दिक के मत में भी शब्द और अर्थ में अभेद माना माना जाता है, क्योंकि मन्त्र देवता स्वरूप हो हैं । इन्द्र शब्द ही देवता है । यह इन्द्र शब्द हो सौ यज्ञों में प्रादुर्भूत होकर एक ही समय में एक साथ सभी यागों का अङ्ग हो जाता है । महाभाष्य में कहा गया है कि यह शब्द कत्वादि ( क ख ग आदि ) के रूप में अभिव्यक्त ( प्रकट ) से ग्राह्य पद, वाक्य आदि के रूप में जाना जाने वाला है, श्रोत्र से उपलब्ध होने वाला, बुद्धि द्वारा निश्चित स्वरूप, वक्ता प्रयोग से जाज्वल्यमान आकाश का विशेष प्रदेश ही शब्द है । न्यायमत में कदम्बगोलकन्याय ( कदम्ब पुष्प भी कली में franir अनेक कलियों की तरह ) से अथवा वीचीतरङ्ग न्याय ( तरङ्ग में विद्यमान अनेक तरङ्गों की तरह ) से अनन्त शब्दों से उत्पन्न हुए अनन्त शब्दों का और उनके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि का प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध नहीं हो सकता, अत: इनकी कल्पना में गौरव ही है । नैयायिकों के मत में जैसे कुछ दूर तक की उन शब्दों की उत्पत्ति मानी जाती है, उसी पद्धति से वैयाकरणों के मत में कुछ दूर तक हो
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३६२ वेदार्थ पारिजातः मुपाधिमन्तराप्युपलम्भकसामग्रीसस्याद् उपलब्धिः, शब्दस्य तूपाधेरेवोपलम्भकसामग्रीत्वान्न तदन्तरोपलब्धिः । कर्णशष्कुल्य वच्छिन्ननभोरूपेण श्रोत्रेण स्वसमवेतशब्दग्रहः । अस्मिन्मत आकाशदेश एवं शब्दो न त्वाकाशगुणः, शब्दाधारत्वेनैवाकाशसिद्धेः । तदुक्तम्- ' आधारशक्तिः प्रथमा सर्वसंयोगिनामयम् । इदमत्रेति भावानामभावानां च कल्पते || व्यपदेशस्तमाकाशनिमित्तं तु प्रचक्षते । कालात्क्रिया विभज्यन्ते आकाशात्सर्वमूर्तयः । एतावानेव भेदोऽयम-भेदोपनिबन्धनः ॥ ' ( वा ० प ० ३१४-६ ) इति । इदं नक्षत्रचक्रमत्र तिष्ठति, अत्रैतदभावः पृथिव्यादीनामपि परमाणुद्वारा तस्यैवाधारत्वात् । सिद्ध-स्वभावस्याकाशाधारत्वम्, साध्यस्वभावक्रियाविषयस्य कालाधारत्वम् । अन्ये तु नभोऽधिष्ठानकस्याहङ्कारिकधर्मं-विशेषस्यैव श्रोत्रत्वम्, तथैव पृथ्वीजलते जोवाय्वधिष्ठानकान्याहङ्कारिकाण्येव अन्यान्यपीन्द्रियाणि । अत एव योगीन्द्रियाणामत्यन्तदूरदेशस्थ विषयोपलब्धिजनकत्वम्, पृथिव्यादिविकाराणां तदसम्भवात् । अहङ्कारविकारस्यान्तः-करणस्य बहुदूरगमनस्यानुभवसिद्धत्वाद् नाहङ्कारविकाराणामिन्द्रियाणां तदसम्भवः । तथा च श्रोत्रमेव चित्तवृत्ति-सहकृतं स्ववृत्तिपरम्परया शब्ददेशमागतं शब्दं गृह्णाति । केचित्तु -- अणून सर्वशक्तीनां सर्वदेशव्यापितया तेजोनभआदिपरमाणूनां विषयदेशपर्यन्तं तत्तदिन्द्रियस्य तत्तद्विषयोन्मुख्ये तत्तदिन्द्रियरूपेण परिणामात् तत्तद्देशे प्रत्यक्षम् । परं तन्मतेऽपि शब्दस्याकाशदेशत्वमेव सिद्धयति । अनन्तश्रोत्रवृत्यनन्तपरमाणु कल्पनापेक्षया कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नस्यैकस्य श्रोत्रस्य कल्पने लाघवमेव । शब्दस्य चैकस्य उनकी अभिव्यक्ति मानी जाती है । स्फटिकादि की उपलम्भक सामग्री की विद्यमानता में बिना उपाधि के भी उपलब्धि होती है, किन्तु शब्द में तो उपाधि ही उपलम्भक सामग्री है, अतः बिना उपाधि के शब्द की उपलब्धि ( ज्ञान ) नहीं हो सकती । कर्णशष्कुली से अवच्छिन ( सम्बद्ध ) आकाशरूप श्रोत्रेन्द्रिय से अपने में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान शब्द को ग्रहण होता है । इस मत में आकाश देश में शब्द केवल विद्यमान रहता है, वह आकाश का गुण नहीं है । शब्द के आधार के रूप में आकाश की सिद्धि होती है । जैसा कि कहा गया है -- ' यह आकाश सभी संयोगी पदार्थों की आधार शक्ति है । इसी में यह पदार्थ यहाँ इस आकाश प्रदेश में है, इस तरह से इसी में न केवल भावों की, किन्तु अभावों के भी निवास की कल्पना होती है । यह सब आकाश के कारण होता है । काल से क्रियाओं का विभाग होता है और आकाश से सभी मूर्त पदार्थों का " आकार वाली वस्तुओं का । इन दोनों का यह इतना सा भेद भी अभेद-मूलक ही है | यह नक्षत्र यहाँ विद्यमान है, यहाँ पर इसका अभाव है, यह सब व्यवहार आकाश में ही कल्पित होता है । परमाणु के द्वारा पृथिव्यादि का भी आकाश ही आधार है । सिद्धस्वभाव वस्तु आकाश में रहती है और साध्य ( निर्माणाधीन ) स्वभाव वाली क्रिया के विषय को काल में स्थित रहती है । अन्य दार्शनिकों के मत से नभ ( आकाश ) जिसका अधिष्ठान है, ऐसा आहङ्कारिक धर्म विशेष ही श्रोत्र है । इसी तरह से पृथ्वी, जल, तेज और वायु की अधिष्ठानभूत अन्य इन्द्रियों भी आहंकारिक ही हैं । इसीलिये योगी जनों की इन्द्रियाँ अत्यन्त दूर देश स्थिति वस्तु का भी ग्रहण कर लेती है, यदि इनको पृथिवी प्रभूति का विकार माना जाय तो यह सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि उनकी गति दूर तक नहीं हो सकती हैं । बाहङ्कारिक अन्तःकरण बहुत दूर तक चला जाता है, यह बात अनुभवसिद्ध है । उसी तरह से इन्द्रियों को भी अहङ्कार के विकार मानने पर यह असम्भव नहीं है । इस तरह से श्रोत्र ही चित्त की वृत्ति के साथ अपनी वृत्ति परम्परा को मिलाकर व्यापक आकाश के रूप में शब्द की अभिव्यक्ति के स्थान पर रहता हुआ शब्द का ग्रहण करता है । अन्य दार्शनिकों का कहना है कि सभी प्रकार की शक्ति से संपन्न परमाणु सर्वत्र व्याप्त हैं, अतः तेज, आकाश आदि के परमाणुओं के विषय देश पर्यन्त उस उस इन्द्रिय की अपने अपने विषय के प्रति उन्मुखता होने पर उस उस इन्द्रिय के रूप में परिणत होने से उस उस देश में उस उस इन्द्रिय के विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । किन्तु उनके मन में भी शब्द की आकाशदेशा ही सिद्ध होती है । अनन्त श्रोत्र वृत्तियाँ और अनन्त परमाणुओं की कल्पना के बजाय कर्णशष्कुली रूप उपाधि वाले एक श्रोत्र की
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daruttaras ३ ९ ३ विभस्तत्तद्ददेशव्याप्यभिव्यक्तिमतश्च तेन ग्रहणमिति तत्तद्देशवर्तित्वानुभवोऽपि न विरुद्धयते । घटाकाशमहा-काशादिपाधिकं भेदमाश्रित्य जात्यादिव्यवहारोऽपि युक्त एव । अगृहीतसम्बन्धैरपि वर्णैः स्फोटव्यक्तिः, अत एवा-गृहीतार्थऽपि इदमेकं पदमित्यनुभवः । परे तुवर्णानां नित्यत्व विभुत्वैकत्ववत्तदवयवकपदादेरपि नित्यत्वादिकं मन्यन्ते । कण्ठतालवाद्यभिधा-तस्य च तद्व्यञ्जकत्वमेव । ननु कालभेदेन तद्वदितानुपूर्व्या भेदादानन्त्यादिकमेवेति चेन्न, देशभेदेऽपि पटादीना-मभेदस्येव कालभेदेऽपि तद्घटितानुपूर्व्या अभेदोपपत्तेः । यथा प्रयागवृत्तित्व वैशिष्ट्य े न दृष्टस्यैव शाटकस्य काशीवृत्तित्व-वैशिष्ट्येन दर्शनेऽपि तदेवेदं शाटकमिति प्रत्यभिज्ञानं जायते, तथैव कालभेदेऽपि आनुपूर्व्या अभेदो युज्यते, तदेवेद-मिन्द्रपदमिति प्रत्यभिज्ञादर्शनात् । तदुक्तं हरिणा -- ' प्रत्यक्षप्रत्यभिज्ञानाद् वर्णैकत्वं प्रतिष्ठितम् । वर्णात्मकं पदं तच्च तदभेदान्न भिद्यते ॥ ' इति । दिनान्तरानुभूतेऽधुनानुभूयमानस्य सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञया तावत्कालं स्थिरत्वे सिद्धे ' तावत्कालं स्थिर चैनं कः पश्चान्नाशयिष्यति ' इति न्यायादाशुविनाशित्वव्यतिरेके सिद्धे नित्यत्वपर्यवसानम् । सर्वदेशेषूपलम्भाद् विभुत्वं लाघवाच्चैकत्वम् । ननु चैवं नित्यत्वविभुत्वाम्यां कथं तदव्यवहितोत्तरक्षणोत्पत्तिकत्व-रूपानुपूर्वी सेत्स्यतीति चेश, उत्पत्त्यनवच्छिन्नस्वज्ञानाधिकरणकालोत्पत्तिकज्ञानविषयत्वस्यैवानुपूर्वपदार्थत्वात् । तथा चोत्पत्त्यनधिकरणीभूतो यो ' घ ' ज्ञानाधिकरणकालस्तत्कालोत्पत्तिकं यत् ' ट'ज्ञानं तद्विषयत्वम् । तादृशं चाव्यव-हितोत्तरत्वं दादी सुलभमेव । कल्पना में लाघव ही है । इस मत में शब्द एक और विभु माना जाता है तथा उसकी उस उस देश में अभिव्यक्ति मानी जाती है, अतः उस उस देश में उसकी स्थिति की अनुभूति अनुभवविरुद्ध नहीं मानी जा सकती । घटाकाश, महाकाश की तरह भोपाधिक भेद का आश्रय लेने पर इसमें जाति आदि के व्यवहार की भी उपपत्ति हो सकती है । संबन्ध के गृहीत न होने पर भी वणों से स्फोट की अभिव्यक्ति की तरह अर्थ के गृहीत न होने पर भी यह एक पद है, इस तरह का अनुभव होता है । अन्य विशिष्ट विचारकों का तो मत हैं कि वर्णों की नित्यता, विभुता ( व्यापकता ) और एकता की तरह वर्णं अवयव वाले पद, वाक्य आदि भी नित्य, व्यापक और एक हैं । कण्ठ, तालु आदि के अभिघात से वे केवल प्रकट होते हैं, पैदा नहीं । प्रश्न है कि जब काल के भेद से तद्घटित आनुपूर्वी का भी भेद है, तो इन शब्दों को अनन्त मानना ही ठीक है । उत्तर है कि देश का भेद रहने पर भी जैसे पटादि में भेद की प्रतीति नहीं मानी जाती, उसी तरह से काल का भेद होने पर भी तद्धति आनुपूर्वी में अभेद बुद्धि की उपपत्ति हो सकती है । जैसे प्रयाग में किसी विशिष्टता से युक्त देखी गई साड़ी काशी में भी उसी विशेषता से संयुक्त देखी जाती है और पहचानी जाती है कि यह वही साड़ी है, उसी तरह से काल के भेद के रहने पर भी आनुपूर्वी का अभेद युक्ति-संगत है । यह यही इन्द्र पद हैं, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा का स्पष्ट दर्शन होता है । जैसा कि भर्तृहरि ने कहा है ' प्रत्यक्ष प्रत्यभिज्ञा के आधार पर वर्ण की एकता सिद्ध होती है । पद भी वर्णात्मक ही है, अतः उससे अभिन्न होने से यह भी वर्ण की तरह एक ही है, भिन्न नहीं । ' कई दिनों पहले अनुभव आ चुकी वस्तु के फिर कई दिनों बाद अनुभव में आने पर यह वही है, इस seafar प्रत्यक्ष के बल पर इतने समय तक यदि स्थिरता सिद्ध हो गई तो फिर ' इतने समय तक स्थिर रूप में सिद्ध पदार्थ को बाद में कौन नष्ट कर सकता है ' इस न्याय के अनुसार क्षणमात्र में नष्ट हो जाने वाली वस्तुओं से भेद के सिद्ध हो जाने पर अन्त में उन्हें नित्य ही मानना पड़ेगा । सभी देशों में उपलब्धि होने से इसमें विभुता ( व्यापकता ) और लाघव के कारण एकता की भी सिद्धि हो जायगी । यहाँ पर शंका उठती है कि इस तरह से नित्यता और विभुता के रहते अव्यवहित उत्तर क्षण में उत्पन्न होने वाली आनुपूर्वी किस तरह से संभव हो सकेगी । इस शंका का समाधान यह है कि आनुपूर्वी पद का अर्थ केवल यह है कि वह अपनी उत्पत्ति से नवनि अपने ज्ञान के अधिकरणभूत काल में उत्पन्न ज्ञान का उसी क्रम से विषय होती हैं । जैसे कि उत्पत्ति जिसकी नहीं होती ऐसे ' घ ' के ज्ञान का अधिकरण ( आश्रय ) जो काल, उसी काल में उत्पन्न होने वाला जो ' ट ' का ज्ञान, वही उस आनुपूर्वी का विषय है । इस तरह की अव्यवहित उत्तरकालता ' ट ' आदि में सुलभ होती है । ५०
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बेधार्यपारिजातः ननु ज्ञानस्य तृतीयक्षणवृत्तिध्वस प्रतियोगित्वेन । नित्यत्वाद् ज्ञानानामानन्त्येतानु अप्यानन्त्यमेवेति स धारावाहिकज्ञानस्थले ज्ञानस्य दीर्घकालस्थाधित्ववद् आनुपूर्वीघटकवर्णविपयकज्ञानानामपि चरमवर्णज्ञानक्षण-पर्यन्तस्थायित्वाभ्युपगमेनादोषात् । न चैवमपि स्वविरोधिज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तमेव ज्ञानस्य स्थितत्वेनानित्यतया आनुपूर्व्याः पुनरप्यानन्त्यं प्रसक्तम् । ऊर्ध्वाधःस्थानभेदेऽपि संस्थानाभेदवद् ज्ञानस्याप्यानुपूर्वीभेदकत्वाभावात् । शब्दबुद्धि-कर्मणां क्षणिकत्वं तु नाभ्युपेयते । ननु योग्यविभुविशेषगुनानां स्वोत्तरोत्पन्न विशेषगुणनाश्यत्वमिति तार्किकमतरीत्या बुद्धिकर्मणां क्षणिकत्वमेवेति चेत्र, इदानीं जानामि, इदानीमुच्चारिता वर्णा इत्यादिव्यवहारस्य तेषां क्षणिकत्वेऽ-उपपत्तेः । क्षणस्यातांन्द्रियतया इदानीं ज्ञानासम्भवात् । यथा द्वित्वप्रत्यक्षानुरोधेनापेक्षाबुद्धेः क्षणत्रयावस्थायित्वं वैशेषिकैरभ्युपेयते तथैवोक्तव्यवहारानुरोधेन शब्दबुद्धयादोनां ततोऽप्यधिकक्षणस्थायित्वाभ्युपगमे दोषाभावात् । गवता समयेन चलितः परमाणुः पूर्वदेश जह्यादुत्तरदेशमुपसम्पद्येत स कालः क्षण इति पातञ्जलभाष्यम् । ' रवेः पद: क्षणस्तस्य नानाक्षणविशिष्टता । ऋमो नानाविधोपाधिसम्बन्धः परिकीर्तितः ॥ ' शब्दस्योत्पत्तिमत्वे भेदोत्पत्त्योः समनियतत्वेनोत्पत्तिसत्त्वं भेदस्यापि सत्त्वेन सोऽयं ककार इति प्रत्यभिज्ञा पपद्यते । न च प्रत्यभिज्ञायाः कत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदाभावो विषयः, द्वयोर्घटयोः सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञापत्तेः । व्यक्तिविषयकत्वे बाघाभावाच्च । न च ककार उत्पन्न इति प्रतीतिवधिः, श्यामो नष्टो रक्त उत्पन्न इति प्रतोते रूप-प्रश्न है कि ज्ञान तो पहले क्षण में पैदा होकर दूसरे क्षण में रहकर तीसरे में नष्ट हो जाता है, अतः वह अनित्य है, इस परिस्थिति में ज्ञान की अनन्तता के कारण उनकी आनुपूर्वी भी अनन्त ही माननी पड़ेगी । इसका उत्तर यह है कि धारावाहिक ज्ञान ज्ञान को जैसे दीर्घकालस्यायिता मानी जाती है, उसी तरह से आनुपूर्वी के घ ce afores ज्ञानों की भी चरम वर्णज्ञानक्षण पर्यन्त स्थायिता मानने पर उक्त आपत्ति का परिहार हो जायगा । ' इस तरह से भी अपने से विरोधी ज्ञान की उत्पत्ति तक ही ज्ञान की स्थिरता मानी जा सकती है, विरोधी ज्ञान की उत्पत्ति होने पर पूर्व ज्ञान के निवृत्त हो जाने से वह अनित्य ही माना जायगा और इस प्रकार पुनः आनुपूर्वी के आनन्त्य की आपत्ति उठ खड़ी होगी । ' इसका समाधान इस तरह से किया जाता है कि ऊपर और के आकार में भेद रहने पर जैसे संस्थान ( आकार ) में भेद नहीं माना जाता, उसी तरह से ज्ञान भी आनुपूर्वी का भेदक नहीं माना जाता | शब्द, बुद्धि ( ज्ञान ) और कर्म की क्षणिकता को हम नहीं मानते । प्रश्न है कि नैयायिक की पद्धति से योग्य से विभु विशेष गुण अपने बाद उत्पन्न होने वाले विशेष गुण के द्वारा नष्ट कर दिये जाते हैं, अतः शब्द, बुद्धि और क्रिया को णिकता ही माननी पड़ेगी । किन्तु यह set ठीक नहीं, क्योंकि मैं अभी जानता हूँ, मैंने अभी वर्णों का उच्चारण किया, इत्यादि यवहार उनको क्षणिक मानने पर संभव न हो सकेंगे, क्योंकि क्षण तो कालरूप होने से अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से नहीं जाना जाता ) है, उसका अभी इस रूप से कैसे ज्ञान हो सकता है? जैसे द्वित्व ( दो वस्तुओं का प्रत्यक्ष ज्ञान ) प्रत्यक्ष की उपपत्ति के लिये वैशेषिक अपेक्षा द्धि ( यह एक है, यह एक है, यह एक एक मिलकर दो है, इसको अपेक्षा बुद्धि कहते हैं ) को तीन क्षण तक स्थायी मान लेते हैं, इसी तरह से उक्त व्यवहारों की उपपत्ति के लिये शब्द, बुद्धि और कर्म की उससे भी अधिक क्षण तक स्थायी मानने में कोई दोष रहीं है । पातंजल महाभाष्य का कहना है कि जितने समय में परमाणु चलकर पूर्व देश को छोड़ दे और उसर देश को प्राप्त कर ने, उसका नाम ' क्षण ' है । अन्यत्र ' रवि का स्पन्द ( हलचल ) क्षण कहलाता है । वह नाना क्षणों से विशिष्ट होता है कार के क्रम बनते हैं । यह सब औपाधिक संबन्ध से होता है । ' और उससे नाना शब्द की यदि उत्पत्ति मानी जाय तो उत्पत्ति और भेद तो सदा साथ रहते हैं, अतः उनमें भेद भी मानना पड़ेगा । सी स्थिति में ' यह वही ककार है, यह वही कविता है ' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा कैसे बन सकती है? उक्त प्रत्यभिज्ञा का विषय af प्रतियोगिता वाले भेद के अभाव को माना जाय, तो दो घटों में भी यह वही घट है, यह प्रत्यभिज्ञा होने लगेगी । क्योंकि त्व से अवच्छिन्न प्रतियोगिता वाले भेद का तो वहाँ भी अभाव है ही । तात्पर्य यह है कि दो घड़े यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, किन्तु नमें रहने वाली घटत्व जाति तो एक ही है । इसलिये वहाँ दोनों में से किसी में भी घटत्वावच्छिन्न प्रतियोगिता वाला भेद नहीं है । तः उनमें एकता प्रतीत होने लगेगी और यह वही ककार है, इस प्रत्यभिज्ञा को कत्व जातिविषयक म मानकर ' क ' आदि व्यक्ति विषयक
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वेदार्थपारिजातः ३६५ गतोत्पत्तिविनाशारोपेण स्वाश्रयसमवायित्वसम्बन्धेन सत्त्वाद्वोपपत्तिवद्ध्वनिनिष्ठोत्पत्ते राक्षेपेण स्वाश्रयध्वनिव्यङ्ग्यत्व-रूपपरम्परासम्बन्धेनोपपत्तेः । न च वर्णोच्चारणस्थले ध्वन्यनुत्पत्तिरिति वाच्यम्, तत्तत्स्थाने जिह्वाया ईषदन्तरपाते वर्णानुपलब्धेर्ध्वन्युपलब्धेश्चानुभवेन हसितरुदितादी जिह्वाभिघातवायुकण्ठसंयोगादेस्तज्जनकत्वस्यावश्यकत्वेन वर्णोत्पत्ती न्युत्पत्त्यनङ्गीकारे प्रतिवध्यप्रतिबन्धकभावकल्पनागौरवेण तत्सत्त्वावश्यकत्वात् । अत एव बहुषु शब्दमुच्चारयत्सु महाध्वनिः श्रूयते । केचित्तु स एवायं शङ्खध्वनिरिति प्रत्यभिज्ञानुरोधेन ध्वनीनामपि नित्यत्वमुपयन्ति । तन्मते ध्वनिज्ञानकारणी-भूतवायुसंयोगनिष्ठमुत्पत्तिविनाशादिकं तत्रारोप्यते । अथवा वर्णे स्वाश्रयव्यङ्ग्यव्यङ्ग्यत्वरूप परम्परासम्बन्धेन ज्ञायते । शब्दं कुरु इत्यादिव्यवहारोऽपि तथैव । उच्चारयेत्येव तदर्थो वा । वस्तुतो लोहितः स्फटिक इतिवदत्राप्यारोप एव, रसो रूपवान् इत्याद्यप्रतीत्या परम्परासम्बन्धस्य विशिष्टबुद्ध चनियामकत्वात् । अत एवोदात्तादिकमपि तन्निष्ठमेव तत्रारोप्यते । तेन न तद्भेदादपि वर्णानां भेदः । प्रागनुपलभ्यमानत्वे सत्युपलभ्यमानत्वरूपेणोत्पन्नविनष्टसादृश्येन तत्रोत्पत्त्याचारोपः । प्रागसत्त्वे सति सत्त्वरूपाया उत्पत्तेर्वर्णेष्वननुभवात् । कण्ठतालवाद्यभिघातजन्याभिव्यक्तिमत्वमेव वर्णानामुच्चारितत्वम् । कण्ठताल्वादिभेदेनेव स्त्रीशुकादिभेदप्रतीतिः । तज्जन्यतावच्छेदकर्वजात्यं ध्वनिनिष्ठं वायु-संयोगनिष्ठं वा वर्णेष्वारोप्यते । तारत्वाद्यपि तन्निष्ठमेव | मानने में कोई बाधा भी नहीं हैं | ककार उत्पन्न हुआ, इस प्रतीति ( ज्ञान ) को उसमें बाधक नहीं मान सकते, क्योंकि जैसे श्याम घट नष्ट हो गया और रक्त घट उत्पन्न हो गया, इस प्रतीति की उपपत्ति रूपगत उत्पत्ति और विनाश का आरोप घट में कर की जाती है, अथवा स्वाश्रयसमवायित्व संबन्ध से उसमें उत्पत्ति और विनाश का आरोप कर की जाती है, उसी तरह से ध्वनि में विद्यमान उत्पत्ति का आरोप करके अथवा स्वाश्रय ध्वनि व्यंग्य रूप परम्परा संबन्ध से शब्दों में भी उत्पत्ति का आरोप मानना उचित हो सकता है । वर्ण के उच्चारण के स्थल में भी ध्वनि की उत्पत्ति नहीं होतो, ऐसा हम नहीं मान सकते, क्योंकि उस उस स्थान से जिल्हा के थोड़ा भी हट जाने पर वर्ण की उपलब्धि नहीं होती, तो भी ध्वनि की उपलब्धि होती है, यह बात अनुभव से सिद्ध है । हसित, रुदित आदि में जिह्वा का अभिषात, वायु और कष्ठ के संयोग आदि को ध्वनि का जनक मानना आवश्यक है । ऐसी परिस्थिति में वर्ण की उत्पत्ति के साथ की उत्पत्ति न मानने पर प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भाव की कल्पना करनी पड़ेगी और ऐसा करने में गौरव होगा | इस गौरव के परिहार के लिये वर्णोत्पत्ति स्थल में ध्वनि की सत्ता मान लेने में ही लाघव है । इसीलिये अनेक व्यक्तियों को एक साथ शब्द का उच्चारण करने पर महाध्वनि सुनाई पड़ती है । कुछ लोग यह वही शंख ध्वनि है, इस प्रत्यभिज्ञा के बल पर ध्वनि को भी free मानते हैं । उनके मत से ध्वनि ज्ञान के कारणीभूत वायु के संयोग में विद्यमान उत्पत्ति और विनाश का उसमें ( ध्वनि में ) आरोप किया जाता है, अथवा वर्ण में स्वाश्रय-व्यंग्यव्यंग्यत्वरूप परम्परा संबन्ध से उत्पत्ति और विनाश का ज्ञान होता है । अर्थात् वर्णों के आश्रय कण्ठ तालु आदि से व्यंग्य जो ध्वनि उनसे व्यंग्य इस परम्परा रूप संबन्ध से ज्ञान होता है । ' शब्द करो ' इस व्यवहार की उपपत्ति भी इसी तरह से हो जाती है, REET उसका अर्थ ' उच्चारण करो ' यह होता है । वस्तुतः स्फटिक में लोहित्य के आरोप की भांति यहाँ पर भी उत्पत्ति और विनाश के आरोप से हो व्यवहार चलता है । रस रूपवान् है, इस तरह की प्रतीति नहीं होतो, अतः परम्परा संबन्ध को विशिष्ट बुद्धि का नियामक नहीं माना जाता । इसीलिये ध्वनिनिष्ठ उदासत्व आदि का ही वर्णों में आरोप किया जाता है, अतः उदात्तत्वादि के भेद से भी वर्णों का भेद नहीं होता । पहले जो धर्म उपलब्ध नहीं होता वह बाद में उपलब्ध होता है, यही उसका उत्पत्ति और विनाश से सादृश्य है । वर्णों में तो वास्तव में उत्पत्ति faure नहीं होता, किन्तु उत्पत्ति के सदन पहले अनुपलब्धि और बाद में उपलब्धि रूप सादृश्य' से उनमें उत्पत्ति आदि का आरोप होता है । पहले जिसकी सत्ता नहीं हैं, किन्तु बाद में जो सत्ता में आता हो, इस तरह की उत्पत्ति वर्णों में उपलब्ध नहीं हो सकती । वर्णों के उच्चारण का तात्पर्य इतना ही है कि उनकी कण्ठ तालु आदि के अभिघात से aafvar क्ति होती है | कण्ठ तालु आदि के भेद से ही स्त्री, शुक आदि के उच्चारण में भेद की प्रतीति होती हैं । उन स्त्री - शुक आदि * कण्ठ वालु आदि से उत्पन्न ध्वनिनिष्ठ मथवा वायुसंयोगनिष्ठ वैजात्य ( जातिभेद ) ही वर्णों में आरोपित किया जाता है । तारत्वादि धर्म भी ध्वनिनिष्ठ ही होते हैं ।
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*** वेदार्थपारिजातः महाभाष्यकारस्तु शुक - सारिका नवनार्याद्युच्चारणव्यङ्ग्येषु तत्तदुच्चारितत्वानुमापकानि वैजात्यान्यपि वर्णनिष्ठानि विजातीयवायुसंयोगव्यङ्ग्यात्येव । तारत्वादिगुणाश्रयत्वेन शब्दस्य गुणत्वं विभुत्वे सत्याकाशाश्रितत्वेन गुणत्वं च उच्चनीचस्यानवस्थितत्वात् । तदेव कञ्चित्प्रत्युच्च र्भवति, कञ्चित्प्रति नीचेर्भवति । ननु वर्णस्य तारत्वादेश्च नित्यत्वे उदात्तत्वानुदात्तत्वयोविरोधो नोपपद्यत इति चेन्न येन वायुसंयोगेन यं प्रति तारत्वं व्यज्यते तं प्रति मन्दत्वा-व्यञ्जनमूलकस्य विरोधस्यो ।पत्तेः । उत्पत्तिवादिनां कण्ठाद्यभिघातोत्पन्नस्यैकस्यैव केनचित् मन्दत्वेन केनचित्तारत्वेन ग्रह किं बीजमिति चिन्त्यमेव । न च नित्यत्वे वायुसंयोगादेः ककारादिप्रत्यक्षत्वं कार्यतावच्छेदकमुत्पत्तिवादिनां कत्वादिकमेवेति लाघवमिति वाच्यम्, अनन्तप्रागभाव प्रध्वंसादिकल्पनापेक्षया तस्य लघुत्वात् । प्रत्यक्षत्वावच्छिन्न-विषयतया त्वस्यैव कार्यतावच्छेदकत्वाच्च । न चैवं घटाद्यपि नित्यं स्यात्, तत्रापि कपालसंयोगादिकं व्यञ्जकं भविष्यति, वर्णवदत्र तदग्रहविपरीतग्रह्येोरभावेनोत्पत्तिप्रतीतेः । अर्थाद् घड़े उत्पत्त्यग्रहस्य सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञया नित्यत्वग्रहस्य चाभावेन तदुत्पत्तेरभ्रमत्वमेव । कुलालव्यापारानन्तरमनुभूयमानस्य तद्व्यापारतः प्राग् अनुभूतेन घटेन नाभेदप्रत्यभिज्ञानम् । अत्र तु कण्ठताल्वादिव्यापारानन्तरमनुभूयमानस्य ततः प्रागनुभूतेनाभेदप्रत्यभिज्ञानमेवेति विशेषः । वैयाकरणानामपनिषदानां च नित्यत्वं सम्पाद्य कालोत्पत्तिकत्वं प्रलयकालनाश्यत्वं च उभयत्रोपाधि-परामर्शमन्तरेणाविभाव्यमानभेदत्वात् । विलक्षणानामपि शब्दस्पर्शादिसंविदा घटमठाकाशादिप्रतीतीनामेकविषयत्वं महाभाष्यकार के मत के अनुसार तो शुक - सारिका ( तोता - मैना ), नवयुवती इत्यादि के उच्चारणों से व्यंग्य होने वाले उच्चारणों को विजातीयता के अनुमापक धर्म वर्णनिष्ठ हो हैं, जो कि विजातीय वायु संयोग से व्यक्त होते हैं । इनके उच्च - नीच Transfer होने से ही तारत्वादि गुणों की आश्रयता के कारण अथवा विभुत्व के रहते भी आकाश के आश्रित रहने से शब्द को भी गुण ही माना जाता है । एक ही शब्द किसी के लिये ऊँचा और किसी के लिये धीमा हो जाता है । प्रश्न है कि वर्ण और तारत्वादि safe यदि नित्य है, तो उदास - अनुदात्त आदि में परस्पर विरोध की प्रतीत कैसे सम्भव होगी? उत्तर है कि जिस वायु संयोग से जिसमें तारत्व की अभिव्यक्ति होती है, उसमें मन्दस्व को अभिव्यक्ति न होने से परस्पर विरोध की प्रतीति सम्भव हो सकेगी । उत्पत्तिवादी के ही मत में यह विचारणीय प्रश्न उठ खड़ा होता है कि एक ही कण्ठ के अभिघात से उत्पन्न स्वर की किसी को मन्द रूप से और दूसरे को तार रूप ते प्रतीति ( ज्ञान ) किस कारण से होती है? ' वर्णों के नित्य मानने पर तो वायु संयोगादि को ककारादि के प्रत्यक्ष में कारण और ककार आदि के प्रत्यक्ष को कार्य मानना पड़ेगा । प्रत्यक्ष अनेक हैं. इसलिये गौरव होगा और उत्पत्तिवाद के मत में तो उत्पन्न होने वाले ' क - ख ' व्यक्ति को कार्य और merrara आदि एक जाति को उसका अवच्छेदक मानते में सापक होगा ' । किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि अनन्त वर्णों के अनन्त प्रागभाव और ra seer भावों की कल्पना की अपेक्षा उ est free मानने में हो लाघव है । फिर कार्यतावच्छेदक तो प्रत्यक्ष rafvan fa षय होने के कारण कत्व ही है | इस तरह से तो बाद भी नित्य हो जायेंगे, क्योंकि वहाँ पर भी कपाल संयोगादि की घढव्यंजकता मान ली जायगी? उत्तर है कि वर्णों की तरह यहाँ पर भी तदग्रह और विपरीतग्रह की प्रतीति नहीं होती, अतः घटादि की उत्पत्ति ही मानी जाती हैं । अर्थात् घट में उत्पत्ति कारण अथवा यह वही है, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा से नित्यत्व का ग्रहण नहीं होता । इसलिये घट की उत्पत्ति की प्रतीति भ्रमात्मक या किसी उपाधि से नहीं मानी जा सकती । कुलाल ( कुम्हार ) के व्यापार ( क्रिया ) के अनम्सर अनुभूयमान पदस्वरूप की उसके व्यापार से पहले विद्यमान घटस्वरूप से अभेद की प्रत्यभिज्ञा नहीं होती, अर्थात् ' यह वही है ' ऐसा अभेद ज्ञान नहीं होता । इसके विपरीत वर्णों के प्रसंग में कण्ठ तालु आदि के व्यापार के अनन्तर अनुसूयमान और इससे पहले प्रतीत हुए वर्णों के स्वरूप की ride प्रत्यभिज्ञा ( यह वही है, ऐसा ज्ञान ) होती है, यही दोनों में अन्तर है । वैयाकरणों और वेदान्तियों के मत में शब्द को इसके नाश की प्रतीति भी मानी जाती है । दोनों ही मतों में नित्य ही माता जावा, तो भो सृष्टिकाल में उत्पत्ति और प्रलयकाल में इसकी उपपत्ति उपाधि के परामर्श के बिना भेद की प्रतीति न होने के
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वेदार्थ पारिजातः दृश्यते, तेनैव संविदाकाशादीनामैक्यं सिद्ध्यति । प्रतिकरणभेदं भिन्नस्वभावत्वं न शब्दगतम्, किन्तु ध्वनीनामेव भिन्नस्वभावत्वप्रतीतिः । शब्दे त्वौपाधिकमेव स्वभावभेदमानम् । अत एवोच्चारणभेदेन ध्वनिभेदः प्रतीयते, न शब्दभेदः । अत एवोक्तमेव ' शिशौ पठति वृद्धे वा स्त्रीजने वा शुकेऽपि वा । वक्तृभेदं प्रपद्यन्ते न वर्णव्यक्तिभिन्नताम् || ' गर्गः पठति, शुकः पठतीत्यादर्श पठितृभेद एव प्रतीयते, न चामुं मन्त्रविशेषं पठतीति प्रतोतिः । ' एककर्तृप्रयोगेऽपि तस्यैवौच्चारणं पुनः । गङ्गा - गगन गर्गादौ न रूपान्तरदर्शनम् ॥ द्रुतादिभेदवोधोऽपि नादभेदनिबन्धनः । न व्यक्तिभेद-atisfy शाबलेयादिभेदवत् | ' द्रुतं श्लोकसूचं बोच्चारयति वक्तरि नाडिकाया नव पलानि स्रवन्ति, तस्या एव मध्यमायां वृत्तौ द्वादशपलानि स्रवन्ति, विलम्बितायां तु वृत्ती षोडश पलानि स्त्रवन्ति । भेरीमाहत्य तच्छन्दं शृण्वन् कश्चित् विशतिपदानि गच्छति, कश्चित् त्रिंशत्, कश्चिच्चत्वारिंशत्, स्फोटश्च तावान् भवति । ध्वनिकृतोपलब्धिकालवृद्धिः । तदुक्तं हरिणा-- ' वर्णानां ग्रहणे हेतुः प्राकृतो ध्वनिरिष्यते । वृत्तिभेदे निमित्तत्वं वैकृतः पुनरेष्यति ॥ ' इति । ' यदुक्तं क्षणिकत्वेन ध्वनीनामपर्वांगिणाम् । क्षणे तुरीयेऽसत्त्वाच्च प्रत्यभिज्ञा सुदुर्घटा ॥ तदयुक्तं यतो ज्ञान-ध्वन्यादिदीर्घकालता | विज्ञायते प्रमाणेन न ततस्तदपह्नवः । यतो ह्यपेक्षा बुद्धया या जायते द्वित्वधीः पुनः । सापि नैवोपपद्येत क्षणिकत्वेन हेतुना ॥ ' प्राकृतध्वनिवं कृतध्वनिभेदेन वैयाकरणः ध्वनिद्वैविध्यमुरीक्रियते । प्राकृतध्वनिना स्फोटाभिव्यक्त्यनन्तरं स्फोटमभिव्यज्य पुनः पुनरविच्छेदेन दीर्घकालमुपलभ्यमानो ध्वनिर्वैकृतः । तमेव स्फोटमयं द्रुतमुच्चारितवान् अयं बिल-आधार पर की जाती है । परस्पर विलक्षण भी शब्द, स्पर्श आदि के ज्ञान और घटाकाश, पटाकाश आदि के ज्ञान एकविषयक देखे जाते हैं । इसी से संवित् ( ज्ञान ) और आकाशादि की एकता सिद्ध होती है । करण के भेद से भिन्नता की प्रतीति शब्द का धर्म न होकर safe का धर्म है । शब्द में स्वभाव भेद की प्रतीति औपाधिक है । इसलिये उच्चारण का भेद होने पर ध्वनि में भेद की प्रतीति होती है, शब्द में नहीं । इसीलिये कहा गया है कि ' शिशु पढता हो या वृद्ध, कोई स्त्री पढ़ती हो या शुक, सर्वत्र वक्ता के भेद की हो प्रतीति होती है, वर्णव्यक्ति के भेद की प्रतीति नहीं ' । गर्ग पढता है, शुक पढता है, यहाँ पर पाठक के भेद की ही प्रतोति ज्ञात होती है, पढे जाने वाले मन्त्र के भेद का ज्ञान नहीं होता, प्रत्युत बच्चे का पढ़ा हुआ श्लोक हो तोता पढ़ता है, ऐसा अभेद ज्ञान हो होता है । ' गंगा, गगन, गर्ग आदि पदों में एक ही व्यक्ति के द्वारा उच्चारित गकारादि वर्णों में एक ही गकारादि व्यक्ति का उच्चारण होता है. इनमें स्वरूप भेद नहीं दिखाई देता । इनमें दुत - विलम्बित के रूप में जो भेदबोध होता है, वह भी नाद के भेद के कारण होता है, इसीलिये शाबलेयादि गो व्यक्ति की तरह वह वर्णव्यक्ति के भेद का बोधक नहीं हो सकता ' । कोई वक्ता किसी ऋना अथवा श्लोक का द्रुत वृत्ति से उच्चारण करता है तो उसमें सुषुम्ना नाडी के नौ पल ( बिन्दु ) खर्च होते हैं तो मध्यमा वृत्ति से उच्चारण करने पर बारह और विलम्बित वृति से उच्चारण करने में सोलह पल ( बिन्दु ) खर्च होते हैं । ढोल बजाकर उसके शब्द को सुनता हुआ कोई बीस डग भरता है, कोई तीस और कोई चालीस | स्फोट की स्थिति यद्यपि समान है तो भी ध्वनि के आधार पर उसकी उपलब्धि में कालवृद्धि हो जाती है । जैसा कि भर्तृहरि ने कहा है-- ' वणों के ग्रहण में प्राकृत ध्वनि सहायक माना जाता है और वृत्ति के भेद के ग्रहण में वैकृत ध्वनि सहायक माना जाता है ' यह कहा जाता है कि ध्वनियों क्षणिक होती हैं, अतः बीती हुई ध्वनियों की चतुर्थ क्षण में सत्ता न रहने से प्रत्यभिज्ञा नहीं बन सकेगी । किन्तु यह कथन इसलिये अयुक्त है कि ज्ञान, ध्वनि आदि की दीर्घकाल तक स्थिति प्रमाणों द्वारा जानी जाती है । see aaraat fo या जा सकता । क्योंकि ऐसा मानने पर इसी क्षणिकत्व हेतु के कारण द्वित्व बुद्धि के प्रति अपेक्षा बुद्धि की भी कारणता न बन सकेगी ' । वैयाकरण प्राकृत और वैकृत के भेद से दो तरह की ध्वनियाँ मानते हैं । प्राकृत ध्वनि से स्फोट की अभिव्यक्ति होती है । दीर्घ काल तक उपलब्ध होने वाली ध्वनि वैकृत कहलाती है । इसी ( शब्द ) का द्रुत उच्चारण किया और इसने विलम्बित । वृत्ति के स्फोट रूप शब्द की अभिव्यक्ति के बाद पुनः पुनः अविछिन रूप से चैत safe के आधार पर यह व्यवहार चलता है कि इसने स्फोट
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६६८ वेदार्थपारिजातः म्बितम् । वृत्तिभेदेऽपि स्फोटे भेदाभावः । वर्णमुच्चारयति वक्तरि ब्रह्माण्डसम्बद्धा सुषुम्ना नाडी अमृतबिन्दुस्रा विणी भव-तीति योगिप्रसिद्धिः । द्रुतमुच्चारणे पूर्वोक्तनाच्या नवबिन्दवः स्रवन्ति, मध्यमायां वृत्ती द्वादश, विलम्वितायां षोडश । शब्दनित्यत्वादेवानेककर्तृकोच्चारणविषयेऽप्येकमिदं घटपदमिति प्रत्ययः । ' एक इन्द्रशब्दोऽनेकेषु ऋतुष्वाविर्भवति ' इति सरूपसूत्रे भाष्यम् । न चेयमेकत्वबुद्धिर्वर्णविषया, तेषामनेकत्वात् । वनराश्याद्यपि वस्त्वन्तरमेव, नैयायिकादिमतेऽवयवातिरेकेणावयविनोऽङ्गीकारात् । तेन न तन्मते वर्णसमूहविषयैकत्वबुद्धिः । न चैकार्थधीहेतुत्वेन-त्वम् तेनैकत्वमेकत्वेन चैकार्थधीहेतुता इत्यन्योन्याश्रयापत्तेः । अर्थावबोधाभावेऽप्येकपदमित्य प्रसिद्धार्थपदश्रवणे दर्शनात् । एकबुद्धिविषयत्वेन पदेकत्वमित्यपि न युक्तम्, सर्वोच्चारणविषयेन्द्रशब्दानामेकज्ञानविषयत्वाभावात् । नाप्येकजातीयबुद्धिविषयत्वम्, विषयैक्ये बुद्धीनामेकजातीयत्वं तदेकजातीयत्वे विषयैक्यमिति परस्पराश्रयात् । किञ्च, एकः पट इति व्यवहारस्याप्येकबुद्धिविषयतन्तुसमूहेनैवोपपत्तौ तत्राप्यतिरिक्तावयव्यसिद्धिः । यदि तक इति व्यवहारात् तत्सिद्धिः तर्हि अत्रापि तथा समम् । एकस्येन्द्रशब्दस्य एकजातीय इति वार्थः, तत्कल्पनापेक्षया तदेकत्वस्यचित्यात् । अन्यथा घटत्वजात्यैक्येन दशसु घटेषु एको घट इति प्रतीत्यापत्तेः । एकजातीय इन्द्रशब्द इत्यव्यवहाराच्च । तच्च पदं प्रकृतिप्रत्ययविभागवत् । प्रकृत्यादिकमपि नित्यमेव, अथवाऽखण्डमेव । अन्यथा वर्णानामपि ऋकारादिषु रेफ - लकारेकारोकारादिविभागानामप्यनुभवसिद्धत्वात् । भागवत्त्वे भागानामिव सभागत्वे परमाणुतुल्यानामवशेषः स्यात् । तथा च घटादीनामवयवसमुदायरूपत्वे या दुरवस्था सेवात्रापि स्यात् । पदपदार्थ-भेद के रहते भी स्फोट ( शब्द ) में भेद नहीं होता । वक्ता जब वर्णों का उच्चारण करता है तो उस समय ब्रह्माण्ड से संबद्ध उसकी सुषुम्ना नाडी से अमृतबिन्दु का स्राव होने लगता है, यह बात योगिसम्प्रदाय में प्रसिद्ध है । द्रुत वृति से उच्चारण करने पर पूर्वोक्त नाडी से नौ बिन्दु after होते हैं, मध्यमा वृत्ति से बारह और विलम्बित वृत्ति से सोलह बिन्दु स्रवित होते हैं । शब्द की freear के कारण हो अनेक व्यक्तियों के द्वारा उच्चारित होने पर भी यह घट पद एक है, इस तरह की प्रतीति होती है । सरूप सूत्र के भाष्य में कहा गया है कि एक ही इन्द्र शब्द अनेक यज्ञों में आविर्भूत होता है । यह एक बुद्धि a farafat नहीं हो सकती, क्योंकि वे अनेक हैं । वन, राशि आदि भी वस्त्वन्तर हैं । नैयायिकों के मत में अवयवों से free raat की स्थिति मानी गई है । अत: उनके मत में वर्णसमूहात्मक एकत्व की प्रतीति नहीं हो सकती । एक अर्थ का ज्ञान कराने के कारण भी इनमें एक बुद्धि नहीं मानी जा सकती, क्योंकि उनमें एकार्थधहेतुता के कारण एकत्व का बोध होगा और एकत्व का बोध होते पर एकार्थधहेतुता होगी, इस तरह से यह अन्योन्याश्रय दोष होगा । अप्रसिद्ध अर्थ वाले पद के सुनने पर अर्थ की अवत न होने पर भी यह एक पद है, ऐसी प्रतीति हो जाती है, अतः यहाँ पर व्यभिचार भी है । एक बुद्धि का विषय होने से एक पद हो सो भी बात नहीं हो सकती, क्योंकि सर्वोच्चारण विषयक इन्द्र शब्द एक ज्ञान का विषय नहीं होता । एकजातीय बुद्धिविषयत्व भी एक नहीं हो सकता, क्योंकि विषय का ऐक्य होने पर बुद्धियों की एकजातीयता और बुद्धियों की एकजातीयता के आधार पर विषय का ऐक्य, इस तरह से यहाँ पर परस्पराश्रयता दोष विद्यमान है । दूसरा दोष यह आवेगा कि ऐसा मानने पर ' यह एक पट ( वस्त्र ) हैं ' इस तरह के व्यवहार की उपपत्ति भी एक बुद्धिविषयक तन्तु ( धागे ) समूह से ही हो सकेगी, तब अलग से अवयवों से free raat मानने की नैयायिक को क्या आवश्यकता है? यदि यहाँ पर यह एक है, इस व्यवहार के आधार पर अवयवी की सिद्धि करता है, तो यहाँ पर भी उसी पद्धति से एकत्व बुद्धि हो सकेगी । एक इन्द्र शब्द एकजातीय है, ऐसा अर्थ करने की अपेक्षा उसमें एक ea मान लेना ही ठीक है । अन्यथा घटव जाति की एकता के आधार पर बस घड़ों में एक पद की प्रीति को मापत्ति उठेगी । इन्द्र शब्द एकजातीय है, इस प्रकार का व्यवहार देखा भी नहीं गया है । यह पद प्रकृति और प्रत्यय में विभक्त है । ये भी नित्य ही हैं, अथवा अखण्ड हैं । अथवा वर्णों में भी विभाग पड़ जायगा, क्योंकि ऋकारादि वर्णों में रेफ, लकार, इकार, उकार प्रभृति विभाग अनुभव सिद्ध हैं । arts विभागों वाला पदार्थ जैसे अपने भागों के ऊपर निर्भर रहता है, उसी तरह से पद, वर्णादि के भी सभाग मानने पर वे भी परमाणुतुल्य अपने अवशेषों के अधीन स्थिति वाले हो जायेंगे । इस तरह से घटादि की अवयवसमुदायता मानने पर जो दुरवस्था
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वेदार्थपारिजातः २६६ व्यवहारभङ्गश्च सावयवत्वे नित्यताभङ्गश्च । वाक्यमपि पदविभागरहितमखण्डमेव । यदि तु वर्णेऽवयवानामभावेऽपि तत्तदुच्चारणविशेषव्यङ्ग्यतत्तद्वर्णसमाना कारक्रमिकव्वनिविशेषोपरागोपाविवशत् तदवभासः, तदा पदे वर्णावभासस्य वाक्ये पदावभासस्याप्येवमेवोपपत्तेः । स्फोटस्वरूपविचारः वर्णानां सामस्त्येन व्यस्ततया वा वाचकत्वं न सम्भवति, शब्दादुच्चारितादर्थावगतिश्च भवति, न चेयमकरणिका सम्भवति । तदस्याः कारणं स्फोट: कार्यानुमानेन परिशेषानुमानेनार्थापत्या वा सिद्धयति । स चैको freerat free एको निष्क्रमकः । ननु चेयमर्थप्रतीतिर्वर्णेषु भवत्सु भवन्ती तेष्वभवत्सु चाभवन्ती तानुत्सृज्य कथं स्फोटकार्यतामुपपाद-यतीति चेन्न तद्भावभावित्वस्यान्यथासिद्धत्वात् । स्फोटव्यञ्जकत्वेनार्थप्रतोतेर्वर्णानन्तर्यस्यान्यथासिद्धिः । वर्णाभिव्यक्तः स्फोटोऽर्थप्रतिपत्तिमादधाति वर्णेष्वपि तत्प्रतीतिहेतुत्वभ्रमः | अबाधिता सन्दिग्धपदबुद्धेः पदस्फोटस्तथाविधाया वाक्य-वुद्धेश्च वाक्यस्फोटः । यथा पदस्यावयवाः परमार्थतो न सन्ति तथैव वाक्यस्यावयवा अपि न सन्ति । अवयवकल्पनायां यथा वाक्यस्यावयवाः पदानि पदस्यावयवा वर्णा एवं वर्णानामप्यवयवैर्भाव्यम्, एवं तदवयवानामप्यवयवैर्भाव्यमित्यन-वस्व । यदि तु वर्णेऽवयवकल्पतातो विरम्यते तद्वाक्य एव कुतो न विरम्यते । एकघटनाकारा वाक्यार्थबुद्धिस्तथा-विधाद्वाक्यादेवोत्पत्तुमर्हति 2 वृद्धव्यवहारेऽपि वाक्यमेव प्रयुज्यते न पदम्, तस्य व्यवहारानङ्गत्वात् । अवयवप्रतिभासस्तु भ्रममात्रम् | अर्थोऽपि वाक्यस्यैक एव नरसिंहाकारः । जात्यन्तरं हि नरसिंहो न नरार्थो न सिंहार्थः । एवं पदार्थेभ्योऽन्य होती है, वही स्थिति वर्ण, पद आदि की भी होगी । सावयवता मानने से पद - पदार्थ आदि के व्यवहार के लोप के साथ नित्यता का भी क्षति हो जायगी । वाक्य भी पद के विभाग से रहित बखण्ड ही है । वर्णों में अवयवों के अभाव के रहने पर भी यदि उस उस उच्चारण की विशेषता के आधार पर अभिव्यक्त उस उस वर्ण की समानाकार क्रमिक ध्वति को विशेषता रूप उपाधि से उपरक होने से उनमें अवयवों का अवभास मान लिया जाता है, तो उसी पद्धति से पद में वर्णावभास ( वर्णों का भेद ज्ञान ) की और वाक्य में पदावभास ( पदों का भेद ज्ञान ) की प्रतीति भी उपपन्न हो सकती है । स्फोट के स्वरूप पर विचार वर्ण समस्त रूप से अथवा व्यस्त रूप से वाचक नहीं हो सकते, किन्तु शब्द के सच्चारण के बाद अर्थ की अवगति होती है । यह बिना कारण के नहीं हो सकती । इस अर्थावगति का कारण स्फोट है, यह बात कार्यानुमिति से, परिशेषानुमान से अथवा अर्थापत्ति प्रमाण से सिद्ध होती है । यह स्फोट एक, निरवयव, नित्य और क्रमरहित है । है कि यह अर्थप्रतीत वर्णों के रहने से होती है और न रहने से नहीं होती, तो इन वर्णों को छोड़कर अर्थप्रतीति रूप कार्य से स्फोट का अनुमान आप कैसे करते हैं? उत्तर है कि वावभाविता के कारण वर्णों की अर्थप्रतीटिजनकता अन्यथासिद्ध है । अर्थप्रतीति स्फोट की व्यंजक है । इसमें वर्णों का आनन्तर्य अन्यथासिद्ध है । वर्णों से अभिव्यक्त स्फोट अर्थप्रतीति कराता है, इसलिये वर्णों में भी अर्थप्रतीति की हेतुता का भ्रम होता है । अबाधित असन्दिग्ध पदबुद्धि से पदस्फोट और इसी तरह की वाक्य बुद्धि से वाक्यस्फोट होता है । जैसे परमार्थतः पद के अवयव नहीं है, उसी तरह से वाक्य के भी अवयव नहीं होते । अवत्र की कल्पना करने पर जैसे वाक्य के अवयव पद और पद के Hars वर्ण हैं, उसी तरह से वर्णों के भी rara मानने पड़ेंगे । इसी तरह से उनके अवयवों के भी अवयव मानने पर अनवस्था होगी । यदि वर्णों में अवयय कल्पना का विराम मान लिया जाता है तो वह विराम art में ही क्यों नहीं मान लिया जाता । एक अनुस्यूत घटना के रूप में वाक्यार्थ बुद्धि इस प्रकार के वाक्य से ही हो सकती है । वृद्ध व्यवहार में भी वाक्य ही प्रयुक्त होते हैं, पद नहीं; क्योंकि पद व्यवहार के अंग नहीं होते । इनमें अवयव की प्रतीति भ्रममात्र है | अर्थ भी वाक्य का एक ही तरह का नृसिंह सदृश आकृति वाला होता है । नरसिंह एक भित्र ही जाति है, जो कि न तो मनुष्य है
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asa वेदार्थपारिजातः एव वाक्यार्थः, पानकादिवत् । यथा पानकं शर्करानागकेसरमरीच्यादिभ्योऽर्थान्तरम्, यथा वा सिन्दूरहरिताललाक्षा-दिभ्योऽर्थान्तरं चित्रम् । प्रकृतिप्रत्ययांशवादसत्पदार्थपरिकल्पनं वाक्यार्थोपममोपायतयाश्रीयते, न त्वर्थस्तदीयः । असत्यमपि सत्योपायतां प्रतिपद्यमानं दृश्यते । अलीका दंशादयः सत्यमरणकारणं भवन्ति, लिप्यक्षराणि चासत्यान्यपि सत्यार्थमादति । अपि च, पारमार्थिकत्वे नियतमसंवादिरूपं प्रतीयते, विसंवादि तु नामाख्यातसाधारणवर्णसन्निवेश-दर्शनान्न नियतं तेषां रूपम्, अतः काल्पनिकमेव तत्, न वास्तवम् । कालेन दन्तिनागा इत्यत्र कीदृशः पदविभाग इति न निश्चीयते, अर्थद्वयोपपत्तेः । किं कालेन कृष्णेन दन्तिना अगास्त्वम्, अथवा काले समये नदन्ति नागाः करिणः फणिनः । तस्मादनियमान पदतदर्थविभागः । ननु यथा पदेषु वर्णा न सन्ति वाक्येषु पदानि न सन्ति तथैव महावाक्येष्ववान्तरवाक्यानि न सन्ति प्रकरणापेक्षा तान्यपि न सन्ति शास्त्रापेक्षया प्रकरणान्यपि न सन्ति ततोऽविभागमेकमेवाद्वयमापतति । उच्यते-परमार्थतस्तु शब्दब्रह्मैवेदमद्वयमनाद्यविद्यावासनोपप्लवमानभेदं विवर्तते । न तु तद्विभक्तं वाच्यमपि किञ्चिदस्ति । faadaar काल्पनिक एव वाच्यवाचक विभागोऽभिधीयते । तदुक्तम्- ' वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती । न प्रकाशः प्रकाशत सा हि प्रत्यवमशिनी ॥ ' अवबोधस्य वाग्रूपता चेदपगच्छेत् तदा प्रकाशो न प्रकाशेत ' न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते । परापश्यत्तीमध्यमावैखरीभेदेन तदेव व्यवस्थितम् । और न सिंह हो । इसी तरह से वाक्यार्थ भी पदार्थों से भिन्न ही है, जैसे कि पानक होता है । जैसे पानक ( शर्बत ) शर्करा, नागकेसर, भरीच आदि सबसे भिन्न स्वाद का होता है अथवा सिन्दूर, हरताल, लाक्षा आदि सबसे भिन्न चित्र वर्ण रहता है, यद्यपि ये सब बनते हैं उन्हीं पदार्थों से । अंश में जैसे असत् अर्थ की कल्पना की जाती है, वैसे ही पदार्थ में भी यह कल्पना वाक्यार्थ को जानने के लिये उपाय के रूप में की जाती है । वास्तव में पद, प्रत्यय, प्रकृति आदि का कोई अर्थ नहीं हैं । सत्य तक पहुँचने के लिये असत्य का भी सहारा दिया जाता है । मिथ्या सर्पदंश भी सत्य मृत्यु का कारण कभी - कभी हो जाता है । लिपि के अक्षर असत्य हैं, तो भी उनसे सत्य अर्थ की प्रतीति होती है । अपि च, यदि यह पारमार्थिक है तो उसकी नियमतः अविसंवादी रूप से प्रतीति होनी चाहिये । किन्तु यह तो विसंवादी है, क्योंकि नाम और ख्यात में ( शब्द और धातु में ) समान वर्णों का संनिवेश देखा जाता है, अतः इनका रूप नियत न होकर काल्पनिक ही है, वास्तविक नहीं | ' कालेन दन्तिनागाः ' यहाँ पर कैसा पद विभाग है, इसका निश्चय नहीं हो पाता, क्योंकि यहां पर दो तरह के अर्थों की प्रतीति होती है कि कालेन अर्थात् कृष्ण वर्ण के हाथी से तुम गये अथवा ( काले नदन्ति नागाः ) समय पर नाम अर्थात् हाथी अथवा सर्प नाद करते हैं ( चिंघाड़ते हैं, या फुंफकारते हैं ) । यतः ऐसे स्थलों पर पदार्थ की संदिग्धता के कारण उसकी नियतोपस्थिति न होने से पद और पदार्थ का विभाग अवास्तविक है । प्रश्न है कि जैसे पदों में वर्ण नहीं है और वाक्यों में पद नहीं है, उसी तरह से महावाक्यों में अवान्तर वाक्य भी नहीं रहेंगे और प्रकरण की अपेक्षा से महावाक्य और शास्त्र की अपेक्षा से प्रकरण की कोई स्थिति नहीं रहेगी । ऐसी स्थिति में अविभागात्मक एक भद्रय तत्व ही बच रहेगा । इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है कि परमार्थतः अद्वय, अनादि एक शब्दब्रह्म ही अविद्या की वासना से उपत होकर नाना रूपों में बदल जाता है । इससे भिन्न किसी वाच्य की अलग से कोई स्थिति नहीं है । शब्दब्रह्म ही वाच्यवाचक रूप में बदल जाता है, अतः यह बाच्यवाचक विभाग काल्पनिक ही माना जाता है । जैसा कि कहा गया है-- ' इस संसार से यदि बाणी का उत्क्रमण हो जाय, जो कि ज्ञान का शाश्वत स्रोत हैं, तो प्रकाश भी प्रकाशित न हो सकेगा, क्योंकि प्रत्येक वस्तु का परामर्श वाणी से ही होता है । ' ज्ञान में से यदि वानूपता निकल जाय तो प्रकाश भी प्रकाशित न हो सकेगा । ' लोक में ऐसा कोई ज्ञान नहीं है, at fa fear शब्द के अनुगम के हो सकता हो । सम्पूर्ण ज्ञान शब्द से अनुविद्ध होकर ही भासित होता है । ' यह शब्द ही परा, पश्यन्ती, मध्यम और वैखरी के भेद से विभक्त होता है । स्थान, करण, प्रयत्न के क्रम से जिसका आकार अभिव्यक्त होता है, ऐसी वर्ण