वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 441–450

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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वैदार्थ पारिजातः I एतेन स्वभावभेदस्य दर्शितत्वात् । तस्मात् कारणानि विवेचयता अर्थेषु तदतत्प्रभवेषु स्वभावभेदो दर्शनीय इत्यपि समाहितमेव । यदुक्तम् --- नात्र लौकिकवैदिकवाक्ययोः स्वभावनानात्वं पश्यामः, असति च तस्मिन् सामान्यस्य तुल्यरूपस्यैवादर्शनात् । पौरुषेयत्वमपौरुषेयत्वं वा व्यवस्थापनतत्स्वभावसम्बन्धिना व्यभिचारः संभाव्यत एवेत्यादि, तदपि प्रतिक्षिप्तम्, वर्णक्रमलक्षणस्य तुल्यत्वेऽपि वैदिक वाक्येष्ववश्यस्मर्तव्यत्वे सत्यप्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वपुरुष-बुद्धयगम्यधर्माधर्मप्रतिपादकत्वायिच्छिन्न पारम्पर्यानादित्वादिस्वभावभेदस्य सिद्धत्वात् । यदपि वेदावेदयोस्तत्त्वलक्षणोऽस्ति विशेष इत्याशङ्कघोक्तम्, तन्न केवलमनयोडिण्डिक ( नग्नाचार्य ) -पुराणेतरयोरप्यस्ति । न च तावता स्वप्रक्रियाभेददीपनो नाम भेदो बाघते अन्यत्रापि प्रसङ्गादिति, तदपि तुच्छम्, लक्षणभेदरहितस्य नाममात्रभेदस्य तथात्वेऽपि पूर्वोक्तलक्षणलक्षितस्य वेदस्येतरवाक्यासाधारण्यात् । तेनैव च वेदस्य पौरुषेयत्वं सिद्धयति । यदयुक्तम् - यदि तु तादृशीं रचनां पुरुषाः कर्तुं न शक्नुयुः कृतां वा अकृतसङ्केतो विवेचयेत् तदा व्यक्तमपौरुषेयो वेदः स्यादिति, तदपि न उक्तोत्तरत्वात् । तथाहि-- प्रत्यक्षानुमानाविषयत्वाद्वेदार्थस्येति न तदर्थमुपलभ्य वाक्यरचनां पुरुषाः कर्तुः शक्नुवन्तीत्युक्तमेव । यथा वाक्यत्वाविशेषेऽपि सत्यमिथ्यात्वशुद्धाशुद्धत्वादिभेदव्यवस्था, तथैव सादित्वानादित्वापौरुषेयत्वादिभेदव्यवस्थाप्युपपद्यते । पुरुषाणामेव मन्त्रकरणशक्तिः । अपि च, मन्त्रो नाम नान्यदेव किञ्चित् किं तहि सत्यतपःप्रभाववतां समीहितार्थसाधनवचनं मन्त्रः । तदद्यत्वेऽपि पुरुषेषु दृश्यत एवं यथास्वं सत्याधिष्ठान वलाद् विषदहनादेः इस उक्ति के द्वारा वेदाध्ययन में स्वभावभेद की स्पष्ट प्रतीति करा दी गई है । अतः आपको इस उक्ति का भी समाधान हो जाता हैं कि कारणों का विवेचन करते समय कुछ अर्थ उनसे उत्पन्न होते हैं, कुछ नहीं, इसके लिये स्वभाव भेद को दिखाना पड़ेगा । आपने यह भी कहा है कि ' हम लौकिक और वैदिक वाक्यों में स्वभाव की कोई भिन्नता नहीं देख पाते, इसके अभाव में सामान्य रूप से वाक्य को एक ही स्वभाव का होना चाहिये । पौरुषेयत्व और अपौरुषेयत्व की व्यवस्था स्वभाव भेद के न रहने पर परस्पर व्यभिचार की संभावना बनी रह सकती है । ' इसका समाधान इस तरह से है कि वर्षों के क्रम की समानता के होने पर भी वैदिक वाक्यों में अवश्य स्मर्तव्य होने पर भी अस्मर्यमाणकर्तृकत्व, पुरुषबुद्धि के अगम्य धर्माधर्म का प्रतिपादकत्व और अविच्छिन परम्परा के कारण अनादित्व के रूप में लौकिक वाक्यों की अपेक्षा स्वभावभेद विद्यमान है | ' वेद और वेदभिन वाक्यों में तास्विक वैशिष्ट्य है ' ऐसी आशंका उठाकर आपने कहा है कि ' केवल इनमें ही नहीं, किन्तु डिण्डक ( मनाचार्य ) के पुराण और तद्भिन्न वाक्यों में भी तात्विक वैशिष्ट्य है, किन्तु इतने से, अपनी प्रक्रिया में केवल भेद का प्रकाशक मात्र होने से वाक्यों में भेद नहीं माना जा सकता, क्योंकि तब अन्यत्र भी भेद को स्वीकार करना पड़ेगा । ' इसका समाधान यह है कि जहाँ पर केवल नाममात्र का भेद है, लक्षण का नहीं, वहीं आपकी उक्त आपत्ति लागू हो सकती है, किन्तु वेद के विषय में पूर्वोक्त तीन लक्षणों से इतर वाक्यों से उसका वैशिष्ट्य प्रतीत होता है, अतः वह इतर वाक्यों के समान नहीं माना जा सकता । इसीसे वेद की अपौरुषेयता भी सिद्ध हो जाती है । आपने यह भी उठाई है कि ' वेद को अपौरुषेय तो तब माना जा सकता है, जब कि उस तरह की रचना को पुरुष करने में समर्थ न हों. रचना हो जाने पर भी बिना ही संकेत के उसकी व्याख्या हो सकती हो ', किन्तु इसका उत्तर दिया जा चुका है । हम यह कह चुके हैं कि वेद का अर्थ प्रत्यक्ष और अनुमान का विषय नहीं है, अतः उसके अर्थ को प्रत्यक्ष या अनुमान से जानकर पुरुष वाक्य की रचना में समर्थ नहीं हो सकता । जैसे समानरूप से वाक्य होते हुए भी सत्य और मिथ्या वाक्यों में, शुद्ध और अशुद्ध वाक्यों में भेद माना जाता है उसी तरह से सादित्व अनादित्व, अपौरुषेयत्व - पौरुषेयत्व आदि वाक्यों के भेदों की भी व्यवस्था हो सकेगी । पुनः शंका उठाई जाती है कि ' मन्त्रों के निर्माण की शक्ति पुरुषों में देखी जाती है । अपि च मन्त्र सत्य और तप के प्रभाव से युक्त महान व्यक्तियों के समीहित प्रयोजन के साधक वचनों के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं । आजकल के पुरुषों में भी यह

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४१२ वेदार्थपारिजातः स्तम्भनकरणात्, शबराणाश्च केषाञ्चिमन्त्रकरणात्, अवैदिकानाश्व बौद्धादीनां मन्त्रकल्पानां दर्शनात्तेषां पुरुषकृतेरिति, तदप्यस्थाने, अनुक्तोपालम्भनात् । नहि मस्त्रत्वेन वेदस्यापौरुषेयत्वं साधयामः किन्त्वस्मर्यमाणकर्ता कत्वादिभि-रित्यवोचाम । अत एव न मन्त्राणाम्, किन्तु तथाभूतानां ब्राह्मणोपनिषदामप्यपौरुषेयत्वं वेदत्वं च सिद्ध्यति । पौरुषे-याणामपि मन्त्राणामभ्युपगमात् । सत्यतपःप्रभाववत्त्वमपि सत्यादिधर्माचरणेनैव सम्भवति । तदपि च ज्ञात्वैव सम्भवति । ज्ञानं च प्रमाणायत्तम् । तच्च प्रमाणं प्रत्यक्षानुमानातिरिक्तो वेद एव । अन्येषामाघुनिकानां ग्रन्थानां तदग्रे वेदाधर्मणत्वमेव । तेन च वेदस्योपजीव्यत्वेन तदविरोधेनैव सत्यतपःप्रभाववतामपि वचनं प्रमाणम् । वेदविरोधिनां तु श्वदृतिनिक्षिप्तकपिलाक्षीरवत्तदप्यग्राह्यमेव वैदिकैः । यदपि तत्रापि ( बौद्धादिमन्त्रकल्पेऽपि ) अपौरुषेयत्वे कथमपौरुषेयं वितथम्? तत्र हि बौद्धेतरमन्त्रकल्पे हिंसामैथुनात्मदर्शनादयोऽनभ्युदयहेतवोऽन्यथा वा वर्ण्यन्ते । तत्कथं विरुद्धाभिधायिद्वयमेकत्र सत्यं स्यात् । अर्थान्तरस्य कल्पने तदन्यत्रापि तुल्यम् । तथा चार्थानिश्चयात् काचिदपि व्यक्तिर्न स्यात् । तथा चापौरुषेयत्वग्रहणमप्यनुपयोग-मेवेत्यादि जल्पितम्, तदप्यज्ञानविजृम्भणम्, बौद्धादिमन्त्राणामपौरुषेयत्वानभ्युपगमेन तत्र पौरुषेयत्वस्य सर्वसम्मतत्वात् । वैदिक मन्त्राणामपौरुषेयत्वेनापास्तपुं दोषशङ्काकलङ्कत्वेन तदुक्तेरनतिशङ्कनीयत्वात्, वैधहिंसामैथुनादीनामदोषत्वाच्च । यागे धर्मयुद्धे दण्डविधाने विहिताया हिंसायाः स्वदारमैथुनस्य च वर्त्यत्वं स्पष्टमेव । सर्वथा हिसानिवृत्त्युपदेशस्यैव परिणामोऽयं बौद्धेषु दृश्यते यत्ते सबमांसभक्षकाः संवृत्ताः । चीनजापानादिदेशीया बौद्धास्तु श्वपाकस्योऽपि हीनतमाः संवृत्ताः । पल्ली - मण्डूक- विट्- कृम्यादिभक्षणेऽपि ते न त्रपन्ते । मैथुननिषेधस्य परिणामी बौद्धेषु वज्रयान सम्प्रदाय विकाशो देखा जाता है | अपनी सामर्थ्य के अनुसार सत्य का सहारा लेकर कुछ व्यक्ति विष, अग्नि प्रभूति का स्तम्भन कर देते हैं । कुछ शाबर मन्त्रों का निर्माण भी होता ही है । अवैदिक बौद्धों के भी मन्त्रशास्त्र के ग्रन्थ मिलते हैं और वे पुरुषों की रचनाएँ हैं, यह स्पष्ट है ' | किन्तु यह सब शंकाएं बिना अवसर की हैं, क्योंकि हमने यह कभी नहीं कहा कि पुरुष मन्त्र नहीं बना सकते | मन्त्र होने से हम वेद की अपौरुषेयता कहीं मानते हैं । हमने इसके लिये अस्मर्यमाणकर्तृत्व आदि तीन कारण अभी बताये हैं । इसीलिये केवल मन्त्रों की ही नहीं, किन्तु उक्त लक्षण से लक्षित ब्राह्मण और उपनिषद् वाक्यों में भी अपोरुषेयता और वेदत्व को सिद्धि होती है । अवैदिक मन्त्रों को पुरुष द्वारा निर्मित हम भी मानते हैं । सत्य, तप आदि का प्रभाव भी इनका आचरण करने से उत्पन्न हो सकता है और इनका आचरण इनकी ote arrari के बाद ही किया जा सकता है । जानकारी किसी प्रमाण से ही होगी । इस तरह का प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान से अतिरिक्त वेद ही हो सकता है । अन्य आधुनिक ग्रन्थ इस अंश में वेदों के ही ऋणी हैं । वेद ही इन सबका उपजीव्य है, अतः सत्य, तप आदि के प्रभाव से युक्त पुरुषों का बचन वेद का अविरोधी ही होना चाहिये । जो वचन वेद के विरोधी है, वे वैदिकों के लिये उसी तरह से ग्राह्य है, जैसे कि कुत्ते के चमड़े की कुप्पी में रक्खा गया कपिला गो का पवित्र दुग्ध भी अग्राह्य हो जाता है । यह भी कहा गया है कि बौद्ध आदि के मन्त्रकल्पों को भी अपौरुषेय मान लेने पर अपौरुषेयत्व कहाँ गलत हो जाता है? बौद्धों से fra neare पों में हिंसा, मैथुन, और आत्मदर्शन आदि को व्यनभ्युदय और साथ ही अभ्युदय का भी कारण बताया जाता है । एक ही वस्तु के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी बातें कैसे सही मानी जा सकती हैं । अर्थान्तर की कल्पना अन्यत्र भी की जा सकती है | इस तरह से तो अर्थ का निश्चय न हो पाने से कुछ भी स्पष्ट न हो सकेगा । इस तरह से अपौरुषेयत्व के ग्रहण का भी कोई उपयोग नहीं हैं । किन्तु यह बात भी कहने वाले के अज्ञान को ही उजागर करती है । बौद्ध आदि के मन्त्रों की अपौरुषेयता नहीं मानी गई है, क्योंकि सर्वसम्मति से वे पौरुषेय ही माने जाते | वैदिक मन्त्रों की अपौरुषेयता के कारण के समस्त पुरुष दोषों की शंका के कलंक से निर्मुक्त हैं, अतः वेदोक्ति में शङ्का का कोई अवसर ही नहीं हैं । वैध हिंसा और वैध मैथुन में कोई दोष नहीं है । याग में, धर्मयुद्ध में और eus a fare में fafe त हिंसा और अपनी पत्नी के साथ ऋतुकाल में अथवा उसकी इच्छा होने पर किये गये मैथुन में कोई धर्म का विरोध नहीं है । सर्वथा हिंसा न करने के उपदेश का ही यह परिणाम हुआ है कि बोद्धों में सर्वत्र मांस भक्षकों का ही प्राबल्य हो गया है । चीन, जापान आदि देशों के बौद्ध तो चाण्डालों से भी निकृष्ट हो गये हैं, जो कि पल्ली ( विसतुइया ), मेढक और विष्ठा में पैदा हुए कीड़ों को भी खाने में लज्जा का अनुभव नहीं करते । सर्वथा मैथुन निषेध का परिणाम बौद्धों में वज्रयान सम्प्रदाय के विकास के रूप में.

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वेदार्थपारि are: *** यत्र मैथुनमपि साधनाङ्गत्वेन गृह्यते । आत्मदर्शनस्य तु परमधर्मत्वमेव । बौद्धेस्तु मोहादेवात्मदर्शनस्यानिष्टहेतुत्वमुपेयते । यद्यपि विषादिकर्मकृतो बौद्धा अपि दृश्यन्ते, तथापि न तावता तन्मन्त्राणामपौरुषेयत्वं सिद्धयति । अपौरुषेयत्वस्य तदतन्त्रत्वात् । वंदिकानामेवाहिसा सत्यादीनां विकृतानुष्ठानेन क्वचित् कश्चित् क्षुद्राः सिद्धयस्तेषु दृश्यन्ते । यदुक्तम् -- मुद्रामण्डलध्यानैरनक्षरे: कर्माणि क्रियन्ते, न च तान्यपौरुषेयाणि युज्यन्ते * तेषां क्रियासम्भवे अक्षररचनापरकः प्रतीघातः । तस्मान्न किञ्चिदशक्य क्रियमेषामिति } तदपि तुच्छम् यागादीनामिव मुद्रादीनामपि विहितत्वेन नैककार्यकरत्वात् । अक्षररचनासामान्यं नाशक्यक्रियम्, किन्तु वेदाक्षररचनाऽशक्य क्रिया, स्वातन्त्र्येण तदर्थानु पलम्भात् । कथं वेदार्थमनुपलम्य वेदवाक्यरचना कर्तुं शक्या । वेदार्थस्तु प्रत्यक्षानुमानागम्य इत्युक्तमेव । अहिंसासत्यादि-भिस्तदुपलम्भश्चेत्तेषामेव वेदमन्तरा कुतो धर्मत्वलाभः । ततो विशेषज्ञतायाः सर्वज्ञताया वा लाभाय धर्मानुष्ठानमावश्य-कम् । तल्लाभाय च वेदोऽङ्गीकरणीयः । पूर्वपूर्वतरः सर्वज्ञेरुत्तरोत्तरेभ्यो धर्मज्ञानं भवतीत्यनवस्थैव । अपि च बौद्धा आताच सत्याहिंसादिषु बद्धादरा दृश्यन्ते, तैश्चेत्तत्त्वज्ञानं तदा कुतस्तेषां मतभेदः । तौ सत्यप्रभवी मन्त्रकल्प कथं परस्परविरुद्धाविति त्वयाप्युक्तम् । यदुक्तम् न वै सर्वत्र ती सत्यप्रभवो प्रभावयुक्तपुरुषप्रतिज्ञालक्षणावपि तौ स्तः । अर्थात् प्रभाववता पुरुषेण य इमां वर्णपदरचनामभ्यस्यति, तद्विधि चानुतिष्ठति, तस्याहं यथा प्रतिज्ञातमर्थं साधयामीति या प्रतिज्ञा, तत्प्रभवावपि मन्त्रकल्पौ भवतः । स च प्रभावो मतिसिद्धिविशेषाभ्यामपि स्यादिति, तदपि न क्षोदक्षमम्, तथात्वे कस्यापि मन्त्रस्य ग्रन्थस्य वा संशयाद्यनास्कन्दितप्रामाण्यासिद्धेः । कश्च सत्यप्रभवः कश्च तथाविधप्रतिज्ञाप्रभव हुआ, जहाँ पर कि मैथुन को भी साधना का अङ्ग मान लिया गया! आत्मदर्शन तो परम धर्म है ही । बौद्ध आत्मदर्शन को afte का कारण अज्ञानवश ही मानते । यद्यपि विष आदि का निवारण करने वाले बौद्धों में भी देखे जाते हैं, किन्तु इतने से ही उनके मन्त्र अपौरुषेय नहीं मान लिये जायेंगे । अपौरुषेयता में इस तरह की सामर्थ्य को प्रयोजक नहीं माना जाता । वैदिक अहिंसा, सत्य आदि धर्मों के गलत तरीके से पालन करने से कहीं - कहीं कुछ क्षुद्र सिद्धियों उनमें दिखाई पड़ जाती हैं । यह भी कहा गया है कि ' मुद्रा, मण्डल, ध्यान आदि के द्वारा बिना ही अक्षरों के अनेक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं, sant area नहीं कहा जा सकता, यदि इनसे क्रियायें सम्पन्न हो सकती हैं. अक्षर रचना से ही क्रिया की सम्पन्नता मानने वाले वचनों का विरोध होगा । इसलिये इनके लिये कोई कार्य अशक्य नहीं माना जा सकता ' | इसका उत्तर यह है कि याम आदि की तरह मुद्रा आदि का भी विधान होने से ही वे किसी कार्य के सम्पादन में समर्थ होते हैं । सामान्य अक्षर रचना कोई असंभव वस्तु नहीं है, किन्तु वेदाक्षर की रचना अशक्य है । स्वतन्त्र रूप से इनके अर्थी को उपलब्धि नहीं होती । वेदार्थ को बिना जाने वेदवाक्यों की रचना कैसे की जा सकती है । वेदार्थ प्रत्यक्ष और अनुमान से अगम्य है, यह कहा जा चुका है । अहिंसा, सत्य आदि से यदि वेदार्थ की उपलब्धि हो सकती हैं तो उनके बिना ही वेद की सहायता के धर्म का लाभ क्यों होता है? ऐसी अवस्था में विशेषज्ञता और सर्वज्ञता के लाभ के लिये धर्म का अनुष्ठान आवश्यक हैं । धर्मं के लाभ के लिये वेद को स्वीकार करता भी जरूरी है । पूर्व पूर्वतर सर्वशों से उत्तर उत्तर काल के सर्वज्ञों को धर्म का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, ऐसा मानने में अनवस्था दोष होगा । दूसरी बात बौद्ध और जैन सत्य, अहिंसा प्रभृति में बड़ा आदर प्रदर्शित करते हैं । इन्हीं से यदि इनको तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है तो इनमें परस्पर मतभेद क्यों है? सत्य से इनके मन्त्रकल्प परस्पर विरुद्ध क्यों हैं? यह प्रश्न आपने भी पूछा है । आपने यह भी कहा है कि ये मन्त्रकल्प सर्वत्र सत्य से प्रसूत ही नहीं हैं, क्योंकि कहीं कहीं विशेष प्रभाव वाले व्यक्ति की प्रतिज्ञा से भो इनकी उत्पति देखी जाती है । अर्थात् कोई प्रभाव शाली व्यक्ति यह कहता है कि जो कोई व्यक्ति मेरी बनाई गई वर्ण - पद योजना का मेरी बताई हुई विधि से अभ्यास करता है, उसके अभीप्सित प्रयोजन को में पूरा कर सकता हूँ, इस तरह की प्रतिज्ञा के साथ भी अनेक मन्त्रों और कल्पों का निर्माण होता है । इस तरह का प्रभाव मति और सिद्धिविशेष के आधार पर भी हो सकता है । यह कथन भी तर्क के आगे नहीं टिक सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर किसी भी मन्त्र अथवा ग्रन्थ का संशयरहित प्रामाण्य ही सिद्ध न हो पायेगा | कौन सत्य से प्रसूत है, कौन असल्य से प्रसूत

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*** बेवार्थपारिजातः इति निर्णये विनिगमनाभावात् । कश्च प्रभावः सत्यप्रसूतः, कश्च मतिसिद्धिविशेषाम्यामित्यस्याप्यनिर्णयात् । अत एव तथाविधप्रभावशरणयोरपि बौद्धार्हतयोः कलहो दृश्यते । यदि पौरुषेया मन्त्रास्तदा सर्वेऽपि पुरुषाः कि न मन्त्रकारिणः, तत्क्रियासाधनवैकल्यात् । यदि तादृशैः सत्यतपः-प्रभृतिभिर्युक्ताः स्युस्तदा कुर्वन्त्येव । यथा कश्चित्काव्यं करोतीति न सर्वः काव्यकृत् । कस्यचिदकरणे या नव कश्चिदपि न कुर्यादित्यादिकमपि निःसारम् काव्यस्य प्रसिद्धलक्षणत्वात्तद्दर्शनेन तच्छक्तिः फलबलकल्प्या । मन्त्राणां मन्त्रत्वं न तथा प्रसिद्धमपि तु फलसिद्धया मन्त्रत्वं कल्प्यते, फलसिद्धिश्च बहुत्र व्यभिचरति । यस्यां कस्याश्विदपि वाक्यरचनायां दाम्भिकैर्मन्त्रत्वकल्पनात् । काकतालीयम्यायात् क्वचिदमन्त्रेभ्योऽपि फलसिद्धिर्भवति । यदप्युक्तम् - मन्त्रो नाम सत्यादिमत्प्रतिज्ञावचनान्नान्यत्किञ्चित् । तानि च क्वचिद् देवपुरुषेषु दृश्यन्ते, सर्वपुरुषास्तद्रहिता इत्यप्यनिर्णयः, तत्सम्भवस्य विरोधाभावात् । न चात्यक्षजस्वभावेष्वनुपलब्धिरभावनिश्चयहेतुः । न च स्मृति - ( अतीतजन्मादिस्मरणम् ) -मति ( परचित्तावबोध: ) - प्रतिवेध ( अदृष्टेषु पदार्थतत्त्वदर्शनम् ) -सत्य-( अनन्यथावादित्वम् ) शक्तयः सर्वत्र भाविन्यो भवन्तीति, तदपि निःसारम्, पौरुषेयाणामपि मन्त्राणां सत्त्वात् । नहि वैदिका अपौरुषेया मन्त्राः सत्यादिमत्प्रतिज्ञावचनानीत्युक्तमेव । पौरुषेयाः केचित्तथाविधा भवन्त्वित्यन्यत् । सत्यादि-स्वरूपं तस्य धर्मत्वप्रभावोत्पादकत्वादिकमप्यपौरुषेयवेदतन्मूलकशास्त्र कवेद्यम् | आंशिक सत्यादिप्रभावाणां पुरुषेषु सम्भवेऽपि तत्सामस्त्यस्येश्वरादन्यत्रासम्भवात् । परिमितज्ञानसाधनशक्तयो हि पुरुषा दृश्यन्ते । अत्यन्तादृष्टस्य तथा कौन उस तरह की प्रतिज्ञा से प्रसूत हैं, इसका निर्णय किसी विनिगमक के अभाव में न हो पावेगा | कौन सा प्रभाव सत्य प्रसूत है या मति और सिद्धि की विशेषताओं से उत्पन्न हुआ है, इसका भी निर्णय न हो पावेगा । इसीलिये इस तरह के प्रभाव को ही एक मात्र शरण मानने वाले बौद्धों और जैनों में परस्पर कह विद्यमान रहता है । ' यदि मन्त्र पौरुषेय हैं तो फिर सभी मनुष्य मन्त्र का निर्माण क्यों नहीं कर देते, यह इसीलिये होता है कि वे उसकी क्रिया और साधन से विरहित हैं । यदि कोई व्यक्ति सत्य, तप प्रभूति से युक्त है, वह मन्त्र के निर्माण में समर्थ होता ही है । जैसे कि यदि कोई एक व्यक्ति काव्य की रचना कर सकता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि सभी काव्यकार हो जाते हैं अथवा किसी एक में इसकी सामर्थ्य न होने पर अन्य में भी काव्य निर्माण की सामर्थ्य न रहेगी ' | आपका यह कथन भी निःसार है । काव्य के लक्षण प्रसिद्ध हैं । उनको देखकर काव्य निर्माण की शक्ति प्राप्त की जा सकती है । मन्त्रों की स्थिति ऐसी नहीं है, फल की सिद्धि हो जाने पर हो उनमें मन्त्र की कल्पना की जाती है और यह फलसिद्धि अनेक स्थलों में नहीं दिखाई देती । दाम्भिक जन जिस किसी भी वाक्य रचना मैं मन्त्रत्व की कल्पना करते देखे जाते हैं और इस तरह के मन्त्रों से कहीं - कहीं काकतालीय न्याय से फल की प्राप्ति भी होती देखी जाती है । यह भी कहा गया है कि ' सत्य, तप आदि से युक्त व्यक्ति के प्रतिज्ञा वचन ही मन्त्र हैं, इसके अतिरिक्त मन्त्र और कुछ भी नहीं है । ये गुण केवल कहीं - कहीं देवताओं और कुछ विशिष्ट पुरुषों में ही रहते हैं और बाकी पुरुष इनसे रहित हैं, इसका निर्णय कर पाना बड़ा कठिन है । अन्यत्र भी ये हो सकते हैं, इसमें कोई विरोध भी नहीं दिखाई पड़ता । जो पदार्थ adtar स्वभाव के हैं, उनकी मात्र अनुपलब्धि अभाव के निश्चय में कारण नहीं मानी जा सकती । स्मृति ( अतीत जन्मादि का स्मरण ), मति ( परचित का ज्ञान ), प्रतिषेध ( अदृष्ट पदार्थों में पदार्थतत्त्व का दर्शन ), सत्य ( अन्यथा न बोलना ) जैसी शक्तियाँ सर्वत्र नहीं हुआ करती । किन्तु आपका यह कथन भी निःसार है, क्योंकि मन्त्र पौरुषेय भी होते हैं । वैदिक अपौरुषेय मन्त्र सत्य तप आदि के प्रभाव से युक्त व्यक्तियों के प्रतिज्ञावचन नहीं है, यह बात पहले ही बताई जा चुकी है । कुछ पौरुषेय मन्त्र ऐसे होते हों यह बात दूसरी है । सत्य आदि का स्वरूप और उनमें धर्म और प्रभावोत्पादकत्व आदि का ज्ञान अपौरुषेय वेद और तन्मूलक शास्त्रों से ही केवल हो सकता है | आंशिक सत्य आदि का प्रभाव पुरुषों में भी आ सकता है, किन्तु उसका सामस्त्य ( संपूर्णता ) ईश्वर के सिवाय अन्यत्र कहीं नहीं रह सकता | पुरुषों का ज्ञान और उनकी साधन शक्ति परिमित होती है । अत्यन्त अपरिदृष्ट विषय की कल्पना करने पर

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वेदार्थपारिजातः ४१५ परिकल्पने सप्तम रसस्यापि कल्पनाप्रसङ्गात् । केवलाया अनुपलब्धेरभावासाधकत्वेऽपि प्रमाणाभावसहकृताया अनुपलब्धेस्तत्साधकत्वे बावाभावात् । यथेदानीं स्वातन्त्रेण धर्मज्ञानं तन्मूलप्रभावातिशयादिकं न कस्यचिद्भवति, तथैव पूर्वमपि न कस्यचिदासीदित्यनुमातुं शक्यत्वात् । यथेदानीं नेत्रस्य शब्दो न विषयस्तथैवान्यदापीतिवत् । अपि ' च, रजस्तमोलेशाननुविद्धविशुद्धसत्त्वप्रधानविद्योपाधिकस्य परमेश्वरस्यैव ज्ञानशक्त्यादीनां काष्ठाप्राप्तिस्तेन तस्यें-वेश्वरत्व सर्वज्ञत्वादिकम्, न तन्नानात्वं सम्भवति । विरुद्धक्रियासङ्कल्पे कस्यचिद्वैतथ्य प्रोव्येणैकस्यैव तत्त्वात् | अविशुद्ध-सत्त्वप्रधानाविधोपाधिकानां जीवानामल्पज्ञत्वमेव । सर्वज्ञपरमेश्वरनिःश्वासभूत वेदोपदिष्टसत्कर्मत पोयोगोपासनादि-भिशिकप्रभावादय एव जीवे व्यज्यन्ते । योगादिमतरीत्यापि यद्यपि चित्तसत्त्वं सर्वार्थावभासनशक्ति, तथापि तमोवृतं सत् किञ्चिदेवावभासयति । निरतिशयसार्वज्ञबीजं पुरुषविशेषे परमेश्वर एव तस्य चानादिसर्वज्ञतेन । तदितरेषां तु तदुपदिष्टमार्गाश्रयणेनवापेक्षिकं सार्वश्यादिकम् । सादिसार्वश्यं न स्वातन्त्र्येण तत्साधनज्ञानस्य सर्वज्ञो-पदेशसापेक्षत्वात् । तस्याप्यन्य सापेक्षत्वेऽनवस्थानमेव । अत एव पुरुषेषु तत्सम्भवस्य विरोधोऽपि युज्यते । रजस्तमो-लेशानुविद्धाविद्योपाधिकानां सार्वश्यस्य रजस्तमोविरुद्धत्वात् । स्मृतिमत्यादीनां कुत्रचित्सम्भवोऽपि वेदोपदिष्टसाधना-नुष्ठानसापेक्ष एव । अपि च, यदि स्वातन्त्र्येण कस्यचित् सार्वश्यमभ्युपेयम्, तदा नान्यस्य सार्वश्यादिकमिति न वक्तुं शक्यते, बहूनां सार्वश्ये परस्परविरोधो न स्यात् । दृश्यते च वौद्धानामार्हतानां यीशूमुहम्मदादीनाञ्च विरोधः । यदप्युक्तम् - नापि सन्नपि सर्वेद्रष्टुं शक्यः, अत एवादृष्टस्यानपह्नवस्तदपि तुच्छम्, तथात्वेऽपि प्रमेयस्य प्रमाणसापेक्षत्वावश्यंभावित्वात् । अन्यथा शशशृङ्गादीनामप्यभ्युपेयत्वापत्तेः । एतेन नापि पुरुषेषु कस्यचिदप्यु-कोई सप्तम रस की भी कल्पना कर सकता है । केवल अनुपलब्धि अभाव की साधिका नहीं होती, किन्तु प्रमाणाभाव के साथ मिलकर अनुप for भाव की साधिका ही हो सकती है । जैसे कि कोई आजकल स्वतन्त्र रूप से धर्म के ज्ञान की बात कहें । उसके कथन के आवार पर किसी में भी प्रभावातिशय की उत्पत्ति नहीं दिखाई पड़ती, उसी तरह से पहले भी इस तरह की शक्ति किसी में नहीं थी, इस तरह का अनुमान किया जा सकता है । जैसे कि आजकल नेत्रेन्द्रिय का विषय शब्द नहीं है, उसी तरह से पहले भी नहीं था, इसी को उक्त बात के समर्थन के लिये दृष्टान्त रूप में रक्खा जा सकता है । अपि च, रज और तम के लेश से भी रहित विशुद्धसत्त्व प्रधान विद्योपाधिक परमेश्वर में ही ज्ञान, शक्ति आदि की पराकाष्ठा मानी जा सकती है, अतः उसी में ईश्वरत्व और सर्वज्ञत्व की सता रह सकती है | परमेश्वर में नानाश्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि इनमें परस्पर विरुद्ध क्रिया और संकल्प की उद्भावना होने पर किसी एक का वैतथ्य ( मिथ्यात्व ) अवश्य मानना पड़ेगा, अतः तात्विक रूप से ईश्वर एक ही माना जा सकता है | अविशुद्ध सत्व प्रधान अविद्योपाधिक जीवों को अल्पज्ञ ही माना जा सकता है । सर्वज्ञ परमेश्वर के ासभूत वेदों के द्वारा उपदिष्ट सत्कर्म, तप, योग, उपासना आदि से जीव में भी आंशिक प्रभाव उत्पन्न होता है । योगदर्शन के मत से भी यद्यपि चित्तव सभी वस्तुओं के प्रकाशन में समर्थ है, तथापि वह तमोगुण से आवृत होकर कुछ वस्तुओं को ही प्रकाशित कर पाता है । निरतिशय सर्वज्ञता केवल पुरुषविशेष परमेश्वर में हो रहती हैं । यह ईश्वर अनादि सर्वज्ञ है, इससे भिन्न अन्य जीवों में ईश्वर के उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने से आपेक्षिक सर्वज्ञता, सादि सर्वज्ञता अभिव्यक्त होती है, स्वतन्त्र रूप से नहीं । क्योंकि इस सर्वज्ञता के साधन का ज्ञान सर्वज्ञ के उपदेश से ही हो सकता है, यदि इसके लिये अन्य सर्वज्ञ की कल्पना की जाय तो उसमें अनवस्था के सिवाय और कुछ हाथ न लगेगा | इसी लिये साधारण जीवों में उसकी उत्पत्ति मानने वाले मत का विरोध भी सार्थक होता है, क्योंकि रज और तम के लेश से अनुविद्ध afrature जीवों में सर्वज्ञता और रज और तम की स्थिति का परस्पर विरोध रहेगा । स्मृति - मत्यादि गुण की कहीं उत्पत्ति हो सकती है, किन्तु यहाँ पर भी वेदोपदिष्ट साधन का अनुष्ठान अपेक्षित है । यदि स्वातन्त्र्येण किसी को हम सर्वज्ञ मान लें तो फिर उसी पद्धति से दूसरे व्यक्ति में भी सार्वय की अभिव्यक्ति नहीं होगी, ऐसा हम नहीं कह सकते । इस तरह से जब अनेक सर्वज्ञ हो जायेंगे, तो उनमें परस्पर विरोध अवश्य उपस्थित होगा । यह विरोध बौद्धों और जैनों में, ईसाईयों और मुसलमानों में देखा भी जाता है ।

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४१६ वेदार्थपारिजातः त्पित्सोमनोगुणस्य प्रतिरोद्धास्ति, बाधकस्यादृष्टैर्बाध्यबाधकभावासिद्धेरित्यप्यपास्तम् आविद्यकस्य तमसो बाधक-स्योक्तत्वात् । तेन भट्टपादादिर्वाणतसर्वज्ञादिप्रतिषेधादयोऽपि समीचीना एव । यदुक्तम् --- अतत्साधनसम्प्रदायोऽयं कथमिवान्येषां तथाभावो एवंभूतो नेति न न्यायः, नादृष्टज्ञापकमित्यपि नहि ज्ञापकानुपलम्भमात्रेण ज्ञाप्यस्याभावो न्यायः । सतामपि केषाञ्चिदर्थानां लिङ्गस्य कार्यस्यानारम्भसम्भवात् । स्वभावविप्रकर्षेण द्रष्टुमशक्यत्वात् । तदपि बालजनमोहनमेव, तत्र प्रमाणस्यावश्यं वक्तव्यत्वात् । नहि शपथमात्रेण तादृशवस्तुसत्त्वमभ्युपेतुं शक्यम्, तथात्वे प्रमाणाभावसहकृताया अनुपलब्धेर्देत्तजलाञ्जलिताप्रसङ्गात् । अत एव वेदा-ध्ययनं गुर्वध्ययनपूर्वकमिति न व्यभिचारि । भारताध्ययने वेदविशेषणस्याभावादेव न व्यभिचारः । यदप्युक्तम् - कः पुनरतिशयो वेदाध्ययनस्येति चेत्, विरच्याध्ययनासम्भवादेवेत्यवेहि । अत एवान्यथाध्ययनं न शक्यते । अत एव नहि विशेषणमविरुद्धविपक्षेण सह अस्माद्धेतुं निवर्तयति, अविरुद्वयोरेकत्र सम्भवादित्यपि निरस्तम्, अविरोधस्यैवासिद्धत्वात् । वेदाध्ययने तदितराध्ययनवैलक्षणस्य साधितत्वात् । यथेदानीन्तनैनं स्वतो विरथ्य वेदाध्ययनं क्रियते, तथैव पूर्वतनैरपीति सिद्धमेव, प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य भारतादिवद्वेदरचनाऽसम्भवात् । अदर्शनमपि तत्साधयत्येव, केवलस्य तदसाधकत्वेऽपि प्रमाणाभावसह्कृतस्यानुपलम्भस्य साधकत्वे बाघाभावस्योक्तत्वात् । अत एव विशेषणमपि नानुपासमम् । अत एव यत्किञ्चिद्वेदाध्ययनं तद्वेदाध्ययनान्तरपूर्वकमिति व्याप्तिरपि सिद्धयत्येव, सर्वस्य तथाभावसिद्धेः । आप यह भी कहते हैं कि ' अदृश्य वस्तु की सत्ता रहने पर भी वह दिखाई नहीं पड़ती, अतः उसका अभाव नहीं माना जा सकता । ' किन्तु आपका यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि वस्तु की सत्ता बिना प्रमाण के नहीं मानी जा सकती, अन्यथा शशशृंग ( खरगोश के सींग ) जैसे अलीक पदार्थों की भी सत्ता माननी पड़ जायगी । इसी युक्ति से आपके इस कथन का भी उत्तर हो जाता है कि ' पुरुषों के मन में उत्पन्न होने वाले गुणों को रोकने वाला कोई नहीं है, क्योंकि बाधक के अभाव में बा sara कभाव बन नहीं सकता । ' इसका सीधा उत्तर यह है कि हमने ऐसे प्रसंगों में अविद्या से उत्पन्न तम को बाधक माना है । इसलिये कुमारिल भट्ट प्रभृति के द्वारा वर्णित जैन और बौद्धों की अभिमत जिन आदि की सर्वज्ञता का प्रतिषेध सर्वथा समीचीन है । आप यह भी कहते हैं कि ' यह संप्रदाय किसी वस्तु का साधन करने वाला नहीं है । दूसरी वस्तु का कोई स्वरूप ऐसा नहीं है, यह न्याय कैसे सिद्ध किया जा सकता है । ज्ञापक नहीं दिखाई देता, इसलिये भी ज्ञायमान के न मिलने मात्र से ज्ञाप्य का अभाव मान लेना न्यायसंगत नहीं है । अनेक सत्तावान् पदार्थ ऐसे देखे जाते हैं, जो कि किसी कार्य को नहीं पैदा करते और स्वभाव की विशिष्टता के कारण देखे भी नहीं जा सकते । ' किन्तु यह बात भी नासमझ लोगों का ही मनोरंजन कर सकती है, आपको अपनी बात के समर्थन में प्रमाण अवश्य देना पड़ेगा । केवल शपथपूर्वक प्रतिज्ञा करने से इस तरह की वस्तु की सत्ता नहीं मानी जा सकती, ऐसा मानने पर हमको प्रमाणाभाव सहकृत अनुपलब्धि को तिलांजलि दे देना पड़ेगा । इसी लिये वेदाध्ययन गुर्वध्ययनपूर्वक है, यहाँ पर हेतु का व्यभिचार नहीं है । भारत के अध्ययन में वेद विशेषण के न रहने से ही वहाँ पर इस लक्षण की प्रसक्ति नहीं होगी । ara यह भी कहा है कि ' वेदाध्ययन का वह अतिशय क्या है? इसके उत्तर में यही कहा जायगा कि इसका रचना-पूर्वक अध्ययन नहीं किया जाता । इसी लिये इसका अन्यथा ( गुरु के बिना ) अध्ययन नहीं किया जा सकता । इसी लिये विशेषण afana fav क्ष से इस हेतु को नहीं निवृत्त कर सकता, क्योंकि दो अविरोधी पदार्थ एक साथ रह सकते हैं । ' इसका समाधान यह है कि यह अविरोध ही तो असिद्ध है । वेद के अध्ययन से तदितर अध्ययन की विलक्षणता सिद्ध की जा चुकी है । जैसे आजकल के लोग वेदाध्ययन स्वयं रचना करके नहीं करते, उसी तरह से पहले के लोग भी बिना रचना के गुरुमुख से ही वेदाध्ययन करते थे । प्रमाणान्तर से अर्थ का ज्ञान प्राप्त कर भारत आदि की रचना की गई, वैसे वेद की रचना नहीं हो सकती | अदर्शन भी अभाव को सिद्ध कर ही देता है, केवल अनुपलब्धि भले ही अभाव की साधिका न हो, किन्तु प्रमाण के न होने पर तो अनुपलब्धि वस्तु के अभाव को सिद्ध करके ही छोड़ेगी, यह कहा जा चुका है । इसी लिये विशेषण भी अनुपात्तसम नहीं है, अर्थात् विशेषण का देना न देना दोनों बराबर नहीं है । विशेषण के कारण ही जो कुछ भी आज का वेदाध्ययन हैं, वह उस वेदाध्ययन के पूर्ववर्ती अध्ययन से सदृश है, इस तरह की व्याप्ति बन पाती है, क्योंकि पूरी वेदाध्ययन की परम्परा वैसी ही है ।

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II यदुक्तम्- ' यादृशं तन्निमित्तं दृष्टं तत्तथैवेति स्यात्, तन्निमित्तस्य ( जाडयादिनिमित्तस्य ) परपूर्वका ध्ययनस्येदानीन्तनेषु दृष्टत्वादेव सामान्यग्रहणं हि हुताशनसिद्धौ पाण्डद्रव्यवद् व्यभिचार्येव ( अग्निसाध्ये धूमे यः पाण्डुविशेषो दृष्टस्तत्त्यागेन पाण्डुद्रव्यसामान्यमुपादीयमानमग्निसिद्धो व्यभिचारि तद्वदित्यर्थः ), तदप्यसङ्गतम्, स्वयं विरच्याध्ययनस्य वेदे बाधितत्वादेव सामान्याध्ययनहेतोः स्वरूपासिद्धत्वात् । एवमेव रागादिप्रतिवचनमपि निःसारम्, प्रवृत्ते रागमूलत्वात् । तदुक्तम् -- ' यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् । अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् ॥ सम्प्रदायप्रवर्तने प्रवृत्तस्य बुद्धस्य राममोहादयोऽनुमातुं शक्या एव । न चेश्वरेऽपि स्रष्टृत्वादिना रागादिमत्त्वम्, तस्य स्वतन्त्रत्वेन वशीकृतमायत्वात् । बुद्धादीनामपि तथाविधेश्वरत्वाङ्गीकारेऽपसिद्धान्त एवानीश्वर-वादिनो बुद्धस्य | ' लोह लेख्यत्वसाध्यस्य वज्र दर्शनतो यथा । पार्थिवत्वस्य हेतोहि व्यभिचारोऽनुभूयते || यथा तथेह सुज्ञेयः स्वकृताधीतिवाधतः । भेदः प्रदर्शितः सम्यग्गिरोलौकिकश्रौतयोः ॥ इदानीन्तन लोकेषु स्वकृताधीतिविप्लवात् । पुरातना अपि तथा किं न स्युरविशेषतः । इत्थं सुदृढमस्माभिगरां भेदे प्रदर्शिते । दीर्घजीवातुसम्पन्ना सुस्थिता -पौरुषेयता । ' यदप्युक्तम् -- ' पुरुषा एवं स्वयमभ्यूह्याधीयते परतो वा? तेषामव्यापृतकरणानां स्वयं शब्दा न ध्वनयन्ति येनापौरुषेयाः स्युः । तस्मात् कथञ्चिदनादित्वसिद्धावपि नापौरुषेयत्वसिद्धिः । अथानादित्वादेवापौरुषेयत्वमिष्यते चेत्तदाऽनादिप्रवृत्तस्य व्यवहारस्याप्यपौरुषेयत्वं स्यात् । तस्मात्पुरुषव्यापारेणैव शब्दानां ध्वननाल्लौकिकवाक्यवत्पौरुषेय-त्वमेव वेदानामपि । ‘ सर्वथाऽनादिता सिद्ध देवं नापुरुषाश्रयः । तस्मादपौरुषेयत्वं स्यादन्योऽप्यनराश्रयः ॥ ' ( प्र ० वा ० यह भी कहा है कि ' जिसका जैसा निमित्त देखा जाता है, वह उसी तरह का होता है, जाड्यादिनिमित्त परपूर्वक अध्ययन की परम्परा आजकल के मनुष्यों में भी देखी जाती है, यह सामान्यग्रहण हुताशन ( अग्नि ) की सिद्धि के लिये उपात्त पाण्डु द्रव्य के समान व्यभिचारी है, अर्थात् अग्नि के साध्य धूम में जो एक विशेष प्रकार की पाण्डुता देखी जाती है, उसी के अनुकरण पर घूमत पाण्डुता को छोड़कर यदि पाण्डु ( सफेद ) द्रव्य सामान्य को हेतु के रूप में उपस्थित किया जाय तो वह व्यभिचारी होगा, उसी तरह से पूर्वापर अध्ययन की वेदाध्ययन के साथ व्याप्ति बनाने से भी दोष उपस्थित होगा । ' किन्तु यह कथन भी असंगत है, स्वयं रचना करके किया जाने वाला अध्ययन वेद में बाधित है, अतः सामान्याध्ययन रूप हेतु स्वरूपासिद्ध है । इसी तरह से रागादि जन्य प्रवृत्तियों के विषय में आपका उत्तर भी सारहीन है, क्योंकि सभी प्रवृत्तियाँ राम के कारण ही होती है । जैसा कि कहा गया है- ' यह प्राणी जो कुछ भी करता है, उसके मूल ' काम, राग की हो प्रवर्तकता प्रतीत होती है । जो व्यक्ति कामनारहित है, उसकी संसार में कभी कोई चेष्टा नहीं देखी जाती । ' संप्रदाय की प्रवृत्ति में लगे बुद्ध में भी राग, मोह आदि का अनुमान लगाया ही जा सकता है । इसी पद्धति से ईश्वर में भी सृष्टिकर्ता के रूप में रागादि की स्थिति मानी जा सकती है, किन्तु वह तो स्वतन्त्र है, उसने माया को अपने वश में कर लिया है, अतः उसमें राग- मोह आदि की संभावना ही कहाँ रह जाती है । यदि बुद्ध आदि को भी उसी तरह का ईश्वर मान लिया जाय तो अनीश्वरवादी बौद्ध के लिये यह तो अपसिद्धान्त की स्वीकृति हो जायगी । ' पार्थिवत्व की सिद्धि के लिये लोह-लेख्यत्व हेतु का व्यभिचार जैसे वज्र में देखा जाता है, क्योंकि वह लोहलेख्य नहीं होता, किन्तु पार्थिव तो होता ही है, उसी तरह से वेदाध्ययन में भी स्वयं रचना करके अध्ययन का बाध होने से लौकिक और श्रीत वाक्यों का भेद भलीभांति हो जाता है | आज के वेदाध्येता लोगों में स्वकृत अध्ययन का विप्लव देखकर पुरातन लोग भी इसी तरह से वेद का अध्ययन करते थे, ऐसा क्यों न माना जायगा । इस तरह से लौकिक और वैदिक वाक्यों का सुदृढ प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट भेद प्रदर्शित कर दिये जाने के बाद चिरकाल से चली आ रही वेद की अपौरुषेयता सुस्थिर हो जाती हैं । ' पूछा जाता है कि पुरुष अपनी समझ के अनुसार स्वयं पढ़ लेते हैं, या इसके लिये दूसरे की सहायता लेते हैं? दोनों ही परिस्थिति में जब तक वे इसके लिये अपनी इन्द्रियों को प्रेरित नहीं करेंगे, तब तक शब्द स्वयं ही उनके कान में नहीं पहुँच जायेंगे, जिससे कि उनको अपौरुषेय माना जाय । इसलिये इनकी अनादिता तो किसी तरह से सिद्ध हो भी सकती है, किन्तु अपौरुषेयता नहीं सिद्ध हो सकती । यदि अनादिता के कारण हो इनकी अपौरुषेयता मानी जाती है तो उस परिस्थिति में अनादि काल से प्रवृत्त व्यवहार को भी

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# वैवार्थपारिजातः ३।२४५ ) तदपि निःसारम्, भावानववोधात् । तथाहि नहि पुरुषोच्चरितत्वमात्रेण पौरुषेयत्वम्, तद्भिन्नत्वमपौरुषेयत्वम्, किन्तु प्रथमोच्चरितत्वम्, तथात्वस्य वेदेऽप्यभ्युपगमात् । प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचितत्वं पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्षो-aaftarana ar पौरुषेयत्वम् तद्भिन्नत्वमपौरुषेयत्वमित्यसकृदवोचाम | अत एव नानादित्वमात्रेणापौरुषेयत्वं येनादिसिद्धव्यवहारेऽतिव्याप्तिः स्यात् । ' पुरुषोच्चरितत्वेन पौरुषेयत्वभागिह । नेष्टो वेदो यतोऽत्रार्थे प्रमाणान्तर-शून्यता | आद्योच्चारणमेवेह निरपेक्षमथापि वा । प्रमाणान्तरसापेक्ष मर्थज्ञानानुसारि यत् । तदेवेष्टं हि निर्माणं तच्च वेदेन सम्भवि । ' यदप्युक्तम् - अपि स्युरपौरुषेया यदि पुरुषाणामादिः स्यात् । तदाप्यन्यपूर्वकं न सिद्ध्यति, अध्यापयितु-रभावात् । तत्प्रथमोऽध्येता कर्तेव स्यात् । तद्रयमनादिः पूर्व प्रदर्शनप्रवृत्तो डिम्भकपांसुक्रीडादिवत् पुरुषव्यवहार इति स्यान्नापीरुषेय एव | अनादित्वादपौरुषेयत्वे बहुतरमिदानीमपौरुषेयं स्यात् । तथा च ' म्लेच्छादिव्यवहाराणां नास्तिक्य-वचसामपि । अनादित्वे तथा भावः पूर्वसंस्कारसन्ततेः || ' ( प्र ० वा ० ३१२४६ ) म्लेच्छव्यवहारा मातृविवाहादयो मदन-महोत्सवादयश्चानादयः । नास्तिक्यवचांसि चापूर्वपरलोकक्षयवादीनि । नहि तान्यनाहितसंस्काराः प्रवर्तयन्ति, स्वप्रतिभारचितसमयानामपि यथाश्रुतार्थविकल्पसंहारेणैव प्रवृत्तः । तत्किञ्चित्कुतश्चिदागतमित्येकस्योपदेष्टुः प्रबन्धेना-भावादपरपूर्वकमित्युच्यते । प्रागेव यथादर्शनप्रवृत्तयः सम्यमिध्याप्रवृत्तयो लोकव्यवहाराः । नन्वादिकल्पिकेष्वदृष्ट-व्यवहाराः पश्चात्प्रवृत्ता इष्यन्त इति चेन्स, तेषामप्यन्यसंस्काराहितानां यथाप्रत्ययं प्रबोधादिति, तदपि निःसारम्, अपौरुषेय मानना पड़ेगा । पुरुष के व्यापार ( प्रयत्न ) से ही शब्दों का ध्वनन होता है, अतः लौकिक वाक्यों की तरह वैदिक वाक्यों को भी पौरुषेय ही मानना पड़ेगा । जैसा कि प्रमाणवार्तिक में कहा गया है— ' इस तरह से वेदाध्ययन की अध्ययनपूर्वकता को सिद्ध करने पर भी उसकी अनादिता ही सिद्ध हो सकेगी, अपौरुषेयता नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर अन्य अनादि लौकिक व्यवहारों को भी अपौरुषेय मानना पड़ जायगा । यह कथन भी निःसार है, क्योंकि आपने हमारी बात का अभिप्राय ठीक से नहीं समझा । पुरुष के द्वारा उच्चरित होने और न होते मात्र से कोई पौरुषेय और अपौरुषेय नहीं हो जाता, किन्तु इसका प्रयोजक प्रथमोच्चरितत्व है । यह लक्षण केवल वेद में हैं । यह हम अनेक बार कह चुके हैं कि पौरुषेयत्व का प्रयोजक प्रमाणान्तर से अर्थ को जानकर की गई रचना ही है, अथवा पूर्व की आनुपूर्वी से निरपेक्ष उच्चारण को पौरुषेय माना जाता है । अपश्यता के प्रयोजक इससे ठीक विपरीत हैं । इसीलिये केवल अनादिता के कारण अपौरुषेयता सिद्ध नहीं होती, जिससे कि अनादिसिद्ध व्यवहार को भी अपौरुषेय मानना पड़े । इस बात को संक्षेप में इस प्रकार कहा जा सकता है - ' पुरुष से उच्चरित होने मात्र से वेद में पौरुषेयता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इस बात की सिद्धि के लिये प्रमाणान्तर का अभाव है । आय उच्चारण ही पौरुषेय है अथवा निरपेक्ष उच्चारण पौरुषेय होता है । अथवा निर्माण की परिभाषा यही है कि वह प्रमाणान्तर सापेक्ष अर्थ के ज्ञान का अनुसरण करती है । पौरुषेयता के स्वरूप को बताने वाली ये तीनों ही बातें aa aaaft area नहीं " । यह भी कहा गया है कि --- ' वेद अपौरुषेय तभी माने जा सकते हैं, जब कि पुरुषों की आदिता मानी जाय । ऐसा मानने पर भी वेद के अध्ययन की अन्यपूर्वकता नहीं सिद्ध होगी, क्योंकि तब कोई अध्यापयिता ही नहीं होगा । इसलिये प्रथम अध्येता को कर्ता ही मानना पड़ेगा । इस तरह से यह वेदाध्ययन उसी तरह का एक अनादि पुरुषव्यवहार माना जायगा, जैसा कि पहले के बच्चों को देखकर बाद के बच्चों को धूलिक्रीडा का व्यवहार होता है, इसको अपौरुषेध नहीं माना जा सकता । अनादिता को हो यदि rudent का प्रयोजक मान लिया जाय तो इस तरह के अनेक अपौरुषेय पदार्थ मानने पड़ जायेंगे । दसीलिये प्रमाणवार्तिक में कहा गया है कि- ' अनादिता को ही यदि अपौरुषेयता का प्रयोजक माना जाता है तो म्लेच्छादि के व्यवहारों तथा नास्तिक वचनों को भी अपो मानना पड़ेगा, क्योंकि इनमें भी पूर्व पूर्व संस्कारों की सन्तति विद्यमान है ' । म्लेच्छ व्यवहार ( माता से विवाह करना ) और मदन महोत्सव प्रभृति भी अनादि परम्परा से चले आ रहे हैं । इसी तरह से पूर्व और परलोक का अभाव मानने वाले नास्तिकों के aar भी अनादि परम्परा से चले या रहे हैं । संस्कारों की पूर्व परम्परा के बिना इनकी एकाएक प्रवृत्ति नहीं हो जाती । अपनी प्रतिभा

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४१५ अनुक्तोपालम्भात् । तथाहि --- नानादित्वमपौरुषे पत्वप्रयोजकमित्युक्तमेव । एवं यथाकथचिदन्यपूर्वकत्वमपि ना-पौरुषेयत्वप्रयोजकम्, पूर्वोक्तव्यभिचारादेव । पूर्वानुपुर्वी निरपेक्षोच्चारणकत्वादिभिन्नत्वमेव तदित्यवोचाम | संसारस्या-नादित्वात्पुरुषप्राथम्यमसिद्धमेव । सृष्ट्यादौ पुरुषप्राथम्यं भविष्यतीति चेत्, मीमांसकमते खण्डसृष्टिप्रलयाङ्गीकारेऽपि समष्टिसृष्टिप्रलयानङ्गीकारात् । उत्तरमीमांसकरीत्या स्रष्टुः परमेश्वरस्याप्यनादित्वमेव । परमेश्वरेणापि पूर्वकल्पीया-मानुपूर्वी मनुस्मृत्येवोत्तरकल्पीयानुपूर्वी पठ्यत उपदिश्यत इति सोऽपि न कर्ता किन्त्वध्येतैव । एतेन तादृशेऽपौरुषेयत्वे कः सिद्धेऽपि गुणो भवेत् ' । ( प्र ० वा ० ३३२४७ ) इत्यप्यपास्तम्, वेदे तादृशस्यापौरुषेयत्वस्थानभ्युपगमात् । यदुक्तम्- ' कामम विसंवादकमित्यपौरुषेयत्वमिष्टं तद्विसंवादकानामपि केषाचिदनादित्वमस्तीति किमपौरुषेयत्वेनेति, तदप्यकिञ्चित्करम्, प्रमाणानां प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वाभ्युपगमात् । संवादविसंवादाभ्यां प्रामाण्या-प्रामाण्यनिर्धारणे तत्परतस्त्वापत्तेः । अपौरुषेयत्वेन तु पुरुषाभावात् पुरुषाश्रित श्रमप्रमादकरणापाटवादिदोषा-संपृक्ततयाऽप्रामाण्यशङ्कानुत्थानाद् बावसंशयादर्शनाच्चानपोदितं सत्प्रामाण्यस्वतस्त्वमेव तिष्ठति । स्पष्टमेवापौरुषेय " त्वस्य महत्त्वम् । यदुक्तम् -- ' वेदवाक्यानामपौरुषेयत्वेऽपि ' अर्थसंस्कारभेदानां दर्शनात्संशय: पुनः ' ( प्र ० वा ० ३।२४८ ) तथात्वेऽपि यदि प्रतिनियतामेव तदर्थप्रतिभां जनयेत्तदा स्यादप्याश्वासनम्, यथेष्टं तु समारोपापवादाभ्यां नैरुक्तमीमांस-से संकेतों की उद्भावना करने वाले भी यथाश्रुत अर्थ विकल्पों के सहारे से ही ऐसा करते हैं । इसमें कहीं से कुछ मिलता है और कहीं से कुछ । एक उपदेश में इन सब की स्थिति नहीं रहती, इसीलिये इनकी अपरपूर्वकता मानी जाती है । प्रारम्भ से ही यह देखा जाता है कि जिसको जैसा दिखाई दिया, तदनुसार सत्य और मिथ्या लोकव्यवहार प्रवृत्त होते रहे हैं । यह कहना उचित नहीं है कि कल्प के आदि काल में जो व्यवहार नहीं देखे गये, ये बाद में प्रवृत्त माने जायेंगे, क्योंकि उनकी भी प्रवृत्ति अन्य संस्कारों से स्थापित वासनाओं के अनुसार उद्भूत होती रहती है किन्तु यह सारा कथन निःसार है, क्योंकि यह हमारे ऊपर अनुक्त का उपालम्भ है । यह कहा जा चुका है कि हम अनादित्व को अपौरुषेयत्व में प्रयोजक मानते ही नहीं । फिर उसके आवार पर दोष देना मिथ्या उपालम्भ ( आरोप ) है । इसी तरह से यथाकथंचित् अन्यपूर्वकत्व भी after का प्रयोजक नहीं है, क्योंकि वहाँ पर भी पूर्वोक्त व्यभिचार है । पूर्वानुपूर्वी निरपेक्ष उच्चारण से भिन्न ही उच्चारण अपौरुषेय कहलाता है, यह हम कह चुके हैं । संसार की अनादिता के कारण पुरुष का प्राथम्य सिद्ध है । सृष्टि के प्रारम्भ में भी पुरुष का प्राथम्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि मीमांसक के मत से खण्ड सृष्टि और खण्ड प्रलय के माने जाने पर भी समष्टि ( सब पदार्थों का ) सृष्टि - प्रलय नहीं माना जाता । उत्तर मीमांसक ( वेदान्ती ) की रीति से स्रष्टा परमेश्वर भी अनादि है । परमेश्वर भी पूर्वं कल्प की आनुपूर्वी का स्मरण करके ही उत्तर कल्प की आनुपूर्वी का उपदेश करता है, इस तरह से वह भी कर्ता नहीं है, किन्तु पाठक मात्र है । इस तरह से प्रमाणवार्तिक की इस उक्ति का उतर हो जाता है कि ' इस तरह की अपौरुषेयता के सिद्ध हो जाने से भो क्या फायदा होने वाला है, क्योंकि वेद में आपकी बताई गई पद्धति की अपौरुषेयता न होकर उससे भिन्न प्रकार की अपौरुषेयता मानी जाती है । यह भी कहागया है कि- - ' ' अविसंवादकता के कारण भले ही अपौरुषेयता मानी जाय, किन्तु उसके विसंवादक वाक्यों को भी अनादिता है, इस परिस्थिति में अपौरुषेयत्व से क्या लाभ होने वाला है ' | यह कथन भी अकिंचित्कर है, क्योंकि प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध माना जाता है । संवाद और विसंवाद के आधार पर प्रामाण्य और अप्रामाण्य का निर्धारण करने पर प्रामाण्य के परतस्त्व की आपत्ति होगी । वेद वाक्यों को अपौरुषेय मानने पर उसका पुरुष से संपर्क न होने से पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, करणापाव आदि पुरुष के दोषों से भी सम्पर्क न होगा । इस तरह से अप्रामाण्य की आशंका के न उठने से और बाघ, संशय आदि के भी न रहने से उसका स्वतः प्रामाण्य निर्वाध रूप से विद्यमान रहता है । इस तरह से अपौरुषेयता का महत्व स्पष्ट है । fe are at aro षेयता मान लेने पर भी प्रमाणवासिक में यह आपत्ति उठाई गई है कि ' वेद वाक्यों के अपने-अपने संस्कार प्रतिभा आदि के बल पर अर्थभेद व्याख्यात है, अतः पुनः संशय उपस्थित हो जाता है कि इनका वास्तविक अभिप्राय क्या है? ' अपौरुषेय होने पर भी वेद वाक्य यदि किसी निश्चित अर्थ की प्रतिभा को हो जन्म दें तो उससे हम उसकी अपौरुषेयता

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 450 का मूल पृष्ठ
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४२० वेदार्थपारिजातः कादयो वेदवाक्यानि विशसन्तो दृश्यन्ते । न च तेषां तेऽर्था न घटन्ते । समयप्राधान्यादर्थनिवेशस्यैकस्य वाक्यस्यानेकार्थ-विकल्पसम्भवात्, प्रकृतिप्रत्ययानामनेकार्थपाठात् । रूदेरप्यनेकान्तेनानुमते ररूढशब्द बाहुल्यात्तदर्थस्य पुरुषोपदेशापेक्षणात्, तदिच्छावृत्तेर निर्णय एव वाक्यार्थेषु, तदप्यकिञ्चित्करम्, अनाद्यविच्छिन्नपारम्पर्येणार्थावगमे बाधाभावात् । साम्प्रदायिकैर्महर्षिभिर्वेदार्थवर्णनाच्च । क्वचित्क्वचिन्मन्त्ररूपवेदस्य व्याख्यानं ब्राह्मणरूपैर्वेदेरेव क्रियते । अत एव मन्त्र-ब्रह्मणः श्रोः कात्यायनाश्वलायनादिसूत्रर्याज्ञिकादानां पद्धनिभिर्योऽर्थः सिद्धयति स एव वेदार्थः । पारम्पर्येणेव याज्ञिका जानन्त्यनुतिष्ठन्ति च । पुराणेतिहासादिभिर्धर्मशास्त्रश्च स एवार्थः समर्थ्यते, पूर्वोत्तरमीमांसाभ्यां स एव मीमांस्यते, व्याकरणनिरुक्तादोनामपि तदनुसार्यवोपयोगः | योगरूढयादीनामपि तात्पर्यानुसार्येवाश्रयणम् । यत्परः शब्दः स शब्दार्थं इति रीत्योपक्रमोपसंहाराभ्यासापूर्वत्वफलार्थवादोपपत्तिभिश्च तात्पर्यं निर्धार्यते । न च वेदे पुरुषाभावात् पुरुषाभिप्रायरूपस्य तात्पर्यस्यासम्भव एवेति वाच्यम्, सप्रयोजनबुद्धिकारणत्वस्यैव वाक्यतत्परत्वाम्युपगमात् । तदुक्तम्-' सप्रयोजनक बुद्धिकारणं वाक्यमाहुरिह तत्परं बुधाः । पदवाक्यतदर्थशाब्दन्याया: केचन सर्वसम्प्रतिपन्ना एव । अन्यथा स्वदुक्तीनामपि तात्पर्यनिर्धारणादपार्थक एवं ग्रन्थलेखनादिरूपस्त्वत्प्रयासोऽपि । तथा च ' अर्थसंस्कारभेदानां सत्त्वेऽ-व्यर्थस्य निर्णयः । तात्पर्यादस्तु तस्यापि निर्णयस्तत्प्रयोजनः । षड्भिलिङ्गेर्भवेन्नित्यं वेदार्थावगमः किल ॥। ' यदप्युक्तम् - वर्णानां वाक्यानाच नित्यत्वं न सम्भवति । ' अन्याविशेषाद्वर्णानां साधने किं फलं भवेत् ' ( प्र ० वा ० ३।२४८ ) । नहि लोकवेदयोर्नाना वर्णाः । भेदेऽपि च प्रत्यभिज्ञानाविशेषस्तत एकत्वासिद्धि प्रसङ्गात् भेदानुप-पर मस्त हो सकते हैं, किन्तु इसके विपरीत अपनी - अपनी इच्छा के अनुसार समारोप और अपवादों का सहारा लेकर नेरुक्त, ities प्रभूति वेद वाक्यों की कतर व्योत करते देखे जाते हैं । उनके बताये अर्थ घटित न होते हों, ऐसी भी बात नहीं है । संकेत की प्रधानता मानने पर एक ही अर्थ के लिये प्रयुक्त वाक्य के अनेक अर्थ हो सकते हैं, क्योंकि प्रकृति और प्रत्यय अनेकार्थक होते हैं । रूढि भी अनियमित होने के कारण अनेक अर्थों की अनुमति दे ही देती है । फिर अरू शब्द भी बहुत से हैं । इनका अर्थ बिना पुरुष के उपदेश के अवगत नहीं होता और यह पुरुष की इच्छा का अनुसरण करता है, अतः ऐसी परिस्थिति में वाक्यों के अर्थ का निश्चय ही न हो पावेगा । ' यह कथन भी किचित्कर है, क्योंकि अनादि, अविच्छिन्न परम्परा के आधार पर अर्थ को अवगति में कोई बाधा नहीं हो सकती और साम्प्रदायिक ( गुरुपरम्परानुसारी ) महर्षिगण वेदार्थ का वर्णन भी करते हैं । कहीं - कहीं मन्त्र रूप वेद का व्याख्यान ब्राह्मणरूप वेदों में ही किया गया है । इसलिये मन्त्र, ब्राह्मण, कात्यायन, भाश्वलायन प्रभूति श्रीसूत्र और याज्ञिक पद्धतियों से जो अर्थ सिद्ध होता है, वही वेदार्थ है । इसको याज्ञिकगण गुरुपरम्परा से ही जानते हैं और तदनुसार अनुष्ठान करते हैं । पुराण, इतिहास और धर्मशास्त्र उसी अर्थ का समर्थन करते हैं, पूर्व और उत्तर मीमांसा विचार के द्वारा उसी अर्थ की परीक्षा करती है और व्याकरण, free आदि का उपयोग भी उसी परम्परा को समझने के लिये है । तात्पर्य के अनुसार ही शब्दों में योग, रूढि आदि का आश्रय लिया जाता है । ' शब्द जिस अभिप्राय से कहा जाता है, वही उसका अर्थ है ' इस न्याय के अनुसार उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता फल, अर्थवाद और उपपत्ति के आधार पर तात्पर्य का निश्चय होता है । वेद में पुरुष नहीं है, अतः पुरुषाति तात्पर्य भी कैसे रहेगा? इसका यह समाधान है कि वाक्य के तात्पर्य का अभिप्राय इतना ही माना जाता है कि वह सप्रयोजन बुद्धि का प्रेरक हो । जैसा कि कहा गया है --- ' तत्परः शब्दार्थ: ' इस नियम स्थल में वाक्य का तात्पर्य इतना ही माना जाता है कि वह सप्रयोजन afa ( ज्ञान ) का उत्पादक हो । ' पद वाक्य और पदार्थ वाक्यार्थ संबन्धी कुछ न्याय सर्वसंमति से स्वीकृत हैं । अन्यथा आपकी उक्तियों का भी कोई तात्पर्य निर्धारित न होने से ग्रन्थ लेखन आदि का सारा प्रयास हो व्यर्थ हो जायगा । इसी लिये कहा गया है कि ' अर्थ ' और उनके संस्कारों की मित्रता रहने पर भी अर्थ का निर्णय तात्पर्य के अनुसार हो सकेगा । इस तात्पर्य का निर्धारण भी तात्पर्य के प्रयोजक षविध लिंग से हो जायगा । इस तरह से वेदार्थ की अवगति में कभी भी कोई बाधा नहीं आ सकती । " यह भी आक्षेप उठाया गया है कि ' वर्णों और वाक्यों की नित्यता नहीं मानी जा सकती । ' लौकिक और वैदिक वर्णों और वाक्यों में परस्पर कोई वैशिष्ट्य नहीं है, इस परिस्थिति में वर्णों की अपोरुषेयता सिद्ध करने से क्या मिलने वाला है? लोक