वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 431–440

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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वैदार्थ पारिजातः ४० है स्थानकरणप्रयत्नक्रमव्यज्यमानाका स्वर्णसमुदायात्मिका या वाक् सा वैखरी । विखरो देहेन्द्रियादिसंघातस्तत्र भवा वैखरी । ' स्थानेषु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा । वैखरी वाक् प्रयोक्तॄणां प्राणवृत्तिनिबन्धना ॥ ' याऽन्तः सङ्कल्प्य -मानक्रमवती श्रोत्रग्राह्यवर्णरूपा अभिव्यक्तिरहिता वाक् सा मध्यमा । ' केवलं बुद्धधपादाना क्रमरूपानुपातिनी । प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते ॥ ' या तु ग्राह्यभेदक्रमादिरहिता स्वप्रकाशसंविद्रूपा वाक् सा पश्यन्ती । ' अविभागात्त पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा । स्वरूपज्योतिरेवान्तः सुक्ष्मा वागनपायिनी ॥ ' योगिगस्य विभागवती पश्यन्ती अविभागसंविद्रूपा परा वागित्युच्यते । तस्माल्लोके वर्णपदपूर्वकव्यवहाराभावाद् वाक्यप्रयोगपूर्वकव्यवहार दर्शनाच्च तस्य चावयवावयविव्यवस्थानुपपत्तेर्निविभागमेतद्वाचकम्, तस्य च वाच्योऽर्थः । एतेन पूर्वोक्ता धर्मकीर्तिसमुत्थापिता दुस्तर्काः पराहताः । अविद्यादशायां वर्णपदादिविभागसत्त्वेऽपि विद्यादशायां तदपोदनात् । एकं वाक्यमेकं पदमित्यबाधितासन्दिग्धदृढप्रतीतेरेव स्फोटे मानत्वात् । स्फुटयते व्यज्यते वर्णावयवैर्वर्णैः पदैरवान्तरवाक्यैरिति वा स्फोट इति व्युत्पत्त्या वर्ण - पद- वाक्य - स्फोटाः सिद्धयन्ति । स्फुटत्यर्थो -S स्मादिति वा पदार्थवाक्यार्थव्यञ्जकत्वेन पदवाक्यस्फोटा: सिद्ध्यन्ति । ननु चैकत्वानेकत्वयोरयोग उक्त इति चेन्त्र, गजपदातितुरगा इति सेना इति च धवखदिरपलाशा इति वनमिति चैकत्वानेकत्वव्यवहारस्य भूयो दर्शनात् । एव पदपदार्थयोरुभयोरपि सत्त्वे तदाश्रितः सम्बन्धोऽप्योत्पत्तिक एव । अत एवाश्रयणीयस्यायोगादेवमनाश्रितः स्यात् । तथा चासम्बन्ध इत्याद्यपास्तम्, आश्रयणीयस्य साधितत्वात् । समुदायात्मक वाणी वैखरी कहलाती है । देह, इन्द्रिय आदि के संघात की विखर कहते हैं । इसमें उत्पन्न होने से यह वैखरी कही जाती है - ' विभिन्न स्थानों में वायु के टकराव से वर्णादि का परिवर्तित रूप धारण करने पर प्रयोक्ता की प्राणवृत्ति के प्रयत्न से वैखरी वाणी अभिव्यक्त होती है । ' अन्तःकरण में संकल्प के सहारे जिसके क्रम की अभिव्यक्ति होती है और जिसके वर्णों की निजी श्रोत्रेन्द्रिय से प्रतीति की जा सकती है, जिसका स्वरूप अभिव्यक्त नहीं होता, उसको मध्यमा वाणी कहते हैं केवल बुद्धि के उपादान से ही जिसमें क्रमरूपता का आभास होता है, वह मध्यमा वाक् प्राणवृत्ति से ऊपर विद्यमान रहती है । ' जो वाणी ग्राह्म भेद से और क्रमभेद से रहित हो केवल स्वयंप्रकाश संविद्रूप है, उसको पश्यन्ती कहते हैं- पश्यन्ती में किसी भी विभाग की स्थिति न रहने से, सब तरह से सभी प्रकार के क्रमों को अपने में समेट कर अन्दर स्वयं सतत प्रकाशित हो रही यही सूक्ष्म वाणी पश्यन्ती कहलाती है । ' पश्यन्ती वाणी में भी योगिजन विभाग का दर्शन कर सकते हैं, किन्तु परा वाणी अविभाग संविद्रूप होती है । इसलिये लोक में वर्ण - पद पूर्वक व्यवहार नहीं होता, केवल वाक्य का प्रयोग करके ही सारा व्यवहार चलाया जाता है तथा वाक्य में अवयव और aarat की व्यवस्था नहीं हो पाती, अतः वाक्य निर्विभागावस्था में ही वाचक माना जाता है और अर्थ इसका वाच्य होता है । ऐसा मानने से धर्म के द्वारा उठायी गयी पूर्व वर्णित सभी गलत युक्तियों का समाधान हो जाता है | अविद्या दशा ( अज्ञान ) में वर्ण - पद आदि का विभाग रहते हुए भी विद्या ( ज्ञान ) दशा में यह सब नष्ट हो जाता है । एक वाक्य है, एक पद हैं, इस तरह की अबाधित असंदिग्ध दृढ प्रतीति ही स्फोट में प्रमाण है । वर्णों के अवयवों से, वर्णों से, पदों से अथवा अवान्तर वाक्यों से जो स्फुट होता है, अर्थात् व्यक्त ( प्रकट ) होता है, उसे स्फोट कहते हैं । इसी व्युत्पत्ति से वर्णस्फोट, पदस्फोट, वाक्यस्फोट सिद्ध होते हैं । reat अर्थ जिनसे स्फुट होता है, वह भी स्फोट है । इस व्युत्पत्ति से भी अपने अर्थों के व्यंजक होने से पदस्फोट और वाक्यस्फोट की सिद्धि होती है । प्रश्न है कि पहले हम कह चुके हैं कि एकत्व और अनेकत्व को एक साथ स्थिति नहीं रह सकती । इस प्रश्न का उत्तर भी पहले ही दिया जा चुका है कि गण, पदाति ( पैदल ) और तुरंग ( घोड़ा ) के रूप में अनेकता की और सेता के रूप में एकता की प्रतीति होती है । इसी तरह से धव, खदिर और पलाश के रूप में अनेकता की और वन के रूप में एकता की प्रतीति संसार में खूब होती हैं । इसी तरह से अन्य अनेक वस्तुओं में एकत्व और अनेकत्व का एक साथ व्यवहार प्रायः देखा जाता है । इस तरह से पद और पदार्थ दोनों की सत्ता रहने से तदाश्रित सम्बन्ध भी स्वाभाविक ही माना जायगा । इसीलिये आश्रयणीय के न होने से यह अनाश्रित ही रहेगा तब उसका सम्बन्ध किस प्रकार बनेगा, इस शङ्का का भी समाधान हो जाता है, क्योंकि आश्रयणीय की सिद्धि की जा चुकी है ।

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४० ९ वैवार्थपारिजातः यदयुक्तम्- ' तदभिप्रायस्य प्रयोगादुत्पन्नोऽभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादनाव्यभिचारीति शब्दस्यार्थप्रतिपादना-frare कार्यत्वम् । एवं पौरुषेय एव शब्दार्थयोः सम्बन्धस्ततोऽौरुषेयत्वकल्पना व्यर्थैवेति, तदप्यविचारितरमणीयम्, अमुकस्यार्थस्य प्रतिपादनायामुकः शब्दः प्रयोक्तव्य इति वृद्धव्यवहारादिभिः शिक्षित्वैव तथा प्रयोगात् । अशिक्षितस्य तथाऽदर्शनात् । शिक्षणं चौत्पत्तिकस्यैवाञ्जस्येनाच कल्पते । ईश्वरकर्तृकस्तदुपदेश एव युक्तः । यदप्युक्तम्- ' अपौरुषेयता पोष्टा कर्तृ णामस्मृतेः किल । सन्त्यस्याप्यनुवक्तार इति धिग्व्यापकं तमः ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२४० ) | सौगता मस्त्राणां कर्तुं नष्टकवामदेव विश्वामित्रादीन् स्मरन्ति । काणादाश्च हिरण्यगर्भ स्मरन्ति, तदपि कुशकाशावलम्बनम्, तथात्वे विप्रतिपत्त्यनापत्तेः । सौगतकाणादानां कर्तृविशेषविषये वैमत्यं न भवेद्यदि निश्चितः fararia वेदानामपि कर्ता स्यात् । वेदा अपि क्वचिदीश्वरं क्वचित् प्रजापति क्वचिद्धिरण्यगर्भ क्वचिदग्म्यादीन् कर्तृ नामनन्तीव । तत्र सम्प्रदायप्रवर्तकत्वमेव कर्तृत्वमिति स्पष्टमेव । ' यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्व प्रहिणोति तस्मै । ' इति मन्त्रेण ब्रह्मनिर्मात्रापि वेदा न निर्मीयन्ते, किन्तु नित्यसिद्धा एव वेदा ब्रह्मणो हृदि प्रहीयन्ते ( प्रेष्यन्ते ) । तत एव ब्रह्माणं विदधाति, वेदात् प्रहिणोत्येव न विदधाति । तदेवमवश्यस्मर्तव्यत्वे सति कर्तुरस्मरणादपौरुषेयत्वमेवायाति । सौगतास्तु पौरुषेयत्वेन बौद्धाद्यागमसाधारण्यख्यापनाय वेदानामपि कर्तृन् मिथ्यैव स्मरन्ति । काणादास्तु वाक्यत्वहेतुना विश्वस्रष्टारं हिरण्यगर्भमेव कर्तारमनुमिन्वन्ति । तत्र चास्मर्यमाणकर्तृस्वमुपाधिः । वेदों को अपौरुषेयता कहा गया है कि - ' वक्ता के अभिप्राय के अनुसार शब्द का प्रयोग होता है, उससे उत्पन्न अर्थात् अभिव्यक्त होने के कारण यह अर्थ के प्रतिपादन में कभी व्यभिचरित नहीं हो सकता, अतः इसका यह अभिप्राय हुआ कि शब्द का प्रयोग बक्ता की इच्छा के अनुसार अर्थ के प्रतिपादन के लिये किया जाता है । इस तरह से शब्दार्थ का सम्बन्ध पौरुषेय ही है, तब अपौरुषेयत्व की कल्पना व्यर्थ है ' | किन्तु यह उक्ति भी अविचारित रमणीय है । अमुक अर्थ के प्रतिपादन के लिये अमुक शब्द का प्रयोग करना चाहिये, वृद्ध व्यवहार आदि से इसको समझ करके ही इस प्रकार का प्रयोग होता है । अशिक्षित व्यक्ति अपने अभिप्राय को ठीक से नहीं व्यक्त कर पाता । शिक्षा उसी अवस्था में सरलता से प्राप्त की जा सकती है, जब कि शब्दार्थ सम्बन्ध को स्वाभाविक माना जाय । यह तभी हो सकता है, जब कि इस स्वाभाविक सम्बन्ध का उपदेष्टा ईश्वर को माना जाय । यह भी कहा गया है कि- ' वेदों की अपौरुषेयता इसलिये मानी जाती है कि उसका कोई कर्ता हमारी स्मृति में नहीं है, किन्तु यह कथन अयुक्त हैं, क्योंकि वेदों के कर्ता को बताने वाले अभी विद्यमान हैं, ऐसी परिस्थिति में भी वेदों के कर्ता की स्मृति न मानना एक व्यापक अज्ञान के सिवाय क्या कहा जा सकता है । इसका अभिप्राय यह है कि बौद्ध अष्टक, वामदेव, विश्वामित्र प्रभृति को वेदों का कर्ता बताते हैं और कणाद दर्शन के अनुयायी हिरण्यगर्भ को वेदों का कर्ता बताते हैं । यह बात कुश - काश का सहारा लेने के समान है, क्योंकि यदि ऐसी बात होती तो इस विषय में परस्पर विप्रतिपत्ति ( मतभेद ) नहीं होनी चाहिये थी । यदि ata ग्रन्थों की तरह वेदों का भी कोई कर्ता होता वो सोगत ( बौद्ध ) और काणादों ( वैशेषिक ) में परस्पर इसके विषय में मतभेद नहीं होना चाहिये था | अर्थात् जैसे बौद्ध शास्त्रों के कर्ता निश्चित हैं, अतः उनमें मतभेद नहीं, ऐसे ही यदि वेदों का भी कर्ता कोई निश्चित हो तो उसमें मतभेद न होना चाहिये था । वेद स्वयं भी कहीं ईश्वर को, कहीं प्रजापति को, कहीं हिरण्यगर्भ और कहीं अग्नि प्रभूति को वेदों के कर्ता के रूप में मानते हैं । इन सब स्थलों में कर्तृत्व का अर्थ केवल सम्प्रदाय प्रवर्तकत्व है, यह बात स्पष्ट है । ' जो पहले ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और बाद में उसको वेदों का उपदेश देता है ' इस मन्त्र से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा को उत्पन्न करने वाला भी वेदों का निर्माण नहीं करता, किन्तु नित्यसिद्ध वेदों का ही वह ब्रह्मा के हृदय में संचार करा देता है । इसीलिये यहाँ पर ब्रह्मा के लिये farara ( बनाता है ) क्रिया का और वेदों के लिये प्रहिणोति ( भेजता है ) क्रिया का प्रयोग किया गया है । इस तरह से जिसका स्मरण अवश्य रहना चाहिये, उसकी स्मृति न रहने से वेदों को अपौरुषेय ही मानना पड़ेगा । सोगत ( बौद्ध ) तो बौद्धागमों की तरह वेदों की भी साधारण स्थिति बताने की गरज से झूठ - मूठ ही वेदों के कर्ता की स्मृति मानते हैं । वैशेषिक भी वाक्यत्व रूप हेतु से free ष्ट हिरण्यगर्भ को ही वेदों का भी कर्ता मान लेते हैं, किन्तु उनके हेतु में स्मर्यमाणकर्तृत्व रूप उपाधि के रहने से वह सद्धेतु नहीं

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वेदार्थपारिजातः ४०२ ननु चैवं कुमारसम्भवादिष्वात्मानमन्यं वा कर्तारं व्यपदिशन्तः कालिदासादयोऽपि मिथ्यावादित्वेन प्रतिक्षेप्तुं शक्या इति कस्यापि पौरुषेयत्वं न स्यात्तथा चाभ्युपगमबाधः । यदि कुमारसम्भवादी पौरुषेयत्वमिष्टं तदा वेदेऽपि कथं न तदिष्यते । न च वेदेऽपौरुषेयत्वमिष्टमिति वाच्यम्, आगमोपादाननिमित्ताया परीक्षायाः प्रागपौरुषेयो वेद इति कुत इष्टिः । वेदस्या क पौरुषेयत्वे कर्तुरस्मरणं प्रमाणमुक्तम्, तत्र चोक्तो दोष इति चेन्न, कुमारसम्भवादी सकर्तृकत्वे विप्रतिपत्त्यभावात् प्रकृते च तत्सत्त्वाद्वेषम्यसिद्धेः । अत एव प्रमीयमाणकर्तृत्वेन कुमारसम्भवादी पौरुषेयत्वम्, वेदे त्वप्रमीयमाणकर्तृकत्वेना-विच्छिनपारम्पर्येण वाऽपौरुषेयत्वम् । लोके यथा वितथावितथवादिनां विवेको भवति नहि वितथवादिदृष्टान्तेनावितथ-बादिनोऽपि वितथवादिनो भवेयुः । कुमारसम्भवादी ग्रन्थे कर्तुर्नामोल्लेखेन तच्छिष्यादिपारम्पर्येणाविप्रतिपत्त्या च कालिदासादीनां कर्तृत्वं सिद्धयति । वेदे कर्तृ नामोल्लेखाभावात्, पारम्पर्येण चाविप्रतिपत्त्या कर्तुरस्मणात्, ' वाचा विरूपनित्यया ' इति नित्यत्वश्रवणाच्चापौरुषेयत्वम् । किञ्च, कुमारसम्भवादीनां सकर्तृकत्वे न कश्चिदपि विप्रतिपद्यते । वेदानां सकतु कत्वे तु बुद्धात्प्राचामपि विरोधः । वेद एव तन्नित्यत्वघोषः । ब्रह्मविधात्रापि तदनिर्माणमुक्तम् । मनुः पुराणञ्च वेदवाचमनादिनिधनां वक्ति-' अनादिनिधनानित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ' इति । व्यासोऽपि ' अत एव च नित्यत्वम् ' इति वेदस्य नित्यत्वमभिप्रेति । भगवद्गीतायाञ्च छन्दोवितवेदविशिष्टसंसारवृक्षस्याव्ययत्वमुक्तम् । नैवं कुमारसम्भवादिसम्बन्धे वक्तुं शक्यत विषमोपन्यासः । कुतोऽस्येयमिष्टिरप्रामाणिका स्यात् । यत्किञ्चिन्नहि सिद्धं सत्साधनमपेक्षते, येन पौरुषेयत्वापौरुषेयत्व-चिन्तयात्मानं दुःखयतीत्यादि सर्वमत्र धर्मकीर्तेरस्थाने प्रलापः । उक्तरीत्याऽपौरुषेयत्वस्य प्रामाणिकत्वात् । रहता । यहाँ पर प्रश्न उठाया जाता है कि इस तरह से तो कुमारसम्भव प्रभृति ग्रन्थों का जो अपने को या अन्य किसी को कर्ता बताते हैं, उन कालिदास प्रभृति को भी मिथ्यावादी कहना पड़ेगा, इस तरह से तो किसी की ग्रंथ की पौरुषेयता सिद्ध न हो सकेगी, जो कि स्वीकृत सिद्धान्त के विरुद्ध बात होगी । यदि कुमारसम्भव प्रभृति ग्रंथों की पौरुषेयता इष्ट है तो वह वेदों में क्यों नहीं मानी जाती । वेदों को अपौरुषेयता हो इष्ट है, यह बात तब तक नहीं ठीक मानी जा सकती, जब तक कि आगम आदि के सहारे इसकी ठीक से परीक्षा नहीं कर ली जाती । वेद की अपौरुषेयता में कर्ता की अस्मृति को प्रमाण माना जाता है और इसमें उक्त दोष विद्यमान है | इसका उत्तर यह है कि कुमारसंभव आदि के कर्ता में किसी को भी किसी प्रकार की विप्रतिपति ( मतभेद ) नहीं है, किन्तु वेदों के कर्ता के विषय में वह है, अत: इन दोनों में अन्तर है । इसीलिये कर्ता का ज्ञान होने से कुमारसंभव आदि की पौरुषेयता और कर्ता का ज्ञान न होने से अविछिन्न परम्परा के आधार पर वेदों की अपौरुषेयता सिद्ध हो जाती है । लोक में मिथ्यावादी से सत्यवादी का विवेक किया जाता है, मिथ्यावादी के दृष्टान्त से सत्यवादी को मिथ्यावादी नहीं माना जाता | कुमारसंभव आदि में ग्रन्थ के कर्ता के नाम का उल्लेख रहने से और उनके शिष्य आदि की परम्परा में वैमत्य के न रहने से भी कालिदास प्रभूति की कर्तृता सिद्ध हो जाती है । वेद में तो कर्ता के नाम का उल्लेख है नहीं और न परम्परा से बिना विप्रतिपत्ति के उसका कोई कर्ता भी स्मृति में विद्यमान है, अतः ' वाचा त्रिरूपनित्यया ' इत्यादि श्रुति वचनों के आधार पर उनकी अपौरुषेयता ही सिद्ध होती है । कुमारसंभव आदि के कर्ता के विषय में कोई विवाद नहीं करता । वेदों का कर्ता मानने के विषय में बुद्ध से प्राचीन शास्त्रों में भी विरोध हैं । वेद में स्वयं ही उसके नित्यत्व की घोषणा की गई है । ब्रह्मा के निर्माता ने भी वेदों की रचना नहीं की हैं । मनुस्मृति और पुराण वेदवाणी को अनादिनिधन मानते हैं । ' वेद के रूप में स्वयम्भू ब्रह्मा ने अनादिनिधन नित्य वाणी को उद्भावित किया ' । ' अत एव च नित्यत्वम् ' इस वेदान्त सूत्र में व्यास भगवान् वेद की तित्यता का प्रतिपादन करते हैं । भगवद्गीता छन्दों से संयुक्त वेदविशिष्ट संसार वृक्ष को अविनाशी माना है । इस तरह की बात कुमारसंभव प्रभृति ग्रन्थों के विषय में नहीं कही जाती, अतः दृष्टान्त और दाष्टन्सिक में विषमता है । तब वेदों की अपौरुषेयता की दृष्टि अप्रामाणिक कैसे हो सकती है? ' जब जो कुछ मन में आया उसको सिद्ध करने के लिये साधन नहीं जुटाये जा सकते, तब फिर क्यों पौरुषेयत्व और अपौरुषेयत्व की चिन्ता से आत्मा को दुःखी किया जाय ' इस तरह की इस प्रसंग में दी गई धर्मकीति की युक्तियाँ असमय के प्रलाप के सिवाय और क्या कही जा सकती है? क्योंकि उक्त पद्धति से वेदों aftedear प्रमाणों से सिद्ध की जा सकती है ।

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*** बेवार्थपारिजात: एतेन पौरुषेयाणामनेकेषां चिरकालातीतकर्तृकाणां कर्तुरस्मरणमस्ति, तथा वेदवाक्येष्वपि कर्तुरस्मरणमित्याद्य-पास्तम्, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृत्वस्य वेदादन्यत्रादर्शनात् । कर्तुराप्तत्वज्ञानेनैव तत्तद्ग्रन्थोक्तब्रह्वायाससाध्येषु कर्मोपासनाद्यनुष्ठानेषु प्रवृत्तिः सम्भवति । तथा सत्यवश्यस्मर्तव्यः कर्ता । वेदाध्ययनतदर्थज्ञानानुष्ठानादौ परमायास-साध्येऽपि शिष्टानामविच्छिलपारम्पर्येण प्रवृत्तिर्दृश्यते । अतोऽत्रापि यदि कर्ता स्यात्ततदावश्यस्मर्तव्यः स्यात् । न च स्मर्यतेऽतोऽपौरुषेयत्वमेव वेदस्य ज्ञातव्यम् । कश्चित्तु कर्तुरस्मरणं दीर्घकालव्यवधानात् संभाव्यम्, मन्वादिभिः कर्तुरस्मरणे-नापौरुषेयत्वं वदति, ततु न किञ्चित् स्मृतिकृत्कर्तृस्मरणविलोपस्यापि संभवात् । वेदशाखा: स्मृतयश्चानेका लुप्ता एवेति । तस्माद् यथा गोघटादिशब्दानां संप्रदायविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृत्वेन नित्यत्वमपौरुषेयत्वम, तथैव वेदानामपि मस्तव्यम् यदप्युक्तम् -- दृश्यन्ते च विच्छिन्नक्रियाङ्गसम्प्रदायाः कृतकाश्च यत्नवन्त उपलभ्यन्ते, नियमाभावादिति, तदप्यस्थाने विभ्रमः, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकतायाः पौरुषेयवाक्येष्वभावात् । यत्र मुक्तकश्लोकादावस्मर्य-माणकर्तृकता दृश्यते, तत्राविच्छिन्नपारम्पर्यं नास्ति । यत्र बौद्धाद्यागमेषु सम्प्रदायपारम्पर्यं तत्र स्मर्यमाणकर्तृकताप्यस्ति । अविछिन सम्प्रदायपारम्पर्यमस्मर्यमाणकर्तृकत्वञ्च वेद एवेति तत्रापौरुषेयत्वमेव । यदप्युक्तमन्यत्राप्युपलम्भानुपलम्भस्य परोपदेशादप्रत्ययाद् अनुपलम्भस्यानिषचयाहेतुत्वात् स्वयंकृतानामप्य + पह्रोतृदर्शनाद् निष्ठागमनस्याशक्यत्वाशापौरुषेयत्वमिति, तदप्ययुक्तम्, तथाऽदर्शनात् । दृश्यन्ते च साधारणस्यापि उक्त प्रतिपादन से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि ' अनेक पौरुषेय ग्रन्थों के भी कर्ताओं को हुए बहुत समय बीत जाने पर उनकी स्मृति नहीं रह जाती, इसी तरह की अस्मृति वेद वाक्यों के विषय में है, क्योंकि संप्रदाय का विच्छेद न होने पर भी कर्ता की अस्मृति वेदों के सिवाय अन्यत्र नहीं देखी जाती । कर्ता की आप्तता का ज्ञान होने पर ही उन उन ग्रन्थों में प्रतिपादित बड़े परिश्रम से संपन्न होने वाले याग आदि कर्मों के और उपासना आदि के अनुष्ठान में प्रवृत्ति हो सकती है । ऐसी परिस्थिति में कर्ता की स्मृति अवश्य रहनी चाहिये । वेद के भव्ययन, उसके अर्थ के ज्ञान और तत्प्रतिपादित अनुष्ठान आदि में कठिन परिश्रम होने पर it fire at it aff च्छत परम्परा से प्रवृत्ति देखी जाती है । इसलिये यहाँ पर भी यदि इनका कोई कर्ता है तो उसकी स्मृति rate रहनी चाहिये थी । ऐसी कोई स्मृति है नहीं, अतः वेदों को अपौरुषेयता ही मान्य हो सकती हैं । कुछ लोगों का कहना है कि दीर्घकाल का व्यवधान होने से भी कर्ता की अस्मृति हो जाती है, इसलिये मनु प्रभृति को भी वेदों के कर्ता की स्मृति नहीं थी, अतः aat at aadheet मानी जाती है । यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि स्मृतिकार में भी स्मरण का विलोप माना जा सकता है । वेदों की अनेक शाखाएँ मोर अनेक स्मृतियाँ लुप्त हो गई है । इसलिये जैसे गो, घट प्रभृति शब्दों की सम्प्रदाय की अविच्छिन्नता और कर्ता की स्मृति न रहने के आधार पर नित्यता और अपौरुषेयता मानी जाती है, उसी तरह सेवेदों के विषय में भी मानना चाहिये । कहा जाता है कि किया के अंगभूत संप्रदायों का विच्छेद देखा जाता है । वे किसी के द्वारा निर्मित हैं और उनके लिये भी प्रयत्न करते हुए लोगों को देखा गया है, अतः अविच्छित संप्रदाय में ही प्रयत्न हो ऐसा कोई नियम नहीं है । किन्तु यह कथन भी बिना अवसर का भ्रममात्र है, क्योंकि सम्प्रदाय के अविच्छित रहते हुए भी कर्ता की स्मृति न हो, ऐसी बात पौरुषेय वाक्यों के विषय में नहीं कही जा सकती । मुक्तक श्लोकों में उनके कर्ताओं को स्मृति इसलिये नहीं रहती कि वहाँ पर परम्परा विच्छित हो जाती है । बौद्ध आदि के आगमों की सम्प्रदाय परम्परा अविच्छिन्न है तो वहीं पर कर्ता की स्मृति भी विद्यमान है । इनके विपरीत अविच्छिन्न संम्प्रदाय - परम्परा के रहते हुए भी कर्ता की अस्मृति केवल वेद में ही है, अतः वेदों को अपौरुषेय ही मानना पड़ेगा । यह भी ' कहा गया है कि ' विदों से aar भी कर्ता को उपलब्धि और अनुपलब्धि का निश्चय दूसरे के उपदेश से या अज्ञान से भी हो सकती है, अर्थात् उपलब्धि उपदेश से और अनुपलब्धि अज्ञान से हो सकती है । इसलिये अनुपलब्धि को कर्ता के अभाव केन का हेतु नहीं माना जा सकता, क्योंकि अपने बनाये ग्रन्थ में भी नाम को छिपाने की प्रवृत्ति देखी जाती है, अतः किसी

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देवार्थपारिजातः *! ग्रन्थस्य लेखकत्वेन स्वनामप्रख्यापकाः । विविधविद्यास्थानोपबृंहितस्य वेदस्य कर्ता स्वनामापोतोति बालभापितम् । कुतूहलितया स तथा करोतीत्यत्र बहूक्तमुदयनाचार्येण | ' अवश्यस्मरणीयस्य कर्तुरस्मरणं तथाऽधीत्यनुष्ठान सान्तत्यं पौरुषेयत्वबाधकम् । तस्मादपौरुषेयत्वं स्थितं वेदेष्वनाविलम् । कुशकाशोपमा व्यर्था धर्मकीर्तेश्च युक्तयः ॥ एतेन ' यथाऽयमन्यतोऽश्रुत्वा मं वर्णपदक्रमम् । वक्तुं समर्थः पुरुषस्तथान्योऽपीति कश्चन ॥ ' ( प्र ० वा ० ३१२४१ ) इत्यस्यापि पूर्वोक्तमेवोत्तरम् । कुमारसम्भवादीनां कर्तृषु विवादादर्शनात् ब्रह्मप्रद्वेषमात्रेण धर्मकीर्तिना तथाभिधानात् । वेदानाम-नाद्यविच्छिन्नपारम्पर्यस्य वेदैरुक्तत्वात् मनुवशिष्ठव्यासादिसम्मतत्वाच्च । मोहादजातबाधनस्यापि कल्पने सर्वव्यवहार-विच्छेदः स्यात् । तदुक्तम् -- उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातर्मापि बाघनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ' || ततः ' वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥ ' इति सम्यगेव |; यदुक्तम्- ' अन्यो वा रचितो ग्रन्थः सम्प्रदायादृते परैः । इष्टः कोऽभिहितो येन सोऽप्येवं नानुमीयते ॥ एकेन रचितो ग्रन्थः सम्प्रदायादृते कोऽभिहितो दृष्टः, ततः सोऽप्यपौरुषेयः किन्नानुमीयते । नहि योपदेशमन्तरेण वेदं पठितुं शक्त इत्यपौरुषेयत्वं वेदवाक्यानामिष्टम् । सा चानुपदेशपाठाशक्तिरन्यत्रापि तुल्येति तदपि तुच्छम्, अप्रमीयमाण-कर्तृ कत्वादेव बुद्धादिभ्यो वेदा अतिप्राचीना इत्याधुनिकैरितिवृत्तिरप्युपेयते । तत्र वेदे वेदस्य नित्यत्वं ब्रह्मनिर्मात्रा परमेश्वरेण तद्वृदि नित्यसिद्धा एव वेदाः प्रेष्यन्ते, न ते निर्मीयन्ते इति पूर्वमुक्तमेव । मन्वादिभिश्च वेदनित्यत्वं स्मर्यते । निश्चय पर पहुँच पाना बड़ा कठिन हो जाता है, ऐसी अवस्था में किसी को अपौरुषेयता का निश्चय नहीं हो सकता । ' यह कथन भी अयुक्त है, क्योंकि ऐसा देखा नहीं जाता । साधारण ग्रन्थ लिखने वाला भी उसके लेखक के रूप में अपने नाम को प्रसिद्ध कराना चाहता है | विविध विद्यास्थानों से उपबृंहित वेदों का कर्ता अपने नाम को छिपायेगा, यह कहना बचकानापन ही कहा जा सकता है | कुतुहल पैदा करने के लिये वह ऐसा करता है? इसके उत्तर में उदयनाचार्य ने बहुत कुछ कहा है- ' अवश्य स्मरणीय होते हुए भी कर्ता की अस्मृति और अध्ययनाध्यापन की सतत परम्परा वेदों की पौरुषेयता में बाधक है, वेदों की अपौरुषेयता बिना किसी विष्न TET के स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाती है । धर्मकीति की सारी युक्तियाँ नदी की बाढ़ में कुश काश का सहारा लेने के समान व्यर्थ हैं । ' अतः वेदों को पढ़ते समय आज का बालक बिना उपाध्याय की सहायता से उनको नहीं पढ़ सकता और उपाध्याय की सहायता मिल जाने पर पढ़ पाता है, ऐसा किसी मीमांसक का कहना है ' इस तरह के धर्मकीर्ति के प्रमाणवार्तिक स्थित वचनों का भी यही उत्तर है । कुमारसंभव प्रभृत्ति के कर्ताओं के विषय में कोई विवाद नहीं है । मात्र ब्राह्मणद्वेष के कारण धर्मकीर्ति इस तरह की बात करते हैं । वेदों को अनादि एवं अविच्छिन्न परम्परा का ज्ञान वेदों से ही होता है और मनु, वसिष्ठ, व्यास प्रभुति में इसको माना भी है । किसी बाधक प्रमाण के न रहने पर भी अज्ञानवश उसकी कल्पना करने पर सारे लोक व्यवहार के ही उच्छेद की संभावना होने लगेगी । जैसा कि कहा गया है जो व्यक्ति feet area प्रमाण के न रहने पर भी अ arrar Geet seear करने लगता है, ऐसे व्यक्ति की सभी व्यवहारों के प्रति संशयालु प्रवृत्ति होने से कोई स्थिति नहीं रह जाती । ' इसलिये यह कहना ठीक ही है कि- ' वेद का सारा अध्ययन गुरु - परम्परा से ही किया जा सकता है, जैसा कि आजकल देखा जाता है, अतः वेदाध्ययन यही सामान्य स्थिति सदा के लिये मान्य है । " यह भी कहा गया है कि वेद के अतिरिक्त किसी व्यक्ति के बनाये ग्रन्थों का अर्थ भी बिना किसी के समझाये कहीं समझ में आता है, तो क्या इससे उस ग्रन्थ की भी अपौरुषेयता मान्य होगी । ' एक व्यक्ति के रचित ग्रन्थ का भी अर्थ बिना संप्रदाय अर्थात् उपवेश परम्परा के कहाँ अभिहित होता है, तब उसको भी आप अपौरुषेय क्यों नहीं मानते? दूसरे के उपदेश के बिना कोई वेद को पढ़ नहीं सकता, अतः आप वेद वाक्यों को अपौरुषेय मानते हैं । यह बिना उपदेश के न पढ़ पाने की स्थिति अन्य ग्रन्थों की भी समान रूप से है! ' किन्तु यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि वेदों को अपौरुषेयता का आधार प्रमाणों के द्वारा भी उसके कर्ता को सिद्ध न कर सकता है । वेद बुद्ध प्रभूति से अत्यन्त प्राचीन है, इस बात की आज कल के इतिहासज्ञ भी मानते हैं । वेदों में उनकी नित्यता प्रतिपादित है । यह पहले ही कहा जा चुका है कि ब्रह्मा के निर्माता परमेश्वर ने उसके हृदय में नित्यसिद्ध वेदों को ही

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४०६ वैवार्थपारिजातः न चैवं सति दुरभिसन्धिभिरन्येरन्यग्रन्थेषु वेदसाधारण्यख्यापनाय यदपौरुषेयत्वमुच्यते, तद्वैदिकानुकरणमेव । यत्र समानविषया बहुषु ग्रन्थेषूपलभ्यन्ते } तेषां सर्वेषां मूलं सर्वप्राचीनग्रन्थ एव । ततोऽन्येषां तदनुकरणमेव, यथा गुरुत्वाकर्षण-सिद्धान्तस्याविर्भावको न्यूटन एव । तदनन्तरं तमेव सिद्धान्तं विभिन्नया रीत्या यद्यपि सहस्रशो वैज्ञानिका वदन्तु, तथापि सिद्धान्ताविष्कारकस्तु न्यूटन एवान्ये तु तदनुकर्तार एव । तथैवापौरुषेयत्ववादिनो भवन्त्वनेके, परन्तु मूलभूतास्तु वैदिक एवान्ये तु तदनुकर्तार एव । असकृदुक्तमेतद्यत्कस्यचिल्लेखस्यापि लेखको महता समारोहेण विविधैरुपादिभिः स्वयं नाम तत्र ग्रन्थे योजयति । वेदस्यापि यदि कश्चित्कर्ता भवेत्तदावश्यं तेन स्वनाम निर्देष्टव्यं भवेत् । अपि च, ग्रन्थ-निर्दिष्टोपायानामनुष्ठाने ग्रन्थकर्तुराप्तत्वज्ञानेनैव प्रवृत्तिर्भवति जनानां नान्यथा । तेन वेदेकगम्यानामनल्पायाससाध्यानी कर्मोपासनादीनामनुष्ठानेऽनादिनाऽनेहसा ब्रह्मविष्णुरुद्रप्रजापतिमनुवशिष्ठतुल्यानामपरिगणितानां शिष्टानां प्रवृत्तिरद्य यावदुपलभ्यते । तादृशस्य परममहत्त्वपूर्णस्य परमशिष्टैरनादिकालादाद्वियमाणस्य कोटिकोटिसंख्याकैर्जनैरनुत्रियमाणस्य वेदस्य कर्ता यदि भवेदवश्यं स्मर्तव्यः स्यात् । अवश्यस्मर्तव्यत्वे सत्यपि यस्य स्मरणं न भवेत्स नास्त्येवेति प्रत्येतव्यम् । वेदवाक्यंस्तदनुयायिभिः शिष्टैस्तु वेदस्य नित्यत्वमनादित्वञ्च प्रोच्यते । तेनापौरुषेयत्वं वेदस्याभ्युपेयते, न तु व्यस-नितया । कोऽप्यन्यो ग्रन्थो यो वेदवन्महत्त्वपूर्णो वशिष्ठादितुल्यैः शिष्टैश्चानादिकालादादृतो यदेकगम्ये साघने कोटिकोटि-जनानां प्रवृत्तिर्भवेदथ च तस्य कर्ता न स्मर्यते, यस्यानादित्वं नित्यत्वञ्च प्रामाणिकैरुक्तं भवेत्, न कोऽपि वेदादन्यस्तादृशो ग्रन्थ इति मुधैव कुमारसम्भवादीनां वेदसाधारण्यसाधने धर्मकीर्तेः प्रयासः । कुमारसम्भवादीनां प्रसिद्धाः कालिदासादयः संचारित किया । वेद को मनु प्रभूति भी नित्य ही मानते हैं । इस परिस्थिति में पुस्तकों के आधार पर कुछ लोग अन्य ग्रन्थों को भी वेद के समकक्ष सिद्ध करने की दुरभिसन्धि से उनको अपौरुषेय सिद्ध करना चाहते हैं, किन्तु यह प्रवृत्ति वैदिकों का अनुकरणमात्र है । जहाँ पर बहुत से ग्रन्थों में समान विषयों का प्रतिपादन देखा जाता है, उनमें सबका मूल वहीं माना जाता है, जो कि सबसे प्राचीन हो । उससे भिन्न दूसरा ग्रन्थ उसका अनुकरणमात्र माना जायगा । जैसे कि - ' गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त का आविष्कारक न्यूटन को हो माना जाता है । उसके बाद इसी सिद्धान्त को अन्य सहस्रों विद्वानों ने भले ही तरह - तरह से प्रतिपादित किया हो, किन्तु इस सिद्धान्त का आविष्कारक तो न्यूटन को ही माना जायगा, अन्य सभी विद्वान् उसका अनुकरण करने वाले ही कहे जायेंगे । इसी तरह से अपौरुषेयतावादी भले ही अनेक हो जाय, परन्तु उनके लिये प्रमाणभूत वैदिक ही है, अन्य सब उनके अनुकती हैं । यह बात हमने बार - बार कही है कि किसी छोटे से लेख का लेखक भी बड़े समारोह के साथ अनेक उपाधियों से विभूषित करके अपने नाम को जोड़ता है | वेद का भी यदि कोई कर्ता होता तो उसके साथ उसने भी अपना नाम जोड़ा होता । दूसरी बात यह भी है कि ग्रन्थ में निर्दिष्ट उपायों के प्रति व्यक्ति की प्रवृत्ति तभी होती है, जब कि उस ग्रन्थ के कर्ता की आप्तता का निश्चय हो जाय, अन्यथा नहीं । वेदों के द्वारा प्रतिपादित कठिन आयाससाध्य कर्मों और उपासना आदि के प्रति अनादि काल से ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, प्रजापति, मनु, तुल्य अपरिगणित शिष्टों की प्रवृत्ति आज तक निरन्तर देखी जा रही है । इस तरह के परम महत्वपूर्ण, परम शिष्टों के द्वारा अनादि काल से आदर के पात्र, कोटि - कोटि संख्या के मनुष्यों से अनुसूत वेदों का यदि कोई कर्ता होता, तो उसको इनकी स्मृति अवश्य ही स्थान मिलता । इस तरह के अवश्य स्मरणीय कर्ता की भी यदि स्मृति नहीं है, तो उसकी कोई सत्ता नहीं है, यही मानना पड़ेगा | वेद वाक्य और उनके अनुयायी शिष्टगण वेद को नित्य और अनादि मानते हैं । इसीलिये वे वेद की अपौरुषेयता मानते हैं । किसी बात को fear प्रमाण के यों ही मान लेने की उनकी कोई आदत ( व्यसन ) नहीं है । ऐसा वह कौन सा ग्रन्थ है, जो कि वेद के समान महत्वपूर्ण और वशिष्ठ आदि के सदृश शिष्ट जनों से अनादि काल से भादृत हो, जिसके द्वारा प्रतिपादित सावनों में कोटि-कोटि संख्या की जनता प्रवृत्ति हो और इसके उपरान्त भी उसके कर्ता की स्मृति विद्यमान न हो तथा जिसकी अनादिता और नित्यता प्रामाणिक जनों के द्वारा भी प्रतिपादित हो? वेदों के अतिरिक्त अन्य कोई भी ग्रन्थ ऐसा नहीं हो सकता । इस तरह से धर्म का कुमारसंभव प्रभृति ग्रन्थों की वेदों से समानता सिद्ध करने का सारा प्रयास व्यर्थ है । कुमारसंभव प्रभृति ग्रन्थों के कर्ता है १. आधुनिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त यद्यपि सर आइजक न्यूटन द्वारा आविष्कृत माना जाता है, तथापि भास्कराचार्य प्रभृति ज्योतिष के faarat द्वारा रचित सिद्धान्तशिरोमणि आदि ग्रन्थों में पृथ्वी में आकर्षण शक्ति को विद्यमानता स्पष्ट रूप से बताई गई है ।

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देवार्थपारिजातः * o's कर्तारः स्त्रियन्त एव । तद्ग्रन्थेऽपि नानादित्वोक्तिः । न वा शिष्टैस्तदनादित्वमुच्यते । येरपि हिब्रू -अरबो भाषामयधर्म-ग्रन्थानुयायिभिरिदानीं वेदवदेव स्वसम्प्रदायाभिमतधर्मग्रन्थानामोश्वरज्ञानमयत्वादिकं वक्तुमारब्धम्, तेषामपि तद्वेदिक सिद्धान्तानुकरणमव । अधिकं तु वेदस्वरूपविमर्श द्रष्टव्यम् । ' अन्यः कस्तादृशो ग्रन्थ वेदवद्यस्य मान्यता | अनादिनिधनं नित्यं यं शिष्टाः सम्प्रचक्षते । पारम्पर्यमविन च्छिन्नं यदधीतेः प्रवर्तते । कोटिकोटिजने यस्य चेशवत्पूज्यता किल । प्रमीयते च नो कर्ता स्वनित्यत्वञ्च वक्ति यः । वेदोक्तं शान्तिपुष्टादिह्यायुर्वेदोऽपि मन्यते । प्राप्तप्रामाण्यभावोऽपि तत्त्वनिष्ठाश्च काविला । योगाः पातलाचापि काणादा गौतमास्तथा || जैमिनोयाः पाणिनीया नेरुका वादरायणाः । शिक्षाकल्पेषु निष्णाता: पौराणाश्चैतिहासिकाः । रामायणप्रवक्तारो वाल्मोकास्तान्त्रिकास्तथा || बहुमानञ्च वेदानां प्रामाण्यं प्रवदन्ति हि । कोऽयं तथाविधो ग्रन्थो यस्य कर्ता न निश्चितः ॥ ' यदपि धर्मकीर्तिनः जल्पितम् - ' यज्ञ्जातीयो यतः सिद्धः सोऽविशिष्टोऽग्निकाष्ठवत् । अदृष्टहेतुरप्यन्यो-ऽविशिष्टः सम्प्रतीयते ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२४३ ) | अदृष्टहेतवोऽपि भावास्तदन्य: स्वभावाभेदमनुभवन्तस्तथाविधाः समनुमीयन्ते । यथा काष्ठादेको वह्निर्दुष्टस्तत्समानस्वभावाऽपरोऽपि तत्समानस्वभावोऽदृष्टहेतुरपि प्रतीयते । तथा च लौकिकेन शब्देन समानधर्मा वैदिकोऽपि शब्दो लौकिकवत्पुरुषहेतुकः स्यान्न वा कचिदपि तथा भवेत् । अथ हेतुरूपस्य पुरुषस्य निवृत्तावपि तद्रूपं ( पौरुषेयं ) वैदिकेषु शब्देषु न निवृत्तं भवेत्तदा कार्यधर्मव्यतिक्रमः स्यात् । ततः पुरुषान्न किञ्चि-द्वाक्यं स्यादिति न कश्चिच्छन्द: पौरुषेयत्वेन वचनीयः स्यात् । रूपविशेषो वा वैदिकाच्छन्दादर्शनोयो य एनं हेतुमनु-कालिदास प्रभूति प्रसिद्ध हैं और इनकी स्मृति भी हैं । इन ग्रन्थों में भी इनको अनादि नहीं माना गया है । शिष्टजन भी इनको अनादि नहीं मानते | आजकल हिब्रू अरबी आदि भाषाओं में लिखे गये धर्म ग्रन्थों के अनुयायीगण वेद के समान ही अपने संप्रदाय के अभिमत धर्मग्रन्थों में ईश्वर का ज्ञान सुरक्षित है, ऐसा कहने लगे हैं । ये लोग भी उक्त वैदिक सिद्धान्त का ही अनुकरण करते हैं । इस विषय पर अधिक विस्तार से विचार हमारे वेदस्वरूप विमर्श ' नामक ग्रन्थ में किया गया है, जो कि वहीं देखा जा सकता है । ' अन्य वह कौन सा ग्रन्थ है, जिसकी कि वेद के समान मान्यता हो, जिसको कि शिष्टजन अनादिनिधन एवं नित्य मानते हों, जिसकी अध्ययन परम्परा अविच्छिस रूप से प्रवर्तमान हो, कोटि - कोटि जन जिसको परमेश्वर के तुल्य पूजनीय मानते हों, जिसके कर्ता को कोई प्रसिद्धि नहीं हो, जो स्वयं अपने को नित्य कहता हो । आयुर्वेद भी शान्ति, पुष्टि प्रभूति वेदोक्त क्रियाकलापों को मान्यता देता है, जिसका प्रामाण्य सभी तरह से स्वतः सिद्ध है और जिसको तस्वनिष्ठ कापिल ( सांख्य ), पातंजल योग, काणाद, गौतम, जैमिनीय, पाणिनीय, नैरुक्त, बादरायण मत के अनुयायी तथा शिक्षा एवं कल्प सूत्रों में निष्णात विद्वान्, पौराणिक, ऐतिहासिक, रामायण के प्रवक्ता वाल्मीकि और तान्त्रिक भी बहुत आदर के साथ सर्वोत्कृष्ट प्रमाण मानते हों, वेद के अतिरिक्त वह कौन सा ग्रन्थ है, जिसका कि कोई कर्ता निश्चित नहीं है । ' यह भी कहा है कि- ' अन्वयव्यतिरेक के द्वारा जिस हेतु से जो पदार्थ जिस जाति का प्रतीत होता है, वह तज्जातीय अविशिष्ट अन्य हेतु के न देखे जाने पर भी उसी तरह का मालूम पड़ता है । जैसा कि देखा जाता है कि अग्नि काष्ठ से पैदा होती है, अतः काष्ठ के न दिखाई देने पर भी अग्नि को देखकर काष्ठ का अनुमान हो जाता है ' । स्वभाव की अभिन्नता को देखकर व्यक्ति ऐसे भावों की भी कल्पना कर लेते हैं, जिनके कि कारण को नहीं देखा गया है । जैसे कि काष्ठ को उत्पन्न हुए वह्नि को देखकर व्यक्ति उसी स्वभाव के वह्नि को यह किससे उत्पन्न हुआ, इसकी प्रतीति न होने पर भी जान लेता है कि यह भी वह्नि काष्ठ से ही उत्पन्न हुआ है । इसी तरह से लौकिक शब्द के सदृश हो वैदिक शब्द भी हैं । लौकिक शब्द जब पुरुषहेतुक है, तो वैदिक शब्द भी उसी तरह का होगा, अथवा ये दोनों ही पुरुषहेतुक न होंगे । हेतुरूष पुरुष की निवृत्ति होने पर भी उसका पौरुषेय रूप यदि वैदिक शब्दों में निवृत्त नहीं होगा तो कार्य के धर्मों में व्यतिक्रम हो जायगा । उस अवस्था में पुरुष से कोई भी वाक्य जन्य नहीं माना जायगा और इस तरह से किसी भी शब्द को पौरुषेय न कह सकेंगे । अथवा ऐसा कोई रूपविशेष वैदिक शब्द से उत्पन्न हुआ दिखाना पड़ेगा, जो कि

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पदार्थ पारिजातः विदध्यात् । न च लौकिकवैदिकशब्दानां स्वभावभेदोऽस्ति हेतुस्वभावस्य निवृत्तावपि वस्तूनामभेदे संभेद आकस्मिकः स्यादिति न क्वचिन्निवर्तेत । तस्याद्यत्स्वभावजन्मा यो दृष्टः सोऽन्यत्राप्रविभज्यमानो यतो दृष्टस्तत्कार्यतामग्नीन्धन-स्वात्मना न निवर्तते । वैदिकलौकिकवाक्यानां तुल्यरूपत्वे पौरुषेयत्वा पौरुषेयत्वभेदः किं कृतः? पुरुषकृत आकस्मिको वा? पुरुषान्तरेणापि वैदिकेषु वाक्येषु लौकिकवाक्यतुल्यत्वरूपविशेषो दृश्यते । तस्माद् दृष्टहेतुना कार्येणाप्यविक्रयमाणः तत्कार्यतां यातो दृष्टः स्वात्मना न निवर्तते । यथा दृष्टेनेन्धनकारणेनाग्निनाऽभेदमनुभवन्नदृष्टकारणोऽप्यग्निर्यथेन्धन-कार्यतां नातिवर्तते तद्वत्, इत्येतदपि न समीचीनम्, तुल्यरूपत्वेऽपि लोके विशेषदर्शनात् । तथाहि यथा वाक्यानां पौरुषे-यत्वाविशेषेऽप्याप्तानाप्तोक्तत्वेन प्रामाण्याप्रामाण्यभेदः, तथैव वाक्यत्वाविशेषेऽपि स्मर्यमाण कर्तृत्वास्मर्यमाणकर्तृकत्वाभ्यां पौरुषेयत्वापौरुषेयत्व विशेष उपपद्यते । यथा घटाङ्कुरयोः सावयवत्वेन कार्यत्वतौल्येऽपि पौरुषेयत्वभेदोऽभ्युपेयते, तथैव लौकिक दिवाक्येषु वाक्यत्वसाम्येऽपि निरपेक्षसापेक्षोच्चरितत्वेन पौरुषेयत्वापौरुषेयत्वभेदः । वाक्यत्वेन पुरुषोच्चरितत्वमनुमातव्यम्, न प्रथमोच्चरितत्वं निरपेक्षोच्चरितत्वं वा अप्रयोजकत्वात् । अपि च, वर्णात्मकस्य शब्दस्य नित्यत्वेन यज्जातीयो यतो जात इति स्वरूपासिद्धो हेतुः तस्माद्धर्मकीर्तिप्रलपितं यत्किञ्चित | ' यज्जातीयो यतः सिद्ध इति प्रकृतबाधितम् । यतः शब्दस्य नित्यत्वमितरत्र प्रसाधितम् । पुरुषोच्चरितं वाक्यमित्यस्मिन्नियमेऽपि हि I । निरपेक्षे च सापेक्षे प्रथमेऽप्रथमे तथा । न बाधा दृश्यते काचिदुभयत्र समो हि सः । ' यदप्युक्तम्- ' तत्राऽप्रदर्श्य ये भेदं कार्यसामान्यदर्शनात् । हेतवः प्रवितन्यन्ते सर्वे ते व्यभिचारिणः । ( प्र ० वा ० ३१२४४ ) | ' वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाऽध्ययनं यथा ॥ अतीतानागती इसको हेतु बनावे | इस तरह का स्वभावभेद लौकिक एवं वैदिक शब्दों में देखा तो नहीं जाता । हेतु के स्वभाव की निवृत्ति हो जाने पर भी यदि वस्तुओं की अभिता मानी जाती है, तो वह भेद आकस्मिक ही माना जायगा और ऐसी अवस्था में वह कहीं निवृत्त न हो, ऐसा भी संभव हो सकता है । इसलिये जो जिस तरह के स्वभाव से उत्पन्न देखा जाता है, यह अन्यत्र भी जिससे अलग स्वभाव का प्रतीत नहीं होता, वहीं पर भी अग्नि और इन्धन के रूप में उसकी कार्यता से निवृत्त नहीं होता । वैदिक और लौकिक वाक्य भी जब अन्य स्वभाव के हैं तो उनमें पौरुषेयता और अपौरुषेयता का भेद किस कारण से होगा? यह पुरुषकृत है या आकस्मिक? दूसरा पुरुष भी वैदिक वाक्यों में लौकिक वाक्यों से तुल्यरूपता ही देखता है । इसलिये जिसका हेतु नहीं देखा गया, ऐसे कार्य से अपूथक् क्रियमाण वस्तु भी दृष्टहेतु कार्य के हेतु से उत्पन्न होने वाला ही माना जायगा । वह अपने इस स्वभाव को छोड़ता नहीं । जैसे कि इन्धन रूप कारण से उत्पन्न होते देखा गया अग्नि अन्यत्र उससे उत्पन्न हुआ है, ऐसा न दिखाई देने पर भी इन्धन की कार्यता से निवृत्त नहीं होता, उसी तरह से लौकिक वैदिक वाक्यों में पौरुषेयता की निवृत्ति नहीं हो सकती ' । ऊपर का यह पूरा प्रतिपादन समीचीन नहीं है । तुल्यरूपता के रहते हुए भी लोक में भेद देखा जाता है । जैसे कि वाक्यों में समानरूप से पौरुषेयता के रहते भी आप्तोक और अनाप्तोक होने के कारण प्रामाण्य और अप्रामाण्य का भेद रहता है, उसी तरह से वाक्यत्व हेतु की समानता के रहते हुए भी स्मर्यमाणकर्तृकत्व और मातृत्व के भेद से उसमें पौरुषेयत्व और अपौरुषेयत्व को विशेषता रह सकती है । जैसे घट और अंकुर में सावयवता के आधार पर कार्यता के समानरूप से रहने पर भी उनमें पौरुषेयता और अपौरुषेयता मानी जाती है, उसी तरह से लौकिक और वैदिक वाक्यों में वाक्यत्वरूप सामान्य धर्म के रहते हुए भी निरपेक्ष मोर सापेक्ष उच्चारण के आधार पर पौरुषेयत्व और अपौरुषेयत्व का भेद होता ही है । वाक्यत्व हेतु से केवल पुरुषोच्चरितत्व मात्र का अनुमान हो सकता है, प्रथमोच्चरितत्व अथवा निरपेक्षोन्नरितत्व का नहीं, क्यों तु की प्रयोजकता पुरुषोच्चरितन को ही सिद्ध कर समाप्त हो जाती है । अपि च, वर्णात्मक शब्द तो नित्य है, अत: ' जिस जाति वाला जिससे पैदा होता है ' यह प्रमाणवार्तिक में उद्धृत हेतु स्वरूप से ही असिद्ध हैं । इस तरह से धर्मकीर्ति का यह सारा प्रलाप निराधार है । ' धज्जातीय पदार्थ जिससे सिद्ध होता है ' इत्यादि तर्क प्रकृत में बाधित है, क्योंकि शब्द की नित्यता अन्यत्र सिद्ध की जा चुकी है । वाक्य पुरुष के द्वारा ही उच्चरित होता है, ऐसा नियम मान लेने पर भी उसकी निरपेक्षता और सापेक्षता में तथा उसकी प्राथमिकता और अप्राथमिकता में कोई बाधा नहीं उपस्थित होती, क्योंकि वाक्यत्व हेतु इन दोनों ही अवस्थाओं में समानरूप से विद्यमान है । धर्मति ने यह भी कहा है कि ' कार्य के स्वभाव भेद को बिना दिखाये सामान्य दर्शन के आधार पर जो हेतु दिये जाते हैं, वे सब व्यभिचारी है ' | ' वेद का सारा अध्ययन गुरुपरम्परा के आधार पर ही होता है, जैसा कि आजकल होता है । इसलिये

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वेदार्थपारिजातः ** a कालो वेदकारविवजिती । कालत्वात्तद्यथा कालो वर्तमानः समीक्ष्यते || ब्रह्मादयो न वेदानां कर्तार इति गम्यताम् । पुरुषत्वादिहेतुभ्यस्तद्यथा प्रकृता नराः ॥ ' सदें चैते तवोऽनैकान्तिकाः । यथान्योऽपि पथिककृताग्निरदृष्टहेतु-ज्वालान्तरपूर्वको न काष्ठनिमंथनपूर्वकपथिकाग्निवत्, ज्वालेतरजन्मनोर्वाध्यबाधकभावे ज्वाला प्रभवत्वमन्यथापि स्यात्, तथा च ज्वालापूर्वक एवाग्निरिति न नियन्तुं शक्यते, अरणिनिर्मन्थनप्रभवस्याप्यग्नेर्दर्शनात् । पथिकाग्निर्ज्वाला-प्रभवः स्यान्न सर्वोऽप्यग्निः, विशेषप्रतिक्षेपस्य कर्तुमशक्यत्वात् । तथैव नैकस्य परपूर्वकमध्ययनमन्यस्यापि तथाभावं साधयति । वेदे क्रियाशक्तिरहितस्य गुर्वध्ययनपूर्वकं दृष्टं यद्यपि तथा हिरण्यगर्भादीनां न तथा च नियमः तेषां परपूर्वकत्वमन्तरेणापि स्वयमुपस्चय्याध्ययनसम्भवात्, तदपि चर्वितचर्वणमेव, वेदक्रियाशक्तेरसिद्धत्वात् । बज्वाला-पूर्वकत्वं निर्मथनपूर्वकत्वञ्च दृष्टमेव नैवं वेदस्य स्वयमुपरचय्याध्ययनं दृष्टमिति वैषम्याच्च । यच्च कथं विशेषस्य सम्भवो यावता तेषामप्यशक्ति रेवेदानीन्तनपुरुषव दित्याक्षिप्योक्तम् - शक्त्योर्न किञ्चिद्विरोधदर्शनमस्ति, तस्मान्न विरुद्ध विध्यनुपलब्धिप्रयोगो गमकः, नह्यतीन्द्रियेषु सहानवस्थानलक्षणस्य विरोधस्य प्रतीतिरित्युक्तम्, नापि परस्परप्रतिषेधस्थितिलक्षणस्य विरोधस्य प्रतीतिः शक्त्यशक्त्योः पुरुषापुरुषत्वयोस्तथात्वेऽपि शक्तिपुरुषयोस्तदभावात् । यदि पुरुषाः शक्ता इदानीन्तना अपि स्युरित्यपि दुःसाध्यम्, यत्रैकस्याशक्तिस्तत्र सर्व-पुरुषाणामप्यशक्तिरित्यपि व्यभिचारी, भारतादिष्वपीदानीन्तनानामशक्तावपि कस्यचिच्छक्तिसिद्धिरित्यादि जल्पितम्, पूर्वकाल में भी वेद का अध्ययन इसी तरह गुरु परम्परा से ही होता था । अतीत और अनागत काल में भी वेद का कोई कर्ता नहीं माना जाता, जैसा कि आजकल नहीं माना जाता, यहाँ पर निर्दिष्ट कालत्व हेतु सर्वत्र विद्यमान है । ब्रह्मा प्रभृति भी वेदों के कर्ता नहीं हो सकते, जैसे कि प्राकृत जन उसके कर्ता नहीं हैं । यहाँ पर पुरुषत्व हेतु दोनों में विद्यमान है । ऊपर दिये गये ये तीनों हेतु अनैकान्तिक ( व्यभिचारी ) हैं । जैसा कि यह हेतु अनैकान्तिक होता है कि पथिक कृत अन्य अग्नि को भी वह किससे पैदा हुई, इसको बिना देखे ही यह सिद्ध कर देना कि यह ज्वालाम्तरपूर्वक ही है, काष्ठनिमंथन पूर्वक नहीं, जैसे कि इस पथिक के द्वारा जलाई अग्नि ज्वालान्तर पूर्वक है । ज्वालान्तरजन्य अग्नियों में बाध्यबाधकभाव की उपस्थिति होने पर ज्वालाप्रभवत्व अन्य पद्धति से भी हो सकता है, अतः ज्वाला-पूर्व ही अग्नि है, यह नहीं सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि अरणि के निर्मथन से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है । इस तरह से रास्ते चलते पथिक के द्वारा सुलगाई अनि ज्वालान्तरप्रभव हो सकती है, किन्तु इससे सभी तरह की अग्नि ज्वालाप्रभव ( जलती हुई अग्नि की ज्वाला से सुलगाई गई दूसरी अग्नि ) ही होती है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । उसी तरह से एक जगह गुरुपरम्परा से देखा गया अध्ययन सर्वत्र गुरुपरम्परा को ही अनिवार्य रूप से सिद्ध नहीं कर सकता । वेद में जिनको निर्माण की सामर्थ्य नहीं है, उनमें भले ही गुरु - परम्परा से अध्ययन मान लिया जाय, किन्तु हिरण्यगर्भ प्रभृति के लिये ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे गुरु परम्परा के बिना भी स्वयं वेदों का निर्माण कर अध्ययन कर सकते हैं । यह सब कथन चवितचर्वण मात्र है, क्योंकि इनमें भी वेद के निर्माण की सामर्थ्य किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं है । वह्नि की ज्वालापूर्वकता और निर्मथनपूर्वकता दोनों दृष्ट इसी तरह से वेद की स्वयं रचना करके atres करने की बात किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं है । इस तरह से दृष्टान्त और दान्तिक में वैषम्य भी विद्यमान है । " हिरण्यगर्भ प्रभृति में किसी प्रकार की विशेषता कैसे आ सकती है, क्योंकि आजकल के पुरुषों की तरह उनमें भी वेद के निर्माण की सामर्थ्य नहीं आ सकती ' इस तरह के आक्षेप को उपस्थित करके यह जो कहा गया है कि ' शक्तियों में कोई विरोध नहीं देखा जाता । इसलिये अविरुद्ध विधि से अनुपलब्धि का तर्क यहाँ गमक नहीं माना जा सकता, क्योंकि अतीन्द्रिय पदार्थों में सहानवस्थान लक्षण विरोध की प्रतीति नहीं हो सकती । ' साथ ही यह भी कहा गया है कि परस्पर प्रतिषेध रूप से रहने वाले विशेष की भी प्रतीत नहीं होगी, क्योंकि शक्ति और शक्ति, पुरुषत्व और a पुरुषत्व की ऐसी स्थिति रहने पर भी शक्ति और पुरुष में इस स्थिति का अभाव है । यदि पहले के पुरुष समर्थ हैं तो आज के भी समर्थ होने चाहिये, इसको सिद्ध कर पाना भी कठिन है । जहाँ पर एक पुरुष असमर्थ है, वहाँ अन्य पुरुष भी समर्थ न होंगे, यह बात गलत भी है । महाभारत प्रभृति की रचना में इदानीन्तन पुरुष के ran र्थ होने पर भी किसी की शक्ति सिद्ध ही है । ' किन्तु यह सब कथन भी उत्तरदाता के भाव को न समझने का ही परिणाम है । ५२

पृष्ठ 440

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
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४१० वेदार्थपारिजातः तदपि तुच्छम् भावानवबोधात् । तथाहि नह्यत्र पुरुषोच्चरितत्वमात्रेण पौरुषेयत्वं तद्भिन्नमपौरुषेयत्वमभिप्रेतम्, तादृशस्य पौरुषेयत्वस्य वेदेऽप्यभिमतत्वात्, किन्तु प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचितत्वमेव पौरुषेयत्वम् । तदेव निरपेक्ष-च्वरितत्वं प्रथमोच्चरितत्वञ्च तद्भिन्नमपौरुषेयत्वम् । तथाग्निहोत्रादिस्वर्गादिकार्यकारणभावो वेदार्थः प्रत्यक्षानु-मानागम्यः । तत्र प्रत्यक्षानुमानशरणेन स कार्यकारणभावो नतरां सम्यः, नतमाञ्च प्रत्यक्षानुमानाभ्यां तमुपलभ्य वेदरचयितृत्वं कस्यचिदुपपद्यते । न च कस्यचित्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामगम्योऽपि धर्मों वेदार्थः कस्यचिद्धिरण्यगर्भादेः पुरुषधौरेयस्य गम्यो भविष्यतीति वाच्यम्, प्रत्यक्षादीनां नियतविषयत्वात् । यथा नेत्रस्य रूपमेव विषयो न गन्धः, घ्राणस्य गन्ध एव विषयो न रूपं यथैतत्पुरुषसामान्यस्य तथैव पुरुषविशेषस्यापि योगजादिसामर्थ्येन दूरसुक्ष्मादि-दृष्टावेव वैशेष्यं न विषयातिक्रमणम् । नह्येवं कल्पयितुं शक्यते यद्यद्यपीदानीं घ्राणेन रूपं नोपलभ्यते, तथापि कदाचिद्विन शिष्टैर्ब्राणनापि रूपमुपलभ्यते । ' यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलङ्घनात् । दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ तु न रूपे श्रोत्रवृत्तिता ॥ ' इत्युक्तेः । तेन रूपादिहीनत्वान्न धर्मे प्रत्यक्षप्रवृत्तिः लिङ्गाभावान्नानुमानस्यात एवाज्ञातज्ञातकत्वेन तत्र वेदादिशास्त्रस्य प्रामाण्यम्, न च तर्हि भारतादीनामपि धर्मब्रह्मबोधकत्वेन कथं व्यासादोनां तत्कर्तृ त्वमपि घटेतेति वाच्यम्, व्यासादीनां प्रत्यक्षानुमानाभ्यामपौरुषेयैर्मन्त्रब्राह्मणात्मकर्वेदैस्तदविरुद्धंरार्षेविज्ञानैश्च तास्तानर्थानुप-लभ्य भारतादिनिर्मातृत्वसम्भवात् । यद्येवमेव पूर्वतनान् वेदाननुसृत्योत्तरोत्तरवेदनिर्माणमभ्युपेयते, तदा यद्यानुपूर्वीपरि-वर्तनं तदा तद्वयाख्यानमेव न वेदनिर्माणम् । यद्यानुपूर्व्या अपरिवर्तनं तदा तदेव - ' वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् ' हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि केवल पुरुष से उच्चरित ही पौरुषेय और तद्भिन्न अपौरुषेय कहलायेगा, क्योंकि इस तरह की पुरुषचरितत्व रूप पौरुषेयता तो हम वेद में भी मानते हैं, किन्तु प्रमाणान्तर से वस्तु को जान कर रचना करना पौरुषेयता कहलाती है, इससे भिन्न अपौरुषेयता है । इसीको निरपेक्षोच्चरितत्व और प्रथमोच्चरितत्व के नाम से भी जाना जाता है । इसी तरह से अग्नि-होत्र स्वर्गादि का कार्यकारणभाव बतानेवाला वेदार्थ प्रत्यक्ष और अनुमानगम्य नहीं है । केवल प्रत्यक्ष और अनुमान का सहारा लेने वाले व्यक्ति को इस कार्यकारणभाव की प्रतीति कभी नहीं हो सकती और इस परिस्थिति में प्रत्यक्ष और अनुमान से उस अर्थ को जानकर वेद की रचना कर सकना तो किसी के भी लिये बड़ी दूर की बात है । किसी साधारण व्यक्ति के लिये प्रत्यक्ष और अनुमानगम्य न होते हुए भी वेदार्थ रूपी धर्म हिरण्यगर्भ प्रभृति पुरुषधीरेयों के प्रत्यक्षानुमान से गम्य हो सकेगा, ऐसा भी नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्षादि के विषय नियत हैं । जैसे नेत्र का विषय रूप ही है, गन्ध नहीं; प्राण का गन्ध विषय ही है, रूप नहीं; यह नियम जैसे सामान्य पुरुष के | लिये लागू होता है, उसी तरह से विशेष पुरुष के लिये भी लागू है । योगज सामर्थ्य से भी दूर सूक्ष्मादि दृष्टि में ही वैशिष्ट्य आ जाता है, इससे भी इन्द्रियों के विषय नहीं बदल जाते । हम ऐसी कल्पना नहीं कर सकते कि यद्यपि इस समय प्राणेन्द्रिय से रूप उपलब्ध नहीं होता तो भी किसी समय कोई विशिष्ट व्यक्ति प्राण से भी रूप को देख सकता है । ' जिस किसी इन्द्रिय में यदि कभी कोई वैशिष्ट्य आ भी जाता हो तो उससे वह अपने विषय का उल्लंघन नहीं कर सकती । चक्षु में दूर की वस्तु को और सूक्ष्म वस्तु को देखने की सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह कान की तरह सुनने भी लगे । ' धर्म रूपादि से रहित है, अतः उसमें प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति न होगी, लिंग के अभाव में अनुमान भी प्रवृत्त न होगा । इसी लिये अज्ञात धर्म के ज्ञापक के रूप में वेद आदि शास्त्र ही वहाँ पर प्रमाण के रूप में प्रवृत्त होंगे । प्रश्न है कि भारत आदि ग्रन्थ भी तो धर्म और ब्रह्म के बोधक हैं, तो इनके निर्माण में व्यास आदि को कैसे समर्थ माना जा सकेगा? उत्तर है कि व्यास आदि प्रत्यक्ष और अनुमान से अपौरुषेय मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद से और इनसे afarna आ विज्ञान से उन उन अर्थों का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, अतः उनमें भारत आदि के निर्माण की सामर्थ्य मानी जाती है । यदि इसी तरह से पूर्वतन वेदों का अनुसरण कर उत्तरोत्तर वेदों का निर्माण माना जाय तो इसमें आनुपूर्वी में परिवर्तन आ जायगा । ऐसी अवस्था में बाद का वेद निर्माण वेद व्याध्यान मात्र रह जायगा, वेद का निर्माण नहीं | यदि आनुपूर्वी में परिवर्तन नहीं माना जाता तो आपको हमारी इस उक्ति को ही सही मानना पड़ेगा कि ' वेद का सारा अध्ययन गुरु परम्परा के आधार पर होता है । '